जावेद अख़्तर अपने सात पुश्तों में सब से कमतर दर्जे के शायर है ! उनके खानदान का इतिहास जानिये !

By –Afzal Ahmad

मै जावेद अख़्तर का मुरीद नहीं हूँ l इसकी कई वजहें हैँ जिनका ज़िक्र यहाँ प्रासंगिक नहीं है l लेकिन जावेद अख़्तर को इग्नोर नहीं किया जा सकता l इसकी कई वजहें हैं जिनका उल्लेख प्रासंगिक होगा l हम जावेद अख़्तर को एक शायर और फ़िल्म के स्क्रिप्ट राइटर, संवाद लेखक और गीतकार के रूप मे जानते हैं जहाँ से उन्हें आठ फिल्मेफयर, पांच राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं l इनकी उर्दू शायरी का संकलन ‘तरकश’ के उर्दू मे सात और हिंदी मे ग्यारह संस्करण छपे हैं जो संभवतः पिछले 65 साल मे शायरी की सबसे ज़्यादा बेचीं गई पुस्तक है lलेकिन इतनी जानकारी काफ़ी नहीं हैं l सार्वजनिक जीवन मे पद्मश्री, पद्मभूषण और इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार के अलावा इनको विभिन्न राज्यों के कई पुरस्कार मिले हैं l जावेद अख़्तर कई बुद्धजीवी और धर्म निरपेक्ष संगठनों से जुड़े हैं l हावर्ड, कैलिफोर्निया, कोलम्बिया, बर्कले, मेरीलैंड, लंदन, कैंब्रिज, ऑक्सफ़ोर्ड और देश के लगभग सभी बड़े विश्वविद्यालयों के अलावा कई संस्थाओं मे इनके द्वारा दिये गए भाषण इनके परिष्कृत बौद्धिक स्तर के परिचायक हैं l जावेद अख़्तर अनीश्वरवादी हैं ( सन्दर्भ : डॉ रणजीत -‘भारत के प्रख्यात नास्तिक’) और आडम्बरों के खिलाफ़ हैं l

जावेद अख़्तर के पिता जां निसार अख़्तर (1914-1976 ) प्रोग्रेसिव राइटर्स मूवमेंट के शायर और फ़िल्म गीतकार थे l माँ सफ़िया अख़्तर जो रुदौली की थीं उन्हें लखनऊ के मअरूफ शायर असरारुल हक़ ‘मजाज़’ की बहन के रूप मे ही अक्सर लोग जानते हैं जबकि वो ख़ुद एक बेहतरीन राइटर के साथ साथ एक टीचर भी थीं l जां निसार अख़्तर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पढ़े थे l फिल्मों मे ज़्यादातर गाने OPN ( ओ पी नैय्यर ) के साथ और कुछ मोहम्मद ज़हूर ‘ख़य्याम’ के साथ हैँ l एक बानगी पेश है –

1. मुझपे इलज़ामे. बेवफ़ाई है ( फ़िल्म यासमीन,1955, संगीत कार सी रामचंद्र )

2. पिया पिया पिया मोरा जिया पुकारे (बाप रे बाप,1955, OPN)

3. ग़रीब जानके हमको न तुम मिटा देना ( छू मंतर,1956, OPN )

4. आँखों ही आँखों मे इशारा हो गया ( CID, 1956, OPN )

5. चना ज़ोर गरम बाबू ( नया अंदाज़,1956, OPN) असली वाला चना ज़ोर गरम यही है l

6. छोटा सा बलमा ( माई बाप,1957, OPN )

7. मै तुम्हीं से पूछती हूँ, मुझे तुमसे प्यार क्यों है ( ब्लैक कैट,1959, एन दत्ता )

8. बेबसी हद से जब गुज़र जाए ( कल्पना, 1960, OPN )

9. आ जा रे, नूरी नूरी ( नूरी,1979, ख़य्याम )

10. ऐ दिले नादाँ ( रज़िया सुलतान,1983, ख़य्याम )

जां निसार अख़्तर के पिता इफ़्तेख़ार हुसैन उर्फ़ मुज़तर ख़ैराबादी (1865-1927) थे l ख़ैराबाद उत्तर प्रदेश के सीतापुर ज़िले मे स्थित है l मुज़तर ख़ैराबादी एक फायरब्रांड स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, उच्च कोटि के वाग्विशेष और शायर थे l मशहूर ग़ज़ल ‘ न किसी की आँख का नूर हूँ, न किसी के दिल का क़रार हूँ ‘ जिसे फ़िल्म ‘लाल क़िला ‘ मे एस एन त्रिपाठी के संगीत निर्देशन मे मुहम्मद रफ़ी ने गाया है और जिसे 1974 मे श्रीलंका मे आयोजित टैलेंट हंट प्रतियोगिता मे गाकर पाकिस्तान के मशहूर ग़ज़ल गायक हबीब वली मोहम्मद ने विश्व प्रसिद्धि पाई, मुज़तर ख़ैराबादी की लिखी हुई है l बहुत लोग समझते थे कि ये ग़ज़ल बहादुर शाह ‘ज़फर’ की रचना है l ग़ज़ल इस तरह है

-न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ l

जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ ll

न दवा-ए-दर्द-ए-जिगर हूँ मैं न किसी की मीठी नज़र हूँ मैं l

न इधर हूँ मैं न उधर हूँ मैं न शकेब हूँ न क़रार हूँ ll

मिरा वक़्त मुझ से बिछड़ गया मिरा रंग-रूप बिगड़ गया l

जो ख़िज़ाँ से बाग़ उजड़ गया मैं उसी की फ़स्ल-ए-बहार हूँ ll

पए फ़ातिहा कोई आए क्यूँ कोई चार फूल चढ़ाए क्यूँ l

कोई आ के शम्अ’ जलाए क्यूँ मैं वो बेकसी का मज़ार हूँ ll

न मैं लाग हूँ न लगाव हूँ न सुहाग हूँ न सुभाव हूँ l

जो बिगड़ गया वो बनाव हूँ जो नहीं रहा वो सिंगार हूँ ll

मैं नहीं हूँ नग़्मा-ए-जाँ-फ़ज़ा मुझे सुन के कोई करेगा क्या l

मैं बड़े बिरोग की हूँ सदा किसी दिलजले की पुकार हूँ ll

न मैं ‘मुज़्तर’ उन का हबीब हूँ न मैं ‘मुज़्तर’ उन का रक़ीब हूँ l

जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ जो उजड़ गया वो दयार हूँ ll

मुज़तर ख़ैराबादी के भाई बिस्मिल ख़ैराबादी भी शायर थे lमुज़तर ख़ैराबादी के पिता अल्लामा शेख अब्दुल हक़ ख़ैराबादी(1828-1899) बुद्धिवादी विचारधारा के स्कॉलर थे l इन्हें ‘शमसुल उलमा’ का ख़िताब हासिल था l इनके शिष्य माजिद अली जौनपुरी हदीस, तर्कशास्त्र और दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान थे l अल्लामा अंग्रेजों के कट्टर दुश्मन थे lआपने वसीयत की थी कि जब अंग्रेज़ हिंदुस्तान से चले जाएँ तो मेरी क़ब्र पर ख़बर कर दी जाए l चुनाँचा, अल्लामा के इंतेक़ाल के तक़रीबन 50 साल बाद 28 रमज़ान, 15 अगस्त 1947 को मौलवी सय्यद नजमुल हसन रज़वी ख़ैराबादी आपकी मज़ार पर हाज़िर हुए, मीलाद के बाद ख़बर सुनाकर वसीयत पूरी की lअब आते हैं उस ख़ास शख्सियत पर जिसके पेशे नज़र ये आलेख तैयार किया गया है l

मौलाना अब्दुल हक़ ख़ैराबादी के पिता *अल्लामा फज़ले हक़ ख़ैराबादी* ( 1796 – 1861 ) प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 के क्रान्तिकारी, तर्कशास्त्र, दर्शन, उर्दू अरबी, फारसी के विद्वान, सूफ़ी और शायर थे। आपके पिता अल्लामा फज़ले इमाम, सदर उस-सुदूर, मुग़ल दरबार मे धार्मिक मामलों के प्रमुख परामर्श दाता थे lआपकी याददाश्त इतनी अच्छी थी कि मात्र चार महीने मे क़ुरान को हिफ़्ज़ कर लिया था l तेरह वर्ष की उम्र मे ही अरबी, फ़ारसी, धर्मशास्त्र मे पारंगत होकर शिक्षक हो गए थे l बाद मे दारुल क़ज़ा के मुफ़्ती हुए l अल्लामा किस दर्जे के शायर थे इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मिर्ज़ा ग़ालिब की प्रार्थना पर अल्लामा ने उनके दीवान का संपादन किया था l यही कारण है कि जहाँ मीर के दीवान मे तमाम सबस्टैण्डर्ड शेर भी यत्र तत्र पाए जाते हैं, ग़ालिब का दीवान एकदम कम्पैक्ट है l

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम मे 26 जून,1857 को जब बरेली से बख़्त खाँ 14000 सिपाहियों के साथ दिल्ली पहुंच गए तो जुमे के ख़िताब मे अल्लामा ने उलमा और स्कॉलर से भरी असेंबली को सम्बोधित करते हुए अंग्रेज़ों के विरुद्ध जिहाद का फतवा जारी किया l इस फ़तवे को दिल्ली, रामपुर, बदायूं आदि के अन्य छः क़ाज़ीओं ने भी अनुमोदित किया lअल्लामा फज़ले हक़ ख़ैराबादी के इस फ़तवे से आम जनता बगावत पर उतर आई l कुछ तो सिर्फ़ लाठी डंडे के साथ अंग्रेज़ों के खिलाफ़ मरने-मारने को तैयार हो गए l अंग्रेज़ों को इस तरह के मास मूवमेंट का अंदाज़ा नहीं था l अंग्रेज़ों ने अल्लामा का शुमार इस स्वतंत्रता संग्राम के मास्टर माइंड लोगों मे किया l ट्रायल के समय अल्लामा को ‘मेजर फ़ोर्स बिहाइंड द मुटिनी ‘ के रूप मे प्रस्तुत किया गया l अल्लामा ने अपने बचाव मे ख़ुद अपनी बहस की जो इतनी तार्किक थी कि वे निर्दोष सिद्ध हो रहे थे l किन्तु फ़तवे के प्रश्न पर मौलाना ने जब स्वीकार कर लिया कि उन्होंने जारी किया था तो उन्हें आजीवन कालापानी की सज़ा देकर अंडमान द्वीप भेज दिया गया जहाँ बाइस महीने बाद 1861 मे उनका देहांत हो गया lअल्लामा फज़ले हक़ ख़ैराबादी की लिखी किताबों मे ‘अल- सूरतुल हिंदिया’ मे 1857 की क्रांति पर आलोचनात्मक विश्लेषण किया गया है जो इस विषय पर पहली किताब है l अल्लामा नें ‘तहक़ीक़ुल फ़तवा फ़ी इबताल अल – तुग़वा’ नामक एक. अन्य महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी जिसमे शाह इस्माइल देहलवी की ‘तक़वीयतुल ईमान’ का खंडन है l

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