जीवन में साहित्य का महत्व : प्रेमचंद

munshi-premchand

सिकंदर हयात

अपने एक लेख में प्रेमचंद बताते हे की जीवन में साहित्य का क्या महत्व हे ? क्या स्थान हे क्यों हे ? आज की भागती दौड़ती जिंदगी में इंसान किसी चीज़ से सबसे ज़्यादा दूर हो रहा हे तो साहित्य भी हे इसके दुष्परिणाम भी साफ़ तौर पर देखे जा सकते हे लोगो की अच्छा कहने सुनने की एक दुसरे को समझने की रोचक बातचीत की क्षमता कम हो रही हे कारण साफ़ हे की दिमाग और मन दोनों की ही खुराक पढ़ना और साहित्य होता ही हे टी वी इंटरनेट और दुसरे माध्यम जीवन में साहित्य का स्थान बिलकुल नहीं ले सकते हे प्रेमचंद बड़े ही सुन्दर शब्दों में बताते हे की जीवन में साहित्य का क्या महत्व हे ?

”साहित्य का आधार जीवन हे इसी नीव पर साहित्य की दीवार कड़ी होती हे उसकी अटारिया मीनार और गुम्बंद बनते हे लेकिन बुनियाद मिटटी के नीचे दबी पड़ी हे उसे देखने का भी जी नहीं चाहेगा जीवन परमात्मा की सर्ष्टि हे इसलिए अंनत हे , अगम्य हे साहित्य मनुष्य की सर्ष्टि हे इसलिए सुबोध हे सुगम और मर्यादा से परिमित हे जीवन परमात्मा को अपने कामो का जवाबदेह हे या नहीं , हमें मालूम नहीं लेकिन साहित्य तो मनुष्य के सामने जवाबदेह हे इसके लिए कानून हे जिससे वह इधर उधर नहीं हो सकता हे ”

”जीवन का उद्देश्य ही आनंद हे मनुष्य जीवन पर्यन्त आनंद की खोज में लगा रहता हे किसी को वह रत्न द्र्वय धन से मिलता हे किसी को भरे पुरे परिवार से किसी को लम्बा चौड़े भवन से , किसी को ऐश्वर्य से , लेकिन साहित्य का आनंद इस आनंद से ऊँचा हे , इससे पवित्र हे , उसका आधार सुन्दर और सत्य हे वास्तव में सच्चा आनंद सुन्दर और सत्य से मिलता हे उसी आनंद को दर्शाना वही आनंद उत्पन्न करना साहित्य का उद्देशय हे , ऐश्वर्य आनंद में ग्लानि छिपी होती हे . उससे अरुचि हो सकती हे पश्चाताप की भावना भी हो सकती हे पर सुन्दर से जो आनंद प्राप्त होता हे वह अखंड अमर हे .” ” जीवन क्या हे – ? जीवन केवल जिन खाना सोना और मर जाना नहीं हे . यह तो पशुओ का जीवन हे मानव जीवन में भी यही सब प्रवृत्तियाँ होती हे क्योकि वह भी तो पशु हे पर उसके उपरांत कुछ और भी होता हे उसमे कुछ ऐसी मनोवृत्तियां होती हे जो प्रकर्ति के साथ हमारे मेल में बाधक होती हे जो इस मेल में सहायक बन जाती हे जिन प्रवृत्तियाँमें प्रकर्ति के साथ हमारा सामंजस्य बढ़ता हे वह वांछनीय होती हे जिनमे सामंजस्य में बाधा उत्पन्न होती हे , वे दूषित हे . अहंकार क्रोध या देष हमारे मन की बाधक प्रवृत्तियाँ हे . यदि हम इन्हे बेरोकटोक चलने दे तो निसंदेह वो हमें नाश और पतन की और ले जायेगी इसलिए हमें उनकी लगाम रोकनी पड़ती हे उन पर सायं रखना पड़ता हे . जिससे वे अपनी सीमा से बाहर न जा सके हम उन पर जितना कठोर संयम रख सकते हे उतना ही मंगलमय हमारा जीवन हो जाता हे ”

” साहित्य ही मनोविकारों के रहस्यों को खोलकर सद्वृत्तियो को जगाता हे साहित्य मस्तिष्क की वस्तु बल्कि ह्रदय की वस्तु हे जहा ज्ञान और उपदेश असफल हो जाते हे वह साहित्य बाज़ी मार ले जाता हे साहित्य वह जादू की लकड़ी हे जो पशुओ में ईट पत्थरों में में पेड़ पौधों में विश्व की आत्मा का दर्शन करा देता हे ”

”जीवन मे साहितय की उपयोगिता के विष्य मे कभी कभी संदेह किया जाता हे कहा जाता हे की जो स्वभाव से अच्छे हे वो अच्छे ही रहेंगे चाहे कुछ भी पढ़े जो बुरे हे वो बुरे ही रहेंगे चाहे कुछ भी पढ़े . इस कथन मे सत्‍य की मात्रा बहुत कम हे इसे सत्य मान लेना मानव चरित्र को बदल देना होगा मनुष्य सवभाव से देवतुल्य हे जमाने के छल प्रपंच या परीईस्थितियो से वशीभूत होकर वह अपना देवत्य खो बेठता हे . साहित्य इसी देवत्व को अपने स्थान पर प्रतिष्टित करने की चेष्टा करता हे उपदेशो से नहीं,नसीहतो से नहीं भावो से मन को स्पंदित करके , मन के कोमल तारो पर चोट लगाकर प्रकर्ति से सामंजस्य उत्पन्न करके . हमारी सभ्यता साहित्य पर ही आधारित हे . हम जो कुछ हे साहित्य के ही बनाय हे विश्व की आत्मा के अंतर्गत राष्ट्र या देश की आत्मा एक होती हे इसी आतमा की प्रतिध्‍वनि हे ‘ साहित्य ‘ ”

”भारतीय साहित्य का आदर्श उसका त्याग और उत्सर्ग हे किसी राष्ट्र की सबसे मूलयवान संपत्ति उसके साहित्यिक आदर्श होते हे व्यास और वाल्मीकि ने जिन आदर्शो की सर्ष्टि की वो आज भी भारत का सर ऊँचा किये हुए हे राम अगर वाल्मीकि के सांचे में न ढलते तो राम न रहते .यह सत्य हे की हम सब ऐसे चरित्रों का निर्माण नहीं कर सकते पर धन्वन्तरि के एक होने पर भी इस संसार में वैद्दो की आवशयकता हे और रहेगी ” कलम हाथ में लेते ही हमारे सर पर भारी जिम्मेदारी आ जाती हे . साधारणतः युवावस्था में हमारी पहली निगाह विध्वंस की और ही जाती हे हम यथार्थ वाद के परवाह में बहने लगते हे बुराइयो के नग्न चित्र खीचने में कला की कसौटी समझने लगते हे यह सताय हे की कोई मकान गिराकर ही उसकी जगह कोई नया मकान बनाया जाता हे पुराने ढकोसलों और बंधनो को तोड़ने की जरुरत हे पर इसे साहित्य नहीं कह सकते हे साहित्य तो वही हे साहित्य की मर्यादा का पालन करे ”

”हम अक्सर साहित्य का मर्म समझे बिना ही लिखना शुरू कर देते हे शायद हम समझते हे की मज़ेदार चटपटी और ओज़पूर्ण भाषा में लिखना ही साहित्य हे भाषा भी साहित्य का अंग हे पर स्थायी साहित्य विध्वंस नहीं करता हे निर्माण करता हे वह मानव चरित्र की कालिमा ही नहीं दिखलाता हे उसकी उज्वलताय दिखाता हे माकन गिराने वाला इंजिनियर नहीं कहलाता इंजिनियर तो निर्माण ही करता हे हममे से जो युवक साहित्य को अपने जीवन का ध्येय बनाना चाहते उन्हें बहुत ही महान सायं की आवशयकता होगी क्योकि वह अपने को एक महान पद के लिए तैयार कर रहे हे साहित्यकार को आदर्शवादी होना ही चाहिए अमर साहित्य के निर्माता विलासी परवर्ती के मनुष्य नहीं थे कबीर भी तपस्वी ही थे ” हमारा साहित्य अगर आह उन्नति नहीं करता हे तो इसका कारन यही हे की हमने साहित्य रचना के लिए कोई तैयारी नहीं की – दो चार नुस्खे याद करके हाकिम बन बैठे साहित्य का उत्थान राष्ट्र का उत्थान हे और हमारी ईश्वर से यही याचना हे की हममें सच्चे साहित्य सेवी उत्पन्न हो सच्चे तपस्वी सच्चे आत्मज्ञानी .”

(Visited 353 times, 1 visits today)

109 thoughts on “जीवन में साहित्य का महत्व : प्रेमचंद

  • August 3, 2015 at 6:32 pm
    Permalink

    अचानक से नज़र पढ़ी तो देखा की प्रेमचंद के इन विचार को सात सौ व्यू मिल गए हे बहुत ख़ुशी हुई पाठको का बहुत बहुत शुक्रिया आम तौर पर नेट पर गैर साम्प्रदयिक या गैर विवादित लेखो को बहुत ही कम क्लिक मिलते हे इसलिए सात सौ ही सही अच्छा लगा आगे और अच्छे साहित्यिक लेख पेश करने की कोशिश रहेगी मसला यह हे की लाइब्रेरी में जिस किताब को हाथ लगाओ उसी पर ”कॉपीराइट की धमकी ” लिखी होती हे साहित्य विचार की तरफ लोगो को आकर्षित कर भी तो कैसे ? और अगर हम लोगो को साहित्य विचार और पढ़ने की दुनिया में ना ले गए तो इसके बहुत ही बुरे नतीजे निकलेंगे आगे आप देखेंगे इंसान इतना सेल्फिश और उपभोगवादी हो जाएगा की पहले दुसरो का फिर अपना जीवन हराम कर देगा ऐसा वेस्ट में हो भी चूका हे लेकिन वहा फिर भी इतनी तबाही नहीं हुई क्योकि वहा आबादी कम हे और संसधान अधिक हे जबकि यहाँ आबादी बहुत ही ज़्यादा हे और संसधान कम हे

    Reply
  • January 12, 2016 at 9:01 am
    Permalink

    रविंदर कालिया जी नहीं रहे उनका श्रद्धांजलि बहुत ही सफल और सार्थक जीवन जिया हे इन कालिया मिया बीवी ने इसलिए इनके संस्मरण इस कदर बेहतरीन हे की पूछो मत ग़ालिब छूटी शराब कामरेड मोनालिसा कितने शहरो में कितनी बार आदि बहुत ही ज़बरदस्त खासकर अश्क जी वाले तो बहुत ही मज़ेदार थे जब भी लाजपत नगर खरीदारी के लिए जाता था सोचता था इनसे मिलु ? लेकिन फिर गले पड़ना सही नहीं समझाइनकी किताबे संस्मरण इस कदर बेहतरीन थे की मुझे वो तारीख भी याद थी जब पहली बार रवि सर ममता जी से मिले थे 27 जून 1964 इसके पचास साल पुरे होने पर मेने ममता जी को बधाई का मेसेज भी किया था

    Reply
    • January 30, 2017 at 10:57 am
      Permalink

      विभोर अग्रवालसफर में हमसफ़र – रवींद्र कालिया और ममता कालिया’ का लोकार्पण
      दिल्ली। रवि को अपनी यादों का पिटारा जान से प्यारा था। होता भी क्यों न! कितने तो शहरों में तंबू लगाए और उखाड़े, कितने लोगों की सोहबत मिली, एक से एक नायाब और नापाम तजुर्बे हुए। पर दाद देनी पड़ेगी उनकी सादगी की कि कभी जीवन-जगत के ऊपर से विश्वास नहीं टूटा। बीहड़ से बीहड़ वक्त और व्यक्तित्व में उन्हें रोशनी की एक किरण दिखी। सुप्रसिद्ध कथाकार ममता कालिया ने विश्व पुस्तक मेले में साहित्य भण्डार द्वारा आयोजित पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम में अपने दिवंगत पति रवींद्र कालिया को याद करते हुए कहा कि रवि के लेखन की सबसे बड़ी खासियत यही है कि उसमें तेवर है पर तल्खी नहीं, तरंग है पर तिलमिलाहट नहीं।इस अवसर पर साहित्य भण्डार द्वारा सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘सफर में हमसफ़र – रवींद्र कालिया और ममता कालिया’ का लोकार्पण हुआ। आयोजन में युवा आलोचक राजीव कुमार ने रवींद्र कालिया के साथ हुई अंतिम भेंट का संस्मरण सुनाया। उन्होंने कहा कि कालिया जी बड़े लेखक और बड़े संपादक होने के साथ बहुत बड़े मनुष्य भी थे। आयोजन में वरिष्ठ कथाकार हरियश राय ने ममता कालिया और रवींद्र कालिया के संस्मरण लेखन को हिन्दी साहित्य के संसार में अविस्मरणीय सृजन बताया। उहोने कहा कि ग़ालिब छुटी शराब की तरह पाठक ‘सफर में हमसफ़र’ को भी खूब पसन्द करेंगे। आयोजन में बनास जन के संपादक पल्लव, युवा कवि प्रांजल धर, फिल्म विशेषज्ञ मिहिर पंड्या, युवा आलोचक गणपत तेली सहित बड़ी संख्या में लेखक, विद्यार्थी तथा पाठक उपस्थित थे। साहित्य भंडार के प्रबंध निदेशक विभोर अग्रवाल ने अपने प्रकाशन संस्थान से कालिया परिवार के आत्मीय संबंधों का उल्लेख करते हुए अंत में सभी का आभार व्यक्त किया।
      विभोर अग्रवाल

      Reply
    • January 22, 2020 at 1:57 pm
      Permalink

      Nitin Thakur
      15 hrs
      जब कई साल पहले पढ़ने का उत्साह सूख चुका था। किताबें खरीदे जाने के बाद ढेर में तब्दील हो रही थीं। उन दिनों किताब से बाहर की दुनिया को संभालने के फेर में पढ़ना छोड़ दिया था। ना दुनिया व्यवस्थित होती थी और ना ही किताबें पूरी कर पाता था। नामालूम कहां से और क्यों उन रवीन्द्र कालिया की “ग़ालिब छुटी शराब” हाथ पड़ गई जिनका नाम नहीं जानता था और जो बाद में शर्मिंदगी की वजह बना। एक बार में किताब पूरी करने का वो लुत्फ सालों बाद मिला। कालिया साहब हाथ पकड़कर मुझे अपनी ज़िंदगी की बंद खिड़कियां खोल खोलकर दिखाते रहे और मैं चेहरों को पहचानता रहा। अरे ये तो जगजीत सिंह हैं, ये फैज़ हैं, कमलेश्वर हैं, जैनेंद्र हैं.. और ये सिलसिला इंसानों तक ही महदूद ना था। शहर भी पहचाने कि ये तो मुंबई है और ये देहली है।

      फिर जाने कैसे उस किताब को मालूम चल गया कि वो मुझे पसंद है। नतीजतन किसी तरह बिछड़ गई। हर चीज़ जो दिल के करीब है वो ऐसे ही तो विदा होती है। आजकल में फिर उस किताब की एक कॉपी मिली है पर ये वो किताब नहीं है। उसकी हमशक्ल है। जुड़वां है। वो तो मुझसे मुक्त हो चुकी पर उसने जो दुनिया दिखाई उसने मुझे भीतर से बहुत समृद्ध किया। अब जिसके हाथों में हो उसे बेहतर बनाए।
      – नितिन

      Reply
  • January 12, 2016 at 9:02 am
    Permalink

    हालांकि ये भी सच हे की इतनी बेहतरीन सार्थक मनमर्ज़ी की ( धर्मयुग की नौकरी छोड़ना आदि ) और चिंतामुक्त मस्त जीवन कालिया जी दम्पति इसलिए जी पाये की जो भी हो मगर विभिन्न सरकारी नौकरियों की छत्रछाया कम या ज़्यादा जो भो हो मगर इनके साथ ये छाया थी इसी कारण इनका जीवन इतना बढ़िया रहा हम भी छुटभय्या लेखक हे घर में चार चार लोगो की सेलरी लाख के आस पास हे गाव में डेढ़ दो करोड़ की जमीन भी हे मगर फिर भी दिल्ली महानगरीय जीवन में इस कदर तनाव दबाव अनिश्चिन्ताय आशंकाय रहती हे की बुरा हाल हे इससे लेखन बुरी तरह प्रभावित होता हे जो सरकारी नौकरी वालो को आज भी और पहले तो बहुत ही ज़्यादा आराम था यही कारण हे की भारत में जो गैर अमीर और आम लोग कामयाब होते हे उनमे से आप देखे की 90 % सरकारी नौकरी के बैकग्राउंड वाले होते हे सरकारी नौकरी आपको चिंतामुक्त होकर कम से कम रोटी कपडा और मकान की गारंटी देती हे जिससे आप आशंकाओ से मुक्त होकर जोखिम लेकर अपनी रचनात्मकता दिखा पाते हे

    Reply
  • January 12, 2016 at 9:03 am
    Permalink

    मेरा मानना हे की भारत में वैसे तो खेर अधिकतर अमीर या वंशवादी लोग ही कामयाब होते हे इनसे बाहर जो आम आदमी कामयाब होते हे उन्हें ये तीन सुविधाए होना अनिवार्य हे वार्ना कामयाबी नामुमकिन हे जिन्हे हम आम आदमी की कामयाबी कहते हे वो भी इन केटेगरी से बाहर के हो ही नहीं सकते हे यानी या तो उनके सर पर किसी की भी किसी भी मगर सरकारी नौकरी की छत्रछाया हो कम हो या ज़्यादा हो मगर हो उसके बाद ये की वो छोटी फेमली के हो यानि इकलौते हो या घर के इकलौते लड़के या लड़की तो हो ही ताकि सारे संसधान उन पर लग सके तीसरा की गाव या शहर में ठीक ठाक जमीन प्लाट मकान दूकान हो ही ताकि कामयाबी के लिए जोखिम लेने में आप खुदा न खास्ता पूरी तरह लूट जाए खाली हो जाए तो छत दाल रोटी की गारंटी तो हो ही ये गारंटी न हो तो आपको दुश्चिंताय बुरी तरह थका देंगी इनसे बाहर आपको भारत में कोई भी कामयाब आदमी नहीं मिलेगा शायद एक भी नहीं जैसे देखे रविश जी हे सबसे बड़े नाम हे वो बीवी बच्चो वाले तो हे मगर शायद कोई और परिवार उनका नहीं हे क्योकि कभी जिक्र नहीं करते हे नतीजा वो रिश्तो के दबाव से बचे रहे होंगे जिससे बची ऊर्जा वो काम पर लगा कर वो कामयाब हुए होंगे

    Reply
    • May 11, 2016 at 8:52 am
      Permalink

      आई ए एस टॉपर टीना के पिता बी एस एन एल में जनरल मेने जर हे अब देखिये की अधिकतर आई ए एस टॉपर के बैकग्राउंड चेक करो तो सब अच्छी सरकारी नौकरी वाले ही मिलेंगे सरकारी नौकरी माँ की बाप की या दोनों की इसी तरह के होंगे सरकारी नौकरी ना केवल आपको पूरी सुरक्षा देती हे बल्कि सबसे बड़ी बात इन के माँ बाप के पास बेहद टाइम भी होता हे जिसमे ये अपने बच्चों को पूरा समय मार्ग दर्शन और सुविधाए देते हे जिससे इनका आधा रास्ता क्लियर हो जता हे तो ये भारत में अधिकांश कामयाबियों का राज़ आप देख सकते हे अब इसमें पेंच ये हे की ये लोग कामयाब तो हो जाते हे मगर एक सिक्योरिटी सर्कल में रहने कम्फर्ट ज़ोन में ही रहने किसी छत्रछाया में आगे बढ़ने के कारण इन लोगो में दमखम विकसित नहीं होता हे और ये लोग भारत जैसे बेहद मुश्किल देश में कही भी बुराई या समस्याओं से लम्बे समय तक झुझ नहीं पाते हे जैसा मेरा कज़िन हे अलीगढ का टॉपर हे बढ़िया सरकारी नौकरी हे उसने भी अपने ऊंच सरकारी नौकरी वाले कज़िन के अंडर में कामयाबी हासिल की नतीजा कामयाब हे महा महा विध्वान हे मगर किसी मुद्दे पर स्टेण्ड लेना का दमखम बिलकुल नहीं हे

      Reply
  • January 12, 2016 at 9:10 am
    Permalink

    हमारे महान नेता मोदी जी के पास उपरोक्त में से कोई सुविधा नहीं थी न जायदाद न कोई सरकारी नौकरी बड़ी फेमली जो उनकी शादी के बाद और बड़ी हुई लेकिन मोदी जी को कामयाबी हासिल करनी ही थी सो वो घर छोड़ कर चले गए और एक छोटी ” फेमली ” का हिस्सा बने जहा वो थे और उनके गुरु थे इनामदार साहब जो संघ के बड़े नेता थे तब मोदी जी ने तरक्की की सीढ़िया चढ़ी इसी तरह कलाम साहब को भी कामयाब होना था उनके पास भी भी कोई भी सुविधा नहीं थी नतीजा कामयाब होने के लिए उन्होंने शादी ही नहीं की वो खुद कहते थे की अगर में शादी करता तो कामयाब नहीं हो सकता था इन बातो से आप भारत के बेहद जटिल हालात समझ सकते हे

    Reply
    • January 24, 2016 at 7:06 pm
      Permalink

      किसी ने मेरी इस बात पर आपत्ति की हे की कलाम साहब ने कामयाब होने के लिए शादी नहीं की जबकि यहाँ कलाम साहब की ”कामयाबी ” से मेरा आशय था उनका भारत रत्न और भारत का सबसे लोकप्रिय राष्ट्रपति और एक लीजेंड जैसा बनने से था फ़र्ज़ कीजिये कलम साहब शादी कर लेते और परिवार के दबाव में आकर विदेश चले जाते या देश में ही रक्षा क्षेत्र को छोड़कर कोई और ऊँची नौकरी कर लेते तो कौन जाने वो करोड़पति होते अरबपति होते क्या होते वो भी कामयाबी होती मगर फिर वो भारत रत्न राष्ट्रपति आदि बनने की कामयाबी नहीं हासिल कर पाते यही बात उन्होंने खुद शादी न करने के संदर्भ में कही थी मेरा आशय शादी करने या न करने से नहीं था बल्कि भारत में आम आदमी के बेहद कठिन हालात बताने से था

      Reply
    • August 31, 2016 at 10:49 am
      Permalink

      देश में हालात इतने नाउमीदी के हे की दीपक शर्मा ( पुराने आज तक वाले ) जैसा समझदार आदमी तक मोदी जी में उमीद देख रहा हे लिखते हे दीपक शर्मा ”आयकर विभाग की इन्वेस्टीगेशन विंग के मुताबिक मायावती के भाई आनंद कुमार अप्रत्यक्ष तौर पर 100 से ज्यादा निजी कंपनियों से जुड़े हुए हैं. आनंद की माली हैसियत 5000 करोड़ रूपए से ज्यादा आंकी जाती है. मुलायम सिंह यादव के बेटे प्रतीक इस वक़्त यूपी के सबसे रसूखदार रियल एस्टेट डेवलपर में एक हैं. लालू यादव के परिवार की चल अचल सम्पतियों की थाह तो आजतक सीबीआई भी नाप नही सकी है. और राबर्ट वाड्रा, सुखबीर बादल , कार्तिक चिदंबरम और सुप्रिया सुले की बात न करें तो बेहतर है.अब ज़रा एक नज़र मोदी के सगे भाई बहन पर भी.16 साल से लगातार सत्ता में रहकर भी मोदी ने अपनी बहन बसंती बेन की सिफारिश नही की जिसके चलते आज भी वो विसनगर के एक स्कूल में मामूली टीचर है. . मोदी के सबसे बड़े भाई सोमभाई आजकल वाडनगर के एक आश्रम के छोटे से कमरे में रहते हैं. सोमाभाई से छोटे अमृतभाई ने अहमदाबाद की स्टार्च मिल कम्पनी में वर्कर के काम से रिटायरमेंट लेकर शहर के राणिप इलाके में पनाह ली है. उनसे छोटे, प्रह्लाद मोदी राशन की दुकान चलाते हैं और राशन दुकानदारों के संघ से जुड़े हैं. सबसे छोटे भाई पंकज गुजरात सूचना विभाग में क्लास 2 अफसर हैं और क्योंकि इनकी माली हालत थोड़ी बेहतर है इसलिए माँ इनके पास रहती है.मित्रों अब सवाल ये है कि प्रधानमंत्री ने जब अपने सगे भाई-बहन-माँ- बीवी को खरबों की सरकारी तिजोरी से एक ढेला नही दिया ..तो फिर वो अपना कलेजा थोड़ा और मज़बूत कर लें तो देश में चोरी-चंदे की राजनीति बदल सकते हैं.. मोदी को देश की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठकर अब बीजेपी के सबसे बड़े दानवीर उद्योगपतियों को खुद से अलग करना होगा. अगर वो सार्वजनिक मंच पर खुद को इन उद्योगपतियों से जुदा करते हैं तो जनता स्वयं चुनावी चन्दे के लिए अपनी झोली खोली देगी. जो काम आम आदमी पार्टी करने चली थी लेकिन नही कर पायी वो मोदी कर सकते हैं. ‘ देीपक शर्मा

      Reply
      • August 31, 2016 at 10:58 am
        Permalink

        जैसे की हमने ऊपर कमेंट में बताया हे की मोदी जी कामयाब ही इसलिए हुए की वो एक बड़े और निम्न मध्यमवर्गीय परिवार को छोड़ कर खिसक लिए थे और कहते हे की फिर परिवार से उनका दोबारा सलाम दुआ का रिश्ता शायद उनके सी एम् बनने के बाद ही हुआ था ऐसे में दीपक जी जैसे समझदार आदमी मोदी जी को अपने परिवार के लिए कुछ ना करने का सर्टिफिकेट दे —– ? क्या ये कोई महानता वाली बात हे————? फिर पहले की भी बात करे तो फ़र्ज़ करे की मोदी जी एक अमीर परिवार से होते उनकी शादी भी अमीर परिवार में होती तब भी वो घर छोड़ कर निकल जाते तब तो उसे त्याग कहा जाता लेकिन उन्होंने जिस हालात में घर परिवार छोड़ा था उसे पलायन या पीठ दिखाना ही कहा जा सकता हे कन्फर्म नहीं हु मगर सुनते हे की इससे उनके पिता उनसे और इनामदार साहब से खासे नाराज़ भी रहे—– ? तो सवाल ही नहीं उठता की मोदी जी कोई महानता दिखाए महानता के लिए जो इतिहास जो संघर्ष जो तरबियत जो अनुभव चाहिए होते हे वो मोदी जी के पास नहीं हे और ये सब रातो रात टपक भी नहीं सकते हे एक प्रोसेस होता हे इस सबका

        Reply
  • January 12, 2016 at 9:26 am
    Permalink

    सहेी बात है.

    Reply
    • January 12, 2016 at 10:11 am
      Permalink

      अच्छा होता ये हे की भारत में 90 % से भी अधिक कामयाब लोग बिना किसी संघर्ष के कामयाब होते हे तो वो फिर अपने झूठे संघर्ष के किस्से सुनाते हे इसी को राजकुमार संतोषी ने अपनी फिल्म हल्लाबोल में दिखया हे जब अजय पत्रकार से कहते हे की आम आदमी को हमारे संघर्ष के किस्से बहुत अच्छे लगते हे जैसे अमिताभ के संघर्ष के किस्से खूब फैलाय जाते हे ( मेरा ख्याल हे की संतोषी का भी इशारा अमिताभ की तरफ हि था ) अब समझ नहीं आता की राजय सभा सदस्य के आप बेटे हो गुलमोहर पार्क दिल्ली जैसी पॉश जगह से आप मुंबई आये हो महमूद जैसे स्टार के यहाँ आप रहते हो शशि कपूर जैसे बड़े नाम आपको छोटे रोल से रोकते हे आपको चोट लगती हे तो देश की पि एम इंदिरा जी आपकी चिंता करती हे फिर भी आप कहते हो की आपने बड़ा संघर्ष किया ये केसा संघर्ष हे भाई ? हद तो तब हो गयी जब सलमान तक अपने संघर्ष बता रहे थे जबकि चौबीस साल से पहले ही उनकी फिल्म भी बनकर आ गयी थी वो सुपर स्टार भी बन गए थे मगर जैसे की परम्परा हे भारत की तो सलमान तक बताते हे की उन्होंने कई साल संघर्ष किया हद हे

      Reply
    • October 29, 2017 at 10:44 am
      Permalink

      सुनीता राजवार ने नवाज़ुद्दीन सिद्द्की के बारे में सही कहा हे की नवाज़ सिम्पेथी का कोई मौका नहीं छोड़ते हे सही हे सेम यही मोदी जी भी करते हे की हमने बड़ा संघर्ष किया बड़ा बड़ा बहुत बड़ा संघर्ष किया जबकि नहीं किया क्योकि भारत में हालात इतने ख़राब हे की सही मायनो में जो नीचे से आये हो जिन्होंने सही मायनो में संघर्ष किया हो वो उभर ही नहीं पाते हे यहा हर फिल्ड में बिना संघर्ष वाले ही बड़े बनते हे इसलिए तो भारत कायरो का देश हे अब पांच साल पहले भी नवाज़ के बारे में मोहल्ला लाइव अविनाश अनारकली आरा वाली वाले की साइट पर आया था की नवाज़ बड़े नीचे के बेकग्राउंड से आये हे में मुज्जफरनगर का हु मेने तब भी वहा लिखा था की ऐसा हो ही नहीं सकता हे नवाज़ बहुत दूर के परिचित हे मेरे लोगो ने बताया की वो गरीब तो छोड़ो बल्कि अच्छे खासे जमींदार परिवार से आते हे हां इतना जरूर हे की शहरीकरण से पहले जमीन से या खेती बाड़ी से ही बहुत ज़्यादा कमाई नहीं थी लेकिन फिर भी एक सेकड़ो बीघे के जमींदार परिवार के पास अच्छी खासी सुरक्षा तो होगी ही फिर भी नवाज़ जैसा की सुनीता ने बताया http://www.amarujala.com/photo-gallery/entertainment/bollywood/an-ordinary-life-of-extraordinary-lies-alleges-theatre-artist-sunita-rajwar-on-nawazuddin-siddiqui?pageId=5

      Reply
      • November 2, 2017 at 2:03 pm
        Permalink

        Nitin Thakur
        58 mins ·
        नब्बे का दशक शुरू हुआ था। अनिल कपूर अब्दुल रहमान खान नाम के नए लड़के को ड्राइवर का रोल देना चाहते थे। एक फिल्म में रोल उसे सिर्फ इसलिए मिला क्योंकि आमिर खान ने फिल्म छोड़ दी और फिल्म की हिरोइन जूही जावला को भरोसा दिया गया कि नया लड़का दिखता आमिर जैसा ही है। सोचिए कि उसके इंडस्ट्री में आने से पहले आमिर और सलमान जैसे बड़े नामों का सिक्का चल रहा था। कहां तो आमिर और सलमान का बचपन.. और कहां अब्दुल रहमान खान जिसके पिता को दिल्ली में चाय का खोखा और छोले-भठूरे की दुकान चलानी पड़ रही थी। पिता का देहांत हुआ तो उसे मुबई जाना पड़ा, वो भी उस लड़की को छोड़ जिसे वो बेपनाह मुहब्बत करता था। मां का सपना था कि बेटा फिल्मों में नाम करे। शुरू में अनचाहे मन से उसने काम शुरू भी किया लेकिन बाद में यही काम उसका जुनून बन गया। आज उसे हम शाहरुख के नाम से जानते हैं। शाहरुख बाकी एक्टर्स के मुकाबले जमीन से ज़्यादा जुड़े लगते हैं। वजह यही हो सकती है कि उन्होंने कामयाबी की राह में वही संघर्ष किया है जो हर उस इंसान को करना पड़ता है जिसे विरासत में कुछ नहीं मिलता। ये आदमी बसों और ट्रेनों में घूमा है। किराये के घरों में रहा है। अपनी बचपन की मुहब्बत से लड़-झगड़कर शादी करता है। कई बार बहुत गुस्सा आया तो ज़ाहिर कर दिया लेकिन अहसास होने के बाद माफी भी मांग ली। ना जाने कितनी ही बार अपने डर को सबके सामने साझा किया और ना जाने कितनी बार अपनी मनचाही फिल्में करके मुंह की खाना मंजूर किया। उसने अपने मनपसंद घर को खरीदने के लिए मसाला फिल्में भी कर लीं। वो फिल्म इंडस्ट्री में तब आया जब पिरामिड पर कई लोग बैठे थे। उसने धीरे से अपनी जगह बना ली। मैंने देखा कि उसे हिंदू दक्षिणपंथियों ने गद्दार बताया तो कठमुल्लों ने मुसलमान मानने से इनकार भी किया। हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी में गज़ब की साफ ज़ुबान। ह्मयूमर में कोई और खान उसके पास भी नहीं फटक सकता। खुद का मज़ाक बनाने में अव्वल। 12 साल से स्लिप डिस्क के दर्द के बावजूद रोज़ ज्यादा मेहनत। शिष्टाचार और समय का पाबंद जिसके गवाह मेरे ही कई जानकार लोग हैं। शाहरुख बहुत कुछ अपने जैसे लगते हैं.. बहुत कुछ उन जैसा होने का मन चाहता है। जन्मदिन मुबारक शाहरुख। अभी तो 52 के हुए हो… उम्र ही क्या हुई है भला..Nitin Thakur
        58 mins · नितिन की बात जायज़ हे मगर शाहरुख़ खान कोई ऐसे आम आदमी भी नहीं थे घर के इकलौते बेटे थे उनकी माँ को केन्द्रीय मंत्री शाहनवाज़ आज़ाद हिन्द फौज वाले ने गोद लिया था वो मजिस्ट्रेट थी कहते हे की उन्होंने कनरल कपूर पर फौजी में शारुख को लेने का दबाव या सिफारिश भी की थी कोई समस्या होने पर वो अपनी माँ का नाम लेकर बच जाते थे वो खुद खुद को ”मेल सिंड्रेला ” कहते थे शाहरुख़ की कामयाबी बेमिसाल हे मगर वो कोई आम आदमी नहीं थे

        Reply
  • January 12, 2016 at 9:30 am
    Permalink

    मैने एक बात नोट करी है कि जो व्यक्ति साहित्य या कला की अन्य किसी भी विधा जैसे संगीत, नृत्य आदि से जुड़ा रहता है, वो धार्मिक कट्टरपंथ का शिकार कभी नही हो पाता. तमाम कट्टरपंथी संगठन चाहे वो हिंदुओं के हो या मुस्लिमो के उनका कला-जगत मे योगदान ना के बराबर है. साहित्य की दुनिया मे भी वो सिर्फ़ दक्षिणपंथी लेखो तक ही सीमित है.

    इसलिए कला जगत के प्रति आकर्षण और उसका विकास, तमाम तर्को से भी बड़ा धार्मिक कट्टरपंथ के खिलाफ हथियार है.

    Reply
  • January 12, 2016 at 10:02 am
    Permalink

    बिलकुल कारण ये हे की मनुष्य जीवन आनद की खोज हे अब होता ये हे की काटरपन्तियो के नेता तो दुनिया में आंनद मार ही रहे होते हे ( एक बड़े मुस्लिम आद्यत्मिक नेता के बारे में सुना हे की उनकी औरते सिर्फ दुबई में शॉपिंग करती हे ) और बाकी छुटभय्ये तो हिन्दू काटरपन्ति जीवन में आंनद लेना चाहता हे तो मुस्लिम काटरपन्ति मरने के बाद आंनद की चाहत रखता हे अब जो लोग विभिन्न कलाओ से संस्कर्ति खेल साहित्य आर्ट कल्चर से जुड़े होते हे उन्हें उसी में बहुत आंनद मिल रहा होता हे जैसे कितने शहरो में कितनी बार किताब में ममता कालिया जी ने जो सन साठ के आस पास में इंदौर में महसूस किया था ” क्या दिन थे वो न सर्दियों में ठंड लगती थी न धुप सताती थी न बारिश चुभती थी कभी नियम से दूध नहीं पिया कभी विटामिन की गोलिया नहीं खायी बस जीने के नशे में चूर थे ” सेम यही हाल मुज्जफरनगर में 90 के दशक में हमारा भी था

    Reply
  • January 14, 2016 at 6:38 pm
    Permalink

    वैसे कालिया जी काफी लम्बे चल गए लगभग 77 साल जबकि वो बहुत ही भयंकर बहुत ही ज़्यादा भयंकर सिगरेटिए और दारूबाज था उन्ही के शब्दों में ” घर में एक बूँद दारु ना थी ” कुदरत का करिश्मा हे की की कुछ लोग इस कदर सवास्थय के नियमो का उलघन करते हुए भी लम्बे चल जाते हे हालांकि कालिया जी का निधन उसी वजह से हुआ जिस वजह से उनके कई दारूबाज दोस्त दुनिया से गए थे लिवर सिरोसिस जहा तक हमारा सवाल हे लेखक होते हुए भी अल्लाह भला करे हम तो सिगरेट शराब पान तम्बाकू गुटका आदि सभी चीज़ो से दूर ही रहे हे इसका बहुत बड़ा नुक्सान ये होता हे की आप चिन्ताओ का भुला कर जमकर लेखन नहीं कर पाते हे व्यसनों से दूर रहने और जीरो ” इस्प्रिचुअल ” नीड और गतिविधयों का व्यक्ति होने के कारण हमारे लिए स्ट्रेस मैनेजमेंट बड़ा कठिन होता हे

    Reply
    • January 15, 2016 at 9:47 am
      Permalink

      अरे सिकंदर साहब, अभी तक तो आप अविवाहित है, तब भी इतना तनाव, शादी के बाद क्या होगा? मज़ाक कर रहा हूँ.

      Reply
    • January 31, 2016 at 8:15 pm
      Permalink

      ”सिगरेटिए और दारूबाज था ”’ माफ़ी चाहूंगा की यहाँ थे की जगह था शब्द आ गया हे माफ़ी एक बात की हिंदी के अधिकतर लेखको का जीवन संघर्षशील होता ही हे और जिन्होंने जीवन में संघर्ष किया हो सव्भाविक हे की उनका झुकाव दक्षिणपंथ में साम्प्रदायिकता में नहीं होता हे यहाँ उनका दिल नहीं लगता हे ऐसे में हिंदी के बड़े लेखको में से शैलेश मटियानी ही ऐसे बताय जाते हे जिनका बाद में हल्का झुकाव दक्षिणपंथ में दिखा था इस विषय में ममता कालिया जी अपनी संस्मरणों की बेहतरीन किताब वाणी प्रकाशन से ”कल परसो के बरसो ” में लिखती हे ”अपने बाद के लेखो ने उन्होंने दक्षिणपंथी होने का आभास दिया . में समझती हु वे हिंदी के एकमात्र ऐसे लेखक थे जिन्होंने दक्षिणपंथी होकर भी सत्ता से लाभ नहीं उठाया ” ये ममता कालिया जी ने बड़ी करारी बात कही हे मटियानी जी तो खेर भले आदमी थे बाद में कहते हे की कुछ विक्षिप्त सी हालात में उन्होंने दुनिया छोड़ी ( इत्तफ़ाक़ से जिस अस्पताल के जिस कमरे में वो रहे थे उसी कमरे में बीमार नहीं मगर तीमारदार के रूप में भी रहा था ) खेर इससे आप उपमहादीप में साम्प्रदायिकता का ये चरित्र समझ सकते हे साम्प्रदायिकता मतलब किसी न किसी का चोखा फायदा

      Reply
  • January 15, 2016 at 11:26 am
    Permalink

    जाकिर भाई ये हाल ” शादियों ” के बाद ही हे दिल्ली हो या कोई भी बड़ा शहर कोई भी ऐसा परिवार जिसके पास क़ाबलियत चाहे जितनी हो ( मेरे घर में भी मुझे छोड़ कर सभी बेहद काबिल रहे ) मगर अगर उनके पास बाप दादाओ की छोड़ी जायदाद हो या करप्शन या शोषण का पैसा नहीं हे तो उसका जीवन बेहद असुरक्षित रहते हे इस असुरक्षा का तनाव मुझे बेहद थका देता हु ऊपर से न कोई गम भुलाने का ” साधन ” हे न मेरी कोई स्प्रिचुअल या रिलिजियस गतिविधि हे जिससे बढ़िया कोई स्ट्रेस बस्टर नहीं होता हे हमें उसका भी सहारा नहीं क्योकि कठमुल्लशाही से जंग के लिए हमें लॉजिक की दुनिया में रहना पड़ता हे तनाव बहुत ज़्यादा हे पहले से ही बड़ा परिवार हर शादी के साथ और बड़ा होता जा रहा हे इतने लोगो के लिए मन में जगह रखनी होती हे चिन्ताय ही चिन्ताय किसी की बिमारी लोन मुकदमेबाजी शादी से पहले चिंता शादियों के खर्चे फिर शादी के बाद दस गुने खर्चे मंदी का खतरा पिछले मंदी 2009 में सभी की जॉब छूट गयी थी और मुझे दो जायदाद कोड़ियो के दाम बेचनी पड़ी थी अब केवल जमीन बची हे कही फिर मंदी या उंच नीच हो गयी तो मुझे वो भी बेचनी पड़ेगी ये सोच कर दिल की धड़कने बढ़ जाती हे ऊपर से लेखन का तनाव इन शैतानी ताकतों से बिना किसी ढाल के लड़ना वो भी इतने बड़े परिवार के दबाव के साथ ? इसके आलावा भी आम जीवन में कठमुल्लवादी और काटरपंथी ताकते रोज कोई न कोई ” घाव ” या मुश्किल ही देती रहती जिंदगी में कोई ऐसा शख्स नहीं जो मेरे लिए ताकत कहा जा सके हर आदमी एक बोझ या सरदर्दी ही हे मेरे लिए तो ये सब बाते मुझे बेहद तनाव में डाल देती हे हलाकि इसका ये मतलब नहीं हे की हम ” सरेंडर ” कर देंगे नहीं घास खा कर भी हम जिन्दा रहेंगे और कठमुल्लावादी और शोषणकारी ताकतों से जितनी हो सके जंग जारी ही रखेंगे

    Reply
    • January 15, 2016 at 11:52 am
      Permalink

      यहाँ ये साफ़ कर दू की ये सारा का सारा तनाव इसलिए हि हे की हम ” सरेंडर ” नहीं करते हे आज सरेंडर कर दे तो फिर कोई दिक्कत नहीं फिर तो मज़े ही मज़े हे ये सारे तनाव उसी जंग के लिए हे जो हमने अपने सर पर ले ली हे आज जंग बंद कर ले नार्मल हो जाए नार्मल जिंदगी जिए कलम को तोड़ दे ? सैय्यद में हु ही आज कहु तो कोई ना कोई गैर सैय्यद करोड़पति बस दामाद बनने के एवज़ में आराम की जिंदगी दे भी सकता हे लेकिन कुछ भी हो जाए हम सरेंडर पर राज़ी ना होंगे जिंदगी चाहे जितनी झंड हो जाए झंडा नहीं झुकाएँगे

      Reply
  • January 15, 2016 at 12:21 pm
    Permalink

    नागर जी से ये उमीद नहीं थी आखिर रविश कुमार पर बेहूदा व्यंगय जो अब हटा लिया हे आखिर पब्लिश कैसा हो गया क्या साइट पर कोई संघी बज़रंगी भेदिया बैठा हुआ इतना नीच व्यंगय आखिर आया कैसे ? व्यंगय में कोई हर्ज़ नहीं मगर व्यंगय में एक % तो लॉजिक हो रविश जैसे बढ़िया पत्रकार का अपमान नागर जी की नाक के निचे आखिर हुआ कैसे ?

    Reply
  • February 5, 2016 at 12:48 pm
    Permalink

    मशहूर कथाकार इंतज़ार हुसैन का इंतकाल भारत-पकिस्तान की सरहदों के आर-पार फैले उर्दू साहित्येतिहास के एक अध्याय की समाप्ति जैसा है. कल 2 फरवरी को 92 साल की उम्र में लाहौर के एक अस्पताल में उनका निधन हुआ. बस्ती, आगे समंदर है और नया घर के रूप में भारत-पाक बंटवारे पर एक अविस्मरणीय उपन्यास-त्रयी लिखने वाले इंतज़ार हुसैन ने कुल पांच उपन्यास और सात कहानी-संग्रहों के अलावा सफ़रनामे, निबंध और अखबारों के स्तम्भ के रूप में प्रचुर लेखन किया.
    वे 1947 में भारत से उखड़ कर पकिस्तान गए थे और बहुलता तथा सहिष्णुता के मूल्यों से बनी साझा जीवन-शैली वाला अतीत उनकी रचनाओं में बार-बार एक गहरी कसक के साथ उभरता रहा. उनके निधन के साथ हमने समकालीन उर्दू लेखन की सबसे बड़ी हस्ती को ही नहीं, भारत और पाकिस्तान के अवाम की एकता के एक समर्थ पैरोकार को भी खो दिया है. जनवादी लेखक संघ मर्हूम इंतज़ार हुसैन के प्रति अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है.
    मुरली मनोहर प्रसाद सिंह
    (महासचिव)
    संजीव कुमार
    (उप-महासचिव)

    Reply
  • September 19, 2016 at 9:56 am
    Permalink

    हिंदी साइट्स का वो भी अफ़ज़ल भाई की बेहतरीन कोशिश खबर की खबर जैसी साइट्स का ये सबसे बड़ा फायदा हे की जहा सोशल मिडिया पर सब कुछ बहुत जल्दी पुराना हो जाता हे उसमे गहराई भी नहीं होती हे और अगर हो भी तो पुराना तलाशना भी आसान नहीं हे इस समय हालांकि खासकर हिंदी वाले सोशल मिडिया फेसबुक पर पर बुरी तरह से पिले हुए हे और अपनी अपनी टी आर पि देख कर बुरी तरह से आत्मुग्द हुए जा रहे हे लेकिन बात ये भी हे की वहां ये भी रहता हे की हर आदमी अपना भी लिंक देता जाता हे इसलिए बहुत से मुर्ख और साम्प्रदायिक लेखक जिसे अपनी टी आर पि समझ रहे होते हे वो असल में एक तो घिसे पिटे एकतरफा विचारो की ही सदाबहार टी आर पि होती हे दूसरा हर आदमी असल में अपना प्रचार भी अपना लिंक भी पेश कर रहा होता हे जबकि हिंदी साइट्स पर शुद्ध विचार विमर्श हो रहा होता हे कोई प्रोपेगेंडा नहीं इसलिए आप देखे की जब प्रेमचन्द के ये विचार आये थे तब मुश्किल से सौ क्लिक थे अब बीस गुना अधिक हो चुके हे क्योकि यहाँ पुराना पढ़ना भी बहुत सरल हे . इसलिए मुझे ऐसा लगता हे की आने वाले समय में लोग सोशल मिडिया की भयंकर एकतरफा प्रोपेगेंडेबाज़ी प्रचार से बोर होकर शुद्ध विचार विमर्श के लिए हिंदी साइट्स की तरफ आएंगे ही

    Reply
  • September 20, 2016 at 9:55 am
    Permalink

    एक बार फिर पाठको से अपील हे की कुछ ही अच्छे लेखको को चुन ले जिनकी पहचान होउन्हें ही पढे और बाकी लोगो को ना पढ़े इस गंद से लोगो को बचना बहुत जरुरी हे इन कटटरपन्तियो कठमुल्लाओ को फंडिंग मिल रही हे उसी से ये गंद फेल रहे हे इनका बायकाट ही इनका इलाज़ हे पढ़िए ये रिपोर्ट https://sabrangindia.in/article/bjp-it-cell-ka-farziwada-hindi

    Reply
  • September 20, 2016 at 5:01 pm
    Permalink

    सोशल मिडिया के बुडबको को हर समय कोई छोटी मोटी टिपण्णी लिख कर जल्दी जल्दी लाइक बटोरने की खफ्त सवार रहती हे इनकी ये सनक ”हिस्टीरिया ” में बदल गयी हे अब ये रविश ही थे जिन्होंने दादरी जाकर अख़लाक़ की बेहद ग़ुस्से में रिपोर्टिंग की थी उसके बाद ही घटना पूरी दुनिया में छा गयी थी इससे भी पटना के” स्टालिनग्राद ” को जितने में बेहद मदद मिली थी अब इन्ही रविश कुमार पर ज़ाहिद साहब को जाने क्या पेट दर्द हुआ की पूछने लगे अब बिजनोर क्यों नहीं गए मानो रविश कुमार कोई सेकुलर सुपर मेन हो जो उड़ कर हर जगह पहोंच जाएगा खेर इतफ़ाक़ से रविश ने इसी विषय पर बेहतरीन लेख लिखा हे ‘http://naisadak.org/mere-paas-ek-naukar-ki-kameez-hai/

    Reply
    • September 22, 2016 at 10:16 am
      Permalink

      Amitaabh Srivastava : सोशल मीडिया नाम के बेकाबू भस्मासुर को फलने फूलने का आशीर्वाद देने वाले तमाम देवता अब घुटनों में सर दिए चिंता में डूबे हुए हैं. कहाँ जाएँ इससे बच के. मनमोहन सिंह की खिल्ली उड़ाने में सबको बड़ा आनंद आ रहा था और समर्थकों को उकसा उकसा कर ऊल-जलूल किस्म का हंसी ठट्ठा खूब चला, अब भी चल रहा है. लेकिन अब पृथ्वीराज चौहान के बाद दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाले हिन्दू ह्रदय सम्राट (स्वर्गीय अशोक सिंघल साहब का बयान याद करें) नरेंद्र मोदी जी को भी लोग कायर और डरपोक कह रहे हैं.लोगों को लग रहा है कि मोदी भी बस लव लेटर वाली पालिसी को गिफ्ट देकर आगे बढ़ा रहे हैं. काहे नहीं एक के बदले सौ सर ला रहे हैं फटाफट. डीजीएमओ साहब ने एकदम ग़दर वाले सनी देओल की तरह बयान दिया कि जगह और वक्त अपने हिसाब से चुन कर कार्रवाई होगी -चुन चुन कर. फिर भी लोग संतुष्ट नहीं है, उन्हें तो ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर में सिर चाहिए, खेलने के लिए सिर चाहिए, गणित सीखने, पहाड़े पढ़ने के लिए सिर चाहिए, गंगा का रुख लाहौर तक मोड़ना है, पाकिस्तान को परमाणु बम से उड़ाना है, बलूचिस्तान को हिंदुस्तान में मिलाना है. और ये सब फटाफट चाहिए बिलकुल फ्लिपकार्ट और अमेज़न के सामान की होम डिलीवरी की तरह. नहीं करोगे या ऐसा करने के बारे में नहीं कहोगे तो गाली खाने के लिए तैयार रहो.ये जो ऑन डिमांड सप्लाई वाली परंपरा शुरू हुई है राजनीति से लेकर तमाम क्षेत्रो में, बिलकुल फरमाइशी फ़िल्मी गानो के विविध भारती वाले प्रोग्राम की तरह और जिसका चौबीसों घंटे मीडिया के ज़रिये प्रसारण होता रहता है, इसके चलते किसी भी सरकार, विचार, व्यक्ति और समूह के सामने तुरंत प्रिय और अप्रिय होने का संकट खड़ा हो गया है. ये दबाव लोगों के लिए, संस्थाओं और समाज के लिए प्राणघातक है. बचना है तो इससे बचिए.Amitaabh Srivastava

      Reply
  • September 24, 2016 at 8:54 am
    Permalink

    ” मकान गिराने वाला इंजिनियर नहीं कहलाता इंजिनियर तो निर्माण ही करता हे ” प्रेमचन्द की सेम यही लाइन बहुत ही सीनियर और बहुत ही बढ़िया फिल्म समाजशास्त्र लेखक जय प्रकाश चोकसे ( जिनमे सिर्फ एक कमी हे की सलमान सलीम खान फेमली उनकी नाक का बाल हे उनका हर ”खून” माफ़ हे ) ने भी प्रयोग की . कहा की अनुराग कश्यप एन्ड पार्टी यानि बहुत से नए फिल्मकार लोगो के बारे उन्होंने बड़ा सटीक कहा की की अपने काम से ये पुरानी मान्यताओ परम्पराओ के महल के महल गिरा सकते हे उस काम में ये माहिर हे ठीक . लेकिन उसके बाद चोकसे ने सही कहा की उस गिरे हुए महल के मलबे पर एक झोपडी भी बना ना इसके बस का रोग नहीं हे यानी प्रेमचन्द ने आज से सौ साल पहले ही क्या खूब बता दिया था की ” मकान गिराने से ही कोई इंजिनियर नहीं बन जाता हे ”

    Reply
  • September 28, 2016 at 9:07 am
    Permalink

    नेहरू जी किशोर इंदिरा गांधी को जेल से पत्र लिख कर पढ़ाया करते ये सिलसिला शायद 1930 से 1933 तक चला था जब ये पत्रो का सिलसिला खत्म हुआ तब एक तरफ भारी आर्थिक मंदी दी थी तो दूसरी तरफ सारी दुनिया में फासिज़्म का उभार हो रहा था उदारवादी ताकते हताश निराश दिख रही थी ठीक वैसे ही मिलते जुलते हालात इस समय हम भारत में देख रहे हे एक तरफ मंदी हे बेरोजगारी आर्थिक दिक्कते हे तो दूसरी तरफ मोदी सरकार के आने के बाद से ही पुरे उपमहादीप में दक्षिणपंथी ताकतों के हौसले उफान पर हे उदारवादी ताकते और लोग हताश निराश और उदास हे कोंग्रेस से कोई उमीद नहीं हे वाम दल सिमट रहे हे बाकी जो अच्छी उदारवादी ताकते हे भी उनकी लीडरशिप भी बूढी हो रही हे नए और ऊर्जावान लोग नहीं दिख रहे हे कम उम्र और निराश लोगो के दक्षिणपंथ और कट्टरपंथ प्रचार में बह जाने का बढ़ा खतरा सामने हे ऐसे हालात में वैचारिक लोगो का हौसला बनाये रखने को पढ़ते हे की इस आखिरी पत्र में नेहरू जी क्या लिखते हे ” 8 अगस्त 1933 ———————————— दुनिया की गेर इंसाफिया रंज और हैवानियत कभी कभी हमें सताते हे और हमारा मन खराब कर देते हे और हमें बाहर निकालने का रास्ता दिखाई नहीं देता . मैथ्यू अर्नाल्ड की तरह हम महसूस करते हे की इस संसार में कोई आसरा नहीं हे और हमारे लिएसिवा इसके कोई चारा नहीं हे की आपसमे सचाई का बर्ताव करे ———— मगर फिर भी अगर हम ऐसा उदासी भरा रुख अपना ले तो कहना होगा की हमने जिंदगी या इतिहास से सही सबक नहीं सीखा हे क्योकि इतिहास हमें विकास की और तरक्की की और मनुष्य के लिए आगे बढ़ सकने की बाते सिखाता हे जिंदगी भरपूर और रंग बिरंगी हे हालांकि उसमे बहुत दलदल और डाबर और कीचड की जगह हे पर दुसरी तरफ इसमें महासागर पहाड़ और बर्फ की नदिया और अधभुत तारो भरी राते ( खासकर जेल में ) हे और परिवार की और दोस्तों की मोहब्बत हे और एक ही मकसद की खातिर काम करने वालो का साथ हे और संगीत हे और पुस्तके और विचारो का साम्राज्य हे ——————————

    Reply
  • September 28, 2016 at 9:08 am
    Permalink

    दुनिया की सुन्दर चीज़ों की तारीफ करना और विचार और ख्याली दुनिया में रहना आसान हे . पर इस तरह दुसरो के रंजो गम से कतराने की कोशिश करना और इस बात की फ़िक्र ना करना की दुसरो पर क्या बीतती हे , न तो हौसले की निशानी हे न आपसी हमदर्दी की . विचार के तभी कोई मानी हो सकते हे जब उसका नतीजा कर्म हो . हमारे दोस्त रोम्यां रोलां ने कहा हे ” कर्म ही विचार का अंजाम हे जो विचार कर्म की तरफ न देखे वह सब का सब नाकाम और धोखेबाज़ी हे इसलिए अगर हम विचार के दास हे तो हमें कर्म का भी दास होना चाहिए लोग बाग़ कर्म से इसलिए कतराते हे की अंजामो से डरते हे क्योकि कर्म का मतलब हे जोखिम और खतरा .लेकिन डर दूर से ही भयंकर दिखाई देता हे नजदीक से देखा जाए तो इतना बुरा नहीं होता और बहुत बार तो डर ऐसा सुहावना साथी बन जाताहै , जो जिंदगी की लज़्ज़त और ख़ुशी को बढ़ाता हे जिंदगी का मामूली दौर कभी कभी नीरस हो जाता हे , क्योकि हम यह सोच लेते हे की दुनिया की बाते अपने आप होती रहती हे , और उनमे मज़ा नहीं लेते लेकिन अगर हमें जिंदगी की इन्ही मामूली चीज़ों के बिना कुछ दिन रहना पड़े , तो हम उनकी कितनी कदर करने लगते हे बहुत से लोग ऊँचे ऊँचे पहाड़ो पर चढ़ते हे , और चढ़ाई के आनन्द के लिए और मुश्किल पर करने व् खतरा उठाने से हासिल होने वाली ख़ुशी के लिए , जिंदगी व् तन बदन को जोखिम में डालते हे . और उनके चारो तरफ जो खतरा मंडराता रहता हे उसकी वजह से उनकी ज्ञानेन्द्रियां पैनी हो जाती हे और आधार लटकी हुई जिंदगी का मज़ा गहरा हो जाता हे हम सबके सामने पसंद करने के लिए दो रास्ते हे या तो हम उन निचली घाटियों में पड़े रहे जो दम घोटने वाले धुंधो और कोहरे से ढंकी रहती हे पर जो कुछ हद तक हमारे तन की हिफाज़त करती हे या हम जोखिम उठाकर और अपने साथियो को खतरे में डाल कर ऊँचे ऊँचे पहाड़ो पर चढ़े , ताकि ऊपर की साफ़ हवा में सांस ले सके , दूर दूर के नज़रो का आनन्द उठा सके और उगते हुए सूर्य का स्वागत कर सके ——————————–प्यारी बेटी मेरा काम पूरा हो गया और यह आखिरी पत्र अब पूरा होता हे आखिरी पत्र ? नहीं कभी नहीं में तो तुम्हे न जाने कितने पत्र और लिखूंगा पर यह सिलसिला खत्म होता हे .

    Reply
  • October 19, 2016 at 11:56 pm
    Permalink

    Sikander Hayat•3558•Member •1 day ago
    अमीरो का और अमीर बनने की होड़ में लगे लोगो का रहन सहन अजीब हो रहा हे बहुत अजीब . मुसलमान हे तो अधिकतम रिलिजियस हुए जा रहे हे हिन्दू हे तो बाबाओ के चरणों में लोट लगा रहे हे अजीब से ढंग से रहते हे मेरे आस पास तीन फ्लैटों में करोड़ो की तोड़ फोड़ हो चुकी हे ( सजाना संवारना ) घर को पता नहीं क्या बनाना चाहते हे ? इनके घरो में कोई आता जाता नहीं दिखता हे ( सोशल सर्किल नहीं ) तोंद निकल रही हे कोई खेल नहीं खेलते कोई किताब नहीं पढ़ते किसी से इनका आत्मीय रिश्ता नहीं होता हे बस पैसा पीटने की धुन में लगे रहते हे और असली होश इनके तब उड़ते हे जब बच्चे थोड़े बड़े हो जाते हे फिर इनके घरो और गहरा सन्नाटा हो जाता हेSikander Hayat•3558•Member •2 days ago
    बुजुर्गो का ही नहीं सभी का अकेला हो जाना तय हे क्योकि सबको कामयाबी चाहिए हे उसके लिए लाज़मी हे की की आप अपने जीवन में कम से कम जन परिजन प्रियजन रखे ताकि आपको उन पर ध्यान देकर अपना समय और दिमाग बर्बाद ना करना पड़े और कामयाबी पर आपका फुल फोकस रहे इसी फंडे को अपनाकर लोग कामयाब भी हो रहे हे शाहरुख़ ने अपनी इकलौती बहन की शादी नहीं की उन्हें पता होगा की जो भी उनकी डिप्रेशन की शिकार बहन से शादी करेगा वो उनकी दौलत पर नज़र जरूर गड़ायेंगे अमिताभ जया ने अमर सिंह को लात मार दी सचिन ने बचपन के दोस्त काम्बली को उबारने की कोई कोशिश नहीं की और हज़ारो उद्धरण हे लोग अब इसी रास्ते पर चल रहे हे और खूब कामयाब भी हो रहे हे मगर जब कामयाब हो जाते हे तो क्या देखते हे की -उस कामयाबी को बाटने वाला और उनकी कामयाबी की ख़ुशी को दुगना करने वाला कोई नहीं होता हे यही से खरबो रुपयो के के जाकिर नायक रविशंकर झांसाराम डालने गुर फलाने गुरुओ के बाजार की नीव भी पड़ती हे

    Reply
  • October 20, 2016 at 11:05 am
    Permalink

    Dilip C Mandal added 3 new photos.18 October at 18:02 · MP व्यापम में जब 50 से ज़्यादा शहीद हो गए तो इस मामले को खोलने वाले आशीष चतुर्वेदी को सुरक्षा दे दी गई।सबसे अच्छी बात है कि सिपाही रहमदिल हुआ तो बीच बीच में साइकिल पर आशीष को बिठा भी लेता है। ज़्यादातर समय आशीष ही चलाते हैं। सुरक्षा के लिए एक डंडा साथ होता है।बीजेपी असम के पूर्व अध्यक्ष सिद्धार्थ भट्टाचार्य के भांजे और बीजेपी से गुवाहाटी का लोकसभा चुनाव लड़ चुके मनोरंजन गोस्वामी के पुत्र अरणब गोस्वामी को सुरक्षा बलों के 20 जवान सुरक्षा देंगे।Dilip C Mandal
    18 October at 13:23 · इतिहास के पन्ने बोलते हैं।डायर से जिरह करने वाले चिमनलाल सीतलवाड़ के पुत्र और तीस्ता के दादा एम सी सीतलवाड़ आज़ाद भारत के पहले अटॉर्नी जनरल बने। भारत के पहले लॉ कमीशन के वे चेयरमैन थेमोदी और अमितशाह की नाक में दम करने वाली तीस्ता के परिवार का असाधारण अतीत रहा है।सरकार उन्हें रेस्टोरेंट के बिल चुकाने के घोटाले में घेरना चाहती है।

    Reply
  • November 7, 2016 at 9:40 am
    Permalink

    भारत ही नहीं विश्व स्तर पर देखा गया हे की जिस तरह का साहित्य होता हे उसी तरह का समाज निर्मित होता हे आज के समय में भारत जैसे विशाल देश में प्रगतिशील साहित्य का निर्माण बहुत जरुरी हे आज भी हमारा समाज धर्मान्धता में डूबा हुआ हे इलेक्ट्रॉनिक मिडिया ने इस धर्मान्धता को खत्म करके वैज्ञानिक समाज बनाने के बजाय अंधविश्वासों को ही बढ़वा दिया हे ———- अब लोग किताब नहीं पढ़ते हे ——— साहित्य का काम पढ़ा जाना या न पढ़ा जान चिंता का विषय हे ——– लोगो की रुचिया बदल रही हे पूरा देश और समाज एक खतरनाक दौर से गुजर रहा हे इसके चलते किताबो का कहतव दिन प्रतिदिन घाट रहा हे दर्शनीय चीज़े महत्वपूर्ण होती जा रही हे मरहूम प्रोफेसर और दलित चिंतक तुलसीराम

    Reply
  • November 7, 2016 at 9:58 am
    Permalink

    मंगलेश डबराल इस समय विस्थापन की इस्थिति यह हे की मनुष्य अपने ही घर में विस्थापित हो रहा हे ———– बड़े लोग बढ़ा धन सफलता बाजार और मीडिया जिस तरह से मनुष्य को अकेला बना रहे हे और विस्थापित कर रहे हे यह एक बहुत बड़ी घटना हे आज की पत्रकारिता हस्ती केंद्रित पत्रकारिता होती जा रही हे ——————- ऐसे में लेखक और साहित्यकार के लिए क्या बच जाता हे वह पैसे या सफलता का रास्ता नहीं अपना सकता हे क्योकि उसकी जो विधा हे उसमे धनसम्पत्ति या बिग मनी नहीं हे यह बहुत ही साधनविहीन लोगो की विधा हे ————- पैसा इतना महत्वपूर्ण हो गया हे की जीवन के अन्य पहलु नदारद हो गए हे ———– जितना में देख सकता हु उतना लिखने का प्रयास करता हु हालांकि समाज की स्वेन्दनात्मक पर्किर्या को हमें और गहराई से पकड़ना चाहिए

    Reply
  • February 12, 2017 at 10:22 pm
    Permalink

    ” ‘विचारो का फल बाबा पेड़ लगाय , पोता पाए -प्रेमचन्द ” प्रेमचन्द की पत्नी शिवरानी देवी प्रेमचन्द पर लिखे संस्मरण में एक रेल यात्रा में प्रेमचन्द की बात बताती हे – ड्योडी दर्जे में – सं 1929 की बात हे में प्रयाग से लौट रही थी मेरे साथ बन्नू था आप थे ( प्रेमचन्द ) हम तीनो इंटर क्लास से आ रहे थे चैत का महीना था अष्टमी थी . गाडी में बेहद भीड़ थी . जब बहुत से देहाती मुसाफिर हमारे डब्बे में घुस आये तो आप बोले ‘ यह ड्योढ़ा दर्ज हे किराया ज़्यादा लगेगा ‘ देहाती लोग बोले क्या करे बाबु जी दो रोज से पड़े हे आप बोले ‘तुम लोग कहा से आ रहे हो कहा जाओगे – ? ‘ . हम लोग शीतला जी के दर्शन करने गए थे देहातियों ने कहा आप बोले शीतला जी के दर्शन से तुम्हे क्या मिला – ? सच बताओ – तुम लोगो का कितना खर्चा हुआ – ? एक एक आदमी के कम से कम पंद्रह रूपये ( आज के शायद दस पंद्रह हज़ार ) देहातियों ने कहा . आप बोले ‘ इसका ये मतलब हुआ की तुम लोगो ने चार चार महीने के खाने का गल्ला बेच दिया . इससे अच्छा होता की देवी की पूजा तुम घर पर ही कर लेते देवीजी सब जगह रहती हे वहां भी तुम पूजा कर सकते थे . देवी देवता तभी खुश होते हे जब तुम आराम से रहो ‘ क्या करे मनोती माने थे अगर देवी जी के यहाँ ना जाते तो नाराज़ न होती – ? देहातियों ने कहा . गाडी बेहद भरी थी . साँस लेना कठिन था गर्मी भी पड़ने लगी थी अगला स्टेशन जब आया तो में बोली ‘ इनसे कह दीजिये उतर जाए ,इन उपदेशो का पालन इनसे नहीं होगा आप बोले – तो बिना समझाए तो भी काम नहीं चलने का में बोली फिर से समझ लेना मेरा तो दम घुट जा रहा हे आप बोले इन्ही के लिए तो जेल जाती हो लड़ाई लड़ती हो और इन्ही को हटा रही हो , मुझे तो इन गरीबो पर दया आती हे बेचारे धर्म के पीछे भूखे मर रहे हे . में बोली जो बेवकूफी करेगा वो भूख ना मरेगा तो और क्या होगा –? आप बोले तो क्या करे , सदियो से अंधविश्वास के पीछे पड़े हे . में बोली जो खुद ही मारने को तैयार हे उन्हें कोई जिन्दा रख सकता हे – ? इनके ऊपर ज़बरन कानून लगा दिया जाए तो इनमे समझ आ सकती हे तभी आप बोले – धीरे धीरे समझ लेंगे यधपि अभी काफी देर हे कोई काम जबरन किया जाएगा तो मारने मारने को तैयार हो जाएंगे . में बोली तो गाडी में बैठे बैठे नहीं सीख पाएंगे आप बोले आखिर तब तक समझाया जाए में बोली आप इन्ही के लिए तो पोथा का पोथा लिख रहे हे ‘ ये उपन्यास लेकर थोड़े ही पढ़ते हे . हां उन उपन्यासों के फिल्म तैयार कर गाँव गाँव मुफ्त दिखलाये जाते तो लोग देखते आप बोले में बोली पहले आप लिख डालिये फिर फिल्म तैयार करवाइयेगा . हम में ये बाते हो ही रही थी की तब तक रेलवे पुलिस का आदमी आया उन सबो को धमकी देने लगा और कहने लगा ड्योढ़ा हे और किराया लाओ उस पुलिसमेन की हरकत देख कर आप को बड़ा क्रोध आया और बोले -तुम लोग आदमी हो या पशु . ”पशु क्यों हु तीसरे दर्जे का किराया दिया और ड्योढ़े में आकर बैठे हे ” तीसरे में जगह थी जो उसमे बैठते – ? किराया तो तुमने ले लिया इ ये भी तो देखते की उसमे जगह हे या नहीं – ? आदमियो को पशु बना रखा हे तुम लोगो ने में इनके पीछे लड़ूंगा यह राहज़नी हे की किराया ले ले और गाडी में किसी को भी जगह नहीं . चलो दो इनको तीसरे दर्जे में जगह और उन आदमियो से कहा – चलो में तुम्हारे साथ चलता हु और उन आदमियो को लिए हुए पुलिसमेन के साथ आप उतर पड़े पुलिसमेन ने किसी तरह उन आदमियो को एक एक करके भरा . जब आप लौटकर आये तो मझसे बोले देखा इन आदमियो को ? में बोली आप क्यों लड़ने लगे आप बोले में क्या कोई भी इस तरह की हरकत नहीं देख सकता और इस तरह के अत्याचार देख कुछ न बोले तो में कहूंगा की उसके अंदर गर्मी नहीं हे में बोली कोंग्रेस के आदमी जो नेता कहे जाते हे , वे ए , बी में मौज़ से रहते हे . यह पता भी नहीं रखते की सी क्लास वालो को क्या आराम -तकलीफ हे , आप बोले अगर यहाँ के सभी आदमी जिम्मेदार ही होते तो इस तरह का मुल्क ना होता . हमारी इसी कमी से सरकार राज्य कर रही हे . मुट्ठी भर अँगरेज़ पेटिस करोड़ लोगो पर राज्य करे इसके माने क्या हे हम में चरित्र बल , आत्म बल कुछ भी नहीं हे उसी तावान हम भोग रहे हे उर रो रहे हे . में बोली रयह एक दिन में थोड़े ही संभलेगा . आप बोले तो क्या सब लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे , तब भी तो अच्छा ना होगा . में बोली होगा जब होगा . वे बोले ये आज़ादी का पौधा इमली के दरख्त ( पेड़ ) की तरह हे बाबा लगता हे तो पोता फल खाता हे ”

    Reply
  • July 30, 2017 at 2:28 pm
    Permalink

    शैलेश मटियानी एक लेखक का नाम है!” – ताराचंद्र त्रिपाठी
    विधाता. जब किसी को भरपूर प्रतिभा देता है तो उसके साथ ऐसी विसंगतियाँ भी जोड़ देता है कि उसके लिए जीना दूभर हो जाता है. इस विसंगति के चक्रव्यूह से वही निकल पाते हैं जिनमें संघर्ष करने की अपार क्षमता होती है. इसी को चाल्र्स डार्विन ने प्राकृतिक चयन या योग्यतम की उत्तरजीविता की प्रकृतिक प्रक्रिया कहा है.
    शैलेश मटियानी का जीवन भी इसका एक जीता­जागता नमूना है. वे आजादी से सोलह साल पहले एक पिछड़ेे पर्वतीय गाँव के बेहद गरीब परिवार में जन्मे और बारह वर्ष की अवस्था में अनाथ हो गये. दो जून रोटी के लिए न केवल अपने चाचा की मांस की दूकान में काम करना पड़ा, अपितु कलम संभालते ही अपने गरीब और पिछड़ेे परिवेश से उठने के प्रयास में एक बोचड़ की दूकान में काम करने वाला छोकरा इलाचन्द जोशी और सुमित्रानन्दन पन्त से टक्कर लेना चाहता है. जैसे व्यंग बाण भी सहे.
    उनको तपा­तपा कर सोना बनाने की प्रक्रिया में काल भी जैसे क्रूरता की हदें पार कर गया. अपने पापी पेट की भूख को शान्त करने के लिए होटल में जूठे बरतन माँजने से लेकर अनेक छोटे­मोटे काम करने पडे. दिल्ली, मुजफ्फर नगर, फिर कुछ दिन अल्मोड़ा, और अन्ततः इलाहाबाद आ गये. इतनी भटकन और अभावों से उनके जीवन पथ को कंटकाकीर्ण बनाने के बाद भी जैसे काल संतुष्ट नहीं हुआ, और उनके मासूम छोटे पुत्र की हत्या के प्रहार ने उन्हें बुरी तरह तोड दिया. मौत भी ऐसी दी कि क्रूर से क्रूर व्यक्ति को रोना आ जाय.
    इतने कठिन जीवन संघर्ष के बीच उन्होंने न केवल हिन्दी साहित्य को दर्जनों अमर कृतियों की सौगात दी अपितु अपने अंचल के जीवन को भी अपनी रचनाओं में जीवन्त रूप से उभारा. सच पूछें तो कुमाऊँ की पृष्ठभूमि, उसके सुख दुख, अभावों और संघर्ष के बीच भी जनजीवन के मुस्कुराने के पल दो पल खोजने के प्रयासों को भी उनके अलावा पर्वतीय अंचल का कोई अन्य कथाकार उतनी शिद्दत के साथ नहीं उभर पाया है.
    उन्होंने अनेक उपन्यास लिखे, दर्जनों कहनियाँ लिखीं, ’पितुआ पोस्टमैन’ के सामान्य धरातल से उठ कर वे ’प्रेतमुक्ति’ के जाति, वर्ग, सामाजिक विडंबनाओं से मुक्त मानवत्व की महान ऊँचाइयों पर पहुँचे. जब कि उनका सहारा लेकर उठे, और लक्ष्मी के वरद्पुत्र बने तथाकथित रचनाकार समाज में सामन्ती युग के प्रेतों को जगाने में लगे हुए हैं.
    शैलेश, हिन्दी साहित्य के भंडार को भर कर चले गये. पर्वतीय अंचल के जनजीवन के अभावों, सुख­दुख, संघर्षों, और जिजीविषा को जीवन्त रूप में उभार कर चले गये. पर हमने, हमारी व्यवस्था ने उनके नाम से एक दो पुरस्कार घोषित कर जैसे छुट्टी पाली. हल्द्वानी में उनके आवास को जाने वाले मार्ग का नामकरण ’शैलेश मटियानी मार्ग, का शिला पट्ट लगाकर, जैसे उन पर एहसान कर दिया. उस शिला पट्ट की हालत यह है कि, उस पर परत­दर­परत कितने व्यावसायिक विज्ञापन चिपकते जा रहे हैं इस पर ध्यान देने की किसी को फुर्सत नहीं है.
    उनका आवास जीर्ण­शीर्ण हो चुका है, टपकते घर के बीच उनका परिवार जैसे­तैसे दिन काट रहा है, अपने पिता की थात को फिर से लोगों के सामने लाने के लिए उनके ज्येष्ठ पुत्र राकेश, रात­दिन अकेले लगे हुए हैं. सत्ता और पद के मद में आकंठ निमग्न, जुगाड़­धर्मी अन्धी व्यवस्था में ही नहीं अपने आप को रचनाधर्मी कहने वाले हम लोगों में भी मौखिक सहानुभूति के अलावा उनकी स्मृति को सुरक्षित करने और नयी पीढी को अभावों से लोहा लेते हुए अपने अस्तित्व को प्रमाणित करने की प्रेरणा देने के लिए कोई विचार नहीं है.
    कितने कृतघ्न हैं हम लोग! यह इस देश में नहीं पता चलता, विदेशों में जाने पर पता चलता है. मुझे 2011 तथा 2013 में छः मास लन्दन में बिताने का अवसर मिला. अपनी यायावरी की आदत से लाचार मैंने लन्दन का कोना­कोना छान मारा. वैभव और उपलब्धियों से भरे इस महानगर में सबसे ध्यानाकर्षक बात लगी ’अपने कृती पुरखों के याद को बनाये रखने की प्रवृत्ति. अकेले लन्दन में कीट्स, सेमुअल जोन्सन, चाल्र्स डिकिंस, चाल्र्स डार्विन, जैसे उनसठ रचनाधर्मियों के आवासों को उनके कृतित्व का संग्रहालय बना दिया गया है. इस श्रद्धापर्व में उनके अपने लोग ही शामिल नहीं है. नाजी जर्मनी के उत्पीड़न से बचने के लिए लन्दन में शरण लेने वाले फ्रायड जैसे अनेक विदेशी मूल के कृती भी विद्यमान हैं. यही नहीं आज के रसेल स्क्वायर के जिस आवास में चाल्र्स डिकिन्स आठ वर्ष रहे और अपने कृतित्व को उभारा, आज पाँच सितारा होटल में रूपान्तरित होने पर भी, उसके मालिक अपनी दीवार पर यह लिखना नहीं भूले कि इस आवास में चाल्र्स डिकिंस आठ वर्ष रहे थे. ब्रिटिश पुस्तकालय के प्रांगण में आइजेक न्यूटन आज भी अपना परकार (कंपास) लेकर अन्वेषण में लगे हुए हैं. बैंक आफ इंग्लैंड वाले मार्ग पर 1808 मे जेलों में सुधार करने के लिए संघर्ष करने वाली महिला ऐलिजाबेथ के आवास पर, जो आज एक विशाल भवन में रूपान्तरित हो चुका है, उनके नाम और कृतित्व को सूचित करने वाली पट्टिका लगी हुई है. किसी भी सड़क पर चले जाइये, आपको अपने पूर्वजों के कृतित्व के प्रति आभार व्यक्त करने वाली पट्टिकाएँ मिल जायेंगी. और हमने अपने लोक जीवन को साहित्य के शिखर पर उत्कीर्ण करने वाले कथाकार के नाम पर एक मार्ग पट्टिका लगाई भी तो उसे अंट­शंट विज्ञापनों के तले पाताल में दफना दिया.
    दो सौ साल जिनकी गुलामी में रहे, जिनकी भाषा, वेश­भूषा, बाहरी ताम­झाम को, अपनी परंपराओं को दुत्कारते हुए हमने अंगीकार किया, उनके आन्तरिक गुणों और अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता बोध को हम ग्रहण नहीं कर सके. आज भी हम वहीं पर हैं. पंजाब से आये लोगों की कर्मठता को अंगीकार करने के स्थान पर हम उनके नव धनिक वर्ग के तमाशों और तड़क­भड़क के सामने अपनी हजारों वर्ष के अन्तराल में विकसित सरल और प्राकृ्तिक रूप से अनुकूलित परंपराओं को ठुकराते जा रहे हैं.
    तब और भी दुख होता है कि जहाँ प्रदेश की सत्ता के शीर्ष पर उनके ही जनपद का व्यक्ति आसीन है, उनके पुत्र को अपने कृती पिता की स्मृति को धूमिल होने और अपने बीमार घर को धराशायी होने से बचाने के लिए दर­दर भटकना पड रहा है.
    — ताराचंद्र त्रिपाठी

    Reply
  • August 27, 2017 at 1:30 pm
    Permalink

    Jagadishwar Chaturvedi
    18 hrs ·
    अलगाव के खि‍लाफ मशाल हैं मुक्‍ति‍बोध
    इंटरनेट युग में संपर्क और संबंध पेट नहीं भरते,मोबाइल की बातों से संतुष्‍टि‍ नहीं मि‍लती,आज हमें सभी कि‍स्‍म के अत्‍याधुनि‍क तकनीकी और संचार साधन चैन से जीने का भरोसा नहीं देते, बार बार अलगाव का एहसास परेशान करता है ,चि‍न्ता होने लगती है कि‍ आखि‍रकार हम कि‍स दुनि‍या में जी रहे हैं। इस अलगाव से मुक्‍ति‍ कैसे पाएं और इसका सामाजि‍क स्रोत कहां है ? इस समस्‍या के समाधान के बारे में मुक्‍ति‍बोध मशाल हैं। अकेलेपन की रामबाण दवा हैं।
    मुक्‍ति‍बोध ने लि‍खा अकेलेपन की अवस्‍था में ” मन अपने को भूनकर खाता है।’ यह वाक्‍य बेहद मारक है। हम गंभीरता से सोचें कि‍ इससे कैसे बचें। ऐसी अवस्‍था में हम अपने लि‍ए मार्गदर्शक खोजते रहते हैं,अपने जीवन के चि‍त्र और अपने जीवन की समस्‍याओं के समाधान नेट से लेकर साहि‍त्‍य तक खोजते रहते हैं लेकि‍न हमें अपनी समस्‍याओं के समाधान नहीं मि‍लते। थककर हम चूर हो जाते हैं और सो जाते हैं। अलगाव को दूर करने के लि‍ए नेट,मोबाइल और फोन पर घंटों बातें करते रहते हैं। इसके बावजूद बेचैनी दूर नहीं होती,जीवन में रस-संचार नहीं होता। इसका प्रधान कारण है हमारी बातचीत,संपर्क और संवाद से मानवीय सहानुभूति‍ का लोप।
    मानवीय सहानुभूति‍ के कारण ही हम एक-दूसरे के करीब आते हैं। हम चाहे जि‍तना दूर रहें कि‍तना ही कम बातें करें मन भरा रहता है क्‍योंकि‍ हमारे मानवीय सहानुभूति‍ से भरे संबंध हैं। लेकि‍न आज के दौर में मुश्‍कि‍ल यह है हमारे पास संचार की तकनीक है लेकि‍न मानवीय सहानुभूति‍ नहीं है। तकनीक से संपर्क रहता है ,दूरि‍यॉं कम नहीं होतीं। बल्‍कि‍ तकनीक दूरि‍यॉं बढ़ा देती है। दूरि‍यों को कम करने के लि‍ए हमें अपने व्‍यवहार में प्रेम और मानवीय सहानुभूति‍ का समावेश करना होगा। प्रेम और मानवीय सहानुभूति‍ के कारण ही जि‍न्‍दगी के प्रति‍ आस्‍था,वि‍श्‍वास और प्रेम बढ़ता है।
    मुक्‍ति‍बोध की नजर में इसका प्रधान कारण है ‘ आजकल आदमी में दि‍लचस्‍पी कम होती जा रही है।’ अलगाव में मनुष्‍य दोहरी तकलीफ झेलता है वह ‘स्‍व’ और ‘पर’ दोनों को दण्‍ड देता है। मुक्‍ति‍बोध के अनुसार जि‍न्‍दगी जीने अर्थ है ‘बि‍जली-भरी तड़पदार जि‍न्‍दगी’ जीना। ‘ ऐसी जि‍न्‍दगी जि‍समें अछोर,भूरे,तपते , मैदानों का सुनहलापन हो, जि‍समें सुलगती कल्‍पना छूती हुई भावना को पूरा करती है, जि‍समें सीने का पसीना हो, और मेहनत के बाद की आनन्‍दपूर्ण थकन का सन्‍तोष हो। बड़ी और बहुत बड़ी जि‍न्‍दगी जीना (इमेन्‍स लि‍विंग) तभी हो सकता है,जब हम मानव की केन्‍द्रीय प्रक्रि‍याओं के अवि‍भाज्‍य और अनि‍वार्य अंग बनकर जि‍एं। तभी जि‍न्‍दगी की बि‍जली सीने में समाएगी।’
    मुक्‍ति‍बोध के अनुसार सार्थक जीवन की अभि‍लाषा रखना एक बात है और उसके अनुसार जीवन जीना दूसरी बात है। यह भी लि‍खा हर आदमी अपनी प्राइवेट जि‍न्‍दगी जी रहा है । या यों कहि‍ए कि‍ व्‍यावसायि‍क और पारि‍वारि‍क जीवन का जो चक्‍कर है उसे पूरा करके सि‍र्फ़ नि‍जी जि‍न्‍दगी जीना चाहता है। मैं भी वैसा ही कर रहा हूँ । मैं उनसे कि‍सी भी हालत में बेहतर नही हूँ । लेकि‍न क्‍या इससे पार्थक्‍य की अभावात्‍मक सत्‍ता मि‍टेगी ? क्‍या इससे मन भरेगा,जी भरेगा ? यह बि‍लकुल सही ख्‍याल है कि‍ सच्‍चा जीना तो वह है जि‍समें प्रत्‍येक क्षण आलोकपूर्ण और वि‍द्युन्‍मय रहे,जि‍समें मनुष्‍य की ऊष्‍मा को बोध प्राप्‍त हो। कि‍न्‍तु यह तभी संभव है जब हम अपने वि‍शि‍ष्‍टों और सुवि‍शि‍ष्‍टों को कि‍सी व्‍यापक से सम्‍बद्ध करें,वि‍शि‍ष्‍ट को व्‍याप्‍ति‍ प्रदान करना, केवल बौद्धि‍क कार्य नहीं है,वह मूर्त, वास्‍तवि‍क ,जीवन -जगत् संबंधी कार्य है। तभी उस वि‍शि‍ष्‍ट को एक अग्‍नि‍मय वेग और आवेग प्राप्‍त होगा , जब वह कि‍सी दि‍शा की ओर धावि‍त होगा।यह दि‍शा वि‍शि‍ष्‍ट को व्‍यापक से सम्‍बद्ध कि‍ए बि‍ना उपस्‍थि‍त नहीं हो सकती।Jagadishwar Chaturvedi
    18 hrs ·

    Reply
  • October 8, 2017 at 2:25 pm
    Permalink

    वायर से साभार – अपूर्वानंद ON 08/10/2017 • 2 COMMENTS
    साझा करें:
    PrintMoreपुण्यतिथि विशेष: प्रेमचंद लिखते हैं, ‘राष्ट्रीयता वर्तमान युग का कोढ़ है, उसी तरह जैसे मध्यकालीन युग का कोढ़ सांप्रदायिकता थी.’
    Premchandलेखक प्रेमचंद. (जन्म: 31 जुलाई 1880 – मृत्यु: 08 अक्टूबर 1936)
    ‘जर्मनी में नाज़ी दल की अद्भुत विजय के बाद यह प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में जर्मनी फ़ासिस्ट हो जाएगा और वहां नाजी-शासन कम से कम पांच वर्ष तक सुदृढ़ रहेगा? यदि एक बार नाज़ी शासन को जमकर काम करने का मौका मिला तो वह जर्मनी के प्रजातंत्रीय जीवन को, उसकी प्रजातंत्रीय कामना को अपनी सेना और शक्ति के बल पर इस तरह चूस लेगा कि 25 वर्ष तक जर्मनी में नाज़ी दल का कोई विरोधी नहीं रह जाएगा.’
    प्रेमचंद ने 1933 में जर्मनी में हुए चुनावों में नाज़ी दल की विजय के बाद ‘जर्मनी का भविष्य’ शीर्षक के संक्षिप्त टिप्पणी में यह आशंका व्यक्त की थी.
    इस अंश में ध्यान देने लायक अंश वह है जिसमें वे जर्मनी की ‘प्रजातंत्रीय कामना’ को चूस लिए जाने को लेकर चिंतित हैं. प्रजातंत्रीय कामना लुप्त हो सकती है और वह एक ख़ास तरह की राजनीतिक शक्ति के प्रबल होने की स्थिति में ख़तरे में पड़ जाती है, यह वे कह रहे हैं.
    लेकिन यह जो जीत हुई है, वह यूं ही नहीं: ‘जर्मनी में नाज़ी दल की नाजायज़ सेना का तीव्र दमन और सभी विरोधी शक्तियों को चुनाव के पूर्व ही कुचल डालना ही नाज़ी विजय का कारण है. यह कहां का न्याय था कि वर्गवादियों को जेल भेजकर, विरोधियों को पिटवाकर, मुसोलिनी की तरह विरोधी पत्रों को बंद कराकर चुनाव कराया जाए और उसकी विजय को राष्ट्र मत की विजय बताया जावे.’
    प्रेमचंद की इस टिप्पणी को ज़रूरी नहीं आज के दौर पर घटाकर देखा जाए. लेकिन इस टिप्पणी में नाज़ी दल की विजय के पहले विपक्ष के जोर-जबर्दस्ती सफाए पर प्रेमचंद का ध्यान जाता है.
    वे जर्मनी के विपक्षी दलों की लानत मलामत नहीं करते कि वे क्यों अपनी रक्षा नहीं कर रहे, यह साफ़ तौर पर कहते हैं कि जुर्म हिटलर का है जो गैरजनतांत्रिक तरीके से विपक्ष का ख़ात्मा कर रहा है.
    विपक्ष का ख़त्म होना चिंता का विषय होना चाहिए और उसके लिए उसे ही ज़िम्मेदार मानने की जगह जो उसे ख़त्म कर रहा है, उस पर सवाल उठाना चाहिए, इसे लेकर प्रेमचंद को संदेह नहीं है. नाजी दल की एक निजी सेना है जो दूसरे जर्मन दलों के पास नहीं.
    प्रेमचंद की तीखी निगाह उनके अपने वक्त की दुनिया में जो कुछ भी घटित हो रहा था, उसके आरपार देखती है. उनका अपना पक्ष स्पष्ट है. जर्मनी में जो रहा है उसके लिए वे यूरोपीय सभ्यता को ज़िम्मेदार मानते हैं.
    जर्मनी में नाजी दल के एकाधिपत्य के पीछे यहूदियों का दमन भी है. इस दमन के लिए पहले से आधार मौजूद है: ‘यूरोपीय संस्कृति की तारीफें सुनते-सुनते हमारे कान पक गए. उनको अपनी सभ्यता पर गर्व है. हम एशियावाले तो मूर्ख हैं, बर्बर हैं, असभ्य हैं, लेकिन जब हम उन सभी देशों की पशुता देखते हैं तो जी में आता है यह उपाधियां सूद के साथ क्यों न उन्हें लौटा दी जाएं.’
    प्रेमचंद यूरोप में यहूदी विरोधी घृणा के बारे में चर्चा करते हैं: ‘यहूदी मालदार हैं और आजकल धन ही राष्ट्रों की नीति का संचालन करता है, माना! रूस में कम्युनिज़्म को फैलाने में यहूदियों का हाथ था, यह भी माना. यहूदियों ने ईसाइयों से पुरानी अदावतों का बदला लेने और ईसाई सभ्यता को विध्वंस करने का बीड़ा उठा लिया है. यह भी हम मान लेते हैं, लेकिन इसके क्या मानी कि एक राष्ट्र का सबसे बड़ा अंग यहूदियों को मिटा देने पर ही तुल जाए. जर्मनी में नाजी दल ने आते ही आते यहूदियों पर हमला बोल दिया है. मारपीट, खून-खच्चर भी होना शुरू हो गया है और यहूदियों को जर्मनी से भागने भी नहीं दिया जाता… वह अपने प्राणों की रक्षा नहीं कर सकते. यहूदियों ने वहां सकूनत अख़्तियार कर ली है. कई पीढ़ियों से वहां रहते आए हैं. जर्मनी की जो कुछ उन्नति है उसमें उन्होंने कुछ कम भाग नहीं लिया है, लेकिन अब जर्मनी में उनके लिए स्थान नहीं है.’प्रेमचंद की इस टिप्पणी को फिर आज के वक़्त की रोशनी में पढ़ने की ज़रूरत नहीं लेकिन वे उस समय भी अपने देश की स्थिति की तुलना, जर्मनी में जो कुछ हो रहा था, उससे करते हैं: ‘इधर कुछ दिनों से हिंदू मुसलमान के एक दल में वैमनस्य हो गया है, उसके लिए वही लोग ज़िम्मेदार हैं, जिन्होंने पश्चिम से प्रकाश पाया है और अपरोक्ष रूप से यहां भी वही पश्चिमीय सभ्यता अपना करिश्मा दिखा रही है.’
    इसी पश्चिमी सभ्यता का एक आविष्कार राष्ट्रीयता है. टैगोर की राष्ट्रवाद की आलोचना से प्रायः सब परिचित हैं. भगत सिंह ने राष्ट्रवादी संकीर्णता की जो आलोचना की, वह कम प्रचारित है. उन्हें कट्टर राष्ट्रवादी के रूप में प्रचारित किया जाता रहा है.
    प्रेमचंद ‘राष्ट्रीयता और अंतर्राष्ट्रीयता’ शीर्षक निबंध में लिखते हैं, ‘राष्ट्रीयता वर्तमान युग का कोढ़ है, उसी तरह जैसे मध्यकालीन युग का कोढ़ सांप्रदायिकता थी. नतीजा दोनों का एक है. सांप्रदायिकता अपने घेरे के अंदर शांति और सुख का राज्य स्थापित कर देना चाहती थी, मगर उस घेरे के बाहर जो संसार था, उसको नोचने-खसोटने में उसे ज़रा भी मानसिक कलेश न होता था. राष्ट्रीयता भी अपने परिमित क्षेत्र के अंदर रामराज्य का आयोजन करती है.’
    प्रेमचंद राष्ट्रीयता की जगह अंतर्राष्ट्रीयतावाद को तरजीह देते हैं. यह गांधी, नेहरू और भगत सिंह के विचारों से मिलता-जुलता ख्याल है. जिस समय प्रेमचंद लेख रहे हैं, देश के भीतर राष्ट्रीयता का प्रश्न हिंदू-मुस्लिम दायरे में बंटा हुआ है. प्रेमचंद इसमें किसी के साथ रियायत नहीं करते लेकिन देखिए, ख़िलाफ़त के मसले पर भी वे क्या कहते हैं.
    वे ख़िलाफ़त के मसले को ‘महात्मा गांधी की व्यापक दृष्टि’ से न देख पाने की हिंदुओं की कमज़ोरी पर अफ़सोस जाहिर करते हैं, ‘सच्चाई यह है कि हिंदुओं ने कभी ख़िलाफ़त का महत्व नहीं समझा और न समझने की कोशिश की, बल्कि उसको संदेह की नज़र से देखते रहे.’
    वे और सख़्त अल्फाज़ का इस्तेमाल करते हैं, ‘हिंदू कौम कभी अपनी राजनीतिक उदारता के लिए मशहूर नहीं रही और इस मौके पर तो उसने जितनी संकीर्णता का परिचय दिया है, उससे मजबूरन इस नतीजे पर पहुंचना पड़ता है कि इस कौम का राजनीतिक दीवाला हो गया वरना कोई वजह न थी कि सारी हिंदू कौम सामूहिक रूप से कुछ थोड़े से उन्मादग्रस्त तथाकथित देशभक्तों की प्रेरणा से इस तरह पागल हो जाती.’
    प्रेमचंद उस समय हिंदू संगठन निर्माण और शुद्धि आंदोलनों की आलोचना करते हैं और कहते हैं निराशा इस बात से है कि इसके ख़िलाफ़ उदार नेता भी नहीं बोल रहे.वे पूछते हैं, ‘आज कौन-कौन हिंदू है जो हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए जी-जान से काम कर रहा हो, जो उसे हिन्दुस्तान की सबसे महत्वपूर्ण समस्या समझता हो. कौम का यह दर्द, यह टीस, यह तड़प आज हिंदुओं में कहीं दिखाई नहीं देती. दस-पांच हज़ार मकानों को शुद्ध करके लोग फूले नहीं समाते, मानो अपने लक्ष्य पर पहुंच गए. अब स्वराज्य हासिल हो गया!’प्रेमचंद के इस लिखे को सिर्फ उन्हीं के वक्त पर टिप्पणी मानें, ‘गोकशी के मामले में हिंदुओं ने शुरू से अब तक एक अन्यायपूर्ण ढंग अख़्तियार किया है. हमको अधिकार है कि जिस जानवर को चाहें पवित्र समझें लेकिन यह उम्मीद रखना कि दूसरे धर्म को मानने वाले भी उसे वैसा ही पवित्र समझें, खामखाह दूसरों से सर टकराना है, गाय सारी दुनिया में खाई जाती है, इसके लिए क्या आप सारी दुनिया को गर्दन मार देने के क़ाबिल समझेंगे? …अगर हिंदुओं को अभी यह जानना बाकी है कि इंसान से कहीं ज़्यादा पवित्र प्राणी है, चाहे वह गोपाल की गाय हो या ईसा का गधा, तो उन्होंने अभी सभ्यता की वर्णमाला भी नहीं समझी.’प्रेमचंद यह सब कुछ आज से तकरीबन नब्बे साल पहले लिख रहे थे. क्या उस ककहरे पर काम अब शुरू किया जाए? अपूर्वानंद
    (लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं.) वायर से साभार

    Reply
  • November 7, 2017 at 3:32 pm
    Permalink

    लेखकों के लिए पत्रकारों के लिए विचारको के लिए आने वाला टाइम या तो बहुत अच्छा हे या बहुत बुरा होगा ———- ? Naved Shikoh is with Deepak Sharma and 46 others.
    4 November at 16:40 ·
    अब कलम बिकेगा, अखबार नहीं
    RNI और DAVP में दर्ज यूपी के 97% पत्र-पत्रिकाओं का वास्तविक सर्कुलेशन 0 से 1000 तक ही है। सोशल मीडिया पर कोई भी अपनी बात या अपना विज्ञापन फ्री में हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। ऐसे में अखबारों को चुनावी विज्ञापन क्या खाक मिलेगा!
    यही कारण है कि सोशल मीडिया पर लिखने की कला का बाजार सजने लगा है। सुना है यूपी के निकाय चुनाव के चुनावी दावेदार सोशल मीडिया को प्रचार का सबसे बड़ा-आसान और सस्ता माध्यम बनाने जा रहे हैं। जुमलेबाजी की जादूगरी से सच को झूठ और झूठ को सच साबित करने का हुनर रखने वाले कलमकारों की मांग बढ़ गयी है। प्रत्याशियों को प्रचारित करते हुए कलमकारों का हुनर मुफ्त के प्लेटफार्म सोशल मीडिया पर मुखरित होगा। पत्रकार खबर इन्टरव्यू/फर्जी सर्वै/फीचर का हुनर दिखायेगा। कवि-शायर तुकबंदी के जादू से पैसा कमा सकेगा। लेकिन पत्रकारों के लिए सोशल मीडिया पर कैम्पेन मृत्यु शय्या पर पड़े इनके रोजगार की संजीवनी साबित होगा।
    देशभर के ज्यादातर अखबारों के बंद हो जाने के पूरे आसार है। बेरोजगारी के खतरों के बीच पत्रकार सोशल मीडिया पर पेड न्यूज में अपनी रोजी-रोटी तलाशने लगा है।
    इन्टरनेट का जदीद दौर पुराने दौर में भी लिए जा रहा हैं। जहां कलमकार का दर्जा किसी अखबार के मालिक से ऊंचा होता था। लेकिन आज लाइजनिंग.. सियासत और मीडिया संचालकों के मोहताज होते जा रहे थे कलमकार। वक्त ने करवट ले ली है। इन्टरनेट (सोशल मीडिया /वेबसाइट) के जरिए कलमकार अब किसी बिचौलिए का मोहताज नहीं रहेगा।
    जिसमें लिखने की कला है वो बेरोजगारी की इस आंधी में भी भूखा नही रहेगा। एक हाथ से लिखेगा और दूसरे हाथ से पैसा लेगा।

    Reply
  • November 10, 2017 at 8:18 pm
    Permalink

    Ravish Kumar
    7 hrs ·
    ख़ुद की लाश अपने कंधे पे उठाये हैं
    ऐ शहर के बाशिंदों हम गाँव से आये हैं।
    आप अदम गोंडवी हैं। कल के लिए पत्रिका 2012 से रखी है कि कभी फुर्सत से पढ़ेंगे। पाँच साल गुज़र गए। आज एक किताब के गुम हो जाने के आतंक में जब तलाश पर निकला तो पत्रिका फिर से सामने थी। हमने अदम गोंडवी को बहुत देर से जाना। ज़िंदगी के शुरू के पचीस साल बग़ैर जाने निकल गए। दो चार का ही नाम सुना था।बाकी बहुत कम को गहराई से जाना। देर से जानने का एक सुख होता है। जब सब जान चुके होते हैं, स्थिर हो चुके होते हैं, उनके बीच आप पहली बार जानने के बाद जीवन के उत्साह में नाचते हुए लगते हैं। कोई ताली नहीं बजाता मगर आप जानकर उससे भी ज़्यादा ख़ुश होते हैं। जानना कभी आख़िरी बार नहीं होता। पहली बार ही होता है। अदम गोंडवी पर एक अच्छे संकलन के लिए ‘ कल के लिए’ का आभार।
    जो डलहौज़ी न कर पाया वो ये हुक्काम कर देंगे
    कमीशन दो तो हिन्दुस्तान को नीलाम कर देंगे
    ये वन्दे मातरम का गीत गाते हैं सुबह उठ कर
    मगर बाज़ार में चीज़ों का दुगना दाम कर देंगे
    सदन में घूस देकर बच गयी कुर्सी तो देखोगे
    वो अगली योजना में घूसखोरी आम कर देंगे
    एक और अर्ज़ किया है-
    आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे
    अपने शाहे-वक्त का यूँ मरतबा आला रहे
    देखने को दे उन्हें अल्लाह कंप्यूटर की आँख
    सोचने को कोई बाबा बाल्टीवाला रहे।
    एक जनसेवक को दुनिया में ‘अदम’ क्या चाहिए
    चार छह चमचे रहें, माइक रहे, माला रहे।
    नोट: चंचल भू जी की तरह बाग़ी कवि गिरफ़्तार नहीं किए जा सकते हैं क्योंकि अदम गोंडवी इस दुनिया में नहीं हैं। एक आख़िरी….
    जब सियासत हो गयी है पूँजीपतियों की रखैल
    आम जनता को बग़ावत का खुला अधिकार है।——————————————Ravish Kumar
    10 hrs ·
    मैं quora पर नहीं हूँ
    प्रोपेगैंडा के कई रूप होते हैं। एक रूप होता कि वो आपके ख़िलाफ़ तरह तरह के गंध फैलाता है। एक रूप यह होता है कि वह आपका ही रूप धर लेता है और वो सब कहने लगता है जो आपको किसी के एंटी होने के खाँचे में फिट कर सके। एक तरफ आपको एंटी बनाकर गाली देगा, दूसरी तरफ आपके नाम से ऐसा कुछ लिखेगा बोलेगा कि लोगों को लगेगा कि ये वाक़ई एंटी है।
    मैं quora. com पर नहीं हूँ। कई लोगों ने पूछा तो जवाब दे रहा हूँ। बहुत साल पहले वहाँ खाता खोला था मगर हिन्दी के नहीं होने से छोड़ दिया। अब मुझे याद भी नहीं है। पासवर्ड न खाता। लगता है किसी ने मेरे नाम से वहाँ भी खाता खोल लिया है और कुछ का कुछ लिखा जा रहा है । शुक्रिया उन सभी का जिन्होंने पूछ लिया वरना कई लोगों ने फ़ॉलो भी कर लिया है। क्या वहाँ भी फेक प्रोफ़ाइल की शिकायत की कोई व्यवस्था है? इत्ती अंग्रेज़ी आती तो यहीं नहीं लिखता ताकि सभी तक पहुँच जाता।
    अजीब दौर है। हम जो नहीं है वो भी कोई हमें बना रहा है। प्रोपेगैंडा वालों से अनुरोध है कि उनके दिल-ओ दिमाग़ पर मेरा डर छाया हुआ है, उससे आज़ाद हो जाएँ। रिलैक्स रहें।Ravish Kumar
    Yesterday at 12:39 ·
    सोशल मीडिया पर चौकीदारी मुश्किल है। इतने में तो डॉन को भी पकड़ लाएँ और ग्यारह मुल्कों की पुलिस छुट्टी पर चली जाए। मेरा कोई पुराना पेज डिलिट नहीं हुआ जिसके लिए इनकी साइट पर क्लिक करने की ज़रूरत है। ख़ूब हंसिए इस पर। क्या किसी को बुरा कहना। लाइक के लिए लइकन सन का का करता है बुझाता ही नहीं है। लइकियों सन का भी उहे हाल है।——————————————–Shambhunath Shukla
    8 hrs ·
    दिल्ली-एनसीआर के प्रदूषण का जायजा लेने के लिए आज सुबह साढ़े आठ बजे मैं घर से निकला. पैदल कोई डेढ़ किमी चलकर विक्रम टेम्पो पकड़ा और आनंद विहार तक गया. वहाँ धुंध, धूल और गाड़ियों के धुएँ के कारण ऐसा लग रहा था मानों नथुनों में कोई किनकिनाती हुई चीज घुस गयी हो. फिर वापस लौटा और उतनी ही दूर का विक्रम टेम्पो पकड़ कर पैदल घर आया. यह समय चूँकि पीक आवर होता है. इसलिए टेम्पो में निर्धारित सात के बजाय पूरे 11 सवारियां ठुंसी थीं और ड्राईवर अलग. लड़कियाँ, महिलाएं और युवक तथा प्रौढ़ भी. सड़क पर निजी वाहनों की इतनी रेलमपेल थी कि गाड़ियाँ दौड़ नहीं सकिल रही थीं. धुआँ और धूल छोडती प्राइवेट माफियाओं की बसें, खनन माफियाओं के मिट्टी से लदे ट्रैक्टर भी चल रहे थे. साइकिल मार्ग पर कारें खड़ी थीं. और पैदल के लिए तो तिल भर जगह नहीं. आनंद विहार रोड पर एक मर्सडीज का मालिक आडी के मालिक से लड़ते हुए कह रहा था किअबे तू पौवे जैसी अपनी कार लेकर मेरी स्काच नुमा गाड़ी को सटा रहा है. इससे जाम लग गया और इसी बीच एक लोकल माफिया का हाफबॉडी ट्रक आया और ढेर सारा धुआँ उगल दिया. सबने उसे ग्रहण किया. लोकल पुलिस का बन्दा नाक पर थूथन जैसी कोई चीज़ लगाए खड़ा था. पेड़ों पर मोटी-मोटी धूल की परत जमा थी. टेम्पो से उतरकर जैसे ही जैन मन्दिर वाली सड़क पर आया वहां सड़क के एक तरफ प्राइवेट मकानों में निर्माण कार्य चल रहा था तो दूसरी तरफ सरकारी. सड़क के दोनों तरफ धूल थी, पास की झुग्गियों में बसे लोग सुबह वहीँ मल विसर्जन करते हैं वहाँ पर मलय पवन नहीं गंदगी और बदबूदार हवा बह रही थी. पास की साहिबाबाद की फैक्ट्रियां धुआँ उड़ेल रही थीं और एसिड की वर्षा भी कर रही थीं.
    अब ऐसे माहौल में राजनेताओं की मटरगश्ती देखिए! दिल्ली के सीएम श्री अरविन्द केजरीवाल फरमाते हैं कि पंजाब के किसान पराली जलाते हैं, यह उसका धुंआ है, इससे हमारी दिल्ली प्रदूषित हो रही है. पंजाब के मुख्यमंत्री श्री कैप्टन अमरिंदर सिंह जवाब देते हैं कि केजरीवाल अजीब इंसान है, उसे समझ ही नहीं है फिर भी टांग अड़ाए जा रहा है. उधर हमारे यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ बेखबर हैं क्योंकि उनकी गायों को प्रदूषण से परेशानी नहीं है और चूँकि गाय के नाम पर ही वे सरकार में आए इसलिए प्रदूषण के लिए वे भला क्या करें! खैर, अपुन को भी प्रदूषण से कोई परेशानी नहीं है. अपुन तो यूँ भी कानपुर के हैं जहां के लोग प्रदूषण रहित वातावरण में बेचैन होने लगते हैं. लेकिन मुझे लगा कि अगर ऐसा ही माहौल रहा तो या तो दस साल बाद हर तीसरा आदमी कैंसर पीड़ित होगा और हर दूसरा व्यक्ति ब्रोंकाइटिस से बेहाल खांस रहा होगा. टीबी का दौर फिर लौट आएगा और पीढ़ियाँ कोढ़ी होंगी. मेरे साथ ही मेरा मधुमेह तो विदा ले लेगा लेकिन दूसरी ऐसी बीमारियाँ पनपने लगेंगी कि इतिहास अपने को दोहराएगा. एसिड की वर्षा से महाप्रलय आएगी और शायद फिर से सृष्टि की शुरुआत हो. आदमी पहले बंदर की शक्ल में आए और हजारों-लाखों वर्ष बाद वह इंसान बने और फिर उसी तरह निपट जाए.
    अभी भी समय है कि आदमी चेत जाए. अपने लोकतान्त्रिक अधिकारों के प्रति जागरूक हो. इन लोभी और दम्भी नेताओं के भरोसे न रहे. तब शायद यह प्रदूषण ख़त्म हो. आबादी पर नियंत्रण और शहरीकरण पर कंट्रोल तथा उपभोक्तावाद को खत्म करना ही इसका निदान है.
    See Translation

    Reply
  • November 16, 2017 at 6:13 pm
    Permalink

    ममता कालिया जी की किताब ”कितनो शहरो में कितनी बार ” कमाल की किताब हे भारत में पुराने समय में ठीक ठाक लगभग लगभग ठीक” सीमा पर उच्च मध्यमवर्गीय ” या सुरक्षित सरकारी नौकरी वालो ने कमाल का एक एक गर्माहट भरा जीवन जिया था कालिया दम्पति के सनसमरणो से इसका खूब पता चलता हे Priya Darshan is with Mamta Kalia.
    2 November at 09:55 ·
    आज वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया का जन्मदिन है। वे उन कुछ लेखकों में रही हैं जिनको सबसे पहले मैं पढ़ना चाहता हूं। उनकी किस्सागोई, उनकी भाषिक चपलता, उनका ‘विट’, उनकी सूक्ष्म अंतर्दृष्टि सब मेरे लिए विलक्षण हैं। मैं यह बात बहुत सावधानी से कह रहा हूं और हिंदी के उन बहुत सारे लेखकों को याद करते हुए भी कह रहा हूं जो हमारे लिए समादरणीय रहे हैं। बहुत सारे दूसरे बहुत सारी दूसरी वजहों से- निश्चय ही लेखकीय या वैचारिक- महत्वपूर्ण होंगे, लेकिन मेरी प्रिय लेखिका ममता कालिया ही हैं।
    इधर सोशल मीडिया पर उनकी सक्रियता भी हमारा सौभाग्य रही है। यहां एक बुजुर्ग की तरह वे सब पर अपनी सदाशयता और स्नेह लुटाती रही हैं। मगर उनका लेखक रूप तो धाकड़ है- अपने बेहतरीन हिस्सों में वे अपने किसी भी समकालीन से आगे हैं। उनको जन्मदिन की बधाई और कृतज्ञ प्रणाम।
    (उनकी कोई तस्वीर मेरे पास नहीं थी। उनकी किताब के कवर से स्मिता ने ली और क्रॅाप करके दी। इसलिए कुछ धुंधली है।

    Reply
    • December 9, 2017 at 10:47 am
      Permalink

      Vineet Kumar added 2 new photos.
      12 hrs ·
      जीवन के सिरे को शब्दों में बांधती रचनाकार को बहुत बधाई :
      ममता कालिया को व्यास सम्मान दिए जाने की खबर पर बार-बार बस एक ही सिरे से सोच रहा हूं- ढंग के लोगों को पुरस्कार मिलते हैं तो इसके प्रति हमारा सम्मान कितना बढ़ जाता है. ऐसे लोगों को सम्मान देकर संस्थाएं उनका नहीं, अपना कद बढाती है, प्रतिष्ठा बरकरार रख पाती है.
      बीए के दिनों में मैंने पहली बार उनका उपन्यास ” बेघर” पढा था. उपन्यास मैं सिंगलसीटिंग यानी एक बार में पढकर खत्म करने का अभ्यस्त रहा हूं. खाना-पीना, पानी-पेशाब सब रोककर. रात के डेढ बजे ये उपन्यास खत्म हुआ. लगा किसी ने मुझे बेघर कर दिया है. मैं बैठे-बैठे एक स्त्री चरित्र में बदल गया था और उसी तरह की क्राइसिस महसूस कर रहा था. उस रात मुझसे कुछ भी खाया न गया.
      एमए में दोबारा से बढा. साहित्य को लेकर कुछ-कुछ मैच्योर हो चला था लेकिन तब भी तासीर वैसी ही थी. एकदम से बेदखल हो जानेवाली अनुभूति.
      ममता कालिया जैसी रचनाकार ने हम हिन्दी पाठकों को तर्क और रचना के आस्वाद के बीच से ले जाते हुए जीवन के प्रति एक गाढी समझ पैदा करने में मदद की है. ये समझ परीक्षा में भले कभी काम न आयी लेकिन जीने के स्तर पर अब भी आती है.
      जीवन के सिरे से अपनी बात लिखनेवाली हमारी बेहद प्रिय लेखिका को बहुत बधाई और आभार. बहुत कम ऐसा होता है कि किसी पुरस्कृत रचनाकार को इस तरह बधाई देने का मन करे. आज बधाई देते हुए लग रहा है- हम एक पाठक का बुनियादी काम कर रहे हैं.Vineet Kumar
      13 hrs ·
      हमारे-आपके हिंसक होने के कई स्तर होते हैं जिन्हें हम सुविधा के लिए गुस्सा, अपसेट, एन्जायटी का नाम दे देते हैं. लेकिन
      गौर कीजिए तो हम कई स्तरों पर सांकेतिक हिंसा में शामिल होते हैं. बच्चों को डांटते हुए, मेड को डपटते हुए, अपनी पार्टनर पर चिल्लाते हुए, अपने कलीग पर फब्तियां कसते हुए…
      इस तरह हमने देखते-देखते एक ऐसा हिंसक परिवेश बनाया है जिसमे अहिंसा, सौम्यता, सहजता और सौन्दर्य के प्रति यकीं ही नहीं रह जाता. जो इन्हें अपनाता है, बेवकूफ, कमजोर, आउटडेटेड करार दे दिया जाता है.
      मैं कई ऐसे घरों में गया हूं जहां सजावट के नाम पर भी आक्रामकता है, सुविधा के नाम पर भी आक्रामकता है, सम्पन्न दिखने की कोशिश में भी आक्रामकता है. जो है वो ऐसा लगता है, अपनी सुविधा के लिए नहीं, किसी और पर दबाव बनाने के लिए है. यही सारी चीजें एक वक्त के बाद उस रूप में झलकती है जिन्हें हम पारिभाषिक रूप में हिंसा मान लेते हैं. गौर कीजिए तो बिना परिभाषा की हिंसा कम खतरनाक स्थिति पैदा नहीं कर रही..

      Reply
  • November 28, 2017 at 9:21 pm
    Permalink

    Vijender Masijeevi
    25 November at 16:44 ·
    इधर साहित्य की दुनिया मे शहर दर शहर होने वाले लिट् फेस्ट्स को लेकर बेचैनी है। ये बेचैनी अधिकतर मीडिया, फ़िल्म, पॉपुलर लिट्रेचर के लोगों की उपस्थिति की वजह से है। मुझे लगता है लिटफेस्ट के डायनामिक्स को जो वो है वही समझकर ही विश्लेषण किया जाना चाहिए। नाम कुछ भी दे दीजिए किन्तु ये कोई साहित्य गोष्ठी नहीं हैं, ये साहित्य, मनोरंजन, मीडिया के इर्द गिर्द बुने गए कंटेंट क्रिएशन इवेंट्स हैं। ये अनिवार्यतः व्यावसायिक कोण से आयोजित उत्पादन ईकाई हैं जहां उत्पन्न कंटेंट मीडिया कंजम्प्शन के लिए है।
    ‘महान साहित्यकारों’ को इनसे चिढ़ना नहीं चाहिए ये उन्हें नुकसान नहीं पहुंचा रहे हैं… महान साहित्यकार परस्पर मैं महान-तू महान का खेल जारी रख सकते हैं।
    वैसे एक सवाल फिर भी बनता है, साहित्य की दुनिया से उपेक्षा अगर हो रही है तो किसकी? क्या रचनाकारों की? नहीं उल्टे अधिक पुस्तक मेलों, लिटफेस्ट स्टॉलों के चलते उन्हें तो लाभ ही है, ज्यादा पाठक मिल पा रहे हैं। दिक्कत आलोचक उसमें भी हमारी दुनिया वाले यानी प्राध्यापक श्रेणी के लोगों को है जबकि सच यह है कि अब तक भी साहित्य वाली दुनिया में जमे बैठे आलोचक वृन्द (सम्पादक या मास्टर, अधिकतर मास्टर) बस भर्ती के, और अनाधिकार ही थे। इन्हें कलपने दिया जा सकता है- वेतन आयोग मिल जाएगा इनका काम चल जाएगा।
    ये लिटफेस्ट जिस पैमाने पर (सोशल) मीडिया कंटेंट पैदा करने में समर्थ हैं, उसके चलते इनका दायरा अभी और फैलेगा… ब्लॉग का विरोध करने वाले आज कहां हैं, याद कीजिए।Vijender Masijeevi

    Reply
  • December 6, 2017 at 7:44 am
    Permalink

    Vineet Kumar
    18 hrs ·
    हे लेखक ! आप प्लीज लेखक होने के साथ-साथ एक सहज इंसान भी बने रहिए, चलते-फिरते पीआर मत हो जाइए. यकीन मानिए, ये प्रकाशक आपको दो-चार लिट फेस्ट में भेजने, हो-हो करने-करवाने के अलावा आपको कुछ नहीं देगा.
    आप महीनों-महीनों हाय-हैलो तक नहीं करते फिर अचानक से इनबॉक्स में अवतरित होते हैं. आपकी किताब आ रही होती है, आपको कवर पेज शेयर करवाना होता है, अपडेट करवाने होते हैं. मुझे शेयर करने में कोई परहेज नहीं लेकिन ऐसा करने से पहले मैं एक बार जरूर लास्ट सीन पर नजर डालता हूं. पता चलता है, जब आपकी पहली किताब आयी थी, लेख छपे थे. हमारी बातचीत में छपने और मुबारकबाद के अलावा कोई दूसरा शब्द ही नहीं है.
    क्या दो लेखक के बीच संवाद का सिरा अग्रिम पुस्तक से शुरू होकर मुबारकबाद पर जाकर खत्म हो जानी चाहिए ? मौका मिले तो पढिएगा हिन्दी के पुराने लेखकों के बीच के संवाद, लिखी चिठ्ठियां. उनमे रोजमर्रे का जीवन है, रोग-बीमारी,दुख-सुख है..लेखक होने से पहले हाड-मांस का आदमी मौजूद है. दो-चार हिट्स के चक्कर में अपनी सहजता दांव पर मत लगा दो प्लीज.
    आप कहेंगे तब तो मैं आपके साथ आपकी किताब आने की खुशी में जनसभा करने लग जाउंगा. लेकिन इसमे हमारे आदमी होने के सबूत कहां तक बचे होंगे, सोचिएगा न..Vineet Kumar
    4 December at 14:34 ·
    आपको जिससे शराफत सीखनी चाहिए उससे..
    हम रायता फैलाने के इतने अभ्यस्त हो चले हैं कि इतना भी नहीं पता करते कि किन-किन चीजों से रायता नहीं बनाए जा सकते. पिछले दिनों पत्रकार निधि राजदान की ओर से अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा से सवाल किया जाना और जबाव नहीं दिए जाने का मामला इसका उदाहरण है.
    जिस कार्यक्रम में निधि राजदान ने बराक ओबामा से सवाल किया वो घोषित रूप से, पूर्व निर्धारित युवाओं से बातचीत का कार्यक्रम था, पत्रकारों का नहीं. ऐसे में उन्होंने निधि राजदान के बतौर पत्रकार परिचय दिए जाने पर जबाव देने से मना कर दिया और यही तर्क दिया तो इसमें गलत क्या है ?
    हां निधि को ये जरूर सोचना चाहिए कि हर जगह आप स्पेस घेरने की कोशिश ठीक नहीं. आपको कार्यक्रम की प्रकृति की समझ होनी चाहिए. लेकिन आपने गौर किया इस न को कितनी स्वाभाविकता के साथ लिया, एम्बेरेस होते हुए भी सहज होने की कोशिश करती रहीं.
    अब देख रहा हूं निधि राजदान के लिए एक से एक फूहड बयान, अपमानित करने के अंदाज में शीर्षक से पोस्ट ठेले जा रहे हैं. भाई आपके ओबामा का स्टैंड सही लगा तो उनकी तरह न करने की तमीज तो सीखने की कोशिश करें. जिस ह्यूमर और अपनेपन के साथ उन्होंने मनी किया, वहीं उन्हें बेहतरीन शख्स बनाता है. उनकी शराफत तो आप सीखोगे नहीं लेकिन एक महिला एंकर और उस पर एनडीटीवी तो लग गए टुच्चागिरी दिखाने. हिट्स के लिए कितना गिरोगे भई आपलोग ?

    Reply
  • December 14, 2017 at 1:18 pm
    Permalink

    साहित्य के प्रभाव को बढ़ा-चढ़ाकर न देखें लेखक
    December 13, 2017, 7:21 PM IST संजय कुंदन in लोग-बाग | सोसाइटी, अन्य, कल्चर
    साहित्य से जुड़े लोग साहित्य की आंतरिक दुनिया की हलचल को इस रूप में देख रहे हैं जैसे साहित्य ने समाज में नए सिरे से अपनी एक जगह बना ली हो और उसका खूब प्रसार हो रहा है। दरअसल इन दिनों साहित्य जगत में एक तरह का उत्सववाद चल रहा है। हर छोटे-बड़े शहर में लिटरेचर फेस्टिवल हो रहे हैं। लेखकों को हवाई जहाज से बुलाया जा रहा है और उन्हें मंच पर सम्मानित किया जा रहा है। वे अपने को स्टार जैसा महसूस कर रहे हैं।गदगद होकर वे अपनी एक ही किताब का पांच बार लोकार्पण करवा रहे हैं। सोशल मीडिया पर साहित्यकार खूब बहस कर रहे हैं जिनमें साहित्य या रचना सबसे कम होती है। आमतौर पर इनमें निजी शिकायतें या भड़ास होती हैं, या फिर लहालहोट होने का भाव रहता है। इन सबसे यह भ्रम हो रहा है कि साहित्य के दिन लौट आए हैं। सोशल मीडिया के कारण साहित्य काफी लोकप्रिय हो रहा है। इधर मेरी कुछ प्रकाशकों से बात हुई तो किसी ने नहीं कहा कि उनकी बिक्री बढ़ी है। एक प्रकाशक ने तो कहा कि जब से ऑनलाइन बिक्री शुरू हुई है, किताबों की बिक्री कम हो गई है।
    ज्यादातर प्रकाशकों ने यही कहा कि कविता तो अब कोई पढ़ता ही नहीं, इसलिए उन्होंने किताब छापना बंद कर दिया। अगर साहित्य के पाठक बहुत बढ़ गए हैं तो लेखकों की रॉयल्टी बढ़ जानी चाहिए थी, लेकिन किसी बड़े-छोटे लेखक के मुंह से यह नहीं सुना कि उन्हें खूब रॉयल्टी मिलने लगी है और वह संतुष्ट हैं। किसी प्रकाशक ने यह नहीं कहा कि अब वह ज्यादा किताबें छाप रहे हैं। यह सही है कि हर पीढ़ी में कुछ ऐसे लोग होते हैं जो लिखने-पढ़ने में रुचि लेते हैं। तो ऐसे कई लोग हिंदी साहित्य में आए हैं। उनकी उपस्थिति से हिंदी की दुनिया बदली है। हालांकि इससे यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि साहित्य समाज में कोई बड़ा हस्तक्षेप कर रहा है या लोगों में साहित्य को लेकर नई चेतना पैदा हो गई है।संजय कुंदन नवभारत

    Reply
  • December 18, 2017 at 9:32 pm
    Permalink

    Vineet Kumar is with Rachna Singh.
    13 hrs ·
    तब हम एमए में थे : जी-जान लगाकर साहित्य पढ़ते थे..
    हिन्दू कॉलेज की कई ऐसी चीजें रही हैं जो जीवन और अध्ययन से इस तरह से चिपक गयीं कि अब लगता है, ये हमारे होने का स्वाभाविक हिस्सा है. एक बेहतर संस्थान आपको समृद्ध करने के साथ-साथ स्वाभाविक भी भी बनाए रखता है. वो आपके भीतर ये अतिरिक्त ऐंठन नहीं पैदा करता कि आप दुनिया से अलग हो और इसलिए अलग-थलग रहकर जीवन जीओ.

    उन तमाम चीजों में एक चीज थी- वादों, खेमे और खांचें में बंटी हिन्दी की दुनिया से अलग उन लेखकों/साहित्यकारों से छात्रों को अवगत कराना जिन्हें सुनना किसी न किसी रूप में बौद्धिक स्तर के विकास का हिस्सा है. जरूरी नहीं कि इनसे यहां के शिक्षकों का निजी आत्मीय औरनफा-नुकसान के संबंध हो. कई बार मैंने महसूस किया कि शिक्षकों से कही ज्यादा छात्रों के आग्रह पर लोग बुलाए जाते. यही कारण है कि एमए के दो साल ती पढाई के दौरान हिन्दी साहित्य सभा के जिस मंच से प्रो नामवर सिंह को सुना, उसी मंच से राजेन्द्र यादव को और उसी मंच से अशोक वाजपेयी को भी.
    तब साहित्य की दुनिया हमारे लिए ज्यादा बडी और व्यापक हुआ करतीं. शिक्षकों का अलग-अलग कारणों से विभाजन हम छात्रों तक उतरकर नहीं आता. सब तरह के लोग आते, सवाल-जबाव का दौर चलता, हम उत्साहित छात्र उनसे अपने स्तर पर भिडते. लेकिन जो भी आते, इस सत्र के बाद हमारे शिक्षकों से कहते- आपके बच्चे बहुत होनहार हैं, पढते-लिखते हैं. सत्र के दौरान हम होते और ये महारथी. कभी किसी शिक्षक ने सवाल करने से रोक-टोक नहीं की.

    सत्र के बाद हम सब बाहर लॉन में लगभग एक ही मुद्रा में तस्वीर खिंचाते. बाद में अम्बा स्टूडियो से जाकर दस रूपये में एक फोटो खरीदते.
    अशोक वाजपेयी ने तब शब्द के बनने और विलुप्त होते जाने की पूरी प्रक्रिया पर बात की थी. मैं तब उनसे बहुत प्रभावित हुआ. वो हमसे बात करते हुए बीच-बीच में कहते- ये तो आप जानते ही हो, आपने पढा ही है..नए लोगों के प्रति उनके व्यवहार में अतिरिक्त लगाव दिखा जो कि मैं अब भी महसूस करता हूं.प्रवीण ने जब एमए की कई तस्वीरों के बीच जब ये तस्वीर साझा की तो ध्यान आया कि ठीक इसी रंग कुर्ता( क्या पता यही हो ) तीन दिन पहले भी तो उसी अंदाज में बोल रहे थे.. रचना मैम ( Rachna Singh) तब हमारी सबसे प्यारी टीचर हुआ करती थीं, अब दिल्ली की सबसे असरदार पेनकिलर, अभिभावक,दोस्त सब..————————————————–Sheetal P Singh shared Jignesh Mevani’s post.
    1 hr ·

    Jignesh Mevani
    3 hrs ·
    वडग़ांव की जनताने वडनगर वाले को जवाब दे दिया। 2-4 दिन में वडग़ांव से वडनगर का रॉड शो, और सफाई कर्मियों का आन्दोलन प्लान किया जायेगा। ईमानदारी की जीत इस जमाने में भी होती है। वडग़ांव कि जनताने जो प्यार किया वह गज़ब है। कल से ही रास्ते की लड़ाई चालू होँगी। गुजरात भाजपा 2 डिजिट में आ गई और 150 का घमंड टूटा उसके लिए जनता का शुक्रियादा।
    साथ मे यह भी कह देते है कि हम विधायक के तौर पे जनता की आवाज़ जरूर बनेंगे लेकिन क्रांति तो तभी होंगी जब इस देश का किसान और मज़दूर जाति और धर्म से ऊपर उठकर करोड़ो की तादात में सड़कों पर उतरे। सड़कों की लड़ाई का कोई विकल्प नही है। इसी लिए विधानसभा में भी आवाज़ उठाएंगे और सडको पर भी।
    अभी तो यह अंगड़ाई है, आगे और लड़ाई है।————————Vikram Singh Chauhan
    7 hrs ·
    मैं हार पर न सांत्वना देता हूँ और न जीतने वाले को बधाई। गुजरात हिंदुत्व की प्रयोगशाला रही है ,वहां हिंदुत्व अंकुरित हुआ ,पनपा और अब बजबजा रहा है। आज भी लोगों के लिए खासतौर पर हिन्दुओं के लिए रोटी और रोजगार से ज्यादा धर्म मायने रखता है। यही वजह है कि जिन लोगों को डंडे पड़े ,जिस समुदाय के लोग मारे गए उन्हीं लोगों ने गद्दारी की और उस पार्टी को वोट दिया जिनके हाथों उनके अपने बच्चे भी मारे गए। ऐसा काम सिर्फ धर्म करवा सकता है। किसान भी अब किसान नहीं रहे वे हिन्दू हो गए हैं,अब उन्हें अपनी फसल की उपज के दाम और सर पर लदे क़र्ज़ से ज्यादा चिंता मुसलमानों से सुरक्षा की हैं और उन्हें पूरी उम्मीद है कि कट्टर हिंदूवादी उन्हें इन मुसलमानों के अदृश्य डर से बचाएंगे। गुजरात नफरत की राजनीति का गढ़ है वहां कोई चमत्कार ही बीजेपी को हरा सकता है ,जनता तो नहीं हराने वाली। कांग्रेस का जो वोट बढ़ा है और सीट बढ़ी है यह उन युवाओं का है जो रोजगार के लिए भटक रहे हैं और नोटबंदी और जीएसटी से सड़क पर आ गए हैं पर उनके माँ -बाप ने भी वोट भाजपा को ही दिया है ,धर्म का मामला है भाई। मुझे लगता है हमें इन लोगों की चिंता बंद कर देनी चाहिए। इस राज्य में कांग्रेस का मुकाबला बीजेपी से न होकर पुरे हिन्दू समुदाय से होता है। यहाँ न कोई व्यापारी है ,न कोई पिछड़ा है ,न कोई पाटीदार है सबके सब हिन्दू हैं। चुनाव के समय डर दिखाने से इनका हिंदुत्व जाग उठता है और हिंदुत्व के झंडाबरदारों को थोक में वोट देकर आ आते हैं। बड़े मासूम होते हैं गुजराती!———————Awesh Tiwari
    6 hrs · Jaipur ·
    गुजरात में बीजेपी की जीत और कांग्रेस की हार को चैनलों पर बैठे एंकरों और फेसबुक के विश्लेषकों के हिसाब से न देखकर वैज्ञानिक तौर तरीकों से देखे जाने की जरुरत है ,अभी जो परिणाम आ रहे हैं उनमे तक़रीबन 22 सीटें ऐसी हैं जिनमे बीजेपी 100 से लेकर 500 मतों से आगे चल रही हैं| मान लेते हैं बीजेपी जीत कर सरकार बना लेगी लेकिन कुल 5- 7 हजार मतों के कम अधिक होने से सरकार के बनने बिगड़ने का फैसला हो रहा है न वो बताता है कि गुजरात में बीजेपी की हालत किस हद तक खराब हुई है, यह स्थिति न तो लोकसभा चुनाव में थी न ही यूपी चुनावों में|

    Reply
  • December 27, 2017 at 9:10 pm
    Permalink

    Sheeba Aslam Fehmi
    25 December at 23:20 · Delhi ·
    दोस्तों,
    दा वौल्ड सिटी कैफ़े – लाउन्ज पुरानी देहली के अदबी दौर की वापसी के लिए कोशा है. इसी सिलसिले में अगली नशिस्त ‘ख़्वातीन के मुशायरे’ की रहेगी।
    राना सफ़वी आपा हमारे कल्चरल असासे पर एक तवील वक़्फ़े से काम कर रही हैं. और तब कर रही हैं जब इसकी बेपनाह ज़रुरत है. इसी बीच उनकी नयी किताब भी मंज़र ए आम पर पेश होने को है. उनकी अदबी, सय्याही और तवारीख़ी ख़िदमात पर भी एक नशिस्त मुनअक़िद करना तो बनता है न.
    सोचा ये है की 7 जनवरी दिन इतवार उनके काम पर एक तब्सिरा और बहादुर शाह ज़फर के दरबार के चुनिंदा शोरा की नुमाइंदा शायरी पर गायकी और ख़्वातीन के मुशायरे का प्रोग्राम रखा जाए.
    आप सब को सुख़नवरी की दावत है.
    डायरी में नोट कर लीजिये.Sheeba Aslam Fehmi

    Reply
  • December 28, 2017 at 11:41 pm
    Permalink

    Kavita Krishnapallavi
    Yesterday at 15:00 ·
    मिर्ज़ा ग़ालिब की 220वीं जयंती के अवसर पर

    कोई उम्मीद बर नहीं आती
    कोई सूरत नज़र नहीं आती

    मौत का एक दिन मुअय्यन है
    नींद क्यूँ रात भर नहीं आती

    आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
    अब किसी बात पर नहीं आती

    जानता हूँ सवाब-ए-ताअत-ओ-ज़ोहद
    पर तबीअत इधर नहीं आती

    है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ
    वर्ना क्या बात कर नहीं आती

    क्यूँ न चीख़ूँ कि याद करते हैं
    मेरी आवाज़ गर नहीं आती

    दाग़-ए-दिल गर नज़र नहीं आता
    बू भी ऐ चारागर नहीं आती

    हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी
    कुछ हमारी ख़बर नहीं आती

    मरते हैं आरज़ू में मरने की
    मौत आती है पर नहीं आती

    काबा किस मुँह से जाओगे ‘ग़ालिब’
    शर्म तुम को मगर नहीं आतीKavita Krishnapallavi
    4 hrs ·
    एक भुतहा यथार्थवादी भारतीय कहानी
    एक दिन रामू ने कहा कि रामू इस देश का बेटा है ।
    फिर एक दिन रामू ने कहा कि रामू इस देश का बाप है ।
    फिर एक दिन रामू ने कहा कि यह देश रामू का है ।
    फिर रामू ने कहा कि रामू ही देश है ।
    फिर रामू ने कहा कि इस देश में रहना होगा तो रामू-रामू कहना होगा ।
    फिर रामू ने कहा कि इस देश में रहने का अधिकार सिर्फ रामू का होगा ।
    अंत में रामू ने कहा कि इतने सबकुछ के बावजूद, जो रामू नहीं है, उसकी हम रामू में रामू कर देंगे ।
    रामू हरदम डरा रहता है कि फिर भी ढेरों लोग हैं जो रामू नहीं हैं और एक दिन वे सब मिलकर रामू की रामू में रामू कर देंगे, जैसा कि लाख कोशिशों के बावजूद पहले भी हो चुका है ।———Kavita Krishnapallavi
    10 hrs ·
    एक तिलस्मी यथार्थवादी भारतीय कहानी

    रामू ने एक दिन बहुत उत्पात मचाया । फिर रामू ने रामू को गिरफ्तार कर लिया । रामू की अदालत में रामू का मुकदमा चला । रामू ने रामू पर अभियोग लगाए और फिर रामू ने रामू का बचाव किया । जज रामू अभियुक्त रामू को दोषमुक्त करने के बारे में सोच ही रहा था कि सरकार रामू ने आदेश जारी कर दिया कि रामू पर मुक़द्दमा चलाया ही नहीं जा सकता ।

    इसतरह सरकार ने जनता के प्रति अपना कर्तव्य निभाया और न्याय की लंगोटी उतरते-उतरते रह गई ।

    Reply
  • December 31, 2017 at 7:59 pm
    Permalink

    Navneet Mishra
    3 hrs ·
    समाजवाद पर 1978 में लिखी गोरख पांडेय की कविता आज भी मौजूं है। बस पांडेय जी से कुछ देर के लिए माफी मांग लीजिए…और फिर कविता में ‘समाजवाद’ को रिप्लेस कर हर जगह ‘विकास’ रखकर पढ़िए। फिर विकास के इंतजार का आनंद लीजिए, ठीक उसी तर्ज पर जैसे आज तक हम समाजवाद का इंतजार कर रहे हैंNavneet Mishra
    6 hrs ·
    दाढ़ी वाले बाबा ने ख़्वाब दिखाया था स्मार्ट सिटी का। चुने गए थे 60 शहर। कायापलट होनी थी इनकी। बाद में बाक़ी शहरों का नंबर लगता। बाक़ी शहरों का नंबर आने की बात छोडिए। पहले चरण की प्रगति देखिए।
    स्मार्ट सिटी बनाने के लिए 9860 करोड़ जारी हुए। अब तक खर्च हुआ सिर्फ 645 करोड़। यानी कुल ज़ारी बजट का सिर्फ सात फ़ीसद। डींगे हाँकने में साढ़े तीन साल गुज़र गए। बचे हैं सिर्फ डेढ़ साल ।
    और हाँ गंगा पुत्र की एक और योजना। नाम है- नमामि गंगे। राष्ट्रीय मिशन का नाम देकर पहले से चल रही कई योजनाओं का पैकेज बना दिया। चंद रोज पहले इस पर आई कैग रिपोर्ट तो पढ़ी होगी आपने।
    सफाई के लिए 2600 करोड़ रुपये से ज़्यादा की धनराशि खाते में डंप रहने की बात है।
    मंत्रालय ने इतनी तेज़ गति से काम किया कि साढ़े तीन बरस में 25 प्रतिशत बजट ही खर्च हुआ।,

    18 घंटे वो भी बिना छुट्टी के काम करने का यह नतीजा है। कौन कहता है कि काम नहीं हो रहा है। विकास इतनी द्रुतगति से दौड़ रहा कि पकड़ में ही नहीं आ रहा।
    विकास बाबू…जरा धीरे चलो…
    —-ःः

    समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई
    समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई

    हाथी से आई, घोड़ा से आई
    अँगरेजी बाजा बजाई, समाजवाद…

    नोटवा से आई, बोटवा से आई
    बिड़ला के घर में समाई, समाजवाद…

    गाँधी से आई, आँधी से आई
    टुटही मड़इयो उड़ाई, समाजवाद…

    काँगरेस से आई, जनता से आई
    झंडा से बदली हो आई, समाजवाद…

    डालर से आई, रूबल से आई
    देसवा के बान्हे धराई, समाजवाद…

    वादा से आई, लबादा से आई
    जनता के कुरसी बनाई, समाजवाद…

    लाठी से आई, गोली से आई
    लेकिन अंहिसा कहाई, समाजवाद…

    महंगी ले आई, ग़रीबी ले आई
    केतनो मजूरा कमाई, समाजवाद…

    छोटका का छोटहन, बड़का का बड़हन
    बखरा बराबर लगाई, समाजवाद…

    परसों ले आई, बरसों ले आई
    हरदम अकासे तकाई, समाजवाद…

    धीरे-धीरे आई, चुपे-चुपे आई
    अँखियन पर परदा लगाई

    समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई
    समाजवाद उनके धीरे-धीरे आईNavneet Mishra
    6 hrs ·
    दाढ़ी वाले बाबा ने ख़्वाब दिखाया था स्मार्ट सिटी का। चुने गए थे 60 शहर। कायापलट होनी थी इनकी। बाद में बाक़ी शहरों का नंबर लगता। बाक़ी शहरों का नंबर आने की बात छोडिए। पहले चरण की प्रगति देखिए।
    स्मार्ट सिटी बनाने के लिए 9860 करोड़ जारी हुए। अब तक खर्च हुआ सिर्फ 645 करोड़। यानी कुल ज़ारी बजट का सिर्फ सात फ़ीसद। डींगे हाँकने में साढ़े तीन साल गुज़र गए। बचे हैं सिर्फ डेढ़ साल ।
    और हाँ गंगा पुत्र की एक और योजना। नाम है- नमामि गंगे। राष्ट्रीय मिशन का नाम देकर पहले से चल रही कई योजनाओं का पैकेज बना दिया। चंद रोज पहले इस पर आई कैग रिपोर्ट तो पढ़ी होगी आपने।
    सफाई के लिए 2600 करोड़ रुपये से ज़्यादा की धनराशि खाते में डंप रहने की बात है।
    मंत्रालय ने इतनी तेज़ गति से काम किया कि साढ़े तीन बरस में 25 प्रतिशत बजट ही खर्च हुआ।,

    18 घंटे वो भी बिना छुट्टी के काम करने का यह नतीजा है। कौन कहता है कि काम नहीं हो रहा है। विकास इतनी द्रुतगति से दौड़ रहा कि पकड़ में ही नहीं आ रहा।
    विकास बाबू…जरा धीरे चलो…

    Reply
  • January 1, 2018 at 10:44 am
    Permalink

    Asghar Wajahat
    20 hrs ·
    साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित करने की एक नई शैली विकसित हो रही है जिसके अंतर्गत मंच पर 2- 3 लेखक या विषय विशेषज्ञ बैठ जाते हैं । संयोजक विषय का परिचय देता है और फिर किसी एक विशेषज्ञ से विषय के किसी एक बिंदु पर कुछ बोलने के लिए कहता है। विशेषज्ञ बहुत संक्षेप में अपनी बात रखता है और फिर श्रोता प्रश्न पूछने के लिए आमंत्रित किए जाते हैं। इस तरह से कार्यक्रम में श्रोताओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाती है।
    साहित्यिक कार्यक्रमों से सांस्कृतिक कार्यक्रमों को भी जोड़ा जाता है ताकि केवल बौद्धिक ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक वातावरण भी बन सके। सांस्कृतिक वातावरण के अंतर्गत रचना पाठ, गायन, संगीत, पुस्तकों और पोस्टरों की प्रदर्शनी, युवाओं द्वारा नुक्कड़ नाटकों का मंचन आदि कार्यक्रम रखे जाते हैं। इस प्रकार साहित्यिक कार्यक्रम अधिक जीवंत बन जाते हैं और उस में युवाओं की भागीदारी बढ़ जाती है।
    परंतु निश्चित रूप से कार्यक्रमों को यह स्वरूप देने के लिए काफी मेहनत करना पड़ती है जबकि परंपरावादी ढंग के आयोजनों में इतनी मेहनत दरकार नहीं है।————————————-Vineet Kumar
    30 December 2017 at 18:00 ·
    कालजयी पुस्तकों का राशिफल लिखनेवालों :

    इस बच्चे की जिद के लिए ही सही ” इश्क कोई न्यूज नहीं ” की चर्चा किताबों की वार्षिक राशिफल में कर दीजिए न प्लीज . बच्चा ये नहीं कह रहा कि सिंह राशि में ही कीजिए, मीन, कन्या जौन सा भी मन करे, उसमें ही.

    हो क्या रहा है मेरे साथ कुछ दिनों से कि पब्लिक इनबॉक्स में मार ठेले जा रही है कि मेरी किताब की चर्चा फलां ने फलां अखबार में करी, फलां ने सारगर्भित समीक्षा कर दी है. अब ऐसे में मेरी हालत ईदगाह टाइप सी हो जाती है.

    मैं कहां कह रहा हूं कि आप मेको हामिद और लप्रेक को लोहे का चिनटा बना दो, बट कम से कम दो लाइन तो लिख ही सकते हो आप- इश्क कोई न्यूज नहीं नाम से 2016 में एक किताब आयी थी जो साल 2017 में भी अमेजॉन पर पूर्ववत उपलब्ध है. आपका ईमान भी रह जाएगा और बच्चे के पास भी ठेलने के लिए कुछ चीज होएगी.Vineet Kumar
    30 December 2017 at 17:00 ·
    अब आप एक-एक करके मानदेय भेजिए, बस्स :

    अब मुझे कुछ दिन छोड़ दीजिए. अपने मन का लिखने-पढ़ने दीजिए. यकीं मानिए, प्रिंट के लिए लिखने के नाम पर मुझे पूरी-पूरी रात नींद ही नहीं आती. जब तक लिखा न जाए, मन लगता ही नहीं किसी चीज में. लिखने के बाद किक तो मिलता है लेकिन वहां तक पहुंचना बहुत पेनफुल होता है.

    दोस्ती-यारी, आपके इमोशन की फिक्र मैं बहुत करता हूं. लेकिन मेरा सच में छपने से मन भर गया है. आप मेल में लिखते हैं- आपका लेख इतने करोड़ पाठकों तक पहुंचेगा. मैं सच बताउं, लोग पहचानने लगें, इससे भी एक अलग किस्म की थकान होती है.

    अब बस ये कीजिए कि जितना लिखा है, बारी-बारी से मानदेय भेज दीजिए. कुछ दिन उस पैसे से गीजा( ताकत प्रदान करनेवाली चीजें ) खाकर देह बनाएंगे. परसों ही मां फोन पर कह रही थी- तुम्हारी आवाज से ही कमजोरी झलक रही है, ठीक से खाता नहीं है?

    लेख के लिए मेल भेजने के साथ स्टार लगाकर लिख दीजिए कि लेख छापने की प्रकृति मानदेय आधारित होगी कि सरोकारी, सामाजिक बदलाव ? फैसले पर टिके रहने में सहूलियत होगी.

    Reply
  • January 2, 2018 at 11:24 am
    Permalink

    Om Thanvi is with Manish Pushkale and Ashok Vajpeyi.
    27 December 2017 at 10:37 ·
    एक शाम, कृष्णाजी के धाम। कल शाम अशोक वाजपेयी, चित्रकार-लेखक मनीष पुष्कले और ख़ाकसार हिंदी साहित्य की मशाल कृष्णा सोबती के घर जुटे। और उनसे भारतीय ज्ञानपीठ सम्मान की दावत झटक ली। उनके यहाँ दावत की तैयारी हरदम रहती है। आत्मीय मेज़बान हैं। उनकी सहायक विमलेश अपने गाँव के ख़ास पेड़े भी ले आई थीं। पर ज्ञानपीठ पर कृष्णाजी का कहना था – किसी युवतर को मिलता। मैंने कहा, यह सही है कि इसमें देर हुई। मगर ज्ञानपीठ में देर-दुरुस्त भूल-सुधार हुआ, जिसका लिहाज़ तो रखना होगा। वे मुस्कुरा दीं।

    93वें वर्ष में चल रहीं कृष्णा सोबती का जीवट देखते बनता है। पचास साल पहले ‘मित्रो मरजानी’ लिखकर उन्होंने हिंदी साहित्य में नारी चेतना की तसवीर बदल दी थी। ‘ज़िंदगीनामा’ – जो अब क्लासिक का दरज़ा पा चुका है – ने बँटवारे के दर्द को नई पहचान दी। भाषा में उनके खुरदरे अन्दाज़ ने शास्त्री लोगों में बड़ी बेचैनी पैदा की। वे ऐसे बिदके जैसे कुमार गंधर्व के प्रयोगों पर संगीत के जड़भारती उखड़ते थे। पर कृष्णाजी ने भी अपने भाषाई तेवर नहीं बदले। आज उनसा कोई नहीं।

    उनके जुझारू तेवर आज भी वैसे ही हैं। हाल में कोई विदेश से फ़िल्म के लिए बात करने बग़ैर तैयारी और बग़ैर समय तय किए आया, तो चाय पिलाकर लौटा दिया। मनमोहन सिंह सरकार का पद्मभूषण यह कहकर ठुकरा दिया कि सरकार का सम्मान क्या सम्मान। निर्भया दरिंदगी पर ‘जनसत्ता’ में पहले पन्ने पर अपना ग़ुस्सा लिखा। शासन को कोसा। अपने दौर के अन्य अनाचार पर भी क़लम उठाती रहीं। मोदी सरकार आने पर लेखकों की हत्याओं और दूसरे ज़ुल्म के ख़िलाफ़ हमने “प्रतिरोध” का आयोजन किया, कृष्णाजी वीलचेयर पर बैठकर कांस्टिट्यूशन क्लब आ पहुँचीं।

    वे हमारे लिए प्रेरणा का जीवंत संबल हैं। इसका गर्व अनुभव होता है। और तसल्ली भी।

    Reply
  • January 3, 2018 at 6:39 pm
    Permalink

    जगदीश्वर चतुर्वेदी
    गालिब के रंग –

    ग़ालिब सदा किराये के मकानों में रहे, अपना मकान न बनवा सके। ऐसा मकान ज़्यादा पसंद करते थे, जिसमें बैठकख़ाना और अन्त:पुर अलग-अलग हों और उनके दरवाज़े भी अलग हों, जिससे यार-दोस्त बेझिझक आ-जा सकें।
    5 अक्टूबर को (18 सितम्बर को दिल्ली पर अंग्रेज़ों का दुबारा से अधिकार हो गया था) कुछ गोरे, सिपाहियों के मना करने पर भी, दीवार फाँदकर मिर्ज़ा के मुहल्ले में आ गए और मिर्ज़ा के घर में घुसे। उन्होंने माल-असबाब को हाथ नहीं लगाया, पर मिर्ज़ा, आरिफ़ के दो बच्चों और चन्द लोगों को पकड़कर ले गए और कुतुबउद्दीन सौदागर की हवेली में कर्नल ब्राउन के सामने पेश किया। उनकी हास्यप्रियता और एक मित्र की सिफ़ारिश ने रक्षा की। बात यह हुई जब गोरे मिर्ज़ा को गिरफ़्तार करके ले गए, तो अंग्रेज़ सार्जेण्ट ने इनकी अनोखी सज-धज देखकर पूछा-‘क्या तुम मुसलमान हो?’ मिर्ज़ा ने हँसकर जवाब दिया कि, ‘मुसलमान तो हूँ पर आधा।’ वह इनके जवाब से चकित हुआ। पूछा-‘आधा मुसलमान हो, कैसे?’ मिर्ज़ा बोले, ‘साहब, शरीब पीता हूँ; हेम (सूअर) नहीं खाता।’

    जब कर्नल के सामने पेश किए गए, तो इन्होंने महारानी विक्टोरिया से अपने पत्र-व्यवहार की बात बताई और अपनी वफ़ादारी का विश्वास दिलाया। कर्नल ने पूछा, ‘तुम दिल्ली की लड़ाई के समय पहाड़ी पर क्यों नहीं आये, जहाँ अंग्रेज़ी फ़ौज़ें और उनके मददगार जमा हो रहे थे?’ मिर्ज़ा ने कहा, ‘तिलंगे दरवाज़े से बाहर आदमी को निकलने नहीं देते थे। मैं क्यों कर आता? अगर कोई फ़रेब करके, कोई बात करके निकल जाता, जब पहाड़ी के क़रीब गोली की रेंज में पहुँचता तो पहरे वाला गोली मार देता। यह भी माना की तिलंगे बाहर जाने देते, गोरा पहरेदार भी गोली न मारता पर मेरी सूरत देखिए और मेरा हाल मालूम कीजिए। बूढ़ा हूँ, पाँव से अपाहिज, कानों से बहरा, न लड़ाई के लायक़, न मश्विरत के क़ाबिल। हाँ, दुआ करता हूँ सो वहाँ भी दुआ करता रहा।’ कर्नल साहब हँसे और मिर्ज़ा को उनके नौकरों और घरवालों के साथ घर जाने की इजाज़त दे दी।

    1857 के ग़दर के अनेक चित्र मिर्ज़ा ‘ग़ालिब’ के पत्रों में तथा इनकी पुस्तक ‘दस्तंबू’ में मिलते हैं। इस समय इनकी मनोवृत्ति अस्थिर थी। वह निर्णय नहीं कर पाते थे कि किस पक्ष में रहें। सोचते थे कि पता नहीं ऊँट किस करवट बैठे? इसीलिए क़िले से भी थोड़ा सम्बन्ध बनाये रखते थे। ‘दस्तंबू’ में उन घटनाओं का ज़िक्र है जो ग़दर के समय इनके आगे गुज़री थीं। उधर फ़साद शुरू होते ही मिर्ज़ा की बीबी ने उनसे बिना पूछे अपने सारे ज़ेवर और क़ीमती कपड़े मियाँ काले साहब के मकान पर भेज दिए ताकि वहाँ सुरक्षित रहेंगे। पर बात उलटी हुई। काले साहब का मकान भी लुटा और उसके साथ ही ग़ालिब का सामान भी लुट गया। चूँकि इस समय राज मुसलमानों का था, इसीलिए अंग्रेज़ों ने दिल्ली विजय के बाद उन पर विशेष ध्यान दिया और उनको ख़ूब सताया। बहुत से लोग प्राण-भय से भाग गए। इनमें मिर्ज़ा के भी अनेक मित्र थे। इसीलिए ग़दर के दिनों में उनकी हालत बहुत ख़राब हो गई। घर से बाहर बहुत कम निकलते थे। खाने-पीने की भी मुश्किल थी। ऐसे वक़्त उनके कई हिन्दू मित्रों ने उनकी मदद की। मुंशी हरगोपाल ‘तुफ़्ता’ मेरठ से बराबर रुपये भेजते रहे, लाला महेशदास इनकी मदिरा का प्रबन्ध करते रहे। मुंशी हीरा सिंह दर्द, पं. शिवराम एवं उनके पुत्र बालमुकुन्द ने भी इनकी मदद की। मिर्ज़ा ने अपने पत्रों में इनके प्रति कृतज्ञता प्रकट की है।

    जब असदउल्ला ख़ाँ ‘ग़ालिब’ सिर्फ़ 13 वर्ष के थे, इनका विवाह लोहारू के नवाब ‘अहमदबख़्श ख़ाँ’ (जिनकी बहन से इनके चचा का ब्याह हुआ था) के छोटे भाई ‘मिर्ज़ा इलाहीबख़्श ख़ाँ ‘मारूफ़’ की बेटी ‘उमराव बेगम’ के साथ 9 अगस्त, 1810 ई. को सम्पन्न हुआ था। उमराव बेगम 11 वर्ष की थीं। इस तरह लोहारू राजवंश से इनका सम्बन्ध और दृढ़ हो गया। पहले भी वह बीच-बीच में दिल्ली जाते रहते थे, पर शादी के 2-3 वर्ष बाद तो दिल्ली के ही हो गए। वह स्वयं ‘उर्दू-ए-मोअल्ला’ (इनका एक ख़त) में इस घटना का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं कि-

    “7 रज्जब 1225 हिजरी को मेरे वास्ते हुक्म दवा में हब्स[ सादिर[ हुआ। एक बेड़ी (यानी बीवी) मेरे पाँव में डाल दी और दिल्ली शहर को ज़िन्दान मुक़र्रर किया और मुझे इस ज़िन्दाँ में डाल दिया।”

    मुल्ला अब्दुस्समद 1810-1811 ई. में अकबराबाद आए थे और दो वर्ष के शिक्षण के बाद असदउल्ला ख़ाँ (ग़ालिब) उन्हीं के साथ आगरा से दिल्ली गए। दिल्ली में यद्यपि वह अलग घर लेकर रहे, पर इतना तो निश्चित है कि ससुराल की तुलना में इनकी अपनी सामाजिक स्थिति बहुत हलकी थी। इनके ससुर इलाहीबख़्श ख़ाँ को राजकुमारों का ऐश्वर्य प्राप्त था। यौवन काल में इलाहीबख़्श की जीवन विधि को देखकर लोग उन्हें ‘शहज़ाद-ए-गुलफ़ाम’ कहा करते थे। इससे अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि, उनकी बेटी का पालन-पोषण किस लाड़-प्यार के साथ हुआ होगा। असदउल्ला ख़ाँ (ग़ालिब) शक्ल और सूरत से बड़ा आकर्षक व्यक्तित्व रखते थे। उनके पिता-दादा फ़ौज में उच्चाधिकारी रह चुके थे। इसीलिए ससुर को आशा रही होगी कि, असदउल्ला ख़ाँ भी आला रुतबे तक पहुँचेंगे एवं बेटी ससुराल में सुखी रहेगी, पर ऐसा हो न सका। आख़िर तक यह शेरो-शायरी में ही पड़े रहे और उमराव बेगम, पिता के घर बाहुल्य के बीच पली लड़की को ससुराल में सब सुख सपने जैसे हो गए।

    ग़ालिब अथवा मिर्ज़ा असदउल्ला बेग़ ख़ान (अंग्रेज़ी:Ghalib अथवा Mirza Asadullah Baig Khan, उर्दू: غالب अथवा مرزا اسدللا بےغ خان) (जन्म- 27 दिसम्बर, 1797 ई. आगरा – 15 फ़रवरी, 1869 ई. दिल्ली) जिन्हें सारी दुनिया ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ के नाम से जानती है, उर्दू-फ़ारसी के प्रख्यात कवि रहे हैं। इनके दादा ‘मिर्ज़ा क़ौक़न बेग ख़ाँ’ समरकन्द से भारत आए थे। बाद में वे लाहौर में ‘मुइनउल मुल्क’ के यहाँ नौकर के रूप में कार्य करने लगे। मिर्ज़ा क़ौक़न बेग ख़ाँ के बड़े बेटे ‘अब्दुल्ला बेग ख़ाँ से मिर्ज़ा ग़ालिब हुए। अब्दुल्ला बेग ख़ाँ, नवाब आसफ़उद्दौला की फ़ौज में शामिल हुए और फिर हैदराबाद से होते हुए अलवर के राजा ‘बख़्तावर सिंह’ के यहाँ लग गए। लेकिन जब मिर्ज़ा ग़ालिब महज 5 वर्ष के थे, तब एक लड़ाई में उनके पिता शहीद हो गए। मिर्ज़ा ग़ालिब को तब उनके चचा जान ‘नसरुउल्ला बेग ख़ान’ ने संभाला। पर ग़ालिब के बचपन में अभी और दुःख व तकलीफें शामिल होनी बाकी थीं। जब वे 9 साल के थे, तब चचा जान भी चल बसे। मिर्ज़ा ग़ालिब का सम्पूर्ण जीवन ही दु:खों से भरा हुआ था। आर्थिक तंगी ने कभी भी इनका पीछा नहीं छोड़ा था। क़र्ज़ में हमेशा घिरे रहे, लेकिन अपनी शानो-शौक़त में कभी कमी नहीं आने देते थे। इनके सात बच्चों में से एक भी जीवित नहीं रहा। जिस पेंशन के सहारे इन्हें व इनके घर को एक सहारा प्राप्त था, वह भी बन्द कर दी गई थी।जगदीश्वर चतुर्वेदी

    Reply
  • January 4, 2018 at 9:59 am
    Permalink

    Manika Mohini
    29 December 2017 at 21:36 ·
    यह पोस्ट लिखने का बहाना बनी, प्रभात रंजन Prabhat Ranjan की पोस्ट। हालाँकि बहुत बार लिखने का सोचा था अमृता प्रीतम और इमरोज़ की प्रेम-कथा के बारे में। उस समय के कुछ वरिष्ठ पंजाबी लेखकों के मुँह से भी जो सुना था, वह कहीं दिमाग में फँसा रह गया था।

    इमरोज़ एक बेरोजगार चित्रकार थे, उम्र में अमृता से बहुत छोटे। उनके पास तब न नाम था, न कोई कैरियर। कहाँ अमृता प्रीतम का कद, कहाँ इमरोज़ का कद? उनका उम्र में छोटा होना भी उनका कोई प्लस पॉइंट नहीं था। इमरोज़ को अपने घर में रख लेने के पीछे अमृता का प्यार तो कतई नहीं था क्योंकि वह साहिर को भुला नहीं पाई थीं। तो क्या साहिर को चिढ़ाने के लिए अमृता ने इमरोज़ को अपनाया था? वे ऐसा कर सकती थीं क्योंकि उनकी प्रतिबद्धता किसी अन्य पुरुष से नहीं थी। वे समाज के प्रति भी जवाबदेह नहीं थीं। इस मामले में वे कतई-कतई परंपरावादी नहीं थीं, घोर विद्रोही थीं।

    उस समय अमृता का रुख इमरोज़ के प्रति यह रहा कि चलो, इसे भी रख लो एक किनारे, काम आएगा। और वह उनके काम आए भी। उनके घरेलू काम करने से लेकर एक बड़ा सहारा यह कि लो जी, अब अमृता एंगेज हो गईं। वैसे भी जिस उम्र में अमृता को इमरोज़ मिले, उस उम्र में उनका एंगेज होना या अवेलेबल होना इतना मायने नहीं रखता था।

    साहिर लुधियानवी के फ़िल्मी गीतों की पुस्तक, ‘आओ कोई ख्वाब बुनें’ पर अमृता प्रीतम की यह टिप्पणी कि ‘जुलाहा सारी उम्र ख्वाब ही बुनता रहा’, इस आशय की ओर संकेत करती है कि इमरोज़ के मिल जाने के बाद भी अमृता को साहिर के न मिलने का अफ़सोस रहा। यानी अमृता का इमरोज़ के प्रति प्यार मिलावट भरा था, एक तरह से खानापूरी थी। इमरोज़ भी साहिर के प्रति उनके लगाव से अवगत थे लेकिन इमरोज़ का व्यक्तित्व परजीवी किस्म का था। इमरोज़ के पास अन्य कोई विकल्प नहीं था। वह किसी अन्य विकल्प को चुनने में असमर्थ थे। यह प्यार नहीं, मजबूरी थी, उनके व्यक्तित्व की कमज़ोरी थी। अमृता के सिवा उनका कहीं कोई रिश्ता या रिश्तेदारी नहीं थी।

    मुझे पता है, मेरे इस लेख से अमृता और इमरोज़ के दीवाने मुझ पर क्रुद्ध हो सकते हैं पर नज़र अपनी-अपनी, नज़रिया अपना-अपना।——————————————————————————————–Dayanand Pandey
    30 December 2017 at 00:20 ·
    Manika Mohini जी , फिर आप प्रेम नहीं जानतीं । यह आप का दुर्भाग्य है । दुर्भाग्य है आप का कि प्रेम को तराजू पर तौलती हैं । लेकिन दिक्कत यह कि आप अमृता प्रीतम और इमरोज का प्यार भी नहीं जानतीं । जो जग जाहिर है । अगर जानती होतीं तो ऐसी अभद्र और सतही टिप्पणी नहीं लिखतीं । अमृता प्रीतम इस डाल से उस डाल कूदने वाली स्त्री नहीं थीं । बाल विवाह था । छ बरस की उम्र में सगाई हो गई थी । विवाह भले टूट गया पर उन्हों ने अपने पति प्रीतम सिंह का नाम अपने नाम से ताजिंदगी जोड़े रखा । अमृता प्रीतम नाम लिखती रहीं । दूसरा विवाह भी नहीं किया । साहिर से प्रेम किया तो छुपाया नहीं । इमरोज के साथ लिव इन में रहीं तो भी नहीं छुपाया । इमरोज बड़े चित्रकार ही नहीं , पंजाब के बड़े जमीदार परिवार से भी थे , मूल नाम इंद्रजीत था ।

    अमृता के प्यार में वह इमरोज हो गए । छ साल छोटे जरुर थे इमरोज पर आर्थिक रुप से अमृता पर आश्रित नहीं थे । वह जमीदार परिवार से थे ही , चित्रकार भी बड़े थे । इस से भी बढ़ कर बड़े आदमी थे , बड़प्पन बहुत था उन में । और सब से बड़ी बात यह कि वह प्रेमी बहुत बड़े थे । अमृता जब अंतिम समय बहुत बीमार थीं तब सालों उन्हों ने अमृता की अनथक सेवा की । उन को रोज कई-कई इंजेक्शन लगते थे । तकलीफ़ से भर कर इमरोज ने एक दिन डाक्टर से कहा कि इस के सारे इंजेक्शन मुझे लगा दीजिए , इसे काम कर जाएगा । आप कह सकती हैं किसी के लिए , इसी विश्वास के साथ ?

    अमृता ने इमरोज के लिए सालों साल न सिर्फ़ रोटियां बनाई बल्कि सिर्फ़ इमरोज के लिए अपनी मशहूर नज्म लिखी , मैं तैनू फ़िर मिलांगी (मैं तुझे फ़िर मिलूंगी)। आप क्या जानें अमृता और इमरोज के प्रेम की तासीर भला । जानतीं तो इमरोज को परजीवी नहीं लिखतीं । असल परजीवी तो आप हैं जो सुनी-सुनाई बातों के आधार पर ऐसी सतही टिप्पणी लिख कर अमृता-इमरोज के प्यार को तराजू पर तौल बैठी हैं । यह गुड बात नहीं है । थोड़ा पढ़ भी लिया किया कीजिए । तो शायद ऐसी सतही , छिछली और प्रेम विरोधी टिप्पणी लिखने से इस उम्र में बच लेंगी। Rajeshwar Vashistha जी , आप भी ध्यान दीजिए । ऐसी छिछली टिप्पणी पढ़ कर कोई राय मत बनाया कीजिए । जान लीजिए कि इमरोज परजीवी नहीं थे । खुद्दार प्रेमी थे । हां , अमृता के लिए जांनिसार प्रेमी थे । अमृता के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था इमरोज ने । मुझे कहने दीजिए ईश्वर इमरोज जैसा प्रेमी हर पुरुष को बनाए। कम से कम मैं तो बनना ही चाहूंगा ।

    Reply
  • January 5, 2018 at 9:07 pm
    Permalink

    Tejendra Sharma
    25 November 2017 · London, United Kingdom ·
    मित्रो – मेरी आने वाली नयी कहानी से।

    “पत्नी: शादी के बाद रोमांस कहां खो जाता है?

    पति: शादी से पहले बाईस घंटे की तड़प के बाद एक दो घंटे के लिए मिल पाते हैं। प्रेमी और प्रेमिका बेहतरीन कपड़े पहन कर सबसे बढ़िया कोलोन लगा कर एक दूसरे को जीतने वाला व्यवहार करते हैं।

    शादी के बाद चौबीस में से अठारह घंटे साथ रहते हैं। सुस्सु पाटी करते हैं, गैस पास करते हैं… बलग़म थूकते हैं… ख़र्राटे मारते हैं… सुबह बासी मुंह उठते हैं और दांत साफ़ करते हुए अजब अजब आवाज़ें निकालते हैं… सुड़क सुड़क कर चाय पीते हैं… और बेचारा रोमांस खिड़की के रास्ते उड़न छू हो जाता है।अब जीतने की जगह हराने की भावना ले लेती है। किसी भी चीज़ के प्रति रोमांस की भावना तब तक रहती है जब तक वो आपकी पहुंच से दूर होती है।”Tejendra Sharma
    30 December 2017 at 12:37 · London, United Kingdom ·
    मित्रो – हिंदी के वरिष्ठ स्टार लेखक
    Tejendra Sharma
    21 November 2017 ·
    मित्रो – जयपुर, लखनऊ, पटना, बरेली, रायपुर, गौहाटी, देहरादून – के लिटरेचर फ़ेस्टिवल सुनने में आ रहे हैं…

    क्या किसी के पास एक संपूर्ण सूचि है कि ऐसे कितने लिटरेचर फ़ेस्टिवल भारत में होते हैं…

    फिर हिन्दी की साहित्यिक किताबों का पहला संस्करण 300 से 350 पुस्तकों तक ही क्यों सीमित होता है….

    इस पर प्रकाश डालिये ना…
    एक ज़माना था हिंदी में धर्मवीर भारती, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, मनोहर श्याम जोशी, ज्ञान रंजन, श्रीलाल शुक्ल, कामतानाथ, जगदंबा प्रसाद दीक्षित, शरद जोशी जैसे क़दावर नाम एक साथ साहित्यिक पटल पर दिखाई देते थे।

    आज इस पाए के लेखक केवल महिलाओं में दिखाई दे रहे हैं… जिनका आशीर्वाद पाकर अन्य लेखक धन्य महसूस कर सकते हैं।

    1. कृष्णा सोबती
    2. मन्नू भंडारी
    3. चित्रा मुद्गल
    4. नासिरा शर्मा
    5. ममता कालिया
    6. मृदुला गर्ग
    7. मैत्रेयी पुष्पा
    8. सूर्यबाला

    अमरीका और ब्रिटेन में भी कमोबेश यही स्थिति है। क्या पुरुष लेखकों की ऐसी कोई सूची बन सकती है?Tejendra Sharma
    1 January at 16:11 ·
    मित्रो – पुस्तक का प्रचार कैसे किया जाना चाहिये….

    मैं गीताश्री के दबंग व्यक्तित्व से तो हमेशा से प्रभावित रहा ही हूं। मगर पिछले दिनों जब उसका लिखा पहला उपन्यास “हसीनाबाद” प्रकाशित हो कर आया तो मैनें उसकी प्रचार के तरीके पर गहराई से ग़ौर किया। मुझे यह कहने में ज़रा भी संकोच नहीं कि पिछले पच्चीस वर्ष में ना तो किसी लेखक ने और ना ही किसी साहित्यिक प्रकाशक ने इतने योजनाबद्ध तरीके से अपनी किसी पुस्तक का प्रचार किया है।

    आज हम बाज़ार संस्कृति से बच नहीं सकते। हम साहित्यकार दोग़लेपन का शिकार बने रहते हैं। मन ही मन चाहते हैं कि हमारी रचना का, हमारी पुस्तक का प्रचार हो, बिक्री हो और रॉयल्टी मिले। मगर इसके लिये खुले रूप से कुछ करते हुए दिखाई नहीं देना चाहते।

    Geeta Shree गीताश्री ने एक नई परम्परा की शुरूआत की है। मुझे पूरी उम्मीद है कि अन्य लेखक एवं प्रकाशक इसका संज्ञान लेंगे और भविष्य में अन्य पुस्तकों का प्रचार भी कुछ इसी तर्ज़ पर होगा।

    गीताश्री हिंदी साहित्य को एक नई राह दिखाने के लिये शुक्रिया

    Reply
  • January 9, 2018 at 9:46 pm
    Permalink

    Priya Darshan
    तुझे हम वली समझते अगर न बादाख़्वार होता
    राजेंद्र यादव पर यह संस्मरण ‘बहुवचन’ के नए अंक में आया है यह 1993 का साल रहा होगा जब राजेंद्र यादव से मैं पहली बार मिला। मुझे मेरे एक मित्र ने अक्षर प्रकाशन बुलाया था। खुद उन्हें वहां पहुंचने में देर हो गई। मुझे मालूम था कि अक्षर प्रकाशन राजेंद्र यादव का है, लेकिन ये एहसास नहीं था कि मुझे वे वहां मिल जाएंगे। मैं बिल्कुल रोमांचित था। जिस लेखक को बचपन से पढ़ता रहा था, वह मेरे सामने बैठा है। ‘सारा आकाश’, ‘अनदेखे अनजाने पुल’, ‘उखड़े हुए लोग’ जैसे उपन्यास, उनकी कहानियां, उनके अनुवाद और उन दिनों लिखे गए उनके विचारोत्तेजक संपादकीय, सब जैसे जेहन में नाच रहे थे। इतने बड़े लेखक से रूबरू होने का यह मेरा पहला अनुभव था।
    करीब घंटे भर से ऊपर चली वह मुलाकात ख़त्म हुई तो दो बातें मेरी समझ में आईं। राजेंद्र यादव वक्ता ही नहीं, श्रोता भी बहुत अच्छे हैं। भले ही वे उन दिनों कहानियां न लिख रहे हों, लेकिन उनके भीतर का कहानीकार जैसे सामने वाले को कुरेदता रहता था। वे ध्यान से मुझे सुनते रहे। मैं भी अपना उन दिनों तक का पढ़ा-लिखा सारा ज्ञान जैसे उंडेल देने पर आमादा था। अब कभी-कभी सोचत हूं- खुद को कुछ साबित करने की वह बेताबी राजेंद्र यादव को कैसी लगी होगी? बहरहाल, उस दिन की चर्चा में उन्होंने मुझे एक उपन्यास दिया- विकास झा का ‘मैक्लुस्कीगंज’ कि मैं इसकी समीक्षा लिख दूं। मुझे याद है कि मैंने उस उपन्यास की बहुत तीखी आलोचना लिखी- अब समझ में आता है कि वह शायद कुछ असंतुलित भी हो गई थी, उन्होंने उसे छापा नहीं। मैं कुछ निराश हुआ। मैंने तय किया कि ‘हंस’ में आगे से नहीं लिखूंगा। लेकिन ‘हंस’ का आकर्षण दुर्निवार था। राजेंद्र यादव इधर-उधर कार्यक्रमों में मिलते रहे, मुझे दफ़्तर आने का न्योता देते रहे और उनसे लगातार संवाद बना रहा। इसके बाद उन्होंने फिर एक उपन्यास दिया- मराठी लेखक आनंद यादव का ‘नटरंग।’ इस बार मैंने यह उपन्यास पढ़ते हुए राजेंद्र यादव के पसंदीदा उपन्यास सुरेंद्र वर्मा के ‘मुझे चांद चाहिए’ से इसकी तुलना की और इसे बेहतर करार दिया।
    राजेंद्र यादव के हाथ में समीक्षा सौंपते हुए जब मैंने इस बात की चर्चा उनसे की तो वे फिर कुछ निराश लगे- कहा कि दोनों दो अलग तरह के उपन्यास हैं, उनकी तुलना ठीक नहीं है। मैं फिर कुछ मायूस हुआ, लेकिन मैंने कहा कि वे इसे पढ़ लें। दो दिन बाद मैंने उनको फोन किया। उनकी आवाज़ बदली हुई थी- ‘यार तुमने तो कमाल का लिखा है, पूरा छाप रहा हूं, तुम लगातार कुछ लिखा करो।’
    इसके बाद लगातार लिखने का तो नहीं, लेकिन उनसे लगातार बातचीत करने का सिलसिला ऐसा बना जो उनसे फिर लगातार बना रहा। यहां इस बात का मुझे पूरा-पूरा एहसास है कि राजेंद्र यादव की मंडली बहुत बड़ी थी और बहुत सारे लोग ऐसे थे जो उनसे लगभग हर रोज़ मिला करते थे, लेकिन मुझसे उन्होंने एक अलग सा रिश्ता बनाया था। हो सकता है कि यह एहसास भी बहुत सारे लोगों को हो कि उनसे राजेंद्र यादव का बिल्कुल अलग सा रिश्ता रहा और इसे भी उनकी शख़्सियत की ख़ासियत की तरह देखा जाना चाहिए। बहरहाल, जब पहली बार जब एक शाम उन्होंने मुझे अपने घर भोजन का न्योता दिया तो खाने के पहले पीने की मेज़ सजी। जब मैंने उन्हें बताया कि इस मामले में मैं कच्चा-बच्चा जैसा कुछ हूं और नहीं पीता तो उन्होंने कहा- सत्यानाश। लेकिन इसके बाद उन्होंने मुझ पर पीने का दबाव नहीं डाला। मेरे लिए डाइट कोक मंगवाई और फिर हम घंटों बैठे रहे। इसके बाद भी उनके घर से मुझे न्योता आता रहा- लेकिन अक्सर नाश्ते का। हम पराठे-सब्ज़ी और तरह-तरह के अचारों और चाय के साथ दुनिया भर के साहित्य की सात्विक चर्चा किया करते। Priya Darshan
    हिंदी के किसी दूसरे लेखक के घर हम इतनी बार नहीं आए-गए जितना राजेंद्र यादव के घर। कुछ करीबी मित्रों के अलावा जो दूसरा ऐसा घर रहा जहां हम बात-बेबात बेहिचक जाते रहे, वह वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर का रहा। उनसे भी बिल्कुल आश्वस्तिकर पारिवारिक रिश्ते रहे। लेकिन इन दोनों को छोड़ किसी भी तीसरे लेखक के घर इस हद तक जाना नहीं हुआ।
    जाहिर है, इस अपनेपन में राजेद्र यादव की उस बहुख्यात लोकतांत्रिकता का बहुत बड़ा हाथ रहा जिसका ज़िक्र अक्सर सब लोग करते हैं। यह सच है कि वे बड़ी सहजता से हर किसी से बिल्कुल मित्रवत बात करते थे- कुछ इस तरह कि हर किसी के भीतर उनका करीबी होने का भाव पैदा हो जाता था। लेकिन ऐसा नहीं कि राजेंद्र यादव सिर्फ दिखावे के लिए ऐसा करते थे। वे वाकई इस मैत्री को बहुत ख़ास ढंग से निभाते भी थे। उनकी इस मित्र सूची में वैसे बहुत सारे युवा लेखक और पत्रकार थे जिनमें राजेंद्र यादव को कोई बौद्धिक संभावना दिखाई पड़ती थी। ऐसे लेखकों के लिए ‘हंस’ के पन्ने हमेशा सुलभ थे। लेकिन राजेंद्र जी के अपने वैचारिक खेल तब भी चलते रहते। कई बार वे बड़ी बारीकी से दूसरों से वह कहलवा लेते जो वे ख़ुद कहना चाहते थे। जब मैत्रेयी पुष्पा का उपन्यास ‘चाक’ छप कर आया तो उन्होंने मुझे उसे पढ़ने को कहा। उसके बाद अगले कई दिन तक वे मुझसे इस उपन्यास पर बात करते रहे- बताते रहे कि कैसे वह हिंदी में पहले लिखे गए उपन्यासों से अलग और आगे का है। इसके बाद उन्होंने मुझसे इसकी समीक्षा लिखवाई। इस क्रम में दो और किताबें- मैत्रेयी जी का ही ‘इदन्नमम’ और प्रभा खेतान की ‘पीली आंधी’ भी इसमें शामिल हो गई। ‘चाक’ पर तब तक छपी शायद वह पहली समीक्षा थी। मैंने उस उपन्यास की भूरि-भूरि तारीफ़ की। आज भी वह उपन्यास मुझे प्रिय है।
    लेकिन मैंने अपने उत्साह में पुरानी लेखिकाओं पर बहुत आक्रामक टिप्पणी की- कृष्णा सोबती और मृदुला गर्ग तक के बारे में लगभग अशिष्ट ढंग से लिखा। अब मुझे लगता है कि इससे बचना चाहिए था- सिर्फ शराफत या शिष्टता के तकाज़े से नहीं, बल्कि इस वजह से भी कि इन लेखिकाओं की रचनाओं के संदर्भ ऐसी सख़्त टिप्पणी उनके साथ न्याय नहीं थी। संभव है, कोई दूसरा संपादक होता तो वह इसे संपादित करता या कम से कम मुझे सुझाव देता कि इसे चाहूं तो बदल दूं। लेकिन राजेंद्र यादव ने ऐसा कुछ नहीं किया। वह समीक्षा जस की तस छपी। जाहिर है, वे शायद ऐसा ही चाहते थे।
    बहरहाल, राजेंद्र यादव की बहुचर्चित लोकतांत्रिकता भर का मामला होता तो शायद उनके व्यक्तित्व में वह चुंबक नहीं होता जिसकी वजह से लोग उनकी ओर खिंचते चले जाते थे। हमारे बीच ऐसे बहुत सारे लोग होते हैं जो बिल्कुल दिल खोल कर मिलते हैं और यारबाश कहे जा सकते हैं। लेकिन राजेंद्र यादव की शख़्सियत में जो बौद्धिक चौकन्नापन था, जो उदात्त नफ़ासत थी- वह बाकी जगह दुर्लभ थी। वे अपनी उपस्थिति का कोई दबाव बनाए बिना अपना आभामंडल बनाए रखते थे। शायद यही वजह थी कि जिस भी महफ़िल में वे होते, महफ़िल के सिरमौर होते। वे पुरानी किताबों की चर्चा करते, नPriya Darshanई घटनाओं पर बहस करते, जो लिखा या पढ़ा जा रहा है, उस पर उनकी बारीक नज़र होती, और अक्सर वे अपने काम की चीज़ निकाल लेते।
    इसका एक उदाहरण भी याद आ रहा है। 1998 के आसपास मेरी पत्नी स्मिता ने एक कहानी लिखी- ‘त्रिज्या’। कहानी मुझे सपाट लगी- शिल्पविहीन और कुछ बोल्ड। उसने राजेंद्र यादव को कहानी दी। यादव जी ने मुझसे पूछा कि कहानी कैसी है। मैंने अपनी राय बेलाग बता दी। यादव जी कहानी लौटाने लगे। स्मिता ने आग्रह किया- छोटी सी कहानी है, आप पढ़ तो लीजिए। शायद उसका मन रखने के लिए राजेंद्र यादव ने वह कहानी रख ली।
    लेकिन अगली सुबह बिल्कुल सात-आठ बजे उनका फोन आया- मुझे अपने प्रिय संबोधन, राक्षस, दानव या कुंभकर्ण जैसे कुछ से नवाजते हुए उन्होंने घोषित किया कि स्मिता की कहानी बहुत ही अच्छी है। अगले अंक में वह कहानी छपी और उस पर जितनी चिट्ठियां आईं. शायद उतनी मेरी अब तक की सारी कहानियों पर नहीं आईं। मैत्रेयी पुष्पा. अनामिका और दूर्वा सहाय जैसी लेखिकाएं उस कहानी को अब भी याद करती हैं।
    यह लिखते-लिखते एक और बात याद आ रही है जिससे उनकी रचनात्मक समझ का कुछ अंदाज़ा मिलता है। साल 1995 में मैं सलमान रुश्दी के उपन्यास ‘मिडनाइट्स चिल्ड्रेन’ का अनुवाद कर रहा था। यह बहुत जटिल उपन्यास था जिसमें कई जगहों पर उपयुक्त अनुवाद की चुनौती कलम रोक लेती थी। मैंने तय किया कि कुछ शब्दों पर दूसरों से राय लूंगा। ऐसा ही एक शब्द आया, ‘रेवरेंड मदर’। उपन्यास में यह अमीना नाम की एक महिला के लिए इस्तेमाल किया गया था जो अपनी उम्र के उत्तरार्ध में कुछ दबंग भी है, ख़ासी मोटी भी और कुछ कर्कश भी। उसे बाकी लोग ‘रेवरेंड मदर’ के नाम से पुकारते हैं। मैं तय़ नहीं कर पा रहा था कि इसका अनुवाद क्या करूं। पवित्र मां या पाक अम्मी जैसा अनुवाद बहुत अटपटा लग रहा था। हिंदी के एक विख्यात कवि-आलोचक और संपादक रहे लेखक ने सुझाव दिया कि इसको मुक़द्दस अम्मी कर दूं। लेकिन यह अनुवाद भी जंच नहीं रहा था। मैंने राजेंद्र यादव से बात की। उन्होंने चुटकी बजाने का भी समय नहीं लिया और कहा कि इसको ‘अम्मी हुजूर’ कर दो। मैं हैरान था, ऐसा उपयुक्त और लगभग शाब्दिक अनुवाद हममें से किसी और को क्यों नहीं सूझा?
    आम तौर पर जिसे हम लोकतांत्रिकता कहते हैं, उसमें भी कई बार आलोचनाओं के लिए जगह नहीं होती। उदार से उदार लोग अपनी हल्की आलोचना को दिल पर ले बैठते हैं। लेकिन कम से कम मेरा अनुभव राजेंद्र यादव के मामले में भिन्न रहा। उनकी दो किताबों ‘हासिल और अन्य कहानियां’ तथा ‘अब वे वहां नहीं रहते’ की मैंने सहारा समय में बहुत तीखी आलोचना लिखी। अपने हिसाब से दोनों संग्रहों की धज्जियां उड़ा दीं। मुझे डर था कि राजेंद्र यादव नाराज़ होंगे। लेकिन वे हंस रहे थे। उन्होंने यह भी माना कि उनकी आलोचना में जो कुछ लिखा गया है, वह सही है।
    उनकी शख्सियत में कुछ था जो पकड़ में नहीं आता था, जो उनको दूसरों से अलग करता था। शायद मानव मन की सूक्ष्मताओं और जटिलताओं को वे कहीं बहुत गहराई से महसूस करते और पकड़ पाते थे। उनके पास बहुत ही समृद्ध भाषा थी जो बहुत जटिल और संश्लिष्ट स्थितियों को बड़ी आसानी से लिख सकती थी। वे मूलतः मध्यवर्गीय संस्कारों में पले-बढ़े और उनके साहित्य लेखन पर इन संस्कारों की बहुत गहरी छाप है। उनकी बहुत सारी अविस्मरणीय रचनाएं इन्हीं संस्कारों के साये में निकली हैं और हममें से बहुत सारे लोगों को अच्छी लगती हैं। इन कथाओं में जो विद्रोह है, वह भी मध्यवर्गीय चरित्र का है, और इसलिए लुभाता है। कई बार यह लगता है कि अपने मध्यवर्गीय जीवन से विद्रोह का रास्ता राजेंद्र यादव इसी मध्यवर्गीय साहित्य में खोजते हैं।
    लेकिन धीरे-धीरे राजेंद्र यादव बदलते हैं। ख़ास कर स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर मध्यवर्गीय जीवन के पाखंड उनके भीतर असंतोष पैदा करते हैं। कहीं यह एहसास भी है कि इसी पाखंड की वजह से वे वह मनचाहा जीवन नहीं चुन पाए जो उनके लिए स्वाभाविक था। धीरे-धीरे वे इस पाखंड से परदा हटाते हैं। एकाध साक्षात्कारों में वे अपने निजी भटकावो का ज़िक्र करते हैं और उनसे उत्साहित हिंदी का पाखंडी मध्यवर्ग इसे अपने चरित्र पर टिप्पणी की तरह देखने की जगह राजेंद्र यादव के निजी भंडाफोड़ की तरह देखने लगता है। यह उन पर छींटाकशी की शुरुआत का दौर था। इस दौर में राजेंद्र यादव से मैं कई बार मिला। वे कुछ विचलित दिखते थे, लेकिन अपने संशयों को जैसे एक ठहाके से बुहार देने की कोशिश करते थे। एक बार मैंने उनसे शिकायत की कि आपने जो मूल मुद्दे उठाए, वे पीछे रह गए, निजी विवाद और खुन्नस हावी हो गए। उन्होंने तत्काल कहा कि ये उनकी नहीं, हिंदी समाज की कमज़ोरी या सीमा है। अब तक उनकी संगत में मैं कुछ ढीठ हो चुका था। मैंने कहा कि मुझे लगता है कि उन्हें भी ऐसी निजी चर्चाओं और टिप्पणियों में सुख मिलता है। हमेशा की तरह इस सवाल का जवाब उन्होंने एक गगनभेदी ठहाके से दिया।
    वैसे यह बाद की बात है। मध्यवर्गीय लेखक राजेंद्र यादव के रूपांतरण की प्रक्रिया इसके पहले ही शुरू हो चुकी थी। हंस के संपदक के तौर पर हिंदी साहित्य में पैठी मध्यवर्गीयता का अतिक्रमण कर उन्होंने स्त्री और दलित विमर्श की जो जगह बनाई, उसके लिए उनका शुरू में बहुत मज़ाक बनाया गया, कई लेखक उनके विरोध में हंस में न लिखने का एलान कर बैठे, लेकिन अंततः आज हम पाते हैं कि राजेंद्र यादव की दृष्टि ने साहित्य के नए इलाक़ों से जो नई पौध खड़ी की, उसकी उपेक्षा अब संभव नहीं है।
    दरअसल यह एक बड़ी विडंबना रही कि राजेंद्र यादव जीवन और साहित्य के बीच का फासला पाटने की कोशिश करते रहे और बीच में कहीं कुचल दिए गए। उनकी मृत्यु से कुछ साल पहले उनके एक सम्मान के मौक़े पर आयोजित एक कार्यक्रम में अब दिवंगत दलित लेखक तुलसी राम ने धूमिल की कुछ पंक्तियां उद्धृत की थीं जिन्हें धूमिल ने राजकमल चौधरी के लिए लिखा था। तुलसी राम ने कहा कि इसे राजेंद्र यादव के संदर्भ में भी पढ़ा जा सकता है- ‘उसे ज़िंदगी और शायरी के बीच / कम से कम फ़ासला रखते हुए जीना था / यही वजह थी कि एक की निगाह में वो हीरा आदमी था / तो दूसरे की निगाह में कमीना था।’ उस दिन भी राजेंद्र यादव यह सुन कर बाकी दर्शक दीर्घा के साथ ठठा कर हंसे थे। अपना तथाकथित खलनायकत्व उन्हें कभी-कभी एक परिपार्श्व जैसा लगता था जिसमें उनके भीतर के हीरे की चमक कुछ और निखर कर आती थी। उनके कृतित्व और व्यक्तित्व पर केंद्रित जो एक मोटी सी किताब साधना अग्रवाल और भारत भारद्वाज ने संपादित की, उसका नाम ही रखा- ‘हमारे युग का खलनायक।’ बहुत संभव है, यह नाम उन्हें राजेंद्र यादव ने सुझाया हो। वे ख़ुद रूसी कवि और उपन्यासकार लेर्मेंतेव के एक उपन्यास का अनुवाद ‘मेरे युग का नायक’ के नाम से कर चुके थे।
    दरअसल यह उनका खुलापन, नए से नए लोगों से मिलने का उत्साह, उसको बिल्कुल अपना बना लेने की आत्मीयता- इन सब ख़ासियतों ने उन्हें बिल्कुल मौजूं बनाए रखा था। उनके पास हमेशा युवा लोगों का एक हुजूम होता। हालांकि राजेंद्र यादव ने यश के अलावा शायद ज़्यादा कुछ संचय नहीं किया। ‘हंस’ के नाम पर कुछ पुरस्कार भले लिए हों, लेकिन मोटे तौर पर पद और पुरस्कारों के मोह से बचे रहे। कायदे से उनको किसी भी कृति पर साहित्य अकादेमी सम्मान मिल सकता था, मगर नहीं मिला। दिल्ली सरकार के शिखर सम्मानों में भी कोई उनके हिस्से नहीं आया। उनके व्यक्तित्व में निहित एक प्रतिरोधी तत्व सा था जो सत्ताओं को शायद बहुत रास नहीं आता था।
    मगर उन्हें प्रसार भारती का सदस्य बनाया गया। कई युवा लोगों को लगा कि यह तो बहुत बड़ी उपलब्धि है। ऐसी ही एक हल्की-फुल्की चर्चा के दौरान जब सब उनसे दावत मांग रहे थे तब मैंने अलग से उनसे पूछा- क्या वाकई उन्हें यह उपलब्धि उनके लेखन से बड़ी लगती है? उन्होंने इस अप्रत्याशित सवाल पर मेरी ओर चौंक कर देखा। मैंने कहा कि एक लेखक के तौर पर उनकी जो ख्याति और कीर्ति है, वह बनी रहेगी, लोग प्रसार भारती का यह पद भूल जाएंगे। वे हंसने लगे। उन्होंने कहा कि इन लड़कों को आनंद लेने दो, मेरे लिए बस यह एक नई दुनिया से परिचय भर का मामला है- मैं इससे बहुत गौरवान्वित महसूस कर रहा होऊं, ऐसा कुछ नहीं है। आख़िरी वर्षों में वे बीमार भी रहने लगे थे। उनको कई बार अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आई। लेकिन यादव जी जीवट से सबका सामना करते रहे। इस युद्ध में बेशक, उनके बहुत सारे मुरीद उनके साथ रहे। उनको संजीव के नेतृत्व में कुछ उत्सााही मित्रों ने एक लाख रुपये की थैली भेंट करने का निश्चय किया। काम आगे बढ़ा, हालांकि यह बहुत बड़़ी रक़म नहीं थी, मगर इसके लिए पैसा जुटाना पड़ा और अंततः मयूर विहार पेज़-1 के आकाश दर्शन अपार्टमेंट के परिसर में उनके लिए एक छोटा सा आयोजन हुआ।
    वे बड़ी मुश्किल से चल कर आए थे। उन्हें देखकर मेरा दिल बैठा जा रहा था। मुझे लगा कि शायद यह उनसे आख़िरी भेंट हो रही है। उन्होंने अपना वक्तव्य शुरू ही इस बात से किया- ‘तो सफ़र यहां तक चला आया है।’ वह एक आत्मीय दोपहर थी जिसमें नामवर जी भी शामिल थे।
    लेकिन राजेंद्र यादव ने फिर अपने शुभचिंतकों को गलत साबित किया। वे न सिर्फ ठीक हुए, बल्कि अपनी सामान्य दिनचर्या तक भी लौटे। शायद इसलिए भी कि बीमारी के तनाव को वो अपने ऊपर हावी होने नहीं देते थे। एक बार जब वे अस्पताल से लौटे तो हम उनसे मिलने गए- हम, यानी मैं, स्मिता और हमारा बेटा प्रखर। उन दिनों उन पर खाने-पीने की बहुत सारी पाबंदियां थीं। बाकी वे मान ले रहे थे, सिगरेट की तलब उन्हें लग रही थी। उन्होंने हमसे शिकायत की कि ये जो किशन है- यानी उनका सहायक- उसने डॉक्टरों के कहने पर उन पर बहुत सारी पाबंदी लगा दी है, सिगरेट तक नहीं पीने देता।उन्होंने प्रखर को पास बुलाया, जेब से पैसे निकाल कर देते हुए धीरे से कहा कि वह सिगरेट का पैकेट ले आए।
    हम असमंजस में थे। इस बहुत साफ समझ के बावजूद कि हमें यादव जी की बात नहीं माननी चाहिए, उनको ना करने की हिम्मत नहीं हो रही थी। मैंने एकाध बार टालने की कोशिश की। फिर उठ कर गया, खुद जाकर सिगरेट लाकर उन्हें दी। उन्होंने बस दो कश लिए और फिर उसे बुझा दिया। हालांकि किशन इससे भी कुछ आत्मीय ढंग से, उचित ही, बिगड़ता नज़र आया।
    बहरहाल, ज़िंदगी अपने ढब पर लौट रही थी और राजेंद्र यादव भी अपने अंदाज में वापस आ रहे थे। उनकी ज़िंदगी फिर ‘हंस’, ‘हंस’ के लिए चुनी जाने वाली कहानियों और वहां बनने वाले किस्सों के बीच चल पड़ी थी।
    मगर जिस खल व्यक्तित्व को राजेंद्र यादव कभी-कभी मज़ाक में ओढ़ लिया करते थे, वह उनके आखिरी वर्षों में उनसे कुछ ज़्यादा ही चिपक गया था। इस दौर में उनके निजी भटकाव उनके वैचारिक आग्रहों पर हावी होते दिखे, पत्र-पत्रिकाओं में उन पर चटखारी चर्चा शुरू हो गई, उनके ख़िलाफ़ जैसे एक मुहिम चल पड़ी। इस मुहिम में बहुत कुछ योगदान उस किताब का था जिसे वे एक नवोदित लेखिका के ज़रिए लिखवा रहे थे और जिसे उनकी बची-खुची कुंठा का परिणाम माना जा रहा था। इन सबके बीच उन्हें एक पुलिस केस भी झेलना पड़ा, अपनों और परायों की लानत-मलामत भी। फिर एक सुबह किसी मित्र के आए फोन ने बताया कि वे अपनी भी और दूसरों की भी कुंठाओं का बोझ उतार कर चल दिए हैं- इस बार वापस न लौटने के लिए।
    यह एक महान नायक का त्रासद अंत था। शेक्सपियर की शोकांतिकाओ में जिस ‘फेटल फ्लॉ’- सांघातिक कमज़ोरी- की सैद्धांतिकी का ज़िक्र मिलता है, वह हमारे प्रिय लेखक के व्यक्तित्व में भी दिख रही थी। बहुत बहादुर और महान मैकबेथ, किंग लीयर, हेलमेट या ऑथेलो अपनी एक मानवीय कमज़ोरी की वजह से मारे गए- कोई अति महत्त्वाकांक्षी साबित हुआ, कोई अति संदेहवादी, कोई संशयवादी- और सबको जीवन की एक कमज़ोर घड़ी में नियति ने जक़ड लिया।
    लेकिन राजेंद्र यादव की सांघातिक कमज़ोरी क्या थी- क्या लड़कियां, जैसा कि बहुत सारे लोग इशारा करते हैं? यह बहुत ही सतही समझ है। यह सच है कि भारतीय मध्यवर्ग में मर्दमदांधता की जो सड़ांध है, और जिसकी वजह से किसी पुरुष का लड़कियों से स्वाभाविक संबंध तक विकसित नहीं हो पाता और अंततः एक क्रूर पाखंड और नकली आदर्शवाद के सहारे जीवन और संबंधों को ढोते रहने का चलन आम मान लिया जाता है, वहां राजेंद्र यादव एक ऐसी दुनिया की कामना कर रहे थे जहां पारस्परिक बराबरी और सम्मान का संबंध हो। इस क्रम में वे उस पाखंड की धज्जियां भी उड़ा रहे थे जो उनके भीतर भी पैठा हुआ था और दूसरों में भी मौजूद है। लेकिन दूसरों ने सिर्फ उनका तमाशा देखा, अपना अंधेरा नहीं देखा। आख़िरी दिनों में उन पर लगभग संगसारी सी की गई। वे अब नहीं हैं तो न कोई आईना दिखाने वाला बचा है और न पत्थऱ फेंकने वाला। क्या इत्तिफाक है कि इसी दौरान हिंदी समाज का कुंठावमन अपने चरम पर जारी है। यह कहना उचित नहीं होगा कि अच्छा हुआ वे चले गए, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि वे इस समय होते तो अपना पक्ष चुनते उनको समय नहीं लगता। दरअसल वे जीवन भर एक लेखक ही रहे- हमेशा अपने किरदार, अपनी स्थितियां, अपनी कहानी और अपना पक्ष चुनते हुए। उनमें कभी संशयग्रस्त हैमलेट दिखता और कभी मोहग्रस्त लीयर, कभी वे मोहन राकेश को बड़ी शिद्दत से याद करते, कभी कमलेश्वर की उदास आलोचना करते। लेकिन अंततः उनकी धूनी अक्षरों की दुनिया में ही रमनी थी। अक्षर भले उनके प्रकाशन का नाम हो, लेकिन उनके प्राण दरअसल अक्षरों में बसते थे। शायद यही बल था जिसकी वजह से वे जीवन में दी हुई सीमाओं का भी अतिक्रमण करते रहे और साहसपूर्वक सबका सामना भी करने की कोशिश की। शायद बार-बार दुहराया गया ग़ालिब का शेर उन पर भी सही उतरता था- ‘ये मसाइले तसव्वुफ़, ये तेरा बयां ग़ालिब / तुझे हम वली समझते जो न बादाख़्वार होता।‘Priya Darshan

    Reply
  • January 15, 2018 at 8:46 pm
    Permalink

    हम तो बहुत् पास होते हुए भि नहि ग्ये मेला देखने ——————————————————————————————————————————Rakesh Kayasth
    Yesterday at 12:47 ·
    .. ना थी मेरी किस्मत की देखूं मेला———————–
    जिज्जी हमारी कावयित्री हैं, जीजाजी प्रकाशक हैं। साले साहब उदयीमान कथाकार हैं। साढ़ू भाई समीक्षक हैं। हम जो हैं उ तो हइये हैं। फूफाजी जी भी हिंदी अकादमी में है। आज सबसे मुलाकात हो जाएगी, विश्व पुस्तक मेले में ज़रूर आइये।

    पुनश्च:- आज मेले पापा की तिताब का विमोचन है, जलूल-जलूल आना।

    हंसी ठट्ठा करना अपनी आदत है। हिंदी के लेखक लोग बहुत टची होते हैं। तुरंत बुरा मान जाते हैं। विश्व पुस्तक मेला अपने आप में एक अनोखा मेला है, अमावस्या के मेले की तरह। मेले में महात्मा होते हैं, अर्ध-महात्मा और कानफूंके गुरू भी होते हैं। मदारी, कलंदर और विदूषक भी होते हैं। इन सबसे मिलकर बनता है मेला।

    छीजती उत्सवधर्मिता के बीच लेखको, भावी लेखको, पाठको और ठन-ठन गोपाल तमाशबीनो का कड़कड़ती ठंड में एक जगह इकट्ठा होना सुखद है। बहुत ही मनभावन दृश्य है। कई लोग शिकायत करते हैं कि स्टॉल पर आनेवालो में आधे लोग केवल सेल्फी खिंचवाकर भाग जाते हैं, किताब नहीं खरीदते। मुझे इस बात का संतोष है कि कम से कम सेल्फी खिचाने वालो के मन में पाठको को लेकर कुछ सम्मान का भाव तो है। वे मानते हैं कि पढ़ना लिखना कुछ अच्छा काम है। हो सकता है, कल को सचमुच पढ़ने भी लगें।
    किसी भी भारतीय भाषा और खासकर हिंदी में लिखना पूरी तरह से स्वान्त सुखाय काम है। बेस्ट सेलर होकर भी आप रायल्टी में मिलने वाले पैसे का जिक्र सार्वजनिक तौर पर नहीं कर सकते, आपको शर्म आएगी। इसके बावजूद जो लोग मैदान में डटे हुए है, उन सबकी प्रतिबद्धता वंदनीय है। जिनकी किताबें इस साल आई हैं, उन सबको बहुत-बहुत बधाई।

    मैं कोशिश करता हूं नई किताबों के बारे में अपडेटेड रहूं।दस-बीस किताबें हर साल मंगवा लेता हूं। फेसबुक पर भी बहुत सारे पुस्तक अंश पढ़ने को मिल जाते हैं। बहुत कुछ अच्छा लिखा जा रहा है। किताबे खरीदिये, पढ़िये और खुले दिल से लेखको को दाद दीजिये। आप पढ़ेगे तभी लेखक लिखेगा।

    दिल्ली में होता तो प्रगति मैदान के कई चक्कर जरूर लगाता। अब तो यही कह सकता हूं— मुबारक हो तुम सबको हज का महीना, ना थी मेरी किस्मत की देखूं मदीना। मदीने वालो को मेरा सलाम कहना…Rakesh Kayasth

    Reply
  • January 18, 2018 at 3:06 pm
    Permalink

    सभी पाठको खासकर नए पाठको को एक जरूरी सूचना की साइट को नया मोबाइल यूज़र फ्रेंडली रूप देने के दौरान हुआ ये की पुराने क्लिक्स की सूचना मिट गयी हे तो नए पाठको के लिए ये सूचना वार्ना वो सोचेंगे की कुछ जगह इतने अधिक कमेंट्स ( मेरे से इतर भी ) और क्लिक इतने कम — ? तो पाठको पुराने क्लिक डिलीट हो गए हे दुःख हे क्योकि ये अफ़ज़लभाई की साइट का जबर्दस्त कारनामा था की बगैर किसी बेक ग्राउंड के बगैर किसी से भी जुड़े बगैर , किसी बड़े या माध्यम नाम के बिना ही खबर की खबर के लेख -लाख हज़ारो तक भी पढ़े गए थे वही कमेंट तो मुझे नहीं लगता की नयी हिंदी साइट्स जो किसी बड़े मिडिया ग्रुप की नहीं हे उनमे से शायद ही किसी को इतने कमेंट्स वो भी एक दो लाइन या शब्दों के नहीं बल्कि विचारो वाले वो शायद ही किसी और नयी हिंदी साइट्स पर हो मेरी तो जानकारी नहीं हे

    Reply
  • January 28, 2018 at 6:45 pm
    Permalink

    Raj Kishore26 January at 21:16 · अपने लेखक को पहचानिएराजकिशोर
    बहुत दिनों के बाद हिंदी क्षेत्र से एक अच्छी खबर आयी है। फेसबुक पर इलाहाबाद के धीरेंद्र नाथ लिखते हैं : ‘अभी सोबन्था से लौटा हूँ! मैं आज गुरुवर दूधनाथ सिंह जी के पैतृक गाँव, अपनी प्रिया एवं बच्चों के साथ गया था। सर के छोटे भाई श्री रामअधार सिंह जी से बातचीत हुई। उनके बेटों और नातियों से मिला। सर के विषय में देर तक चर्चा हुई। निःसंदेह, अत्यंत सरल और मानवीय गरिमा से युक्त हैं उनके परिजन। ग्रामप्रधान ने मूर्ति लगाने की घोषणा की है। बलिया जनपद में फेफना-बक्सर रोड पर लबे-सड़क है सोबन्था गाँव। बलिया की भूमि से (हालाँकि सिर्फ बलिया के नहीं) आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और अमरकांत जी की कड़ी में दूधनाथ जी रचनात्मक लेखन में तीसरा महत्वपूर्ण नाम हैं, (भैरव दादा तो हिंदी के विचार स्तंभ हैं) और चौथा नाम केदार नाथ सिंह का है…’
    इस पोस्ट में अच्छी खबर यह है कि दूधनाथ सिंह, जिनकी मृत्यु 81 वर्ष की आयु में इसी हफ्ते हुई है, के गाँव सोबंथा ग्राम प्रधान ने उनकी मूर्ति लगाने का निर्णय किया है। यह एक विरल घटना है। हिंदी में बहुत कम लेखकों की याद में मूर्ति स्थापित की गयी है। यह सौभाग्य प्रेमचंद, निराला, रामवृक्ष बेनीपुरी, रेणु आदि गिने-चुने लेखकों को मिला है। दूधनाथ सिंह बलिया के थे। स्वयं धीरेंद्र नाथ जी बताते हैं कि बलिया की भूमि से (हालाँकि सिर्फ बलिया के नहीं) आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और अमरकांत जी की कड़ी में दूधनाथ जी रचनात्मक लेखन में तीसरा महत्वपूर्ण नाम हैं, (भैरव दादा तो हिंदी के विचार स्तंभ हैं) और चौथा नाम केदार नाथ सिंह का है…।’ मुझे नहीं पता कि बलिया में हजारी प्रसाद द्विवेदी और अमरकांत की मूर्ति लगी है या नहीं। केदारनाथ सिंह की मूर्ति लगने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि सौभाग्यवश वे अभी जीवित हैं और जीवित आदमियों की मूर्ति स्थापित करना इसलिए गलत है कि कोई आदमी जब तक अंतिम साँस न ले ले, तब तक उसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता (राममनोहर लोहिया) । मेरा अनुमान है, द्विवेदी जी और अमरकांत जी की मूर्ति नहीं ही लगी होगी, क्योंकि इसकी परंपरा नहीं रही है। जिन लेखकों की मूर्तियाँ बनी भी हैं, उनकी हालत हर दृष्टि से चिंतनीय है। इससे भी पता चलता है कि हिंदी समाज को अपने लेखकों से कितना लगाव है। दूधनाथ सिंह के गाँव के प्रधान द्वारा की जा रही यह पहल निश्चय ही प्रशंसनीय है।
    कुछ समय पहले दिल्ली में राजेंद्र यादव का निधन हुआ था अज्ञेय जी की मृत्यु भी दिल्ली में हुई थी। हाल ही में कुँवर नारायण जी का दिल्ली में देहांत हुआ। पर जिस इलाके में वे रहते हैं, वहाँ उनकी मूर्ति लगने की न कोई योजना है और न संभावना। साहित्य अकादमी, हिंदी अकादमी, हिंदी भवन में भी ऐसी कोई योजना नहीं है। ये तीनों ही लेखक दूधनाथ सिंह से ज्यादा प्रसिद्ध हैं। इसलिए जिज्ञासा होती है कि दूधनाथ सिंह को यह सौभाग्य कैसे प्राप्त हुआ होगा। मुझे लगता है, इसका एक कारण उनकी गजब की लोकप्रियता थी। इसी पोस्ट में धीरेंद्र नाथ लिखते हैं : ‘हालाँकि कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, आलोचना, संभाषण, ठिठोली और ठहाकेबाजी के साथ जीवंत राजनीतिक-वैचारिक संवाद और लेखकीय संगठनात्मक गतिविधियाँ : इतने मोर्चों पर तो उनका समकालीन शायद ही कोई अन्य लेखक उनके मुकाबले ठहरे। इन सब विधाओं से ऊपर वह एकग लोकप्रिय अध्यापक थे। कहा न, फिराक साहब के बाद, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के संभवत: सर्वाधिक लोकप्रिय अध्यापक। फिर उनका चुंबकीय व्यक्तित्व नये रचनाकारों को अपने इर्द-गिर्द अनायास खींच लेता था। उनके तराशे कई पत्थर समकालीन कविता में चमक रहे हैं। जब आप अँधेरे पर प्रकाश डालते हैं तो वहाँ कोई अँधेरा नहीं मिलता। दूधनाथ सिंह के अँधेरे कोनों की तलाश में निकलने वालों को भी यही हासिल होना है कि हजार बातों के बाद, वह अपनी जनता के हित-अनहित से नाभिनाल-बद्ध इंटेलेक्चुअल थे। हमारे गुरु नितांत मनुष्य थे और हर शब्द, हर पल, हर भाव और भंगिमा में बेहद क्रिएटिव।’ अर्थात वे जितना साहित्य में थे, उससे कम अपने परिवेश में, अपने विश्विद्यालय में और अपने गाँव-जँवार में नहीं। इस सभी से उनका जीवित और आत्मीय संबंध था। इसका कुछ अनुभव मुझे भी है, तब वे वर्धा के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्याय में तब के कुलपति विभूतिनारायण राय के निमंत्रण पर अतिथि लेखक थे और मैं भी इसी रूप में वहाँ रह रहा था। लेकिन सिर्फ लोकप्रियता के कारण उनकी मूर्ति लगना संभव नहीं था। वे लोकप्रिय थे और एक बड़े लेखक भी थे।
    बड़े शहरों में आदमी खो जाता हैं। लेखक भी खो जाता है। जहाँ बड़े-बड़े गुणी जन अधिक संख्या में रहते हैं, वहाँ बेचारे लेखक की क्या बिसात, जिसकी रचनाओं को पढ़े बिना उसे जाना ही नहीं जा सकता। शायद इसीलिए वह चित्रकार, गायक, संगीतकार, फिल्म अभिनेता आदि की तुलना में कम प्रसिद्ध होता है। यह हमारे शहरों के निम्न सांस्कृतिक स्तर का पता देता है। गाँवों में अशिक्षा, अज्ञान और गरीबी है। यह हमारे ग्रामीण क्षेत्र के सांस्कृतिक पिछड़ेपन का एक दुखदायी पहलू है। ऐसे अनुर्वर वातावरण में यह जान कर किसी का भी दिल उछल सकता है कि उत्तर प्रदेश के एक ग्रामप्रधान ने एक लेखक की मूर्ति स्थापित करने का निर्णय किया है। आइए, उसका वंश खूब फले-फूले। देश भर के लोग उससे प्रेणित हों। समाज में लेखकों के लिए जगह बने।
    इस सब के बावजूद मुझे तब ज्यादा खुशी होती, अगर यह समाचार भी सुनने को मिलता कि सोबंथा गाँव में दूधनाथ सिंह के नाम पर एक सार्वजनिक पुस्तकालय भी बनाया जायेगा, जिसमें उनका संपूर्ण साहित्य ही नहीं, अन्य महत्वपूर्ण साहित्य भीरखा जायेगा। मूर्ति से कोई शायद ही उन्हें पहचान सके। लेखक की वास्तविक पहचान उसका चेहरा या उसकी देहयष्टि नहीं है, यह तो उनका साहित्य ही है। इसलिए दूधनाथ जी का साहित्य उनकी मूर्ति से ज्यादा महत्वपूर्ण है। मूर्ति अंततः धूल में मिल जायेगी, पर दूधनाथ जी का साहित्य बचा रहेगा। इसके साथ ही, अन्य साहित्यिक कार्यक्रम भी अपनाये जा सकते हैं, जैसे उनके नाटकों का मंचन, उनकी कविताओं का पाठ और उनके साहित्यिक अवदान पर चर्चा।
    यह बड़े दुख की बात है कि हमारा लेखक हमारे समाज को थोड़ा-बहुत तो पहचानता ही है, पर हमारा समाज अपने लेखक को बिलकुल नहीं पहचानता। जिस चीज की उपेक्षा होती है, वह अंततः खत्म हो जाती है। साहित्य भी अपनी शोक सभा की ओर जा रहा है। एक समय हमारे देश में ही कहा गया था कि साहित्य, संगीत, कला आदि से विहीन व्यक्ति पशु की तरह होता है। आज यह पशुता हमें इतना क्यों आकर्षित कर रही है? दूधनाथ सिंह के लेखन में इसका कुछ जवाब मिलता है, बाकी जवाब तो हमें अपने भीतर से ही खोजना होगा। जाहिर है, उस जवाब से बहुत-से नये प्रश्न उभरेंगे।———————-Krishna Kalpit26 January at 10:09 ·
    जब हमने JLF को नयी ईस्ट इंडिया कंपनी कहा तो कइयों को नागवार गुज़रा । कल JLF के उद्घाटन में अंग्रेज़ी निबन्धकार Pico Iyer ने जो कहा उसको पढ़िये :
    “एक नई तरह का लेखक आ रहा है एक नई तरह के पाठक के लिये । अगर 19वीं शताब्दी में अंग्रेज़ी-लेखन की राजधानी लंदन था तो 20वीं शताब्दी की अंग्रेज़ी-लेखन की राजधानी न्यू यॉर्क थी और 21वीं शताब्दी के अंग्रेज़ी-लेखन की राजधानी मुम्बई होगी !”
    हम फिर कहते हैं कि JLF हमें मानसिक रूप से ग़ुलाम बनाने का षड़्यंत्र है । आप आमंत्रित हैं भारतीय भाषाओं की राजधानी गुलेरी-ग्राम में । समानान्तर साहित्य उत्सव (PLF) आज़ादी की अलख है ।#PLF_2018 ६.————————-पाठको पुराने क्लिक मिट गए हे इसलिए नए पाठको लेखकों के लिए सुचना की ये लेख पुराने नए मिलाकर लगभग सात हज़ार से अधिक तक पढ़ा गया हे -सभी पाठको खासकर नए पाठको को एक जरूरी सूचना की साइट को नया मोबाइल यूज़र फ्रेंडली रूप देने के दौरान हुआ ये की पुराने क्लिक्स की सूचना मिट गयी हे तो नए पाठको के लिए ये सूचना वार्ना वो सोचेंगे की कुछ जगह इतने अधिक कमेंट्स ( मेरे से इतर भी ) और क्लिक इतने कम — ? तो पाठको पुराने क्लिक डिलीट हो गए हे दुःख हे क्योकि ये अफ़ज़लभाई की साइट का जबर्दस्त कारनामा था की बगैर किसी बेक ग्राउंड के बगैर किसी से भी जुड़े बगैर , किसी बड़े या माध्यम नाम के बिना ही खबर की खबर के लेख -लाख हज़ारो तक भी पढ़े गए थे वही कमेंट तो मुझे नहीं लगता की नयी हिंदी साइट्स जो किसी बड़े मिडिया ग्रुप की नहीं हे उनमे से शायद ही किसी को इतने कमेंट्स वो भी एक दो लाइन या शब्दों के नहीं बल्कि विचारो वाले वो शायद ही किसी और नयी हिंदी साइट्स पर हो मेरी तो जानकारी नहीं हे

    Reply
  • February 1, 2018 at 7:16 pm
    Permalink

    Jagadishwar Chaturvedi
    20 hrs ·
    प्रेमचंद और ईश्वर
    हमारे कई मित्रों ने कहा है कि प्रेमचंद तो ईश्वर को मानते थे। हम विनम्रतापूर्वक कहना चाहते हैं कि वे ईश्वर या ऐसे किसी तत्व की उपस्थिति मानने को तैयार नहीं थे जिसे देखा न हो।यह भी सवाल उठा है प्रेमचंद ने इस्लाम धर्म की आलोचना कहां की है ॽ हम इन दोनों सवालों के जवाब खोजने की कोशिश करेंगे। हिन्दू-मुस्लिम भेदभाव का विस्तार से जिक्र करने के बाद प्रेमचंद ने ´मनुष्यता का अकाल´(जमाना, फरवरी 1924) निबंध में लिखा , ´इतिहास में उत्तराधिकार में मिली हुई अदावतें मुश्किल से मरती हैं,लेकिन मरती हैं,अमर नहीं होतीं।´

    उपरोक्त निष्कर्ष निकालने के पहले प्रेमचंद ने ´मनुष्यता का अकाल´ में ही लिखा, ´हमको यह मानने में संकोच नहीं है कि इन दोनों सम्प्रदायों में कशमकश और सन्देह की जड़ें इतिहास में हैं। मुसलमान विजेता थे,हिन्दू विजित।मुसलमानों की तरफ से हिन्दुओं पर अकसर ज्यादतियाँ हुईं और यद्यपि हिन्दुओं ने मौका हाथ आ जाने पर उनका जवाब देने में कोई कसर नहीं रखी,लेकिन कुल मिलाकर यह कहना ही होगा कि मुसलमान बादशाहों ने सख्त से सख्त जुल्म किये। हम यह भी मानते हैं कि मौजूदा हालात में अज़ान और कुर्बानी के मौक़ों पर मुसलमानों की तरफ से ज्यादतियाँ होती हैं और दंगों में भी अक्सर मुसलमानों ही का पलड़ा भारी रहता है।ज्यादातर मुसलमान अब भी ´मेरे दादा सुल्तान थे´नारे लगाता है और हिन्दुओं पर हावी रहने की कोशिश करता रहता है।´

    इसी निबंध में पहलीबार धार्मिक प्रतिस्पर्धा को निशाना बनाते हुए उन्होंने तीखी आलोचना लिखी।उस तरह की आलोचना सिर्फ ऐसा ही लेखक लिख सकता है जिसकी ईश्वर की सत्ता में आस्था न हो,उन्होंने लिखा ,´ दुनियावी मामलों में दबने से आबरू में बट्टा लगता है,दीन-धर्म के मामले में दबने से नहीं।´ आगे लिखा ´यह किसी मज़हब के लिए शान की बात नहीं है कि वह दूसरों की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाये।गौकशी के मामले में हिन्दुओं ने शुरू से अब तक एक अन्यापूर्ण ढंग अख़्तियार किया है। हमको अधिकार है कि जिस जानवर को चाहें पवित्र समझें लेकिन यह उम्मीद रखना कि दूसरे धर्म को माननेवाले भी उसे वैसा ही पवित्र समझें,ख़ामख़ाह दूसरों से सर टकराना है।गाय सारी दुनिया में खायी जाती है,इसके लिए क्या आप सारी दुनिया को गर्दन मार देने क़ाबिल समझेंगेॽ यह किसी खूँ-खार मज़हब के लिए भी शान की बात नहीं हो सकती कि वह सारी दुनिया से दुश्मनी करना सिखाये।´

    आगे लिखा ´ हिन्दुओं को अभी यह जानना बाक़ी है कि इन्सान किसी हैवान से कहीं ज्यादा पवित्र प्राणी है,चाहे वह गोपाल की गाय हो या ईसा का गधा,तो उन्होंने अभी सभ्यता की वर्णमाला भी नहीं समझी।हिन्दुस्तान जैसे कृषि-प्रधान देश के लिए गाय का होना एक वरदान है,मगर आर्थिक दृष्टि के अलावा उसका और कोई महत्व नहीं है।लेकिन गोरक्षा का सारे हो-हल्ले के बावजूद हिन्दुओं ने गोरक्षा का ऐसा सामूहिक प्रयत्न नहीं किया जिससे उनके दावे का व्यावहारिक प्रमाण मिल सकता।गौरक्षिणी सभाएँ कायम करके धार्मिक झगड़े पैदा करना गो रक्षा नहीं है।´

    प्रेमचंद का मानना है ´वर्तमान समय में धर्म विश्वासों के संस्कार का साधन नहीं,राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि का साधन बना लिया गया है।उसकी हैसियत पागलपन की-सी हो गयी है जिसका वसूल है कि सब कुछ अपने लिए और दूसरों के लिए कुछ नहीं।जिस दिन यह आपस की होड़ और दूसरे से आगे बढ़ जाने का ख़याल धर्म से दूर हो जायेगा,उसदिन धर्म-परिवर्तन पर किसी के कान नहीं खड़े होंगे।´

    प्रेमचंद ने हिन्दू और मुसलमानों को धर्म के नाम पर भड़काने वालों और धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों की तीखी आलोचना की है ।´मिर्जापुर कांफ्रेस में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव´(अप्रैल1931) में लिखा ´जब तक अपना हिन्दू या मुसलमान होना न भूल जायेंगे ,जब तक हम अन्य धर्मावलम्बियों के साथ उतना ही प्रेम न करेंगे जितना निज धर्मवालों के साथ करते हैं,सारांश यह कि जब तक हम पंथजनित संकीर्णता से मुक्त न हो जायेंगे,इस बेड़ी को तोड़कर फेंक न देंगे,देश का उद्धार होना असंभव है।´इसमें ही वे आगे कहते हैं ´धर्म को राजनीति से गड़बड़ न कीजिए´। एक अन्य निबंध ´गोलमेज़ परिषद में गोलमाल´ (अक्टूबर1931) में लिखा ´भारत का उद्धार अब इसी में है कि हम राष्ट्र-धर्म के उपासक बनें,विशेष अधिकारों के लिए न लड़कर,समान अधिकारों के लिए लड़ें।हिन्दू या मुसलमान,अछूत या ईसाई बनकर नहीं,भारतीय बनकर संयुक्त उन्नति की ओर अग्रसर हों,अन्यथा हिन्दू मुसलमान,अछूत और सिक्ख सब रसातल को चले जायेंगे।´

    यह भी लिखा ´धर्म का सम्बन्ध मनुष्य से और ईश्वर से है।उसके बीच में देश,जाति और राष्ट्र किसी को भी दखल देने का अधिकार नहीं।हम इस विषय में स्वाधीन हैं।´

    शिवरानी देवी से बातचीत करते हुए प्रेमचंद ने ईश्वर के बारे में कहा ´ईश्वर पर विश्वास नहीं होता कि अगर वह सचमुच ईश्वर है तो क्या दुखियों को दुख देने में ही उसे मजा आता है ॽ फिर भी लोग उसे दयालु कहते हैं.वह सबका पिता है.फला-फूला बाग उजाड़कर वह देखता है और खुश होता है.दया तो उसे आती नहीं .लोगों को रोते देखकर शायद से खुशी ही होती है.जो अपने आश्रितों के दुख पर दुखी न हो.वह कैसा ईश्वर है।´

    आगे वकौल शिवरानी देवी प्रेमचन्द पूछते हैं ´तब कैसे ईश्वर हमसे अन्याय कराता है.जो अच्छा समझे वही हमसे कराये,हम जिससे दुखी न हो सकें.कुछ नहीं.यह सब धोखे में डालने वाली भावनायें हैं,बस अपने को धोखे में डालने के लिए यह सब प्रपंच रचे गए हैं.और नहीं तो हम प्रत्यक्षतःकोई बुरा काम नहीं करते तो लोग कहते हैं .अगले जन्म में बुरा काम किया होगा,उसी का फल है.और मैं कहता हूँ,यह सब गोरखधंधा है।´

    प्रेमचंद मानते थे ´भगवान मन का भूत है,जो इन्सान को कमजोर कर देता है.ईश्वर का आधार अन्धविश्वास है और इस अंधविश्वास में पड़ने से तो रही सही अक्ल भी मारी जाती है।´

    प्रेमचंद का जैनेन्द्र के साथ लगातार पत्र-व्यवहार होता था,दोनों गहरे मित्र थे।प्रेमचन्द ने 9दिसम्बर 1935 को जैनेन्द्र कुमार को लिखा ,´ईश्वर पर विश्वास नहीं आता,कैसे श्रद्धा होती.तुम आस्तिकता की ओर जा रहे हो,जा ही नहीं रहे हो.बल्कि भगत बन गये हो मैं संदेह से पक्का नास्तिक होता जा रहा हूँ।´ और एक दिन जैनेन्द्र कुमार को दो-टूक उत्तर दे दिया, ´जब तक संसार में यह व्यवस्था है,मुझे ईश्वर पर विश्वास नहीं आने काःअगर मेरे झूठ बोलने से किसी की जान बचती है तो मुझे कोई संकोच नहीं होगा.मैं प्रत्येक कार्य को उसके मूल कारण से परखता हूँ.जिससे दूसरों का भला न हो.जिससे दूसरों का नुकसान हो वही झूठ है।´

    मृत्यु से कुछ दिन पहले रोग-शैय्या पर पड़े हुए प्रेमचंद ने जैनेन्द्र कुमार से कहा ´जैनेन्द्रःलोग इस समय ईश्वर को याद किया करते हैं.मुझे भी याद दिलाई जाती है.पर अभी तक मुझे ईश्वर को कष्ट देने की जरूरत नहीं मालूम हुई।´ , ´जैनेन्द्र ! मैं कहचुका हूं.मैं परमात्मा तक नहीं पहुँच सकता.मैं उतना उत्साह नहीं कर सकता.कैसे करूँ जब देखता हूँ,बच्चा बिलख रहा है,रोगी तड़प रहा है.यहाँ भूख है,क्लेश है,ताप है,वह ताप इस दुनिया में कम नहीं है.तब उस दुनिया में मुझे ईश्वर का साम्राज्य नहीं दीखे तो मेरा क्या कसूर हैॽमुश्किल तो है कि ईश्वर को मानकर उसको दयालु भी मानना होगा.मुझे वह दयालुता नहीं दीखती ,तब उस दया सागर में विश्वास कैसे हो.´

    ईश्वरतंत्र पर प्रहार करते हुए प्रेमचंद ने लिखा ´ईश्वर के नाम पर उनके उपासकों ने भूमण्डल पर जो अनर्थ किये हैं,और कर रहे हैं,उनके देखते इस विद्रोह को बहुत पहले उठ खड़ा होना चाहिए था.आदमियों के रहने के लिये शहरों में स्थान नहीं है.मगर ईश्वर और उनके मित्रों और कर्मचारियों के लिए बड़े-बड़े मंदिर चाहिए.आदमी भूखों मर रहे है मगर ईश्वर अच्छे से अच्छा खायेगा,अच्छे से अच्छा पहनेगा और खूब विहार करेगा।´

    ´कर्मभूमि´में गजनवी के मुँह से प्रेमचंद कहलवाते हैं ´मज़हब का दौर खत्म हो रहा है बल्कि यों कहो कि खत्म हो गया है सिर्फ हिन्दुस्तान में इसकी कुछ जान बाकी है.यह मुआशयात का दौर है.अब कौम में दार ब नदार,मालिक और मजदूर अपनी-अपनी जमातें बनायेंगे।´

    शिवरानी देवी से बातचीत के दौरान प्रेमचंद ने नास्तिकता के सम्बन्ध में साफ कहा नास्तिकता का तब तक प्रचार संभव नहीं जब तक जनता सचेत नहीं हो जाती.लिखा ´और फिर जो जनता सदियों से भगवान पर विश्वास किये चली आ रही है,वह यकायक अपने विचार बदल सकती है ॽ अगर एकाएक जनता को कोई भगवान से अलग करना चाहे तो संभव नहीं है।´

    आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने ´इस्लाम का विष वृक्ष´किताब लिखी,इस किताब पर प्रेमचंद ने विरोध करते हुए जैनेन्द्र कुमार को लिखा, ´और इन को क्या हो गया है कि ´इस्लाम का विष-वृक्ष´ही लिख डाला.इसकी एक आलोचना तुम लिखो,वह पुस्तक मेरे पास भेजो.इस कम्युनल प्रोपेगेण्डा का जोरों से मुकाबला करना होगा।´

    प्रेमचन्द का किसी भी परम्परागत धर्म में विश्वास नहीं था,इस सम्बन्ध में उर्दू के प्रसिद्ध विद्वान मुहम्मद आकिल साहब ने लिखा है ´प्रेमचन्दजी ने मुझसे कहा कि मुझे रस्मी मज़हब पर कोई एतबार (विश्वास)नहीं है,पूजा-पाठ और मन्दिरों में जाने का मुझे शौक नहीं.शुरू से मेरी तबियत का यही रंग है. बाज़ लोगों की तबियत मज़हबी होती है.बाज़ लोगों की ला मज़हबी.मैं मज़हबी तबियत रखने वालों को बुरा नहीं कहता,लेकिन मेरी तबियत रस्मी मजहब की पाबन्दी को बिल्कुल गवारा नहीं करती।´

    शिवरानी देवी से मज़हबी सवाल के जवाब में प्रेमचंद ने कहा ´अवश्य मेरे लिए कोई मज़हब नहीं है.मेरा कोई खास मज़हब नहीं है।´ इसका कारण क्या है ॽ इसका कारण हैः´धर्म से ज्यादा द्वेष पैदा करने वाली वस्तु संसार में नहीं है.´ , ´आज दौलत जिस तरह आदमियों का खून बहा रही है,उसी तरह उससे ज्यादा बेदर्दी धर्म ने आदमियों का खून बहाकर की.दौलत कम से कम इतनी निर्दयी नहीं होती,इतनी कठोर नहीं होती,दौलत वही कर रही है जिसकी उससे आशा थी,लेकिन धर्म तो प्रेम का संदेश लेकर आता है और काटता है आदमियों के गले.वह मनुष्य के बीच ऐसी दीवार खड़ी कर देता है,जिसे पार नहीं किया जा सकता।’

    शिवरानी जी ने प्रेमचंद से सवाल किया आप मुसलमानों की ओर हैं या हिन्दुओं की ओर ॽजवाब दियाः´मैं एक इन्सान हूँ और जो इन्सानियत रखता हो,इन्सान का काम करता हो,मैं वही हूँ और मैं उन्हीं लोगों को चाहता हूँ.मेरे दोस्त अगर हिन्दू हैं तो मेरे कम दोस्त मुसलमान भी नहीं हैं और इन दोनों में मेरे नजदीक कोई खास फ़र्क नहीं है.मेरे लिए दोनों बराबर

    Reply
  • February 3, 2018 at 6:34 pm
    Permalink

    Log In
    NBT Blogs
    होमब्लॉग्स राजनीतिदेश-दुनियासाइंस-टेक्नॉलजीसोसाइटीकल्चरखेलमनोरंजनव्यंग्यरिश्ते-नातेपोल बोलपाठशालाअन्य
    Search for:
    साहित्य में लिट-फेस्ट का क्या काम, हो रहा साहित्‍य का बाजारीकरणFebruary 3, 2018, 11:55 AM IST NBT एडिट पेज in नज़रिया | सोसाइटी, मनोरंजन, कल्चर लेखक: संजय कुंदनजनवरी में जयपुर में दो बड़े साहित्यिक आयोजन हुए- जेएलएफ और पीएलएफ। जेएलएफ यानी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल। पीएलएफ का मतलब पैरलल लिटरेचर फेस्टिवल (समानांतर साहित्य उत्सव)। पीएलएफ दरअसल जेएलएफ के विरोध में आयोजित किया गया था। कहा गया कि जेएलएफ ने साहित्य का बाजारीकरण कर दिया है और अपसंस्कृति फैला रहा है। इसके जवाब में पीएलएफ का आयोजन राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ ने किया था। हिंदी के लेखक इसे लेकर बड़े उत्साहित थे, लेकिन जल्द ही उनमें फूट पड़ गई।
    कुछ लोग पीएलएफ का विरोध इस आधार पर करने लगे कि आयोजन के संयोजक अपनी स्त्री विरोधी टिप्पणियों के लिए बदनाम हैं। आयोजन संपन्न होने के बाद संयोजक महोदय ने इसकी व्याख्या इस रूप में की है कि ‘डिग्गी-हॉउस के दरबार हॉल में षड्यंत्र रचा जा रहा था।’ एक वरिष्ठ कवि-आलोचक और एक अखबार के पूर्व संपादक पर पीएलएफ के खिलाफ साजिश रचने का आरोप लगाते हुए उन्होंने यह भी लिखा, ‘यहां तक कि जसम और जलेस के कुछ बिगड़े हुए वीर-बालकों ने भी पीएलएफ के विरुद्ध अफवाहें फैलाने में कोई कमी नहीं आने दी। अब भी वे लगे हुए हैं।’क्या साहित्य का बाजारीकरण हिंदी के सभी साहित्यकारों के लिए एक सामान्य चिंता का विषय नहीं है। फिर जो लोग कल तक जेएलएफ को पानी पी-पीकर कोस रहे थे, वे पीएलएफ की टांग आखिर क्यों खींच रहे हैं। इतना ही नहीं, एक सांस्कृतिक संगठन ने वहीं जन साहित्य पर्व यानी जनसा का आयोजन भी कर दिया। इस तरह हिंदी के लेखक और संस्कृतिकर्मी तीन खेमों में बंटे नजर आए। इससे पहले कुछ लेखकों ने मोदी सरकार की फासीवादी नीतियों के खिलाफ आयोजनों का सिलसिला शुरू किया था। फिर उन्हीं में से कुछ एक-दूसरे को सत्ता का दलाल कहने लगे। समझ में नहीं आता, कौन किसके साथ खड़ा है और कौन किसके विरोध में है और क्यों।हिंदी में इन दिनों एक उत्सववाद चल रहा है। हर छोटे-बड़े शहर में लिट-फेस्ट हो रहा है। एक तरफ कहा जा रहा है कि दक्षिणपंथ के उभार से देश में एक अंधकार युग की शुरुआत हो गई है, दूसरी तरफ साहित्य में उत्सव ही उत्सव है, आनंद-मंगल है। सवाल है कि क्या साहित्य में अचानक कई महादेव सेठ पैदा हो गए हैं जो दोनों हाथों से लेखकों पर पैसे लुटा रहे हैं। या फिर जनता का साहित्य प्रेम उफान पर आ गया है। इसका जवाब नहीं मिल रहा। हां, लेखकों को हवाई यात्रा और बड़े होटलों में ठहरने के अवसर मिल रहे हैं। लेकिन इन उत्सवों में होता क्या है! यहां बहस नहीं बहस की मुद्राएं होती हैं।‘साहित्य बनाम सोशल मीडिया’, ‘साहित्य और स्त्री विमर्श’ जैसे कुछ फड़कते हुए विषय रख लिए जाते हैं। टीवी चर्चा की तरह एक एंकर बैठ जाता है और सवाल करता है। लेखक जवाब दे ही रहा होता है कि उसके आगे से माइक हटा लिया जाता है। सबसे ज्यादा जोर ‘लेखक से मिलिए’ पर दिया जाता है और उसे एक सिलेब्रिटी की तरह पेश किया जाता है। इसमें लेखक शर्म-हया की हदें पारकर बताता है कि उसकी कृति कितनी महान है।अपने प्रॉडक्ट का प्रचार आप खुद करें, इससे निकृष्ट बाजारवाद और क्या होगा। फेस्टिवल में पहुंचे लेखकों से पूछा जाए कि उन्होंने हाल में प्रकाशित कौन-कौन सी किताबें पढ़ी हैं। सब बगलें झांकने लगेंगे। किसी को भी किसी और से कोई मतलब नहीं है। अपने अलावा कोई किसी को लेखक नहीं मानता। सारा विमर्श इन्हीं फेस्टिवल्स और फेसबुक तक सिमट गया है। बहस इस पर होती है कि फलां ने फलां को यानी किस कवि या कवयित्री को क्या कहा। या फिर, उसने अमुक पुरस्कार कैसे ले लिया। सारी चर्चा व्यक्ति केंद्रित है। याद नहीं पड़ता कि किसी बड़े सवाल को लेकर कोई महत्वपूर्ण चर्चा हुई हो, या किसी कृति पर अच्छी बहस हुई हो।
    हिंदी में खेमेबंदियां पहले भी थीं। लंबी-लंबी बहसें चलती थीं। लेकिन उनका जोर व्यक्ति से ज्यादा विचार पर था। कभी ‘परिमल’ ने लघु मानव पर बहस चलाई थी। प्रगतिशीलों ने उसका जवाब दिया था। डॉ. नगेंद्र के रस सिद्धांत का डॉ. नामवर सिंह ने खंडन किया था। कामायनी पर नंददुलारे वाजपेयी और अन्य आलोचकों की राय से मुक्तिबोध ने असहमति जताई थी। उर्वशी पर चली बहस पर तो ‘कल्पना’ ने एक अंक ही निकाल दिया था। फिर मुक्तिबोध पर रामविलास शर्मा और नामवर सिंह में बहस चलीं। लेकिन इन सभी ने एक-दूसरे पर हल्की व्यक्तिगत टिप्पणी शायद ही कभी की हो।हिंदी साहित्य को इस तरह एक आत्ममुग्ध क्लब में बदलने से बचाना होगा। साहित्य हमेशा से मनुष्यता के पक्ष में खड़ा होता आया है। वह उस कमजोर आदमी के पक्ष में खड़ा होता है, जिसकी बाजार में कोई कीमत नहीं होती। यह एक भ्रम है कि इन लिट-फेस्ट्स से साहित्य आगे बढ़ रहा है। अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि जिन शहरों में ऐसे आयोजन हुए वहां साहित्य के पाठक बढ़ गए। आयोजकों की मंशा इन फेस्टिवल्स के जरिये समाज के ताकतवर लोगों के बीच अपनी जगह पक्की करने और एक सोशलाइट के रूप में अपनी छवि बनाने की है। साहित्य तो आम जनता के सहयोग से, उनके बीच रहकर ही आगे बढ़ेगा। अभी सोशल मीडिया और लिट फेस्ट ने साहित्य के सामने एक चुनौती पेश की है। इनसे उबरकर या आलोचनात्मक रिश्ता बनाकर ही लेखक अपना दायित्व निभा सकता है। संजय कुंदन

    Reply
  • February 7, 2018 at 9:17 pm
    Permalink

    Jagadishwar Chaturvedi
    मुंबई में दौलत है और लाखों शिक्षितजन हैं। दिल्ली में पैसा है,शोहरत है,सत्ताकेन्द्र हैं,मध्यवर्गीय लेखकों की हेकड़ी है ,लेकिन बुकफेयर में भीड़ नहीं है। कोलकाता में न सत्ता है,न शोहरत है, न पैसा है,किताबें ही किताबें हैं और लाखों की भीड़ है। किताबों के खरीददार हैं। मुंबई,दिल्ली,मद्रास आदि किसी भी शहर में बुकफेयर में लोग सपरिवार बुकफेयर नहीं जाते लेकिन कोलकाता में सपरिवार बुकफेयर जाने का रिवाज है।

    हिन्दी में जो लोग कहते हैं नवजागरण हो गया या हुआ था वे सही नहीं कहते। पुस्तक संस्कृति विकसित किए बिना नवजागरण नहीं होता। हिन्दी में सबकुछ है लेकिन पुस्तक संस्कृति नहीं है।

    कोलकाता बुकफेयर ज्ञानसमुद्र है। यहां सनसनी नहीं बिकती। यहां किताबें बिकती हैं। जयपुरमेले पर जो संपादक और मीडिया महर्षि वाह-वाह और आह-आह कर रहे थे वे सोचें कि कोलकाता बुकफेयर में सलमान रूशदी को रोका गया ,मीडिया में खबर बनी और बात खत्म हो गयी। साहित्य में सनसनी नहीं होती।
    कोलकाता बुकफेयर में रोज लेखक एक से बढ़कर बेहतर बातें कहते हैं ,लोग सुनते हैं,मीडिया में रिपोर्ट होती है,लेकिन वे सनसनी नहीं बन पातीं। विश्वविख्यात लेखक आए ,अपनी बात कही और चले गए।असल में साहित्य एक कम्युनिकेशन है। वह कलह, सनसनी, पुलिस,थाना,मुकदमा नहीं है।
    कुछ तो कोलकाता बुकफेयर से सीख सकते हैं मीडियावाले !!

    कोलकाता बुकफेयर का कोलकाता के हिन्दी लेखकों,हिन्दी के कॉलेज-विश्वविद्यालय शिक्षकों आदि पर न्यूनतम असर है। इनमें से अधिकांश लोग किताबें नहीं खरीदते और किताबें नहीं पढ़ते। वे हिन्दी में हांकते बहुत हैं। कोलकाता के हिन्दी के तथाकथित लेखक -शिक्षक आपको किताब खरीदने के लिए प्रेरित नहीं करेंगे। यदि आप किताब खरीद रहे हैं या किताब पर बात करना चाहते हैं तो हतोत्साहित जरूर करेंगे।
    मसलन् आपने काशीनाथ सिंह की कोई किताब खरीदी और पूछा कि यह किताब कैसी है तो हिन्दी शिक्षक कहेगा अरे यार ,यह क्या है, मेरी तो कल ही काशीजी से एक घंटा बात हुई थी। पाठक भौंचक्का रह जाता है कि कमाल के लोग हैं ये ,मेरे किताब खरीदने और इनके 1घंटा काशीनाथ से बात करने के बीच में क्या रिश्ता है ?
    कहने का आशय यह कि कोलकाता के हिन्दी के शिक्षकों-लेखकों ने किताब पढ़ने-पढ़ाने और लेखक पर बात करने की संस्कृति को विकसित ही नहीं किया। इसके विपरीत बंगाली शिक्षक-लेखक यह सब नहीं कहता।

    कोलकाता बुकफेयर का सबसे दुखदपक्ष है हिन्दीभाषियों की कम से कम शिरकत। यह शहर मारवाडियों से भरा पड़ा है। इनलोगों की सैंकड़ों संस्थाएं हैं। भारतीय भाषा परिषद जैसी शक्तिशाली संस्था है लेकिन इस संस्था का कोलकाता बुकफेयर में एक स्टॉल तक नहीं है। हिन्दी की पत्रिकाएं कहीं पर भी नजर नहीं आतीं। गिनती की तीन-चार हिन्दी किताबों की दुकान हैं। हिन्दीक्षेत्र के प्रकाशक यहां आते नहीं,कोलकाता में रहने वाले हिन्दीभाषी बुकफेयर जाते नहीं।जबकि कोलकाता में 50 लाख से ज्यादा हिन्दीभाषी लोग रहते हैं। कोलकाता के बाजार पर इनका एकाधिकार है। सारा बिजनेस नियंत्रित करते हैं।
    एक ही शहर में रहने वाले मध्यवर्गीय बंगाली परिवारों और हिन्दीभाषी मध्यवर्गीय परिवारों में बुकफेयर को लेकर अंतर साफ देख सकते हैं। बंगाली बुकफेयर जाता है हिन्दीभाषी नहीं जाता। हिन्दीभाषियों की कमाने-खाने और सोने की आदत ने बुककल्चर को यहां के हिन्दीभाषियों में विकसित नहीं होने दिया।

    Reply
  • February 11, 2018 at 11:42 am
    Permalink

    संघियो के प्रिंस इंदौरी केशु फिरंगी – लिखते हे की अब साहित्य के गढ़ और मठ टूटेंगे – जी नहीं नहीं टूटेंगे सब कुछ वैसा ही रहेगा जैसा पहले था माध्यम बदलने से इंसान नहीं बदल जाएगा बदलाव के लिए शायद इंसान का पूरा डी एन ए ही बदलना पड़ेगा मनोजगत में कोई क्रांति होगी तब ही कुछ बदलेगा वार्ना सब कुछ पहले ही जैसा रहेगा संघियो के प्रिंस इंदौर केशु फिरंगी जिस बदलाव पर खुश हो रहे हे वो उनके अपने हित से जुड़ा हे हम सभी अपने अपने हित को जनहित का नाम देते रहते हे इन्दोरी जिस बदलाव पर खुश हो रहे हे उसमे ऐसा क्या बहुत खुश होने की बात हे मुझे तो समझ नहीं आता आप-को पता भी नहीं चलेगा की कब आप अपना मठ बनाकर उन्ही के जैसे बन जाओगे जिनकी बुराई कर रहे हो जैसे पहले ये मनमानी करते थे अपने जाम भरने वालो वालियो को बड़ा लेखक बनाते थे वैसे ही आप करोगे इस समय भी देखो आप क्या कर रहे हो क्या आप अपने आलावा किसी लेखक को नहीं जानते क्या आपके आलावा कोई ऐसा नहीं हे जिसका आप प्रचार करते हो जिसकी जानकारी आप अपने पाठको को देते हो काफ्का ( और बहुत से भारी भरकम नाम ) की धमकी तो ये रोज देते हे क्या एक भी गुमनाम लोकल लेखक ऐसा नहीं हे जो आपको कुछ अच्छा लगा हो ——- ? नहीं न यहाँ भी लोग उन्ही का प्रचार करते हे जो उनकी ” खुजाते ” हे वार्ना नहीं ( ठीक से याद नहीं पर शायद सूफी संत की बदमिजाजी की खुद को लाइक देने वाली चुटकुले पोस्ट करने वाली एक बबली से लड़की तक को शायद विचारक घोषित कर दिया था ) यहाँ भी कई अच्छे लेखक लेखिकाएं गुमनाम रह जाएंगे जैसे पहले होता था इस नए माध्यम का भी सबसे ज़्यादा फायदा निहित स्वार्थी तत्व ले रहे हे यानी सब कुछ वही जो पहले भी होता आया हे इंसान थोड़ा ही ना चेंज हुआ हे ————————————————————————————— ”Sushobhit Saktawat3 February at 14:33 · साहित्य के गढ़ों और गिरोहों का सर्वनाश हो!”वर्गभेद” हमारी नियति बन चुकी है, उसके बिना जैसे जी ही नहीं सकते!
    यह एक नया “वर्गविभेद” है : “सोशल मीडिया के लेखक” बनाम “मुख्यधारा के प्रकाशन माध्यमों के लेखक”।
    वे बहुत हिक़ारत से कहते हैं–
    -तुम तो “फ़ेसबुकिया” लेखक हो।
    -बतलाइये, कितनी पुस्तकें प्रकाशित हुईं?
    -पुस्तकें तो दूर, यही बतला दीजिये कि “हंस”, “कथादेश”, “ज्ञानोदय”, “पहल”, “आलोचना” में कितनी रचनाएं आईं?
    -आप कौन-सी शिष्य परम्परा से आते हैं, किस घराने के हैं, रीतिबद्ध हैं या रीतिमुक्त, कलावादी हैं या प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष हैं या प्रतिक्रियावादी?
    -आपके गिरोह में कौन-कौन शामिल हैं?
    और यह तब होता रहता है, जब “फ़ेसबुकिये” लेखकों की रचनाओं में निर्लज्जता से सेंध मारकर “हंसादि” पत्रिकाओं में साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेताओंं द्वारा रचनाएं प्रकाशित की जाती रहती हैं!
    हिंदी साहित्य में यह बाध्यता पहले थी, कि अगर आपका “गिरोह” नहीं, “गुरु-परम्परा” नहीं, सुस्पष्ट “राजनीति” नहीं, “न्यस्त स्वार्थ” नहीं तो आप लेखक नहीं बन सकते!
    सोशल मीडिया ने इन बाध्यताओं को ध्वस्त कर दिया है!
    और अचरज नहीं कि दिल्ली विचलित है!
    बड़ा हास्यास्पद लगता है जब “साहित्य अकादमी” पुरस्कार विजेता कविगण फ़ेसबुक पर सतही राजनीतिक टिप्पणियां और अविवेकपूर्ण शेयर्स के माध्यम से 25-30 लाइक्स में सिमटते नज़र आते हैं, जबकि राजपथ की मुख्यधारा से विलग कवि, कथाकार, वृत्तांतकार हज़ार डेढ़ हज़ार लाइक्स के साथ पाठकों के लाड़ले बने हुए हैं।
    हिंदी की अग्रणी साहित्यिक पत्रिकाओं में जितनी रचनाएं आज छप रही हैं और जितने पाठक उन्हें पढ़ रहे हैं, उससे कहीं अधिक, कहीं बेहतर “सोशल मीडिया” पर लिखा जा रहा है और उससे कहीं अधिक संख्या में पाठकों तक वे रचनाएं पहुंच रही हैं!
    “फ़ेसबुकिया लेखक” और “मुख्यधारा के प्रकाशन माध्यमों का लेखक” : यह वर्गविभेद ही अनैतिक है!
    जो भी शब्द की साधना करता है, वह “वाग्देवी” का उपासक होता है। बस इतनी भर परिभाषा है। लेखक की कोई और पहचान नहीं होती!
    आप देखेंगे कि मुख्यधारा की पत्रिकाओं में आपको धीरे-धीरे तथाकथित स्थापित साहित्यकारों के बजाय फ़ेसबुक पर लिखने वाले नवोन्मेषी, ऊर्जस्वित, निष्पक्ष और रचनात्मक लेखकों की रचनाएं पढ़ने को मिलें!
    इसकी शुरुआत पहले ही की जा चुकी है!
    आगे यह परिघटना और ज़ोर पकड़ेगी, ऐसा मेरा विश्वास है!
    साहित्य के गढ़ों और गिरोहों का सर्वनाश हो!
    नई प्रतिभाओं को यथेष्ट और समुचित अवसर मिले!
    यही सही मायनों में वसंत का उत्सव होगा, वाग्देवी की आराधना होगी!
    इति नमस्कारान्ते!
    Sushobhit Singh सक्तावत ”

    Reply
  • February 15, 2018 at 9:35 am
    Permalink

    Ravish Kumar
    13 February at 06:58 ·
    लाइब्रेरी से इतना प्यार !

    दोनों साथ बैठे चुपचाप उन दीवारों को निहार रहे थे जिनकी मैं तस्वीर ले रहा था। अचनाक इस बुज़ुर्ग महिला ने कह दिया कि आप ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से तस्वीर ले रहे हैं।मैं तो सकपका गया। लगा सफाई देने की बक़ायदा अनुमति लेकर आया हूं। उसके बाद वो हंस पड़ी और साथ में उनके प्रेमी पति भी।फिर दोनों ने कहा आपको बुरा तो नहीं लगा। मैंने कहा कि बुरा नहीं लगेगा अगर आप अपनी कहानी बता दें। क्यों ? बस यूं ही आपको जानकर ख़ुद को जान लूंगा इसलिए। अब आगे सुनिये।

    पति शिक्षक हैं। शिक्षकों को ट्रेनिंग देते हैं। पत्नी मिड वाइफ़। दाईं का काम करती हैं। दोनों अमरीका के हर शहर की लाइब्रेरी घूमने जाते हैं। चुपचाप देर तक बैठते हैं। वहां की किताबों, दीवारों को देर तक ताकते हैं। बताया कि वे सिर्फ पब्लिक लाइब्रेरी यानी सरकारी लाइब्रेरी में जाते हैं। उनके लिए घूमने का मतलब लाइब्रेरी घूमना होता है। गांव कस्बे से लेकर अमरीका के हर बड़े शहर की पब्लिक लाइब्रेरी देख चुके हैं। लाइब्रेरी का इतिहास, वास्तुकला जानना अच्छा लगता है।

    दोनों टीवी नहीं देखते। घर में टीवी नहीं है। फोन है मगर सिर्फ आपातकाल में इस्तमाल करते हैं। मैडम ने बताया कि टेक्नालजी को इंसानी रिश्ते के बीच नहीं आने देना चाहिए। रिश्तों को अहसास से भरिए टेकनालजी से नहीं। सुनकर ठिठक गया।

    मैंने उनकी अनुमति से तस्वीर ली और खुद के बारे में बताया। भारत की लाइब्रेरी का भी हाल बताया। ज़ाहिर है बुरा ही बताया। हार्वर्ड जाने से पहले लाइब्रेरी देखने की इच्छा ज़ाहिर की थी। शायद नियति मुझे इन दो प्रेमियों से मिलाना चाहती थी जिन्हें लाइब्रेरी से प्यार है। दोनों के बीच का प्यार भी किसी लाइब्रेरी से कम नहीं लगा। हम वाक़ई अपने जीवन को नहीं जीते हैं। हमें कोई और जी रहा होता है। यह भी अमरीका है। बल्कि ऐसा भी होता हैRavish Kumar added 4 new photos.
    13 hrs ·
    कमल हसन को करीब से देखा। बहुत देर तक हम उनमें उस वासु को खोजते रहे जिसने हिन्दी की सपना से प्यार किया था। कमल हसन बरखा दत्त के सवालों के जवाब में खुलते चले जा रहे थे। रजनी कांत के बारे में साफ कह दिया कि हम दोनों साथ आ सकते हैं मगर डर है रजनी भगवा न हों। सियासी सफ़र शुरू करने से पहले कमल हसन ने अपनी लाइन साफ साफ खींच दी। हिन्दुत्व के नाम पर चल रही ऊटपटाँग राजनीति से विरोध रहेगा। वे राष्ट्रीय राजनीति में दक्षिण के प्रभाव का सपना देख रहे हैं। संकीर्णता का नहीं, उदारता का। उन्होंने कहा कि ज़रूरी नहीं आपका पता तमिलनाडु में हो, इरादा एक हो तो आप इस अभियान के सहयात्री बन सकते हैं। 21 फरवरी को उनकी पार्टी लांच हो रही है। कमल हसन काफी सोच कर बहुत कम बोलते हैं।

    कमल हसन हावर्ड कैनेडी इंडिया कांफ्रेंस के वक्ता थे। उस मौके के लिए मोटी कोर वाली नई धोती पहनकर आए थे। बरखा के सवालों के जवाब देते देते धोती के कोर से निकले एक धागे से उलझ गए। किसी तरह उसे हथेली में फँसा कर तोड़ दिया। धागा तोड़ते तोड़ते कमल ने रजनीकांत को लेकर अपनी झिझक तोड़ दी। कमल को पोलिटिक्स में सैफ़रन पसंद नहीं है। आज कितने स्टार हैं जो यह बात साफ साफ कह सकते हैं। कमल हसन गांधी और पेरियार को अपना गुरु मानते हैं। बार बार सामाजिक न्याय की बात कर रहे थे।

    इंटरव्यू ख़त्म होने के बाद हम कुछ उनकी तरफ बढ़े और कुछ कमल हमारी तरफ। दोनों ने हाथ मज़बूती से थामा और निगाहें किसी पुरानी मुलाकात की तरह टकरा गईं। थोड़ी बातचीत के बीच ही भीड़ ने अपने स्टार को घेर लिया। रात को जब पार्टी में पहुँचे तो उनके सहयोगी ने कहा कि कमल हसन मिलकर अफसोस जताना चाहते हैं कि बातचीत पूरी नहीं हुई। मैं गया तो कमल हसन को हिन्दी बोलता पाया। वही सँभल संभल कर। कमल हसन शाम को धोती से प्रिंस सूट में आ चुके थे। मुझे फिल्म एक दूजे के लिए से प्यार है। भारत को दक्षिण से एक ऐसा राष्ट्रीय नेता चाहिए जो उत्तर के आम लोगों के दिलों पर राज करता हो। हैप्पी वेलेंVineet Kumar updated his status.
    Yesterday at 09:07 ·
    इश्क कीजिए, इएमआई पार्टनर बनकर मत रह जाइए ः

    प्रेम अपने गहरे अर्थों और सुन्दरतम रूप में एक अंतहीन प्रतिरोध है. एक ऐसा प्रतिरोध जो प्रेम करनेवाले के जीवन के साथ ऑक्सीजन की तरह जुड़ा होता है. जो प्रेम करते हुए अपने आसपास के परिवेश को लगातार यह एहसास कराता रहता है कि जो है, जैसा है, उससे बेहतर होने की संभावना है. हम प्रेम करतेte हुए दरअसल कुछ बेहतर कर रहे हैं, मनुष्य से बेहतर मनुष्य हो रहे हैं.

    प्रतिरोध के साथ स्वाभाविक रूप से नत्थी ये प्रेम इसलिए एक बेहतर संभावना है क्योंकि हम अपने-अपने जिस दौर और माहौल में बड़े होकर यहां तक आए हैं, वो प्रेम करने की तो छोड़िए, बेहतर नागरिक होने तक की गुंजाईश को कम करनेवाला रहा है. हम हर दूसरे-तीसरे से कुछ खास शब्दों के प्रयोग किए जाने के बाद से पूछ बैठते हैं- आप बिहार से हो, आप कानपुर के लग रहे हो, पूर्णिया में कहां, अच्छा गुदौलिया चौक में कहां ? राय या रॉय, गोत्र से पता चलेगा, क्लीयर कीजिए..

    कहने को तो कॉस्मपॉलेटिन सिटी में रहने के बावजूद हम आए दिन कोई ऐसी तार खोजते-फिरते हैं जो हमारी पुरानी पहचान से हमें दोबारा से जोड़ दे और हम नए शहर में रहकर भी पुराने घेटो की सुविधा उठा सकें. दिलचस्प है कि ये सब करते हुए हम कहीं से न तो अमानवीय दिखते हैं, न ही कुरूप बल्कि हमारे साथ नास्टैल्जिया का एक ऐसा दरवाजा हुआ करता है कि हम अपनी पूरी चेतना को, समझदारी को इस दरवाजे से वो सब आने देते हैं जो एक नागरिक होने के सारे दावे को ध्वस्त करता है. प्रेम इस अर्थ में हमें बेहतर और अलग करता है कि हम ऐसे मासूम किन्तु खतरनाक दरवाजे के पार जाकर भी बहुत कुछ देख पाते हैं. यदि हम सचमुच ऐसा देखते हुए किसी से जुड़ते हैं, अपनी निजता को उसके आगे खोलकर रख देते हैं तो हम प्रेम हैं और इन सारे आधार को साथ लेकर किसी से जुड़ते हैं तो समझिए हम प्रेम में नहीं, प्रेम-प्रबंधन की एक डील कर रहे होते हैं. किसी भी बिजनेस डील की तरह एक और डील.

    मैं अपने आसपास ऐसे दर्जनों कपल को देखता हूं जिनमे से कुछ के साथ कभी मैं बेहद करीब रहा हूं. करीब रहते हुए मैंने महसूस किया कि उन्होंने प्रेम तो किया, प्रेम को शादी की परिणति तक ले जाने के लिए अपने स्तर पर प्रतिरोध भी लेकिन वो इतना व्यक्तिगत और प्रतिरोध की गली इतनी संकरी होती चली गयी कि कुंडली मिलाकर शादी करनेवाले जीव से अलग नहीं रह गए. वो प्रेम करते हुए भी उतने ही क्षेत्रवादी रह गए, उतने ही आक्रामक, उतने ही स्त्री विरोधी, जड़, पैट्रियार्की, नागरिकता बोध से उतने ही दूर..और तो और अपने स्वाभिमान से उतने ही दूर. ऐसे में उनका प्रेम प्रबंधन किसी दूसरे सच्चे प्रेमी के लिए प्रेरणा और हिम्मत न होकर एक भयानक स्वपन है जो हमें डराता है कि हम प्रेम में होकर इतने क्षुद्र और अपनी ही समझदारी के खिलाफ तो नहीं चले जाएंगे ?

    कई ऐसे कपल को बेहद करीब से देखता हूं जिनके बीच प्रेम का नमक जाने कब बिल्कुल गुम हो गया है. वो एक छत के नीचे तो जरूर रह रहे हैं लेकिन एक-दूसरे के भीतर झांकते रहने की तड़प खत्म हो गयी है. अपने-अपने हिस्से की खिड़की तो है लेकिन वो खिड़की उनके मन में झांकने की इजाजत नहीं देती. जब वो अपनी मासूमियत और बेवकूफियों के साथ प्रेम में थे तो उनकी माचिस की डिब्बी जैसे कमरे से प्रेम छलककर बालकनी, सीढ़ियों तक पसर जाया करता था. अब वो थ्री बी एच के में हैं तो प्रेम महीने की इएमआइ राशि में जाकर सिमट गया है जहां इस बात तक की समझदारी बची हुई है कि कौन अपनी सैलरी से कितनी रकम निकालने जा रहा है ? उनसे मिलते हुए डर भी लगता है कि जिस दिन इएमआइ पूरी हो गयी तो ?..

    आपका, हमारा प्रेम जब तक इस देश के हजारों-लाखों संभावित प्रेमियों को बेखौफ, बिंदास और बेफिक्र नहीं बनाता, हमें अपने प्यार पर लौट-लौटकर विचार करना होगा. हमें रोज खुद से सवाल करना होगा कि क्या हम प्रेम करते हुए आसपास के लोगों को इतना आश्वस्त कर पा रहे हैं कि वो इस दौरान टूटते है, बिखरते हैं, इमोशनल क्राइसिस से गुजरते हैं तो उतनी ही सहजता से हमारे पास आ सकते हैं जितनी आसानी से सर्दी-खांसी-जुकाम में किसी ओपीडी तक चले जाते हैं ?

    प्रेम में होना, प्रेम करना व्यक्तिगत होते हुए भी एक सार्वजनिक अभिव्यक्ति है और ये सार्वजनिक अभिव्यक्ति सामाजिक जिम्मेदारियों के बीच से होकर गुजरती है. दिल्ली जैसे शहर में लाखों लोग प्रेम में होंगे, हजारों ने प्रेम करते हुए शादियां की होंगी लेकिन इसी शहर में एक नौजवान प्रेम करते हुए मार दिया जाता है ? हमारे प्रेम में जब सामाजिक जिम्मेदारियों के रेशे मौजूद और मजबूत होते तो ये इतनी आसानी से हो पाता ? हम प्रेम करते हुए भी अल्पमत में हैं. हमने खुद के लिए जो रिस्क लिया या लेते हैं उसका सामाजिक विस्तार नहीं करते. हम हर दूसरे के प्रेम पर पर्सनल मैटर की लेबल चस्पाकर मुक्त हो जाना चाहते हैं. लेकिन इसी तरह सबका प्रेम पर्सनल होता चला गया तो प्रेम के भीतर के प्रतिरोध का क्या होगा ? शहर में खिड़कियां होंगी लेकिन बाहर झांकना मना है की तख्ती टंगी होती तो उन खिड़कियों में अर्थ कैसे बचे रह पाएंगे ?

    इन सबके बीच आप सबको वेलेंटाइन डे की बहुत-बहुत मुबारकबाद. शिवरात्रि की पूरी रात के उत्सव के बीच एक तथाकथित पाश्चात्य संस्कृति के वाहर वेलेंटाइन डे की मुबारकबाद. भारतीय और पाश्चात्य का ये झगड़ा और विभाजन आपकी-हमारी आखिरी सांस लेने तक चलता रहेगा. बस आप ये महसूस करते रहिए कि मानवीय वृत्तियां ऐसे स्थूल विभाजन से परे होती हैं, भाषा और वाद से भी परे. वो सिर्फ इतना समझती है कि प्रेम हमारी वो आदिम, स्वाभाविक अभिव्यक्ति है जिसके होने पर हम एक सुंदर और संभावित भविष्य की कल्पना कर पाते हैं. हमारी कोशिश हो कि इस संभावित भव
    #वेलेंटाइनडे वाया #शिवरात्रि मुबारकटाइन डे। इश्क़ ही ज़िंदाबाद रहेगा, जहां भी चाहे जितना रहेगा।कमल हसन को उत्तर से ख़ूब सारा प्यार और शुभकामनाएँ ।————————————-Vineet Kumar
    13 February at 16:30 ·
    हर घर एक रेडियो हो, हर देश का अपना आकाशवाणी

    मैं रोज की तरह आज भी आकाशवाणी की सिग्नेचर ट्यून सुन रहा हूं. सुनते-सुनते उस जूनूनी यहूदी रिफ्यूजी वॉल्टर कॉफमैन के बारे में सोचने लग जाता हूं. उसके दिमाग में ऐसी कौन सी बात आयी होगी कि अपना देश छोड़कर भारत जैसे देश से मोहब्बत करने लगा होगा, वो भी तब जबकि वो अंग्रेजों के हाथों गुलाम था. एक औपनिवेशिक सत्ता के भीतर उसे इस मुल्क कौन सी ऐसी खूबसूरत बात जंच गयी होगी कि उसने यहां के शास्त्रीय संगीत और राग का अध्ययन किया होगा और आखिर में( 1936 ई. ) राग शिवरंजिनी को वायलिन की धुन में ढालकर इस देश के रेडियो को सिग्नेचर ट्यून दिया होगा ?

    आकाशवाणी की ये धुन खत्म होने के बाद उस्ताद विस्मिल्लाह खां की इसी राग पर शहनाई सुनने लग जाता हूं. खां साहब जितनी शहनाई डूबकर बजाते हैं,इस देश की गंगा-जमुनी तहजीब की शक्ल उतनी ही मजबूती से हमारे सामने उभरने लग जाती है. हम यकीं कर पाते हैं कि ये मुल्क कई रेशों को, रसों को, रागों को खुद में समेटकर जीता है..

    इन दिनों मैं वापस से विविध भारती, आकाशवाणी सुनने लगा हूं. सुनते हुए लगातार महसूस करता हूं कि इस देश में सरकार के असर से जितना बाकी के मीडिया बदले हैं, उतना तो खुद सरकारी भोंपू कहा जानेवाला आकाशवाणी भी नहीं. वो आज भी इस मुल्क के मिजाज के ज्यादा करीब है. यहां अभी भी श्रोताओं का विभाजन कलीम और कौशल के आधार पर नहीं हुआ है. यहां अभी भी समाज के वो घिसे चेहरे माध्यम से बेदखल नहीं हुए हैं जिन्हें सीधे तौर पर देश की जीडीपी बढ़ाने वाला उपभोक्ता-नागरिक नहीं माना जाता. सिलाई मशीन चलाते हुए, ईंट भठ्ठी में काम करते हुए, ऑटो चलाते हुए और पान का बीड़ा लगाते हुए रेडियो सुननेवाले अभी भी इस देश में न केवल मौजूद हैं बल्कि अपनी फरमाईश के साथ रेडियो पर हाजिरी लगाते हैं. अंदाज बिल्कुल वैसा ही है- ये देश जितना मेरा है, उतना ही इस देश का आकाशवाणी भी. देश और माध्यम के प्रति एक तरह का लगाव और एक तरह की मौजूदगी हमें एक हद तक आश्वस्त करती है कि ये मुल्क चंद न्यूज चैनलों और अखबार के खबरों और कवरेज के स्तर पर बांट दिए जाने से नहीं बंटने जा रहा.

    वॉल्टर कॉफमैन का जूनून और खां साहब की धुनों में घुला हिन्दुस्तान इतनी आसानी से इस मुल्क से नहीं धुलने जा रहा. आकाशवाणी में वो तासीर अभी मौजूद है जिससे गुजरकर आप इस मुल्क को उतना ही लोकतांत्रिक, विविधताओं से भरा हुआ महसूस कर पाते हैं जितना कि संविधान आपको आश्वस्त करता है.

    आकाशवाणी पर सरकारी भोंपू होने के आरोप आज से नहीं लगे हैं. इसे यूं कहें कि कई बार वो इस आरोप से मुक्त होते-होते रह गया. लेकिन इस सरकारीपन के भीतर जो चाहे-अनचाहे जनतंत्र बचा रह गया है वो किसी भी मुल्क के माध्यम के लिए एक बड़ी उपलब्धि है, एक उम्मीद है.

    देश के बाकी निजी न्यूज चैनल, समाचारपत्र धंधा करते हुए भी अपने दर्शकों, पाठकों के भीतर जहर पैदा कर रहे हैं और एक तरह से जनतंत्र के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं, उन्हें कुछ दिन इत्मिनान से बैठकर आकाशवाणी सुनना चाहिए, उन श्रोताओं की आवाज को महसूस करना चाहिए जिनके अंदाज में अभी भी वो लगाव शामिल है जो अपने पडोसी के साथ हुआ करता है. वो भरोसा कायम है जो एक संवैधानिक परिधि के बीच खड़े नागरिक को होता है. कुछ नहीं तो निजी चैनल, अखबार अपना धंधा चमकाते हुए सिर्फ इस सिरे से सर्वे करा लें कि क्या उनके दर्शकों, पाठकों को लगता है कि ये उनका माध्यम है- यकीन जानिए, तब आकाशवाणी उनके लिए एक बड़ी चुनौती के तौर पर सामने खड़ा नजर आएगा.

    मैं इस बात पर फक्र करता हूं कि मैं एक ऐसे मुल्क में जीता हूं जहां तमाम तरह के ऐतिहासिक दाग-धब्बे के बावजूद आकाशवाणी है और दिल्ली शहर में मेरा अपना एक कोना है जहां चीजों के कबाड़ होते जाने के बीच एक चालू हालत में रेडियो है..

    Reply
  • February 20, 2018 at 6:38 pm
    Permalink

    Gaurav Kumar Nigam
    18 February at 19:53 ·
    अपने यहां किसी नौजवान का… आम उच्चशिक्षित, शहरी नौजवान का दो बातें करते हुए दिख जाना लोगो को थोड़ा अचंभित करता है। पहला, हिंदी का साहित्य पढ़ते हुए मिलना और दूसरा, उसका शास्त्रीय संगीत सुनना।
    दोनों की वजह लगभग एक जैसी है…एक तरफ जहां उसे बचपन से ही अपने कोर्स की किताबों से ही सर उठाने की फुरसत नही मिलती वहीं उसके परिवेश की वजह से अगर उसके हाथ गद्य या पद्य की कोई किताब हाथ चढ़ती है तो वो अंग्रेजी में होती है…क्योंकि वो ‘इन थिंग’ है।
    ऐसे में ज़ाहिर है कि उसके लिए कुमार विश्वास ही महाकवि हैं क्योंकि उसने निराला,पंत या कालिदास को पढ़ा ही नही…वो जस्टिन बीबर का लिप सिंक सुनने के लिए घर में झगड़ा करके सत्तर हजार की टिकट खरीदता है क्योंकि अभी उसका उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खान साहब या पंडित भीमसेन जोशी को सुनना बाकी है।
    पर उसकी भी गलती नही है।
    जैसे अच्छे खाने को पहचानने के लिए टेस्ट बड्स को प्रशिक्षित करना पड़ता है वैसे ही अच्छी किताब, अच्छे संगीत को सुनने, समझने के लिए उसके बारे में समझ बढ़ानी पड़ती है।
    स्टेप बाई स्टेप वाला काम है ये।
    जिसका हिंदी साहित्य में जीरो इंटरेस्ट होने के बावजूद कभी कुमारसंभवम तक जाने का दिल करे तो सुरेंद्र मोहन पाठक से शुरू करे…ये फाइनल तो नही पर क्लासिक हिंदी साहित्य के समानांतर माइल स्टोन हैं। हिंदी में कुमारसंभवम तक ना भी जा पाए तो भी शिवानी, बच्चन, साहनी, पंत, निराला, दिनकर, अज्ञेय तक पहुंच बहुत आसान हो जाएगी।
    ऐसे ही जिसका शास्त्रीय संगीत में जीरो इंटरेस्ट हो…सेक्सोफ़ोन के आगे सितार शोर लगता हो वो एक बार इस लिंक को सुन लें। पाइरेट्स ऑफ कैरेबियन का इंडियन कवर है। अगर सुपर बिजी हों तो सिर्फ पांच सेकण्ड्स, 0:54 से 0:59सुन लें…संडे की शाम बन जाएगी।
    ये सिर्फ इंटरेस्ट जगाने के लिए है, आगे खुद ही जाना पड़ेगा पर आगे जाइये या ना जाइये एक बार सुरेंद्र मोहन पाठक या सप्तक तक पहुंच गए तो वहां से वापस नही लौट पाएंगे।
    #surendermohanpathak Gaurav Kumar Nigam
    18 February at 21:21 ·
    ईयर एंड तक आते आते कॉर्पोरेट जॉब छोड़कर अपना बिज़नेस या ‘स्टार्टअप’ शुरू करने का खयाल आना एक आम फेज है, खासकर, कॉर्पोरेट के नए रंगरूटों को अक्सर ये खयाल सताता है…लेकिन हुजूर, बड़े धोखे हैं इस राह में।
    कॉर्पोरेट की कढ़ाही से बिज़नेस के बर्नर पर कूदने से पहले कुछ बातें जान लेना आगे जान बचाने के काम आएगा।
    1- कॉर्पोरेट में मैनेजर, एनालिस्ट, सीनियर जब थे तब थे…बिज़नेस में सिर्फ टीम होती है। यहां हर कोई एक बड़ी मशीनरी का छोटा या बड़ा पुर्जा भर होता है।
    2- ईगो अपने घर के कबाड़खाने में छोड़ कर आइए। कभी कभी चाय बाँटने, टेबल साफ करने की भी नौबत आ सकती है। अपने साम्राज्य के पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर सब खुद ही रोल प्ले करना पड़ सकता है।
    3- या तो कम से कम 3 महीने का राशन पहले से इकठ्ठा रखें या उसके बराबर के पैसे जमा महीने के ज़रूरी बिल्स का अपने पास अलग से रखें…कम से कम तीन महीने का, ताकि भुने चने खाकर पानी पीने की नौबत ना आये।
    4- रिजेक्शन आम बात है और बहुत होता है…इतना कि अगर इतने रिजेक्शन शादी की फ़ोटो भेजने के बाद मिल जाये तो डोकलाम में परमानेंट कुटी बनाकर बसना ही एकमात्र उपाय लगेगा। लेकिन अच्छी बात ये है कि गाड़ी का न्यूट्रल फेज ही लंबा होता है। एक बार गाड़ी गियर में आ गयी तो चल भी पड़ेगी।
    5- पैशन का बेताल कंधे पर लादने से पहले उससे जान लेना जरूरी होगा कि क्या इससे आगे खाना खुराकी, महीने के बिल्स, इमरजेंसी फंड्स और सेविंग हो पाएगी…अगर नही, तो उस पैशन नाम के बेताल को कंधे पर लादकर बिज़नेस के घाट तक लाने से अच्छा है उसे वापस वहीं दफन कर दिया जाए।
    6- डिग्री चाहे जिस ट्रेड की हो पर फाइनेंस, मार्केटिंग, ब्रांडिंग, सेल्स, नेगोशिएशन, टैक्ससेशन और बिज़नेस लॉ के बेसिक्स तो सीखना ही पड़ेगा। ह्यूमन बेहवियर के ‘read between the lines’ सीख पाये तो सोने पर सुहागा।
    7- दूसरों के साथ साथ कभी कभी खुद का खुद के पोटेंशियल पर डाउट होने लगना भी आम बात है। पेशेंस रखकर ही पेशेंट बनने से बचा जा सकता है।
    8- एंट्री प्लान तैयार है ? बहुत बढ़िया। अब लगे हाथ एक एग्जिट प्लान भी तैयार रहे। बड़े से बड़े जहाज़ में भी लाइफ बोट अनिवार्य रूप से मौजूद रहती है।
    -/-/-/-
    बिच्छू का मंत्र सामने है, सांप वाले मंत्र अलग हैं।

    Reply
  • March 2, 2018 at 7:55 pm
    Permalink

    Girish Malviya4 hrs · आज रंग है ऐ मां रंग है ही..
    मेरे महबूब के घर रंग है री…..
    अमीर खुसरो के सारे परिवार ने निजामुद्दीन औलिया साहब से धर्मदीक्षा प्राप्त की थी.. जब अमीर खुसरो महज सात वर्ष के थे तब उनके पिता अमीर सैफ़ुद्दीन महमूद अपने दोनों पुत्रों को लेकर औलिया साहब के दरबार में गये.. वहां अमीर खुसरो ने अपने पिता से आग्रह किया की ‘मुरीद’ इरादा करने वाले को कहते हैं और मेरा इरादा अभी मुरीद होने का नहीं है.. अतः अभी केवल आप ही अंदर जायें और मैं यहीं बाहर बैठता हूं.. अगर निजामुद्दीन चिश्ती वाक़ई कोई सच्चे सूफ़ी हैं तो खुद-बखुद मैं उनका मुरीद बन जाऊंगा..जब खुसरो के पिता भीतर थे तब खुसरो ने बैठे-बैठे दो पद बनाये और सोचा कि अगर औलिया साहब आध्यात्मिक बोध सम्पन्न होंगे तो वह मेरे मन की बात जान लेंगे और अपने द्वारा निर्मित पदों से मुझे उत्तर भी देंगे, और तभी मैं उनसे दीक्षा लूंगा अन्यथा नहीं..
    खुसरो ने जो पद बनाये वह कुछ ऐसे थे –

    “तु आं शाहे कि बर ऐवाने कसरत, कबूतर गर नशीनद बाज गरदद..
    गुरीबे मुस्तमंदे बर-दर आमद, बयायद अंदर्रूं या बाज़ गरदद..”

    मतलब – तू ऐसा शासक है कि यदि तेरे प्रसाद की चोटी पर कबूतर भी बैठे तो तेरी असीम अनुकंपा एवं क्रिपा से बाज बन जाये..

    खुसरो मन में यही सोच रहे थे कि भीतर से संत का एक सेवक आया और खुसरो के सामने यह पद पढ़ा –

    “बयायद अंद र्रूं मरदे हकीकत, कि बामा यकनफ़स हमराज गरदद..
    अगर अबलह बुअद आं मरदे – नादां, अजां राहे कि आमद बाज गरदद..”

    अर्थात – हे रहस्य के अन्वेषक, तुम भीतर आओ, ताकी कुछ समय तक हमारे रहस्य-भागी बन सको.. यदि आगुन्तक अज्ञानी है तो जिस रास्ते से आया है उसी रास्ते लौट जाए..

    खुसरो ने जैसे ही यह पद सुना, वे आत्मविभोर और आह्लादित हो सीधा संत के चरणों में नतमस्तक हो गये और उनसे दीक्षा ली..

    इस घटना के बाद खुसरो जब अपने घर पहूंचे तो वे मस्त होकर झूम रहे थे.. वे गहरे भावावेग में डूबे थे और अपनी माताजी के पास कुछ गुनगुना रहे थे.. आज क़व्वाली और शास्त्रीय व उप-शास्त्रीय संगीत में अमीर खुसरो द्वारा रचित जो “रंग” गाया जाता है वह इसी अवसर का स्मरण स्वरूप है..

    आज रंग है ऐ मां रंग है री,
    मेरे महबूब के घर रंग है री..
    अरे अल्लाह तू है हर,
    मेरे महबूब के घर रंग है री..

    मोहे पीर पायो निजामुद्दीन औलिया,
    निजामुद्दीन औलिया-अलाउद्दीन औलिया..
    अलाउद्दीन औलिया, फ़रीदुद्दीन औलिया,
    फ़रीदुद्दीन औलिया, कुताबुद्दीन औलिया..
    कुताबुद्दीन औलिया, मोइनुद्दीन औलिया,
    मोइनुद्दीन औलिया, मुहैय्योद्दीन औलिया..
    आ मुहैय्योद्दीन औलिया, मुहैय्योद्दीन औलिया..
    वो तो जहां देखो मोरे संग है री..

    अरे ऐ री सखी री,
    वो तो जहां देखो मोरो संग है री..
    मोहे पीर पायो,
    निजामुद्दीन औलिया, आहे, आहे आहे वा..
    मुंह मांगे बर संग है री,
    वो तो मुंह मांगे बर संग है री..
    निजामुद्दीन औलिया जग उजियारो,
    जग उजियारो जगत उजियारो..
    वो तो मुंह मांगे बर संग है री..
    मैं पीर पायो निजामुद्दीन औलिया..

    गंज शकर मोरे संग है री..
    मैं तो ऐसो रंग और नहीं देखयो सखी री..
    मैं तो ऐसी रंग..
    देस-बदेस में ढ़ूंढ़ फिरी हूं, देस-बदेस में..
    आहे, आहे आहे वा,
    ऐ गोरा रंग मन भायो निजामुद्दीन..
    मुंह मांगे बर संग है री..
    सजन मिलावरा इस आंगन मा..
    सजन, सजन तन सजन मिलावरा..
    इस आंगन में उस आंगन में..
    अरे इस आंगन में वो तो,
    उस आंगन में..

    अरे वो तो जहां देखो मोरे संग है री..
    आज रंग है ए मां रंग है री..
    ऐ तोरा रंग मन भायो निजामुद्दीन..
    मैं तो तोरा रंग भायो निजामुद्दीन..
    मुंह मांगे बर संग है री..
    मैं तो ऐसो रंग और नहीं देखी सखी री..
    ऐ महबूब इलाही मैं तो ऐसो रंग और नहीं देखी..
    देस-विदेस में ढ़ूंढ़ फिरी हूं..
    आज रंग है ऐ मां रंग है ही..
    मेरे महबूब के घर रंग है री…..

    ( यह किस्सा आज नेट पर मिला )

    कोक स्टूडियो का यह लिंक जरूर सुनियेगा
    Happy होलीGirish Malviya
    50 mins ·
    मोदी जी को कम से कम इस बात के लिये बधाई तो दी ही जानी चाहिए
    मोदीजी के राज में मुकेश अंबानी की संपत्ति 73% बढ़ गयी है रिलायंस इंडस्ट्रीज के मालिक मुकेश अंबानी 45 बि‍लि‍यन डॉलर (करीब 2.92 लाख करोड़ रुपये) की संपत्‍ति‍ के साथ विदेशी पत्रिका हुरून ग्लोबल की लि‍स्‍ट में दुनिया के टॉप 20 अमीरों में शामिल हो गए है

    आखिरकार रिलायंस ‘समानांतर राज्यसत्ता’ चला रहा है इतना तो हक उसका बनता ही है

    परंजय गुहा ठाकुरता और उनके दो सहयोगियों की लिखी किताब ‘गैस वॉर्स: क्रोनी कैपिटलिज्म एंड दि अंबानीज’ के लोकार्पण समारोह में गोपालकृष्ण गांधी ने यह रिलायंस की समानान्तर राज्यसत्ता का सिद्धांत दिया था उन्होंने अपने उदबोधन में कहा था

    ‘कॉरपोरेट लोभ सारी हदें तोड़ चुका है, वह कुछ भी निगल जाने को तैयार है। हम काले धन को समानांतर अर्थव्यवस्था मानते थे और आज भी यही स्थिति बनी हुई है, लेकिन रिलायंस एक समानांतर राज्यसत्ता ही है। मैं ऐसे किसी देश के बारे में नहीं जानता जहां कोई इकलौती फर्म इतने नग्न रूप में प्राकृतिक, वित्तीय, पेशेवर और मानव संसाधनों पर अपना नियंत्रण रखती है जितना कि अंबानियों की कंपनी यहां करती है। आर्थिक लोकतंत्र की बात करने वाले आंबेडकर से लेकर अभूतपूर्व स्तर पर तकनीकी-वाणिज्यिक एकाधिकार का प्रतिनिधित्व करने वाले अंबानी तक, हम बहुत दूर आ चुके हैंNarendra Nath
    22 hrs ·
    अाज एक पुलिस अधिकारी से बात हो रही थी। राजस्थान कॉडर में आइपीएस हैं। बता रहे थे कि कुछ दिन पहले उनसे मिलने सात जवान मिलने आए थे। सातों ने कहा कि पिछले दस सालों में कभी होली के दौरान परिवार के साथ नहीं रहे। न पूजा में। सातों ने इस बार छुट्टी किसी तरह दिलवाने की मिन्नत की थी। तीन दिन पहले छुट्टी तय भी हो गयी थी। लेकिन आज अंतिम समय में इन सात में 5 की छुट्टी रद्द हो गयी।
    अधिकारी ने कहा कि आज वे उनके नजर नहीं मिला पा रहे थे। वे इस संदर्भ में बता रहे थे कि किस तरह पुलिस जैसे जॉब को हम समाज में डिसक्रेडिट कर देते हैं वे कितने खराब-कठिन हालात में वक्त गुजारते हैं।
    अभी कुछ दिन पहले पुलिस रिफार्म पर बात हो रही थी। यह बात सामने आयी कि कई राज्यों में पुलिस 100 घंटे से अधिक लगातार ड्यूटी करते हैं बिना घर गए उनके लिए आज भी कोई ड्यूटी चार्ट नहीं है।
    सेना के जवान भी इससे कठिन हालात में काम करते हैं। सीमा की रक्षा करते हैं। तो हम उन्हें उचित सम्मान भी देते हैं। लेकिन पुलिस जवानों के इस पहलू को कभी नहीं देखते हैं।
    हां, उनमें कई में नैतिकता की कमी है। पुलिस को बदनाम करने में उनका खुद का भी योगदान रहा होगा। लेकिन इनके बीच इस सच को भी हमें स्वीकार करना हाेगा कि वे भी एक इंकसा हैं और उनके अंदर के इंसान के प्रति कभी तो दो बोल प्यार के बोलना होगा।Vikram Singh Chauhan added 7 new photos.
    Yesterday at 01:49 ·
    सिखों का अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘खालसा ऐड’ एक बार फिर मानवता के मोर्चे पर है।इस बार यह जगह सीरिया है ,जहां हजारों बच्चे हताहत है उन्हें मदद की और इलाज की जरूरत हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा मीडिया सीरिया के युद्ध को अभी हाईलाइट कर रही है लेकिन ‘खालसा ऐड’ यहां पिछले चार सालों से काम कर रही है। 2015 में सर्बिया में सीरियन रिफ्यूजियों की मदद की सराहना विश्व ने भी की थी। ‘खालसा ऐड’ जरूरतमंदों को इलाज और खाना दे रही है।सीरियन रिफ्यूजी और तुर्की रिफ्यूजी की ये तस्वीरें है जो बता रही है मानवता का एक ही धर्म होता है सेवा ,जो ये सिख संगठन बखूबी कर रही है ,बार-बार कर रही है।हमने म्यंमार के रोहिंग्या मुस्लिमों के लिए ‘खालसा ऐड’ की मानवीय तस्वीर देखी थी और अब ये तस्वीरें है।Dilip C Mandal
    8 hrs ·
    मोदी जी एक स्कूल मे visit करने गये, एक Class मे खड़े होकर बोले, बच्चों कोई सवाल पूछना है तो पूछो?

    चिंटू बोला: “मेरे तीन सवाल हैं”

    1. आपने कितनी पढ़ाई की है?
    2. काला धन कब वापस आयेगा?
    3. छोटा मोदी 13,000करोड लेकर कैसे भाग गया ?

    इससे पहले कि मोदी जी जवाब देते Half Time की घंटी बज गयी…

    Half Time के बाद…

    बब्लू खड़ा होकर बोला:

    मेरे पाँच सवाल हैं, तीन तो चिंटू वाले ही हैं और 2 सवाल अन्य जो जुड़ गए..

    4. Half Time की घंटी 20 मिनट पहले कैसे बजी?

    और आख़िरी सवाल…

    5. चिंटू कहाँ है?

    कॉपीDilip C Mandal
    7 hrs ·
    बुरा तो मानेंगे

    उत्तर भारत के बड़े हिस्से में होली का मतलब सवर्ण लफंगों का उत्पात होता था। होलिका दहन के नाम पर गरीबों की झोपड़ी और खाट जला दी जाती थी। होली के दिन लफंगे नशा करके कमजोर तबकों की बस्तियों में जाते और होली खेलने के नाम पर लड़कियों और औरतों के साथ गंदी हरकतें करते। होली के नाम पर छूट थी।

    फिर कई इलाकों में लोकतंत्र आ गया। हालात सुधर गए।

    लेकिन कुछ इलाकों में अंधेरा बना हुआ है।Girish Malviya
    9 hrs ·
    आखिरकार इतने घोटाले एक साथ क्यो बाहर आ रहे है कभी सोचा है आपने ?
    इतने घोटालो का एक साथ सामने आना बता रहा है कि नोटबन्दी के बाद व्यापार धंधो की हालत अचानक से खराब हो गयी है, उन्होने जो लोन लिए हुए थे वे चुका नही पाए इकनॉमी का सुदृढ़ तथ्य यह है कि अर्थव्यवस्था में जब संकुचन आता है तो निवेश का रिटर्न कम होने लगता है. कंपनियां लोन नहीं चुका पाती हैं

    बढ़ती FDI की सुनहरी तस्वीर से आपकों बहलाया जा रहा है लेकिन वास्तविकता यह है कि प्राइवेट कैपिटल इंवेस्टमेंट नही के बराबर है कंपनियों कुछ कमा ही नहीं रहि हैं तो नया निवेश कहा से करेगी, लोन कैसे चुकाएगी,
    पिछले दो सालो में बैड लोन बढ़ता जा रहा है. इस कड़ी में अब छोटी और मझोली कंपनियां भी आ गईं है. बिक्री और मुनाफ़ा गिरने के कारण ये कंपनियां लोन चुकाने में असमर्थ होती जा रही हैं. कई कंपनियां अपनी संपत्ति बेचकर लोन चुकाने जा रही हैं. क्या उनके पास इतनी संपत्ति है, क्या इतने ख़रीदार हैं?

    बैंक की वित्तीय स्थिति चरमरा रही है हम ढहती हुई अर्थव्यवस्था के कगार पर है, सरकार अभी भी शेखचिल्ली के सपने दिखा रही है, व्यापार की हालत जानना हैं तो किसी भी मुख्य बाजार के व्यापारी से पूछ कर देख लीजिए नोटबन्दी के पहले ओर नोटबन्दी के बादGirish Malviya
    20 hrs ·
    Hemant Malviya की वाल से होली पैरोडी

    इक दिन बिक जायेगा मोदी के मोल
    तुझसे तलवाएँगे पकोडे अनमोल

    डुबो दे बैंको को करके अपने ट्विट
    अपने मेहुल को दे दुनियाभर के लोन

    एक दिन लुट जाएगा मोदी के मोल
    तुझसे पिटवाएँगे राष्ट्रवाद के ढोल

    मोदीजी सपने चाहे लाख दिखाये
    झोंगी जी चाहे जितना भगवा रंग पुताये

    ,न रोटी ना पूरी
    ये NPA मजबूरी
    फिर कोई चायवाला काहे घबराये
    तरम पम…
    बैंके जो डूबी है डूबती रहती है
    तू बस बेचारा बन जा सब नेहरू जी पे ढ़ोल

    एक दिन…

    परदे के पीछे बैठी अम्बाईन गोरी
    थाम के एलेक्ट्रोराइल बांड की डोरी
    यह डोरी ना छूटे यह बंधन ना टूटे
    मोर होने वाली है अब मैना है थोड़ी
    तरम पम…

    इकानामी डुबाये तू बैठा क्या
    नोटबन्दी GST से जोड़
    अडानी संग संग डोल

    एक दिन खुल जाएगा तेरा सारा पोल ।
    तू तो घोटाला कर और कांग्रेस पे ढोल
    फिर pm बन जायेगा कर evm में झोल ।

    #पैरोडी_Hemant_malviya

    Reply
  • March 4, 2018 at 2:26 pm
    Permalink

    Tej Pratap
    3 hrs ·
    आज जिन साहित्यिक विभूति फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म दिन है उनकी कहानी ‘पंचलाइट ‘यूपी बोर्ड की हिंदी की किताब में पढ़े हुए अर्सा हो गया जिस पर अब मूवी भी बन चुकी है । कहने को तो लोगों ने उन्हें आंचलिक कथाकार कह कर निपटाने का प्रयास किया है पर सच में उनकी कहानियाँ और उपन्यास किसी अंचल मात्र की कहानी न होकर समग्रता में पूरे देश को समेटे हुए हैं । आंचलिकता इस अर्थ में ठीक है कि उनके उपन्यास मैला आँचल में एक अंचल विशेष के शब्दों का अधिकाधिक प्रयोग हुआ है ।उनके उपन्यास मैला आँचल को ही ले जिसमे आज़ादी के पूर्व और स्वतंत्र भारत की दास्ताँ है जो मेरी गंज के माध्यम से दिखाया गया है एक ऐसा मेरी गंज जो अब तक (2018) मूलभूत सुविधाओं से वंचित है ।एक तरह से शहर गाँवों को लीले जा रहे है चाहे गाँव के पढ़े लिखे तबके का सुख सुविधाओं और अवसर की तलाश में शहर आकर बस जाना हो या मजदूरों का पलायन हो या विभिन्न संसाधनों का गाँव से शहर की तरह बहाव हो ।बिजली गाँव में पैदा होती है (e.gसारे थर्मल प्लांट ग्रामीण इलाकों में ही होते हैं) लेकिन गाँव को मिलती नहीं ।शहर में 24 घंटे तो गाँव में 4 घंटे बिजली दी जाती है । उनकी कहानी पंचलाइट को ही ले जो गाँव में जातीय टोलों और उनके आपसी विद्वेष की कथा कहती हैं ।जब महतो टोला के लोग पंचलाइट लाते हैं और वें उसे जला नहीं पाते हैं तो अन्य टोलो के लोग जातीय विद्वेष के कारण आंनद की अद्भुत अनुभूति करते हैं ।
    बहुत कम साहित्यकार हुए हैं जो ग्रामीण जीवन की सही तस्वीर पेश करते हैं प्रेम चंद और रेणु जी वैसी ही दो महान साहित्यकार हैं जिनका उद्देश्य स्पष्ट था और जो उनके साहित्य में परिलक्षित भी हुआ है ।
    आश्चर्य की बात है इतने बड़े साहित्यकार को उनकी किसी कृति के लिए साहित्य अकेडमी या ज्ञान पीठ जैसे अवार्ड नही मिले ।ज्ञान पीठ तो वैसे एक साहूकार की संस्था द्वारा दिया जाने वाला अवार्ड है इसका न मिलना कोई खास बात नहीं है लेकिन साहित्य एकेडेमी जैसी सरकारी संस्था इतनी बड़ी भूल कैसे कर सकती है यह अकल्पनीय है ।वैसे आज कल साहित्य एकेडेमी की अवार्डी लिस्ट पर प्रश्न उठने लगे हैं (फैक्ट चेक कर लें) ।
    अवार्ड उन्हें भले ही न मिले हो। किसी लेखक के लिए उनके लिखे की प्रासंगिकता,समाज के लिए उपयोगिता और जनता द्वारा पढ़ा जाना ज़्यादा ज़रूरी है न कि लॉबिंग करके प्राप्त किया गया कोई अवार्ड ।
    रेणु जी को उनके जन्म दिन पर नमन ,अभिनंदन ।
    Anant SinhaAnant ji आपने काफी रिसर्च किया है रेणु जी पर ।उनके जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं पर कुछ लिखिए ।
    रेणु जी की माटी के Santosh Patelsantosh ji का भी आज जन्म दिन है ।उनको भी जन्म दिन मुबारक़ हो ।

    See TranslationSadhvi Meenu Jain
    18 hrs ·
    वाकई गरीब और ईमानदार मुख्यमंत्री नही चाहिए , मग़र एक फर्जी चायवाला चलेगा ?

    आखिर जनता चाहती क्या है?
    रहस्य गहराता जा रहा है ?Girish Malviya
    1 hr ·
    यह हैं आपके 25 सालो के वामपंथी शासन की हकीकत, माफ कीजिएगा कॉमरेड,ऐसा वामपंथ आपको ही मुबारक हो

    Jagadishwar Chaturvedi जी की कलम से

    ‘मैंने जबसे कलकत्ता विश्वविद्यालय की नौकरी शुरू की तब से किसी न किसी रुप में त्रिपुरा से संबंध बना रहा’
    ‘अगरतला देखने के बाद मैं बहुत दुखी हुआ , समूचे बाजार में ७०फीसदी से ज्यादा दुकानें लोहे के टीनशैट में चल रही थीं, यदि राजधानी का यह हाल है तो बाकी शहरों का क्याहोगा ? माकपा की गंभीर समस्या है उपभोक्तावाद को नियंत्रण में रखने की। इसके चलते वे इस तरह की नीतियों का अनुसरण करते हैं जिससे उपभोक्तावाद का सही ढंग से विकास ही नहीं हो पाता। उपभोक्तावाद को नियंत्रित करने के लिए तनख़्वाह को नियंत्रित करना जरूरी है। मैं जिस समय अगरतला गया था उस समय वहाँ सिर्फ एक दुमंज़िला मॉल था मुझे बताया गया कि यह दो साल पहले ही बना है।पूरे बाजार को देखकर बेहद निराशा हाथ लगी थी बाजार चारों ओर बूढ़े लोग। इसके विपरीत शिलांग के बाजार को देखें तो तबियत खुश हो जाएगी, पूरा बाजार युवाओं से भरा हुआ, बाजार में हर चीज बेहतरीन ब्रांड की उपलब्ध थी,यदि वाम शासन का मतलब बाजार की रौनक़ का चले जाना है तो ऐसा वाम जितनी जल्दी चला जाए बेहतर है।Girish Malviya
    5 hrs ·
    आर्थिक जगत में लगातार कुछ ऐसा घटता है जो ध्यान खींचता रहता है हम सभी जानते है कि जहाँ मुकेश अम्बानी नयी उचाईयों को छू रहे है वही अनिल अंबानी दीवालिया होने की कगार पर आ गए है

    ओर ऐसे समय मे अनिल अंबानी का रिलायंस बिग टीवी डीटीएच केबल टीवी जगत में एक नयी क्रांति लाने की घोषणा करता है तो कान खड़े हो जाते हैं रिलायंस बिग टीवी मुफ्त में एक एचडी एचईवीसी HD HEVC सेट टॉप बॉक्स दे रहा है और रिलायंस बिग टीवी 5 साल तक जीरो इफेक्टिव लागत में 500 चैनल उपलब्ध करा रहा है।

    यह सुविधा 1 वर्ष तक एचडी चैनलों के लिए भी होगी हालाकि जीरो इफेक्टिव लागत पर रिलायंस बिग टीवी सेट-टॉप-बॉक्स लेने के लिए आपको कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट से 499 रुपये की बुकिंग राशि का भुगतान करना होगा। साथ ही, 1,500 रुपये का भुगतान डीटीएच के इंस्टॉलेशन तथा सेवाएं शुरू होने पर भी करना होगा।
    हालांकि यह 2000 रुपये की कुल राशि 3 साल बाद रीचार्ज के रूप में रिफंडेबल है लेकिन फिर भी यह आम उपभोक्ता के लिए बहुत आकर्षक ऑफर है

    आखिरकार दीवालिया होने की कगार पर खड़ी कम्पनी ऐसा ऑफर ग्राहकों को कैसे दे सकती हैं यह समझ के बाहर की बात है ? क्या यह ऑफर वास्तव में अनिल अंबानी की रिलायंस बिग टीवी वाली कम्पनी दे रही है या कुछ और बात है !

    कुछ समय पहले ही खबर आयी थीं कि अनिल अंबानी की रिलायंस कम्युनिकेशंस ने घोषणा की है कि उसने अपने ‘गैर-प्रमुख डीटीएच कारोबार’ के इक्विटी शेयरों की बिक्री के लिए वीकॉन मीडिया ऐंड टेलीविजन लिमिटेड (वीएमटीएल) के साथ समझौता किया है। इस सौदे के तहत आरकॉम की सहायक इकाई- रिलायंस बिग टीवी लिमिटेड- के 500 कर्मचारी और करीब 12 लाख ग्राहकों को वीएमटीएल हासिल करेगी
    तो क्या यह समझौता करने के बाद का ऑफर है ? शायद ऐसा ही है लेकिन ये नयी कम्पनी कौन है ? कंपनी रजिस्ट्रार के पास उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार वीएमटीएल महज पांच महीने पहले खुद का गठन करते हुए यह नाम लिया है। वीकॉन आईपीए गैसटेकनिक लिमिटेड (वीआईजीएल) ने अपने नाम और कारोबारी उद्देश्यों में बदलाव किया है ताकि उसमें उत्पादन, वितरण और टेलीविजन सामग्रियों की बिक्री को शामिल किया जा सके

    वीआईजीएल मूल रूप से नई दिल्ली की कंपनी है जो नाइट्रोजन और ऑक्सीजन जैसी औद्योगिक गैसों के उत्पादन कारोबार में शामिल रही है। कंपनी रजिस्ट्रार के दस्तावेजों से पता चलता है कि कंपनी का प्रदर्शन काफी समय से कमजोर हो रहा था। साल 2016-17 के दौरान उसका परिचालन राजस्व 86 फीसदी घटकर 11.41 लाख रुपये रह गया जो एक साल पहले 82.09 लाख रुपये रहा था। इससे पहले के दो वर्षों में कंपनी के परिचालन राजस्व में क्रमश: 43 फीसदी और 52 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी मार्च 2017 में समाप्त वर्ष के दौरान कंपनी का शुद्ध घाटा बढ़कर 20.14 करोड़ रुपये हो गया जो एक साल पहले 9.70 लाख रुपये रहा था

    अब आप खुद सोचिए कि ऐसी कम्पनी को अनिल अंबानी अपने 12 लाख ग्राहकों वाली कम्पनी बेच देते हैं जिसके ग्राहक औसतन 500 रुपये महीना तो इस डीटीएच सुविधा का देते होंगे यानी हर महीने 600 करोड़ कमाने वाली कम्पनी अपने आपको एक ऐसी कंपनी को बेच रही हैं जिसका 5 महीने पहले तक कोई नामलेवा भी नही था और जिसके पास अधिकृत तौर पर 5 लाख रुपये की शेयर पूंजी है और उसकी पेड-अप इक्विटी पूंजी करीब 1,78,500 रुपये है, कमाल है, ओर आते ही वह इतना बड़ा ऑफर भी दे देती है……….

    दया , कुछ तो गड़बड़ है……….

    Reply
  • March 9, 2018 at 2:13 pm
    Permalink

    Praveen Jha
    5 March at 22:20 ·
    जब से हाथ में मोबाइल आया, कागज के किताब छूट गए। यह सत्य है। पर यह भी सत्य है कि अनाप-शनाप ही सही, औसत भारतीय अब दस-बारह घंटे प्रति दिन अक्षर पढ़ता है। जब मोबाइल नहीं था, तो लोग सुबह का अखबार पढ़ते, कुछ इंडिया-टुडे वगैरा मैगज़ीन पलट लिया, और कुछ उपन्यास। प्रतिदिन इतने अक्षर नहीं पढ़ते, जितना अब पढ़ते हैं। पर अब यह आंखें कचरा अधिक पढ़ती है। एक दिन के दस हजार शब्द में पांच हजार त्रिपुरा पर पढ़ लिया, जो महज दो सौ शब्दों में निपट सकता था।

    यही हाल चीन का है, जहाँ हर व्यक्ति मोबाइल में डूबा है। पर ताज्जुब है कि चीन में विश्व की सबसे अधिक किताबें छपतीं है। भारत से लगभग पांच गुणा अधिक, और कहीं सस्ती। यह कैसे संभव है कि मोबाइल में डूबा देश पांच गुणा अधिक किताबें पढ़ जाता है?

    चीन मोबाइल पर ही पढ़ता है। और गर भारत में यह परंपरा नहीं आई, तो भारत में किताबें दिनानुदिन घटती जाएगी, और मोबाइल पर कचड़ा बढ़ता जाएगा। इससे बचने के दो ही उपाय हैं- एक कि भारतीय मोबाइल पर मात्र एक-दो घंटे दें और बाकी के आठ घंटे अखबार/मैगजीन/उपन्यास पढ़ें। और दूसरा कि भारतीय दस घंटे मोबाइल पर रहें, पर मोबाइल पर कचरा न पढ़ किताबें पढ़ें। सभी किताबें चीन की तरह मोबाइल पर ही हो। आपको क्या लगता है कि कौन सा उपाय संभव है? बेहतर नहीं पूछ रहा। क्या संभव है, यह पूछ रहा हूँ।

    मैं आज भी पुराने दिनों को याद कर खुश होता हूँ, पर यह मान चुका हूँ कि अब मोबाइल पर घंटे बढ़ते ही जाएँगें। अभी-अभी मोबाइल पर ही एक किताब खत्म की – ताहिर शाह की ‘सॉर्सरर्स ऐप्रेंटिस’। पर वो भारत में प्रकाशित नहीं है। भारत में मोबाइल पर किताबें कम छपती हैं। मोबाइल पर फ़ेसबुक-व्हाट्सऐप्प में ही वक्त गुजरता है। हम फ़ेसबुक पर हज़ारों शब्द पढ़ लें, पर किताब के पन्ने पढ़ने में अजीब लगे, यह विरोधाभास ही तो है। सब जूझ ही रहे हैं, पर चीन और अमरीका कुछ तेज अडैप्ट हो रहे हैं। भारत चाहे तो इस डिज़िटल दुनिया में सबको मात दे दे, पर मोह-पाश में अटका पड़ा है।Praveen Jha
    28 February at 13:27 ·
    ‘आनंद’ फ़िल्म में रमेश देव जी के डॉक्टर किरदार सिगरेट पीते हुए मरीजों को ऊट-पटांग दवाएँ और फंडे दे रहे हैं, तो अमिताभ बच्चन का किरदार नाराज हो जाता है। वो समझाते हैं कि इन्हीं अमीर मरीजों के पैसे से मैं गरीबों की सेवा भी करता हूँ।

    यह स्थिति भारत में आम है। कॉरपोरेट हस्पताल में ‘होल बॉडी सी.टी. स्कैन’ से अमीर मरीजों को बीस हजार रूपए में यह बता देते कि कैंसर नहीं है। अच्छे-खासे मस्त खाए-पीए लोग क्ष-किरण के सागर में नहा आए, और मिला कुछ नहीं। मैनें जब विरोध किया, तो आखिर जगह ही बदलनी पड़ी। पर जगह बदल कर भी कहाँ जाएँगें? गरीबों के मसीहा के पास?

    कोई कैसे मुफ्त में हृदय सर्जरी किए जा रहा है? कैसे मँहगे वेंटीलेटर का खर्च निकाल रहा है? बीस रूपए ही की दवा कहाँ से ला रहा है? बीस रूपए मिले कहाँ से? किसी को बीस का चालीस में बेच के? डॉक्टर रॉबिनहुड बने घूम रहे हैं।

    पर इसमें उन लोगों का क्या जो अंतराष्ट्रीय स्थापित मानकों पर चलना चाहते हैं? न राक्षस बनना चाहते हैं, न भगवान। बस मनुष्य बन कर जीना चाहते हैंPraveen Jha
    3 March at 07:37 ·
    कल एक मित्र की गाड़ी पार्किंग से सौ मीटर तक चलाने के लिए बुलावा आया। होली पर कुछ शराब पी ली, तो उनके लिए एक मीटर भी चलाना यहाँ अवैध है। ऐसे मौकों पर जो लोग नहीं पीते, उनका काम यह जनसेवा ही है।

    आज तड़के लगभग पांच बजे सुबह से भारत से सी.टी. स्कैन आ रहे हैं। वहाँ होली मन रही है, तो मैं ही पढ़ रहा हूँ। साथ में मरीज की हिस्ट्री भी आ रही है, जो नहीं बता सकता, पर मोटा-मोटी कहता हूँ। मोटरसाइकल सवार दो युवा और एक बच्ची बुरी तरह गिरते हैं, युवा बच जाते हैं। अमूमन सब के सर ही फूटे, चोट का साइज अलग-अलग है। आज सर्जन वगैरा भी अलग मूड में है, तो सेवाएँ ठीक से नहीं चल रही। और केस भी अधिक हैं।

    भारत में प्रतिदिन 28 मोटरसाइकल सवार मर जाते हैं। और इसके दस गुणा विकलांग होते हैं। इसमें अमूमन युवा, नवविवाहित या कम उम्र के विवाहित, और उनके छोटे बच्चे। मोटरसाइकल भारत में हैं भी बहुत। सपाट सड़कों पर यूँ ही एक त्यौहार के दिन मर जाना? यह कैसे संभव है?

    यह ठान लें कि शराब की एक बूंद भी पी ली, तो गाड़ी वो चलाएगा जिसने न पी हो। फिर कई लोगों को नींद अच्छी आएगी। मुझे भी होली की अगली सुबह यह सी.टी. स्कैन न देखने होंगें। सब मस्त रहेंगें।

    लोग पूछते हैं कि यूरोप में लोग शराब पीते हैं, फिर सौ साल कैसे जीते हैं? वीक-डे पर नहीं पीते, स्वस्थ रहने के उपक्रम करते हैं और वो शराब पीकर गाड़ी भी तो नहीं चलाते।Praveen Jha
    22 February at 06:19 ·
    वीभत्स-पोस्ट
    ……
    मेडिकल कॉलेज़ फर्स्ट-यर में कंकाल खरीदने गया, तो पुणे में काफी मंहगा था। सोचा दरभंगा से ही ठीक रहेगा। वहाँ सात-आठ सौ रूपए में सुना बढ़िया कंकाल मिल जाते हैं। यह सुन दो मराठी मित्रों ने भी ऑर्डर दे दिया।

    जब दरभंगा पहुँचा तो अस्पताल के कर्मचारी ने कहा कि अभी ताजा मुर्दा तो कोई नहीं, पर शाम तक कोई न कोई आ जाएगा। मरते तो लोग रोज ही हैं, पर हर लाश लावारिश नहीं होती कि कंकाल निकाली जा सके। संभव है कि कुछ परिजन लाश बेचते भी हों। मरे व्यक्ति की कीमत मिल जाए, उसकी हड्डियों का व्यापार हो, और कोई उसकी हड्डियों से चिकित्सक बन जाए तो क्या बुरा है?

    जब कंकाल आखिर अगले दिन मिला तो उससे मांस पूरी तरह नहीं उतरा था। दरअसल हड्डियों को वाश और सुखाया ठीक नहीं गया था। छत पर कुछ अदौरी-कुम्हरौरी* सूख रहे थे। साथ ही हड्डियाँ भी लगा दी। छोटे शहरों में छतें पास-पास होती हैं। पड़ोसी डर गए।

    जब ट्रेन से लौटने लगा तो भी गंध पूरी तरह गया नहीं था। यात्रियों को शक हुआ कि डब्बे में क्या है, तो आर.पी.एफ़ को खबर दी। वो आए तो मैनें कह दिया कि हड्डियाँ हैं, अभी सूखी नहीं है, डॉक्टरी का सामान है। दिखाऊँ? पुलिस वाले भी मुँह पर रूमाल रख निकल लिए। मरने के बाद मनुष्य सर्वथा घृणित हो ही जाता है।

    योगिनी-तंत्र में तो कंकाल से पूजा भी होती है। अब पता नहीं, कोई करता है या नहीं।

    (एक मित्र से कंकाल संवादोपरांत)Praveen Jha
    20 February at 14:57 ·
    एक नमाजी हृदय सर्जन थे। नमाजी इसलिए भी क्योंकि ऑपरेशन से पहले भी नमाज पढ़ने बैठ जाते। उनकी चर्चा पहले भी की है वो मरीजों के परिजनों को धकिया कर मंदिर भेजते। उनका फंडा था कि ‘ट्रिपल इफ़ेक्ट’ होगा। एक उनका, एक उनके नमाज का, और एक मंदिर का।

    इस ‘इफ़ेक्ट’ की चर्चा रियूनियन द्वीप के संस्मरणों में भी है, जहाँ दो बार श्राद्ध होता है। एक बार ईसाई रीति से, एक बार तमिल हिन्दू रीति से। बर्मा की हिंदु मंदिरों पर जब मूल निवासियों ने उत्पात शुरू किया, तो इन्होनें हर मंदिर में बुद्ध की बड़ी प्रतिमा लगा दी। उत्पात रूक गया।

    मेरे एक अकादमिक गुरू जनेऊ पहन पूजा करने बैठते, तो उसी में जीसस भी। पत्नी ईसाई थी, और पूजा-घर एक ही था। यह बात एक भाजपा के बड़े नेता के संबंध में भी सुनी, जिनकी पत्नी ईसाई हैं।

    बैंगलूर के व्हाइटफ़ील्ड में पुटपर्ती वाले साईबाबा के ‘लोगो’ में तो ईसाई, मुस्लिम, सिख, यहूदी सब डले हुए हैं। शायद तभी वो जमैका और गुयाना में लोकप्रिय हैं। गांधी द्वारा मंदिर-प्रांगण में बहुधार्मिक प्रार्थना करना भी उनके प्रति आक्रोश और मृत्यु का कारण बना।

    मेरे पूजाघर में एक ही धर्म के तमाम देवी-देवता हैं। बाकी किसी के लिए जगह भी बननी कठिन है। पर यूँ ही कुछ याद आ गया, कि दुनिया में यह भी होता है।

    Reply
  • March 9, 2018 at 4:14 pm
    Permalink

    Vivek Shukla
    27 December 2017 ·
    दिल्ली-6 में क्यों नहीं दफन किए गए चचा गालिब
    आज चचा गालिब का जन्म दिन है, पर मैं बात करूंगा उनके अपने घर से इतनी दूर दफनाए जाने की। मुझे एक बात कभी समझ नहीं आई कि उन्हें दफन उनके बल्लीमरान स्थित घर से करीब आठ-नौ मील दूर बस्ती निजामउद्दीन में क्यों किया गया… उनके घर के करीब तीन कब्रिस्तान थे,हैं। पहला, कब्रिस्तान कदम शरीफ। ये कुतुब रोड पर है। इधर ही जौक चिरनिद्रा में हैं। दूसरा, इंडियन एक्सप्रेस के पीछे कब्रिस्तान एहले- इस्लाम। तीसरा, एलएनजेपी अस्पताल के पीछे स्थित कब्रिस्तान। इन तीनों में वे दफन हो सकते थे। मिर्जा गालिब से जुड़ी दो शख्सियतों से कई बार मिला। पहला नाम हकीम अब्दुल हामिद साहब का लूंगा। उनसे मेरे घनिष्ठ संबंध थे। हमदर्द दवाखाना के संस्थापक हकीम साहब ने गालिब साहब के मकबरे का सौंदर्यीकरण करवाया था। मैंने एक बार ये सवाल बड़ी हिम्मत करके उनसे पूछा। इससे पहले कि वे कोई जवाब देते उनके कौटिल्य मार्ग वाले बंगले के निजी कक्ष में उनसे मिलने बहुत से लोग आ गए। बात आई-गई हो गई। गालिब पर श्री पवन कुमार वर्मा ने भी भरपूर काम किया है। उनसे एक-दो बार मिला। लेकिन, उनसे भी अपना सवाल नहीं पूछ सका। मेरे सवाल का संभावित जवाब दिया दिग्गज पत्रकार-लेखक Manmohan Sharma जी ने। वे मानते हैं कि चूंकि हजरत निजामउद्दीन के प्रति गालिब साहब की निष्ठा थी, इसलिए उनके परिवार वाले उन्हें दफनाने के लिए निजामउद्दीन ले गए होंगे।Vivek Shukla
    2 February ·
    अलविदा ‘मिस्टर करीम’
    हाजी जहूरउद्दीन (85) को आप ‘मिस्टर करीम’ कह सकते हैं। अगर राजधानी में मुगलई फूड खाने वालों की दशकों तक करीम होटल पहली पसंद रहा तो इसका श्रेय हाजी जहूरउद्दीन को मिलना चाहिए। उनके हाल ही में इंतकाल के साथ ही ब्रांड करीम को खड़ा करने वाला शख्स चला गया है। सच बोलते थे वे। एक बार कहने लगे कि “ हम तो पंजाबियों के इस शहर में आने की वजह से बड़े बन गए, वर्ना हमें कौन पूछता था… छोटा-मोटा धंधा करके रोटी कमा रहे थे।” दरअसल सन 1947 से पहले यहां के मुसलमानों की जेब में तो पैसा ही नहीँ था और पुरानी दिल्ली के हिन्दू ( वैश्य और जैन) गोश्त खाते नहीं थे। लेकिन, सब कुछ बदल गया पंजाबियों के कारण। उन्होंने दिल्ली वालों की खानपान की आदतों को प्रभावित किया। ये लगभग सभी मांसाहारी थे। ये सच है कि करीम के मुगलई व्यंजनों, खासतौर पर रोगनजोश और बर्रा, के साथ चटोरे ऱिफ्यूजियों ने दोनों हाथों से न्याय किया। इसके साथ ही, हाजी साहब जानने लगे थे कि अगर उन्होंने पंजाबियों की पसंदीदा डिश बटर चिकन को अपने करीम में तैयार करवाना शुरू नहीं किया तो उनके हाथ से निकल जाएँगे पंजाबी। ये वर्ग ही तो उनके धंधे की जान था। निर्विवाद रूप से बटर चिकन को दिल्ली में पेशावर से आए कुंदन लाल गुजराल ने अपने दरियागंज के मोती महल रेस्त्रां में चालू किया था। वे कमाल के शेफ थे। फिऱ तो बटर चिकन दिल्ली वालों की पहली पसंद बन गया। इसलिए हाजी साहब ने बटर चिकन को करीम में भी बेचना शुरू किया। उधर, मोती महल ने रोगन जोश और बर्रा को अपने मैन्यू में जोड़ा। हाजी साहब और कुंदन लाल गुजराल मित्र और प्रतिद्वंद्वी दोनों थे। रोगन जोश और बर्रा पंजाबियों ने दिल्ली में करीम में ही पहली बार चखा था। हाजी साहब खाटी दिल्ली वाले थे। हालांकि करीम कुनबे के विस्तार होने के बाद इस परिवार के कई सदस्य राजधानी-एनसीआर में चले गए। वहां पर ही करीम की शाखाएं खोल लीं, पर हाजी साहब ने जामा मस्जिद के करीम से अपने संबंध को कभी नहीं तोड़ा। वे खुद रोज अपने कारीगरों को बताते थे कि फलां-फलां डिश में कितनी मात्रा में मसाले डलेंगे। पर ये मानना होगा कि जामा मस्जिद के बाहर के करीम कोई बहुत आगे नहीं बढ़े। उनकी डिशेज में हाजी साहब वाले करीम वाला जायका भी दूर-दूर तक नहीं है।

    Reply
  • March 26, 2018 at 7:27 am
    Permalink

    पाठको पुराने क्लिक्स की सुचना डिलीट हो गयी हे ये लेख नए पुराने मिलकर आठ हज़ार से ज़्यादा क्लिक था ————————–

    शम्भू नाथ शुक्ल
    रा.सा. ही बने रहे राहुल सांकृत्यायन!
    राहुल संकृत्यायन के बचपन का नाम था केदार नाथ और पिता का नाम गोबर्धन। चूंकि वे ब्राह्मणों के पांडेय कुल में पैदा हुए इसलिए नाम पड़ा- केदारनाथ पांडेय। अपने नाना रामशरण पाठक के यहाँ ही यह बालक उनके गाँव पंदहा में अक्सर रहता था। नाना चूँकि फौज में रह चुके थे, इसलिए ब्राह्मणी परंपरा के विरुद्ध वे सामिष भोजी थे। केदार को सामिष भोजन पसंद भी था, इसलिए जब छपरा के परसा मठ के महंत इस बालक को अपने मठ का उत्ताधिकारी बना कर ले गए, तो नाम रखा- रामोदर दास (यानी राम जी का उदर अथवा पेट) साधु। इस मठ की ओर से वे दक्षिण भारत गए। मदरास, तिरुमाला, मदुरै सब घूमे। वहां उन्होंने एक तो तमिल सीख ली और सारस्वत संस्कृत व्याकरण तथा ‘हिन्दू’ पढ़कर अंग्रेजी। बाद में वे सनातन छोड़कर आर्यसमाज में आए। आगरा के आर्य मुसाफिर पाठशाला में मौलवी महेश प्रसाद से अरबी-फ़ारसी सीखी और जल्द ही आर्य समाज छोड़कर बौद्ध बन गए तथा नाम रखा राहुल संकृत्यायन। राहुल गौतम बुद्ध के बेटे का नाम था. सांकृत्यायन बालक केदार के गोत्र का नाम था। इस तरह बाबा रामोदार दास (रा.सा.) बौद्ध बन कर भी वे रा.सा. (राहुल संकृत्यायन) ही रहे। तिब्बत गए और वहां से तमाम बौद्ध ग्रन्थ चोरी-छिपे जान पर खेलकर लाये तथा पटना आकर इतिहासकार एवं पुरातत्त्वविद केपी जायसवाल को सौंप दिए। फिर मार्क्सवादी हो गए। मार्क्सवादियों की जड़ता, उनकी अल्पसंख्यक नीति और भाषा के सवाल पर उनके ढुलमुल रवैये को छोड़कर वे फिर से वहीँ आ गए, जहाँ से चले थे। वे जीवन भर घूमते रहे। पृथ्वी के एक कोने से दूसरे कोने तक। उन्होंने सब कुछ बदला, नहीं बदला तो अपना भाषा प्रेम। उन्होंने लिखा है- ’’मैंने नाम बदला, वेशभूषा बदली, खान-पान बदला, संप्रदाय बदला लेकिन हिन्दी के संबंध में मैंने विचारों में कोई परिवर्तन नहीं किया।“
    हिंदी के बाबत उन्होंने लिखा है- “हिंदी, अंग्रेजी के बाद दुनिया के अधिक संख्यावाले लोगों की भाषा है। इसका साहित्य 750 इसवी से शुरू होता है और सरहपा, कन्हापा, गोरखनाथ, चन्द्र, कबीर, जायसी, सूर, तुलसी, बिहारी, हरिश्चंद्र, जैसे कवि और लल्लूलाल, प्रेमचंद जैसे लेखक दिए हैं इसका भविष्य अत्यंत उज्जवल, भूत से भी अधिक प्रशस्त है। हिंदी भाषी लोग भूत से ही नहीं आज भी सब से अधिक प्रवास निरत जाति हैं। गायना (दक्षिण अमेरिका), फिजी, मर्शेस, दक्षिण अफ्रीका, तक लाखों की संख्या में आज भी हिंदी भाषा भाषी फैले हुए हैं।”
    राहुल जी बेजोड़ घुमक्कड़ थे, वे लिखते हैं- “मेरी समझ में दुनिया की सर्वश्रेष्ठ वस्तु है घुमक्कड़ी। घुमक्कड़ से बढ़कर व्यक्ति और समाज का कोई हितकारी नहीं हो सकता। दुनिया दुख में हो चाहे सुख में, सभी समय यदि सहारा पाती है तो घुमक्कड़ों की ही ओर से। प्राकृतिक आदिम मनुष्य परम घुमक्कड़ था। आधुनिक काल में घुमक्कड़ों के काम की बात कहने की आवश्यकता है, क्योंकि लोगों ने घुमक्कड़ों की कृतियों को चुरा के उन्हें गला फाड़–फाड़कर अपने नाम से प्रकाशित किया। जिससे दुनिया जानने लगी कि वस्तुत: तेली के कोल्हू के बैल ही दुनिया में सब कुछ करते हैं। आधुनिक विज्ञान में चार्ल्स डारविन का स्थान बहुत ऊँचा है। उसने प्राणियों की उत्पत्ति और मानव–वंश के विकास पर ही अद्वितीय खोज नहीं की, बल्कि कहना चाहिए कि सभी विज्ञानों को डारविन के प्रकाश में दिशा बदलनी पड़ी। लेकिन, क्या डारविन अपने महान आविष्कारों को कर सकता था, यदि उसने घुमक्कड़ी का व्रत न लिया होता। आदमी की घुमक्कड़ी ने बहुत बार खून की नदियाँ बहायी है, इसमें संदेह नहीं और घुमक्कड़ों से हम हरगिज नहीं चाहेंगे कि वे खून के रास्ते को पकड़ें। किन्तु घुमक्कड़ों के काफले न आते जाते, तो सुस्त मानव जातियाँ सो जाती और पशु से ऊपर नहीं उठ पाती। अमेरिका अधिकतर निर्जन सा पड़ा था। एशिया के कूपमंडूक को घुमक्कड़ धर्म की महिमा भूल गयी, इसलिए उन्होंने अमेरिका पर अपनी झंडी नहीं गाड़ी। दो शताब्दियों पहले तक आस्ट्रेलिया खाली पड़ा था। चीन, भारत को सभ्यता का बड़ा गर्व है, लेकिन इनको इतनी अक्ल नहीं आयी कि जाकर वहाँ अपना झंडा गाड़ आते।“
    (राहुल पर संस्मरण अभी जारी हैं)

    Reply
  • April 1, 2018 at 10:18 pm
    Permalink

    Anita Misra
    20 March at 22:08 ·
    स्टीफन स्वाइग की जीवनी पढ़ते हुए जानकर हैरत हुई कि वियना के लोग किस कदर बौद्धिक रूप से जागरूक समाज थे। वे थियेटर में होते , किताबे खरीदते ..बेहद कलाप्रेमी लोग…सबसे ज्यादा हैरान हुई ये पढ़कर कि बर्ग थियटर के पुराने मंच को जब गिराने का फैसला किया गया तो वियना का सारा समाज अपना दुख प्रकट करने वहां हाज़िर था। लोग उस मंच की लकड़ी , लट्ठे , शीशे आदि अपने साथ प्रतीक के रूप में ले गए।
    ये बात बस इसलिये बताई कि हम उस तरह से अपनी संस्कृति के लिए अपने लेखकों कलाकारों ( फिल्मी को छोड़कर) , मंच के लिए सेंसिटिव लोग नही है। बल्कि कोई दूसरा ऐसा करता है तो उसका मजाक उड़ाते हैं।
    हमारे बीच एक बड़ा कवि गया तो अब कौन कैसे श्रद्दांजलि दे रहा ये मुद्दा बन रहा। लोग उनकी कविताएं शेयर कर रहें तो हर बात से खुन्नस खाने वाले लोग लिख रहे ये देखो जिसने नाम भी नही सुना वो भी दुखी हो रहा …जबकि ये अच्छी बात है जिसने नाम भी नही सुना वो भी सोशल मीडिया की वजह से नाम सुनकर उन्हें सर्च कर रहा , उनके बारे में जान रहा उन्हें पढ़ रहा है। …..ठीक है आपकी कला , संस्कृति , लेखन में दिलचस्पी नही है। आप वियना वासी जैसे सेंसिटिव नही हो सकते लेकिन सामान्य मनुष्य की तरह तो हो सकते हैं जिसे एनिमल नही रैशनल एनिमल समझा जाये ।

    Reply
  • April 4, 2018 at 7:56 pm
    Permalink

    Pushya Mitra is with Manzoor Ahtesham.Yesterday at 12:23 · हैप्पी बर्थडे मंजूर सर…
    आज मेरे दो प्रिय कथाकारों का जन्म दिन है. पहले तो निर्मल वर्मा हैं. जिनका उपन्यास वे दिन एक जमाने में मुझे इतना पसंद था कि कई साल तक सर्दियों के मौसम में धूप में चटाई बिछाकर पढ़ता था. नौकरीपेशा होने के बाद यह सुख नसीब होना बंद हो गया. उनकी कहानियां, उनका आखिरी उपन्यास अंतिम अरण्य, उनके लिखे यात्रा वृत्तांत, सब मुझे पसंद हैं. जीवन में रोज घटित होने वाली छोटी-छोटी घटनाओं के बीच हमारा जीवन जिस तरह हर क्षण बदलता रहता है, जो अक्सरहां अनकहा रह जाता है, उसे वे बहुत बारीकी से पकड़ते हैं. उनकी यही खासियत मुझे उनका दीवाना बनाती है.
    मगर आज निर्मल वर्मा की नहीं, एक दूसरे कथाकार की बात करूंगा. वे हैं मंजूर एहतेशाम. यह मेरा सौभाग्य था कि भोपाल में पांच साल रहने के दौरान मुझे उनसे मिलने का और उनके देखने-समझने, उनसे बतियाने, बहस करने का सुख और सामीप्य मिला. इसलिए उनके बारे में कुछ बातें कहने की पात्रता भी हासिल कर पाया हूं.
    निजी रिश्तों से इतर मैं पहले उनके साहित्य पर बातें करना चाहूंगा. उनके दो उपन्यास मुझे खास तौर पर बहुत प्रिय हैं. पहला सूखा बरगद और दूसरा दास्तान-ए-लापता. दोनों उपन्यासों का विषय और उसकी पृष्ठभूमि कमोबेस एक सी है. मसला एक ही है, भारत में आजाद ख्याल और आजाद तबीयत मुसलिम बिरादरी का धीरे-धीरे कट्टरपंथ के कब्जे में फंसते चले जाना. और इस मसले की पड़ताल करने हुए उन वजहों को तलाशना जिसके कारण ऐसा हुआ. ये वजहें सिर्फ अंदरूनी इनसिक्योरिटी नहीं हैं, बाहरी दवाब भी है. दुनिया भर के इस्लामी हलकों में बढ़ती रूढिवादिता है तो आम भारतीयों के सेकुलर मिजाज का क्षरण भी. यहां की राजनीति में कट्टर हिंदुत्व का बढ़ना भी. हां, सूखा बरगद जहां इस विषय पर फोकस्ड है, वहीं बाद में लिखा गया उपन्यास ‘दास्तान-ए-लापता’ इस बहस को आगे ले जाता है.
    दास्तान-ए-लापता खास तौर पर मुझे इसलिए पसंद है, क्योंकि यह इन्सानी जमीर के लापता होने की कहानी है. और इसे उन्होंने एक दिलचस्प किस्से में ढाला है.
    यह किताब मूलतः एक ऐसे व्यक्ति के बारे में है जो अपने अतिसंवेदनशील मिजाज के कारण दुनियावी तौर-तरीकों से तालमेल नहीं बिठा पाता है. दो-दो इंजीनियरिंग कालेज में एडमिशन होने के बावजूद कोर्स पूरा नहीं कर पाता. एक खूबसूरत और जहीन युवती के मुहब्बत को इसलिए ठुकरा देता है, क्योंकि उसने उसे पहले बहन मान लिया था. दो बार बिजनेस का असफल तजुर्बा लेता है और जमा पूंजी और आत्म विश्वास लुटाकर घर बैठ जाता है. उसके निकम्मेपन से आजिज आकर उसकी बीवी अपनी बेटियों के साथ घर छोड़कर चली जाती है और तलाक लेने का फैसला कर बैठती है. इन घटनाओं से गुजरते हुए वह खुद अहसास ए लापता के गिरफ्त में पड़ जाता है.
    वह महसूस करने लगता है कि वह धीरे-धीरे लापता हो रहा है. वह अपने डॉक्टर से बार-बार मिलता है और उसे अपने इस अजीबोगरीब अहसास के बारे में बताता है. मगर डॉक्टर हर बार उसे यह कह कर लौटा देता है कि उसे कोई बीमारी नहीं है, न शारीरिक और न ही मानसिक. मगर इस लापता होने के अहसास के कारण उस मरीज का जीवन उसके हाथ से लगातार फिसलता चला जाता है.
    जब मैंने यह नॉवेल पढ़कर मंजूर सर को फोन लगाया तो उन्होंने कहा कि यह किरदार उनका लापता है. हम सब के अपने-अपने लापता होते हैं, जो जिंदगी की आपाधापी हमारे अंदर ही कहीं खो जाते हैं और हम भी उन्हें भूल जाते हैं.
    भोपाल में रहने के दौरान अक्सर मेरा मंजूर सर से मिलना होता था. हमीदिया रोड स्थित उनकी दुकान शिल्पकार फर्नीचर में कई टेबुलों-कुरसियों-पलंगों और सोफों को पार करने के बाद उनका एक केबिन हुआ करता था, जहां धीमी रोशनी में वे बैठकर अपने अजीजों से बतियाते थे. जैसे ही मालूम होता कि कोई उनका परिचित मिलने आया है, वे झटकते हुए आते और आगवानी करके अंदर ले जाते. फिर घंटे-दो घंटे बाद जब वापसी की बात होती तो बड़ी आत्मीयता से बाहर छोड़ आते. इस बीच चाय-सिगरेट और कभी-कभार नास्ता चलता और दोस्तोएवस्की और गांधी और जिन्नाह और निर्मल वर्मा, शानी वगैरह का जिक्र होता रहता.
    बाद में उन्हें मध्य प्रदेश की सरकार ने संभवतः निराला सृजनपीठ का अध्यक्ष बना दिया और रवींद्र भवन के सामने के सरकारी बंगलों में उन्हें एक छोटा सा बंगला मिल गया. फिर वहां मुलाकात होने लगी. इस बीच मैं भोपाल से बारस्ते दिल्ली-पंजाब फिर से बिहार आ गया और मुलाकातों का सिलसिला बंद हो गया. कुछ दिन फोन पर बातचीत हुई.
    फिर एक बार काफी दिनों के बाद ऐसा लगा कि सर से मिलना जरूरी है. भोपाल गया और एक रात उनके घर वही शिल्पकार फर्नीचर के ऊपर बने उनके फ्लैट में रहना हुआ. ढेर सारी बातें हुईं. और फिर कुछ रोज पहले वे जब फेसबुक पर आये तो फिर से उनकी नजदीकी हासिल हो गयी.
    तकरीबन 17-18 साल के इस छिटपुट मुलाकातों की वजह से मैं यह मानता हूं कि उनके जैसे आत्मीय इंसान बहुत कम मिलते हैं, जो मुझ जैसे नये लोगों को सुनने और हमारे सवालों का जवाब देने को लेकर इतने गंभीर होते हैं. और आप जब मिलो तो यह अहसास दिलाते हैं कि आपका अपना महत्व है. वे अपने बारे में बहुत कम बातें करते हैं, बार-बार कुरेदने पर ही कुछ बताते हैं. बांकी इधर-उधर की ही बातें होती हैं.
    यह संयोग है कि निर्मल वर्मा उनके भी प्रिय कथाकार हैं. उनसे और गगन गिल से उनकी नजदीकियां भी रही हैं. और आज ही उनका जन्मदिन भी है. शारीरिक डील डौल को छोड़ दिया जाये तो मुझे निर्मल वर्मा और मंजूर सर का चेहरा भी कमोबेस एक जैसा ही लगता है. मंजूर सर लंबे-चौड़े हैं, बिल्कुल पठानों की तरह और हैं भी पठान. मगर कथन की बारीकियां दोनों की एक जैसी है.
    इस तेज तर्रार नयी हिंदी वाले आंदोलन में वे किसी बरगद की तरह खड़े हैं और उनकी कलम आज भी चल रही है. यह हम सबों की खुशकिस्मती है. आशा है फिर कोई बेहतरीन कृति हमें पढ़ने के लिए मिलेगी और मुझे बार-बार शिल्पकार फर्नीचर के ऊपर वाले उस फ्लैट की ड्राइंग रूम में बैठकर उनसे बतियाने का अवसर भी मिलता रहेगा. हैप्पी बर्थडे सर…

    Reply
  • April 22, 2018 at 8:33 am
    Permalink

    Shambhu Nath
    59 mins ·
    दिल्ली जो इक शहर था……..!
    पहले मुशायरे का मतलब सिर्फ़ मुसलमानों का जमावड़ा ही नहीं होता था। मीर तकी मीर दिल्ली के मशहूर शायर थे। कुछ कमाने-धमाने की गरज से लखनऊ के एक मुशायरे में गए। लखनऊ तब संपन्न लोगों का शहर था और मीर गए थे तब तक फटीचर हो चुके शहर दिल्ली से। लखनऊ में उस समय शिया मुसलमान, हिंदू कायस्थ, बनिये, खत्री और पंडित लोग फ़ारसी के विद्वान थे। किसी ने मीर की देहाती और उजबेक जैसी चाल-ढाल देखकर पूछ लिया- ‘यो को आय, हूश अइस घुस आवा महफ़िल मा!’
    मीर ने अपना परिचय दिया। बाद में हिंदी वालों ने अपने अखबार/रिसाले में इस मुशायरे की रिपोर्टिंग इस तरह की।
    (यह दस्तावेज़ इतिहासकार श्री अनूप शुक्ल के संग्रहालय से मिला है। इसमें काल तिथि सन् में नहीं संवत में दर्ज है पर भाषा ठेठ हिंदुस्तानी है)
    Shambhu Nath
    12 hrs ·
    मेरे पिताजी स्वर्गीय रामकिशोर शुक्ल भी खूब थे। वे कानपुर की स्वदेशी काटन मिल में एक अकुशल मजदूर थे। मगर मजदूर चेतना से लैस। स्वदेशी काटन मिल के मालिक जैपुरिया सेठ से मजदूर नाखुश रहते थे इसलिए वहां अक्सर हड़ताल हो जाया करती थी। मालिक भी मजदूर विरोधी कुछ ज्यादा ही थे। एक बार जब वहां पर मिस्टर भावसिंहका जनरल मैनेजर थे मजूदरों ने हड़ताल कर दी। मजदूरों में जोश भरने का काम मेरे पिता जी को सौंपा गया। उन्होंने उस समय एक कुंडलिया लिखी जो बड़ी लोकप्रिय रही। उनकी पूरी कुंडलिया तो मुझे याद नहीं पर उसकी कुछ लाइनें शेयर कर रहा हूं-

    “मँगतूराम की मिल चलें धनीराम कंगाल।
    अल्ला तेरे राज में कैसा मचा बवाल॥
    कह किशोर कविराय बजा जब श्रम का डंका।
    कुर्सी पर से उछल पड़े मिस्टर भवसंका॥”
    (स्वदेशी काटन मिल दरअसल मँगतूराम जैपुरिया ने अंग्रेज मिस्टर हार्समैन से 1946 में सिर्फ पौने तीन करोड़ में खरीद ली थी उस वक्त जब अंग्रेज अपनी संपत्तियां औने-पौने दामों में बेचकर जा रहे थे।)
    Shambhu Nath
    19 hrs ·
    संस्कृत भाषा और गेरुआ वस्त्र दोनों आजकल अछूत की तरह ट्रीट किए जा रहे हैं। अगर आपने संस्कृत के पक्ष में एक भी शब्द बोला तो कुछ अधर्म निरपेक्ष धुरंधर टूट पड़ेंगे। और कहीं गेरुआ वस्त्र पहन लिए तब तो खैर नहीं। अब मुझे यही दोनों पसंद हैं। दसवीं के बोर्ड में संस्कृत लेकर मैने 85 पर्सेंट अंक पाए थे और अंग्रेजी में ग्रेस मार्क्स मिले थे। इसके बाद साइंस ले ली इसलिए संस्कृत तो छूट गई पर गणित में वही मजा आया और गणित में 90 पर्सेंट मिले तथा अंग्रेजी में मात्र 31 मगर पास कर दिए गए। पूरी नौकरी में मैने गेरुआ कुर्ता ही पहना। लेकिन किसी ने मुझे संघ का आदमी नहीं कहा और न ही यह कहा कि मैं हिंदू हूं या ब्राह्मण सेवी हूं। मैं अकेला व्यक्ति जनसत्ता में था जिसने अपनी दम पर जनसत्ता से वाल्मीकियों, यादवों और मुसलमानों को जोड़ा और इसके लिए दफ्तर में दुत्कार पाई। मगर आज इन्हीं दोनों के कारण आभासी मार्क्सवादी मुझसे किनारा कर रहे हैं।
    अब इन्हें कौन समझाए कि सारे अवैदिक लोग भी संस्कृत को प्रयोग में लाते रहे और उनके आयुर्वेद तथा ज्योतिष के ग्रन्थ इन्हीं अवैदिकों की ही देन है। बौद्घ दर्शन का सबसे क्रांतिकारी पक्ष शून्यवाद के प्रणेता नागार्जुन ने संस्कृत में ही इसे उकेरा। और बौद्घ साहित्यिक अश्वघोष ने अपने नाटक संस्कृत में ही लिखे हैं। अश्वघोष पहले ऐसे व्यक्ति थे जिनके पिता का नाम नहीं मां का ही नाम था और वे उसे बताने में कतई संकोच नहीं करते थे। अश्वघोष ने अपने हर नाटक के अंत में लिखा है- “इति साकेतकस्य सुपर्णाक्षीपुत्र अश्वघोष विरचितं”। चाणक्य का अर्थशास्त्र अब बेमानी बताएं जाएंगे और रामायण व महाभारत जैसे सामाजिक काव्य भी। कालिदास अब बाहर कर दिए जाएंगे तथा कल्हण का इतिहास विस्मृत कर दिया जाएगा। यही नहीं जो विवेकशील बुद्घिजीवी संस्कृत के पक्ष मंत उतरेगा उसे संघी बताकर जमात से बाहर कर दिया जाएगा। शायद इसीलिए एक मार्क्सवादी आलोचक को अपनी पोस्ट वापस लेनी पड़ी। आज भी मध्यकाल में पनपे सारे क्रांतिकारी संप्रदाय अपने अखाड़ों में संस्कृत शिक्षा अनिवार्य बताते हैं। सिखों के दो संप्रदाय उदासीन और निर्मल के अखाड़ों में संस्कृत पाठशालाएं चलती हैं। बौद्घों में भी संस्कृत शिक्षण अनिवार्य है तथा जैन ग्रन्थों में भी आयुर्वेद और खानपान से जुड़ा माधव शास्त्र संस्कृत में है। तथा तमाम अन्य दुर्लभ पुस्तकें भी।
    इसी तरह गेरुआ वस्त्र लगभग सारे भारतीय संप्रदाय धारण करते हैं। अकेले शैव, वैष्णव व शाक्त ही नहीं बल्कि कई सधुक्कड़ी संप्रदाय भी। सिखों में भी गेरुआ धारण किया जाता है, बौद्घों में भी और आर्य समाज के साधु भी गेरुआ धारण करते हैं। जैन संप्रदाय में पीतांबर धारण करना शुभ है तो शांति कुंज हरिद्घार के बटुक भी पीत वस्त्र ही धारण करते हैं। तमाम सूफी मत के लोग भी बसंती व केसरिया रंग के वस्त्र पहनते हैं। पर अब शायद यह सधुक्कड़ी परंपरा विस्मृत कर दी जाएगी।
    Himanshu Kumar
    15 hrs · Paprola ·
    भारत में मुसलमान आए हैं

    तब भारत के लोगों को कपड़ा सिलना आया

    भारत सुई की खोज तक नहीं कर पाया था

    उससे पहले तक भारतीय लोग नीचे धोती लपेटते थे

    सर पर पगड़ी लपेटते थे

    औरतें साड़ी लपेट लेती थी

    भारत के लोगों को कपड़ा सिलना नहीं आता था

    सिर्फ लपेटना आता था

    अब गप्प मार रहे हैं कि महाभारत के समय हमारे पास तो इंटरनेट भी था

    और हमारे पास तो पुष्पक विमान था

    इस तरह की बातें करना बंद करो

    अपने बच्चों को हनुमान का सूरज खाना और तीर से बारिश करना जैसी कहानियों से मुक्ति दिलाओ

    उन्हें विज्ञान पढ़ाओ

    दुनिया के साथ मिल जुलकर रहना सिखाओ

    छोड़ दो बेवकूफियां

    कहीं नहीं पहुंच पाओगे गाल बजाने से

    दुनिया भर में भद्द पिट रही है तुम्हारी
    Shamshad Elahee Shams
    13 April at 08:47 ·
    आज के ही दिन, यानि पिछले शुक्रवार को शाम ४-५ बजे के बीच कनाडा के सेस्केचुआन प्रान्त में एक कहर बरपा था. जूनियर हाकी की एक टीम जिसका मैच रविवार को था हमबोल्ट शहर से करीब २०० किलोमीटर दूर
    दूसरे कस्बे निपाविन जाते वक्त एक ट्रेक्टर ट्रेलर से टकरा गयी, बस में २८ लोग थे १५ मर गए. मरने वालो में हमबोल्ट ब्रोंकोस टीम के कोच और कप्तान भी थे. नौजवान खिलाडियों की उम्र १६-२१ बरस के बीच थी.
    हमबोल्ट की आबादी कुल ६००० है, इस छोटे से कस्बेनुमा शहर में एक साथ १५ लाशें आये तो क्या हश्र होगा? खिलाडियों की आर्थिक मदद करने के लिए एक लड़की ने ‘गो फण्ड मी’ वेब साईट पर एक मुहीम चलाई जिसने कनाडा में इतिहास रच दिया. ८० देशो से ज्यादा लोगों के इस भयंकर दुर्घटना से दिल पसीजे और अब तक १० मिलियन डालर से ज्यादा इकठ्ठा हो चुके हैं जो कनाडा के लिए एक कीर्तिमान है.
    हाकी कनाडा के जन जीवन की ब्लड लाइन है, जब बर्फ की सर्द जकडन में जीवन ‘ठंडा’ हो जाता है उसे हॉकी ही किक देती है. शहर से जरा सा दूर चले जाते ही अगर कुछ जोड़ने वाला, गतिशील करने वाला कोई मनोरंजक उपक्रम है तो वह है हॉकी. और हॉकी के नौजवान खिलाड़ी वह भी एक साथ १५ किसी हासदे की नज़र हो जाए तो इनके लिए क़यामत से कम नहीं.
    एक शाम को पूरे कनाडा में लोगो ने अपने घरो से बाहर अपनी हाकियां रख दी; हमबोल्ट ब्रोंकोस खिलाडियों की याद में, कि हम नहीं जानते कि अब वे कहाँ हैं, जहाँ भी होंगे – हॉकी खेलेंगे तो हमारी हॉकी आ कर ले जाए.
    पिछले एक सप्ताह से मैं लोकल कम्यूनिस्टो की फेसबुक गतिविधियों पर नज़र रख रहा हूँ और इस बात पर क्षुब्ध हूँ कि इस मुद्दे पर किसी कामी की कलम नहीं चली. बेचारे सीरिया, फलस्तीन, वेनेजुएला, उत्तर कोरिया ,क्यूबा के विधवा विलाप में लगे हैं. सोचता हूँ इनकी असफलताओं के पीछे क्या कारण हो सकते है ? हमें तो जनता के संवेगों का संवाहक होना था उसे स्वर देना था उसके सुख दुःख के क्षणों में उसके साथ कंधे से कंधा मिलाना था. लेकिन हो क्या रहा है ? संवेदना मुक्त राजनीतिक मुद्दे न तो तुम्हे जनता के बीच खड़ा होने देते और जब जनता के बीच तुम्हारे पैर ही नहीं तो संवेग कहाँ से समझोगे? देसी कामियों का तो पूछिए ही मत बेचारे भारत के कम्यूनिस्टो के दुखो में रात दिन दुबले हुए जा रहे है, यहाँ तो जैसे होटल में रहते है, लोकल किसी मसले से ऐसे भागते-बिदकते है जैसे ‘लाल’ का सांड से बैर.
    बारहाल ६ अप्रेल को कनाडा में हुई इस बस दुर्घटना जिसने १५ होनहार नौजवानों को मौत दी और बाकी बचे हुए लोग भी बड़े भयंकर घायल है, इस घटना ने मुझे अब तक न जाने कितनी बार विचलित किया है. इसके बाद ही भारत में स्कूल के बच्चो की बस खाई में गिरी जिसमे २७ बच्चे मारे गए- बतौर इंसान के बच्चो और नौजवानों की मौत मेरे भीतर के एक हिस्से को भी मार देती हैं. यह दुःख शब्दातीत है- बस महसूस करने वाला जाने!!

    अलविदा बच्चो – हम इस हादसे को झेलने के लिए अभिशिप्त हैं.
    अलविदा

    Reply
  • April 27, 2018 at 9:27 pm
    Permalink

    Abhishek Srivastava
    20 hrs ·
    दिल्‍ली में रहते हुए रोने के मौके कम आते हैं। या शायद आते ही नहीं। इतने बरस दिल्‍ली में हुए, याद आती है 2012 की वह दुर्लभ शाम जब शरमन साहब के अक्षरा थिएटर में पाकिस्‍तान के अजोका थिएटर ग्रुप का नाट्य-मंचन हुआ था। उस दिन राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय के रंग महोत्‍सव में अजोका को परफॉर्म करना था लेकिन सरकार ने इस पर पाबंदी लगा दी थी। उसी शाम जल्‍दबाज़ी में यह तय हुआ कि अजोका परफॉर्म करेगा, लेकिन एनएसडी में नहीं बल्कि राममनोहर लोहिया अस्‍पताल से सटे दिल्‍ली के सबसे पुराने थिएटरों में एक अक्षरा के भीतर। चुनिंदा लोगों को सूचनाएं भेजी गई और शाम होते-होते अक्षरा भर गया। नाटक था ”कौन है ये गुस्‍ताख़”, जो मंटो और श्‍याम की दोस्‍ती को समर्पित था। जिन्‍होंने अजोका ग्रुप के श्‍याम को देखा है, वे इस बात की तस्‍दीक करेंगे कि वे हूबहू श्‍याम ही दिखते हैं।

    वो शाम दिल्‍ली में अभूतपूर्व थी। बैकग्राउंड में ‘दुलारी’ का स्‍कोर बजता था ”कौन सुने फ़रियाद हमारी”, और नाटक बढ़ता जाता था। पटाक्षेप के बाद मदीहा गौहर सभी किरदारों के साथ मंच पर आईं। उन्‍होंने सबसे परिचय करवाया। इसके बाद अजोका ने अपना मशहूर सामूहिक गीत गाया, ”इंसान अभी तक जि़ंदा है.. जिंदा रहने पे शर्मिंदा है…।’ उन्‍होंने नाटक पर बंदिश लगाए जाने पर दो बातें कहीं, तो लगा तक़सीम का सारा दर्द सीने में उमड़ आया हो। सभागार में ऐसा सन्नाटा था गोया कब चीख पड़ता। माहौल बहुत भारी हो चुका था। अचानक बत्‍ती जली, तो सब ने सब की ओर देखा। पता चला, लोग रो रहे थे। सब एक-दूसरे से नज़रें बचा कर रो रहे थे। तकरीबन सभी की आंखें नम थीं। किसी ने किसी से कुछ नहीं कहा।

    अजोका की संस्थापक मदीहा गौहर नहीं रहीं। कैंसर से जूझते हुए उनका इंत़काल हो गया। आज जब ख़बर सुनी तो 19 दिसंबर, 2012 की वह शाम अचानक आंखों में उतर आई। दिन भर उस शाम को मैंने याद किया। संजोए रखा। सोचा, सोने से पहले दो शब्‍द बनते हैं उस अज़ीम शख्सियत पर, जिनके अल्‍फ़ाज़ हम जैसे नौजवान के हलक में दर्द बनकर अटक गए थे और पहली बार आंखों में कुछ अजीब सा चुभ रहा था। दिल्‍ली में रुलाई-सी आने का यह मेरा पहला और आखिरी तजुर्बा था। थिएटर से वापसी में पत्‍नी शीलाजी ने चुपके से बताया कि रो तो वे भी रही थीं। आज भी कभी गाहे-बगाहे मधुबाला पर फि़ल्‍माया ‘कौन सुने फ़रियाद…” कहीं बजता है तो मदीहा गौहर याद आती हैं, मंटो याद आते हैं, वो शाम ताज़ा हो उठती है। मदीहा जी शुक्रिया, उस इकलौती मुलाकात में यह अहसास दिलाने के लिए कि ”इंसान अभी तक जिंदा है / जिंदा रहने पे शर्मिंदा है…।”

    See Translation

    Reply
  • April 29, 2018 at 3:49 pm
    Permalink

    Avinash Das
    12 April at 09:15 ·
    आख़िरी मुग़ल के बाद कुछ भी पढ़ने से पहले मैं घबराने लगा था। एक अच्छी किताब के नशे से बाहर आने के लिए जब तक दूसरी अच्छी किताब के बारे में इत्मीनान न हुआ जाए तो कड़वाहट स्वाद बिगाड़ देती है। इस बीच ढेर सारी किताबें उलटी पुलटीं, लेकिन शुरू करने का जोश नहीं आ पाया। पिछले महीने मनीष गोस्वामी [Manish Goswami] ने मुझे सुनील गंगोपाध्याय की एक किताब दी, प्रथम आलोक। मैंने सुनील गंगोपाध्याय की कुछ कहानियां पढ़ी हैं और एक लघु उपन्यास, रानू और भानू। मैं उन्हें पसंद करता हूं। प्रथम आलोक की काया देख कर लगा कि इसे शुरू किया, तो मेरे कई दिन बर्बाद हो जाएंगे। मगर आवरण पर तीन महापुरुषों के चित्र ने मेरे चित्त को चंचल कर दिया। रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद और रवींद्रनाथ ठाकुर। रामकृष्ण परमहंस पर मेरे पास ज़्यादा साहित्य नहीं है, लेकिन स्वामी विवेकानंद और रवींद्रनाथ ठाकुर से जुड़ी कई पुस्तकें मैंने पढ़ी हैं और मेरे अपने जीवन में इन पुस्तकों ने ढेर सारी हलचल भी मचायी है। बंगाल में नवजागरण के ये शिखर पुरुष रहे हैं। एक ही समय में इनके साथ बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, जगदीशचंद्र बोस के जीवित किस्से घट रहे हैं। कोई ढलती उमर में है, कोई उफनती उमर में और कोई कोंपलों की तरह फूटती उमर में। आप सोचिए कि दिल ही दिल में कितनी रोशनी जमा हो सकती हैं इनकी कहानियां पढ़ते हुए!

    महान लोगों से जुड़े कथासूत्र में त्रिपुरा के राजा वीरचंद्र माणिक्य की फलती-फूलती वैचारिकी और ढहते हुए वैभव और राजमहल के अंत:पुर की षड्यंत्र-कथाओं से जोड़ते हुए सुनील गंगोपाध्याय ने जो यह उपन्यास लिखा है, मुझे नहीं मालूम कि हिंदी इलाक़ों में कितना पढ़ा गया है। कम से कम मैं तो इस उपन्यास से अनभिज्ञ था। ऐसे रोचक उपन्यास, जो अपने समग्र इतिहासबोध से हमारे हृदय में ज्वार-भाटा पैदा कर सकें, बहुत कम हैं। लक्ष्मीकांत वर्मा के मुंशी रायजादा की याद आयी। शम्सुर्रहमान फारूक़ी का कई चांद थे सरे आसमान हालांकि श्रेष्ठ भी है, अलौकिक भी।

    प्रथम आलोक पढ़ने के बाद मैं तो इसी बात से रोमांचित हूं कि अठारहवीं सदी के आख़िरी दशकों में रवींद्रनाथ अपने शुरुआती काव्य-अभ्यास में थे, विवेकानंद प्रेसीडेंसी कॉलेज के छात्र थे, जगदीशचंद्र बोस ने उसी कॉलेज में भौतिकी पढ़ाना शुरू किया था, बंकिमचंद्र के हिंदू पुनरुत्थानवादी उपन्यासों को लेकर बहस तेज़ हो रही थी, उस समय के बंगाल का लगभग सचित्र वर्णन मेरी आंखों के आगे साकार हो सका। इसी किताब से मुझे पता चला कि बंकिमचंद्र ने अंग्रेज़ों के डर से आनंद मठ के बाद के संस्करणों में जहां अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ नफ़रत थी, उसे मुसलमानों की तरफ़ मोड़ दिया। क्या आप यक़ीन करेंगे कि एक भारतीय उपन्यास अपनी सहज किस्सागोई के जरिये यह बताने में सक्षम हो सका कि डार्विन के अस्तित्ववाद के सिद्धांत ने दुनिया भर की धर्मसत्ताओं को किस तरह चुनौती देने के काम किया। यूरोप जब विज्ञानोन्मुखी हो रहा था, भारत में धर्म और विज्ञान ने साहित्य, संस्कृति और राजनीति को किस तरह प्रभावित किया था – यह सब जानने के लिए प्रथम आलोक पढ़ना चाहिए।

    मेरे लिए उस अध्याय से उबरना मुश्किल है, जिसमें रामकृष्ण परमहंस की कष्टसाध्य मृत्यु का विवरण है। महान शिष्यों के इस गुरु की शवयात्रा में मात्र सौ-डेढ़ सौ लोग भी बड़ी मुश्किल से शामिल हो पाये। मैं कहता हूं सब इसे पढ़ें। वाणी प्रकाशन ने छापा है।
    Punj Prakash
    11 April at 22:36 ·
    रेणु जी पुण्यतिथि के बहाने

    ज्ञातव्य है कि आज बिहार के प्रसिद्ध कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु की पुण्यतिथि है। रेणुजी मेरे लिए द्रोण हैं और मैं एकलव्य, और मेरे जैसे पता नहीं कितने एकलव्य और होगें। इनकी लिखी कहानी पंचलाइट में गोधन और ना जाने केही वेष में के कवि के चरित्र से मेरे अभिनय जीवन को एक पहचान मिली। मैं कवि होता था और आजकल के प्रसिद्द फ़िल्म अभिनेता Pankaj Tripathi भैरौ प्रसाद “भौंरा” अभिनीत करते थे। आदरणीय Vijay Kumar निर्देशित रेणु के रंग, जिसमें रेणु जी की तीन कहानियां (पंचलाइट, रसप्रिया और ना जाने केहि वेष में) से हम पटना रंगमंच पर अंकुरित हो रहे थे। चाहे वो पंकज हो, शशिभूषण हो, Sunil Bihari हों, हेमशंकर हेमन्त हो, Priti Jha Tiwari हो, Arvind Pathak हो, Avinash Das हों, Sharda Singh हों, Sahil Sunny हों या अन्य अनगिनत नाम; सब अपनी पहचान बनाने की चाहत लिए पूरी ऊर्जा से लगे थे। पंकज त्रिपाठी की तो पहचान ही भैरौ प्रसाद भौंरा के रूप में अंकित हो गई थी। हमने इस नाटक का मंचन देश भर में किया और जबतक मंच आर्ट ग्रुप पटना में सक्रिय रहा रेणु जी की यह तीन कहानियां मंच का प्रतिनिधि नाट्यप्रस्तुति रही। इसी दौरान मैं रेणुजी की एक एक पढ़ गया और उसका जादू आज भी जस का तस बरकरार है बल्कि और बढ़ ही गया है। यह 2002 की बात है। इस नाट्यरूपान्तरण को आदरणीय हृषीकेश सुलभ भैया ने बड़े ही धीरज और गौर से सुना था और कई बहुमूल्य सुझाव भी दिए थे।
    फिर सन 2004 में एक दिन आदरणीय Sanjay Upadhyay सर ने मेरे सामने रेणुजी की प्रसिद्द रचना परती परिकथा का नाट्य-रूपांतरण का प्रस्ताव रखा। एक बार के लिए तो चौंक गया लेकिन जब संजय भैया ने हौसला बढ़ाया तो भिड़ गया। उसी दौरान मेरा चयन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में हो गया तो मैंने पढ़ाई के साथ ही यह रूपांतरण भी पूरा किया। संजय भैया ने फिर इसे मंचस्त किया। रूपांतरण कैसा था/है यह मैं आजतक समझ नहीं पाया हूँ। वैसे भी अपने किसी भी कार्य से संतुष्ट हो जाना मेरी नियति नहीं है। हां, इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि इस नाट्य प्रस्तुति के लिए संजय भैया ने जो संगीत तैयार किया था वो कमाल था और अरविंद जी का चरित्र तथा अनिल मिश्रा द्वारा गाया हुआ “काया का क्यों रे गुमान” नामक निर्गुण मेरे कानों में आज भी गूंज रहा है। मैं गीतकार नहीं हूं लेकिन परती परिकथा के लिए मैंने यह निर्गुण लिखा था जिसे संजय भैया ने अमर कर दिया। मैंने गीत बहुत ही कम लिखें हैं लेकिन #काया नामक इस निर्गुण का जादू आज भी यह है कि कई जगह मैंने इसे आज भी लोगों को गाते हुए सुना है। अनिल मिश्रा, मोहम्मद जॉनी और खुद संजय भैया आज भी इस निर्गुण को बड़े ही मिजाज़ से गाते हैं और मेरा सर गौरव से ऊंचा हो जाता है। यह सब रेणुजी के प्रताप का असर है।
    फिर बारी आती है रेणुजी की प्रसिद्ध कहानी तीसरी क़सम की। सच पूछिए तो इस कहानी को छूने की मेरी हिम्मत नहीं थी लेकिन दवाब ऐसा बना कि तीसरी क़सम और रसप्रिया को मिलाकर एक नाटक लिखा, जिसे Vishwa Patna के कलाकारों ने Rajesh Raja के निर्देशन में खूब खेला और आजतक खेल रहे हैं। यह रेणुजी का ही जादू है कि यह नाटक कई रंगकर्मियों और दर्शकों के पसंदीदा नाटकों में से एक है। इस नाटक के लिए भी दो गीत लिखे। एक गीत ठीक वहां रखना था जहां फ़िल्म में चलत मुसाफ़िर मोह लिया रे नामक गीत है। कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि गीत के बोल क्या होंगे तो रेणुजी की रचनाओं को पुनः पढ़ने लगा। उनकी रचनाओं में संगीत का भी एक ख़ास महत्व हैं। कई कहानियों में तो वो वाद्ययंत्रों के बोल तक लिखकर एक अद्भुत वातावरण बनाते हैं। तो मैला आँचल में एक बोल मिला – सांइयाँ तेरे प्यार में फुलगेंदा बन जाऊंगी। बस क्या था मुझे जैसे ताले की चाभी मिल गई और मैंने एक ही बैठक में पूरा गीत लिख दिया। इस गीत जो धुन Markandey Kumar Pandey ने बनाई वो आज भी लोगों की ज़ुबान पर है। इस नाटक के भी अनगिनत मंचन पूरे देश भर हुए।
    तत्काल लाल पान की बेग़म का नाट्यरूप तैयार किया जिसे Prastuti के कलाकार Sharda Singh के निर्देशन में खेलते हैं। इस नाटक पर मुझे इत्मीनान से और मेहनत करने की ज़रूरत है, इस बात को मैं स्वीकार करता हूँ।
    बहरहाल, कह सकता हूँ कि रेणुजी की रचनाओं ने मुझे नाटककार बना दिया। उन्हें कोटि कोटि नमन।

    See Translation
    Image may contain: 1 person, smiling, text

    Reply
  • May 1, 2018 at 4:26 pm
    Permalink

    जगदीश्‍वर चतुर्वेदी। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर।
    रविवार, 31 जुलाई 2016
    प्रेमचंद और ईश्वर
    हमारे कई फेसबुक मित्रों ने कहा है कि प्रेमचंद तो ईश्वर को मानते थे। हम विनम्रतापूर्वक कहना चाहते हैं कि वे ईश्वर या ऐसे किसी तत्व की उपस्थिति मानने को तैयार नहीं थे जिसे देखा न हो।यह भी सवाल उठा है प्रेमचंद ने इस्लाम धर्म की आलोचना कहां की है ॽ हम इन दोनों सवालों के जवाब खोजने की कोशिश करेंगे। हिन्दू-मुस्लिम भेदभाव का विस्तार से जिक्र करने के बाद प्रेमचंद ने ´मनुष्यता का अकाल´(जमाना, फरवरी 1924) निबंध में लिखा , ´इतिहास में उत्तराधिकार में मिली हुई अदावतें मुश्किल से मरती हैं,लेकिन मरती हैं,अमर नहीं होतीं।´

    उपरोक्त निष्कर्ष निकालने के पहले प्रेमचंद ने ´मनुष्यता का अकाल´ में ही लिखा, ´हमको यह मानने में संकोच नहीं है कि इन दोनों सम्प्रदायों में कशमकश और सन्देह की जड़ें इतिहास में हैं। मुसलमान विजेता थे,हिन्दू विजित।मुसलमानों की तरफ से हिन्दुओं पर अकसर ज्यादतियाँ हुईं और यद्यपि हिन्दुओं ने मौका हाथ आ जाने पर उनका जवाब देने में कोई कसर नहीं रखी,लेकिन कुल मिलाकर यह कहना ही होगा कि मुसलमान बादशाहों ने सख्त से सख्त जुल्म किये। हम यह भी मानते हैं कि मौजूदा हालात में अज़ान और कुर्बानी के मौक़ों पर मुसलमानों की तरफ से ज्यादतियाँ होती हैं और दंगों में भी अक्सर मुसलमानों ही का पलड़ा भारी रहता है।ज्यादातर मुसलमान अब भी ´मेरे दादा सुल्तान थे´नारे लगाता है और हिन्दुओं पर हावी रहने की कोशिश करता रहता है।´

    इसी निबंध में पहलीबार धार्मिक प्रतिस्पर्धा को निशाना बनाते हुए उन्होंने तीखी आलोचना लिखी।उस तरह की आलोचना सिर्फ ऐसा ही लेखक लिख सकता है जिसकी ईश्वर की सत्ता में आस्था न हो,उन्होंने लिखा ,´ दुनियावी मामलों में दबने से आबरू में बट्टा लगता है,दीन-धर्म के मामले में दबने से नहीं।´ आगे लिखा ´यह किसी मज़हब के लिए शान की बात नहीं है कि वह दूसरों की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाये।गौकशी के मामले में हिन्दुओं ने शुरू से अब तक एक अन्यापूर्ण ढंग अख़्तियार किया है। हमको अधिकार है कि जिस जानवर को चाहें पवित्र समझें लेकिन यह उम्मीद रखना कि दूसरे धर्म को माननेवाले भी उसे वैसा ही पवित्र समझें,ख़ामख़ाह दूसरों से सर टकराना है।गाय सारी दुनिया में खायी जाती है,इसके लिए क्या आप सारी दुनिया को गर्दन मार देने क़ाबिल समझेंगेॽ यह किसी खूँ-खार मज़हब के लिए भी शान की बात नहीं हो सकती कि वह सारी दुनिया से दुश्मनी करना सिखाये।´

    आगे लिखा ´ हिन्दुओं को अभी यह जानना बाक़ी है कि इन्सान किसी हैवान से कहीं ज्यादा पवित्र प्राणी है,चाहे वह गोपाल की गाय हो या ईसा का गधा,तो उन्होंने अभी सभ्यता की वर्णमाला भी नहीं समझी।हिन्दुस्तान जैसे कृषि-प्रधान देश के लिए गाय का होना एक वरदान है,मगर आर्थिक दृष्टि के अलावा उसका और कोई महत्व नहीं है।लेकिन गोरक्षा का सारे हो-हल्ले के बावजूद हिन्दुओं ने गोरक्षा का ऐसा सामूहिक प्रयत्न नहीं किया जिससे उनके दावे का व्यावहारिक प्रमाण मिल सकता।गौरक्षिणी सभाएँ कायम करके धार्मिक झगड़े पैदा करना गो रक्षा नहीं है।´

    प्रेमचंद का मानना है ´वर्तमान समय में धर्म विश्वासों के संस्कार का साधन नहीं,राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि का साधन बना लिया गया है।उसकी हैसियत पागलपन की-सी हो गयी है जिसका वसूल है कि सब कुछ अपने लिए और दूसरों के लिए कुछ नहीं।जिस दिन यह आपस की होड़ और दूसरे से आगे बढ़ जाने का ख़याल धर्म से दूर हो जायेगा,उसदिन धर्म-परिवर्तन पर किसी के कान नहीं खड़े होंगे।´

    प्रेमचंद ने हिन्दू और मुसलमानों को धर्म के नाम पर भड़काने वालों और धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों की तीखी आलोचना की है ।´मिर्जापुर कांफ्रेस में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव´(अप्रैल1931) में लिखा ´जब तक अपना हिन्दू या मुसलमान होना न भूल जायेंगे ,जब तक हम अन्य धर्मावलम्बियों के साथ उतना ही प्रेम न करेंगे जितना निज धर्मवालों के साथ करते हैं,सारांश यह कि जब तक हम पंथजनित संकीर्णता से मुक्त न हो जायेंगे,इस बेड़ी को तोड़कर फेंक न देंगे,देश का उद्धार होना असंभव है।´इसमें ही वे आगे कहते हैं ´धर्म को राजनीति से गड़बड़ न कीजिए´। एक अन्य निबंध ´गोलमेज़ परिषद में गोलमाल´ (अक्टूबर1931) में लिखा ´भारत का उद्धार अब इसी में है कि हम राष्ट्र-धर्म के उपासक बनें,विशेष अधिकारों के लिए न लड़कर,समान अधिकारों के लिए लड़ें।हिन्दू या मुसलमान,अछूत या ईसाई बनकर नहीं,भारतीय बनकर संयुक्त उन्नति की ओर अग्रसर हों,अन्यथा हिन्दू मुसलमान,अछूत और सिक्ख सब रसातल को चले जायेंगे।´

    यह भी लिखा ´धर्म का सम्बन्ध मनुष्य से और ईश्वर से है।उसके बीच में देश,जाति और राष्ट्र किसी को भी दखल देने का अधिकार नहीं।हम इस विषय में स्वाधीन हैं।´

    शिवरानी देवी से बातचीत करते हुए प्रेमचंद ने ईश्वर के बारे में कहा ´ईश्वर पर विश्वास नहीं होता कि अगर वह सचमुच ईश्वर है तो क्या दुखियों को दुख देने में ही उसे मजा आता है ॽ फिर भी लोग उसे दयालु कहते हैं.वह सबका पिता है.फला-फूला बाग उजाड़कर वह देखता है और खुश होता है.दया तो उसे आती नहीं .लोगों को रोते देखकर शायद से खुशी ही होती है.जो अपने आश्रितों के दुख पर दुखी न हो.वह कैसा ईश्वर है।´

    आगे वकौल शिवरानी देवी प्रेमचन्द पूछते हैं ´तब कैसे ईश्वर हमसे अन्याय कराता है.जो अच्छा समझे वही हमसे कराये,हम जिससे दुखी न हो सकें.कुछ नहीं.यह सब धोखे में डालने वाली भावनायें हैं,बस अपने को धोखे में डालने के लिए यह सब प्रपंच रचे गए हैं.और नहीं तो हम प्रत्यक्षतःकोई बुरा काम नहीं करते तो लोग कहते हैं .अगले जन्म में बुरा काम किया होगा,उसी का फल है.और मैं कहता हूँ,यह सब गोरखधंधा है।´

    प्रेमचंद मानते थे ´भगवान मन का भूत है,जो इन्सान को कमजोर कर देता है.ईश्वर का आधार अन्धविश्वास है और इस अंधविश्वास में पड़ने से तो रही सही अक्ल भी मारी जाती है।´

    प्रेमचंद का जैनेन्द्र के साथ लगातार पत्र-व्यवहार होता था,दोनों गहरे मित्र थे।प्रेमचन्द ने 9दिसम्बर 1935 को जैनेन्द्र कुमार को लिखा ,´ईश्वर पर विश्वास नहीं आता,कैसे श्रद्धा होती.तुम आस्तिकता की ओर जा रहे हो,जा ही नहीं रहे हो.बल्कि भगत बन गये हो मैं संदेह से पक्का नास्तिक होता जा रहा हूँ।´ और एक दिन जैनेन्द्र कुमार को दो-टूक उत्तर दे दिया, ´जब तक संसार में यह व्यवस्था है,मुझे ईश्वर पर विश्वास नहीं आने काःअगर मेरे झूठ बोलने से किसी की जान बचती है तो मुझे कोई संकोच नहीं होगा.मैं प्रत्येक कार्य को उसके मूल कारण से परखता हूँ.जिससे दूसरों का भला न हो.जिससे दूसरों का नुकसान हो वही झूठ है।´

    मृत्यु से कुछ दिन पहले रोग-शैय्या पर पड़े हुए प्रेमचंद ने जैनेन्द्र कुमार से कहा ´जैनेन्द्रःलोग इस समय ईश्वर को याद किया करते हैं.मुझे भी याद दिलाई जाती है.पर अभी तक मुझे ईश्वर को कष्ट देने की जरूरत नहीं मालूम हुई।´ , ´जैनेन्द्र ! मैं कहचुका हूं.मैं परमात्मा तक नहीं पहुँच सकता.मैं उतना उत्साह नहीं कर सकता.कैसे करूँ जब देखता हूँ,बच्चा बिलख रहा है,रोगी तड़प रहा है.यहाँ भूख है,क्लेश है,ताप है,वह ताप इस दुनिया में कम नहीं है.तब उस दुनिया में मुझे ईश्वर का साम्राज्य नहीं दीखे तो मेरा क्या कसूर हैॽमुश्किल तो है कि ईश्वर को मानकर उसको दयालु भी मानना होगा.मुझे वह दयालुता नहीं दीखती ,तब उस दया सागर में विश्वास कैसे हो.´

    ईश्वरतंत्र पर प्रहार करते हुए प्रेमचंद ने लिखा ´ईश्वर के नाम पर उनके उपासकों ने भूमण्डल पर जो अनर्थ किये हैं,और कर रहे हैं,उनके देखते इस विद्रोह को बहुत पहले उठ खड़ा होना चाहिए था.आदमियों के रहने के लिये शहरों में स्थान नहीं है.मगर ईश्वर और उनके मित्रों और कर्मचारियों के लिए बड़े-बड़े मंदिर चाहिए.आदमी भूखों मर रहे है मगर ईश्वर अच्छे से अच्छा खायेगा,अच्छे से अच्छा पहनेगा और खूब विहार करेगा।´

    ´कर्मभूमि´में गजनवी के मुँह से प्रेमचंद कहलवाते हैं ´मज़हब का दौर खत्म हो रहा है बल्कि यों कहो कि खत्म हो गया है सिर्फ हिन्दुस्तान में इसकी कुछ जान बाकी है.यह मुआशयात का दौर है.अब कौम में दार ब नदार,मालिक और मजदूर अपनी-अपनी जमातें बनायेंगे।´

    शिवरानी देवी से बातचीत के दौरान प्रेमचंद ने नास्तिकता के सम्बन्ध में साफ कहा नास्तिकता का तब तक प्रचार संभव नहीं जब तक जनता सचेत नहीं हो जाती.लिखा ´और फिर जो जनता सदियों से भगवान पर विश्वास किये चली आ रही है,वह यकायक अपने विचार बदल सकती है ॽ अगर एकाएक जनता को कोई भगवान से अलग करना चाहे तो संभव नहीं है।´

    आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने ´इस्लाम का विष वृक्ष´किताब लिखी,इस किताब पर प्रेमचंद ने विरोध करते हुए जैनेन्द्र कुमार को लिखा, ´और इन को क्या हो गया है कि ´इस्लाम का विष-वृक्ष´ही लिख डाला.इसकी एक आलोचना तुम लिखो,वह पुस्तक मेरे पास भेजो.इस कम्युनल प्रोपेगेण्डा का जोरों से मुकाबला करना होगा।´

    प्रेमचन्द का किसी भी परम्परागत धर्म में विश्वास नहीं था,इस सम्बन्ध में उर्दू के प्रसिद्ध विद्वान मुहम्मद आकिल साहब ने लिखा है ´प्रेमचन्दजी ने मुझसे कहा कि मुझे रस्मी मज़हब पर कोई एतबार (विश्वास)नहीं है,पूजा-पाठ और मन्दिरों में जाने का मुझे शौक नहीं.शुरू से मेरी तबियत का यही रंग है. बाज़ लोगों की तबियत मज़हबी होती है.बाज़ लोगों की ला मज़हबी.मैं मज़हबी तबियत रखने वालों को बुरा नहीं कहता,लेकिन मेरी तबियत रस्मी मजहब की पाबन्दी को बिल्कुल गवारा नहीं करती।´

    शिवरानी देवी से मज़हबी सवाल के जवाब में प्रेमचंद ने कहा ´अवश्य मेरे लिए कोई मज़हब नहीं है.मेरा कोई खास मज़हब नहीं है।´ इसका कारण क्या है ॽ इसका कारण हैः´धर्म से ज्यादा द्वेष पैदा करने वाली वस्तु संसार में नहीं है.´ , ´आज दौलत जिस तरह आदमियों का खून बहा रही है,उसी तरह उससे ज्यादा बेदर्दी धर्म ने आदमियों का खून बहाकर की.दौलत कम से कम इतनी निर्दयी नहीं होती,इतनी कठोर नहीं होती,दौलत वही कर रही है जिसकी उससे आशा थी,लेकिन धर्म तो प्रेम का संदेश लेकर आता है और काटता है आदमियों के गले.वह मनुष्य के बीच ऐसी दीवार खड़ी कर देता है,जिसे पार नहीं किया जा सकता।’

    शिवरानी जी ने प्रेमचंद से सवाल किया आप मुसलमानों की ओर हैं या हिन्दुओं की ओर ॽजवाब दियाः´मैं एक इन्सान हूँ और जो इन्सानियत रखता हो,इन्सान का काम करता हो,मैं वही हूँ और मैं उन्हीं लोगों को चाहता हूँ.मेरे दोस्त अगर हिन्दू हैं तो मेरे कम दोस्त मुसलमान भी नहीं हैं और इन दोनों में मेरे नजदीक कोई खास फ़र्क नहीं है.मेरे लिए दोनों बराबर हैं।´

    Reply
  • May 9, 2018 at 9:02 am
    Permalink

    Zahid Baig
    6 May at 22:01 ·
    रात का सफ़र हमेशा आपको प्रकृति से/ ख़ुद से एकाकार होने का अवसर प्रदान करता है । अँधेरे का अपना निज़ाम अपना ज़ादू होता है । अँधेरा अपने आप में कुल जहान की रौशनी समाये रहता है ।अँधेरे में आप सतत खिड़की से बाहर देखते रहिये यदि घुप अँधेरा हुआ तो आप ख़ुद में डूब जायेंगे । अतीत आपके सामने से चलचित्र की तरह गुज़र कर आपके अंतर्मन को सुखद अहसास से भर देगा । आपका अतीत आपको कभी निराश नही करता, कभी दुःख नहीं देता । प्रेमचन्द जी ने यूँही नहीं लिखा था -“आपका अतीत कितना भी दुःखद क्यों न हो उसकी स्मृतियाँ हमेशा सुखद होती हैं ।”
    और अग़र आप संवेदनशील हैं तो रात का अँधेरा भी आपको ऐसे दृश्यों से रूबरू करवाएगा जो दिन की रौशनी में या तो दुर्लभ हैं या जिन्हें आप उजाले में अनुभूत ही नहीं कर पाएँगे । रूटीन अनुसार इंदौर से रात में बस से खातेगाँव लौट रहा हूँ । बग़ल की सीट पर एक धीर-गम्भीर वृद्ध सज्जन बैठे हैं । एकाध बार उनसे बात करने की क़ोशिश की पर उन्होंने मुझ में और मेरी बातों में कोई रूचि नहीं ली । उनकी सारा इन्टरेस्ट सामने स्क्रीन पर चल रही साऊथ की फ़िल्म और उसकी हिरोईन में था ।
    निराश होकर मेरे पास खिड़की से बाहर अँधेरे में झाँकने के अलावा और कोई चारा नहीं था ।
    बस की रफ़्तार के साथ होड़ लगाते जँगल, खेत, खलिहान विपरीत दिशा में दौड़ रहे थे ।एक स्थान पर बस सब्जियों के बोरे लादने के लिए कुछ देर जँगल में रुकी । चारों और घना अँधेरा पसरा हुआ था । दूर किसी खेत में घास-फूस की झोपड़ी से लगे ग्वाड़े में किसी खेत मज़दूर की 8-10 वर्षीय बेटी ढिबरी की रौशनी में अपनी बकरी को दूह रही थी । उसके आस-पास घनी झाड़ियाँ थीं । लगता था कि उस समय उस की झोंपड़ी में उसके अलावा कोई नहीं था । मात्र एक कुत्ता सजग हो कर उसके पास खड़ा था । उसके माता-पिता उस लड़की को उस जानवर के हवाले कर निश्चिन्त होकर शायद हाट-बाज़ार करने गए थे । मुझे लगा कि जानवर पर भरोसा कर उन्होंने ठीक ही किया कम से कम इस बात की तो गारण्टी थी की उस कुत्ते के जीवित रहने तक उनकी लाडली उस जँगल में भी सुरक्षित रहेगी ।
    वन के नीरव सन्नाटे में वो लड़की निडर और एकाग्र चित्त होकर अपने काम में मगन थी । मैं सोच रहा था कि हम अपने किशोर वय के बच्चों को घर आँगन में भी अँधेरे में बिना टार्च के नहीं निकलने देते । इस वन ग्राम की लड़की को प्रकृति ने कितना बहादुर बना दिया था । सच है प्रकृति से बड़ा कोई शिक्षक नहीं होता । मैंने हमेशा देखा है कि सुदूर ग्रामों की महिलाऐं शहरी महिलाओं से ज़्यादा आत्मनिर्भर और आत्मविश्वास से लबरेज़ होती हैं । वो अपने पिता/भाई/पति की मौज़ूदगी में भी किसी भी अज़नबी से सहज होकर बात कर लेती हैं । उनके परिजनों को भी इससे कुछ फ़र्क नहीं पड़ता । कोई शहरी महिला ऐसा नहीं करेगी और यदि उसने ऐसा किया तो उसे परिजनों की चुभती निगाहों और घर पहुँच कर चुभते सवालों का सामना करना पड़ेगा । यह प्रकृति ही है जो उन्हें सहज,सरल,निडर और निश्चल बनाती है । मैंने यह भी पाया कि ग्रामीण महिलाएँ या लड़कियाँ अपने साथ किसी भी तरह की छेड़-छाड़ का तत्काल और समुचित प्रतिकार करती हैं । इसके विपरीत शहरी महिलाएँ अक़्सर ऐसे अवसरों पर ख़ामोश रह कर सब सह जाती हैं । सच में लड़कियों को प्रकृति से बहुत कुछ सीखने की ज़रूरत है ।

    Reply
  • May 9, 2018 at 11:35 pm
    Permalink

    Shambhu Nath
    4 May at 12:26 ·
    कवि सम्मेलन बनाम मुशायरा!
    मुझे लगता है कि इन तनातनी के दिनों में यह लेख फेसबुक पर जरूर साया किया जाए। इसे पढ़कर आप वेस्टर्न यूपी की सांप्रदायिक मानसिकता को अच्छी तरह समझ सकते हैं-
    “बात 1995 की है। उस समय मेरठ के कमिश्नर श्री हरभजन लाल विरदी साहब हुआ करते थे। यूपी में सपा-बसपा सरकार थी। बहन मायावती की तूती बोलती थी। विरदी साहब मान्यवर कांशीराम जी के निकट के रिश्तेदार थे और यूपी की ब्यूरोक्रेसी में एक ईमानदार और सज्जन तथा धर्मभीरु स्वभाव के अफसर। देवबंद नगरपालिका हर साल एक मुशायरा व कवि सम्मेलन का आयोजन करती थी। विरदी साहब ने मुझे कहा कि “आप कवि सम्मेलन की बागडोर संभालो और कवियों को बुला लो”। मेरे लिए यह बड़ी चुनौती थी। मैं मंचीय कवियों के नखरों से अनजान था। फिर भी अपने कुछ मित्रों से बातचीत कर मंच के लिए उपयुक्त कवियों को बुलवाया। मुझे खुशी है कि पद्मभूषण गोपालदास नीरज तो मेरे सामान्य अनुरोध पर ही आ गए और श्री सोम ठाकुर भी। इस कवि सम्मेलन में राजस्थान की व्यास नाम की एक कवयित्री भी पधारी थीं। उन्होंने पिछले दिन मुशायरे में भी शिरकत की थी और उनकी शायरी खूब सराही गई थी। खैर निर्धारित समय पर मैं देवबंद पहुंचा। हमारी व्यवस्था देवबंद की चीनी मिल के गेस्ट हाउस में थी। वहां मच्छरों की भरमार थी। इसलिए वहां बैठना तक मुश्किल।
    उसी समय वहां के एक नगरसेठ के युवराज पधारे। और कवियों से आग्रह किया कि उनके घर चलकर जलपान कर लें। सब राजी हो गए। वे बहुत इसरार कर के उन कवयित्री व्यास को भी ले गए। बीच शहर में उनका महल जैसा घर। कवियों की व्यवस्था उन्होंने भव्य की थी। उस जमाने में कई बोतलें प्रीमियम व्हिस्की की तथा स्टार्टर। प्यासे हिंदी कविगण टूट पड़े। मगर वे कवयित्री चुपचाप बैठी रहीं और उन्होंने कह दिया कि वे शराब नहीं पीतीं। यह बात उन सेठपुत्र को नागवार लगी और बोले- “यह कैसे हो सकता है आप कल उन मुल्लों के बीच तो पी रही थीं”। उन्होंने कहा कि ‘नहीं उन मुल्लों ने मेरे साथ बहुत ही बेहतर सलूक किया था। किसी ने मुझे न तो शराब पीने को कहा और न ही मांसाहार को’। पर वे सेठपुत्र मानें ही नहीं। मैने कहा कि “क्यों आप उन भद्र महिला के पीछे पड़े हैं? उनकी जो इच्छा हो खायें-पियें”। पर वे और बदतमीजी पर उतारू। अंत में मैने धमकी दी कि ‘देखिए यह कवि सम्मेलन मेरा है। अगर किसी ने भी इन कवयित्री से बदतमीजी की तो मैं रिपोर्ट लिखाऊँगा। मैं अभी सहारनपुर के एसएसपी श्री जवाहर लाल त्रिपाठी और डीएम श्री हरभजन सिंह से बात करता हूं’। मेरी धमकी काम कर गई और तत्काल एक कार द्वारा हमें कवि सम्मेलन स्थल में भेज दिया गया। रास्ते में उन कवयित्री ने मुझे धन्यवाद देते हुए कहा- “शुक्ला जी ऐसे जाहिल लोग हैं ये हिंदी वाले हिंदू। कल मुझे मुशायरे वालों ने कितनी अधिक इज्जत दी और पूरे समय मुझे बेटी-बेटी कहते रहे। लेकिन हिंदी वालों के यहां तो किसी महिला का मंच पर आकर कविता पढऩा एक निकृष्ट पेशा समझा जाता है”। मुशायरे और कवि सम्मेलन में यह फर्क साफ देखा जा सकता है। जहां मुशायरे में आज भी साहित्य की गरिमा रहती है वहीं हिंदी कवि सम्मेलन में एक तरह की लूट-खसोट। दोनों के बीच शायद इस फर्क की वजह यह भी है कि हिंदी शुरू से ही हिंदुओं की सवर्ण कही जाने वाली जातियों के हाथ में आ गई इसलिए इसमें जातीय नफरत भी फैली और विधर्मियों के प्रति विद्वेष भी। शायद इसीलिए हिंदी हिंदुस्तान में हिंदू हो गई”।

    Reply
  • June 4, 2018 at 10:58 am
    Permalink

    पाठको पुराने क्लिक की सुचना मिट गयी हे ये लेख दस हज़ार के आस पास क्लिक हे

    Reply
  • June 5, 2018 at 5:30 pm
    Permalink

    Jagadishwar Chaturvedi
    3 June at 17:23 ·
    केजीबी और साहित्य-
    केजीबी सोवियत संघ की खुफिया एजेंसी है,यह लंबे समय तक समाजवादी सोवियत संघ का ,आज अंग है रूस का। इस संस्था ने कला-साहित्य का कोई आंदोलन प्रमोट नहीं किया लेकिन साहित्य-कला के क्षेत्र में सोवियत संघ में काफी बड़ी संख्या में लेखकों को उत्पीडित किया। इनमें बड़े नाम हैं सोल्जेनित्सिन , सखारोव आदि।

    सोवियत संघ ने समाजवाद का जो मॉडल चुना यह वह मॉडल नहीं है जिसकी कल्पना मार्क्स-एंगेल्स ने की थी। समाजवादी सोवियत संघ में मानवाधिकारों को लेकर कोई समझ ही नहीं थी। खासकर व्यक्तिगत स्वतंत्रता,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि के लिए संविधान से लेकर सामाजिक संरचनाओं में कोई जगह नहीं दी गयी।फलतः विभिन्न किस्म की विचारधाराओं के माननेवाले लेखन और लेखकों के लिए भी कोई जगह नहीं थी। इसके विपरीत भारत में लोकतंत्र है और सभी नागरिकों को मानवाधिकारों की संविधान प्रदत्त गारंटी है। यहां पर कम्युनिस्टलेखक, विरोधी विचारधारा की आलोचना का संवैधानिक हक रखते हैं। इसके बाबजूद वे सोवियतसंघ आदि देशों के लेखकों के अभिव्यक्ति की आजादी के दर्द को महसूस करने में असमर्थ रहे।

    कार्ल मार्क्स -एंगेल्स के विचारों में क्रांतिकारी भावबोध इसलिए विकसित हुआ क्योंकि वे पूंजीवाद की उदार परंपराओं में विकसित हुए और क्रांतिकारी परंपराओं की खोज में सफल रहे । उन्हें उदार पूंजीवादी माहौल मिला। यदि सोवियत संघ में मार्क्स-एंगेल्स होते तो उनके साथ वही होता जो प्लेखानोव के साथ हुआ। प्लेखानोव को रूसी मार्क्सवाद का जनक माना जाता है।

    माइकेल एंजेलो ने एक बार स्वयं अपने विषय में कहा था ” मेरा उपदेश ज्ञानी होने का दावा करने वाले अनेक अज्ञानियों को जन्म देगा।” इस पर प्लेखानोव ने कहा दुर्भाग्यवश यह भविष्यवाणी पूरी हो गयी है। आजकल मार्क्स का ज्ञान ऐसे अनेक अज्ञानियों को जन्म दे रहा है,जो ज्ञानी होने का दावा करते हैं।स्पष्ट रूप से इसमें मार्क्स का कोई कसूर नहीं है,बल्कि कसूर उन लोगों का है जो उनके नाम पर मूर्खता की बातें कर रहे हैं।ऐसी मूर्खताओं से बचने के लिए हमें भौतिकवाद की प्रणाली के महत्व को समझना आवश्यक है।

    सोवियत संघ के पतन में जिन कारकों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की उनमें KGB की भूमिका प्रधान कारक है। अर्सा पहले इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली ने सोवियत संघ के पतन पर एक विशेषांक निकाला था उसमें केजीबी के पूर्वप्रधान ने यह बात रेखांकित की थी। इसके अलावा केजीबी का काम था सोवियत नागरिकों की इलैक्ट्रोनिक नजरदारी करना और आंतरिक प्रतिवाद का दमन करना। इसके कारण घर-घर में जासूस पैदा हो गए,बाप अपने बेटे पर, बीबी अपने पति पर केजीबी के लिए जासूसी कर रहे थे। यह सीधे नागरिकों के जीवन को नरक बनाने के प्रयास थे जो अंत में सोवियत संघ के विघटन और समाजवाद के पतन तक ले गए।Follow

    Jagadishwar Chaturvedi
    2 June at 18:32 ·
    मथुरा के दुख-सुख

    सोचा था मथुरा जाकर रहूँगा तो यमुना नहाऊँगा लेकिन हिन्दुओं की कृपा से यमुना का पानी किसी लायक नहीं बचा ।यमुना में डुबकी लगाने की इच्छा अब कभी साकार नहीं होगी।यह मेरे जीवन की सबसे त्रासद घटना है।

    मथुरा में सुबह कचौड़ी-जलेबी का नाश्ता (कलेवा) करते समय पुराने मित्रों हरिवंश चतुर्वेदी-ऋषिकांत खासतौर पर बहुत याद आते हैं।मैंने इन दोनों के साथ 1979 के पहले सैंकड़ों बार पहलवान की दुकान पर कलेवा कियाहै और उसके बाद भाटिया के यहां चाय और देश और शहर की राजनीति पर जमकर विचार विमर्श,दिलचस्प बात है हरिवंश और ऋषिकांत मथुरा छोड़ गए पहलवान कचौड़ी वाला मर गया ,इन दिनों होलीगेट पर उसका नाती है जो दुकान चलाता है।सबसे दिलचस्प पहलू यह कि दुकानें जैसी पहले थीं वैसी ही अब हैं, अंतर यह है अब हर दुकान पर नाती बैठा है।

    मथुरामें विगत 1979 के बाद के वर्षों में बहुत कुछ बदला है। खासकर 1990 के बाद जो परिवर्तन हुए हैं वे काबिलेगौर हैं।शहर में युवाओं में अपराधीकरण बढ़ा है।साथही गतिशीलता भी बढ़ी है।युवाओं की बहुत बड़ी फौज है जो भाजपाप्रेम में डूबी हुई है।साथ ही उसके अंदर स्थानीयतावाद-जातिवाद बहुत पुख्ता हुआ है।धार्मिक लामबंदी में गुणात्मक परिवर्तन हुआ है।साथ ही धर्म के साथ उपभोग का सम्मिश्रण बढ़ा है।मथुरा में वेश्यावृत्ति लंबे समय से गायब है।संभवतः अकेला शहर है जहां औरतों के साथ छेड़खानी की घटनाएं तकरीबन नहीं होतीं,औरतों के प्रति सामान्यजन का स्वस्थ नजरिया है,साथ ही औरतें बिंदास,निडर और सुंदर हैं, 1979 के समय युवा लड़कियों में परंपरावाद हर स्तर पर हावी था लेकिन इन दिनों लड़कियों का ड्रेसकोड एकदम ग्लोबल है।वह कहीं से मथुरा वाली नहीं लगती ।लड़कियां पहले की तुलना में ज्यादा सामाजिक और सांस्कृतिक बनी हैं, सोशलमीडिया का जमकर उपयोग कर रही हैं।मसलन् 1979 के पहले लड़कियां मिलती थीं या बातें करती थीं तो उनके पास जितने विषय होते थे आज उससे कई गुना ज्यादा विषय होते हैं।लड़कियों का स्वभाव,रूपरंग,सौंदर्य आदि पहले की तुलना में गुणात्मक रूप से बदल चुका है।मैं मथुरा की सड़कों पर घूमते हुए यह महसूस नहीं कर रहा था कि मथुरा में हूँ बल्कि सड़कों पर लड़कियों की गतिशीलता,सौंदर्य,भाषा और सुंदर ड्रेसकोड बार बार ग्लोबल लड़की के भावबोध को संप्रेषित कर रहे थे।मथुरा की लड़की में आया यह बदलाव असामान्य चीज है,इससे मथुरा के आंतरिक गठन में आ रहे परिवर्तनों को पढ़ा जा सकता है।मैंने अभी मथुरा की युवा लड़कियों से मुलाकात नहीं की है, लेकिन निकट भविष्य में संभावनाएं हैं ,उनसे मिलने के बाद हो सकता है युवा लड़कियों के स्वभाव में आए परिवर्तनों को मैं और करीब से जान पाऊँ।

    मथुरा में बिताया बचपन रह- रहकर याद आता है सुबह उठता था चार बजे,अभी भी उठता हूं,दो घंटे पढने के बाद यमुना में जाकर नहाता था,वहीं संध्यावंदन करता था,घर लौटकर मां त्रिपुरसुंदरी की पूजा करके स्कूल जाता,जिस दिन छुट्टी रहती या कोई विशेष तिथि के दिन पूजा कई घंटे चलती,पिता ने स्वतंत्र रुप से पूजा के लिए कमरा बनवा दिया था,यज्ञोपवीत के साथ बाला और भुवनेश्वरी की विधिवत दीखा दिला दी और शाक्त परंपरा के अनुसार पूजा अर्चना सिखा दी जिसमें छुट्टियों के दिनों में घंटों गुजर जाते |खासकर मई- जून की छुट्टियों में बहुत मजा रहता, सुबह उठता था लेकिन पढ़ता नहीं था सुबह चार बजे यमुना में नहाना ,यमुना के उस पार दुर्वासा आश्रम के पास हमारी एक सुंदर बगीची और मंदिर था, वहां से कई थैले भरकर फूल लाता था और फिर घंटों उपासना में गुजर जाते यह सिलसिला सालों चला | यह सिलसिला अपने आप बंद हो गया जब मैं संस्कृत साहित्य से इतर साहित्य पढने लगा और मुझे दोस्त मिल गए| संभवत: मैं जब शास्त्री प्रथमवर्ष में था, आधुनिक साहित्य और दर्शन की किताबों के अध्ययन और मित्रों की संगति ने मुझे पूजा- अर्चना से मुक्ति दिला दी | यह मैंने अनुभव से सीखा कि ईश्वरोपासना तो खाली समय ,किताबें और मित्रों के अभाव से पैदा होती है |

    Reply
  • June 15, 2018 at 1:46 pm
    Permalink

    H L Dusadh Dusadh
    13 June at 22:27 ·
    प्रेमचंद के भक्तों जरा यह पढ़ लो !

    मित्रों, कल प्रसंगवश मैंने एक पोस्ट डाला था कि हिंदी पट्टी के प्रेमचंद-अज्ञेय इत्यादि को पढना मुझे अपने कीमती समय का दुरूपयोग लगता रहा.इस पर इनके भक्तों ने मेरा खासा मजाक उड़ाया .एक स्वनामधन्य यादव जी ने तो, जिन्हें बहुजन समाज का समझकर भरपूर आदर करता हूँ, मुझे मुर्ख ही घोषित कर दिया.
    पर, मित्रों मेरे समय का आज भी इतना कीमत है कि हिंदी पट्टी के साहित्यकारों, विचारकों को नहीं, को पढना सचमुच विलासिता लगता है. अब मेरे पास इतना समय नहीं कि हिंदी पट्टी के साहित्यकारों को फिर से पढूं और टिपण्णी के लिए समय निकालूँ.खैर इन साहित्यकारों , विशेषकर प्रेमचंद के विषय में खुद न कहकर उनके ही विराट गुणानुरागी राजेन्द्र यादव की कुछ पंक्तियाँ पोस्ट कर रहा हूँ

    ‘मैं तो इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि साहित्य कभी कोई दिशा ही नहीं देता.: कभी कोई क्रांति या परिवर्तन ही नहीं करता.वह तो औरों द्वारा किये गए विचारों और कर्मों से खुद दिशा लेता है, अपने को पैना और प्रभावशाली बनाता है और आगे जाकर अपने आपको जीवित रखता है.
    जिंदगी के अंधविश्वासों कि तरह अगर हम, समय रहते इस प्रश्न पर भी पुनर्विचार कर लें कि साहित्य कि प्रासंगिकता आज है क्या ? पूरी मनुष्य जाति के इतिहास में कब किसी कविता ,कहानी, उपन्यास ने समाज को बदला है? मनुष्य की तकदीर को जो शासन करते हैं, वे कब किसी कविता, कहानी,उपन्यास से प्रभावित हुए हैं?कौन से युद्ध, कौन सी हत्याएं और कौन से शोषण साहित्य ने रोके हैं?……….प्रेमचंद की रचनाएँ पढ़कर किन समस्यायों के निदान निकाले गए ?(कांटे की बात-1, न लिखने का कारण ,पृष्ठ- 26-27 )

    मित्रों, साहित्य की इस व्यर्थता को देखते हुए मैंने अपने दो दर्जन के करीब लिखे एकांकी नाटक, टीवी सीरियल के स्क्रिप्ट फ़ेंक दिए. सैकड़ों घंटे खर्च करके लिखे गए वे नाटक मेरे कद्रदानों के लिए बहुमूल्य थे. कई लोगों का मानना रहा है कि टीवी सीरियलों पर लिखे गए मेरे स्क्रिप्ट प्रथम श्रेणी के लेखकों से भी ज्यादा बेहतर रहे. युवास्था में मेरी जुबान से निकले हर वाक्य बेहतरीन शेर हुआ करते थे .लेकिन जब मैं सामाजिक बदलाव के लिए कलम पकड़ा शायर, नाट्यकार, स्क्रिप्ट राइटर दुसाध को हमेशा के लिए किल कर दिया.
    मुझे ऐसा लगता है यदि साहित्य से जुड़े ये ऐब, जिसे बहुत से लोग खूबियाँ कहते हैं. मेरे साथ जुड़ गया तो दुसाध की रायटर के रूप में जाति दूषित हो जाएगी.
    अब आप बताएं ग्रेट दुसाध प्रेमचंद-अज्ञेय इत्यादि को पढ़े तो उसके चाहने वालों को कैसा लगेगा. आप बताएं दुसाध द ग्रेट की मार्क्स-आंबेडकर के योग्यतम अनुसरणकरी के रूप में जो छवि है, क्या वह अक्षत रह पायेगी?आज की तारीख में बहुजनों को गुलामी से बचाने में सर्व शक्ति लगा रहे दुसाध को क्या हिंदी पट्टी प्रेमचंद -निराला इत्यादि को पढने में समय जाया करना चाहिए ?

    Reply
  • June 21, 2018 at 10:50 am
    Permalink

    जब तक ईद रहेगी तब तक प्रेमचंद की ईदगाह रहेगी बचपन में ईद के लिए बिलकुल ऐसा ही महसूस होता था रमजान के पूरे तीस रोजों के बाद ईद आयी है। कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभाव है। वृक्षों पर अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक है, आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है। आज का सूर्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है, यानी संसार को ईद की बधाई दे रहा है बिलकुल ऐसा ही , क्या थे प्रेमचंद उन्हें कैसे पता चला की हम बच्चे ईद के दिन बिलकुल यही फील कर रहे होते थे एक एक लाइन एक हीरा हे सदा के लिए ———-
    Rakesh Kayasth
    15 June at 20:12 ·
    सभी दोस्तों को ईद मुबारक। मेरी तरफ से बच्चो को ईदी में मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी ईदगाह। जिन बुजुर्गों ने नहीं पढ़ी वे भी पढ़ सकते हैं।

    ईदगाह
    ——–
    रमजान के पूरे तीस रोजों के बाद ईद आयी है। कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभाव है। वृक्षों पर अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक है, आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है। आज का सूर्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है, यानी संसार को ईद की बधाई दे रहा है। गॉंव में कितनी हलचल है। ईदगाह जाने की तैयारियॉँ हो रही हैं। किसी के कुरते में बटन नहीं है, पड़ोस के घर में सुई-धागा लेने दौड़ा जा रहा है। किसी के जूते कड़े हो गए हैं, उनमें तेल डालने के लिए तेली के घर पर भागा जाता है। जल्दी-जल्दी बैलों को सानी-पानी दे दें। ईदगाह से लौटते-लौटते दोपहर हो जाएगी। तीन कोस का पेदल रास्ता, फिर सैकड़ों आदमियों से मिलना-भेंटना, दोपहर के पहले लोटना असम्भव है। लड़के सबसे ज्यादा प्रसन्न हैं। किसी ने एक रोजा रखा है, वह भी दोपहर तक, किसी ने वह भी नहीं, लेकिन ईदगाह जाने की खुशी उनके हिस्से की चीज है। रोजे बड़े-बूढ़ो के लिए होंगे। इनके लिए तो ईद है। रोज ईद का नाम रटते थे, आज वह आ गई। अब जल्दी पड़ी है कि लोग ईदगाह क्यों नहीं चलते। इन्हें गृहस्थी चिंताओं से क्या प्रयोजन! सेवैयों के लिए दूध ओर शक्कर घर में है या नहीं, इनकी बला से, ये तो सेवेयां खाऍंगे। वह क्या जानें कि अब्बाजान क्यों बदहवास चौधरी कायमअली के घर दौड़े जा रहे हैं। उन्हें क्या खबर कि चौधरी ऑंखें बदल लें, तो यह सारी ईद मुहर्रम हो जाए। उनकी अपनी जेबों में तो कुबेर काधन भरा हुआ है। बार-बार जेब से अपना खजाना निकालकर गिनते हैं और खुश होकर फिर रख लेते हैं। महमूद गिनता है, एक-दो, दस,-बारह, उसके पास बारह पैसे हैं। मोहनसिन के पास एक, दो, तीन, आठ, नौ, पंद्रह पैसे हैं। इन्हीं अनगिनती पैसों में अनगिनती चीजें लाऍंगें— खिलौने, मिठाइयां, बिगुल, गेंद और जाने क्या-क्या।
    और सबसे ज्यादा प्रसन्न है हामिद। वह चार-पॉँच साल का गरीब सूरत, दुबला-पतला लड़का, जिसका बाप गत वर्ष हैजे की भेंट हो गया और मॉँ न जाने क्यों पीली होती-होती एक दिन मर गई। किसी को पता क्या बीमारी है। कहती तो कौन सुनने वाला था? दिल पर जो कुछ बीतती थी, वह दिल में ही सहती थी ओर जब न सहा गया,. तो संसार से विदा हो गई। अब हामिद अपनी बूढ़ी दादी अमीना की गोद में सोता है और उतना ही प्रसन्न है। उसके अब्बाजान रूपये कमाने गए हैं। बहुत-सी थैलियॉँ लेकर आऍंगे। अम्मीजान अल्लहा मियॉँ के घर से उसके लिए बड़ी अच्छी-अच्छी चीजें लाने गई हैं, इसलिए हामिद प्रसन्न है। आशा तो बड़ी चीज है, और फिर बच्चों की आशा! उनकी कल्पना तो राई का पर्वत बना लेती हे। हामिद के पॉंव में जूते नहीं हैं, सिर परएक पुरानी-धुरानी टोपी है, जिसका गोटा काला पड़ गया है, फिर भी वह प्रसन्न है। जब उसके अब्बाजान थैलियॉँ और अम्मीजान नियमतें लेकर आऍंगी, तो वह दिल से अरमान निकाल लेगा। तब देखेगा, मोहसिन, नूरे और सम्मी कहॉँ से उतने पैसे निकालेंगे।
    अभागिन अमीना अपनी कोठरी में बैठी रो रही है। आज ईद का दिन, उसके घर में दाना नहीं! आज आबिद होता, तो क्या इसी तरह ईद आती ओर चली जाती! इस अन्धकार और निराशा में वह डूबी जा रही है। किसने बुलाया था इस निगोड़ी ईद को? इस घर में उसका काम नहीं, लेकिन हामिद! उसे किसी के मरने-जीने के क्या मतल? उसके अन्दर प्रकाश है, बाहर आशा। विपत्ति अपना सारा दलबल लेकर आये, हामिद की आनंद-भरी चितबन उसका विध्वसं कर देगी।
    हामिद भीतर जाकर दादी से कहता है—तुम डरना नहीं अम्मॉँ, मै सबसे पहले आऊँगा। बिल्कुल न डरना।
    अमीना का दिल कचोट रहा है। गॉँव के बच्चे अपने-अपने बाप के साथ जा रहे हैं। हामिद का बाप अमीना के सिवा और कौन है! उसे केसे अकेले मेले जाने दे? उस भीड़-भाड़ से बच्चा कहीं खो जाए तो क्या हो? नहीं, अमीना उसे यों न जाने देगी। नन्ही-सी जान! तीन कोस चलेगा कैसे? पैर में छाले पड़ जाऍंगे। जूते भी तो नहीं हैं। वह थोड़ी-थोड़ी दूर पर उसे गोद में ले लेती, लेकिन यहॉँ सेवैयॉँ कोन पकाएगा? पैसे होते तो लौटते-लोटते सब सामग्री जमा करके चटपट बना लेती। यहॉँ तो घंटों चीजें जमा करते लगेंगे। मॉँगे का ही तो भरोसा ठहरा। उस दिन फहीमन के कपड़े सिले थे। आठ आने पेसे मिले थे। उस उठन्नी को ईमान की तरह बचाती चली आती थी इसी ईद के लिए लेकिन कल ग्वालन सिर पर सवार हो गई तो क्या करती? हामिद के लिए कुछ नहीं हे, तो दो पैसे का दूध तो चाहिए ही। अब तो कुल दो आने पैसे बच रहे हैं। तीन पैसे हामिद की जेब में, पांच अमीना के बटुवें में। यही तो बिसात है और ईद का त्यौहार, अल्ला ही बेड़ा पर लगाए। धोबन और नाइन ओर मेहतरानी और चुड़िहारिन सभी तो आऍंगी। सभी को सेवेयॉँ चाहिए और थोड़ा किसी को ऑंखों नहीं लगता। किस-किस सें मुँह चुरायेगी? और मुँह क्यों चुराए? साल-भर का त्योंहार हैं। जिन्दगी खैरियत से रहें, उनकी तकदीर भी तो उसी के साथ है: बच्चे को खुदा सलामत रखे, यें दिन भी कट जाऍंगे।
    गॉँव से मेला चला। ओर बच्चों के साथ हामिद भी जा रहा था। कभी सबके सब दौड़कर आगे निकल जाते। फिर किसी पेड़ के नींचे खड़े होकर साथ वालों का इंतजार करते। यह लोग क्यों इतना धीरे-धीरे चल रहे हैं? हामिद के पैरो में तो जैसे पर लग गए हैं। वह कभी थक सकता है? शहर का दामन आ गया। सड़क के दोनों ओर अमीरों के बगीचे हैं। पक्की चारदीवारी बनी हुई है। पेड़ो में आम और लीचियॉँ लगी हुई हैं। कभी-कभी कोई लड़का कंकड़ी उठाकर आम पर निशान लगाता हे। माली अंदर से गाली देता हुआ निंलता है। लड़के वहाँ से एक फलॉँग पर हैं। खूब हँस रहे हैं। माली को केसा उल्लू बनाया है।
    बड़ी-बड़ी इमारतें आने लगीं। यह अदालत है, यह कालेज है, यह क्लब घर है। इतने बड़े कालेज में कितने लड़के पढ़ते होंगे? सब लड़के नहीं हैं जी! बड़े-बड़े आदमी हैं, सच! उनकी बड़ी-बड़ी मूँछे हैं। इतने बड़े हो गए, अभी तक पढ़ते जाते हैं। न जाने कब तक पढ़ेंगे ओर क्या करेंगे इतना पढ़कर! हामिद के मदरसे में दो-तीन बड़े-बड़े लड़के हें, बिल्कुल तीन कौड़ी के। रोज मार खाते हैं, काम से जी चुराने वाले। इस जगह भी उसी तरह के लोग होंगे ओर क्या। क्लब-घर में जादू होता है। सुना है, यहॉँ मुर्दो की खोपड़ियां दौड़ती हैं। और बड़े-बड़े तमाशे होते हें, पर किसी कोअंदर नहीं जाने देते। और वहॉँ शाम को साहब लोग खेलते हैं। बड़े-बड़े आदमी खेलते हें, मूँछो-दाढ़ी वाले। और मेमें भी खेलती हैं, सच! हमारी अम्मॉँ को यह दे दो, क्या नाम है, बैट, तो उसे पकड़ ही न सके। घुमाते ही लुढ़क जाऍं।
    महमूद ने कहा—हमारी अम्मीजान का तो हाथ कॉँपने लगे, अल्ला कसम।
    मोहसिन बोल—चलों, मनों आटा पीस डालती हैं। जरा-सा बैट पकड़ लेगी, तो हाथ कॉँपने लगेंगे! सौकड़ों घड़े पानी रोज निकालती हैं। पॉँच घड़े तो तेरी भैंस पी जाती है। किसी मेम को एक घड़ा पानी भरना पड़े, तो ऑंखों तक अँधेरी आ जाए।
    महमूद—लेकिन दौड़तीं तो नहीं, उछल-कूद तो नहीं सकतीं।
    मोहसिन—हॉँ, उछल-कूद तो नहीं सकतीं; लेकिन उस दिन मेरी गाय खुल गई थी और चौधरी के खेत में जा पड़ी थी, अम्मॉँ इतना तेज दौड़ी कि में उन्हें न पा सका, सच।
    आगे चले। हलवाइयों की दुकानें शुरू हुई। आज खूब सजी हुई थीं। इतनी मिठाइयॉँ कौन खाता? देखो न, एक-एक दूकान पर मनों होंगी। सुना है, रात को जिन्नात आकर खरीद ले जाते हैं। अब्बा कहते थें कि आधी रात को एक आदमी हर दूकान पर जाता है और जितना माल बचा होता है, वह तुलवा लेता है और सचमुच के रूपये देता है, बिल्कुल ऐसे ही रूपये।
    हामिद को यकीन न आया—ऐसे रूपये जिन्नात को कहॉँ से मिल जाऍंगी?
    मोहसिन ने कहा—जिन्नात को रूपये की क्या कमी? जिस खजाने में चाहें चले जाऍं। लोहे के दरवाजे तक उन्हें नहीं रोक सकते जनाब, आप हैं किस फेर में! हीरे-जवाहरात तक उनके पास रहते हैं। जिससे खुश हो गए, उसे टोकरों जवाहरात दे दिए। अभी यहीं बैठे हें, पॉँच मिनट में कलकत्ता पहुँच जाऍं।
    हामिद ने फिर पूछा—जिन्नात बहुत बड़े-बड़े होते हैं?
    मोहसिन—एक-एक सिर आसमान के बराबर होता है जी! जमीन पर खड़ा हो जाए तो उसका सिर आसमान से जा लगे, मगर चाहे तो एक लोटे में घुस जाए।
    हामिद—लोग उन्हें केसे खुश करते होंगे? कोई मुझे यह मंतर बता दे तो एक जिनन को खुश कर लूँ।
    मोहसिन—अब यह तो न जानता, लेकिन चौधरी साहब के काबू में बहुत-से जिन्नात हैं। कोई चीज चोरी जाए चौधरी साहब उसका पता लगा देंगे ओर चोर का नाम बता देगें। जुमराती का बछवा उस दिन खो गया था। तीन दिन हैरान हुए, कहीं न मिला तब झख मारकर चौधरी के पास गए। चौधरी ने तुरन्त बता दिया, मवेशीखाने में है और वहीं मिला। जिन्नात आकर उन्हें सारे जहान की खबर दे जाते हैं।
    अब उसकी समझ में आ गया कि चौधरी के पास क्यों इतना धन है और क्यों उनका इतना सम्मान है।
    आगे चले। यह पुलिस लाइन है। यहीं सब कानिसटिबिल कवायद करते हैं। रैटन! फाय फो! रात को बेचारे घूम-घूमकर पहरा देते हैं, नहीं चोरियॉँ हो जाऍं। मोहसिन ने प्रतिवाद किया—यह कानिसटिबिल पहरा देते हें? तभी तुम बहुत जानते हों अजी हजरत, यह चोरी करते हैं। शहर के जितने चोर-डाकू हें, सब इनसे मुहल्ले में जाकर ‘जागते रहो! जाते रहो!’ पुकारते हें। तभी इन लोगों के पास इतने रूपये आते हें। मेरे मामू एक थाने में कानिसटिबिल हें। बरस रूपया महीना पाते हें, लेकिन पचास रूपये घर भेजते हें। अल्ला कसम! मैंने एक बार पूछा था कि मामू, आप इतने रूपये कहॉँ से पाते हैं? हँसकर कहने लगे—बेटा, अल्लाह देता है। फिर आप ही बोले—हम लोग चाहें तो एक दिन में लाखों मार लाऍं। हम तो इतना ही लेते हैं, जिसमें अपनी बदनामी न हो और नौकरी न चली जाए।
    हामिद ने पूछा—यह लोग चोरी करवाते हैं, तो कोई इन्हें पकड़ता नहीं?
    मोहसिन उसकी नादानी पर दया दिखाकर बोला..अरे, पागल! इन्हें कौन पकड़ेगा! पकड़ने वाले तो यह लोग खुद हैं, लेकिन अल्लाह, इन्हें सजा भी खूब देता है। हराम का माल हराम में जाता है। थोड़े ही दिन हुए, मामू के घर में आग लग गई। सारी लेई-पूँजी जल गई। एक बरतन तक न बचा। कई दिन पेड़ के नीचे सोए, अल्ला कसम, पेड़ के नीचे! फिरन जाने कहॉँ से एक सौ कर्ज लाए तो बरतन-भॉँड़े आए।
    हामिद—एक सौ तो पचार से ज्यादा होते है?
    ‘कहॉँ पचास, कहॉँ एक सौ। पचास एक थैली-भर होता है। सौ तो दो थैलियों में भी न आऍं?
    अब बस्ती घनी होने लगी। ईइगाह जाने वालो की टोलियॉँ नजर आने लगी। एक से एक भड़कीले वस्त्र पहने हुए। कोई इक्के-तॉँगे पर सवार, कोई मोटर पर, सभी इत्र में बसे, सभी के दिलों में उमंग। ग्रामीणों का यह छोटा-सा दल अपनी विपन्नता से बेखबर, सन्तोष ओर धैर्य में मगन चला जा रहा था। बच्चों के लिए नगर की सभी चीजें अनोखी थीं। जिस चीज की ओर ताकते, ताकते ही रह जाते और पीछे से आर्न की आवाज होने पर भी न चेतते। हामिद तो मोटर के नीचे जाते-जाते बचा।
    सहसा ईदगाह नजर आई। ऊपर इमली के घने वृक्षों की छाया हे। नाचे पक्का फर्श है, जिस पर जाजम ढिछा हुआ है। और रोजेदारों की पंक्तियॉँ एक के पीछे एक न जाने कहॉँ वक चली गई हैं, पक्की जगत के नीचे तक, जहॉँ जाजम भी नहीं है। नए आने वाले आकर पीछे की कतार में खड़े हो जाते हैं। आगे जगह नहीं हे। यहॉँ कोई धन और पद नहीं देखता। इस्लाम की निगाह में सब बराबर हें। इन ग्रामीणों ने भी वजू किया ओर पिछली पंक्ति में खड़े हो गए। कितना सुन्दर संचालन है, कितनी सुन्दर व्यवस्था! लाखों सिर एक साथ सिजदे में झुक जाते हैं, फिर सबके सब एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ झुकते हें, और एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ झुकते हें, और एक साथ खड़े हो जाते हैं, कई बार यही क्रिया होती हे, जैसे बिजली की लाखों बत्तियाँ एक साथ प्रदीप्त हों और एक साथ बुझ जाऍं, और यही ग्रम चलता, रहे। कितना अपूर्व दृश्य था, जिसकी सामूहिक क्रियाऍं, विस्तार और अनंतता हृदय को श्रद्धा, गर्व और आत्मानंद से भर देती थीं, मानों भ्रातृत्व का एक सूत्र इन समस्त आत्माओं को एक लड़ी में पिरोए हुए हैं।

    नमाज खत्म हो गई। लोग आपस में गले मिल रहे हैं। तब मिठाई और खिलौने की दूकान पर धावा होता है। ग्रामीणों का यह दल इस विषय में बालकों से कम उत्साही नहीं है। यह देखो, हिंडोला हें एक पैसा देकर चढ़ जाओ। कभी आसमान पर जाते हुए मालूम होगें, कभी जमीन पर गिरते हुए। यह चर्खी है, लकड़ी के हाथी, घोड़े, ऊँट, छड़ो में लटके हुए हैं। एक पेसा देकर बैठ जाओं और पच्चीस चक्करों का मजा लो। महमूद और मोहसिन ओर नूरे ओर सम्मी इन घोड़ों ओर ऊँटो पर बैठते हें। हामिद दूर खड़ा है। तीन ही पैसे तो उसके पास हैं। अपने कोष का एक तिहाई जरा-सा चक्कर खाने के लिए नहीं दे सकता।
    सब चर्खियों से उतरते हैं। अब खिलौने लेंगे। अधर दूकानों की कतार लगी हुई है। तरह-तरह के खिलौने हैं—सिपाही और गुजरिया, राज ओर वकी, भिश्ती और धोबिन और साधु। वह! कत्ते सुन्दर खिलोने हैं। अब बोला ही चाहते हैं। महमूद सिपाही लेता हे, खाकी वर्दी और लाल पगड़ीवाला, कंधें पर बंदूक रखे हुए, मालूम होता हे, अभी कवायद किए चला आ रहा है। मोहसिन को भिश्ती पसंद आया। कमर झुकी हुई है, ऊपर मशक रखे हुए हैं मशक का मुँह एक हाथ से पकड़े हुए है। कितना प्रसन्न है! शायद कोई गीत गा रहा है। बस, मशक से पानी अड़ेला ही चाहता है। नूरे को वकील से प्रेम हे। कैसी विद्वत्ता हे उसके मुख पर! काला चोगा, नीचे सफेद अचकन, अचकन के सामने की जेब में घड़ी, सुनहरी जंजीर, एक हाथ में कानून का पौथा लिये हुए। मालूम होता है, अभी किसी अदालत से जिरह या बहस किए चले आ रहे है। यह सब दो-दो पैसे के खिलौने हैं। हामिद के पास कुल तीन पैसे हैं, इतने महँगे खिलौन वह केसे ले? खिलौना कहीं हाथ से छूट पड़े तो चूर-चूर हो जाए। जरा पानी पड़े तो सारा रंग घुल जाए। ऐसे खिलौने लेकर वह क्या करेगा, किस काम के!
    मोहसिन कहता है—मेरा भिश्ती रोज पानी दे जाएगा सॉँझ-सबेरे
    महमूद—और मेरा सिपाही घर का पहरा देगा कोई चोर आएगा, तो फौरन बंदूक से फैर कर देगा।
    नूरे—ओर मेरा वकील खूब मुकदमा लड़ेगा।
    सम्मी—ओर मेरी धोबिन रोज कपड़े धोएगी।
    हामिद खिलौनों की निंदा करता है—मिट्टी ही के तो हैं, गिरे तो चकनाचूर हो जाऍं, लेकिन ललचाई हुई ऑंखों से खिलौनों को देख रहा है और चाहता है कि जरा देर के लिए उन्हें हाथ में ले सकता। उसके हाथ अनायास ही लपकते हें, लेकिन लड़के इतने त्यागी नहीं होते हें, विशेषकर जब अभी नया शौक है। हामिद ललचता रह जाता है।
    खिलौने के बाद मिठाइयाँ आती हैं। किसी ने रेवड़ियॉँ ली हें, किसी ने गुलाबजामुन किसी ने सोहन हलवा। मजे से खा रहे हैं। हामिद बिरादरी से पृथक् है। अभागे के पास तीन पैसे हैं। क्यों नहीं कुछ लेकर खाता? ललचाई ऑंखों से सबक ओर देखता है।
    मोहसिन कहता है—हामिद रेवड़ी ले जा, कितनी खुशबूदार है!
    हामिद को सदेंह हुआ, ये केवल क्रूर विनोद हें मोहसिन इतना उदार नहीं है, लेकिन यह जानकर भी वह उसके पास जाता है। मोहसिन दोने से एक रेवड़ी निकालकर हामिद की ओर बढ़ाता है। हामिद हाथ फैलाता है। मोहसिन रेवड़ी अपने मुँह में रख लेता है। महमूद नूरे ओर सम्मी खूब तालियॉँ बजा-बजाकर हँसते हैं। हामिद खिसिया जाता है।
    मोहसिन—अच्छा, अबकी जरूर देंगे हामिद, अल्लाह कसम, ले जा।
    हामिद—रखे रहो। क्या मेरे पास पैसे नहीं है?
    सम्मी—तीन ही पेसे तो हैं। तीन पैसे में क्या-क्या लोगें?
    महमूद—हमसे गुलाबजामुन ले जाओ हामिद। मोहमिन बदमाश है।
    हामिद—मिठाई कौन बड़ी नेमत है। किताब में इसकी कितनी बुराइयॉँ लिखी हैं।
    मोहसिन—लेकिन दिन मे कह रहे होगे कि मिले तो खा लें। अपने पैसे क्यों नहीं निकालते?
    महमूद—इस समझते हें, इसकी चालाकी। जब हमारे सारे पैसे खर्च हो जाऍंगे, तो हमें ललचा-ललचाकर खाएगा।
    मिठाइयों के बाद कुछ दूकानें लोहे की चीजों की, कुछ गिलट और कुछ नकली गहनों की। लड़कों के लिए यहॉँ कोई आकर्षण न था। वे सब आगे बढ़ जाते हैं, हामिद लोहे की दुकान पररूक जात हे। कई चिमटे रखे हुए थे। उसे ख्याल आया, दादी के पास चिमटा नहीं है। तबे से रोटियॉँ उतारती हैं, तो हाथ जल जाता है। अगर वह चिमटा ले जाकर दादी को दे दे तो वह कितना प्रसन्न होगी! फिर उनकी ऊगलियॉँ कभी न जलेंगी। घर में एक काम की चीज हो जाएगी। खिलौने से क्या फायदा? व्यर्थ में पैसे खराब होते हैं। जरा देर ही तो खुशी होती है। फिर तो खिलौने को कोई ऑंख उठाकर नहीं देखता। यह तो घर पहुँचते-पहुँचते टूट-फूट बराबर हो जाऍंगे। चिमटा कितने काम की चीज है। रोटियॉँ तवे से उतार लो, चूल्हें में सेंक लो। कोई आग मॉँगने आये तो चटपट चूल्हे से आग निकालकर उसे दे दो। अम्मॉँ बेचारी को कहॉँ फुरसत हे कि बाजार आऍं और इतने पैसे ही कहॉँ मिलते हैं? रोज हाथ जला लेती हैं।
    हामिद के साथी आगे बढ़ गए हैं। सबील पर सबके सब शर्बत पी रहे हैं। देखो, सब कतने लालची हैं। इतनी मिठाइयॉँ लीं, मुझे किसी ने एक भी न दी। उस पर कहते है, मेरे साथ खेलो। मेरा यह काम करों। अब अगर किसी ने कोई काम करने को कहा, तो पूछूँगा। खाऍं मिठाइयॉँ, आप मुँह सड़ेगा, फोड़े-फुन्सियॉं निकलेंगी, आप ही जबान चटोरी हो जाएगी। तब घर से पैसे चुराऍंगे और मार खाऍंगे। किताब में झूठी बातें थोड़े ही लिखी हें। मेरी जबान क्यों खराब होगी? अम्मॉँ चिमटा देखते ही दौड़कर मेरे हाथ से ले लेंगी और कहेंगी—मेरा बच्चा अम्मॉँ के लिए चिमटा लाया है। कितना अच्छा लड़का है। इन लोगों के खिलौने पर कौन इन्हें दुआऍं देगा? बड़ों का दुआऍं सीधे अल्लाह के दरबार में पहुँचती हैं, और तुरंत सुनी जाती हैं। में भी इनसे मिजाज क्यों सहूँ? मैं गरीब सही, किसी से कुछ मॉँगने तो नहीं जाते। आखिर अब्बाजान कभीं न कभी आऍंगे। अम्मा भी ऑंएगी ही। फिर इन लोगों से पूछूँगा, कितने खिलौने लोगे? एक-एक को टोकरियों खिलौने दूँ और दिखा हूँ कि दोस्तों के साथ इस तरह का सलूक किया जात है। यह नहीं कि एक पैसे की रेवड़ियॉँ लीं, तो चिढ़ा-चिढ़ाकर खाने लगे। सबके सब हँसेंगे कि हामिद ने चिमटा लिया है। हंसें! मेरी बला से! उसने दुकानदार से पूछा—यह चिमटा कितने का है?
    दुकानदार ने उसकी ओर देखा और कोई आदमी साथ न देखकर कहा—तुम्हारे काम का नहीं है जी!
    ‘बिकाऊ है कि नहीं?’
    ‘बिकाऊ क्यों नहीं है? और यहॉँ क्यों लाद लाए हैं?’
    तो बताते क्यों नहीं, कै पैसे का है?’
    ‘छ: पैसे लगेंगे।‘
    हामिद का दिल बैठ गया।
    ‘ठीक-ठीक पॉँच पेसे लगेंगे, लेना हो लो, नहीं चलते बनो।‘
    हामिद ने कलेजा मजबूत करके कहा तीन पैसे लोगे?
    यह कहता हुआ व आगे बढ़ गया कि दुकानदार की घुड़कियॉँ न सुने। लेकिन दुकानदार ने घुड़कियॉँ नहीं दी। बुलाकर चिमटा दे दिया। हामिद ने उसे इस तरह कंधे पर रखा, मानों बंदूक है और शान से अकड़ता हुआ संगियों के पास आया। जरा सुनें, सबके सब क्या-क्या आलोचनाऍं करते हैं!
    मोहसिन ने हँसकर कहा—यह चिमटा क्यों लाया पगले, इसे क्या करेगा?
    हामिद ने चिमटे को जमीन पर पटकर कहा—जरा अपना भिश्ती जमीन पर गिरा दो। सारी पसलियॉँ चूर-चूर हो जाऍं बचा की।
    महमूद बोला—तो यह चिमटा कोई खिलौना है?
    हामिद—खिलौना क्यों नही है! अभी कन्धे पर रखा, बंदूक हो गई। हाथ में ले लिया, फकीरों का चिमटा हो गया। चाहूँ तो इससे मजीरे काकाम ले सकता हूँ। एक चिमटा जमा दूँ, तो तुम लोगों के सारे खिलौनों की जान निकल जाए। तुम्हारे खिलौने कितना ही जोर लगाऍं, मेरे चिमटे का बाल भी बॉंका नही कर सकतें मेरा बहादुर शेर है चिमटा।
    सम्मी ने खँजरी ली थी। प्रभावित होकर बोला—मेरी खँजरी से बदलोगे? दो आने की है।
    हामिद ने खँजरी की ओर उपेक्षा से देखा-मेरा चिमटा चाहे तो तुम्हारी खॅजरी का पेट फाड़ डाले। बस, एक चमड़े की झिल्ली लगा दी, ढब-ढब बोलने लगी। जरा-सा पानी लग जाए तो खत्म हो जाए। मेरा बहादुर चिमटा आग में, पानी में, ऑंधी में, तूफान में बराबर डटा खड़ा रहेगा।
    चिमटे ने सभी को मोहित कर लिया, अब पैसे किसके पास धरे हैं? फिर मेले से दूर निकल आए हें, नौ कब के बज गए, धूप तेज हो रही है। घर पहुंचने की जल्दी हो रही हे। बाप से जिद भी करें, तो चिमटा नहीं मिल सकता। हामिद है बड़ा चालाक। इसीलिए बदमाश ने अपने पैसे बचा रखे थे।
    अब बालकों के दो दल हो गए हैं। मोहसिन, महमद, सम्मी और नूरे एक तरफ हैं, हामिद अकेला दूसरी तरफ। शास्त्रर्थ हो रहा है। सम्मी तो विधर्मी हा गया! दूसरे पक्ष से जा मिला, लेकिन मोहनि, महमूद और नूरे भी हामिद से एक-एक, दो-दो साल बड़े होने पर भी हामिद के आघातों से आतंकित हो उठे हैं। उसके पास न्याय का बल है और नीति की शक्ति। एक ओर मिट्टी है, दूसरी ओर लोहा, जो इस वक्त अपने को फौलाद कह रहा है। वह अजेय है, घातक है। अगर कोई शेर आ जाए मियॉँ भिश्ती के छक्के छूट जाऍं, जो मियॉँ सिपाही मिट्टी की बंदूक छोड़कर भागे, वकील साहब की नानी मर जाए, चोगे में मुंह छिपाकर जमीन पर लेट जाऍं। मगर यह चिमटा, यह बहादुर, यह रूस्तमे-हिंद लपककर शेर की गरदन पर सवार हो जाएगा और उसकी ऑंखे निकाल लेगा।
    मोहसिन ने एड़ी—चोटी का जारे लगाकर कहा—अच्छा, पानी तो नहीं भर सकता?
    हामिद ने चिमटे को सीधा खड़ा करके कहा—भिश्ती को एक डांट बताएगा, तो दौड़ा हुआ पानी लाकर उसके द्वार पर छिड़कने लगेगा।
    मोहसिन परास्त हो गया, पर महमूद ने कुमुक पहुँचाई—अगर बचा पकड़ जाऍं तो अदालम में बॅधे-बँधे फिरेंगे। तब तो वकील साहब के पैरों पड़ेगे।
    हामिद इस प्रबल तर्क का जवाब न दे सका। उसने पूछा—हमें पकड़ने कौने आएगा?
    नूरे ने अकड़कर कहा—यह सिपाही बंदूकवाला।
    हामिद ने मुँह चिढ़ाकर कहा—यह बेचारे हम बहादुर रूस्तमे—हिंद को पकड़ेगें! अच्छा लाओ, अभी जरा कुश्ती हो जाए। इसकी सूरत देखकर दूर से भागेंगे। पकड़ेगें क्या बेचारे!
    मोहसिन को एक नई चोट सूझ गई—तुम्हारे चिमटे का मुँह रोज आग में जलेगा।
    उसने समझा था कि हामिद लाजवाब हो जाएगा, लेकिन यह बात न हुई। हामिद ने तुरंत जवाब दिया—आग में बहादुर ही कूदते हैं जनाब, तुम्हारे यह वकील, सिपाही और भिश्ती लैडियों की तरह घर में घुस जाऍंगे। आग में वह काम है, जो यह रूस्तमे-हिन्द ही कर सकता है।
    महमूद ने एक जोर लगाया—वकील साहब कुरसी—मेज पर बैठेगे, तुम्हारा चिमटा तो बाबरचीखाने में जमीन पर पड़ा रहने के सिवा और क्या कर सकता है?
    इस तर्क ने सम्मी औरनूरे को भी सजी कर दिया! कितने ठिकाने की बात कही हे पट्ठे ने! चिमटा बावरचीखाने में पड़ा रहने के सिवा और क्या कर सकता है?
    हामिद को कोई फड़कता हुआ जवाब न सूझा, तो उसने धॉँधली शुरू की—मेरा चिमटा बावरचीखाने में नही रहेगा। वकील साहब कुर्सी पर बैठेगें, तो जाकर उन्हे जमीन पर पटक देगा और उनका कानून उनके पेट में डाल देगा।
    बात कुछ बनी नही। खाल गाली-गलौज थी, लेकिन कानून को पेट में डालनेवाली बात छा गई। ऐसी छा गई कि तीनों सूरमा मुँह ताकते रह गए मानो कोई धेलचा कानकौआ किसी गंडेवाले कनकौए को काट गया हो। कानून मुँह से बाहर निकलने वाली चीज हे। उसको पेट के अन्दर डाल दिया जाना बेतुकी-सी बात होने पर भी कुछ नयापन रखती हे। हामिद ने मैदान मार लिया। उसका चिमटा रूस्तमे-हिन्द हे। अब इसमें मोहसिन, महमूद नूरे, सम्मी किसी को भी आपत्ति नहीं हो सकती।
    विजेता को हारनेवालों से जो सत्कार मिलना स्वाभविक है, वह हामिद को भी मिल। औरों ने तीन-तीन, चार-चार आने पैसे खर्च किए, पर कोई काम की चीज न ले सके। हामिद ने तीन पैसे में रंग जमा लिया। सच ही तो है, खिलौनों का क्या भरोसा? टूट-फूट जाऍंगी। हामिद का चिमटा तो बना रहेगा बरसों?
    संधि की शर्ते तय होने लगीं। मोहसिन ने कहा—जरा अपना चिमटा दो, हम भी देखें। तुम हमार भिश्ती लेकर देखो।
    महमूद और नूरे ने भी अपने-अपने खिलौने पेश किए।
    हामिद को इन शर्तो को मानने में कोई आपत्ति न थी। चिमटा बारी-बारी से सबके हाथ में गया, और उनके खिलौने बारी-बारी से हामिद के हाथ में आए। कितने खूबसूरत खिलौने हैं।
    हामिद ने हारने वालों के ऑंसू पोंछे—मैं तुम्हे चिढ़ा रहा था, सच! यह चिमटा भला, इन खिलौनों की क्या बराबर करेगा, मालूम होता है, अब बोले, अब बोले।
    लेकिन मोहसनि की पार्टी को इस दिलासे से संतोष नहीं होता। चिमटे का सिल्का खूब बैठ गया है। चिपका हुआ टिकट अब पानी से नहीं छूट रहा है।
    मोहसिन—लेकिन इन खिलौनों के लिए कोई हमें दुआ तो न देगा?
    महमूद—दुआ को लिय फिरते हो। उल्टे मार न पड़े। अम्मां जरूर कहेंगी कि मेले में यही मिट्टी के खिलौने मिले?
    हामिद को स्वीकार करना पड़ा कि खिलौनों को देखकर किसी की मां इतनी खुश न होगी, जितनी दादी चिमटे को देखकर होंगी। तीन पैसों ही में तो उसे सब-कुछ करना था ओर उन पैसों के इस उपयों पर पछतावे की बिल्कुल जरूरत न थी। फिर अब तो चिमटा रूस्तमें—हिन्द हे ओर सभी खिलौनों का बादशाह।
    रास्ते में महमूद को भूख लगी। उसके बाप ने केले खाने को दियें। महमून ने केवल हामिद को साझी बनाया। उसके अन्य मित्र मुंह ताकते रह गए। यह उस चिमटे का प्रसाद था।

    ग्यारह बजे गॉँव में हलचल मच गई। मेलेवाले आ गए। मोहसिन की छोटी बहन दौड़कर भिश्ती उसके हाथ से छीन लिया और मारे खुशी के जा उछली, तो मियॉं भिश्ती नीचे आ रहे और सुरलोक सिधारे। इस पर भाई-बहन में मार-पीट हुई। दानों खुब रोए। उसकी अम्मॉँ यह शोर सुनकर बिगड़ी और दोनों को ऊपर से दो-दो चॉँटे और लगाए।
    मियॉँ नूरे के वकील का अंत उनके प्रतिष्ठानुकूल इससे ज्यादा गौरवमय हुआ। वकील जमीन पर या ताक पर हो नहीं बैठ सकता। उसकी मर्यादा का विचार तो करना ही होगा। दीवार में खूँटियाँ गाड़ी गई। उन पर लकड़ी का एक पटरा रखा गया। पटरे पर कागज का कालीन बिदाया गया। वकील साहब राजा भोज की भाँति सिंहासन पर विराजे। नूरे ने उन्हें पंखा झलना शुरू किया। आदालतों में खर की टट्टियॉँ और बिजली के पंखे रहते हें। क्या यहॉँ मामूली पंखा भी न हो! कानून की गर्मी दिमाग पर चढ़ जाएगी कि नहीं? बॉँस कापंखा आया ओर नूरे हवा करने लगें मालूम नहीं, पंखे की हवा से या पंखे की चोट से वकील साहब स्वर्गलोक से मृत्युलोक में आ रहे और उनका माटी का चोला माटी में मिल गया! फिर बड़े जोर-शोर से मातम हुआ और वकील साहब की अस्थि घूरे पर डाल दी गई।
    अब रहा महमूद का सिपाही। उसे चटपट गॉँव का पहरा देने का चार्ज मिल गया, लेकिन पुलिस का सिपाही कोई साधारण व्यक्ति तो नहीं, जो अपने पैरों चलें वह पालकी पर चलेगा। एक टोकरी आई, उसमें कुछ लाल रंग के फटे-पुराने चिथड़े बिछाए गए जिसमें सिपाही साहब आराम से लेटे। नूरे ने यह टोकरी उठाई और अपने द्वार का चक्कर लगाने लगे। उनके दोनों छोटे भाई सिपाही की तरह ‘छोनेवाले, जागते लहो’ पुकारते चलते हें। मगर रात तो अँधेरी होनी चाहिए, नूरे को ठोकर लग जाती है। टोकरी उसके हाथ से छूटकर गिर पड़ती है और मियॉँ सिपाही अपनी बन्दूक लिये जमीन पर आ जाते हैं और उनकी एक टॉँग में विकार आ जाता है।
    महमूद को आज ज्ञात हुआ कि वह अच्छा डाक्टर है। उसको ऐसा मरहम मिला गया है जिससे वह टूटी टॉँग को आनन-फानन जोड़ सकता हे। केवल गूलर का दूध चाहिए। गूलर का दूध आता है। टाँग जावब दे देती है। शल्य-क्रिया असफल हुई, तब उसकी दूसरी टाँग भी तोड़ दी जाती है। अब कम-से-कम एक जगह आराम से बैठ तो सकता है। एक टॉँग से तो न चल सकता था, न बैठ सकता था। अब वह सिपाही संन्यासी हो गया है। अपनी जगह पर बैठा-बैठा पहरा देता है। कभी-कभी देवता भी बन जाता है। उसके सिर का झालरदार साफा खुरच दिया गया है। अब उसका जितना रूपांतर चाहों, कर सकते हो। कभी-कभी तो उससे बाट का काम भी लिया जाता है।
    अब मियॉँ हामिद का हाल सुनिए। अमीना उसकी आवाज सुनते ही दौड़ी और उसे गोद में उठाकर प्यार करने लगी। सहसा उसके हाथ में चिमटा देखकर वह चौंकी।
    ‘यह चिमटा कहॉं था?’
    ‘मैंने मोल लिया है।‘
    ‘कै पैसे में?
    ‘तीन पैसे दिये।‘
    अमीना ने छाती पीट ली। यह कैसा बेसमझ लड़का है कि दोपहर हुआ, कुछ खाया न पिया। लाया क्या, चिमटा! ‘सारे मेले में तुझे और कोई चीज न मिली, जो यह लोहे का चिमटा उठा लाया?’
    हामिद ने अपराधी-भाव से कहा—तुम्हारी उँगलियॉँ तवे से जल जाती थीं, इसलिए मैने इसे लिया।
    बुढ़िया का क्रोध तुरन्त स्नेह में बदल गया, और स्नेह भी वह नहीं, जो प्रगल्भ होता हे और अपनी सारी कसक शब्दों में बिखेर देता है। यह मूक स्नेह था, खूब ठोस, रस और स्वाद से भरा हुआ। बच्चे में कितना व्याग, कितना सदभाव और कितना विवेक है! दूसरों को खिलौने लेते और मिठाई खाते देखकर इसका मन कितना ललचाया होगा? इतना जब्त इससे हुआ कैसे? वहॉँ भी इसे अपनी बुढ़िया दादी की याद बनी रही। अमीना का मन गदगद हो गया।
    और अब एक बड़ी विचित्र बात हुई। हामिद कें इस चिमटे से भी विचित्र। बच्चे हामिद ने बूढ़े हामिद का पार्ट खेला था। बुढ़िया अमीना बालिका अमीना बन गई। वह रोने लगी। दामन फैलाकर हामिद को दुआऍं देती जाती थी और आँसूं की बड़ी-बड़ी बूंदे गिराती जाती थी। हामिद इसका रहस्य क्या समझता!

    Reply
  • June 26, 2018 at 8:23 pm
    Permalink

    Priya Darshan23 June at 07:45 · महादेवी वर्मा की स्मृति। कुछ दिन पहले लिखी थी यह टिप्पणी।
    मोतियों की हाट और चिनगारियों का एक मेला
    कई अर्थों मे महादेवी वर्मा हिंदी की विलक्षण कवयित्री हैं। उनमें निराला की गीतिमयता मिलती है, प्रसाद की करुण दार्शनिकता और पंत की सुकुमारता- लेकिन इन सबके बावजूद वे अद्वितीय और अप्रतिम ढंग से महादेवी बनी रहती हैं। उनके गीतों से रोशनी फूटती है, संगीत झरता है। शब्द उनके यहां जैसे कांपते हुए फूल हो उठते हैं- लेकिन अपनी तरह की आंच और ऊष्मा से भरे हुए और अपनी कोमलता के साथ एक अनूठी दृढ़ता का संवहन करते हुए। उनके व्यक्तित्व की तरह ही उनकी कविता की शुभ्र चादर पर भी जैसे कोई धूल-धब्बा नहीं टिकता। लेकिन अगर वे सिर्फ छायावादी संस्कारों तक सिमटी कवयित्री होतीं तो पंत की तरह लगभग अप्रासंगिक सी हो चुकी होतीं या प्रसाद-निराला की तरह ऐसी दूरस्थ, जिनको प्रणाम किया जा सकता है, जिनसे प्रेरणा ली जा सकती है लेकिन जिनका अनुसरण नहीं किया जा सकता।
    अनुसरण महादेवी का भी संभव नहीं है। लेकिन महादेवी ने पीड़ा, करुणा और विद्रोह के मेल से जो एक कालातीत अनुभव रचा है, उसने उनको हिंदी की अब तक के समकालीन संवेदना-संसार में लगातार स्मरणीय बनाए रखा है। यह संयोग भर नहीं है कि हिंदी कविता का उल्लेख आज भी मीरा और महादेवी के साथ ही शुरू होता है। यही नहीं, हिंदी की कई पीढ़ियां महादेवी के दुखवाद में, उनकी करुणा में सिंच कर बड़ी हुई हैं। उनकी अपनी कविताओं में दुख और करुणा की जो छाया है, वह जैसे महादेवी की कविता की कोख से ही निकलती है। कविता में वे न जाने कितनी कवयित्रियों की, कितनी पीढ़ियों की, रोल मॉडल रहीं- अब तक हैं।
    यह देखकर कुछ आश्चर्य सा होता है कि महादेवी वर्मा की जिन बहुत प्रौढ़ कविताओं को हम आज तक दुहराते रहते हैं, वे सब उन्होंने बहुत कम उम्र में लिख डाली थीं। ‘नीहार’ सिर्फ 22-23 साल की उम्र में आ चुका था, ‘रश्मि’ 25 साल की उम्र में, ‘नीरजा’ 27 साल में और ‘दीपशिखा’ 35 साल में। बाद के जीवन में उन्होंने ज़्यादातर गद्य लिखा। यह गद्य भी हिंदी साहित्य की अनमोल थाती है।
    लेकिन फिलहाल उनकी कविताओं की बात। वह कौन सी चीज़ है जो महादेवी को हिंदी की विलक्षण कवयित्री बनाती है? हिंदी की पारंपरिक आलोचना बताती है कि उनकी कविताओं में जो दुख और करुणा है. वह विरल है। लेकिन भारतीय स्त्री के जीवन में दुख या करुणा कोई नया या अनूठा भाव नहीं है। उस दुख से तो उसका पूरा जीवन बना और सना है। अगर सिर्फ़ इस दुख का चित्रण होता तो महादेवी एक साझा अनुभव को रचने का काम करने से आगे नहीं जा पातीं। सच यह है कि दुख को महादेवी ने जिस तरह आंख मिलाकर देखा, जिस तरह उसे अपनी रचनात्मक शक्ति में परिवर्तित किया, वह इसे एक विलक्षण अनुभव में बदलता था। वह पीड़ा के आगे जैसे अपनी पलकें झपकने नहीं देतीं। दीपक उनका सबसे प्रिय प्रतीक है। जलना, घुलना और फिर भी ऊष्मा देते रहना- यह जैसे उनका सबसे सहज स्वाभाविक बिंब है। यह बहुत सारी कविताओं में आया है। लेकिन कहीं यह दीपक कातर नहीं पड़ता है। उल्टे कवयित्री कहती हैं- ‘दीप मेरे जल अचंचल घुल अकंपित। पथ न भूले, एक पग भी / घर न खोये, लघु विहग भी / स्निग्ध लौ की तूलिका से / आँक सबकी छाँह उज्ज्वल’।
    दुख का, आत्मविसर्जन का, करुणा का- यह रचनात्मक इस्तेमाल महादेवी वर्मा को एक अलग ऊंचाई देता है। यह अनायास नहीं है कि उनकी कविता दुख और आंसुओं के बीच बनने के बावजूद जैसे लगातार झिलमिलाती रहती है- यह सिर्फ दीपक की उपस्थिति का प्रभाव नहीं है- उसमें एक पूरा पर्यावरण है जो कहीं ‘लहराती आती मधु बयार’ से बनता है तो कहीं श्वासों में झरते स्वप्न परागों से, कहीं उनमें मधुमास बोलता है, कहीं स्वप्न और सुरभि के संकेत मिलते हैं। कहीं उनमें अपने सारे दुखवाद, अपनी सारी करुणा के बावजूद उनकी कविता में एक अद्भुत चमक और स्पंदन है। यह दुख और करुणा की आकर्षक पैकेजिंग का मामला नहीं है- यह दुख और करुणा के पार जाकर जीवन को जीने योग्य बनाए रखने के उद्यम की परिणति है।
    दरअसल मीरा का मामला हो या महादेवी का- हिंदी आलोचना में एक रूढ़ दृष्टि इनको प्रेम की, त्याग की, करुणा की, दुख की कवयित्री मानती रही। यह बात बहुत बाद में समझ में आई कि इन कविताओं में जितना दुख है, उससे ज़्यादा विद्रोह है और इन दोनों से कम उल्लास नहीं है। महादेवी में जितने आंसू हैं, उनसे ज़्यादा मोती हैं- ‘पंथ रहने दो अपरिचित, प्राण रहने को अकेला। दुखव्रती निर्माण उन्मद / यह अमरता नापते पद / बांध देंगे अंक-संसृति / से तिमिर में स्वर्ण बेला / दूसरी होगी कहानी / शून्य में जिसके मिटे स्वर, धूलि में खोई निशानी / आज जिस पर प्रलय विस्मित / मैं लगाती चल रही नित / मोतियों की हाट औ’ / चिनगारियों का एक मेला’।
    महादेवी के यहां मोतियों की हाट और चिनगारियों का मेला सिर्फ यहीं नहीं है। एक अदम्य-अपूर्व जीवट- सीमांतों को अतिक्रमित करने का मानवीय साहस महादेवी की कविता का एक बहुत सुंदर पहलू है। उन जैसी कवयित्री ही लिख सकती है- ‘फिर विकल हैं प्राण मेरे! / तोड़ दो यह क्षितिज, मैं भी देख लूं उस ओर क्या है। / जा रहे जिस पंथ से युग कल्प उसका छोर क्या है। / क्यों मुझे प्राचीर बन कर आज मेरे श्वास घेरे?’
    यह महादेवी की अनूठी शक्ति है- दुख के सागर में तैर कर भी जैसे उसके पार जाने की क्षमता, ‘विस्तृत नभ का कोई कोना, मेरा न कभी अपना होना, परिचय इतना इतिहास, उमड़ी कल थी मिट आज चली, लिखने के बावजूद आकाश को इतने रंगों से सजा देने की गहन संवेदना कि वह एक विराट कविता हो जाए, मिट कर भी जीवन को सार्थक-समृद्ध कर जाने का उदात्त स्वप्न। यहां वे अपनी कविता में, अपनी दार्शनिकता में बुद्ध की भी याद दिलाती हैं और उन संतों की भी जिनके लिए त्याग का अपना एक अलग मोल रहा है। यह अनायास नहीं है कि छोटे-छोटे गीतों से बना उनका कविता संसार महाकाव्यों और खंड काव्यों जैसे विराट दिखने वाले उद्यमों के बावजूद और समानांतर अपनी अलग चमक के साथ न सिर्फ टिका हुआ है, बल्कि लगातार संबल का भी काम करता रहा है।

    Reply
  • July 4, 2018 at 4:41 pm
    Permalink

    Dheeresh Saini
    28 June at 12:42 ·
    कवि सम्मेलन और मुशायरे

    गर्मियों की छुट्टियों में पिताजी से मार खाकर गांव से शहर भाग आया तो पट्टा खुलने की ख़ुशी में ही मैं पहली बार किसी ‘राष्ट्रीय हिंदी कवि सम्मेलन’ को सुनने पहुंचा। 12वीं कक्षा में भी यह आयोजन अश्लील चुटकलेबाज़ी, छिछोरापन्ती, तुकबाज़ी, उन्माद, सम्प्रदायिक विषवमन से ज़्यादा कुछ नहीं लगा था। हाँ, वहां मंच पर सुखद आश्चर्य की तरह शरद जोशी थे जिन्होंने अपनी व्यंग्य रचनाएं सुनाई थीं। नवभारत टाइम्स के उनके स्तम्भ ‘प्रतिदिन’ का मैं भी पाठक था।

    बाद के बरसों में तो अखबार के लिए कवरेज की ज़िम्मेदारी की वजह से कवि सम्मेलन और मुशायरे ज़िंदगी के हिस्से से हो गए थे। एकाध गीतकार/ग़ज़लकार को छोड़ दूं तो कवि सम्मेलन के मंचों की कवि-भीड़ कविता नाम की शै के चलताऊ पैमाने तक को भी नहीं छूती थी। इसकी कमी वे स्त्रियों, कमज़ोरों के प्रति अपने अश्लील पूर्वग्रहों, छिछोरी टिप्पणियों और उन्मादी, साम्प्रदायिक नरेबाज़ियों से पूरी करते थे।

    पतन, छिछोरी हरकतों, अश्लील बयानबाज़ियों और हल्केपन के नुमाइंदों की मौजूदगी के बावज़ूद ऐसा कभी नहीं हुआ कि मुशायरे इस कम्पीटीशन में कवि सम्मेलनों को छूते भी दिखाई दिए हों। हिंदी कविता के प्रतिनिधि नाम इन कवि सम्मेलनों से दूर थे पर कैफ़ी आज़मी, हिमायत अली शायर, फ़हमीदा रियाज़ जैसे नामों से मुलाक़ात इन मुशायरों के जरिये ही हो पाई। कृष्ण बिहारी नूर और बशीर बद्र से लेकर ख़ुमार, वसीम बरेलवी, मलिकज़ादा मंसूर, नवाज़ देवबंदी तक तो वहां रहते ही थे। दो महीने पहले टीवी पर कुछ मुशायरे सुने तो कई ऐसे नामों ने दिलचस्पी पैदा की जो मुज़फ़्फ़रनगर में रहते हुए मुशायरों में नहीं थे। कल मुज़फ़्फ़रनगर नुमाइश का मुशायरा सुनने की इच्छा की एक बड़ी वजह यह भी थी। लेकिन, ये नाम आमंत्रित शायरों में नहीं थे और इस वक़्त के मंचों के कई बड़े पॉपुलर नाम भी लिस्ट में नहीं थे। हालांकि, नुमाइश पंडाल के गेट से ही लौट आने की वजह यूं ही हावी हुई अरुचि रही। और सुबह यह संयोग रहा कि अचानक सरदार चरण सिंह बशर और जौहर कानपुरी से मिलना हो गया। जहां मैं ठहरा था, वहीं बगल के कमरे में ये दोनों रात के ख़ुमार पर सुबह का ‘पानी’ चढ़ा रहे थे।

    जौहर कानपुरी बोले कि मंदिर और मस्जिद की मांग पर शोर फ़िज़ूल है। हमें स्कूलों की ज़रूरत है। मैन पूछा कि ये बताइए कि किस मस्जिद के लिए आंदोलन चल रहा है। बाबरी मस्जिद बचाने की छटपटाहट थी। तोड़ दी गई। अब वहां भव्य मंदिर बनाने, हर हाल में बनाने, काशी, मथुरा में भी बना देने के ऐलान ज़रूर होते हैं। जौहर कानपुरी के साथ उनके सीनियर बशर साहब भी ख़ामोश। जौहर बोले, हम तो मुहब्बत वाले हैं, दोनों का नाम लेकर चलते हैं। मैंने पूछा कि क्या इसे बैलेंस कहते हैं कि एक भयानक सच और एक काल्पनिकता को साथ-साथ दोहराया जाए। दोनों बोले, बात यही है।

    मैंने पूछा कि क्या यह मुमकिन है कि जो हालात हैं, मसलन, सड़कों, चौराहों, पर, घरों में घुसकर हत्याएं आदि, उन पर साफ़-साफ़, सीधे-सीधे पढ़ा जा सकता है। ऐसा तो जेस्चर भी शायरों की साम्प्रदायिकता हो जाए। दोनों फिर चुप और फिर दोनों की ही सहमति।
    बहरहाल, बशर साहब ने अहमद फ़राज़ की ख़ूबसूरती, उम्दा शायरी और परफॉर्मेंस पर मज़ेदार टिप्पणियां कीं। गुरु ग्रन्थ साहब में शामिल सूफ़ी शायरों का ज़िक्र किया और गुरबानी और रागों के ताअल्लुक़ का ज़िक्र किया।
    दोनों ने एक-एक शेर भी सुनाया जिन्हें वे ख़ूब सुनाते हैं।

    बशर साहब :
    चराग़ों के सफर में दबदबा हो आंधियों का
    तो फिर अंजाम ज़ुल्मत के सिवा कुछ भी नहीं है
    ये दुनिया नफ़रतों की आख़िरी स्टेज में है
    इलाज इसका मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं है।

    जौहर कानपुरी :
    अंगारों को फूल बनाया जाएग
    ये नारा मक़बूल बनाया जाएगा
    बाद में होगी मन्दिर मस्ज़िद की तामीर
    पहले एक स्कूल बनाया जाएगा

    Reply
  • July 15, 2018 at 11:27 am
    Permalink

    ये एक बहुत ही सुखद आश्चर्य हे की ये साहित्य से जुड़ा लेख लगातार पढ़ा जा रहा हे पाठको पुराने क्लिक की सुचना मिट गयी हे और ये लेख दस हज़ार से भी अधिक क्लिक हो चूका हे बहुत अच्छे

    Reply
  • July 15, 2018 at 10:45 pm
    Permalink

    Follow

    Jagadishwar Chaturvedi
    Yesterday at 07:28 ·
    मथुरा के मायने-

    आपकी दशा मैं नहीं जानता,लेकिन अपनी तकलीफ का एहसास मुझे है और यह एहसास ही मुझे बार-बार मथुरा की ओर खींचता है।आमतौर पर शिक्षा के बाद आदत है कि जहां पैदा हुए,पले-बड़े , वहां पर नौकरी करना नहीं चाहते,बाहर जाना चाहते हैं।लेकिन मेरा मन हमेशा इस बात से परेशान रहा कि मुझे मथुरा में उपयुक्त काम ही नहीं मिला वरना मैं जेएनयू से पढ़कर मथुरा लौट आता।
    मुझसे पूछें तो यही कहूँगा नौकरी जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी है।नौकरी की तलाश में जब शहर छूटता है तो आपसे बहुत कुछ छूट जाता है।अपने लोग, परिवेश, भाषा,चिर-परिचित संस्कृति आदि आपके हाथ से एक ही झटके में निकल जाते हैं।अधिकतर नौकरीपेशा लोग अपने काम-धंधे में इस कदर मशगूल हो जाते हैं कि इस सांस्कृतिक जमा पूँजी के हाथ से निकल जाने से होने वाली सांस्कृतिक क्षति से अनभिज्ञ रहते हैं।लेकिन आजीविका की तलाश में इस सांस्कृतिक क्षति को हम सबको उठाना पड़ता है।हमारे पास कोई शॉर्टकट नहीं है कि इस क्षति से बच सकें।जन्मस्थान से पलायन एक स्थायी नियति है जिससे आधुनिककाल में पूरा समाज गुजरता है।
    मैं मथुरा से जेएनयू पढ़ने के लिए 1979 में निकला तो जानता ही नहीं था कब वापस लौटूंगा।पढ़ते हुए मन में यही आशा थी कि कहीं मथुरा के आसपास ही नौकरी लग जाएगी और मथुरा से संपर्क-संबंध बना रहेगा।लेकिन बिडम्बना यह कि जैसा चाहा वैसा नहीं घटा।आमतौर पर जीवन में जैसा चाहते हैं वैसा नहीं घटता।
    विश्वविद्यालय में अध्यापन नौकरी की तलाश में ढाई साल तक इधर-उधर दसियों विश्वविद्यालयों में इंटरव्यू दिए।जेएनयू से पढाई खत्म करके निकलने के बाद दि.वि.वि. के दो कॉलेजों में इंटरव्यू देने के बाद तय किया कि कॉलेज में इंटरव्यू नहीं दूँगा और न नौकरी करूँगा।यही वजह थी कि विश्वविद्यालय में ही नौकरी के आवेदन करता रहा,परिचितों से खारिज होता रहा और अंत में कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में नौकरी मिल गयी। नौकरी लगायी प्रो.के.पी.सिंह, काशीनाथ सिंह और सावित्री चन्द्र शोभा ने।विभिन्न विश्वविद्यालयों में नौकरी के लिए अनुपयुक्त पाया प्रो.नामवर सिंह,शिव कुमार मिश्र,रमेश कुंतल मेघ, नित्यानंद तिवारी आदि ने।इन लोगों ने जिन लोगों का चयन किया वे निश्चित तौर मुझसे योग्य थे,जो योग्य पाए गए उनकी अकादमिक क्षमता से हिंदी जगत बखूबी परिचित है।
    कोलकाता अप्रैल1989 में आया और तबसे नवम्बर 2017 तक वहीं रहा।यहां आने के पहले दिल्ली में था तो मथुरा जल्दी-जल्दी जाता था लेकिन कोलकाता आने के बाद मथुरा आने-जाने का सिलसिला टूट गया।अब साल-छह महिने में आना जाना होता ।इसके कारण मथुरा में नए दोस्त नहीं बने।पुराने दोस्त लगातार उम्रदराज होते गए और उनमें से अनेक थक भी गए ।अब नौकरी से रिटायर होने के बाद मथुरा रह रहा हूं तो एक नए मथुरा का अनुभव कर रहा हूं।यह नव्य उदार युग का मथुरा है।इसकी हर चीज नयी है।
    मथुरा से दूर हुआ तो सबसे बड़ा अभाव मुझे का. सव्यसाची का महसूस हुआ।सव्यसाची सही मायने में मथुरा में रचे-बसे थे,वहां के लोगों से घुले-मिले थे,उनसे मिलकर हमेशा मजा आता था,उनकी अनौपचारिक बोलने की शैली और तीखी भाषा हमेशा अपील करती थी,वे मुझे कभी कॉमरेड नहीं कहते ”पंडितजी´´ कहकर बुलाते थे।पता नहीं क्यों उन्होंने मेरे लिए पंडितजी सम्बोधन चुन लिया,मैं नहीं जानता,जबकि मुझे कोई और पंडितजी नहीं कहता था।सव्यसाची के पंडितजी कहने का असर अन्य लोगों पर भी हुआ,इसके कारण और भी कई मित्र पंडितजी कहने लगे। लेकिन इन चंद मित्रों को अलावा सब नाम से ही बुलाते हैं।मेरे मित्रों का सीधे नाम से पुकारना और सव्यसाची जी का पंडितजी कहकर पुकारना अपने आपमें मेरे व्यक्तित्व के उन पहलुओं को अभिव्यंजित करता है जो मुझे सामाजिक विकास के क्रम में मिले हैं,मेरे व्यक्तित्व में दो किस्म के व्यक्ति हैं।एक वह व्यक्ति है जो पिता और संस्कृत पाठशाला ने बनाया,दूसरा वह व्यक्ति जिसे मथुरा –जेएनयू के मित्रों और जेएनयू की शिक्षा ने बनाया।मजेदार बात है कि मैं इन दोनों को आज भी जीता हूँ।मुझे अपने बचपन के संस्कृत के सहपाठी और अग्रज जितने अच्छे लगते हैं उतने ही जेएनयू के मित्र और कॉमरेड भी अच्छे लगते हैं।
    मुझे मथुरा का अतीत बार-बार अपनी ओर खींचता है,लेकिन जेएनयू नहीं खींच पाता।जेएनयू से पढ़कर निकलने के बाद 1989 से लेकर आज तक में मात्र 4बार ही जेएनयू गया हूँ।लेकिन इस बीच मथुरा बार-बार गया,उन पुराने स्थानों पर बार- बार जाता हूँ जो मेरी बचपन की स्मृति का अंग हैं,या मेरी फैंटेसी का अंग हैं।अपने जीवन के तजुर्बे से यही सीखा है कि जन्मस्थान का मतलब कुछ और ही होता है,जन्मस्थान आपके रगों में,इच्छाओं और आस्थाओं में रचा-बसा होता है,वह आपके व्यक्तित्व के निर्माण में बुनियादी रूप से भूमिका निभाता है।वह कभी पीछा नहीं छोड़ता।
    मथुरा से निकले तकरीबन 35साल से ऊपर गुजर गए,इस बीच मथुरा में बहुत कुछ बदला है,जिसका कायदे से अध्ययन करना मेरा लक्ष्य है,मैं इस बीच मथुरा आता-जाता रहा हूँ,लेकिन मात्र पर्यटक की तरह,मथुरा को नए सिरे से पाने,समझने और महसूस करने के लिए वहां कुछ समय गुजारना बेहद जरूरी है,निकट भविष्य में यह काम कर पाऊँ तो बेहतर होगा।
    मथुरा के मंदिर,बंदर,घाट,यमुना का किनारा,गलियां,वहां के लोगों की बेबाक भाषा,गालियां,अनौपचारिकता,औरतों का बिंदास भाव मुझे बहुत अच्छा लगता है।चलते -फिरते मथुरा को जितना मैं देखकर समझ पाया हूँ उसमें मुझे एक नए किस्म की मानुषगंध मिलती है।
    मथुरा पहले की तुलना में स्मार्ट हो गया है।वहां के लोग पहले की तुलना में ज्यादा आधुनिक बने हैं,बदले हैं,खासकर स्त्रियां तो पहचानने में ही नहीं आतीं।इन दिनों आधुनिकता के परिवर्तनों ने मथुरा की युवा लड़कियों को बहुत ही आकर्षित किया हुआ है।
    पुराने शहर के बाहर विशाल नया मथुरा,नयी रिहाइश वाला मथुरा बस गया है। दिलचस्प बात है मथुरा की गंध, पुराने शहर के अंदर ही महसूस कर सकते हैं।पुरानी गलियों में ही पुराने शहर की भाषा ,गंदी नालियों,बंदरों आदि को देखकर महसूस कर सकते हो।
    मेरी दिली ख्वाहिश है कि मथुरा की गलियों और उनकी जीवंतता के वैविध्य पर जमकर लिखूँ।हर गली की अपनी विशेषता है,वहां के रहने वाले लोगों की अपनी निजी विशेषताएं भी हैं।मथुरा के बाहर रहते हुए मथुरा का मर्म धीरे धीरे मन से खिसक गया है।ब्रजभाषा बोल नहीं पाता,वहां जाने पर दो-तीन दिन रहने पर ब्रजभाषा बोल पाता हूँ।
    ब्रजभाषा का सुख मथुरा का सबसे बड़ा सुख है।बाहर रहते हुए मुझे रोज एक-दो ब्रजभाषा कविता पढ़ने की आदत पड़ गयी,इस आदत को मैंने सचेत रूप से विकसित किया,जिससे मैं मथुरा से जुड़ा रहूँ।मथुरा में बड़ी संख्या में पुराने मित्र भी हैं जो बार-बार याद आते हैं।लेकिन मथुरा को हमेशा भाषा में ही पाता हूँ,वहां जाता हूँ तो भाषा सुनने में मजा लेता हूँ।
    मैंने अपने अनुभव से यही सीखा है कि यदि किसी शहर को पाना है तो वहां के लोगों को देखो और आत्मीयता से वहां की भाषा सुनो,शहर आपके मन में उतरता चला जाएगा।
    कोलकाता में 27साल से ज्यादा रहा हूँ और यहां पर मैंने बोलचाल की बंगला भाषा के जरिए बंगाल को महसूस किया है, घर से जब पढाने जाता तो रास्ते में बंगला में लोगों की बातें सुनते हुए बंगाल को पाता,उसी क्रम में बंगला का आस्वाद विकसित हुआ,बंगला समझने की क्षमता पैदा हुई।यहां तक कि नए बंगला शब्दों को भी मैंने बोलचाल की बंगला के जरिए ही अर्जित किया,सीखा।असल में जीवन तो भाषा में ही व्यक्त होता है।
    मथुरा की याद आती है तो सूरदास याद आते हैं,उनकी यह पंक्ति बहुत प्रिय है-“आजु कोऊ नीकी बात सुनावै ।”वैसे उनकी यह पूरी कविता ही बहुत सुंदर है-

    आजु कोऊ नीकी बात सुनावै ।
    कै मधुबन तैं नंद लाड़लौ, कैऽब दूत कोउ आवै ॥
    भौंर एक चहूँदिसि तैं उड़ि-उड़ि, कानन लगि-लगि गावै ।
    उत्तम भाषा ऊँचे चढ़ि-चढ़ि, अंग-अंग सगुनावै ॥
    भामिनि एक सखी सौं बिनवै, नैन नीर भरि आवै ।
    सूरदास कोऊ ब्रज ऐसौ, जो ब्रजनाथ मिलावै ॥

    Reply
  • July 17, 2018 at 4:47 pm
    Permalink

    मुज्जफरनगर में धीरेश सैनी भाई ने मुझे बड़ा ज़बरदस्त कॉम्प्लीमेंट दिया था —- दीदी ने कहा था की डी ए वी कॉलिज में धीरेश से मिल लेना वहा खड़ा था तो धीरेश भाई सीधे मेरे पास आये मेने पूछा आपने मुझे पहचाना कैसे —— ? कहने लगे तुम्हारे चेहरे से ही शराफत टपक रही थी
    ” Dheeresh Saini
    Yesterday at 01:19 ·
    बराक नदी के एक तरफ काचार जिले का मुख्यालय सिलचर शहर है और दूसरी तरफ़ दुधपातिल गांव। नदी के किनारे-किनारे दूर तक फैला हुआ गांव। सिलचर रेलवे स्टेशन की बगल के अन्नपूर्णा घाट से उस पार देखो तो दूर तक पेड़ों के झुरमुट फैले दिखाई देते हैं। नदी तट पर कभी कोई एक या दो स्त्रियों की छवियां दिखाई देंगी। कभी नाव से चढ़ते-उतरते लोग। अन्नपूर्णा घाट की बगल में फेरी घाट से सुबह-सवेरे से रात 10 बजे तक फेरी इस पार से उस पार जल्दी-जल्दी फेरे करती रहती है।

    इस नाव को फेरी कहना अन्याय होगा पर यही बोला जाता है। ये इंजन से चलने वाली बड़ी नाव है जिस पर बाइसाइकल, बाइक, स्कूटर भी अनिवार्य रूप से लदे होते हैं। जिनके पास दुपहिया हैं, वे बाज़ार, नौकरी आदि कामों से शहर जाते हैं तो दुपहिये को भी साथ ले जाते हैं। किराया बड़ा दिलचस्प है। 2 रुपये प्रति सवारी। साइकल साथ है तो कुल 5 रुपये और बाइक या स्कूटर साथ है तो 10 रुपये। दिलचस्प यह है कि किराया शहर से उस पार जाते वक़्त ही लिया जाता है। गांव से शहर आते वक़्त नहीं। कम से कम मेरा अनुभव दोनों दफा यही रहा।

    गांव से शहर को जोड़ने वाले दो पुल भी हैं पर सड़क मार्ग का उपयोग करने का मेरा कोई इरादा फिलहाल नहीं है। अन्नपूर्णा घाट के अलावा भी कई घाट हैं जहां से नावें दुधपातिल गांव जाती-आती हैं। पारम्परिक नाव भी जिसे मल्लाह खेता है। नदी में देखने में सुंदर यही लगती है। साइकल के साथ तो इस नाव पर भी यात्रा की जा सकती है। छोटी नाव पर निश्चय ही किराया दोनों ओर से देना होता होगा और मल्लाह फिर भी मुश्किल में ही रहता होगा।

    दुधपातिल गांव के बारे में मेरा ज्ञान सिफ़र है। बस इतना पता है कि यह असम का दूसरा सबसे बड़ा गांव है। इसका नाम दुधपातिल क्यों है, यह गांव वाले भी शायद ही जानते हों। दो युवक मेरे सवाल पर बांग्ला में बहस करते रहे। आख़िर में एक ने कहा, कोई नाम तो होना था न! दूसरे ने कहा, कभी दूध का कारोबार ज़्यादा रहा होगा पर पक्का नहीं कहा जा सकता। कल दोपहर में मैं और नीर पहली बार इस गांव में पहुंचे थे। किसी काम से दौड़ कर जाते एक बच्चे को स्कूटर पर लिफ्ट दे दी और उसने कुछ दूर जाकर अचानक उतारने के लिए चिल्लाना शुरू किया तो होश फाख्ता हो गए। असल में वह बांग्ला में जो कह रहा था, वह अनुमान लगाने में मुझे कुछ देर लगी थी। अचानक एक अज्ञात बल्कि ज्ञात भय ने घेर लिया। महान राष्ट्र ने मॉब लिंचिंग में जो महारत हासिल की है, उस वजह से। इन दिनों तो बच्चा चोरी की अफवाह के सहारे भी। पास ही खड़े कुछ किसानों-मज़दूरों से जबरन बातचीत चलाने की कोशिश की। अपने तिलक से जगन्नाथी पुजारी लग रहे एक वृद्ध से रथयात्रा की बाबत पूछा। फिर कुछ निश्चिंत होकर खेतीबाड़ी के बारे में। फिर अनमने ढंग से गांव में फेरे लगाकर उसी घाट आ लगा।

    यही सोचते हुए कि क्या लिफ्ट देना अब बंद करना होगा। 1999 में पहली बार प्यारे मुज़फ़्फ़रनगर को छोड़कर करनाल जाना पड़ा था तो रात में किसी भी वक़्त टूटा-फूटा स्कूटर उठाकर मुज़फ़्फ़रनगर दौड़ पड़ता था। इस तरह ग़ैर वक़्त जमना पार कर झिंझाना-शामली होते हुए मुज़फ़्फ़रनगर जाना समझदारी नहीं थी। पर दिल बेचैन हो उठता, रुकना मुश्किल हो जाता। रात में 9 बजे, 10 बजे, 11 बजे, 1 बजे, 2 बजे या 3 बजे जाने कितनी बार मुज़फ़्फ़रनगर शिव चौक पहुंचकर सुभाष के ठेले पर चाय पीने के बाद चैन पड़ा। कितनी बार तो ऐसा हुआ कि एकाध घन्टा रुककर वापसी करनी पड़ी। लोहिया बाज़ार पहुंचता तो पिताजी पागल से होकर छत पर चक्कर लगाने लगते। खतरा मैं भी जनता था, लुत्फ़ भी आता था तो डर भी लगता था पर ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी ने सुनसान जंगल में गहराती रात में लिफ्ट मांगी हो और मैंने इनकार किया हो। हमेशा डरते हुए कि बदमाश न हो या कोई हथियार या नशीली चीज़ न लिए हो और हमेशा मदद के भाव से ख़ुशी-ख़ुशी कि बेचारा, जाने किस मुश्किल में ऐसे निर्जन में फंसा हो। पर कल यही सब सोचता रहा कि क्या इस वक़्त सहज विश्वास की परिपाटी को नष्ट नहीं कर दिया जा रहा है।

    बहरहाल, हम आज शाम फिर उस पार पेड़ों में बसे उसी दुधपातिल गांव में थे। ज़िद नीर की थी और चाह मेरी भी कम नहीं थी। तय रहा कि छोटी नाव से चलेंगे पर पूछते-पूछते गारे-मिट्टी में धँसते हुए जहां पहुंचे, वहां भी नाव इंजन वाली ही मिलनी थी। हालांकि, अन्नपूर्णा घाट वाली से काफी छोटी। तय रहा कि स्कूटर इस पार ही एक युवा महिला के भरोसे छोड़कर नाव में चलते हैं और उस पार उतरे बिना ही लौट आते हैं। एक अम्मा ने नीर को टूटी-फूटी हिंदी और बांग्ला में अपने पान रंगे दांतों के बारे में बताना शुरू किया। नीर ने नोमस्कार कहा और अम्मा ने ख़ुश होकर जबरन स्कूटर भी लदवा दिया। इस आदेश के साथ कि बच्चे को गांव घुमा दो।

    और यह बूढ़ी अम्मा का आशीर्वाद था। उस पार उतरे तो दिन छिपने वाला था। कच्चे घाट पर एक स्त्री सूती साड़ी पहने नहा रही थी। उसके पीछे उसका 9-10 बरस का लड़का खड़ा था। उसके पीछे ढांग पर चढ़ी एक भूरी बकरी खड़ी थी। ये तीनों शायद एक ही परिवार के होंगे। ऊपर चढ़ते ही एकाध लोगों ने इंटरव्यू टाइप लिया और रास्ता-वास्ता बताया। शहर की तरफ़ नदी का किनारा जितना इरीटेट करने लगता है, इस पार उतना ही ज़्यादा सुकून देता है। देर तक नदी के किनारे ही रुका जा सकता था पर एक गली से निकलकर हम सड़क पर एक मस्जिद के पास थे। दूर पहाड़ियों तक पानी भरे मैदान थे जिनमें सूरज की लाली उतर रही थी। हमारे आसपास बकरियों का एक कुनबा था। कुछ मुस्लिम युवक थे जिनकी बातचीत को कुछ मूर्ख सवालों से बाधित करना पड़ा। मसलन, आपका गांव बड़ा सुंदर है। सूरज आपके यहाँ रोज़ इसी तरह का जादू बिखेरता होगा। बदले में भी कुछ सवाल हुए और अहसास हुआ कि अब उनसे उपेक्षित उनके सूरज को, उनके भूदृश्यों को, उनकी बकरियों को और उनके बच्चों को निहारा जा सकता है।

    सूरज पिघले लोहे की तरह गाढ़ा होकर फैल रहा था। पानी में उसके रंग उतर रहे थे और दूर नज़र आ रही पहाड़ियों ने लाली के असर वाली धूसर चादर ओढ़ ली थी। हम आगे बढ़ते और दृश्य बदलता जाता। पेड़ों के पत्ते सुनहले नज़र आते, झुरमुट से झांकता आसमान गेरुआ सा। कहीं किसी पेड़ की पत्तियों के बीच से सूरज बाहर निकल आने को बेचैन दिखाई देता। गोके वो जा रहा था।

    दिन भर घूमती रहीं दो गायों को खूंटे से बांधने के लिए एक किशोर झुंजुपुंजु हुए जा रहा था। मुझे उसमें अपना बचपन नज़र आ रहा था। हर पुराने शख्स की तरह मेरा मन उसे गाय बंधने के लिए सलाह देने को आतुर था या स्कूटर से उतरकर उसकी मदद कर देने को। दो-तीन स्त्रियां हमें देख रही थीं। फिर कुछ मूर्ख सवाल किए। जैसे, गाय कितना दूध देती है। चरती ही घूमती हैं या कुछ फीड वगैराह देते हो। फिर, लगा कि उन्हें अपनी गायों में मेरी दिलचस्पी संदिग्ध तो नहीं लग रही। झट से राम-राम बजाई।

    हां, एक माशूक़ मियां से जरूर मज़ाखोरी की। बोले, हमारा नाम माशूक़ है। मैंने कहा कि पीछे जो चली आ रही हैं, आपकी बीवी और बच्ची हैं। उन्होंने हामी भरी तो उनकी बीवी हाज़रा बेग़म से पूछा कि आप जी-वी ही करती हैं या पति को माशूक़ कहकर पुकारती हैं। वे हंसी तो हौसला बढ़ा और कहा कि माशूक़ मियां तो मुझे यही कह रहे थे कि बीवी नाम लेकर माशूक़-माशूक़ पुकारे तो बात बने। तीनों खूब हंसे। तस्वीर भी खिंचवाई। और फिर लगा कि गांव अपना ही है। फिर कल वाले पुजारी भी मिले। बोले, आज फिर। हंसे और फिर मछली पकड़ कर लौट रहे दो युवकों की तरफ इशारा कर बोले, लो, लो, फोटो लो। अरे बाबा, मैं तो खूसट टाइप समझ रहा था, आप तो मज़ेदार बूढ़े हैं, यह सुनते ही उन्होंने ठहाका लगा दिया।

    शाम से रात के आगोश में जाते दुधपातिल पर रुमानियत छाने लगी। केरल के गांवों की तरह ऐसे गांव यूँ भी सुंदर ही लगते हैं। पेड़ों से घिरे हुए, दूर-दूर घरों वाले। छत से छत सटे मकानों वाले नहीं। एक पेड़ के नीचे कोई दीवा बाल गया था। इधर, शक़ूर मियां कमर पर बांस का घड़ा सा बांधे खेत में भरे पानी में जाल डालकर उसे समेट चुके थे। कुछ नन्ही-नन्ही चांदी सी मछलियां हाथ लगी थीं जिन्हे नन्हे मियां जाल से जल्दी-जल्दी बीन लेना चाहते थे। बहन ख़ामोश देखती थी। घर पर चावल उबल चुके होंगे। ये मछलियां अभी पकाई जानी हैं।

    सुंदर गांवों में सभी की ज़िंदगी उतनी सुंदर हो, ऐसा नहीं होता। जिनके पास खेती है, उनके लिए भी खेती का मतलब धान की एक फसल। ओली (पौध) तैयार हो रही है। गाय-शागुल आदि से बचाने के लिए बाड़ेबंदी की गई है। एक महीने बाद रोपाई शुरू होगी तो दूर तक खाली पड़े मैदानों में अद्भत दृश्य होगा। एकाध लोगों ने रुआं लगाना (रोपाई) शुरू कर भी दिया है।

    ज़मीन का बंटवारा कैसा है, किस तरह की ऊंच-नीच हैं, अभी इससे बेखबर हूँ, जानते हुए भी। अचानक तेज हवाएं चलने लगी हैं। केले के लहराते पत्ते और सुंदर लगने लगे हैं। अन्नपुर्णा घाट ले जाने वाली नाव भर चुकी है। उस पार रेलवे स्टेशन की फ्लड लाइट्स नदी में इस पार तक रोशनी की पट्टियां सी बना रही हैं। रोशनी की इन्हीं पट्टियों में जल ज़्यादा तरंगित लग रहा है। नीर अपने फिल्मी ज्ञान से आशंका जताता है, हमारी नाव डूब जाएगी। एक महिला हंसती हैं। उनकी बेटियां सुष्मिता दास और प्रियंका दास को नीर से बतियाने का टॉपिक मिल गया है। अब नईम मोजूमदार भी नीर से गपिया रहे हैं लहरों पर ही।

    रात के 8 बज चुके हैं पर नाव का इन्तिज़ार करने वालों में स्त्रियां और बच्चे भी बड़ी संख्या में हैं लेकिन रात या नदी को परेशान करने वाला शोर नहीं। रेलवे स्टेशन से इंजन की आवाज़ें भी इसी लय में शामिल लग रही हैं। उस पार अन्नपूर्णा मन्दिर से जो बांग्ला भजन आ रहा है, उसकी धुन भी किसी विरह गीत का ही अहसास करा रही है।

    पहले छोटी नाव आई है। मल्लाह और दो लोग बैठे हुए हैं, एक साइकल और एक स्त्री खड़ी हुई हैं। किसी डायरेक्टर ने ख़ास इसी तरह यह अद्भुत दृश्य तैयार किया होगा। वापसी में एक स्त्री और उसका पति ही इस नाव में सवार हुए हैं। छोटी नाव का घाट दूर है। देखते ही देखते नाव अंधेरे में खो जाती है। मैं यही सोचकर हैरान हूँ कि नाविक अंधेरे में पानी पर रास्ता कैसे पहचानता होगा। हमारी नाव में कोई अधीर बाइक की लाइट को जलाता-बुझाता है तो नाव का स्टाफ उसे घुड़कता है। नईम मोजूमदार बताते हैं, बाइक की लाइट नाव चलाने वाले के अनुमान को बिगाड़ सकती है। रात में यह रास्ता अनुमान से तय होता है। बड़ी नाव है, जरा गड़बड़ी हुई तो दूर तक चक्कर लगाकर घूमना पड़ेगा।

    कोई मित्र आता है तो एक शाम दुधपातिल गाँव के किनारे तय रही। और रात छोटी नाव में। नाविक का अनुमान उस रात कुछ तो गड़बड़ाए भी। ”

    Reply
  • July 31, 2018 at 6:10 pm
    Permalink

    Follow

    Jagadishwar Chaturvedi
    6 hrs ·
    प्रेमचंद और भाषा समस्या

    एक है मीडिया की भाषा और दूसरी जनता की भाषा,मीडिया की भाषा और जनता की भाषा के संप्रेषण को एकमेक करने से बचना चाहिए।
    प्रेमचंद ने भाषा के प्रसंग में एक बहुत ही रोचक उपमा देकर भाषा को समझाने की कोशिश की है, उन्होंने लिखा है ´यदि कोई बंगाली तोता पालता है तो उसकी राष्ट्रभाषा बँगला होती है।उसी तोते की सन्तान किसी हिन्दी बोलनेवाले के यहाँ पलकर हिन्दी को ही अपनी मादरी-जबान बना लेता है।बाज़ तोते तो अपनी असली भाषा यहाँ तक भूल जाते हैं कि ´´ टें-टें´´ भी कभी नहीं कहते।ठीक इसी प्रकार कुछ नये रंग के भारतीय हिन्दी इतनी भूल जाते हैं कि अपने माँ-बाप को भी वे अँग्रेजी में खत लिखा करते हैं। विलायत से लौटकर ´´तुम´´को ´´टुम´´कहना मामूली बात है।हम भारतीय भाषा के विचार में भी अंग्रेजों के इतने दास हो गए हैं कि अन्य अति धनी तथा सुन्दर भाषाओं का भी हमें कभी ध्यान नहीं आता।´
    प्रेमचन्द ने ´´शान्ति तथा व्यवस्था´´की भाषा के प्रसंग में अंग्रेजी मीडिया के अखबारों पर जो बात कही है वह आज के बहुत सारे अंग्रेजी मीडिया पर शत-प्रतिशत लागू होती है।प्रेमचंद ने लिखा है ´विलायती समाचार-पत्र डेली टेलीग्राफ या डेली मिरर या डेली न्यूज (तीनों ही लन्दन के हैं तथा अनुदापदल के प्रमुखपत्र हैं)जो अंग्रेजी में ही छपते हैं,पर इंग्लैंड की राजनीति के अधिकांश सूत्र प्रायःइन्हीं के हाथ में हैं और इनकी भाषा प्रायःसबसे अधिक कटु,दुष्ट,जहरीली और निंद्य होती है।´ अंग्रेजी मीडिया की भाषा को जिस रूप में यहां विश्लेषित किया गया है वह बात आज भी अनेक मीडिया के संदर्भ में अक्षरशःसच है।भारत में टाइम्स नाउ टीवी चैनल इसका आदर्श नमूना है।
    उत्तर-आधुनिक विमर्श की शुरूआत संस्कृति के क्षेत्र से हुई। यही वजह है इसकी शैतानियों का जन्म भी यहीं हुआ। आज भी विवाद का क्षेत्र यही है। प्रश्न उठता है संस्कृति के क्षेत्र में ही यह उत्पात शुरू क्यों हुआ?असल में संस्कृति का क्षेत्र आम जीवन की हलचलों का क्षेत्र है और साम्राज्यवादी विस्तार की अनन्त संभावनाओं से भरा है। पूंजी,मुनाफा, और प्रभुत्व के विस्तार की लड़ाईयां इसी क्षेत्र में लडी जा रही हैं।भाषा व्यक्तिगत तथा ऐतिहासिक स्मरण की वस्तु है। यह न केवल वर्षों के स्थायी आत्म-अनुभव को संजोने में सक्षम बनाती है बल्कि भविष्य में अपने आपको अवस्थित करने में, ऐतिहासिक स्मरण का उपयोग करने में सहायता करती है।भाषा हमें भविष्य की ओर उन्मुख रहते हुए अतीत में जाने में सक्षम बनाती है। अतीत के अनुभव लाभ-हानि, जय-पराजय, खुशी-गम, वर्तमान की परिस्थिति के बारे में कुछ कह सकते हैं; वे प्रेरणा, सबक तथा वर्तमान के लिए उम्मीद की किरण दे सकते हैं। भविष्य में पहुंचने के क्रम में हम अतीत में वापस आ सकते हैं, और ऐसा करने में भाषा हमारी मदद करती है।
    भाषा हमें उन अर्थों के निर्माण के लिए संसाधन प्रदान करती है जो भविष्य की ओर अग्रसर होते हैं। ये उन संभावनाओं की ओर इशारा करते हैं जो वर्तमान में हमारे अनुभव से परे होती है और कई संसाधन जो भाषा हमें उपलब्ध कराती है, अतीत के उन अर्थों से व्युत्पन्न होते हैं जो हमारे लिए समाप्त हुए नहीं रहते, बल्कि वे हमारी भाषा में, हमारी संस्कृति में, हमारे अनुभव में जीवित रहते हैं।
    भारत में अधिकांश प्रतिष्ठित समाजविज्ञानी बुद्धिजीवी अपनी भाषा में नहीं लिखते,यह किस बात का सबूत है ?एक जमाने में मध्यवर्ग बंगाली मातृभाषा में बोलना-लिखना गौरव की बात समझता था,महान वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बसु और सत्येन्द्र बसु जैसे लोग बंगला में विज्ञान की नई खोजों पर लिखते थे, लेकिन इन दिनों अनेक बड़े बंगाली बुद्धिजीवी हैं जो बंगला में नहीं लिखते, यह हम सबके लिए चिन्ता की बात है।
    एक अन्य समस्या है वह है संचार क्रांति की मूलभाषा अंग्रेजी है । अंग्रेजी कम्प्यूटर की मूलभाषा है, इसमें जनभाषाओं की देर से शुरूआत हुई है,इसका कु-फल है कि कम्प्यूटर में जनभाषाएं हैं लेकिन भारतवासी उनका न्यूनतम इस्तेमाल करते हैं।सिर्फ किताब-पत्र-पत्रिका प्रकाशन में जनभाषाओं की मदद लेते हैं।बाकी सब काम अंग्रेजी में कर रहे हैं।यह स्थिति बदलनी चाहिए। प्रतिष्ठित लेखक-प्रोफेसर-पत्रकार-एम.ए,बी.ए. लोग अभी तक इंटरनेट पर यूनीकोड हिन्दी या भारतीय भाषा के फॉण्ट में नहीं लिखते, यह स्थिति जितनी जल्दी बदले उतना ही अच्छा है। कहीं यह मातृभाषा की विदाई की सूचना तो नहीं है ?

    Reply
  • August 15, 2018 at 7:25 pm
    Permalink

    Hariom Rajoria
    8 August at 10:21 ·
    तमस जैसा उपन्यास हानूश जैसा नाटक और बाँगचू , अमृतसर आ गया , चीफ़ की दावत जैसी कहानियां लिखने वाले भीष्म साहनी जी का आज जन्मदिन है । भारत विभाजन की त्रासद घटनाओं का उन्होंने सजीव और सरल भाषा में चित्रण किया है । भाषा से चमत्कार पैदा करने और चौंकाने का गुण उनमें नहीं है , हां भंगिमा रहित साधारण भाषा में उन्होंने असाधारण कहानियां , उपन्यास और नाटक लिखे हैं । उनके द्वारा अनुदित तोलस्तोय के पुनरुत्थान तथा चिंगिज एत्मातोव के पहला अध्यापक उपन्यास सहित अन्य रूसी पुस्तकों के अनुवादों में भी उनका चेहरा आप देख सकते हैं । जैसी सरलता उनके गद्य में है वैसा ही सहज और सुंदर उनका व्यक्तित्व भी था । इतने शालीन और खूबसूरत बूढ़े मैंने कम ही देखे हैं । 1988 में प्रलेसं भोपाल ने फैज़ पर केंद्रित ” यादे फ़ैज़ ” आयोजन किया था । किसी साहित्यिक आयोजन में पहली बार मेरा जाना हुआ था । उस समय भोपाल में क्या देश में अपने जिले के लेखकों के अलावा किसी से मेरा परिचय नहीं था । विज्ञान का विद्यार्थी होने से साहित्य में भी अल्पज्ञ ही था । उस आयोजन में पहली बार त्रिलोचन , कैफ़ भोपाली , मज़रूह सुल्तानपुरी , शिवमंगल सिंह सुमन जैसे अनेक हिंदी – उर्दू के साहित्यकारों को मैंने बहुत पास से देखा और उनकी बातचीत तटस्थ दर्शक बनकर सुनीं । भीष्म जी के नाम से मैं तब भी भलीभांति परिचित था । मैंने भोपाल के उस पत्रकार भवन में पहली बार उन्हें देखा । मैं सीढ़ियों के ऊपर था और वे सीढियां चढ़ते हुए ऊपर आ रहे थे । कोई उत्साही छात्र उनसे बातें कर रहा था । भीष्म जी के चेहरे पर स्नेहिल भाव था वे धीरे धीरे ऊपर मेरे नज़दीक उस लड़के से बात करते हुए सीढ़ियां चढ़ रहे थे । वे जब मेरे पास से गुजरे तो मैंने दोनों हाथ जोड़कर उनसे नमस्कार किया । उन्होंने मुस्कुराकर मेरा अभिवादन स्वीकारा और मेरी ओर अपनत्व से देखा । उनका वह मुस्कुराता हुआ चेहरा आज भी आंखों के सामने आ जाता है । कस्बाई झिझक और अकेलेपन के बोध से भरा मैं उनसे कुछ बात न कर सका । इस आयोजन के मुख्य अतिथि इंद्र कुमार गुजराल जी थे पर वे किसी कारण से नहीं आ पाए थे तो भीष्म जी ने ही कार्यक्रम का उद्घाटन भाषण दिया था । उसके बाद हर सत्र में उन्हें नीचे फर्स पर बैठे पाया , अहंकार रहित मुस्कुराता हुआ मासूम चेहरा ।
    इसके एक वर्ष बाद 1989 में गुना में प्रलेसं का पांचवां राज्य सम्मेलन हुआ तो भीष्म जी ने ही इस सम्मेलन का उद्घाटन किया था । अशोकनगर के साथियों ने भी इस समेलन में बहुत काम किया था , । तमस धारावाहिक के प्रदर्शन के बाद देशभर में भीष्म जी के नाम की धूम थी । भीष्म जी एक दिन रुककर चले गए थे । मैंने रेल्बे स्टेशन पर अन्य यात्रियों के साथ बैंच पर उन्हें यात्रियों के बीच बैठे देखा , पर उनसे बात न कर सका । उनके जाने के बाद राजनारायण बोहरे जी ने मुझे बताया कि भीष्मजी तुम्हारे बारे में पूछ रहे थे , उनसे दिल्ली में गिरजा कुमार माथुर जी ( अशोकनगर में जन्मे वरिष्ठ हिंदी कवि ) ने मेरा जिक्र किया होगा । उसके बाद एक दो बार और भीष्मजी को सुना पर कभी बात नहीं कर पाया ।
    अशोकनागर इप्टा ने उनके तीन नाटक ” कबिरा खड़ा बाजार में ” , ” मुआवजे ” और ” चीफ़ की दावत “( कहानी का नाट्य रूपांतरण ) किये हैं । नाटकों को तैयार करते हुए भी उनकी रचना प्रक्रिया को समझने का प्रयास मैंने किया । कबिरा खड़ा बजार नाटक में कबीर के कुछ पदों की धुनें भी मैंने तैयार कीं थीं । उनके लेखन और व्यक्तित्व में दूरी नहीं थी । कबिरा खड़ा बाजार नाटक के कारण ही मैं और सीमा पास आये । इस नाटक में पहली बार अशोकनगर इप्टा के नाटकों में महिला पात्रों का प्रवेश हुआ था ।
    आज भीष्मजी के 103 वें जन्मदिन पर उनके अवदान और स्मृति को सलाम ।
    – हरिओम राजोरिया

    Reply
  • October 29, 2018 at 10:29 am
    Permalink

    ये बड़ा ही सुखद आशचर्य हे की साहित्यिक लेख ज़्यादा नहीं पढ़े जाते हे प्रेमचंद का ये लेख लगातार इतना क्लिक होता रहता हे पुराने क्लिक की सुचना मिट गयी हे और सर मिलाकर ये लेख कम सेकम 12 या शायद 13 हज़ार क्लिक हो चूका हे बहुत ही सुखद बात ———————————————————————————————–
    Shambhunath Nath
    14 hrs ·
    वह चैत की एक धूल भरी साँझ थी। मेरठ में नौचंदी का मेला अपने शबाब पर था। मवाना, बहसूमा, किठौर, शाहजहांपुर से किसान पास की आनाज मंडी में अपना माल लाते और ताँगों में लदे हुए नकदी लेकर वापस जाते। ताँगे भी कम दूरी तय करने की गरज़ से शहर की घनी बस्तियों से गुजरते। ऐसी ही एक घनी बस्ती सराय लालदास थी, जहां की गलियों से भी ये ताँगे गुज़रते। इस बस्ती में हिंदू और मुसलमानों का फ़ासला साठ-चालीस का था। इसी बस्ती में सबसे रसूखदार थे, सेठ श्यामलाल। उनका पाँच साल का पोता और छह साल का नवासा गली पार करने के इरादे से मुहाने पर आए। सेठ जी का नवासा अलीगढ़ से अपने नाना के घर आया था। अचानक वह भागा और गली पार करने लगा, तभी एक मियाँ जी के ताँगे का घोड़ा उस पर चढ़ गया और पल भर में वह बालक घोड़े के पाँवों के नीचे से होते हुए ताँगे के पहिए के नीचे आ गया। क्षणांश में ही सेठ जी के नवासे के प्राण-पखेरू उड़ गए। मोहल्ले में शोर मच गया कि सलीम मियाँ के ताँगे ने सेठ जी के नवासे को कुचल दिया। सलीम मियाँ की सिट्टी-पिट्टी ग़ुम। सेठ जी दम-ख़म वाले थे। ताँगेवाला खड़ा-खड़ा काँप रहा था। तभी भीड़ को चीरते हुए सेठ जी आए और अपने नवासे का मृत शरीर अपने हाथों में उठा लिया। फिर भीड़ को संबोधित करते हुए बोले- आप लोग अपने-अपने घर जाओ, यह एक हादसा है, मेरे नवासे को मरना था, मर गया। सेठ जी ने न तो कोई पुलिस रिपोर्ट दर्ज़ कराई न उस ताँगेवाले को कुछ कहा। ताँगेवाला सलीम सेठ जी के चरणों पर गिर पड़ा। सोचिये, आज कोई हादसा हो जाए, तो लोग उसे मॉब-लिंचिंग बोलने लगेंगे। यह तब की घटना है, जब देश को आज़ाद हुए सिर्फ सात साल गुज़रे थे। वे सेठ श्यामलाल जी थे हमारे मित्र श्री Anil Maheshwari के दादा जी।
    (अनिल जी की अंग्रेजी में आने वाली पुस्तक के एक संस्मरण का संक्षिप्त रूपांतरण)
    Shambhunath Nath
    21 hrs ·
    राम मंदिर और अयोध्या दोनों ने मुझे कभी उद्वेलित नहीं किया. मुझे न तो राम मंदिर में अनुरक्ति है, न अयोध्या से. इसकी वजह भी है. अयोध्या आज से नहीं हज़ारों वर्ष से ऐसी ही उजड़ी और अकेली रही है. हमारे लिखित इतिहास में कहीं किसी अयोध्या का ज़िक्र नहीं है. सिर्फ बौद्ध विद्वान अश्वघोष, जो पहले ब्राह्मण था लेकिन बाद में बौद्ध हो गया, ने ज़रूर साकेत का ज़िक्र किया है. उसने अपने हर ग्रंथ में लिखा है- “इति सुपर्णाक्षी पुत्र साकेतस्य अश्वघोष विरचितं”. मैंने सदैव अयोध्या को एक राजनीतिक हथकंडा ही माना. और ऐसी अयोध्या विहिप ने बना दी जो सदैव युद्धरत रही.
    लेकिन Hemant Sharma की पुस्तकें- युद्ध में अयोध्या और अयोध्या का चश्मदीद पढ़ कर लगा कि अयोध्या को युद्ध में झोंकने की शुरुआत तो आज़ादी के फ़ौरन बाद ही कर दी गई थी. बलरामपुर के राजा पटेश्वरी सिंह, गोरख पीठ के महंत दिग्विजय नाथ, रामराज्य परिषद के करपात्री जी और आईसीएस केके नायर ने इसकी नींव रख दी थी और इसकी नींव रखे जाने एवं उसे क्रियान्वित किए जाने तक नरसिंह राव की तरह आँख मूंदे रहे उत्तर प्रदेश के कांग्रेसी मुख्यमंत्री गोविंदबल्लभ पंत. तब प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू या तो समझे नहीं अथवा उनका ब्राह्मण अंतर्मन इसकी तरफ से अनचेता रहा. मगर इस काण्ड का लाभ पहले जनसंघ को और फिर भाजपा को मिला. अलबत्ता इसमें कोई शक नहीं कि भाजपा अपने जीते-जी अयोध्या में राम मंदिर नहीं बनाने देगी ताकि विहिप युगों-युगों तक इसे ज़िंदा रखे.

    Reply
  • November 1, 2018 at 9:48 am
    Permalink

    Konpal Balpatrikaविज्ञान पढ़नेवाले बच्‍चों की समाज में ज्‍यादा कद्र होती है। कला वर्ग को (यानी समाज विज्ञान, साहित्‍य, इतिहास और कला आदि जैसे विषयों को) दोयम दर्जे का माना जाता है। विज्ञान वर्ग को प्रतिभा का प्रतीक समझा जाता है और कला वर्ग को पिसड्डीपन का। और इसी के हिसाब से छात्र समाज में आंके भी जाते हैं।
    यह सच है कि विज्ञान हमारे दिमाग को क्‍यों, क्‍या, कैसे जानने का मंत्र देता है। हम जान सकते हैं कि तारे क्‍यों चमकते हैं, रात को सूरज कहां चला जाता है और एक कोशिकावाले कमजोर जीव से हम महाबली मनुष्‍य आज कैसे बन गये हैैं। पर क्‍या जान लेना ही काफी होता है। इस जानकारी का क्‍या और कैसे इस्‍तेमाल किया जाये, अगर यह प्रश्‍न ही हमारे मन में नहीं उठता तो कहीं कुछ गड़बड़ अवश्‍य है। ठीक इसी जगह कला और साहित्‍य आवश्‍यक हो जाता है। वास्‍तव में यही वह क्षेत्र है जहां हमारी कल्‍पनाशक्ति को उपजाऊ बनाया जाता है, हमारे मानस में संवेदनशीलता के बीज को रोपा और सींचा जाता है। हमारी सोच कला-साहित्‍य के इसी क्षेत्र में बड़ी बनती है। और तभी हम सोच पाते हैं कि विज्ञान ने हमें जो सिखाया है उसका उपयोग कैसे करना चाहिए, केवल अपने जीवन में सुख-सुविधा पाने के लिये या सभी का जीवन सुखी और आरामदायी हो सके, इसके लिए। विज्ञान और कला के दोनों क्षेत्र अलग-अलग नहीं है और न ही इनमें भेद है, वास्‍तव में वे एक दूसरे के पूरक हैं और पूरक होकर ही वे सच्‍चे मनुष्‍य के निमार्ण में अपनी भूमिका निभा सकते हैं (कोंपल अप्रैल-जून18 अंक से ‘हमारी बात’ का अंश, थोड़े बदले शब्‍दों के साथ पर सारवस्‍तु वही)

    Reply
  • November 15, 2018 at 10:40 pm
    Permalink

    अनूप शुक्ल
    12 November at 07:57 ·
    लेखन एक संजीवनी की तरह है
    ————————————–
    समय को पहचानिये। खराब समय को बदलिए। खराब हालत बहुत दिन तक हम पर हावी न हो सकें हमें यह देखना होगा। उसके लिये मेहनत करनी होगी। वक्त को नजरअंदाज मत कीजिये। नजर अंदाज करेंगे तो वक्त आपको छोड़कर आगे चला जायेगा। उसके बाद वक्त आपका होगा या नहीं , अच्छा होगा या बुरा , यह कहा नहीं जा सकता।

    ये बातें कल प्रख्यात साहित्यकार गिरिराज किशोर जी ने कथाकार गीतांजलि श्री Geetanjali Shree के उपन्यास ’रेत समाधि’ पर हुई चर्चा के अवसर पर अध्यक्षीय संबोधन देते हुई कही। चर्चा मर्चेन्ट चेम्बर हाल में हुई।

    चर्चा का समय साढे तीन था। हम ठीक समय पर पहुंच गये। वहां अमरीक सिंह दीप, अनीता मिश्रा और अन्य कुछ लोग आ गये थे। कम लोग लगे। लगा कि ज्यादा लोग आयेंगे नहीं। अनीता मिश्रा को संचालन करना था। हमने उनसे किताब के बारे में पूछा तो उन्होंने पर्चा आउट करने से मना किया लेकिन सार संक्षेप बता दिया कि इस उपन्यास में लड़की और उसकी मां की कहानी के जरिये आज के समय पर बात की गई है।

    हमने वहीं हाल के मौजूद स्टॉल से किताब खरीद ली। राजकमल की पुस्तक मित्र योजना का हवाला देकर २५% छूट सहित। साथ में गीतांजलि श्री जी की अन्य किताबें माई और प्रतिनिधि कहानियां भी लीं। ३७६ पेज का उपन्यास ’रेत समाधि’ २९९ रुपये का है। ९९ मतलब बाटा प्राइस। छूट मिलाकर २२४ का पड़ा।

    कुछ देर में हाल भर गया। सभा के अध्यक्ष गिरिराज किशोर जी आ गये। उनका कस्तूरबा गांधी पर लिखा उपन्यास हाल ही में कानपुर विश्वविद्यालय के पाढ्यक्रम में शामिल किया है। कथाकार राजेन्द्र राव जी भी आ गये। धीरे-धीरे करके हाल भर गया। नीलाम्बर कौशिक जी भी आये। करेंट बुक डिपो के अनिल खेतान जी ने मुझे इस कार्यक्रम की जानकारी दी थी वे भी आ गये। कुछ देर में गीतांजलि श्री जी भी आईं। हमने राजकमल प्रकाशन के अशोक माहेश्वरी जी की कलम उधार लेकर गीतांजलि श्री जी के ऑटोग्राफ़ ले लिये।

    कार्यक्रम की शुरुआत करते हुये अनीता मिश्रा ने गीतांजलि श्री के बारे में बताते हुये किताब का संक्षिप्त परिचय देते हुये अशोक माहेश्वरी जी को आमंत्रित किया। अशोक जी ने राजकमल प्रकाशन का परिचय देते हुये बताया कि इसकी स्थापना के ७० साल होने वाले हैं। गीतांजलि श्री जी के लेखन के बारे में भी बात करते हुये उन्होंने कहा – ’उनकी सिग्नेचर टोन एक अजीब तरह का फ़क्कड़पन, एक अजीब तरह की दार्शनिकता, एक अजीब तरह की भाषा और एक अजीब तरह की रवानी। लेकिन ये सारी अजीबियतें ही उनके कलाकार को व्यक्तित्व प्रदान करती हैं। यहां सब परम्परा से हटकर भी है और परम्परा में समाहित भी।’

    उपन्यास पर बात करने के लिये सबसे पहले दिनेश प्रियमन जी को बुलाया गया। अपनी साफ़गोई का ठीकरा अपने शहर पर फ़ोड़ते यह कहते शुरुआत की – ’ उन्नाव का आदमी हूं इसलिये साफ़ बात कहता हूं।’

    आगे अपनी बात कहते दिनेश प्रियमन जी ने कहा- “यह थोड़ा ऊब का उपन्यास है। आज समय कम है। जिस कथा भूमि को लेकर गीतांजलि जी ने उपन्यास लिखा है उसका फलक बहुत व्यापक है। इसने स्त्री विमर्श की नई खिड़कियां खोलता है। यह उपन्यास एक अफसर परिवार की विधवा की कहानी है। मैंने उनका उपन्यास माई नहीं पढ़ा अतः कह नहीं सकता कि उससे यह कैसे रिलेट करता है। इसमें आज का बाजारवाद, भूमंडलीकरण दार्शनिक तरीके से चित्रित हुआ है।

    शुरुआत में मुझे लगा कि क्या निराला की किसी कविता से ली गयी पंक्ति है। उपन्यास का शीर्षक पढ़कर निराला की कविता पंक्ति याद आई:

    स्नेह निर्झर झर गया है
    रेत ज्यों तन रह गया है।

    मुझे प्रो जीडी अग्रवाल भी याद आये। रेत समाधि से उनका निधन भी याद आया। उन्होंने 112 दिन उपवास करके देह त्यागी। अपने समय की बात कहता हुआ आने वाले समय का संकेत देता है ’रेत समाधि’। भविष्योन्मुख है यह उपन्यास।

    भाषा और शब्द संयोजन में बहुत तोड़ फोड़ की है गीतांजलि जी ने। हिंदी पट्टी के अनेक भूल से गये शब्द तद्भव रूप में दिखते हैं। भूले बिसरे शब्दों को जीवित किया है।

    चीजों की नई प्रस्तुति इस उपन्यास की उपलब्धि है।“

    दिनेश प्रियमन जी के बाद दया दीक्षित जी ने अपनी बात कही। उन्होंने उपन्यास के प्रकाशन के लिये राजकमल प्रकाशन के प्रकाशकीय विवेक को सलाम करते हुये बात की शुरुआत की।

    दया जी ने अपना लिखा हुआ वक्तव्य पढते हुये कहा-

    “इस कायनात में अनेक नेमतें अपनी विशेषताओं के साथ विद्यमान हैं। लेकिन विडंबना है कि सभी विशेषतायें हरेक को एक तरीके से नहीं प्रभवित कर सकती। सब पर अलग-अलग प्रभाव छोड़ती हैं।

    यह बहुपाठीय उपन्यास है। लेखिका ने यह सुविधा प्रदान की है कि अपने हिसाब से हम इसका पाठ कर सकते हैं।
    इसकी भाषा विलक्षण है। शब्दों की प्रयोग शीलता ऐसी है जिनमें आकर्षण भी हैं, विकर्षण भी है।

    सफ़ल लेखक वह है जो अपने लेखन के माध्यम से समकालीन समस्याओं को उठाये। गीतांजलि इसमें पूर्णत: सफल हैं।

    प्रेम का उद्दात स्वरूप इस उपन्यास का प्राणाधार है।“

    खान अहमद फारुख साहब ने अपनी बात कहते हुये कहा- “जब बहुत बुरा वक्त आता है तो बशारतें (खुशखबरी) आती हैं। बुरे वक्त के लिए यह उपन्यास बशारत है।“

    आगे खुलासा करते हुये फ़ारुख साहब ने कहा –“ यह उपन्यास मुश्किल है यह अफवाह मेरी ही उड़ाई हुई है। गीतांजलि का उपन्यास माई मैंने उर्दू में पढ़ लिया था।

    इंतजार हुसैन ने माई का द्विवाचा उन्होंने किया है। सरहद की दोनों तरफ गीतांजलि उतनी ही पापुलर है।

    माई से जोड़कर मैंने इसे पढ़ना शुरू किया। लगा कि माई की रूह उपन्यास में आ गई है।

    कहानियां कभी मरती नहीं। बड़ी ढीठ होती हैं। सबने इस नेवले की कहानी सुनी होगी जिसके मुंह में खून देखकर उसके मालिक ने यह सोचकर उसे मार दिया कि उसने उसके बेटे को मार दिया है जबकि वह नेवला सांप से बेटे को बचाने के लिए उसको मार दिया है। दुनिया की तमाम भाषाओं में यह अलग अलग तरह से पढ़ी गयी है।

    इस उपन्यास की खासियत है कि यह लाउड नहीं है। सहज है। इस उपन्यास की इस समय बहुत जरूरत थी। मोहब्बत की कहानी है यह उपन्यास।

    जब बहुत बुरा वक्त आता है तो बसारत भी होती हैं। बुरे वक्त के लिए यह उपन्यास बसारत है। “

    फ़ारुख साहब के बाद कवि आलोचक पंकज चतुर्वेदी जी ने उपन्यास के बारे में अपनी राय रखी।

    उन्होंने बताया कि उनका वक्तव्य पढ़ने की प्रक्रिया के दौरान का है। युध्द भूमि में लड़ते सैनिक का बयान। उन्होंने बताया कि इस उपन्यास पर लिखने वाले लेख का शीर्षक होगा – ‘हद सरहद के आईना खाने में’ ।

    उपन्यास की दुरुहता पर किसी आलोचक को उद्दरित किया –’शेक्सपियर ने दस शक्तिशाली लगातार वाक्य कहीं नहीं लिखे।’

    पाब्लो पिकासो के हवाले से कहा – ’दुनिया ही बेमतलब है।’

    उपन्यास पर बात करते हुये पंकज चतुर्वेदी ने कहा – “मतलब भर की कविता के श्रेष्ठ अंश इस उपन्यास में मिले।

    यह बहुत सारी विधाओं का संश्लेषण है। इसमें इतिहास है, दार्शनिकता है, संस्मरण है।

    आज भारत का मध्यवर्ग आक्रामक है, मदमस्त है, तमाम समस्याओं की अनदेखी देखी करके मेरा भारत महान का नारा लगाने में लगे है।

    जिसके ऊपर बीत रही है उसकी कथा कहने वाला उपन्यास है।

    वामपंथियों की विफलता रही कि वे अपने समाज को शिक्षित कर पाए। आम लोगों को कहिये की फासीवाद आ गया तो लोग समझेंगे की कोई त्योहार आ गया है।
    उपन्यास में ठहराव है, भुलभुलैयापन है, इसमें गद्य कब कविता हो जाये और कविता कब लौट आए कह नहीं सकते।

    आप इसे कहीं से भी पढ़ सकते हैं। कहीं खत्म कर सकते हैं। पूरा पढ़कर भी लगेगा कि अधूरा है। आधा पढ़कर भी लग सकता है अधूरा है।

    राजेन्द्र यादव की आत्मकथा मुड़ मुड़ कर देखता हूँ की तर्ज पर इस उपन्यास के बारे में कहा जा सकता है – ’रुक रुक कर देखता हूँ।’

    उपन्यास में उन कई लेखकों के नाम हैं जिन्होंने विभाजन की त्रासदी पर लिखा है। विभाजन की त्रासदी पर उन्ही लोगों ने लिखा जिन्होंने इसे सबसे ज्यादा भोगा है। लेकिन कुछ नाम छूट भी गये हैं जैसे –’अज्ञेय, यशपाल आदि।’

    पंकज जी ने उपन्यास के कुछ अंश भी पढे। ’ हर कहानी होती ही है पार्टीशन स्टोरी।’- यह एक समुद्र जैसा वाक्य है जिसमे मेरे जैसा पाठक बहुत दिन तक उतराता रहेगा।

    राजेन्द्र राव जी ने उपन्यास पर अपनी राय जाहिर करते हुये कहा-’ यह उपन्यास अद्भुत है, अलग है, मुश्किल है। कोई जरूरी भी नहीं कि कोई उपन्यास चन्द्रकान्ता की तरह आसान लगे।’

    उन्होंने आगे आह्वान किया –’ पढने में भी मेहनत करनी चाहिये। पढिये कसरत कीजिये। पहलवान की तरह। पढिये इसे। आनन्द उठाइये।’

    प्रियंवद जी के आने तक समय काफ़ी हो चुका था। उन्होंने अपनी बात की शुरुआत इस शुरुआत इस शेर से की

    ’कुछ भी बचा न कहने को हर बात हो गई
    आओ कहीं शराब पिएँ रात हो गई ।’

    उपन्यास के शिल्प पर बात करते हुये प्रियंवद जी ने कहा-’भाषा के स्तर पर इस उपन्यास के पहले भी बहुत प्रयोग हो चुके। जेम्स जायस ने लिख है – शब्द सब कुछ कह सकते हैं।’

    कृष्ण वलदेव वैद्य के उपन्यास ’नर नारी’ में भी कोई पूर्णविराम नहीं है। जब कोई सोचता है तो वह व्याकरण में नहीं सोचता। कामा फूल स्टॉप में नहीं सोचता।

    पंकज चतुर्वेदी की बात ’ विभाजन पर उन्होंने लिखा जिन्होंने भोगा’ पर सवाल उठाते हुये प्रियंवद जी ने पूछा –’ गंगा जमुनी सभ्यता पट्टी के लोगों ने क्यों नहीं लिखा विभाजन। निराला, महादेवी और अन्य के यहां यह त्रासदी कहां है? किसने लिखा है इस बारे में बताइये आप ? आप तो अध्यापक हैं।

    पंकज चतुर्वेदी जी ने यह कहते हुये अपना पल्ला झाड़ लिया – ’अध्यापक सबसे मूर्ख होते हैं।’

    लेकिन प्रियंवद जी ने इस पर अपनी राय रखते हुये कहा-’हिंदी पट्टी का आदमी हमेशा से साम्प्रदायिक सोच का रहा है इसीलिए यहां के लोगों ने विभाजन पर नहीं लिखा। आप तब भी साम्प्रदायिक थे, आज भी साम्प्रदायिक हैं।’

    आगे अपनी बात कहते हुये उन्होंने कहा-’ किसी दूसरे की रचना पर हम कैसे टिप्पणी कर सकते हैं। लिख जाने के बाद उस पर हम बोलें यह ठीक नहीं लगता। ’

    इसके बाद गीतांजलि श्री जी ने अपनी बात कही। उन्होने चर्चा पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुये कहा – ’मैं सन्नाटे में हूँ। मुझे समझ नहीं आ रहा मैं क्या कहूं?’

    गिरिराज किशोर जी से अपने जुड़ाव की बात करते हुये गीतांजलि जी ने बताया-’ पहला गिरमिटिया पढ़कर मेरे पिताजी जिगर से लगाये घूमते थे। उन्होंने उसे न जाने कितनी बार पढ़ा। वे ऊबे हुए थे। जब भी मन करता पढने लगते। बार-बार पढते।

    बाद में मेरी माँ ने बा पढा। वे उसी तरह उससे जुड़ी जिस तरह पिताजी पहला गिरमिटिया से जुड़े थे।

    अपने उपन्यास के बारे में बात करते हुये गीतांजली श्री ने कहा- ’छह सात साल लग चुके इसे लिखे। जब इतना डूबकर लिख चुके होते हैं तो कुछ इम्यून से हो जाते हैं। अलग से हो जाते हैं। समझ नही आता कि कैसे इसे ग्रहण किया जाए। ऐसे आयोजनों की उपलब्धि है कि संवाद बनता है। आप सबने मेरी किताब को पुर्नजीवन दिया है। यह एक विनम्र अनुभव है। यही कहकर अपनी बात खत्म करती हूँ।

    अपनी बात खत्म करने के बाद गीतांजलि श्री जी ने उपन्यास के एक अंश का पाठ किया।

    गिरिराज किशोर जी ने अपने संबोधन में गीतांजली श्री का अपने पिताजी से जुड़ी यादें साझा करने के लिये आभार व्यक्त करते हुये कहा –’यह मेरे लिये सुखद अनुभूति है कि मेरी रचना से कोई इस कदर जुड़ाव महसूस करे।’

    उन्होंने गीतांजलि श्री जी के पिताजी के साथ की यादें साझा करते हुये करते बताया- ’चालीस साल पहले वो मेरे बॉस थे। हम साथ बैठते थे। वे अच्छे लेखक थे।’

    गिरिराज जी ने अपनी बात कहते हुये कहा-“रचना होने के बाद वह उससे बाहर हो जाता है। वह खूब डूबकर लिखता है। उसके बाद बाहर हो जाता है। हो जाना चाहिए।

    लेखन एक संजीवनी की तरह है। रचना लिखना बच्चों को पालना जैसा है।

    आज हमारे सामने सबसे बड़ी समस्या अपने समय को जीने की है। इतनी घटनाएं हो रही हैं, इन पर कैसे लिखें लेखक को समझ नहीं आ रहा। हमारी बात दूर दूर तक कैसे पहुंचे यह सोचना होगा।

    अगर लेखक डरता है तो लिख भी नहीं सकता ।
    गीतांजली की कहानियां मैंने पढ़ी हैं। उनमें भी वही सम्वेदना है जिसका जिक्र उपन्यास में हुआ है।

    आज समय कठिन है। लेकिन कुछ रोशनी बची हुई है। हमको पहले से संम्भलना होगा। अभी उतना अंधियारा नही हुआ। कुछ किरणें बाकी हैं। हमें अपने समय को पहचानना होगा।

    आज राजनीति में बहुत गड़बड़ है। जिस भाषा में वे राजनीतिज्ञ संवाद करते हैं उससे साफ लगता है कि उनको जनता से कोई मतलब नहीं। वे अपने मतलब के लिए जनता का उपयोग करते हैं।

    हमारी आवाजें उन तक नहीं पहुंचती जहां तक पहुंचनी चाहिए। आज पाठ्यक्रम सरकारें तय कर रही हैं।

    समय को पहचानिये। खराब समय को बदलिए। खराब हालत बहुत दिन तक हम पर हावी न हो सकें हमें यह देखना होगा। उसके लिये मेहनत करनी होगी।

    वक्त को नजरअंदाज मत कीजिये। नजर अंदाज करेंगे तो वक्त आपको छोड़कर आगे चला जायेगा। उसके बाद वक्त आपका होगा या नहीं यह कहा नहीं जा सकता।“

    अध्यक्षीय संबोधन के बाद अनीता मिश्रा सभी को धन्यवाद किया। बोलते रहने का आह्वान भी कर दिया यह कहते हुये –’बोल कि लब आजाद हैं तेरे।’

    इस तरह एक खूबसूरत शाम रही। किताब की चर्चा उससे किस कदर जोड़ती है हमको इसका एहसास हुआ। इस तरह के कार्यक्रम होते रहने चाहिये। हों तो उनमें जाते रहना चाहिये। जिन्दगी को नया एहसास मिलता है। संजीवनी मिलती है।

    Reply
  • November 19, 2018 at 11:54 pm
    Permalink

    Anoop Shukla is with Neelam Shukla and 3 others.15 November at 21:39 · “प्रसाद जी नफासत के आदमी थे | इतना बढ़िया ताम्बाकू पीते थे कि गोवर्धन सराय की गली मे घुसते ही महक से नाक को आनन्द आ जाता था | मुझे लालच लगती थी वैसे ही पीने को पर पैसा नही था | वे कभी ‘ फर्शी ‘ या कीमती पेचवान नही रखते थे |
    काशी की प्रसिद्ध मिट्टी की ‘गोरैया’ पर चिलम रखते | हाथ मे लेकर पीते | नई गोरैया मे पानी पड़ने से बड़ा सौधापन आ जाता था | इसीलिये एकबार से अधिक उसका उपयोग नही करते | वह फेंक दी जाती | तम्बाकू पीने के लिये मिट्टी की गोरैया तथा आग की जगह पिसा कोयला तथा चावल की माँड की बनी टिकिया , यह काशी की ही विशेषता हैं | अन्य कही भी नही मिलती | उन दिनो एक पैसे की दो गोरैया मिलती थी | प्रसाद जी दिन भर मे करीब पच्चीस गोरैया प्रयोग मे लाकर फेक देते थे | मुझसे कहते — एक बार एक गोरैया पीने के बाद बेकार हो जाती है | कोशिश करता हूँ कि दुबारा काम मे न लूँ | मैने कहा — ‘ बड़ा खर्च पड़ता हैं |” अरे इस शरीर को और कितना सादा रक्खू | शराब पीता नही , भाँग छानने का शौक नही , मेरी तरफ से विनोद और उग्र छान लेते है | उन्ही का नशा मुझे भी लगा रहता है | अब इतनी अय्याशी तो करने दो |’एक बार दोपहर को उनके सादे पर स्वच्छ कमरे मे मै बैठा हुआ था | प्रेमचंद जी के कमरे मे हरेक वस्तु अस्त- व्यस्त रहती थी | अगर न भी रहती तो वे अस्त व्यस्त कर देते | शायद अव्यवस्था की व्यवस्था से ही उन्हे स्फूर्ति मिलती थी | पर प्रसाद जी के कमरे मे एक तिनके को भी आजादी नही थी | कलम भी टेढ़ीनहीं रह सकती थी | पान के शौकीन थे पर पीकदान जरुर रखते | फर्श , गली या सड़क पर उन्हे थूकते नही देखा | पान खाने को वे बनारसी भाषा मे ‘पान जमाना ‘ कहते थे | गर्मी का दिन था , मै कमरे मे बैठा था , मैने पानी माँगा | उन्होने पूछा – फल का रस लोगे ?
    मैने कहा – प्यास लगी है | देर लगेगी |नही तैयार है | फालसा का है | मै गर्मी मे पानी बहुत कम पीता हूँ|
    पर , स्वच्छ , शालीन, सच्चरित्र , फल दूध, बढ़िया भोजन से पोषित शरीर को क्षय का घुन लग गया | वे बच न सके | ४८ वर्ष की कच्ची उम्र मे सन् १९३७ मे , प्रेमचंद जी के निधन के कुछ महीने बाद उनका स्वर्गवास हो गया |(बीती यादे : परिपूर्णानन्द वर्मा )
    Anoop Shukla is with Matrasthan Matrasthan and 2 others.
    13 November at 20:07 ·
    –: मिर्जा गालिब और कानपुर :–
    ==================
    ” मिर्जा गालिब ने भी अपने सफर कलकत्ता के दौरान कुछ दौर कानपुर मे कयाम किया | मौलाना गुलाम रसूल मेहर ने अपने एक मजमून मे गालिब के कलकत्ता के सफर की सही तारीख पर बहस करते हुए बताया कि ” लखनऊ के बाद जो अखतरार लोग मुद्दत से चाहते थे कि मिर्जा एक बार लखनऊ आए | इसलिए जब वो कानपुर पहुँचे तो उन्हे ये ख्याल आया कि लखनऊ भी देखते चले जीकायदा १२४२ हिजरी मुताबकत १८२७ की २९ तारीख को वो लखनऊ से निकले और कानपुर पहुँचे , और वहाँ दो – तीन रोज कयाम के बाद चले गये | ” इस मजमून से यह बात साफ होती है कि गालिब कानपुर से होते हुए लखनऊ गए , और वापस मे भी कानपुर आए , लेकिन यह बात साफ नही होती कि लखनऊ जाने से पहले वह कानपुर मे कयाम पजीर हुए या नही और लखनऊ मे कितनी उमर कयाम किया | बहरहाल गालिब जितने दिन दिन ठहरे हो लेकिन उनके दोस्त मुंशी मियादाद खान औरंगाबादी अक्सर वीस्तर कानपुर आते थे , और मुशायरो मे शिरकत करते थे | मुशायरा तरह खुद देते थे , और हर मुशायरो मे अपना रंग जमा लेते थे | मुंशी साहब के गालिब से निहायत पर खलूस और करीनी तहकात थे | कहा जाता हैं कि उनका तखलिस सिय़ाह और लकब ” सैफ अल्हक ” दोनो न गालिब के तजवीज कर दो थे | निहायत और जहीन और जी आलम थे और कसरत से सफर करते थे | उन्होने अरब , ईरान की भी सयाहत की भी और इसी हवाले से गालिब ने उनका तखलिस सिया रख दिया था |
    ” अवध हिन्दी ” मे गालिब ने सयाह का जिक्र निहायत मोहब्बत से किया है | सयाह के मुंशी नवलकिशोर से भी बहुत अच्छे तालुकात थे | काता बरहान की इशायत पर जो हंगामा खड़ा हुआ था , उस सिलसिले की एक किताब ” लतायफ गौबी” सयाह से भी मनसूब है, लेकिन बकौल मौलाना गुलाम रसूल भर ऐ किताब गालिब ने लिखी थी , और सयाह के नाम से छपवाई थी |
    खुतूत गालिब मे दो खत एक व्यक्ति गोविन्द सहाय के नाम मिलते है | गोविन्द सहाय के बारे मे मौलाना गुलाम रसूल भर लिखते है ,कि वह देहली के रहने वाले थे |और उनका घर गली कासिम जान से ज्यादा दूर न था | मुलाजमत या किसी दूसरे सगल के सिलसिले मे आगरे चले गये थे | जहाँ शराब के लिए गालिब ने उनके नाम खत लिखे , लेकिन खत के मजमून से अन्दाजा होता है कि गोविन्द सहाय आगरा नही कानपुर मे थे , गालिब अपने खत मे लिखते है – ” …..दो सवाल हैं तुमसे एक तो ए के यहां मशहूर हैं कि नवाब गवर्नर जनरल बहादुर इलाहाबाद से कानपुर आए गे कोई कहता हैं , आवे गे इसका हाल जो कुछ तुमको मालूम हो लिखो ….. ” अगर गोविन्द सहाय आगरे मे होते तो गालिब ” आ गए और और आवें गे ” की बजाय ” चले गये और जावें गे” इस्तेमाल करते ये खत २९ दिसम्बर १८५९ ई० का तहरीर करदो है | दूसरे खत मे गालिब ने शराब की पसन्दीदा किस्मो का जिक्र करते हुए इसकी कीमत को बहुत ज्यादा बताया है | गोया ये खत गालिब के पहले खत का जवाब अलजवाब है | ये जनवरी १८६५ का तहरीर कर दो है | इस भी अन्दाजा होता हैं कि खतो का तबादला काफी वक्त लेता है | इसलिए गोविन्द सहाय कानपुर मे ही मुकाम थे | अगर वह आगरा मे होते तो इतना वक्त न लगता क्योकि आगरा देहली के बहुत करीब है और शराब की कीमतो मे भी यकसानियत होगी | बहरहाल देहलीवालो की भी कानपुर मे आमद व रफत थी |
    ( शहर ए अदब कानपुर : डा. सय्यद सईद अहमद / करांची , पाकिस्तान / अप्रैल २००१ )
    (किताब के पेज – १२ से १७ तक का अनुदित अंश )
    नोट :- उर्दू के जानकार से किताब पढ़वा कर मैने हिन्दी मे लिखा हैं अत: त्रुटियो की संभवना है इसलिए माफी चाहूँगा |

    Reply
  • December 9, 2018 at 7:00 pm
    Permalink

    Vineet Kumar
    27 November at 11:09 ·
    हिन्दी में छोटापन एक समस्या है,
    लोग एक-दूसरे को स्वीकार नहीं करते ः रविश कुमार

    सवाल ये है कि आप अपने खिलाफ, अपनी विचारधारा के खिलाफ जाकर कितना लिख पाते हैं ? भाषा कोई अलग से चीज नहीं होती, कंटेंट नहीं है तो भाषा की सजावट से आप क्या कर लेंगे ? ऐसा नहीं है कि हिन्दी में लोग पढ़ नहीं रहे हैं, खूब पढ़ते हैं और ऐसे लोगों की संख्या लाखों में है. लेकिन

    हिन्दी में असल समस्या छोटापन है. लोगों को लगता है कि मैं फलां का नाम ले लूंगा तो उसे कोई अतिरिक्त लाभ न हो जाए. पुराने लोग नए लोगों का नाम नहीं लेते. जो बहुत पढ़ते हैं वो माध्यम के हिसाब से कंटेंट लोगों तक ले जाने की काबिलियत अपने भीतर पैदा नहीं कर पाते. आपमें काबिलियत नहीं है तो मान लीजिए, सीधे-सीधे माध्यम को कोसने से क्या हो जाएगा ?

    Reply
  • December 13, 2018 at 9:05 am
    Permalink

    Priya Darshan6 December at 07:58 · हिंदी की वरिष्ठ लेखिका चित्रा मुदगल पर ‘हिदुस्तान’ में छपी यह संक्षिप्त-त्वरित टिप्पणी।
    एक मूल्यवान परंपरा का सम्मान73 साल की लेखिका चित्रा मुदगल को मिला इस वर्ष का साहित्य अकादेमी सम्मान बताता है कि साहित्य अकादेमी जैसे अतीत की चूकों के प्रक्षालन में लगी है। जो पहले वहां निर्णायक रह चुके हैं, उन्हें अब पुरस्कृत किया जा रहा है। पिछले पांच-छह साल में जिन हिंदी लेखकों को यह सम्मान मिला है, वे सब सत्तर पार रहे हैं और उनके बारे में यह बात आश्वस्ति के साथ कही जा सकती है कि अपनी पिछली कृतियों में भी वे यह सम्मान हासिल करने की पात्रता रखते थे।
    चित्रा मुदगल के साथ एक और ख़ास बात है। मन्नू भंडारी और कृष्णा सोबती के बाद हिंदी में महिला लेखन की कमान जिन हाथों ने बहुत भरोसे के साथ थामी और अपने समय के पुरष लेखकों को लगभग बराबरी की चुनौती दी, उनमें मृदुला गर्ग और ममता कालिया के अलावा तीसरा नाम चित्रा मुदगल का ही ध्यान आता है। बेशक, इन्हीं के साथ और आसपास नासिरा शर्मा और उषा प्रियंवदा के नाम भी लिए जा सकते हैं। क्या इत्तिफ़ाक है कि साहित्य अकादेमी ने महज दो साल पहले नासिरा शर्मा को और पांच साल पहले मृदुला गर्ग को सम्मानित किया है। निस्संदेह इस सबके मुक़ाबले अलका सरावगी ख़ुशक़िस्मत रहीं जिन्हें उनके पहले ही उपन्यास ‘कलि कथा वाया बाईपास” के लिए 40 साल से कम की उम्र में यह सम्मान मिल गया था- बेशक, उनका उपन्यास भी अपनी तरह से विलक्षण था- और ममता कालिया अब तक इससे वंचित हैं, जबकि संभवतः सबसे अच्छी क़िस्सागोई का फ़न इन सबमें उन्हें ही हासिल है।

    चित्रा मुदगल पर लौटें। वे पांच दशकों से लगातार लिख रही हैं। कहानियां, उपन्यास, नाटक, बाल साहित्य, विचार- लगभग हर क्षेत्र में नए इलाक़ों में दाख़िल होती दिखती रहीं। समय-समय पर प्रकाशित और कई कहानी संग्रहों में संकलित उनकी कहानियां व्यक्तिगत अस्मिता, पारिवारिक ताने-बाने और सामाजिक संघर्ष के आसपास घूमती रही हैं। उनकी कहानियों पर टीवी सीरियल और सिनेमा बने हैं। उनका उपन्यास ‘गिलीगडु’ दो वृद्धों के बढ़ते एकांत की मार्मिक कथा है जो हमारे समय में लगातार विकराल हुई जा रही है। ‘आवां’ मुंबई के मज़दूर आंदोलन पर फोकस करता एक पठनीय उपन्यास है। अपने पिछले उपन्यास ‘पोस्ट बॉक्स नंबर 203 नाला सोपारा’ में उन्होंने एक किन्नर परिवार की कहानी कही। वे सामाजिक और साहित्यिक मोर्चों के के कई मंचों पर भी सक्रिय रही।

    दरअसल स्त्री सशक्तीकरण की जो बात इन तमाम वर्षों में एक मुहावरे की तरह कही जाती रही है, उसे उसके सच्चे अर्थों में हिंदी साहित्य में जिन शख्सियतों में देखा जा सकता है, उनमें चित्रा मुदगल भी एक हैं। बेशक, स्त्री स्वातंत्र्य को लेकर चल रही नई बहसें उन्हें कुछ असहज करती रही हैं। वे ख़ुद को स्त्री विमर्श के दायरे से बाहर रखा जाना पसंद करती हैं और इसके पीछे के उनके वैचारिक आग्रह बहुत दूर तक उनकी पीढ़ी के उस द्वंद्व की भी देन हैं जिसकी नायिकाएं घर से बाहर तो आ रही थीं, लेकिन शील के पुराने मूल्यों से बंधे रहना अपना कर्तव्य समझती थीं। इसका मतलब यह नहीं कि वे आधुनिक नहीं हैं, मगर बहुत आक्रामक क़िस्म की आधुनिकता की पक्षधर वे नहीं हैं।

    साहित्य अकादेमी सम्मान पिछले वर्षों में विवादों के घेरे में आया है। कुछ अरसा पहले कई लेखकों ने राजनीतिक सत्ता के विरोध में अपने सम्मान भी लौटाए। अचानक वहां सरकारी परियोजनाओं- मसलन स्वच्छता मिशन- से जु़ड़े आयोजन दिखने लगे हैं। उस पर इन वर्षों में यह आरोप पुख्ता हुआ है कि वह वैचारिक तौर पर सत्ता के लिए सुविधाजनक लेखकों को दिया जाता रहा है। यह सुविचारित हो या अनायास, इसमें संदेह नहीं कि इतने वर्षों बाद साहित्य अकादेमी चित्रा मुदगल को सम्मानित करने का साहस दिखा सकी तो इसलिए भी कि वे मौजूदा सत्ता-प्रतिष्ठान के लिए असुविधाजनक नहीं हैं, उनकी आंखों में गड़ने वाली लेखिका नहीं हैं। उल्टे कई बार वे मौजूदा वैचारिकी की सहचर नज़र आती हैं।

    बहरहाल, लेखन ‘पॉलिटिकल करेक्टनेस’ से भी बड़ा होता है और पुरस्कारों से भी। चित्रा मुदगल और उनकी पीढ़ी का मोल यह है कि उन्होंने लेखन की एक बड़ी धारा बनाई। सातवें आठवें दशकों में महिला लेखन के जिस क्षितिज पर कुल जमा चार-पांच नाम दिखाई पड़ते थे, आज वहां लेखिकाओं की पूरी फौज है तो इसका कुछ श्रेय उनके लेखन को भी जाता है

    Reply
  • December 31, 2018 at 11:28 pm
    Permalink

    Vineet Kumar
    25 December at 11:33 ·
    हर किसी को पीड़ित करार देना भी उसके खिलाफ हो जाना है ः

    बदतर से बदतर जिंदगी से भी छोटी-छोटी खुशियां या बेहतर की उम्मीद चिपकी रहती है. शायद यही वजह होती है कि उपरी तौर पर जिन्हें हम फटेहाल, बेजान और जर्जर देखते हैं, जब उनकी जिंदगी में झांकने की कोशिश करते हैं तो कई बार उस चमक से हम अवगत हो पाते हैं. रिक्शेवाले की बेटी ने किया सीबीएससीई में टॉप, कबाड़ी वाले लड़के का बाबू बनने का सपना हुआ पूरा. एक हाथ गंवा चुकी छात्रा ने किस्मत को किया परास्त जैसी हेडलाइन के साथ खबरें इन्हीं उम्मीद के बचे रहने के बीच से निकलकर आती हैं. लेकिन

    कई बार हम सरोकार के नाम पर जब ऐसी जिंदगियों के बारे में बात करते हैं, उन पर लिखते हैं, रिपोर्टिंग करते हैं तो उनसे चिपकी खुशियों और उम्मीदों को न केवल नजरअंदाज कर जाते हैं बल्कि हमारी कोशिश होती है कि जमाने के आगे उन्हें पीड़ित( विक्टम ) के रूप में पेश करें. पीड़ित के तौर पर ऐसी जिंदगियों को स्थापित करने का फॉर्मूला इतना पॉपुलर और असरदार है कि इन जिंदगियों की पेंचीदगी, उनके रोज के संघर्ष करते हुए भी जीवन के प्रति गहरी आस्था हमारी कीबोर्ड से ओझल हो जाते हैं. हम उन्हें पीड़ित बताने में इतने रम जाते हैं कि इस बुनियादी सच से काफी दूर हो जाते हैं कि ऐसा करने से पहले हमें खुद से भी पूछना चाहिए था कि सिर्फ वो पीड़ित है या हम सरोकार की बात करते-करते पीड़ित सिन्ड्रोम के शिकार होते चले गए हैं ?

    एक लेखक का, पत्रकार का, कलाकार का, रचनाशील इंसान की यह जरूरी जिम्मेदारी है कि वह अभावग्रस्त समाज के साथ खड़ा हो, संघर्ष कर रहे लोगों के पक्ष में हो लेकिन उसके साथ-साथ उतना ही जरूरी है कि उनके संघर्ष को, उनकी छोटी-छोटी खुशियों को, उनकी उम्मीदों को उनके बारे में बात करते हुए उनकी जिंदगी से अलग न कर दे.

    आप प्रेमचंद को पढ़िए, रेणु को पढ़िए, नागार्जुन को पढ़िए, मुक्तिबोध, राही मासूम रजा को पढ़िए…पढ़ते चले जाइए. अलग-अलग कहन शैली और समझ के बावजूद आप इन सबमें एक चीज कॉमन पाएंगे और वो यह कि ये गरीब, मजदूर, किसान, हाशिए के समाज के संघर्षों और पीड़ा को जितनी बारीकी से संवदेना के गहरे धरातल पर जाकर व्यक्त करते हैं, उतनी ही शिद्दत से उनके बीच की उत्सवधर्मिता, जीवटता और जीवन के प्रति गहरी आस्था को सहेजते हैं. उनके बड़ा लेखक होने की वजह सिर्फ संघर्षों और अभाव का बयान नहीं, छोटी-छोटी खुशियों के सहेजने और व्यक्त करने का हुनर है. आप इनकी रचनाओं के सबसे जर्जर चरित्र को सबसे उद्दात, मजबूत और मानवीय भी इसी आधार पर महसूस कर पाते हैं.

    जब हम ऐसे अभावग्रस्त लेकिन संघर्षशील समाज और व्यक्ति को हर हाल में पीड़ित के तौर पर स्थापित करने लग जाते हैं तो जाने-अनजाने उनके भीतर के उस नमक को नजरअंदाज कर देते हैं जिनके बूते उनकी जिंदगी चल रही होती है. ऐसा किया जाना लिखते-पढ़ते हुए भी उनके खिलाफ हो जाना है. हमारे भीतर इस विवेक का विकसित होना और बने रहना बेहद जरूरी है कि कहां हम उनके संघर्ष और जीवटता पर बात करते हुए नमक पैदा कर रहे हैं, उसके आत्मसम्मान को सहेज रहे हैं और कहां उन्हें पीड़ित करार देकर अपना कद बड़ा करने की कोशिश में लगे हैं.

    नवीन कुमार, आजतक की दिल्ली की ठंड और उस पर अभिषेक श्रीवास्तव (Abhishek Srivastava) का आलेख पढ़ने के बाद जो महसूस किया.

    Reply
  • January 9, 2019 at 6:19 pm
    Permalink

    बहुत ही सुखद आश्चर्य हे की ये साहित्यिक लेख लगातार पढ़ा जाता हे और पंद्रह हज़ार के आस पास क्लिक हो चूका हे अब तक बहुत खूब

    Reply
  • January 25, 2019 at 4:42 pm
    Permalink

    पुराने क्लिक की सुचना मिट गयी हे ये साहित्यिक लेख पंद्रह हज़ार के आस पास क्लिक हो चूका हे——————————————————
    Ravish Kumar
    6 hrs ·
    कृष्णा सोबती ने टीवी को वो आखिरी न्यूज़ दे दी है

    “इन दिनों मैं ऐसा महसूस कर रही हूं जैसे अपार्टमेंट के वॉक-वे पर चल रही हूं। एक ब्लॉक से दूसरे ब्लॉक की ओर। जाने किए पृथ्वी के इस नक्षत्र से किसी दूसरे नक्षत्र की ओर। कुछ ऐसे कहूं कि इस लोक से उस लोक की ओर-यहां से विदा होने के ख़्याल से कुछ अटपटा भी नहीं लग रहा। शायद इतनी लम्बी जीवन-यात्रा का संतोष ही होगा।

    इस लोक में जीते हुए अपनी आंखों से हज़ारों-हज़ारों सूर्योदय देखे और हज़ारों ही सूर्यास्त, त्रिकाल के सांझ-सन्धया, सुनहले रंगों के अंकन। ताजी निथरी धूप की संगीन-सुहानी छांह। आकाश में फैली पड़ी सूर्य की मनभाती गरमाहट। ऋतु मास के अनुरूप तीखी सर्द गरमाहट। फिर वसन्त की फुहार –मन-तन को सरसाती हमारी यह भारत धरती। मेघ-मालाएं, झम्मा-झम्म पनीली धाराएं टीलों और मंझली पहाड़ियों को थपथपाती, गुनगुनाती- जिस महाशक्ति ने आंका होगा इस ब्रह्मांड का लैंडस्केप वह कोई साधारण चितेरा न होगा। अब वैज्ञानिक भी छू रहे हैं- इन रहस्यों को।

    यह सुहाना लोक है जो इस भारत धरती के हिस्से में आया- उसका महिमागान भला हम क्यों न करें। और जो इनसानी प्रतिभा ने इस धरती के स्त्रोत में सुविधाएं बनाईं, उसके लिए भी क्यों भाव न लें।”

    (गिरधर राठी से, कृष्णा सोबती से साक्षात्कार में)

    “सबसे अक्षम्य अपराध है किसी भी व्यक्ति, समूह जाति का मनोविज्ञान बदलना। हम भारतीय इसके विशेषज्ञ हैं। हम पचास वर्ष पुराने लोकतंत्र में आज बी इसका दर्शन पाल रहे हैं। चित्तपावन बिन्दु को केंद्र में रखकर बराबर के नागरिकों को विभाजित करने पर तुले हैं। पुरानी वर्ण-व्यवस्था को दुबारा स्थापित करने की कोशिश में। डंके की चोट पर कह रहे हैं कि हम हम हैं, तुम तुम हो। तुम तुम रहोगे, हम हम रहेंगे। याद इतना रहे कि इतिहास का पुनर्लेखन एक ऐसी राजनीति है जो दिलों में घृणा, विक्षोभ और वैमनस्य के अम्बार जुटाती है और मौक़ा देखते ही आग सुलगाकर लपलपाने लगती है। गुजरात से गुजरात तक।”

    (अनामिका से, कृष्णा सोबती से साक्षात्कार में)

    हॉकी की खिलाड़ी कृष्णा सोबती के पास कितना साहित्य था। मैं भी कृष्णा जी से बात करना चाहता था। उनके साथ बैठकर सुनने का प्लान बनता रह गया। प्राइम टाइम के लिए बहुत कोशिश की। अमितेश ने जान लगा दी। कई बार बात की मगर असफलता ही हाथ लगी। मीडिया के मौजूदा दौर ने घर अस्पताल के चक्कर काटती कृष्णा जी को खिन्न कर दिया होगा। तभी अपनी बेहद करीबी से कह गईं कि मुझे वो पसंद है लेकिन मैं अब टीवी को एक ही न्यूज़ दूंगी। वही जो आज ख़बर आई है। अपने विदा होने की।

    Reply