जाकिर नायक को सऊदी ने प्रतिष्ठित पुरस्कार से क्यो सम्मानित किया!

zakir-naik

by — ताबिश सिद्दीकी

सऊदी सरकार ने जाकिर नायक को इस्लाम के प्रति अभूतपूर्व योगदान के लिए सऊदी अरब के एक सबसे बड़े प्रतिष्ठित पुरस्कार से सम्मानित किया.साउदी सरकार ने उन्हे इस्लाम की सेवा के लिये 2015 का किंग फैसल अवॉर्ड से नवाज़ा है .मालूम हो के इस से पहले ए अवॉर्ड इस्लाम के मशहूर उलेमा मौलाना अबुल हसन नदवी को 1980 मे दिया गया था. जिसमे उनको दो सौ ग्राम सोने का मैडल और करीब एक करोड़ पचीस लाख कैश दिया गया है.. सऊदी जाकिर नायक को सम्मानित करती है.. यूरोप मलाला को नोबेल देता है.. यूरोप हिम्मत, हौसले और इंसानियत के लिए आगे आये क़दम को सम्मानित करता है और सऊदी किसको ये सम्मान दे रहा है इस इक्कीसवीं सदी में, वो भी किस कार्य के लिए.. ये दुनिया देख रही है.

लोग अक्सर मुझ से कहते हैं की सऊदी वाले यहाँ के लोगों को मुसलमान नहीं समझते.. मगर वो ये नहीं जानते की वो क्यूँ यहाँ के लोगों को मुसलमान नहीं मानते हैं.. यहाँ जो मुसलमानों की मान्यताओं पर सूफी और हिन्दू प्रभाव है इसके कारण वो हम लोगों को मुसलमानों की श्रेणी में नहीं गिनते हैं.. जाकिर नायक जैसे मुसलमान बन जाओ अभी.. वो पलकों पर बिठाएंगे हमको और आपको भी

जो धर्म और जाति से ऊपर उठकर चला.. बिना किसी भेदभाव के पूरी ईमानदारी से अपने देश के लिए निष्ठावान रहा.. ऐसे अब्दुल कलाम को भारत ने देश का राष्ट्रपति बनाया.. मुसलमानों की दुश्मन कहे जाने वाली पार्टी और लोगों ने उनका खुल के सपोर्ट किया और आज भी करते हैं..

अब्दुल कलाम जैसे मुसलमान इस्लाम का बेडा गर्क कर रहे हैं क्या जो सऊदी सरकार को नहीं दिखता? अब्दुल कलाम को दिया कभी कुछ? ये लोग किस तरह की मानसिकता को समर्थन देते हैं ये हमारे और आपके विचार करने वाली बात है..

आपको कैसा मुसलमान बनना है.. दोनों उदाहरण भी आपके सामने है.. दो सौ ग्राम सोना और कुछ रुपये चाहिए या देश और दुनिया भर के लोगों की आँख का तारा बनना है आपको?

ब्लोगर (अविजीत रॉय) की हत्या—–

बाग्लादेश के उस ब्लोगर (अविजीत रॉय) की हत्या देखिये और वहां के बहुसंख्यक वर्ग की प्रतिक्रिया देखिये.. पाकिस्तान में भी यही हालात रहे हैं.. यहाँ भारत में मैं बहुसंख्यकों के साथ रहा जीवन भर.. अपनी बातें खुल के रखी और उनकी सुनी.. और उन्होंने भी अपनी एक एक धार्मिक बुराईयों की जम के हंसी उडाई और मैं भी उनके साथ उनकी हंसी में शामिल हुवा.. हमारा कभी कोई विवाद धर्म को लेकर नहीं हुवा

जहाँ गाय माता हो.. पेड़ पौधे पूजे जाएँ.. नदियाँ और पक्षी सम्मानित हों.. वहां ऐसी दरिंदगी के हालत अभी तक सिर्फ इसलिए नहीं बन पाए क्यूंकि इस संस्कृति के मूल में इस तरह की मान्यताएं है.. बहुत लोगों को मैं अतिवादी या सनातन के मूल से कुछ अधिक आशा की उम्मीद रखने वाला लगूं मगर मेरी मनोविज्ञान की अब तक की समझ यही कहती है..

भारत के मुसलमान पूरी दुनिया के मुसलमानों से अलग हैं और वो भी सिर्फ इसलिए क्यूंकि कहीं न कहीं यहाँ के संस्कृति की छाप हमारे अवचेतन मन में घर कर ही जाती है.. ISIS के साथ रहने वाला जिहादी जो रोज़ लोगों के गले काटता है वो ब्रिटेन से है.. और भारत से जो गया था ISIS में भरती होने.. वहां की दरिंदगी देख भाग खड़ा हुवा.. हम किन लोगों के बीच पलते बढ़ते हैं ये हमारे आने वाले जीवन और पीढ़ियों पर बहुत असर डालता है

पाकिस्तान को जिन अल्पसंख्यकों को अपने बीच रखना चाहिए था वो रख नहीं पाए.. अहिंसा का पाठ सिखाने वाले वहां अब न के बराबर बचे हैं.. बांग्लादेश में भी यही हालात हो गए हैं अब..

कोई तो हमारे आस पास होना ही चाहिए जो हमे ये याद दिलाता रहे की जिन जानवरों को मार कर आप खा रहे हैं वो पाप है.. कोई तो हो जो ये बताता रहे कि कण कण में भगवान है.. भले आप उसे माने या न माने मगर आपके आस पास ऐसे लोगों के होने से आपके अवचेतन में कहीं न कहीं अहिंसा का समावेश हो ही जाता है

मेरा बेटा मुझे स्कूल से आके बताता है कि “पापा, पेड़ पौधों में भी जान होती है और उन्हें भी हमारे जैसा ही दर्द होता है.. ये मेरी टीचर ने बताया.. इसलिए हमे पेड़ नहीं काटने चाहिए और जानवर तो हमारे जैसे ही होते हैं उनको बहुत दर्द होता है इसलिए मेरे दोस्त बोलते हैं की मटन और चिकन जंक फ़ूड है.. हमे नहीं खाना चाहिए”

जिन बच्चों के लिए मटन और चिकन जंक फ़ूड होगा वो ऐसे किसी इंसान का गला काटेंगे कभी?

(Visited 15 times, 1 visits today)

57 thoughts on “जाकिर नायक को सऊदी ने प्रतिष्ठित पुरस्कार से क्यो सम्मानित किया!

  • March 6, 2015 at 5:22 pm
    Permalink

    मुसलमानो के बीच लगातार बढ़ती छोटे बड़े” जाकीरो नायको ” की तादाद एक गंभीर समस्या बनने वाली हे हाल हे में आई एस आई एस में भर्ती होकर वापस आये अरिब मज़ीद के बारे में इंडिया टुडे में आया हे की पहले वो जाकिर साहब का फॉलोअर बना था

    Reply
  • March 6, 2015 at 5:34 pm
    Permalink

    किसी भी बात की सनक नहीं पालनी चाहिए शाकाहार की भी नहीं शाकाहार को इंसानियत से जोड़ना मुझे नहीं जचता हे देखना हो तो देख ले की भारत में सबसे अधिक पैसा शाकाहारी समाजो के पास ही हे पता कर ले क्या कुछ कम शोषण किया हे इन लोगो ने ? ( प्रेमचंद – सवासेर गेहू ) वो लोग जो इंसानो को एकझटके में काटते हे उनसे कोई खास काम बुरे वो लोग भी नहीं होते हे जो इंसानो को जिन्दा रख कर धीरे धीरे उनका खून चूसते हे

    Reply
    • March 6, 2015 at 5:51 pm
      Permalink

      सब लोग शाकाहारी हो जाएंगे या फ़र्ज़ करे होते तो फिर जानवर इतने हो जाएंगे की वो इंसानो के हिस्से का अनाज आदि खा जाएंगे और वैसे ही सब मांसाहारी हो गए तो इतने जानवर पालने होंगे उन्हें खिलाना होगा की तब भी अनाज कम पड़ जाता इसलिए इंसानो का शाकाहारी मांसाहारी होना ईश्वर का बनाया अध्भुत संतुलन हे इसी तरह में ये भी कहूँगा की मांसाहार की भी खब्त नहीं पालनी चाहिए जैसे बहुत से लोग खासकर कुछ मुस्लिम पालते हेकी बिना मांसाहार के इनका खाना हज़म नहीं होता नतीजा अपनी सेहत खराब करवा रहे हे

      Reply
      • March 7, 2015 at 9:38 pm
        Permalink

        सिर्फ शाका हार से जेीवन् निर्वाह हो सक्ता है लेकिन सिर्फ् मान्सा हार से नहेी
        कई करोद व्यक्ति सिर्फ शाका हारेी है !
        बहुत से जानवर इस्लिये जान् बुज्ह्कर पैदा किये जाते है कि उन्को मान्साहारियो केी सेवा कर्नेी है ! यहेी हाल फारम के अन्दो का भेी है

        Reply
  • March 6, 2015 at 8:37 pm
    Permalink

    जाकिर नायक को अवॉर्ड मिलना भारत के लिये बड़े नाम की बात है . मेरे समझ से इस समय दुनिया मे कोई भी इल्म के मामले मे जाकिर नायक से नही जीत सकता वो या मुसलमान हो हिन्दू हो या ईसाई. जितना उन्हे बाइबल, वेद, गीता, उपनिषद की जानकारी है उतना तो उन धर्म के गुरुओ को नही . क्यो नही 20 साल मे कोई और धर्म के धार्मिक गुरु जाकिर नायक से डिबेट कर लिया .

    ताबिश सिद्दीक़ी बेवक़ूफ़ है उन्हे क्या मालूम जाकिर नायक . इस्लाम के लिये बहुत बड़ा काम कर रहे है.

    Reply
    • March 6, 2015 at 11:20 pm
      Permalink

      चिश्ती साहब धीरे से एक राज की बात बताये, यह सीटे भी कई देशो के नागरिको द्वारा देखी जाती है इसलिये आप अपने कठमुल्लेपन मे थोड़ी और रवानी लाइये, करोड़ो का नही तो लाखो का इनाम तो आपको भी कभी भी मिल सकता है…..इंशा अल्लाह 🙂

      Reply
      • March 6, 2015 at 11:23 pm
        Permalink

        भुल सुधार–>सीटे के स्थान पर साइट पढ़ा जाये

        Reply
    • March 7, 2015 at 11:23 am
      Permalink

      किस बात का इल्म मि. Wahab.?
      इसे तो सही से इस्लाम का भी इल्म नहीं है!
      इस्लाम में हराम की दौलत के लिए मनाही है, और ये करोड़ों रुपये ले रहा है हराम का! इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी और दर पे सर झुकना मना है, जबकि इसने तो जूते चाटने के अलावा कुछ किया ही नहीं (अरबों के)! और यूँ ही इनाम नहीं मिला करते बादशाहों से!
      अब रही बात इल्म की तो, वो इल्म ही किस काम का जो इंसानियत के काम न आ के उल्टा इस पर बोझ बन जाये!
      सभी जगह बड़े बड़े विद्वान होते हैं, पर ज़रूरी नहीं की जहाँ आदमी और सुवर दोनों हों वहां आदमी कीचड़ में इस लिए उतर आये की अपने आप को उस सुवर से श्रेष्ठ साबित कर सके जो खुद को सर्वश्रेष्ठ समझ रहा हो!
      और जब आदमी ऐसा नहीं करता तो उस सुवर के सगे-सम्बन्धी उसे आदमी से श्रेष्ठ समझ कर पूजने लग जाते हैं! और कुछ बड़े सुवर उसे सम्मानित भी करने लग जाते हैं।
      बाकि आप खुद भी थोड़ा बहुत समझदार होगे ही!

      Reply
    • March 7, 2015 at 2:16 pm
      Permalink

      चिश्ती साहब आपके जाकिर साहब डा0 अली सीना साहब की चुनौती को स्वीकारने की हिम्मत नही जुटा पाये थे:) जाकिर साहब इस्लाम पर कम और बाइबिल, वेद-पुराण की कमियो पर जायदा बोलते रहे है और शुरु मे इस बात को कोई पकड नही पाया कि इस्लाम पर होने वाले डिस्कसन मे बड़े-2 मुस्लिम विद्वान बाग्ले झांक जाते है और उनको जवाब नही मिल पाता है !!…..इस साइट समेत 3 साइट्स पर तो हम खुद ही गवाह है 🙂

      Reply
  • March 6, 2015 at 9:14 pm
    Permalink

    ताबिश सिद्दीक़ी अच्छा लिखते है .इस से पहले बहुसंख्यक ज्यादा सहन शील है अल्पसंखयक से . पसंद आया . इन्हो ने सही आवाज़ उठाया है के साउदी सरकार जाकिर नायक को किस योगदान के लिये नवाज़ा है . अगर मुसलमान को ही इनाम देना है तो अब्दुल कलम से अचका कौन है . अगर इन को इनाम दिया जाता तो एक अलग मेसेज जाता के साइन्स और पदाई के लिये इनाम दिया गया है .
    मे अफ़ज़ल ख़ान की तारीफ करता हु के वी ताबिश सिद्दीक़ी , सिकंदर हयत जैसे अच्छे लिखने वाले को आयेज ला रहे है .

    Reply
  • March 7, 2015 at 1:01 am
    Permalink

    Please I need ur mob number to know about ur self mr siddique

    Reply
  • March 7, 2015 at 2:23 pm
    Permalink

    चिश्तेी सहाब आप फरमाते हे कि जाकिर नायक को अवॉर्ड मिलना भारत के लिये बड़े नाम की बात है ?? ….
    फिर तो कल अगर डा0 प्रवीण तोगडिया को हिन्दुत्व के लिये बढिया काम करने पर सम्मानित किया जाये तब भी क्या आपकी यही राय होगी क्योकि जैसे जाकिर नायक की उपलब्धिया एक धर्म के लिये वैसे ही प्रवीण तोगडिया की उपलब्धिया दूसरे धर्म के लिये !!……

    देश अगर जाकिर नायक पर खुश होना चाहिये तो तोगडिया पर क्या नही ??

    Reply
    • March 7, 2015 at 2:33 pm
      Permalink

      शरद जी

      शयेद आप को मालूम नही है के तोगडिया जाहिल आदमी है और उसे अपने धर्म की जानकारी नही है , मगर जाकिर नायक साहब को सभी धर्म की जानकारी है .

      भारत मे कुछ मुसलमान अगर जाकिर साहब का विरोध कर रहे है तो सिर्फ मौलाना कर रहे है के क्यो के उन की इंकों बंद हो रही है और जाकिर साहब इस्लाम का सही रूप पेश कर रहे है.

      Reply
      • March 7, 2015 at 2:50 pm
        Permalink

        चिश्तेी सहब् देश किसेी एक मजहब से नहेी बल्कि सारे देश्वासियो से बनता है और भारत देश मे मुसलमानो के अलावा गैर-मुस्लिम भी रहते है आखिर इस्लाम का प्रचार करने से हमारे हक मे जाकिर साहब ने ऐसा क्या किया है जिससे हमे उनकी उपलब्धियो ? पर खुश होना चाहिये:)

        तोगडिया साहब ने धर्म पर डिस्कसन ना किये हो कोई बात नही मगर हिन्दुओ को जाग्रत करने और हिन्दुत्व के लिये उल्लेखनीय काम तो किये हेी है (आपको जब जाकिर साहब के टुच्चे कर्म उपलब्धिया लगेंन्गे तो हमे भी किसी तोगडिया साहब की शरण तो लेनी ही पड़ेगी)

        …..जाहिल तोगडिया नही बल्कि जाकिर नायक है जो बदनियती से दूसरो मे धर्मो मे घुसा रहता है जबकि खुद उनका इस्लाम दुनिया भर की बुराईयो से भरा पड़ा है ??

        Reply
      • March 8, 2015 at 2:38 pm
        Permalink

        वहाब जी ज़ाकिर साहब को किसी भी धर्म की जानकारी नहीं है इस्लाम को छोड़कर | वो सिर्फ दूसरों की कामिया गिना कर उन कमियों को रट कर स्टेज पर चढ़कर भाषण दे कर धर्मांतरण कराना जानते हैं | और पूरे भारत को उन पर क्यू गर्व हो इनाम तो उन्हे मिला अगर वो उस इनाम की राशि को भारत के गरीब मुसलमानो के हित और उनकी पढ़ाई के लिए , उनके उद्धार के लिए दान देते तो हमे गर्व होता | उन्होने इस्लाम के लिए क्या किया आज तक मुझे तो कुछ भी नहीं दिखता | अगर आप उन्हे सिर्फ इसीलिए पसंद करते हैं की वो दूसरे धर्मो की कमियो को गिना कर इस्लाम को महान बता रहे हैं तो महोदय मुझे आप पर हंसी आ रही है | एक तरफ हम भारतीय जिनहे पैदा होते ही सेकुलिरियत की घुट्टी पिलाई जाई है दुनिया की एक बहुत बेहतर कौम है | और अरब देशो से काफी बेहतर जिंका पैसा तेल है | मुझे तो नहीं लगता की ज़ाकिर साहब को हिन्दू धर्म की जानकारी शंकराचार्य या बड़े हिन्दू धर्म गुरुओ से ज्यादा होगी | महोदय उन्हे सिर्फ बुरयाईया पता है और अगर किसी दिन किसी हिन्दू धर्म गुरु ने खड़े हो कर इस्लाम मे कीड़े निकाले तो इनकी दुकान बंद हो जाएगी | तोगड़िया जाहिल है बेशक जाहिल है लेकिन अगर कल को इसी तरह से स्टेज पर खड़ा हो कर इस्लाम की गलतिया निकालेगा और लोगो को धर्मांतरित करेगा तो भी आप खुश होंगे | भारत के मुसलमान अरबी मुसलमानो से बेहतर हैं | पाकिस्तान का आज ये हाल इसीलिए है की पाकिस्तानी अवाम को अरबी मुसलमान बनाने की कोशिश की गयी और आज हम उसका असर देख ही रहे हैं | हिंदुस्तान की सेकुलर छवि ने इसे अतांकवाद के मुह से निकाल भागने मे सफल किया |
        ज़ाकिर साहब को आतंकवाद मे कोई कमी नहीं दिखती वो इस्लाम का सही रूप पाकिस्तान , अफगानिस्तान, नाइजीरिया या आतंकवाद से प्रभावित मुल्को मे क्यू नहीं दिखाते मेरे ख्याल से वाहा उनकी ज़्यादा ज़रूरत है |

        Reply
  • March 7, 2015 at 3:33 pm
    Permalink

    चिश्तेी सहब् आप हमारे कुच सवालो को जाकिर नायक से जवाब लेकर लिखिये क्योकि हमारा अब तक का अनुभव यही रहा है कि मुसलमान सिर्फ दूसरे के मजहब की कमिया गिनाने और उन पर खुल कर डिस्कसन करने तक ही टिका रहता है और जब भी उससे इस्लाम के बारे मे सामने वाला सवाल करता है तो वह मैदान छोड़ कर भाग जाता है 🙂 आशा है आप ऐसा नही करेंगे और अपने जिस मजहब पर आपको इतना भरोसा है उसके बारे मे हमारे कुछ बुनियादी सवालो पर अपना जवाब अवश्य देंगे …..लीजिये सवालो का इस्लामिक पेक…..
    1-अल्लाह एक है वही सब करता है तो फिर अल्लाह को 1,20,000 फ़रिशतो की जरूरत क्यो पड़ती ह्रे ??
    2-उन 1,20,000 फ़रिशतो के बारे मे कही कोई जानकारी क्यो नही मिलती ??
    3-अल्लाह निराकार है (बिना शरीर वाला) तो उसके इबादत के लिये मस्जिद की जरूरत क्यो पड़ती है ??
    4- मुसलमानो मे चार-2 शादिया करने का नियम आज भी क्यो जारी है
    5-अल्लाह ने सारी कायनात (स्रष्टि) बनाई है सारी दिशाये भी…तो फिर नमाज़ एक विशेष दिशा की तरफ मूह करके ही क्यो पढी जाती है ??
    6-क़ुरान को आसमानी किताब क्यो कहते है ?? इसे किसने लिखा था?? इसे सिर्फ अरबी भाषा मे ही क्यो लिखा गया था ?? क्या अल्लाह अरबी मुसलमानो के अलावा बाकी मुसलमानो को मुसलमान नही मानता ??……
    7-इस्लाम के नाम पर खून खराबा करके निर्दोधो की जान लेने वाले आतंकवादियो और आम मुसलमानो की क़ुरान क्या एक ही है ?? अगर एक ही है तो आतंकवादी कैसे उसी क़ुरान को पढ कर हत्याए करते है और बाकी मुस्लिम उसी क़ुरान के हवाले से शान्ति की बाते करते है ?? क्या एक ही क़ुरान दो अलग-2 लोगो के हिसाब से अलग अलग दिखती है ??.
    8-क़ुरान को सातवे आसमान से कौन और किस यातायात के जरिये लाया गया था ??
    9-इस्लाम मे बुतपरस्ती हराम है तो फिर हज़रत निज़ामुद्दीन, अजमेर शरिफ की दर्गाहो.के पत्थरो पर मुसलमान क्या करने जाता है ?? दफनाने के बाद पत्थर की क़ब्र क्यो बनाते हो ?? काबा का काला पत्थर भी तो बूत ही है, ताजमहल भी बूत ही है :)……
    10-इस्लाम किसी अवतार को नही मानता (अच्छी बात है) , मगर फिर मोहम्मद साहब कौन है ?? और एक बार नही बल्कि अनगिनत बार मुस्लिम ब्लॉगर्स मोहम्मद साहब को हिन्दुओ के अवतारो जैसा साबित करनेके तुक्के भिडाते नज़र क्यो आते है 🙂
    11-अल्लाह निराकार (बिना शरीर वाला) और उसका नबी मोहम्मद साहब साकार (शरीर वाले) ?? ऐसा कैसे संभव है ??
    12-अल्लाह एक, नबी भी एक, क़ुरान भी एक और इस्लाम की शिक्षा भी एक !! तो फिर मुसलमान आपस मे ही इतनी मार-काट क्यो करते है ?? दुनिया मे मुसलमान सबसे जयदा मुसलमान के हाथो ही क्यो मरते है ??
    13-अल्लाह अगर सर्वशक्तिमान है तो उपर से ही सभी को मुसलमान पैदा करके क्यो धरती पर नही भेजता ?? मुसलमानो को गैर मुस्लिमो को मुसलमान बनाने की मुहिम क्यो चलानी पड रही है ?? अल्लाह इस काम को खुद करे ताकि बेमतलब का खूनखराबा और निर्दोषो की जान बचाई जेया सके ??
    14-अजान पूरी ताकत स चिल्ला कर लाउद-स्पीकर से ही पढी जाये ऐसा आपके किस धर्मग्रंथ मे लिखा है ? (हम हिन्दुओ द्वारा रात को लाउद-स्पीकर इस्तेमाल् का भी खुला विरोध करते है)
    15-खतना करने की हिदायत आपके कौन से धर्मग्रंथ से मिलती है , उस आयत का नंबर बताइये ??…………..
    16-यहा की लाइफ को जहन्नुम बना कर “पता नही कौन सी दूसरी दुनिया” की गलतफहमी मे लगे रहते है ?? किसी ने देखा है 72 हूरो को ?? खयाली पुलाव के चक्कर मे क्यो दुनिया को जहन्नुम बना रहे हो ????
    असल सवाल अभी बहुत सारे बाकी है है ये कुच् सवाल सिर्फ ट्राइयल पेक है , आशा है आप इन सवालो पर अपनी राय जरूर रखेंगे और अगर नही रखेंगे तो आगे से दूसरे धर्मो के बारे मे अनाप-शनाप बोलने का आपको कोई हक नही है ……
    अफ़ज़ल साहब, हयात भाई और इस साइट पर मौजूद बाकी मुस्लिम पाठको से हम क्षमा चाहते है मगर चिश्तेी साहब जैसे विद्वानो से येअ दिस्कसन जरुरेी हे.

    Reply
    • March 7, 2015 at 9:23 pm
      Permalink

      आदरनेीय श्रेी शरद जेी , आप अपने विचारो मे सन्शोधन भेी कर सक्ते है.
      {१} कल्पित फरिश्ते १२०००० नहेी, बल्कि असन्ख्य {बेतादाद्} है !
      {३} कल्पित कुरानेी अल्लाह सातवे आस्मान् मे एक सिन्घासन मे विराज्नमान है उस सिन्घासन को ६-८ कल्पित फरिश्ते उथाये हुये है फिर वह निराकार कैसे ?
      {७} कुरान मे दोहरापन कफेी है इस्लिये दोनो पक्श् अप्ने अप्ने तरेीके से मतल्ब निकाल लेते है शान्तेी कि बाते तब थेी जब मुहमम्द जेी कम्जोर थे शान्तेी कि आयते भेी निरस्त हो चुकेी है वह् सिर्फ् पधने मात्र के लिये है, अमल के लिये नहेी है !
      { १५} , खतना का जिकर कुरान मे हर्गिज नहेी है हदेीसो मे हो सकता है !

      Reply
  • March 7, 2015 at 9:32 pm
    Permalink

    यह लेख जाकिर जेी से कफेी हत गया है !
    जाकिर जेी बहावेी मुस्लिम गिरोह का ज्यादा प्रचार करते है, इस्लिये भेी उन्को पुरस्कार मिला होगा !
    जाकिर जेी इस्लमि अतन्क्वाद का भेी समरथन् करते है, उन्कि निगाह मे अमेरिका ज्यादा बदा अतन्क्वदेी है इस्लमि अतन्क्वदेी तो क्रन्तिकारेी और इस्लाम् केी सेवा करने वाले है !

    Reply
  • March 7, 2015 at 10:39 pm
    Permalink

    राज जी हम किसी के मज़हबी मामलो मे पहल नही करते और इस ब्लॉग पर भी हम तब तक चुप रहे जब तक चिश्ती साहब ने जाकिर नायक को अवॉर्ड मिलना भारत के लिये बड़े नाम की बात नही कहा था ?? अवॉर्ड अरब का, देने वाला सौदी अरब , पैसा भी उनका जिसको चाहे उसे दे हमे क्या ?? मगर इस अवॉर्ड को भारत देश के लिये उपलब्धि बताने पर चिश्ती साहब के अलावा बाकियो को ऐतराज अवश्य होना था और वैसा ही हमे भी हुआ:)…..

    या फिर चिश्ती साहब स्पष्ट करे की सिर्फ इस्लाम के लिये दिया जाने वाला अवॉर्ड हमारे जैसे गैर-मुस्लिमो को कैसे सेलेब्रेट करना चाहिये?? कल अगर तोगडिया को हिन्दुत्व के लिये अवॉर्ड दिया जाये तो क्या चिश्ती साहब सेलेब्रेट करेंगे:)…….अगर नही तो ये दोहरापन किसलिये??

    Reply
  • March 8, 2015 at 11:54 am
    Permalink

    कहा चले गये चिश्ती साहब जवाब तो दे जाते 🙂

    Reply
  • March 9, 2015 at 9:59 am
    Permalink

    वहाब चिश्ती साहब, आप धर्मगुरुओं की बात छोड़िए, दुनिया मे इस्लाम और अनेक धार्मिक मान्यताओ पे हर प्रकार के विचार-वान हर क्षण साइबर वार मे मशगूल है. रही बात जाकिर नायक की तो इनसे कोई कैसे बहस करे. एक ओर तो ये कहते हैं की इस्लाम की आलोचना, मूर्तिड इत्यादि की सज़ा कत्ल है, और दूसरी तरफ ये कहते हैं की मुझसे जो चाहे सवाल करो. पहले अपने आप को इंसान बनाओ, फिर आपसे बात की जा सकती है, हैवान से नही. अभी आपने लेखक के बताई घटनाए याद ही होगी, बांग्लादेशी ब्लॉगर की हत्या, इससे पहले राजिब हैदर की हत्या, उससे पहले तसलीमा, रुश्दी को धमकियाँ, सलमान तासीर, इतिहास भरा पड़ा है, इस प्रकार की हैवानियत के उदाहरनो से. और आप कह रहे हो की ऐसी हैवानियत के लीडर, जाकिर नालयक से आके बहस करो. तो मैं आपको बतला दूं की अली सिना ने एक नही अनेको बार जाकिर नायक को बहस की चुनौती दी, लेकिन उन्होने इनकार किया. मैं अली सीना की सभी बातो से सहमत नही हूँ, लेकिन उनकी इस बात से सहमत हूँ की जाकिर नायक जैसे हैवान और उसके जैसे हैवानो के सामने इस्लाम मे एक तार्किक बहस की ही नही जा सकती. उसके जैसे हैवान, खुले आम यूरोप, अमेरिका और भारत मे घूम सकते हैं, बाकी तसलिमाओ, रुश्दीओ को निर्वासित जीवन बिताना पड़ता है या राजिब हैदर की तरह उनके गले रेत दिए जाते हैं. जाकिर नायक जैसे हैवान के लिए साहिर लुधियानवी की कुछ पंक्तियाँ बता रहा हूँ.

    सज़ा का हाल सुनाए जज़ा की बात करें खुदा मिला हो जिन्हें वो खुदा की बात करें उन्हें पता भी चलें और वो खफा भी ना हो इस एहतियात से क्या मज़ा की बात करें हमारे अहद के तहज़ीब में क़ाबा ही नही अगर क़ाबा हो तो बंदा-ए-क़ाबा की बात करें हर एक दौर का मज़हब नया खुदा लाता, करे तो हम भी मगर किस खुदा की बात करें.

    जाकिर जैसे जाहिल और हैवान से कोई भी समझदार इंसान बात नही करेगा.

    Reply
  • March 9, 2015 at 10:13 am
    Permalink

    जाकिर नायक जैसे लोगो की बढ़ती लोकप्रियता के सामने उदारवादी मुस्लिमो की सबसे बड़ी उलझन यह है की वो इन जैसे लोगो के मामले मे विदेशी चंदा, निजी स्वार्थ इत्यादि की बात करके निजी हमला करते हैं, जबकि जाकिर नायक, विशुद्ध रूप से किताबो की बात करता है. जनता को उसके दिए रीफ़्रेंस की काट विपक्षी द्वारा नही मिलती, वो निजी हमलो को खारिज करता है.

    सवाल यह है की किसी भी बहस मे सही या ग़लत का पैमाना क्या है? अगर धार्मिक किताबे हैं, तो जाकिर नायक जीतेंगे, और हर बार जीतेंगे. लेकिन धार्मिक किताबे अविवादित रूप से सत्य है, हम इस्पे ही सवाल करते हैं. इसलिए हम जाकिर नायक जैसे लोगो से बहस मे अपना समय ही बर्बाद नही करते. बाकी उदारवादी मुस्लिम, ना सिर्फ़ हर बहस मे बुरी तरह से जाकिर नायक जैसे लोगो से मात खाते हैं, बल्कि हर मात पे जाकिर नायक ताकतवर बनके उठता है.
    सवाल है जाकिर नायक को चुनौती के वक्त, उसके सही या ग़लत की कसौटी को चुनौती क्यूँ नही दी जाती? क्यूंकी यह जानलेवा है, घातक है, एक उन्मादी भीड़ के हाथो अपनी जान गँवाने जैसा है.

    Reply
  • March 9, 2015 at 11:13 am
    Permalink

    ज़ाकिर साहब उसका इलाज़ ये हे की बगैर मज़हब पर या किसी की भी किसी भी आस्था पर चोट किये बिना ही इन लोगो को निरुतर किया जाए वो कला हमें तो हमारी जीवन की पाठशाला ने सीखा दी हे जाकिर साहब के ही एक शिष्य ”छोटे जाकिर साहब ” यानी हमारे वासी भाई से हमारी अफज़ल भाई के विभिन ब्लॉग पर पिछले डेढ़ दो साल से लगातार बहस हुई और बगैर धार्मिक भावनाव पर चोट किये बगैर ही हमने उन्हें कई बार निरुतर किया और मुझे पूरी पूरी आशा हे की हम उनके विचारो में कुछ ना कुछ परिवर्तन लाने में सफल होंगे इसी तरह कुछ और भी उद्धरण हे हमें करना यही हे की इस तरह धीरे धीरे लोगो को अपने साथ जोड़ना हे दिक्कत यही हे की इन जाकिरो को तो करोड़ो रूपपए मिलते हे पूंजीवादी पिशाच भी एक तरह से इनके साथ हे हमारे साथ कोई भी नहीं हे खेर फिर भी कुछ ना कुछ रास्ता निकालेंगे लेकिन याद रहे ये बहुत लम्बी लड़ाई हे शायद आखिरी सांस तक चलने वाली हे

    Reply
    • March 9, 2015 at 11:34 am
      Permalink

      ”उदारवादी मुस्लिम, ना सिर्फ़ हर बहस मे बुरी तरह से जाकिर नायक जैसे लोगो से मात खाते हैं, बल्कि हर मात पे जाकिर नायक ताकतवर बनके उठता है.” हुसेन भाई में एक उदारवादी मुस्लिम हु मेने महाकटरपंथी वासी भाई से सेकड़ी बहस की हे जाकिर साहब समय हो तो देख कर बताइये की मेने कब कहा कैसे उनसे मात खाई हे ? और जाकिरो नायको की तरह ही में अलिसिनाओ के भी खिलाफ हु किसी भी मज़हब या आस्था को ख़ारिज करना कोई बड़ी या तारीफ की बात नहीं हे ये कोई मुश्किल काम नहीं हे मसला तो इंसान आम इंसान हे जिसे इस दुनिया में जीना हे और इस दुनिया के दो बड़े सच हे सबसे बड़े सच हे मौत और असमानता ये दुनिया इन्ही दो सच पर टिकी हे इंसान इस सच से घबराता हे और धर्म ईश्वर के सहारे इस डर पर काबू पाता हे और इसमें ज़रा भी हर्ज़ भी नहीं हे ईश्वर हे या नहीं इस बात का फैसला कभी नहीं होगा मगर ईश्वर हमारे जीवन का संस्कर्ति का अभिन्न अंग रहेगा तो अली सीना या आस्था को ख़ारिज करने वाला तर्कवादी बनना कोई बड़ी बात नहीं हे मगर इससे कोई ऐसा खास नतीजा नहीं हे की हम इस आधार पर किसी को भी खास मान ले

      Reply
  • March 9, 2015 at 12:02 pm
    Permalink

    वैसे इनके लिए हैवान शब्द भी कम ही पड़ेगा हैवान तो आतंकवादी होते हे और ये लोग मुझे आतंकवादियों से भी खतरनाक लगते हे आतंकवादी तो जो भी हे मगर बहुत कुछ खोता हे अपनी जान दांव पर लगाता हे अपने बीवी बच्चो की भहि परवाह नहीं करता मगर ये हैवानो के हैवान तो सिर्फ पाते हे गाँठ से गवाते कुछ भी नहीं हे

    Reply
    • March 9, 2015 at 12:11 pm
      Permalink

      ” एक ओर तो ये कहते हैं की इस्लाम की आलोचना, मूर्तिड इत्यादि की सज़ा कत्ल है,” मान भी ले की ऐसा हे तो ठीक हे ना आगे बढ़ो खुद सजा दो या अपने बच्चो को आगे करो वो सजा देंगे ठीक हे खुद बम बाँध कर या अपने बच्चो के बाँध कर भेज दो रश्दी तस्लीमा के पीछे फिर हम आपंकि बड़ाई करेंगे मगर ये हैवान सिर्फ दुसरो के वो भी खासकर गरीबो के बच्चो को आगे करते हे

      Reply
      • March 9, 2015 at 10:47 pm
        Permalink

        अच्छा होता यही हे की इन केसो में की ये बढ़ चढ़ कर दीन ईमान की बात बताते हे तो फिर होता यही हे की बात बताकर इन्हे बड़ा अच्छा लगता हे ये सोचते हे की हम बड़े महान हे सुनने वाला सोचता हे की सुनना भी सवाब का काम हे तो वो बड़े उत्साह दिखाकर सुन लेता हे जाहिर हे की कहना सुनना कोई मुश्किल काम थोड़ा ही हे मुश्किल तो चलना हे वो कोई नहीं करता बस कहने सुनने वाले दोनों खुश हो जाते हे प्रेक्टिकल में आप देखे की पाकिस्तान में आज हज़ारो ” जाकिर नाइक साहब ” जैसे लोग सिर्फ यु ट्यूब पर ही हे जमीन पर तो जाने कितने होंगे फिर भी भारत की तरह पाकिस्तान में भी हर एक एक एक दुनियावी बुराई अपने चरम पर हे तो लब्बो लुआब ये हे की ये धर्माधिकारी समाज से एक भी बुराई खत्म या काम करने में असफल हुए हे फिर भी खुद को ज़बरदस्ती महान समझते हे और जो कोई इन्हे आइना दिखाय उसे इस्लाम का दुश्मन बता देते हे अपने अंदर झाकने को तैयार बिलकुल नहीं हे ये ये भी नहीं देख पा रहे की कुछ अच्छा करने के बजाय ये लोग कुछ बुरे लोगो में ये और ज़्यादा तककबूर भर देते हे रांची के रक़ीबुल उर्फ़ रंजीत का केस तो सामने हे ही जो दुनिया की हर गंद में लिसड़ा हुआ था उसे सुधारने के बजाय किसी मुर्ख धर्माधिकारी ने उसे एक मासूम लड़की को ज़बरदस्ती मुस्लिम बनाने पर और प्रेरित कर दिया http://tehelkahindi.com/love-jihad-victim-tara-sahdev/# ऐसे ही तककबूर के कई केस मेने देखे हे

        Reply
  • March 9, 2015 at 1:17 pm
    Permalink

    मैं भी अली सीना का समर्थक नही हूँ, ना ही मैं नास्तिक हूँ. ना ही मैं तसलीमा, रुश्दी का प्रशंसक. मैं यह भी मानता हूँ की विश्व मे आस्तिक सदैव रहेंगे, वो भी बहुमत मे. लेकिन आस्था, अनास्था और विभिन्न आस्था इन सबको एक दूसरे के साथ, और एक दूसरे के सवालो के साथ रहने की आदत होनी चाहिए. हम यह सोचें की इस दुनिया मे ईश्वर को लेके एक ही अवधारणा होगी, या कोई ईश्वर की अवधारणा पे सवाल नही उठाएगा, तो यह संभव ही नही.
    इतिहास, राजनीति शास्त्र, समाज शास्त्र, हर विषय, धार्मिक चरित्रो पे तीखे तीर छोड़ेगा, और इसे हमे स्वीकारना होगा.
    जब तक हम अली सिना, और तसलीमा जैसे लोगो को एक आवश्यक सामाजिक तत्वो के तौर पे स्वीकार नही करेंगे, हम बहुलतावाद को प्राप्त नही कर सकते. हम इनसे असहमत हो सकते हैं, लेकिन इनकी किसी भी विचारधारा, भले ही उसे रिलीज़न कहा जाता हो पे सवाल उठाने की आज़ादी के लिए हम सबको लड़ना होगा. वरना कट्टरपंथ की लड़ाई हम कभी नही जीत सकते.

    Reply
  • March 9, 2015 at 1:50 pm
    Permalink

    जब मैं हार की बात करता हूँ तो मेरा मतलब खुद की हार मानने से नही, बल्कि इनकी शरण मे गये या इनके जैसे सोच रहे लोगो को बाहर निकालने से है. चलिए जो इनका शिकार हो गया, वो शायद वापस ना आए, लेकिन जो आने वाली पीढ़ी है, उसको इनका शिकार होने से रोकने के लिए, हम क्या कर सकते हैं. मेरा मानना है की किताबो की सत्यता को अविवादित मान के की गयी चर्चा, हमे मंज़िल से दूर रख रही है.

    आप और मैं शायद ईश्वर को लेके अलग अलग राय रखते हैं. लेकिन बिना धार्मिक ग्रंथो के गहन अध्ययन के बाद भी, जब एक धर्म का प्रकांड पंडित, मुर्तिद और इस्लाम के आलोचको को कत्ल करने को सही ठहराता है, तो हम (आप और मैं) बिना धर्म ग्रंथो को पढ़े, इसे ग़लत कहते हैं.

    सही या ग़लत का ये पैमाना या ये चेतना, जिसका स्रोत यक़ीनन वो किताबे नही हैं, जिसे लोग धर्म ग्रंथ कहते हैं, लेकिन वो पैमाना या वो चेतना, या वो विवेक, हमे कहाँ से मिला, वोही चेतना हम आगे आने वाली पीढ़ी को कैसे दें, ये सोचने की ज़रूरत है. कैसे धर्म ग्रंथो को पढ़ने के बाद, बुल्ले शाह जैसा व्यक्ति, अपने सवालो से मुक्त नही होता, और कह उठता है “बुल्ला की जाना, मैं कौन हूँ..” कबीर कह जाता है ” कंकर पत्थर जोड़ के मस्जिद दियो बनाय…” या फिर “पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भयो ना कोई, ढाई आखर प्रेम का पढ़े जो पंडित होये..”

    वहीं, एक शैतान, कुछ किताबो का रीफ़्रेंस देके बोलता है की जनन्त मे सिर्फ़ एक रिलीज़न के लोग जाएँगे, और बाकी नरक की आग मे जलेंगे.

    तो सवाल यह है धार्मिक किताबे, हमे शायद दुनिया का हर नैतिक मूल्य या सही ग़लत का पैमाना नही देते हैं. सही ग़लत का पैमाना हमे हमारे विवेक से मिलता है, और फिर हम अपने ग्रंथो का उन पैमानो पे बचाव करते हैं. तो जब किताबे सही ग़लत की समझ का स्रोत नही है, तो उनकी पवित्रता को लेके इतनी असुरक्षा क्यूँ?

    Reply
    • March 9, 2015 at 5:55 pm
      Permalink

      आपकी बात पर आगे चर्चा जारी रहेगी जाकिर साहब —————

      Reply
  • March 9, 2015 at 3:20 pm
    Permalink

    हयात भाई, फरक देखिये…
    दो जाकिर….
    दोनो मुसलमान…
    एक जाकिर नायक और दूसरा जाकिर हुसैन….
    दोनो की सोच एकदम अलग…
    पहला जाकिर (नायक) अपने धर्म के साथ-2 कई धर्मो की किताबे पढ कर भी कठमुल्ला ही रहता है और दूसरा जाकिर (हुसैन) तुलनात्मक रूप से काफी कम धार्मिक किताबे पढ कर भी धर्म का मतलब बेहतर समझता है !!….

    उपरवाला बचाये पहले वाले जाकिर (जोकर) नायको से:)

    Reply
  • March 9, 2015 at 3:23 pm
    Permalink

    मुसलमानो की कट्टरता पर नवभारत टाइम्स “अपना ब्लॉग” सेक्शन मे एक ब्लॉगर समीर का ब्लॉग “बुरे फंसे अब्दुल भाई इस्लाम पर:” प्रकाशित हुआ है जो हूबहू नीचे लिख रहे है

    कल अब्दुल आ गया… और जैसे फेसबुक पर छोटे छोटे मासूम बच्चों के फोटो शेयर करके अमेरिका इजराइल आदि कि बुराई करते हैं वो करने लगा…
    ये देखो.. ये इंसानियत है.. ? देखो कैसे छोटे छोटे बच्चे मारे गए हैं ..इस्लाम खतरे में हैं…
    मैंने कहा…”हां यार.. ये तो बच्चे मरे पड़े हैं… गलत है… शायद…..
    शायद ? शायद क्या होता है..ये १००% गलत है…
    नहीं मतलब मैं सोच रहा हूँ कि अगर ओसामा बिन लादेन भी बचपन में ही मर जाता.. तो सही नहीं होता क्या ?
    क्या बकवास करते हो…
    देखो भाई … एक बात बताओ.. ये बच्चे जिसके है उसका बाप या समाज किस धर्म के हैं ?
    इस्लाम के…हैं और क्या …
    अभी तो मैं भी मानता हूँ ये मासूम है..लेकिन ५ साल के होते होते पढेंगे तो क्या इसको इस्लाम कि किताब पढ़ाओगे…?
    इंशाल्लाह.. इस्लाम के रास्ते पर चला कर पढ़ा कर इसको सच्चा मुस्लमान बनाना होगा…हमारा फर्ज है..
    अच्छा तो उसके लिए क्या पढाओगे ?
    इस्लाम कि सबसे पाक किताब कुरआन हदीस आदि….
    ये कुरआन में हम हिन्दुओं को या इसरायली को या अमेरिकन को काफिर याने दुश्मन बताया गया है..और उसको मारने के लिए लिखा गया है… वो भी पढ़ेगा… ?
    अह…. हाँ… पढना तो पढ़ेगा न अगर लिखा है…
    उसी में जिहाद करने वाला ही सच्चा मुस्लमान माना गया है है कि नहीं ?
    तो ये भी बड़ा होकर बम ही फोड़ेगा .. लोगों को मारेगा…अमेरिका और इजराइल पर हमले करेगा…
    अह… करेगा …….शायद……….
    तो भाई ऐसा है कि इजराइल भी क्या करे… उसने दूर कि सोची होगी… अगर तुमलोगों ने आने वाली नस्ल को भी कुरआन से दूर करके अच्छा इंसान बनाया होता तो कोई हमले नहीं करता…
    लेकिन वो तो बाद कि बात है मियाँ…क्या बात करते हो…ये मासूम हैं…
    अच्छा चलो मान लो…लेकिन इसके जो बड़े भाई या अब्बा हैं वो लोग जो इजराइल से या अमेरिकन से लड़ते हैं तो लड़ते वक़्त इनकी मासूमियत का ख्याल करके इनके नानी घर या दूर कहीं शहर क्यूँ नहीं भेज देते युद्ध के दौरान… ? साथ में रखेंगे ..तो क्या इजराइल वाले बाप को और बेटे को अलग अलग करने के लिए इनके इलाके में आ कर खतरा उठाये…? वो तो दूर से राकेट मारते हैं …
    मियाँ तुमसे तो बहस ही बेकार है… इस्लाम्म…. क्या है अभी तुम जानते नहीं……
    अच्छे बच्चे तैयार कर जो २० साल बाद अपने देश में शान्ति से रहना सीख लें…कम से कम २० साल बाद तो बच्चे मरना बंद हो जाएँ …

    Reply
  • March 9, 2015 at 4:24 pm
    Permalink

    शरद जी, हालाँकि मैं इस्लाम का आलिम नही हूँ, लेकिन मैं यह कह सकता हूँ की आपको इस्लाम की जो समझ है, वो बहुत सतही है. अगर ऐसा होता तो दुनिया के किसी मुस्लिम बहुल देश मे कोई गैर मुस्लिम जीवित नही रहता. दुनिया के अधिकांश मुस्लिम आतंकवादी या उनके समर्थक होते. मान लिया, की मैं मुसलमान नही, क्यूंकी मुस्लिम एक वंशानुगत पहचान नही है, लेकिन इसी साइट पे आप अफ़ज़ल ख़ान और सिकंदर हयात जैसे मुस्लिमो से मिलेंगे, जो दुनिया के कर कोने मे फल फूल रहे इस्लामी कट्टरपंथ की जमकर आलोचना करते हैं, और वो भी बिना किसी पैसे के लालच मे.

    देखिए, इस्लाम मे ईमान के लिए कुर्बानी देने का जज़्बा है, और ईमान को अपने सगे-संबंधियो से भी ऊपर रखा गया है. हालाँकि मैं दूसरे धर्म ग्रंथो की आलोचना नही करता, लेकिन आपने बात छेड़ी ही है, तो भगवत गीता मे भी धर्म के लिए अपने सगे-संबंधियो और गुरुओं तक की हत्या तक को पुण्य कार्य माना गया है.
    देखिए धर्म और अधर्म की ये परिभाषा ही फिसलन भरी है, लेकिन आप जो कह रहे हैं, यह मान भी लिया जाए की सही है, तो बेहतर होता आप इसे एक वैचारिक लड़ाई के तौर पे पेश करते.

    एक इंसान कहाँ पैदा होगा, कौनसे देश मे पैदा होगा, उसके माता-पिता का धर्म क्या होगा, इसमे उसका कोई अख्तयार नही होता. मान लीजिए, आप एक तालिबानी, सऊदी या फिलिस्तीनी के घर पैदा होते तो आपके मुताबिक आप एक आतंकवादी ही बनते. इसलिए आपको पैदा होते ही मार देना चाहिए था. आप जो बात कर रहे हैं, जो सोच रहे हैं, वो एक तालिबानी से भी अधिक हैवानियत लिए हुए है. बेहद ही घटिया और गिरी हुई सोच है आपकी. बस आप खुद कत्ल नही कर रहे, लेकिन जो नफ़रत के बीज, आपके दिल मे हैं, उससे आप किसी दिन किसी की धर्म के नाम पे हत्या कर दो तो कोई बड़ी बात नही. लेकिन फिर भी मैं आपको कत्ल करने के किसी भी अभियान का समर्थन नही करूँगा, क्यूंकी आप एक बीमारी के लक्षण है, बीमारी नही. बीमारी आपकी सोच है.

    Reply
    • March 9, 2015 at 5:32 pm
      Permalink

      ये समीर शर्तिया मेन्टल आदमी हे मनोरंजन उद्योग में हे और घोर साम्प्रदायिक हे मेने इसे बहुत पहले चेतावनी दी थी की भाई देखो भारत के फिल्म टीवी उद्योग और चाहे लाख बुराइया हो मगर साम्प्रदायिकता उग्रता के लिए वहा कोई जगह नहीं हे सोच समझ लो खेर . इसे कोई काम नहीं देगा और अब समीर साहब को ब्लॉग ही लिखने पड़ेंगे

      Reply
    • March 10, 2015 at 4:53 pm
      Permalink

      क्या मक्का व मदेीना मे कोइ गैर मुस्लिम है / यह कोइ बात नहि है किअगर कुच मुस्लिम देशो मे गैर मुस्लिम है तो उस्से इस्लाम् या मुसलिम समुदाय को अच्हा मान् लिया जाये ?
      क्य सौदेी अरब् मे किसि गैर मुस्लिम को अप्ने तरेीके से खुले आम इश्वर केी आराधना करने का अधिकार है ? तब करोदो मुस्लिम् इस नियम कि निन्दा क्यो नहि कर्ते है उस्क हतवाने मे सहयोग कोइ अन्दोलन क्यो नहेी करते है ?

      Reply
  • March 9, 2015 at 5:04 pm
    Permalink

    जाकिर साहब, बात आपने कही है तो हमे भी अपना पक्ष रखने का मौका दीजिये और इसे एक वैचारिक डिस्कसन के तौर पर ही लीजिये.

    1-इस्लाम क्या है हो सकता है हमे उसका ग्यान नही हो (हमे कोई शर्म नही है) मगर इस्लामी देशो मे गैर-मुस्लिमो को कितनी धार्मिक और सामाजिक आज़ादी है यह तथ्य किसी से भी छुपा नही है.

    2-मुस्लिम बहुल आबादी होते ही गैर मुस्लिमो की आबादी काफी तेजी से कम हो जाती है क्योकि जबरन इस्लाम कुबूल करवाने की महत्वपूर्ण वजह को “आप भी” नकार नही सकते और दुनिया भर का मुसलमान चुप रहता है ?? हमे तो इस्लाम के ऐसे ही दर्शन हुए है !! हमारी इस बात को एक चुनौती की तरह लीजिये और किसी भी मुस्लिम बहुल देश मे गैर मुस्लिमो की 23-30-40 साल पहले की जनसंख्या और आज की जनसंख्या को खुद अपनी आंखो से देख कर तसल्ली कीजिये और उसके बाद अपना जवाब लिखिये हमे खुशी होगी.

    3-म्यांमार मे मुस्लिमो पर हमले की खबर आती है (झूठी) और हमारे ही देश की कोई रज़ा अकादमी हमारे देश के 50,000 मुसलमान इकट्ठे कर हमारे ही शहीदो के स्मारको पर तोड-फोड़ करती है और दूसरी तरफ पाकिस्तान मे 143 मासूम “मुसलमान” बच्चे आतंकियो द्वारा गोलियो से भुन दिये जाते है और पूरे देश की कोई भी रज़ा अकादमी 50,000 तो दूर 10000 मुस्लिमो के साथ आतंकवादियो का विरोध करती नही दिखती ?? जो दिखता है मुस्लिम समाज की उस पाक-परास्त सोच और उस इस्लाम को कैसे नकार दे ??

    हर बार हर खबर पर वही गिनतेी के दो चार सिकंदर हयात, अफ़ज़ल ख़ान और ज़ाकिर हुसेन दिखाई दे तो सच से आंखे फेरना हमारी नेचर नही है बेशक आप हमे किसी भी तरह से नवाजे….. अब आपको पूरा समय और मौका है की इस्लाम का वह पक्ष रखिये जो गैर मुस्लिमो के प्रति नफरत नही बल्कि सद्भाव और उनकी धार्मिक और सामाजिक आज़ादी पर हमले करने से अलग हो…..आपको हुई असुविधा के लिये खेद है.

    Reply
    • March 10, 2015 at 4:24 pm
      Permalink

      एक विदेशेी इसलामिक् विद्वान है उन्कानाम तारिक् जेी या तहिर जेी है उन्होने कुच किताबे अन्ग्रेजेी मे लिखि है उन्का कहना है कि मस्जिदो मे कफिरो के विरुद्ध नमाज के बाद दुआ केी जातेी हैकि उन्का नाश “मुस्लिम” केहाथो हो ! जब ऐसि दुवाये मस्जिदो मे होगि तब कैसे मुस्लिम समुदाय अन्य समुदायो से नफरत् नहि करेगा ! उन इस्लमिक विद्वान ने नमाज के बाद केी दुवाओ मे शामिल नहेी होते ! उन्होने उन दुवाओ को रोकने का दावा भि किया लेकिन सफल् नहेी हो सके १ उन्होने कहा है कि कुरान केी ” अल कफिरुन” कि आयत मे से कुच पधेी जति है

      Reply
  • March 9, 2015 at 6:06 pm
    Permalink

    अगर आपकी आपत्ति इस्लाम से है तो भी मुझे कोई समस्या नही. मैं यहाँ इस्लाम पे आक्रमण या उसका बचाव करने नही आया. सही या ग़लत की समझ के लिए मुझे किसी धार्मिक किताब का सहारा नही लेना पड़ता. लेकिन आपने मुस्लिमो के प्रति नफ़रत की बात करी, मुझे उससे आपत्ति है. कौन किस घर, देश या मज़हब मे पैदा होगा, इसमे उसका कोई वश नही. किसिके नाम से उसकी सोच का पता ना लगाएँ.
    अगर आपको सिकंदर, अफ़ज़ल या मेरे जैसे 2-4 लोग नज़र आते हैं, हर खबर पर तो बताइए की आपने जैसी छवि बना रखी है उस जैसे कितने लोग आपको इन ब्लॉग्स पे टिप्पणी करते नज़र आते हैं?
    धार्मिक कट्टरता पे बातचीत के समय हम लोगो मे भी कई मुद्दो पे मत-भिन्नता रहती है. मुस्लिम देशो मे अन्य धर्मो के कम होते लोगो की संख्या मेरी नज़र मे कोई चिंता का विषय नही, दुनिया का हर नया मज़हब, पुराने धर्मो मे ही अपनी जगह बनाता है.
    वर्ना दुनिया मे कभी कोई धर्म नही पनपेगा. समस्या दूसरे धर्मो के लोगो को मिले सामाजिक और राजनैतिक अधिकारो को लेके है, जो यक़ीनन मुस्लिम देशो मे नही है, और निश्चित रूप से इसकी जड़ो मे इस्लामी सिद्धांत और उनकी व्याख्या हो सकती है.
    लेकिन आप ये भी समझिए की इस्लाम का प्रसार सिर्फ़ इस्लामी मुल्को मे ही नही, गैर इस्लामी मुल्को मे भी हो रहा है. जहाँ जाकिर नायक जैसे लोगो की आलोचना सिकंदर हयात जैसे लोग खुल कर रहे हैं, वहीं उनकी सभाओं मे अपनी मर्ज़ी से धर्म परिवर्तन करने वाले हिंदू और ईसाई भी आते हैं.
    मैं आपको यह समझाने की कोशिश कर रहा हूँ की मुस्लिम समुदाय को जो आप एक रंग मे मान रहे हैं, ये भी विविध सोच वाले लोगो का समुदाय है, और आतंकवाद को लेके इस समुदाय मे भी चिंताए हैं.
    जिस तरह से सिकंदर और अफ़ज़ल साहब जैसे लोगो के विचार जाने बगैर आप उनके नामो की वजह से उनकी सोच को अलग प्रकार का मानते थे, उसी प्रकार सैकड़ो, हज़ारो सिकंदर हयात, अफ़ज़ल ख़ान और जाकिर हुसैन मुस्लिम समुदाय मे है. और वो रोज अपने जी-जान से समस्या के हल मे लगे हैं

    Reply
    • March 10, 2015 at 2:24 pm
      Permalink

      ”हल में तो लगे हे ”’ लेकिन इस काम में कामयाबी अगर नहीं मिलती दिख रही हे तो इसका कारण हे की कोई भी ऐसा ताकतवर व्यक्ति संगठन संस्था देश कोई भी नहीं हे जो दुनिया में सबसे मुश्किल हालात झेल रहे शुद्ध सेकुलर भारतीय मुस्लिम वर्ग की मदद कर उन्हें सहायता दे कोई भी तो नहीं हे कोई भी नहीं जाकिरो को तो अरब दुनिया से करोड़ो रूपये मिल जाते हे रश्दी तस्लीमो औ को भी वेस्ट से मानसम्मान अवार्ड बहुत कुछ मिल जाता हे दूसरे सेकुलरो यानी तीस्ता टाइप लोगो को भी क्या कुछ मिलता हे चर्चा में हे ही हिन्दू कटटरपन्तियो को एन आर आई देते हे शियो को ईरान से बरेल्वियो को गैर मुस्लिमो से चंदा सहायता समर्थन मिलता हे मगर एक शुद्ध सेकुलर लिबरल मुस्लिम वर्ग बिलकुल खाली रहता हे यही कारण हे की इतने अधिक मुस्लिम बुद्धजीवी होते हुए भी वो भी ये वर्ग बना बढ़ा नहीं सके वे इस सरदर्दी से दूर ही रहे तो ये हे बहुत ही मुश्किल हालात फिर भी मेरी समझ हे की अपने काम में लगे रहे चाहे जो हो राजेंदर माथुर के शब्दों में ” चाकू जब सान पर चढ़ा होता हे तो वो अपने कर्तव्य से भाग नहीं रहा होता ” तो खेर खुद को शारीरिक मानसिक रूप से फिट रखे और इंतज़ार करे शायद अल्लाह की तरफ से ही कोई मदद आएगी उस दिन का इंतज़ार करे

      Reply
      • March 10, 2015 at 3:52 pm
        Permalink

        सिर्फ अल्लाह् केी तरफ देख्ने से काम नहेी चल्ता है बहुत ज्यदा कोशिश कर्नेी होतेी है !
        तेीस्ता जेी को भेी अनेक स्वदेशेी एन जेी ओ और् विदेशेी धन भेी मिला है !

        Reply
    • March 10, 2015 at 4:12 pm
      Permalink

      मुस्लिम नाम का प्रानेी इस्लाम के नाम पर एक्मत रहता है १
      वह गरेीब हो या धनेी हो !
      अन्पध हो य पधा लिखा हो !
      महिला हो या बच्हा हो या पुरुश हो १
      हमारेी बात के .००००१% अप्वाद हो सक्ते है ?
      बत्लाये कित्ने मुस्लिम ऐसे है जो मुहमम्द जेी ” बिबियो के भन्दार ” केी निन्दा कर्ते है !
      कित्ने मुसलिम् ऐसे है जो हुरो को काल्प्निक् कहते है!
      कित्ने मुस्लिम ऐसे है जो कुरान पर प्रश्न्चिन्ह लगाते है ?
      क्योकि भय्भेीत रहते है कि उन्केी जान जा सक्ति है १
      जब कि लाखो हिन्दु खुलेी आम कह देन्गे कि राम इश्वर के अव्तार नहि है !
      क्रिश्न इश्वर के अव्तार नहि है
      फिर भेी उन्को कोइ सुई भेी नहेी चुभोयेगा !
      उदार कौन हुआ ? मुस्लिम समुदाय् या हिन्दु समुदाय ?
      मुस्लिम समुदाय कैसा भेी हो वह इस देश का जनम्जात सम्मानित् नागरिक् अन्य समुदायो कि तरह है औरआगे भेी रहेगा ! इस देश मे कोइ भेी समुदाय वेी आई पेी नहेी है सभेी के साथ समान व्य्व्हार होना चहिये १
      अफ्सोस ! प्राय मुस्लिम् अप्ने समुदाय कि बात ज्यादा सोचता है !
      जब कि सारे समाज का भला हो ऐसा सोच्ना चहिये! !
      अगर महन्गाई घ्तेगेी य बधेगेी तो सब्का भला या नुक्सान होगा !
      बिज्लेी नहि होगेी तो सब्का नुक्सान होग पानेी नहेी होगा तो सब्का नुक्सान होगा !
      सदक्खराब होगेी तो सब्का नुक्सान होगा !
      कौन सा मुस्लिम नेत इस्के लिये अन्दोलन कर्त है उस्का नाम जरुर बत्लऐये
      अप्वाद कोइ हो सक्ता है , लेकिन महौल नहेी है !

      Reply
  • March 9, 2015 at 7:05 pm
    Permalink

    जाकिर साहब, किसी भी धर्म पर हमला या बचाव कभी हमने नही किया मगर चाहे इस साइट की बात हो या किसी भी दूसरी साइट की 10 मे से 9 बार गैर मुस्लिमो की धार्मिक और सामाजिक बातो को कुरेदने वाला चेहरा शर्तिया किसी मुस्लिम का ही होता है और ऐसे चेहरो को आइना दिखाना कोई गलत बात नही है?? ….हन्नान आंसारी साहब, चिश्ती साहब, वासी साहब के लेखन का इकलौता मकसद गैर-मुस्लिमो को कोसने तक ही सीमित है और कितने मुस्लिम उनका विरोध करते दिखते है?? यही कभी कोई हिन्दू दूसरे धर्मो के बारे मे गलत बात की शुरुआत करेगा तो काफी बड़ी सांख्या मे उसी के धर्म वाले उसका विरोध करते दिख जायेंगे….सच को आप नकर नही सकते !!

    क्यो मुसलमानो को दूसरो के धर्मो मे घुसे बिना रोटी हज़म नही होती ?? अरे भाई आपका एक धर्म है उसके नियम कानून है उनको निभाइये और चैन से जिंदगी गुजारिये !! दूसरी तरफ हमारा भी एक धर्म है हम उसे निभा रहे है , नही भी निभा रहे तो कभी ईसाइयो या मुस्लिमो को तो नही कोसते कि उनके धर्म मे क्या है ?? ये बीमारी सिर्फ मुस्लिमो मे ही सबसे जयादा क्यो पायी जाती है ?? मूर्तिपूजा गलत की चिंता हिन्दुओ से जयदा मुस्लिमो को क्यो होती है?? बुरा मत मानिये मगर हकीकत मे जब भी मुस्लिम सांख्या मे जयादा होते है तो ना खुद चैन से जी पाते है और ना ही दूसरो को जीने देते है

    Reply
  • March 10, 2015 at 9:53 am
    Permalink

    देखिए, मुस्लिम बहुसंख्यक देशो मे अल्प संख्यक समुदाय के साथ भेदभाव किया जाता है, अशांति है. और जहाँ अल्प संख्यक है, वहाँ भी यह समुदाय शिक्षा और अन्य मामलो मे पिछड़ा है. इन्ही सब कारणो से मैं, और अन्य लोग मशक्कत कर रहे हैं. बुरा मानने की कोई बात ही नही है, लेकिन पूरे समुदाय से नफ़रत की बू आपके लेखन से नज़र आ रही है, इसके लिए मैं आपको किसी पहचान मे नही डाल रहा, लेकिन आपकी बातो से ऐसा लग रहा है, की आप किसी ज़ाकिर, अफ़ज़ल या सिकंदर नाम के व्यक्ति को जब तक वो अपने उदारवादी होने का प्रमाण नही दें, आप उसे संकीर्ण मानसिकता, देश-विरोधी वग़ैरह वग़ैरह मानेंगे. समस्या इसी बात से है.

    अब बात आती है की हम तो ऐसे नही है, मुस्लिम ऐसे होते हैं. मैं तो मुसलमान नही हूँ, इसलिए मैं आपके विचारो को व्यक्तिगत नही ले रहा हूँ, लेकिन क्या आपने सोचा है की हिंदू समुदाय मे मुस्लिम समुदाय से कई सौ गुना अन्याय हज़ारो साल तक रहा, नस्ल वाद के तौर पे, और इस अन्याय और रक्त-पात की मिसाल आज तक के इतिहास मे नही मिली, कुछ दशको या एक सदी पहले जब दयानंद सरस्वती, ज्योतिराव फूले जैसे लोगो ने इस अन्याय के खिलाफ बोला तो वो उतने ही अल्प-संख्यक थे, जितने आपको मुस्लिम समुदाय मे उदारवादी नज़र आते हैं, लेकिन सूरत धीरे धीरे बदली. दो ग़लत मिलके एक सही नही होता, इसलिए उन कमीयो का हवाला देके, मुस्लिम समुदाय या उनकी धार्मिक मान्यताओ मे कोई कमी नज़र आती है तो उसे सही नही ठहराया जा सकता.
    लेकिन यह समझा जा सकता है की जिस प्रकार से अन्य समुदायो मे सकारत्मक परिवर्तन हुए, मुस्लिम समुदाय मे भी हो सकते हैं.

    उदाहरण के तौर पे 50-60 वर्ष से फल फूल रहे अपने फिल्मी जगत को देखें, यहाँ हर विधा मे हर धर्म जाति से जुड़े लोग हैं, मुस्लिम भी हैं, लेकिन एक भी मुस्लिम नाम आपको अपवाद स्वरूप भी नही मिलेगा, जो संकीर्ण धार्मिक भावना से ग्रस्त हो. देश के हर हिस्से से, अनेक आर्थिक स्तर के लोग यहाँ आए, लेकिन उदारवाद और सौहार्द का स्तर एक जैसा रहा. देश मे मंदिर-मस्जिद के लिए झगड़े हुए हो, लेकिन इस दुनिया को कोई फ़र्क नही पड़ा.
    यानी किसी भी समुदाय का व्यक्ति हो, एक खुले माहौल मे रहने से उसकी मानसिकता उदार हो सकती है. जैसे आपकी नही हो पाई.
    और किसी भी समुदाय मे रूढ़िवादिता या कट्टरपंथ की लड़ाई तभी प्रभावी होती है, जब वो उसके भीतर से शुरू हो.

    Reply
    • March 10, 2015 at 3:47 pm
      Permalink

      फिल्म वाले कोइ आदर्श् नहि है उन्को बहुसन्ख्यक लोगो मे लोक् प्रिय्ता और धन भेी कमाना है !

      Reply
  • March 10, 2015 at 10:36 am
    Permalink

    हालांकि खुद के बारे मे बोलना अच्छा तो नही लगता मगर शान्ति और प्यार की भाषा कट्टरपंथियो पर असरकारी साबित नही होती और इसे हम नवभारत टाइम्स पर प्रक्टिकल्ली अनुभव कर चुके है जहा इस्लाम पर अनगिनत ब्लॉग्स / कॉमेंट्स लिखे जाते थे जिसमे मुख्य फोकस हिन्दुओ की सामाजिक और धार्मिक बातो को निशाना बना कर “बिना इस्लाम की कमिया डिस्कस किये” इस्लाम की जयकार करना था , अपने धर्म के बारे मे बात करना गलत नही मगर दूसरो को गलत साबितकरने का मिशन चला कर ऐसा करना गलत है…. शुरुआती 6 महीनो मे हम बार-2 मुस्लिम कट्टरपंथियो को शान्ति और सद्भाव की अपील करते रहे मगर उनकी नज़र ने शायद ये हमारे धर्म की कमजोरिया है जिसकी वजह से हमारी आवाज़ शांत है, शर्म की बात ये थी कि उदारवादी और सुधारवादी मुस्लिम नाम के गिनती के 4 इंसान भी नही होते थे जो उनकी गलत बातो के खिलाफ आवाज़ उठाते).

    इसके बाद हमने उनको उन्ही का इस्लाम उनकी आंखो के सामने रखना शुरु किया (उसी ईमानदारी के साथ जैसे वे वेद-पुराणो को हमारे सामने रखा करते थे) और बताने की जरूरत नही की अब वहा ऐसे ब्लॉग्स ढूंढे से भी दिखाई नही देते, ताज्जुब इस बात का जरूर होता था की जब हम कट्टरपंथियो की खबर ले रहे होते थे तब उदारवादी मुस्लिम हमे शान्ति और सद्भाव से काम करने का मशवरा दिया करते है , वो मशवरा जो अगर उन्होने उन कट्टरपंथियो के ब्लॉग्स पर दिया होता तो हमे बोलने की नौबत ही नही आती !!…..इस साइट पर भी वासियो, चिश्तीयॉ और हन्नानियो को प्यार और शान्ति की भाषा कहा समझ मे आई थी (हयात भाई की कोशिशो पर वे उन्ही को इस्लाम-विरोधी बता देते है और तब भी सुधारवादी जमात सोती रहती है??)

    आप कोई एक भी ब्लॉग पर आये कॉमेंट्स के समय चेक करवा लीजिये और हमेशा यही पायेंगे कि हमारा कॉमेंट हमेशा किसी ना किसी गलत बात शुरु करने वाले का जवाब ही होगा !!….मदरसे पर ब्लॉग लिखे हमारा कॉमेंट नही मिलेगा, बुरके और हिज़ाब पर भी हम शांत ही रहे क्योकि ये मुस्लिमो का अपना मसला है, मगर जब कोई बुरके और मदरसे को शरारतपूर्ण तरीके से हमारे धर्म के इतिहास मे घुसा कर सर्टेफिकेशान की कोशिश करेगा तो उसे इतिहास पढ़ाना तो जिम्मेदारी है ही.

    Reply
  • March 10, 2015 at 12:47 pm
    Permalink

    तो चलिए शरद जी, आप ही बताइए की उनको कौनसी भाषा मे समझाना है. लात-घूँसो की, बंदूक की, गाली-गलौच की. आप सब कुछ करके देख लीजिए.
    अब दूसरा पहलू वासी, चिश्ती, हन्नान ज़्यादा हैं तो चलो आपकी नज़र मे सिकंदर, अफ़ज़ल जैसे लोग कम हैं, तो अब आप इनकी संख्या बढ़ाना चाहते हैं, तो ये सोचिए की मैं, अफ़ज़ल या हयात साहब क्या लात-घूँसो या गाली गलौच से आज इस सोच के हुए हैं. आप अफ़ज़ल, सिकंदर जैसे उदारवादियों का उदाहरण लें, या तसलीमा, रुश्ड़ीयों वाले इस्लाम को गलियाने वालो का, या मेरे और जावेद अख़्तर जैसे एक्स मुस्लिमो का एक भी व्यक्ति की सोच ताक़त के बल पे नही बदली. और ना ही इन तमाम तरह के लोगो मे कोई भी मुस्लिमो से नफ़रत करता है.
    आप की नज़र मे क्या समाधान है, और उस तरीके से एक भी व्यक्ति को आप सही रास्ते पे लाए हो, ये आप ही जानते होंगे, जबकि दूसरे रास्ते मे हज़ारो उदाहरण हैं.
    आप व्यावहारिक तरीके की बात कर रहे हैं तो मैं भी उसी की बात कर रहा हूँ. आप मुझे व्यावहारिक तरीका ही बताइए.

    Reply
  • March 10, 2015 at 1:06 pm
    Permalink

    मैने समीर का लेख पढ़ा. हालाँकि यह बेहद सतही था, लेकिन इसमे मुझे नफ़रत की बू नही आई. उसने बात कटाक्ष के लहजे मे की, और उसका निशाना इस्लाम और क़ुरान थी. किसी किताब या विचार पे सवाल नफ़रत नही. हालाँकि जब उस ब्लॉग्स मे समीर ने जवाब दिया तो उसे अपनी बात के पक्ष मे उस किताब के अंश रखने चाहिए थे, जिसपे उसने कटाक्ष किया, तब तो जाकर बहस एक सार्थक रूप मे पहुँचती. खैर, लेकिन आप तो जनाब, मुस्लिम समुदाय से ही नफ़रत कर रहे हैं.

    मुस्लिम समुदाय मे कितने लोग, उन किताबो को पढ़ते हैं, पढ़ते हैं तो उनकी व्याख्या क्या होती है, कई चीज़े हैं. कई परते हैं. इंसानो से नफ़रत, और किताब से नापसंदी दो अलग बाते हैं.

    Reply
  • March 10, 2015 at 1:48 pm
    Permalink

    जाकिर साहब, तरीका तो एक ही है और वही कारगर साबित होता आया है और होता रहेगा वो ये कि जब भी गलत होते देखे तुरंत पहली बार मे ही टोक दीजिये, गलत बात को समय रहते नही टोकने पर जल्द ही वो ऐसी बीमारी बन जायेगी जिसका इलाज काफी मुश्किल होगा, हमने तो अपने जैसे कुछ साथियो की मदद से इसी तरीके से राष्‍ट्रीय स्तर के न्यूज़ चॅनेल नवभारत टाइम्स पर कोशिश की और काफी कट्टरपंथि भी सुधार दिये, इस हद तक कि पहली बात तो उनका धर्मांध लेखन वहा दिखाई ही नही देता और देता भी है तो वे दोनो पक्षो के बारे मे सोच कर लिखते है और जब लेखन दोनो पक्षो के बारे मे सोच कर लिखा जायेगा तो उसमे कट्टरपन होगा ही नही…..आपके पास इससे बेहतर तरीका हो तो अवश्य सामने लाइये !!

    Reply
  • March 10, 2015 at 4:40 pm
    Permalink

    राज साहब, फिल्मी जगत मे लाख बुराइयाँ होगी, लेकिन धार्मिक कट्टरता बिल्कुल नही. एक ऐसा क्षेत्र जहाँ किसी को किसी के धर्म, जाति से लेना देना नही.
    पैसा कमाना है, तो पैसा कमाना क्या बुरी बात है?

    शरद जी, आप बिल्कुल सवाल उठाइए, आप सवाल उठाइए, कट्टरपंथ पे, आतंकवाद पे. अगर इसकी जड़ मे आपको कोई किताब या धार्मिक मान्यता नज़र आती है, उसपे भी सवाल उठाइए. लेकिन दुनिया को सिर्फ़ हिंदू या मुस्लिम नज़रिए से देखेंगे तो इस नज़र से देखने वालो से ही चर्चा हो पाएगी. मेरा जैसा व्यक्ति जो ना हिंदू है ना मुसलमान, उसके लिए ये दुनिया भी हिंदू, मुसलमान जैसी नही है. आप पूरे हिंदुओं को एक पक्ष, और मुस्लिमो को एक पक्ष रख कर ही, हर बात कर रहे हैं तो गहराई मे जा ही नही पाएँगे, सतह पे ही रहेंगे.
    जहाँ तक मेरी बात है, अगर आप किसी समस्या के मूल मे किसी भी सोच या किताब को तर्को के साथ पेश करने की कोशिश करेंगे तो चर्चा मे मैं सक्रिय रहूँगा, बाकी किसी इस्लाम या हिंदुत्व के ब्रांड को बेहतर या कमतर सिद्ध करने की कोशिश मे मेरी कोई दिलचस्पी नही.

    Reply
    • March 10, 2015 at 5:20 pm
      Permalink

      माननेीय श्रेी जाकिर जेी, जब फिल्म वाले अधिकतर मजहबेी हेी नहेी है, तब वह कत्तर भेी कैसे हो सक्ते है /

      Reply
    • March 10, 2015 at 7:18 pm
      Permalink

      जाकिर साहब, जो आपने हमारे बारे मे कहा सर माथे पर और हम ऐसा बिल्कुल नही चाहेंगे की आप हमारे ही नही कभी किसी के बारे मे उसे खुश या नाराज करने की सोच कर अपने विचार बदले क्योकि फिर आप मुद्दे के प्रति ईमानदार नही रह पायेंगे !!

      आपकी बात बिल्कुल सही है कि हम अक्सर इस्लाम या मुसलमान शब्द का इस्तेमाल करते है मगर शायद आप हमारे कॉमेंट्स पढने मे थोड़ी जल्दबाजी कर जाते है क्योकि वे शब्द हम तब इस्तेमाल करते है जब सामने वाला बिना वजह वेद-पुराण, हमारे धार्मिक और सामाजिक मामलो पर निशाना साध रहा हो और “उसको जवाब देते समय भी” हम हमेशा बाकी मुस्लिम पाठको को बाकायदा लिख कर बोलते है कि यह कॉमेंट उनके लिये नही है….हमारे.पूरे धर्म (सनातन) पर सवाल उठाने वाले मुस्लिम को उसके पूरे धर्म (इस्लाम् से संबोधित करके ही जवाब दिया जा सकता है, कट्टर और उदार की बात तब आती है जब डिस्कसन दोनो से हो रहा है, सामने अगर सिर्फ कट्टरपंथि ही नज़र आयेगा तो बात वही की जायेगी जो उस की आसानी से समझ मे आ जाये.

      आपने इस साइट पर हमारे कई कॉमेंट पढ़े है और आपको लगता है कि हम आंख बंद कर के सिर्फ मुस्लिम बिरोध मे लिखते है, यहा हम अपना पक्ष रखते हुए आपसे गुजारिश करते है कि सिर्फ एक कॉमेंट (फकत एक) का रेफरेंस दे दीजिये जिसमे हमने अफ़ज़ल ख़ान, आपको, हयात भाई और वासी साहब, चिश्ती साहब और हन्नान साहब को एक तराजू मे तोला हो ….सिर्फ इसलिये कि आप सब मुसलमान हो ?? हमे नही लगता हमने कभी ऐसा किया होगा इसलिये अपनी उस गलती को देखने अवश्य चाहेंगे !! हम मुद्दा डिस्कस करते है इंसान नही और हयात भाई और राज भाई तक की जिन बातो पर हमारी सहमति नही होती हम खुल कर जाहिर करते है, हिन्दू-मुसलमान की बात दिमाग मे होती तो इस साइट पर तो आते ही नही क्योकि इस विषय पर नवभारत की साइट पर कई काफी लंबे-2 डिस्कसन करने के बाद “उसेी विशय पर” उसके मुकाबले काफी कम पाठक सांख्या वाली इस साइट पर आने की कोई एक भी वजह नही है सिवाय इसके कि इस साईत् से हयात भाई और अफ़ज़ल साहब जैसे इंसान जुड़े हुए है !!

      Reply
  • March 10, 2015 at 5:22 pm
    Permalink

    इस चर्चा मे एक बात निकल के आई की जब भी किसी नास्तिक व्यक्ति के द्वारा विचार रखे जाते हैं तो यह कहा जाता है की उसे फंडिंग हो रही है.
    मैं नास्तिक नही, लेकिन हम ये क्यूँ नही मानते की नास्तिकता भी किसी के मन मे उतनी ही स्वाभाविक हो सकती है, जितनी आस्था. तसलीमा और रुश्दी के लिए पश्चिम से मिले सम्मानो की बात हुई तो यह भी देखिए की कितने ऐसे लोगो ने अपनी जान भी गँवाई? राजिब हैदर, अविजित रॉय ने क्या पैसो के लालच मे लिखा था? पाकिस्तान के एक डॉक्टर यूनुस शेख को अपनी जान बचाने के लिए पाकिस्तान छोड़ना पड़ा, उससे पहले वो एक आम डॉक्टर ही था. भगत सिंह, जो आर्य समाजी परिवार मे पैदा हुआ, और घंटो वेदो के श्लोक बोलता था, अपने अंतिम दिनो मे जब नास्तिक बना तो उसे कहीं से पैसा नही मिला. हम एक खुले दिल से चर्चा करें, जहाँ हर प्रकार के विचारो को शांतिपूर्वक और अहिंसक तरीके से बताने की छूट हो.
    नास्तीको या नास्तिकता को हेय या विदेशी चंदे पे पलने वाली मानसिकता करार देना भी तो वो ही मानसिकता हुई, जो कट्टरपंथी दूसरी आस्थाओ के लिए सोचते हैं? मेरी नज़र मे नस्तिक वर्ग, एक बहुलातावादी समाज का एक आवश्यक अंग है, इस वर्ग को अपनी राय रखने की आज़ादी उतनी ही ज़रूरी है, जितनी किसी और विचार या आस्था को प्रकट करने की.
    नास्तिकता, अव्यवहारिक है, सिर्फ़ इस वजह से तो हम उसका दमन नही कर सकते?

    Reply
  • March 10, 2015 at 9:58 pm
    Permalink

    अल्लाह का घर हैं या हैं कोई दूकान
    बिक रहा फिरका फिरका रोज मुसलमान
    .
    ये जहरीली तकरीरे, ये नफरतो के नारे
    घर घर को बना देंगे उजडा हुआ कब्रिस्तान
    .
    दीन के फ़राइज़ पे तो कोई जोर नहीं हैं
    फिरको के अमल पे मचा रखी हैं घमासान
    .
    क्या नहीं देखते तुम हश्र इस फिरकापरस्ती का
    ये सीरिया, ये इराक, ये अफगानों पाकिस्तान
    .
    हैरान हूँ के वही लोग फिरको में बंट गए
    जिनका एक खुदा, एक रसूल एक हैं कुरआन

    Reply
  • March 11, 2015 at 12:43 pm
    Permalink

    एक ईश्वर, एक पैगंबर और एक किताब का कितना भी हवाला क्यूँ नही दिया जाए. सारे मुसलमान, कभी भी एक जैसी सोच रखने वाले नही होंगे. समय बदलता है तो कई मान्यताओ के साथ जीना मुश्किल हो जाता है. उसके लिए धार्मिक ग्रंथो की सुविधनुसार व्याख्या करने का लोग प्रयास करते हैं, नतीजा विभिन्न फिरके. लेकिन ये फिरके तो और भी समुदायो मे हैं, लेकिन और समुदायो मे इतनी मारकाट अब क्यूँ नही, जबकि मुस्लिम समुदाय मे ये मारकाट वक्त के साथ बढ़ती जा रही है.

    इसका कारण है की कुछ मुसलमान, इस्लाम के ठेकेदार बन बैठे है, इस्लाम की रक्षा करने का बीड़ा उठा रखा है. अब देखिए, इस्लाम की आलोचना पे या इस्लाम छोड़ने पे अगर कत्ल कर देना का रिवाज हो तो, मुनाफिक बढ़ेंगे ही.

    हसन निसार के लफ़जो मे “बंदूक के बल पे सिर्फ़ मुनाफिक बनते हैं, मोमिन नही”. जब राजिब हैदर जैसे लोगो की जो इस्लाम मे विश्वास नही करते, की हत्या की जाएगी, या आसिफ़ मौईद्दिन जैसे नास्तिक पे जानलेवा हमला होगा, तो इस्लाम मे यकीन नही करने वाला, मुस्लिम घर मे पैदा हुआ व्यक्ति मुसलमान बनेगा. इस्लाम की वैसी व्याख्या करेगा, जिसमे उसे सुविधा हो, फिर वो एक अलग फिरके की शक्ल ले लेगा, और फिर कुछ इस्लाम की हिफ़ाज़त करने वाले उनके खिलाफ जहर उगलने लगेंगे.
    जब इतना उन्माद, इस्लाम के खिलाफ लिखने या बोलने मे है तो कौन मुसलमान है कौन नही, पता ही नही किया जा सकता.

    फिर तो वोही होगा की
    “कौन किसे मार दे, काफ़िर कह के,
    सारा का सारा शहर, मुसलमान हुआ फिरता है”

    Reply
    • March 11, 2015 at 2:23 pm
      Permalink

      विश्य कोइ भेी क्यो न हो अपनेी बुद्धि से सोच्ने केी जरुरत हमेशा रहेगेी !
      आप जैसे विचारो वाले मुस्लिमो कि भारेी सन्ख्या मे जरुरत भेी है !
      एक ईशवर तो चल सक्ता है लेकिन एक कल्पित पैगम्बर एक कल्पित किताब केी बाते हर्गिज नहि चल सक्तेी है क्योकि परिवर्तन हर पल होता रहता है !
      मुस्लिम परिवार मे जन्म् लेने वाले , खुलि बुद्धि से काम लेने वाले, सिर्फ् मानवता को उच्ह्ता देने वालो कि सख्त जरुरत भेी है !
      जब अरबेी नामवाला व्यक्ति खुलेी बात कहेगा तब बहुत से मुस्लिमो को नया रास्ता चुनने का साहस भेी दिखने लगेगा ! आज उदार मुस्लिमो मे साहस जगाने कि अतय्न्त आवश्य्कता भि है !आप्ने इस्केी हिम्मत् दिख्लाई इस्लिये आप्को हार्दिक बधाई ! अपनेी जान कत्तर्पन्थियो से जरुर बचऐयेगा

      Reply
  • March 11, 2015 at 1:17 pm
    Permalink

    मुस्लिम समुदाय मे ये मारकाट वक्त के साथ बढ़ती जा रही है.इस बारे मे विचार मुस्लिम करे तो बेहतर होगा लेकिन और समुदायो मे इतनी मारकाट अब क्यूँ नही की वजह ये है कि वे समय-2 पर वक़्त के हिसाब से जरूरी बदलाव करते रहे है जैसे शुरुआती ईसाई कट्टरपंथियो ने विग्यान को हमेशा ठोकर पर रखने की कोशिश की मगर धर्म और विग्यान को अलग कर वे आज दोनो ही मोर्चो पर सफल है !!….कमिया तो हिन्दुओ मे भी बहुत थी जिनमे से काफी को दूर भी किया गया है जैसे सती-प्रथा खत्म, विधवा-विवाह स्वीकार्य, बॉल-विवाह पर कानून बना कर रोक….इसी कड़ी मे दहेज-प्रथा और जातिवाद मे भी पहले के मुकाबले काफी कमी आई है और लगातार हालात पहले से बेहतर हो रहे है (अभी भी सुधार की काफी गुंजाइश है ).

    Reply
  • March 12, 2015 at 9:50 am
    Permalink

    जकिरनायको और भारत और दुनिया में तरह तरह के बाबाओ की कामयाबी का राज़ ये हे ”जैसा की इस रिपोर्ट में बताया गया हे की कटटरपन्ति लोगो में ” खास ” होने की भावना भरते हे आधुनिकता पूंजीवाद शहरीकरण टेक्नोलॉजी की अधिकता ने आम आदमी से बहुत कुछ छिना भी हे खासकर बड़े सफल और कामयाब लोगो की मिडिया ऐसे बमबारी करता हे की आम आदमी खुद को बिलकुल महत्वहीन फ़ालतू पाता हे इसी का फायदा तरह तरह के बाबा और कटटरपन्ति उठा रहे हे ये अपने मानने वालो में एक खास होने की भावना जमाते हे जिससे आम आदमी को अपने झंड हो रहे जीवन का कोई मकसद नज़र आने लगता हे http://WWW.BBC.CO.UK/HINDI/INTERNATIONAL/2014/11/141120_FRENCH_NATIONALS_JOIN_IS_SR
    रिप्लाई ” शोषणकारी ताकते और निजाम अंदर ही अंदर इन बाबाओ से बहुत खुश होती हे और डायरेक्टली इन डायरेक्टली इन्हे पुरुस्कृत करती रहती हे

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *