जातिप्रथा का दंष और इसका समाधान !

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भारत सहित पुरे विश्व में धर्म का आविष्कार मानव के हाथों मानव के शोषण के लिए हुआ है. विश्व के लगभग सभी विकसित देशों में लोगों ने धर्म की इस कड़वी सचाई को समझा और स्वतंत्र धर्म को मानवता के लिए घातक मान कर धर्म को क़ानून द्वारा परिभाषित करके एक सीमित क्षेत्र में बाँध कर दिया है और लोग धर्म को छोड़ कर मानव-विकास के लिए कार्य कर रहे है. लेकिन यह भी कुछ सीमा तक ही !! आज भी विचारधारा की जंग अपनी पराकाष्ठा पर है । इंसान ही इंसानियत का गला काट रहा है !!

भारत में आज भी धर्म की स्थिति कानून से ऊपर मानी जाती है. जिसके लिए प्रत्यक्ष रूप से धर्माधिकारी और धर्म के रक्षक जिमेवार है. आज भी भारत के लोग धर्म को लेकर दूसरी सदी के आदिवासियों की तरह आपस में लड़ते झगडते रहते है. यही वो मुख्य कारण है जो भारत के विकास में बाधक है. भारत में धर्म का मुख्य आधार जाति प्रथा है. जो वर्ण और श्रम पर आधारित बताई जाती है लेकिन सचाई कुछ और ही है. भारत में आज भी ब्राह्मण के घर ब्राह्मण, क्षत्रिय के घर क्षत्रिय, वैश्य के घर वैश्य और शूद्रों के घर पैदा होने वाला शुद्र कहलाता है. भारत के समाज में उपरोक्त चार ही वर्ण होते तो भी शायद बात न्याय संगत होती, लेकिन यहाँ स्थिति और भी विकट है. ब्राह्मण सिर्फ ब्राह्मण है, क्षत्रिय सिर्फ क्षत्रिय है, वैश्य भी हर हाल में वैश्य है लेकिन शूद्रों को यहाँ 6743 जातियों में बाँट दिया गया है. अर्थात शूद्रों के घर में जो भी बालक या बालिका उत्पन होते है वह जन्म से ही 6743 जातियों का हिस्सा बन जाते है.
caste system and its solutionउपरोक्त सभी बातों से यह साबित हो जाता है कि भारत में जातिप्रथा श्रम या वर्ण पर नहीं जन्म पर आधारित है.भारत में अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि जातिप्रथा श्रम पर आधारित है यहाँ तक महात्मा गाँधी ने भी इस बात को हरिजन पत्रिका में कहा था. इस के जबाब में बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर ने महात्मा गाँधी को बहुत ही खूबसूरत शब्दों में जबाबी पत्र में लिखा था“क्या आदमी को अपना पैतृक पेशा ही अपनाना चाहिए, वह अनैतिक पेशा ही क्यों ना हो? यदि प्रत्येक को अपना पैतृक पेशा ही जारी रखना पड़ेगा । पड़े तो इसका अर्थ होगा कि किसी आदमी को दलाल का पेशा इसलिए जारी रखना पड़ेगा, क्योकि उसके दादा दलाल थे और किसी औरत को इसलिए वैश्या का पेशा अपनाना पड़ेगा, क्योकि उसकी दादी वैश्या थी.”।

बाबा साहब ने यह उत्तर बहुत सोच समझ कर महात्मा गांधी और नेहरूके जीवन और उनके पूर्वजों को सामने रख कर दिया था. इस उत्तर से महात्मा गाँधी और नेहरूके पुरे जीवन और उनके पूर्वजों के बारे पता चलता है. अत: भारत में जाति प्रथा किसी भी प्रकार से श्रम विभाजन पर आधारित नहीं है। जातिप्रथा धर्म के नाम पर मानव के द्वारा मानव के ऊपर जबरदस्ती थोपा गया क़ानून है.मेरा मानना है कि “हिन्दू कोई धर्म नहीं, वास्तविकता में रुढ़ीवादी कानूनों का एक पुलिन्दा है, जो कल आज और कल के लिए समान रुप से लागू होता है.” । हिंदू का हर धर्म शास्त्र अपने आप में क़ानून है. ऐसा कानून जिसका पालन हर हिंदू के लिए करना जरुरी है फिर चाहे वो जातिप्रथा के किसी भी स्तर पर क्यों ना हो। मेरा मानना है कि हिंदू रहते हुए आप कभी भी वेदों, पुराणों, मनुस्मृति आदि के क़ानून पर आधारित इस जातिप्रथा की गुलामी से बाहर नहीं निकल सकते.।

भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों में मूलत: दो जाति के लोग रहते है पहले मूलनिवासी; जिनमें अनुसूचित जाति, अनुसुचित जनजाति, दूसरे पिछड़े वर्ग, धर्मान्तरित अल्पसंख्यक । आदिवासी और भारत की समस्त नारियाँ आती है. विज्ञान की भाषा में इन लोगों को अफ्रीकन इंडियन कहते है. इस जाति के लोग भारत के बहुसंख्यक है. दूसरी जाति में ईसा से लगभग 3000 साल पहले यूरेशिया से भारत में समुद्र के रास्ते आये लोग है इनमें ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य नामक जाति के लोग आते है। .इन लोगों को विज्ञान की भाषा में यूरेशियन कहा जाता है
लेकिन यह लोग अपने साथ अपनी स्त्रियों को लेकर नहीं आये थे. यही मुख्य कारण है किब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों के घरों की स्त्रियों को धर्म शास्त्रों के अनुसार शुद्र ही कहा जाता है. यह लोग अपने आपको आर्य भी कहते है. यही यूरेशियन वो लोग है जिन्होंने धोखे से या चालाकी से भारत के मूलनिवासियों को नीच शुद्र घोषित किया हुआ है. अर्थात अपने आपको शिक्षा, युद्ध या राज करने और व्यापार के आधार पर बांटा है तथा मूलनिवासियों को शुद्र अर्थात सेवक बनाया हुआ है. यही वो लोग भी है जो धर्म के नाम पर मूलनिवासियों का शोषण करते है. उपरोक्त दोनों जातिओं पर आज तक बहुत से वैज्ञानिक शोध हो चुके है जिनमें माइकल बामशाद और राजीव दीक्षित के डी एन ए शोध प्रमुख है. इन दोनों बुद्धिजीवियों ने डी एन ए के आधार पर युरेशियनों को विदेशी और बाकी सभी जातियों और भारत की नारी को मूलनिवासी घोषित किया है.।

कोई भी मूलनिवासी जाति (SC, ST, OBC , ) का सदस्य अगर चाहे तो भी वह हिंदू धर्म का हिस्सा बने रहने तक जातिप्रथा की गुलामी से नहीं बच सकता. मूलनिवासी तब तक यूरेशियन आर्यों का गुलाम ही रहेगा, जब तक वह हिंदू धर्म अर्थात युरेशियनों के धर्म को अपनाये हुए है. इस प्रकार मूलनिवासी किसी भी हाल में ब्राह्मणवाद से मुक्त नहीं हो सकता. यह सिर्फ हिंदुओं की बात नहीं है, मुस्लिम और ईसाई भी मूलनिवासियों को हेय दृष्टि से देखते है. क्योकि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हर मूलनिवासी को नीच या शुद्र मनाता है. यह बात सही भी है, मूलनिवासी जातियों के लगभग सभी लोग अपनी रोजाना की जिंदगी में इन जाति प्रथा पर आधारित उंच नीच और शोषण की समस्याका सामना करते है. आज के समाचार पत्र हर रोज मूलनिवासियों पर यूरेशियन आर्यों के अत्याचारों के समाचारों से भरे रहते है. आज भी मूलनिवासियों को धार्मिक स्थानों में जाने की,ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के साथ खाने-पीनेकी, सार्वजनिक जलाशयों या जल स्त्रोतों से पानी लेने की, विवाह-शादियों में दुल्हे को घोड़े पर ले जाने की, ब्राह्मणों, क्षत्रियों या वैश्यों के साथ रोटी-बेटी का रिश्ता बनाने की इजाज़त नहीं है.।
मूलनिवासियों की माँ-बेटी की इज्ज़त आज भी सुरक्षित नहीं है. मूलनिवासियों की बेटियों को मंदिरों में देवदासी तक बनाया जाता है,मूलनिवासियों की हालत तो इतनी बुरी है कि एक ही वर्ण अर्थात शुद्र वर्ण का होने पर भी एक मूलनिवासी अपनी जाति से बाहर दूसरी मूलनिवासी जाति में शादी-ब्याह का रिश्ता तक स्थापित नहीं कर सकता.

भारत में नारियों की स्थिति तो इस से भी गई गुजरी है. आये दिन बलात्कार होना, लडकियों को बेच देना, लडकी को वस्तु समझ कर दान कर देना, सार्वजनिक स्थानों पर छेड़-छाड, स्कूलों और कॉलेजों में शारीरिक और मानसिक शोषण, कार्यस्थलों में नारी शोषण आदि जैसी घटनाएँ हर दिनलाखों के हिसाब से होती है. एक संस्था की रिपोर्ट के मुताबिक देश में हर छ: सेकिंड में नारी शोषण की एक घटना होती है इन सभी घटनाओं के पीछे भी जाति प्रथा मुख्य कारण है और दूसरा सबसे बड़ा कारण भारत की नारी का मूलनिवासी होना है, यही वह कारण है जिसके चलते ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और मूलनिवासियों की नारी पर समान रूप से अत्याचार होते है.

कोई मूलनिवासी जाति प्रथा से बाहर कुछ करता है या जाति प्रथा को तोडना चाहता है तो उसके लिए हिंदू धर्म में मनुस्मृति जैसे दंड विधानों का प्रावधान किया गया है जो आज भी सामाजिक मान्यताओं के रूप में देश के हर कोने में प्रचलित है और लोग परम्पराओं या मान्यताओं के रूप में उन शास्त्रोक्त कानूनों का पालन करते है. अत: जो कोई जाति प्रथा के खिलाफ जायेगा तो उसको सामाजिक दंड का सामना करना पड़ सकता है, जिसमें समाज या जाति से बहिष्कृत तक कर दिया जाता है. इन सभी प्रकार की ज्यादतियों और शोषण के लिए ब्राह्मणों द्वारा जनित जाति व्यवस्था ही हर प्रकार से जिमेवार है. क्योकि हिंदू धर्म के शास्त्रों के अनुसार जातियों का मिश्रण होने से बचाए रखने की परम्परा है. अगर एक जाति के लोग दूसरी जाति में शादी करना शुरू कर दे तो जातिप्रथा खत्म हो जायेगी. जातिप्रथा खत्म हो गई तो ब्राह्मणों की सर्वोपरिता खत्म हो जायेगी.। कोई भी हिंदू धर्म का अनुयायी उपरोक्त नियमों को धर्म शास्त्रों के कानूनों और धर्म खोने के डर से नहीं तोडता, इसलिए जातिप्रथा हजारों सालों से जैसी थी वैसी ही बनी हुई है. उपरोक्त सभी बातों से यह बात सामने आती है कि हिंदू धर्म जातिप्रथा नाम कीगुलामी प्रथा पर आधारित है. जहाँ ब्राह्मण शीर्ष पर है वो सभी दूसरे वर्णों पर धर्म के नाम पर राज करता है और दूसरे सभी लोगों का शोषण करता है.इस प्रकार जो भी आदमी हिंदू धर्म का हिस्सा है वह हर प्रकार से गुलाम है.

अत: मूलनिवासी समुदाय (SC, ST, OBC) के लोगों के सामने इस गुलामी से निकलने का एक ही तरीका है “धर्मान्तरण”. जिसका अर्थ “नया जीवन” है जहाँ कोई गुलामी, छुआ छूत या भेद भाव ना हो. लोग समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय के शासन के अंतर्गत समान रूप से शासित हो. धर्मान्तरण का सबसे सकारात्मक पहलू है कि हिंदू धर्म छोड़ने के बाद कोई भी दूसरे धर्म को मानने वाला मूलनिवासी से घृणा नहीं करता और ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य भी दूसरा धर्म अपनाने पर भेद-भाव नहीं करते. धर्मान्तरित आदमी सभी के लिए बराबर हो जाता है, जैसे मुस्लिम, सिख, ईसाई या किसी और धर्म के आदमी के साथ ब्राह्मण व्यापार करता है, काम करता है या नौकरी करता है तो कोई हिन् भावना इनके बीच नहीं होती. यही बात सभी धर्मों के लोगों पर लागू होती है साथ काम करते हुए भी हिंदू धर्म का ब्राह्मण मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, सिख आदि धर्मों के लोगों से कोई भेद भाव नहीं करता. इस प्रकार धर्मान्तरण करने पर मूलनिवासी एक प्रकार से जाति प्रथा की गुलामी और भेदभाव से मुक्त हो जाता है.।
धर्मान्तरण करके मूलनिवासी कौन से धर्म को अपनाये यह भी एक गंभीर समस्या है. आज भारत का हर धर्म अपने आप में वर्गीकृत है. कोई समुदाय के नाम से वर्गीकृत है कोई जाति के नाम से वर्गीकृत है तो कोई धर्म अपने ही लोगों को हीन दृष्टि से देखता है. कुछ धर्म ऐसे है जो दूसरे धर्म से आने वाले लोगों को एक अलग श्रेणी में रखते है. इन सभी समस्याओं के चलते कोई भी मूलनिवासी धर्मान्तरण नहीं कर पाता. क़ानून अपने आप में एक समस्या है अगर कोई मूलनिवासी धर्म को छोड़ कर दूसरे धर्म में जाना भी चाहता है तो उससे तरह तरह के सवाल किये जाते है. एक तरह से उस मूलनिवासी को कानून के नाम पर उत्पीड़ित किया जाता है. अगर वह मूलनिवासी धर्म बदल नहीं सका तो उसको समाज में हेय दृष्टि से देखा जाने लगता है. उसके अपने ही समाज और जाति के लोग उस से घृणा करने लग जाते है. इस प्रकार की सभी घटनाओं के लिए भी यूरेशियन ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ही पूरी तरह जिम्मेवार है. देश के हर सरकारी तंत्र पर इनका कब्ज़ा है. आप जिस मर्जी सरकारी संस्थाके कार्यालय में जाओ आपको कार्यलय का मुख्य अधिकारी ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य ही मिलेगा और वो लोग जानबूझ कर मूलनिवासियों को नीचा दिखाते है. मूलनिवासियों के हालात तो इस कदर बुरे है कि उनको सरकारी कार्यालयों में कोई काम भी करवाना हो तो हज़ार तरह की शर्मिन्दगियाँ उठानी पड़ती है. संविधान में विशेष अधिकारों और क़ानून के तहत बिशेष अधिकारों का प्रावधान होने पर भी मूलनिवासियों को प्रताड़ित और उत्पीड़ित किया जाता है.इस प्रकार अगर कोई मूलनिवासी चाहे भी तो भी जाति प्रथा की गुलामी से मुक्त नहीं हो सकता. अब इस समस्या से मुक्त कैसे हुआ जाये?

इस समस्या से मुक्ति का मार्ग भारतीय संविधान और कानून में ही है. सबसे पहली बात कि मूलनिवासियों का शोषण क्यों होता है? भारतीय कानून और सामाजिक व्यवस्थाका अध्ययन करने से पता चलता है कि मूलनिवासी लोगों के शोषण का मुख्य कारण क़ानून के बारे पर्याप्त जानकारी ना होना ही है. देश की शैक्षणिक संस्थाओं में क़ानून के स्थान पर धार्मिक पुस्तकों को पढाया जाता है. जोकि मूलनिवासियों में फैले अन्धविश्वास और धर्म के प्रति आस्था के साथ साथ डर के लिए भी पूरी तरह से जिमेवार है. देश में महाराष्ट्र सरकार के द्वारा अन्धविश्वास निरोधी क़ानून पारित करने और उच्चतम न्यायलय द्वारा अन्धविश्वास के विरोध में हजारों आदेश देने के बाद भी देश के लगभग सभी राज्यों में धार्मिक पुस्तकों को शिक्षा के पाठ्यक्रममें शामिल किया गया है. रामायण, महाभारत जैसे काल्पनिक धर्म ग्रंथों के विरोध में उच्चतम न्यायलय कई बार आदेश दे चुका है लेकिन फिर भी देश के यूरेशियन शासक अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य बेशर्मों की तरह देश के स्कुल्लों और कॉलेजों में रामायण और महाभारत जैसे धर्म शास्त्रों को पढ़ा रहे है. अर्थात भारत में क़ानून की सही जानकारी ना होने के कारण मूलनिवासी अपने बच्चों को इन दकियानुसी किताबों को पढ़ने देते है. जबकि देश की केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकारों और उच्चतम न्यायलय को चाहिए कि वो इन दकियानुसी किताबों को पाठ्यक्रम से बाहर करके क़ानून को पढाने के सिफारिश करे. जिस से हर आदमी जागृत हो और अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों के प्रति भी सजग हो.

भारत के संविधान के अंतर्गत अगर **धारा 25 **का अध्ययन करे तो पता चलता है कि क़ानून ही एक मात्र वह उपाय है जो मूलनिवासियों को जातिप्रथा की गुलामी से आज़ादी दिला सकता है. इस धारा के मुताबिक कोई भी देश का आदमी या औरत किसी भी धर्म या संप्रदाय को मानने या ना मानने के लिए स्वतंत्र है. कोई भी आदमी उसको किसी भी धर्म को मानने के लिए बाध्य नहीं कर सकता. यही एक ऐसा उपाय है जो मूलनिवासी को जाति और धर्म नाम की गुलामी से हमेशा के लिए आज़ाद कर सकता है.उसके लिए मूलनिवासियों में दृढ इच्छा शक्ति का होना जरुरी है. इस प्रकार की आज़ादी की बहुत से मूलनिवासी अपने स्तर पर शुरुआत कर चुके है. लेकिन आरक्षण के लालच में फंसे मूलनिवासी आज भी इस प्रकार आज़ाद होने को तैयार नहीं है. मूलनिवासी यह नहीं समझ रहे कि आरक्षण आज एक ऐसी हड्डी बन चुकी है जो मूलनिवासियों को जातिप्रथा की दलदल में डुबो के रखने के सिवा कोई दूसरा काम नहीं कर रही है. केन्द्र सरकार से सुचना के अधिकार के अंतर्गत प्राप्त सूचना के आधार पर देश की 92% सरकारी नौकरियों पर ब्राह्मणों का कब्ज़ा है. अर्थात आरक्षण होते हुए भी मूलनिवासियों के पास आज कुछ भी नहीं है. आरक्षण का फायदा उस स्थिति में सही तरीके से होता जब शासन करने वाले अर्थात ब्राह्मण चाहता कि किसी और वर्ण को भी सरकारी नौकरियां मिले.। वास्तविकता तो यह है की संविधान कितना भी अच्छा क्यों ना हो, अगर सरकार उस संविधान को समाज में सही रूप से लागू ना करे तो अच्छा संविधान भी देश के नागरिकों के लिए बुरा बन सकता है। .
यहाँ बहुत से मूलनिवासी तर्क देंगे कि अगर हमने धर्म परिवर्तित कर दिया तो हमें आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा.मूलनिवासी लोगों को जब उनके भले की बात बताई जाती है और खास कर भले की बात बताने वाला कोई उनमें से ही हो तो उनके मन में सबसे पहले विरोधी विचार ही आते है. जैसे ऐसा क्यों? ऐसा कैसे? इस से क्या होगा? आदि. जबकि इसके विपरीत जब कोई ब्राह्मण या तथाकथित उच्च जाति का कोई आदमी उनको कोई भी बात बिना किसी प्रमाण के बोलता है या बताता है तो उनके मन में कोई भी प्रशन नहीं आता. आखिर ऐसा होता क्यों है ? इसका सीधा सा उत्तर है मूलनिवासियों का मानसिक रूप से गुलाम होना. मूलनिवासी आत्मसमर्पण किये बैठे है और यह धारणा उनके मन में घर कर चुकी है कि ब्राह्मण श्रेष्ट है और देवता का अवतार है. यही वो मूल कारण है जिसके कारण मूलनिवासी कभी भी ब्राह्मणों से तार्किक प्रश्न नहीं करते. इसके विपरीत मूलनिवासी तो उन में से ही एक है तो उसकी बात का बिना सोचे समझे विरोध करना शुरू कर देते है. यहाँ बात हो रही है आरक्षण की. तो आपको बताना जरुरी समझूंगा कि पिछले 67 सालों में भी आपको सही रूप से आरक्षण का कोई फायदा नहीं हुआ है. आप लोग आज भी जिस आरक्षण की आस में जाति प्रथा कायम किये हुए हो उसका सीधा फायदा ब्राह्मण ही उठा रहा है.।

उपरोक्त सभी बातों से साफ़ हो जाता है कि आज आरक्षण मूलनिवासियों के उत्थान के लिए नहीं, जाति व्यवस्था को बनाये रखने के लिए प्रयोग हो रहा है. मूलनिवासी आरक्षण के लालच में जातिप्रथा को कायम किये हुए है और ब्राह्मण इसका फायदा मूलनिवासियों को दबाये रखने के लिए कर रहा है. अब सवाल खड़ा होता है कि आज मूलनिवासियों को क्या करना चाहिए? तो मेरा सुझाव है; जो व्यवस्था हमारे समाज के लिए गुलामी को बनाये रखने के लिए ब्राह्मण का सहयोग कर रही है उस व्यवस्था को धीरे धीरे जरुरतमंदों के लिए छोड़ कर त्याग कर देना चाहिए. हमारे समाज के बहुत से लोग धीरे धीरे साधन सम्पन हो रहे है वो अच्छा कमाते है अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला सकते है या जो लोग सरकारी नौकरियों में है उन लोगों को चाहिए कि संविधान का पालन करते हुए अपनी जाति और धर्म को लिखना बंद कर देना चाहिए ताकि आरक्षण का लाभ एक गरीब और जरुरतमंद मूलनिवासी को मिल सके. इस प्रकार की व्यवस्था से हमारे समाज के लोगों को दो फायदे होंगे. पहला; जाति प्रथा खत्म हो जायेगी. दूसरा शोषित और दबे कुचले मूलनिवासियों को भी उत्थान का अवसर मिलेगा. इसलिए साधन सम्पन मूलनिवासियों को चाहिए कि समय के साथ जाट प्रथा को समाप्त करने का प्रयास करे.
उपरोक्त सभी बातों पर विचार करने से पता चलता है कि आरक्षण एक सुखी हुई हड्डी बन चुका है, हिंदू धर्म में रहते हुए मूलनिवासी समाज कभी उन्नति नहीं कर सकता. मूलनिवासियों के सभी प्रकार के शोषण के लिए ब्राह्मण धर्म और स्वयं ब्राह्मण पूरी तरह जिम्मेवार है.ब्राह्मणों के स जातिप्रथा नाम के षड्यंत्र से बचने के हमारे पास सिर्फ दो ही उपाय है. पहला; धर्मान्तरण और दूसरा; संवेधानिक कानून. इन दो उपायों के सिवा कोई भी ऐसा उपाय नहीं है जो कारगर तरीके से देश से जातिप्रथा का उल्मुलन कर सके. जहाँ तक शिक्षा की बात है तो भारत में शिक्षा तकनीकी पर नहीं धर्म पर आधारित है. जब तक भारत में तकनीकी पर आधारित शिक्षा पद्धति की शुरुआत नहीं की जाती तब तक शिक्षा के माध्यम से जातिप्रथा को समाप्त करना एक स्वपन से ज्यादा कुछ नहीं है. महापुरुषों के विचार अपने समय और उस काल के परिवेश के अनुसार सही हो सकते है. लेकिन आज के समय और परिवेश को देखते हुए शिक्षा को देखते हुए यह कहना उचित नहीं है कि आप शिक्षा के माध्यम से जातिप्रथा से मुक्त हो सकते है. आप अपने पास के विद्यालयों में जा कर देखे. किताबी ज्ञान के बजाये धरातल पर जो हो रहा है उसका अध्ययन करे तो आपको समझ आएगा कि मेरा यह तर्क अन्यथा नहीं है. आज स्कूलों और कौलेजों में धर्म की शिक्षा का बोलबाला है दूसरा मूलनिवासी समाज के बच्चों के साथ तिरस्कार पूर्ण भेदभाव आज भी जारी है जिसके कारण मूलनिवासी समाज के बच्चे सही शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते. जब शिक्षा का स्तर सही नहीं है और पढाने वाले धर्म के चाटुकार है जिनको धर्म के सिवाए कुछ नहीं दिखता तो ऐसी शिक्षा से मूलनिवासी समाज का भला कैसे हो सकता है? इसी कारण में पहले जातिप्रथा को समाप्त करने और फिर शिक्षा पर बल देने की बात कर रहा हूँ. जाति प्रथा जब तक समाज में कायम रहेगी तब तक देश के मूलनिवासियों और उनकी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य अन्धकारमय ही है.

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27 thoughts on “जातिप्रथा का दंष और इसका समाधान !

  • January 23, 2015 at 10:34 am
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    ‘Arya invasion’ thoery which seems to the root this article is already denounced by the latest research on DNA of Indian. It is found that DNA of all the Indian, irrespective to their cast, color and regions are same. Sample Data for Bamsad reasrach was 250 and when it was challenged by other academics. His co author, disassociated himself from the Finding. So result of this research are not credible.

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  • January 23, 2015 at 11:05 am
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    भाईसाहब आपके एक समस्या विशेष् पर इतनी विस्तृत विवेचना और आक्रन्दन के बाद आपके दो टूक समाधन के सत्यापन पर आपकी कलम कोई निर्णयामत्मक निष्कर्ष निकालने में असमर्थ रही । आप जातिप्रथा के सहारे मानव जिसमे की पुरुष और नारी दोनों के समानाधिकार और समान सन्मान की चिंता को बड़े ही मानवाहितकारी एंगल से एक धर्म विशेष् की बेड़ियों से मुक्ति का रास्ता बता रहे हो और फिर से उसे धर्मान्तरण के रास्ते दूसरे धर्म के नियमो के पालन के लिए बाध्य हुवे बिना कोई चारा न होने का भी स्पष्ट संकेत दे रहे हो ! लेकिन ये भी सप्रमाण स्पष्ट नहीं कर रहे हो की वो कौन सा ऐसा धर्म है जो सभी मानव जिसमे पुरुष और नारी दोनों के समानाधिकार और समान सन्मान की गारंटी हो ?
    और हैरत होती है की आप मानवो को समान अधिकार और सन्मान के लिए एकतरफ तो धर्म परिवर्तन की शिफारिस कर रहे हैं और दूसरी तरफ संविधान की जरुरत पर भी जोर दे रहे हो ! क्यों ? बताइये वह कौन सा धर्म है जो नियमो का पुलिंदा नहीं ? फिर भी आपको संविधान चाहिए तो क्या आप खुद ही ये स्वीकार नहीं कर रहे की कोई भी धर्म बिना अलग से किसी संविधान के बिना समान मानव अधिकार और सन्मान के लिए अपर्याप्त है ?? या फिर कोई प्रमाण दीजिये की दुनिया में कहाँ ऐसा है की जहाँ केवल धर्म के आधार पर आपकी चिंता दूर हुई दिखाई देती है ! हाँ और साथ साथ आप अगर जरूरतमंदों को ही आरक्षण के लाभ के पक्षधर हैं तो यह भी बताकर मेहरबानी कर दीजिये की वह कौन सा धर्म है जिसमे परिवर्तन द्वारा प्रवेश पा लेने के बाद कोई भी व्यक्ति ऐसा जरूरतमंद नहीं रह जाता जिसे आरक्षण जैसे सहारे की दरकार न हो ! अगर ऐसा नहीं तो फिर क्या आप दुनिया के सभी धर्मो के जरूरतमंदों के लिए आरक्षण शुरू किये जाने की शिफारिश तो नहीं कर रहे ?
    इसीलिए आपकी विवेचना और चिंता से सहानुभूति रखते हुवे भी मेरा निवेदन होगा की किसी को रास्ता बताओ तो ऐसा मत बताओ की कोई उलटे पाँव लूटकर आपको लठ लेकर ढूंढता फिरे ! धन्यवाद !

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  • January 23, 2015 at 11:09 am
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    उपरोक्त कॉमेंट में …….उलटे पाँव लौटकर …….पढ़ें

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  • January 23, 2015 at 1:17 pm
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    सचिन परदेशी जी ! आप क्या सोचते हैं कि यदि कोइ आप को रास्ता बताये तो उसका ये भी अपने आप कर्तव्य बन जाता है कि वह अपने सवारी से आप के घर तक भी छोडे ! और आप को कुछ करना ही नही पडे ! फिर तो आप या हम या किसी का ऐसा भटकाव भी बहुत लज़ीज़ , स्वादिष्ट और सुखदायी होगा ! जिसने केवल रास्ता बताया किन्तु अपनी सवारी से घर तक नही पहुंचाया फिर वह अपने आप ही गुनहगार और दंडनिय हो गया ! संसार में जिस धर्म में भी जन्म के आधार पर मनुष्य इतना नीच माना जाये कि उसके साये से भी लोग दूर भागें , गावों से किनारे उसको रहने और नीच काम करने पर धर्म ही उसको मजबूर कर दे , कही ऐसा तो नही कि आप उसे स्वयं भी उसी धर्म का अनुयायी बने रहने पर मजबूर कर रहे हैं ! जो आप के लिये उचित होसकता है किन्तु सब के लिये कभी भी उचित नही हो सकता और यही कारण है कि दलित धीरे धीरे हिन्दू धर्मसे बुद्धधर्म की ओर प्लायन कर रहे हैं ! उनके लिये रास्ता बताने वाले का इशारा ही पर्याप्त है किसी के सवारी की आवशयक्ता नही ! धन्यवाद !

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    • January 23, 2015 at 8:12 pm
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      धर्मान्तरण करके मूलनिवासी कौन से धर्म को अपनाये यह भी एक गंभीर समस्या है. आज भारत का हर धर्म अपने आप में वर्गीकृत है. कोई समुदाय के नाम से वर्गीकृत है कोई जाति के नाम से वर्गीकृत है तो कोई धर्म अपने ही लोगों को हीन दृष्टि से देखता है. कुछ धर्म ऐसे है जो दूसरे धर्म से आने वाले लोगों को एक अलग श्रेणी में रखते है. इन सभी समस्याओं के चलते कोई भी मूलनिवासी धर्मान्तरण नहीं कर पाता.

      नुज़हत खान साहब लगता आपने ये नहीं पढ़ा ! जिसे लेखक समस्या से मुक्ति का मार्ग कह रहे हैं उसमे भी समस्या गिना रहे हैं ! क्या इसे रास्ता दिखाना कहते हैं ? सवारी को घर तक छोड़ने की तो छोड़िये कोई खुद जाना चाहे तो भी जा नहीं पायेगा ! लेकिन मुझे ख़ुशी है की ऐसी दुविधा लेखक महोदय संविधान के लिए नहीं दर्शा रहे हैं ! मतलब बिलकुल साफ़ है ! अगर आप समझ न पाये हो तो मुझे आपको अपने सवारी की सेवा देने में कोई हर्ज नहीं होगा !

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      • January 23, 2015 at 10:12 pm
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        …………..भटके लोगों को रास्ता बताया जाता है ॥ भटकते रहने वालों को नहीं ???

        Reply
    • January 23, 2015 at 9:50 pm
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      शुक्रिया नुजहत जी आपने सारे सवालों का जवाब भीगा भीगा कर दे दिया । मुझे कहने की अब जरूरत नही !!!!!!!!!!!!!!

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  • January 23, 2015 at 1:19 pm
    Permalink

    हर द्रुष्टिकोण से एक तार्किक और सराहनिय लेख के लिये लेखक को धन्यवाद !

    Reply
    • January 23, 2015 at 9:51 pm
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      शुक्रिया आपका मोहतरमा जी

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  • January 23, 2015 at 2:26 pm
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    मेरा जैसा व्यक्ति, जो किसी जात-पात को नही मानता, वेदो और स्मृतीयो पे उल्लेखित नस्ल वाद का आलोचक है, लेकिन उसी वक्त, इनमे लिखित “वसुधैव कुटुम्बकम” और “सर्वे भंतु सुखीं” जैसे विचारो को मार्ग दर्शक मानता है. जो एक ब्राह्मण घर मे जन्म लेके अपने साथ पढ़ने वाली कायस्थ लड़की से मनु स्मृति मे दिए श्लोको और कर्म कांडो से विवाह करता है.

    क्या वो हिंदू नही है? आपने लिखा की हिंदू धर्म को त्यागे बिना, जात-पात से मुक्ति नही, तो क्या मैं हिंदू नही रहा? तो अब मैं क्या हूँ?

    मेरा जैसा व्यक्ति, जो ईश्वर के एक और निराकार होने मे भरोसा रखता है, लेकिन बहुईश्वर और साकार ईश्वर की आस्था को पाप नही मानता, जिसके लिए ईश्वर है या नही, प्रश्न अप्रासंगिक है. जो एकेश्वरवाद मे विश्वास के साथ पैगंबरवाद को पाखंड मानता है, उसे क्या मुस्लिम कहा जा सकता है, जैसा मुझे मेरे किसी मुस्लिम दोस्त ने बताया की एक और निराकार ईश्वर मे आस्था ही इस्लाम है, तो क्या मैं मुसलमान हूँ?

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    • January 23, 2015 at 9:50 pm
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      जो मानने न मानने पर निर्भर हो वो ईश्वर कैसा ? वो धर्म भी कैसा ?
      इस मानने मनवाने के चक्कर से ही धर्म न सिर्फ बदनाम हुवा ,कालबाह्य भी होता जा रहा है !
      धन्यवाद ! अमितजी , वेदो और स्मृतीयो पे नस्लवाद उल्लेखित होने को तो आपने माना !

      Reply
    • January 23, 2015 at 9:53 pm
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      आप करोड़ो के प्रतिनिधि नहीं हो सकते न !!!!!!!!

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      • January 23, 2015 at 10:30 pm
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        हूँ ! तो आप किसी के मार्गदर्शक किस आधार पर हुवे ?

        दखिये अंसारी साहब , मैं मुद्दों की बहस में व्यक्तिगत आरोप का सहारा नहीं लेता, यहाँ भी मुझे लगा था की किसी मुद्देदार से पाला पड़ा है ! लेकिन आप मेरी किसी बात के जवाब में खुद ही निर्णायक होकर न सिर्फ व्यक्तिगत हो रहे हो बल्कि औरों को भी प्रोत्साहित कर रहे हो ! भाई सिर्फ तारीफ सुनने के आदि हो तो मुशायरे में जाइए ! यहाँ अगर मुद्दे से फिसले तो यही हश्र होगा !

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    • January 23, 2015 at 10:10 pm
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      आज हिन्दू की व्याख्या इस प्रकार से की जाती है की जो हिंदुस्तान में रहनेवाले है वह हिन्दू। यह व्याख्या पूरी तरह गलत से गलत और छूठी है। मूलनिवासी बहुजन यह हिन्दू नहीं है। हिंदुत्व थोपकर जनता को हिन्दू बनाया गया है। वैदिक धर्म में लिखा है की कोई भी जन्म से हिन्दू नहीं बन सकता। हिन्दू बनना है तो जनेउ (उपनयन) संस्कार करना पड़ता है। यह अधिकार धर्म शास्त्रों ने केवल ब्राह्मणों को दिया है, अब्राह्मनो को नहीं। फिर अब्राह्मण हिन्दू कैसे? अगर ब्राह्मण छोड़कर बाकि लोगो को जनेउ धारण करने का अधिकार नहीं है तो वो हिन्दू किस आधार पर अपने आप को कहते है? बाकि जनता को मुर्ख बनाया जा राहा है इसे हमें जल्द ही समझना चाहिए। धर्म की यह सरल बात समझनी चाहिए की इस देश का अब्राह्मण खुद को चाहे जितना भी हिन्दू कहता है, वह हिन्दू नहीं है। हिन्दू बनाने का अधिकार धर्मशास्त्रों ने केवल ब्राह्मणों को दिया है। यही सत्य है। बाकि बाते गुमराह, बेवकूफ़ बनाने और, इस्तेमाल करने के लिए की जाती है…………..

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      • January 23, 2015 at 10:33 pm
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        बहोत खूब ! इसीलिए तो कह रहा हूँ ! पहेलियाँ क्यूँ बुझा रहे हो ? पूछा तो, बताइए वह कौन सा धर्म है जो जिसकी बातें गुमराह, बेवकूफ़ बनाने और, इस्तेमाल करने के लिए नहीं की जाती !

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  • January 23, 2015 at 3:17 pm
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    किस शेीक्शा के बोर्द् मे गेीता रामयन् वेद मनु स्म्रिति आदि पधायि जतेी है क्या लेख्क् महोद्य बत्लायेन्गे !
    जब आप्के अनुसार सभेी धर्म शोशन कर्ते है तब धर्मान्तरन् कि बात क्यो ?
    साधु सन्यसि कोइ वर्ग बन सक्ता है !
    आम्बेद्कर जि और जग्जिवन राम जि कि पत्नि जन्म्जात् ब्रह्मन परिवार से थेी
    सन्त रविदास चर्म्कार होते हुये भि सन्त थे!
    अगर आप भि चहे तो ब्रह्मन् बन सक्त है और् विवाह आदि सन्स्कार् हिन्दु समज मे कर्व सक्क्ते है !
    करोदो हिन्दु मनुस्म्रिति भि नहि पध्ते है फिर उस्के अनुस्सार शोशन भि कैसे करेन्गे १
    मनुस्म्र्ति मे ब्रह्मन राजा अदि को कई गुनेी सजा का नियम बनाया गया है .
    क्या आप्ने कभेी पुरेी मनुस्म्रिति पधेी है ?
    अगर ब्रहाम्न आदेी युरेशिया से आये होते तो युरेशिय मे कई गुना जतिवाद होता
    दश्राथ भरत लक्शमन रावन मेघ्नाथ कुम्भ्कर्न सेीता जनक , जान्केी , कौशल्या मन्थरा , कैकेयेी , सुलोच्ना , सवित्रि सुर् दास्, मेीरा बाई, ध्रित्राश्त्र कुन्तेी दुर्योध्न युधिश्थेीर , कर्न् भेीम अर्जुन, बल राम्, बासुदेव् कन्स सुदामा यशोदा , क्रिश्न लक्श्मि बाई , आदेी ने कब जाति सुचक चिन्हो का उप्योग क़ीय़ा !

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    • January 23, 2015 at 8:44 pm
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      राज जी केवल जवाब के लिए जवाब देना ठीक नहीं ! ये सही है की हिन्दुओ में मदरसों की तरह धर्मग्रन्थ पढ़ाये नहीं जाते लेकिन रामायण और महाभारत को काव्य, साहित्य का दर्जा प्राप्त है !
      हाँ सभी धर्मो में समस्या होने का विरोधाभास लेखक के मार्गदर्शन की थ्योरी को स्वयम् खारिज करता है यहाँ मैं आपसे सहमत हूँ
      जन्म आधारित वर्णव्यवस्था में किसी को मनुस्मृति या वेद् पढने की जरुरत ही नहीं राखि गई थी और जब यह चरम पर थी तब एक ब्राह्मणों के अलावा और किसी के पढ़े जाने की गुंजाइश भी नहीं थी ! अब पढ़ पा रहे हैं तो उसपर लीपापोती करने की मज़बूरी ही ये साबित करती है की उसमे कुछ गलत है !
      नहीं राज जी आज भी जो चाहे वो ब्राह्मण नहीं बन सकता ! और बन भी गया तो माना नहीं जाता यही वस्तविकता है ! जब शिवाजी को क्षत्रिय न होने की वजह से राजा नहीं स्वीकारा गया तो किसी को ब्राह्मण माना जाना तो दूर की बात है ! वरत्मान में भी आप ब्राह्मिन हो कहते ही गोत्र पूछा जाएगा तब क्या जवाब दोगे ?
      और संतो की बात न ही की जाए तो अच्छा होगा क्यों की एक तो ब्राह्मणों में कोई संत नहीं बना और अन्य संतो को पहले नकारा ही गया है !
      ब्राह्मण से शादी के बाद बाबासाहब और बाबू जगजीवन राम को ब्राह्मण नहीं माना गया और न ही उनकी पत्नियों को क्षुद्र ! वो जो थे वही रहे और आज भी वही हैं ! आपका तर्क ही इसकी गवाही दे रहा है !
      और आपने जिनके नाम गिनाये उनसे जुडी कहानियों का आधार ही जाती रहा है ! जाती के बिना तो इनकी कहानियों का भी कोई वजुद नहीं बचेगा !

      आपकी बातों को काटने का ये मतलब कतई नहीं की किसी भी दूसरे धर्म को मैं ऐसी कमियां के दोष से बाइज्जत बरी कर रहा हूँ !

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      • January 23, 2015 at 9:57 pm
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        सचिन जी बहुत दम है आपकी बातों मे

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  • January 23, 2015 at 10:27 pm
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    मित्रों !!! ब्राह्मणों की जो व्यवस्था है उस व्यवस्था को मूलनिवासियों पर थोपने का जो कार्यक्रम है उस कार्यक्रम को मै ब्राह्मणीकरण मानता हूं। क्योंकि ब्राह्मण का जो धर्म है, ब्राह्मण कहते हैं कि वह धर्म है किन्तू हम कहते हैं कि वो एक षड्यंत्र है। ब्राह्मणों ने समाज नहीं बल्कि मूलनिवासियों को विभाजित करने का षड्यंत्र है। वे वर्ण व्यवस्था बनाकर हमें विभाजीत करते हैं फिर वर्ण व्यवस्था का विखंडन होकर जाति व्यवस्था बनती है। समाज चार टुकड़ों में विभाजित होने की बजाय चार हजार टुकड़ों में विभाजित हो जाता है और हमारे जितने टुकड़े होते है उतनी ही प्रभावशाली ढ़ंग से प्रतिकार करने की हमारी जो क्षमता है, वह कमजोर होती है। दुश्मन हमें गुलाम बनाना चाहता है, दबाना चाहता है। दुनिया में प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। यह एक वैज्ञानिक नियम है मगर शासक जाति के लोगों ने योजना बनायी कि हम क्रिया तो करेंगे किन्तू लोगों को प्रतिक्रिया करने लायक नहीं छोड़ेंगे। इसलिए उन्होंने हमें हजारों जाति के टुकड़ों में विभाजित कर, जाति की उपजातियां बनाकर हमें प्रतिकारविहीन बना दिया। जब उपजाति बनाकर प्रतिकार विहीन बनाया जाता है तब कोई भी समूह अपने उपर थोपी जा रही गुलामी का प्रतिकार करनेलायक नहीं रहता। तब थोपी गई गुलामी मानने के अलावा उसके पास दूसरा कोई भी विकल्प शेष नहीं रहता॥ यही गूढ़ बात है मुक्ति के लिए इसे समझिए ॥

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  • January 23, 2015 at 10:46 pm
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    किसी भी धर्म की जो व्यवस्था पूरी तरह’ है’ से अब कुछ कुछ या पूरी तरह ‘ थी ‘ में बदल चुकी है उसे वापस लाने की कोशिश का क्या अंजाम हो सकता है ये आज दुनिया देख रही है ! और ये दिखाने वाले कौन है ? उनका धर्म क्या है ? यह तो किसीको भी बताने की जरुरत नहीं ! इसीलिए आपसे अनुरोध है की क्या था ये सब बहोत सुन चुके ! सिर्फ आप क्या हम भी खूब सुनाते हैं ! लेकिन इससे न कुछ हासिल हुवा न होयेगा ! और आप तो एक हल लेकर आये थे न ? जितना खुल कर आप ‘थे” पर बात कर रहे हो उतना खुलकर आपके समस्या के हल पर आप क्यूँ नहीं टिक पा रहे ?

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  • January 24, 2015 at 12:08 am
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    अगर किसी व्यक्ति को प्रयः भडकती हुयी आग के सामने रहकर आत्मा तक को जला देने जैसी स्थिति का सामना करना पडता है और वह प्रयत्न स्वरूप ऐसी जगह आजाता है कि जहां नित्य तेज़ धूप में उसे रह्ना पडता है अब यदि वह तेज़ धूप वाली जगह आगया तो उसने जिस हद तक संभव था समस्या का समाधान ढूंढ लिया किन्तु उसके लिये वहां जाना आवश्यक है और वास्तव में यही उसके समस्या का समाधान होगा ! जैसे पहले लोग नाव से समन्दर पार करते थे जिसमे कोइ आराम नही था फिर भी वह समस्या का समाधान था ! फिर जलपोत आये और बेहतर हुआ आज का समाधान है कल इस से भी बेहतर होगा ! अब यदि कोइ इसे माने ही नही और किसी भी बात में किडे निकालने की प्रविर्ति का द्योतक हो तो उसकी समस्याओं के लिये कहीं भी समाधान नही ! बल्कि अपने आप में स्वयं ही वह समस्या है ! जो समस्याओं का हल तो नही बता सकता हां और अनेको समस्याएं खडी कर सकता है !

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  • January 24, 2015 at 5:48 pm
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    आपके लेख के शीर्षक में समाधन शब्द न होता तो हम आपसे इतनी बहस न करते ! बहरहाल ,फिर भी आपको ये एहसास कराना जरुरी समझाता हूँ की आप जो उपाय बता रहे हैं वो आपके ही उदाहरण के अनुसार जलपोत है ! जो नाव की तरह आज के लिए बेकार है ! आज के और कल के लिए बेहतर समाधानो में उसकी गिनती नहीं होती ! इसीलिए आप जो बार बार रास्ता बताने का दावा कर रहे हैं उससे कोई भी फिर से जलपोत में सवार होना नहीं चाहेगा ! इसीलिए आप जिस आधुनिक समाधान की पैरवी कर रहे हैं उसको हल के रूप में पेश करते तो हम भी मानते की इतना बड़ा उपदेशों का डोस पिलाकर कोई ढंग का कोई हल दिया है !
    अफ़सोस ,की इस बहस में हमें जितनी तहजीब आपकी तमन्ना में नजर आई ,उतनी आपके लफ्जों में नहीं नजर आई ! और जब अगली बार किसी को कोई सलाह दो तो पहले तो खुद उस काबिल हो या नहीं यह तय कर लेना और उसके बाद भी पूरी तैयारी से कुछ कहना ताकि आपकी भाषा को मुद्दों से बचने के लिए तेहज़ीब का दामन छोड़ने पर मजबूर न होना पड़े ! धन्यवाद !

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  • January 24, 2015 at 9:06 pm
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    Writer looks like an agent of ISIS.
    Jiske ghar sise ke ho unhe doisro ke ghar pe pathar nahi uchaalne chahiye he shoud suggest to muslims on the same matters.
    What is the condition of women in Islam.
    Before questioning “Manu Smarti” question Sariya law , Hadis

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  • January 25, 2015 at 4:09 pm
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    ये भी गलत है , वो हमारी कुरेद रहा है तो हम भी उसकी कुरेदे ! इससे क्या हासिल होगा ? ईगो पर नहीं विचारों पर आघात कीजिये !!
    और हाँ आग लगने पर पानी डालने के लिए पहले आप पहले आप कहने वालों में से तो आप नहीं हैं न ? ये देख लीजियेगा !

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  • January 25, 2015 at 9:53 pm
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    ये आपकी दिग्भ्रमित मानसिकता इस बात का ध्योतक है की आप समाधान नहीं बल्कि बिखराव चाहते हैं । आपने लेख सही दिशा मे संगयान मे लेकर पढ़ा ही नहीं । आपने गंदगी को साफ करने केस्थान पर पुनःकचरा डालने की नीति अपनाई । मैं ने जो समाधान दिया है उसके धूल तक भी आप नहीं पहुँच सकते ।मित्र देश कि सामाजिक संरचना गैर-बराबरी के आधार पर खड़ी है। इस गैर-बराबरी कि व्यवस्था को ख़त्म करनेवाली संरचना अर्थार्त समतामूलक समाज , बराबरी , और इक्वल डिस्ट्रिब्यूशन । जी मान्यवर जो धर्म इसको सही ठहरता है यही बेहतर है । यह गल्थोथाही से नहीं बल्कि अध्यन और मंथन से प्राप्त होता है ॥

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  • February 1, 2015 at 8:48 am
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    App sab mein se koun apna dharm ko desh dharm se uncha manta hei jiska dharm deshdharm se uncha hei mein talwar ho ya banduk ya fir apne hi hath se uski hatya karunga. Aur fir bhi uncha hei to khud ko dekho ki tum ye sab kya kr rhe ho. Jago desh ko bhi jagao doston.

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