खांसी, मफलर और स्टिंग

kejriwal

ये खांसी भी कितनी अजीब होती है न! जिसे फल जाये उसे ऊपर उठा देती है और जिसे न फले उसे ऊपर ही उठा देती है! मुझे भी हुई थी स्कूल के ज़माने में! वैसे तो बीमार होना स्कूली दिनों में वरदान की तरह माना जाता है की चलो अब कुछ दिनों तक स्कूल जाने से छुटकारा तो मिला! परन्तु खांसी एक ऐसी बीमारी होती है की बीमार भी हो जाओ और छुट्टी भी ना कर पाओ! उस समय नेचुरोपैथी नहीं हुआ करती थी ना! लोग वैसे भी नेचुरल ही होते थे! जो होते वही दिखते भी थे! जो ईमानदार होता था वो ईमानदार होता था, उसे किसी को बताने या बनाने की ज़रुरत नहीं होती थी! हाँ तो हम बात कर रहे थे नेचुरोपैथी की, सॉरी खांसी की! ये भूलने की आदत भी ना! चलिए कम से कम अपने बच्चों की कसम खा के ६०० पन्नो का सुबूत तो नहीं भूला! फिर भी भूलना भूलना होता है! हम भूल गए रे हर बात मगर तेरा प्यार (४९ दिनों का) नहीं भूले, तभी तो दुबारा पटाने को चले थे! अब ये तो हमारी बदकिस्मती थी (चुनावों के बाद खुशकिस्मती) की पटा नहीं पाये! इस पटाने के चक्कर में अपना स्टिंग भी करा आये! देखिये मैं फिर पॉइंट से भटक गया! अब हम और आप को तो भटकना शोभा नहीं देता ना, भले कुछ आम आदमी भटक जाएँ! अब भटक जाएँ तो भटक जाएँ, बाद में सेक्युलर और नॉनसेक्युलर वाले तो हैं ना उन्हें अपने रस्ते पर लाने के लिए!

हाँ तो खांसी भी आम आदमी को कितना ऊपर उठा देती है वो तो आने वाले वर्षों में एक शोध का विषय बन ही जायेगा, क्योंकि अभी तक हम यही जानते थे की ज्यादा दिनों की खांसी आम आदमी को सीधे ऊपर तक उठा सकती है! इसके कई विज्ञापन भी आते रहे हैं रेडिओ पर स्वाथ्य एवम जान कल्याण मंत्रालय द्वारा जनहित में जारी! अब तो मन की बात ही आते हैं!

अब रही बात मफलर की तो बचपन में जब खांसी आती थी तो माँ कान से लेकर गले तक मफलर लपेट देती थी जिस से ठंढ ना लगे और खांसी ना बढे! असर भी होता था, खांसी काम हो जाती थी! पर वो हो सकता है बचपन के कारण हो जाया करता होगा, अब तो ना होती! आपने भी देखा है! बल्कि अब तो खांसी और मफलर का साथ सात जन्मो का हो गया है!

खांसी का इलाज़ हो गया और मफलर का मौसम ख़त्म हो गया! लेकिन ये अच्छा नहीं हुआ जी! इधर ये कॉम्बिनेशन टुटा, उधर अंदर खाने की टूट-फुट सड़क पर आ गयी! मतलब खांसी किसी किसी के लिए लकी भी होता है! अब चाहे तो आपलोग इस शोध के लिए मेरा नाम भारत रत्न के लिए प्रस्तावित कर सकते हैं! जब हमारी पार्टी की सरकार बनेगी तो मुझे मिल जाएगी वरना मरणोपरांत तो मिलती नहीं! मेजर ध्यानचंद को भी नहीं मिली! लेकिन कल को अगर खांसी राष्ट्रीय बीमारी और मफलर राष्ट्रीय पोशाक बन जाये तो कोई ताज्जुब की बात नहीं होगी! खांसी को लेकर तो कोई किन्तु परन्तु नहीं है, लेकिन मफलर को नाम लिखे सूट से टक्कर जरूर मिल सकती है! या फिर ऐसा भी हो सकता है की ६ महीने मफलर और ६ महीने सूट राष्ट्रीय पोशाक बना रहे या फिर ऐसा भी हो सकता है की एक राष्ट्रीय पोशाक तो दूसरा राष्ट्रीय उप-पोशाक घोषित हो जाये कश्मीर में हुए गठबंधन की तरह! लेकिन जो भी हो मसरत तो लगेगा ही! ओफ़्फ़, भूल सुधर कर ‘मसरत’ को ‘मशक्कत’ पढ़ें!

वैसे जी किसी गर्ग मुनि ने ये बुरा किया की बंदा खांस रहा हो और आप पानी देने के बजाये उसकी रिकॉर्डिंग कर लो! कर लिया तो कर लिया उसे लोगों को सुना भी दो! वैसे लोगो ने क्या पता चलना था खांसी की ही तो आवाज आनी थी पर बेड़ा गर्क हो आधुनिक टेक्नोलॉजी का की खांसी के साथ साथ छोड़े हुए दिलवर से दुबारा इलू इलू करने वाली बात भी रिकॉर्ड हो गयी! गर्ग मुनि को भी तब पता चला जब उन्होंने bass कम कर के और treble बढ़ा के उस रिकॉर्डिंग को वॉइस क्लारिटी मोड पर सुना! अब करें भी तो क्या करें, कमान से निकला हुआ तीर और जुबान से निकली हुई बात वापस तो हो नहीं सकती! उस में संसोधन भी नहीं हो सकता, हाँ बाद में उसे ये बताया जा सकता है की हमने किसी और परिप्रेक्ष्य में कहा था और लोगों ने कुछ और समझा!

अब देखना ये है की हमारे इस व्यंग्य लेखन को किस परिप्रेक्ष्य में समझा जाता है!

(Visited 12 times, 1 visits today)

19 thoughts on “खांसी, मफलर और स्टिंग

  • March 15, 2015 at 4:39 pm
    Permalink

    तेज़ साहब आपका इस साइट पर बहुत बहुत स्वागत हे शायद ये आपका पहला व्यंगय हे मुबारकबाद

    Reply
    • March 15, 2015 at 5:31 pm
      Permalink

      धन्यवाद सिकंदर भाई I

      Reply
  • March 15, 2015 at 4:52 pm
    Permalink

    अन-नेचुरल राजनीतिक हालातो को नेचुरल तरीके से निपटने मे नेचुरोपैथी से बढिया कोई हथियार नही है:)

    Reply
    • March 17, 2015 at 11:46 am
      Permalink

      शरद भाई देखना ये है की अब जो हालत उत्पन्न हुए हैं उसे किस पैथी से निपटा जाता है!

      Reply
      • March 17, 2015 at 3:17 pm
        Permalink

        “आप” पार्टी का लोकतंत्र , लोकतंत्र से तानाशाही मे बदल गया है और जिसने भी पार्टी के “अमर अकबर अन्थोनी (अरविन्द, आशीष, आशुतोष) के खिलाफ तो छोड़िये उनकी किसी एक भी बात से असहमति दिखाई उसे पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया ??

        वैसे तो साहेब बोलते नही थकते कि दिल्ली की सरकार और मुख्यमंत्री “आप” नही बल्कि जनता है:) अगर दिल्ली की जनता ही सरकार है तो क्या उससे पार्टी की उठापटक पर राय नही लेनी चाहिये थी ??

        सुनते है कि दिल्ली मे फ्री वाई-फाइ पर जनता की “राय” चाहिये जिसमे 10 सवाल पूछे गये है !! क्या चुनावो से पहले फ्री वाई-फाइ का वादा करते समय जनता की राय मांगी गयी थी??………वैसे बता दे कि यू पी जैसे बीमारु राज्य की राजधानी लखनऊ तक के रेलवे स्टेशन पर आधे घंटे के लिये फ्री वाई-फाइ की सेवा शुरु भी हो चुकी है और दिल्ली जैसे विकसित राज्य मे ये जनाब अपने वादे पूरे करने की बजाय हर बात मे जनता जनता कह कर जनता की आंखो मे धूल ही झोकते रहेंगे ?? नौटंकीबाज “आम आदमी पार्टी” ??…..मुफ्त के वादे मुफ्त की राय 🙂

        Reply
        • March 17, 2015 at 5:43 pm
          Permalink

          One of my comment on IBN Khabar

          इस स्टिंग में कितनी सच्चाई ही ये बहस का मुद्दा तो है ही! लेकिन इस की सच्चाई पर बहस कर हम असल मुद्दे से भटक तो नहीं रहे!
          मुख्य मुद्दा तो ये है की बीजेपी और कांग्रेस पर जोर तोर कर के सरकार बनाने का आरोप लगाने वाले आम आदमी पार्टी की ऐसी कौन सी मज़बूरी थी की उसे वैसा ही करना पड़ा!
          अब इसे तो झुठलाया नहीं जा सकता की ऐसी कोशिश हुई तो थी ही!
          अगर आम आदमी पार्टी अपने आप को आम आदमी की पार्टी बताती है और पूरी तरह से पारदर्शी और ईमानदार होने का दावा करती है तो मीटिंग्स बंद कमरे में क्यों होते हैं.?
          और जब मीटिंग में क्या हुआ और कैसे हुआ इस पर सवाल उठाये जा रहे हैं तो पार्टी मिनट्स ऑफ़ मीटिंग को रिलीज़ क्यों नहीं कर रही.?
          किस बात का डर है.?

          Reply
  • March 15, 2015 at 6:11 pm
    Permalink

    बिल्कुल सही सटीक टिप्पणी आप और केजरीवाल . एक अच्छे बयंग के लिये मुबारकबाद ! देखिये मफलर भी हट गया और और खांसी भी खत्म हो गयी है . मगर आप पार्टी की खांसी बड गयी है.

    Reply
    • March 17, 2015 at 11:47 am
      Permalink

      धन्यवाद रमेश जी, इस राजनितिक खांसी की किस नेचुरोपैथी में इलाज़ है इस पर अभी केजरीवाल जी शोध कर रहे होंगे!

      Reply
  • March 15, 2015 at 7:04 pm
    Permalink

    तेज प्रताप जी आप का खबर की खबर मे स्वागत है. पाठक तो आप पहले से है लेकिन लेखक के तौर पे आप का स्वागत है . आप की पहली ब्यंग्य रचना के लिये मुबारकबाद .

    Reply
    • March 16, 2015 at 11:37 am
      Permalink

      आपका बहुत बहुत धन्यवाद अफजल सर,
      आपने इस आर्टिकल को छापने का अवसर दिया!
      मैं आपके इस साइट का नियमित पाठक रहा हूँ और मुझे लिखने की प्रेरणा यहीं से मिली!
      सच कहें तो आपको लिख भेजते समय ऐसा लगा की ये प्रकाशित हो जायेगा! नए लेखकों को प्रोत्साहित करने का ये एक अच्छा उदाहरण है!

      Reply
  • March 16, 2015 at 1:27 am
    Permalink

    तेज प्रताप जी स्वागत ! आपकी तेजस्वी खांसी के सुनहरे बलगम ने तो रायता फैला दिया ! वैसे व्यंग्य का काम कड़वी से कड़वी दवाई को बड़े बेमालूम तरीके से गले से निचे उतारना होता है ! ‘आप’ की अंदरूनी बेआवाज खांसी अब प्रतिध्वनियों के साथ सुनाई देने लगी है ! उन अनेको प्रतिध्वनियों में आम आदमी की राजनीति में उतरने की जगी हिम्मत फिर से न खो जाए और राजनीति फिर से कुछ गिने चुने नेताओं की बेवा बन के न रह जाए बस यही डर है !

    Reply
    • March 16, 2015 at 11:40 am
      Permalink

      सचिन जी आपका धन्यवाद प्रोत्साहन के लिए!

      हमने आम आदमी को तो राजनीती में आते जरूर देखा है पर राजनीती में आ कर उसे आम रहते शायद ही किसी को देखा है!
      अपवाद स्वरुप कुछ लोग भले ही मिल जाएँ, लेकिन वो भी गिने चुने ही हैं!
      अब आप केजरीवाल जी को ही ले लीजिये! इनसे बड़ा आम आदमी तो कोई हो ही नहीं सकता, परन्तु अब ये आम नहीं रह गए!
      आम आदमी इतनी महँगी नेचुरोपैथी अफ़्फोर्ड नहीं कर सकता वो भी दिल्ली से बैंगलोर जा कर! आम आदमी तो corex benedril जैसे कफसिरप और दो चार एंटीबायोटिक दवाओं के भरोसे ही खांसी से निजात पा लेता है!
      एक आम आदमी और उनके माता-पिता के लिए बैंगलोर के नेचुरोपैथी संस्थान ने सभी सुविधाओं से युक्त चार कमरों का कॉटेज बुक किया है। केजरीवाल और उनके परिवार पर रोजाना खर्च करीब 25,000-30,000 रुपए है! क्या हम या आप इसे अफ़्फोर्ड कर सकते हैं.? नहीं!

      Reply
      • March 16, 2015 at 1:14 pm
        Permalink

        केजरीवाल की कामयाबी का राज़ हे उनकी वाइफ का भी अच्छी सरकारी नौकरी में होना सरकारी नौकरी का मतलब हे की रोटी कपडा मकान की कम से कम गारंटी भला ही कुछ भी हो जाए अगर सुनीता जी की अच्छी जॉब ना होती तो केजरीवाल कभी खुद नौकरी छोड़ कर समाजसेवा में उतरने का सहस नहीं कर पाते . क्या करे भारत में हालात इतने ख़राब हो चुके हे की सही मायने में आम आदमी आगे बढ़ ही नहीं सकता हे जिन्हे आम आदमी की कामयाबी हम कहते हे ये भी वो आम आदमी होते हे जिन्हे कुछ एडवांटेज मिले होते हे जैसे घर में किसी की भी किसी भी सरकारी नौकरी होना या बेहद छोटी फेमली होना या फिर गाव या शहर में ठीक ठीक जमीं और जायदाद होना तब ही आम आदमी आगे बढ़ पाता हे हर चीज़ के अपवाद होते हे मगर ये ऐसी कड़वी सच्चाई हे जिसका कोई अपवाद भी ना मिलेगा जैसे नवाज़ुद्दीन सिद्द्की अपनी कामयाबी को एक बिलकुल आम आदमी की कामयाबी बताते हे लेकिन ये हमारे मुज्जफरनगर के ही हे जितना मुझे पता चला हे की अच्छी खासी जमींदार फेमली से हे http://mohallalive.com/2012/06/19/nawazuddin-siddiqui-mumbai-via-delhi/

        Reply
        • March 16, 2015 at 1:15 pm
          Permalink

          सिकंदर हयात
          June 19, 2012 at 4:46 pm

          खोने के लिए कुछ नहीं था – मतलब शायद ये हे की इस बात की चिंता नहीं थी की बुरी तरह से नाकामयाब हो जाते तो ऐसा नहीं था की पीछे माँ बिना इलाज के — जाती, बाप खासते -खासते एक दिन — बहने बिना शादी के रह जाती छोटा भाई आवारा और नशेडी हो जाता . यानि नवाज़ की बेक ठीकठाक मज़बूत थी. यही तो बात हे की भारत में हालत इतने कठिन होते जा रहे की सही मायनो में आम आदमी कामयाब हो ही नहीं सकता सच तो ये हे की जिन्हें आम आदमी की कामयाबी कहा जाता हे वो भी वही आमआदमी होते हे जिनकी पीछे ठीक ठाक सपोर्ट होता हे जेसा उनके यहाँ किसी की भी- माँ बाप भाई बहिन की सरकारीनौकरी होना – जिस फिल्ड में संगेर्ष कर रहे हो हो उसमे किसी परिचित का पहले से मौजूद होना जो कुछ राह सुझा सके , एक gendar के बच्चो की ही छोटी फेमली होना – शहर या गाव में ठीक ठाक जमींन जायदाद होना – जाहिर हे ये सब ना हो तो कोई कितना भी पतिभाशाली आम आदमी क्यों ना हो वो कामयाब हो ही नहीं सकता इस बात का आपको कही कोई अपवाद भी ना मिलेगा भारत में हालत इतने बदतर हो चुके कामयाबी का सपना देखने से पहले हर आम आदमी को ये सच्चाई अच्छे से समझ ही लेनी चाहिए

          Reply
          • March 16, 2015 at 2:42 pm
            Permalink

            आप से पूरी तरह सहमत हूँ सिकंदर भाई! जब भी एक सचमुच का आम आदमी कुछ करना चाहता है तो उसे सबसे पहले ये सोचना पड़ता है की अगर फेल हुए तो उन लोगो का क्या होगा जो हमारे ऊपर आश्रित हैं! फिर जो करने जा रहे हैं उस का संसाधन कहाँ से जुटाया जाये! क्योंकि, जितनी आमदनी है वो तो पारिवारिक जरूरतों को ही पूरा करने में खर्च हो जाता है!
            अब आप आम आदमी पार्टी को ही ले लीजिये, इस में से कौन ऐसे नेता हैं जो सचमुच में आम आदमी है, कोई भी नहीं होगा! सब अपने अपने क्षेत्र में स्थापित लोग ही थे, जिनके पास इतने संसाधन थे की वो रिस्क ले सकते थे अपने परिवार की ज़रूरतों को ताक पर रखे बिना!

  • March 16, 2015 at 5:48 pm
    Permalink

    मोदी जी भी इसके अपवाद कतई भी नहीं हे उनकी कामयाबी आम आदमी की कामयाबी नहीं हे उनका परिवार बड़ा था सरकारी नौकरी जमीं जायदाद नहीं थी मोदी जी महत्वाकांक्षी थे कामयाब होने के लिए ही वो शायद परिवार और पत्नी को छोड़कर खिसक लिए फिर कभी परिवार के साथ नहीं रहे क्योकि बड़े गैरसिक्योर परिवार का तनाव थका और पका देता मोदी जी घर से निकल लिए मोदी मुक्क़दर के सिकंदर निकले उन्हें आर अस अस के बड़े और कुंवारे नेता ईमानदार साहब की छत्रछाया मिल गयी और वो उन्हें पुत्र की तरह ट्रीटमेंट देने लगे यानि एक तरह से परिवार और बड़े की साये की सुरक्षा भी और परिवार की जिम्मेदारियों का कोई भी तनाव भी नहीं हे तो फिर उनकी छत्रछाया में मोदी जी आगे बड़े यही उनकी कामयाबी का राज़ हे परिवार के साथ रहते तो माँ बाप बीवी बच्चे हारी बीमारी इसकी शादी उसकी चिंता ये वो में आगे बड़ नहीं पाते मोदी जी चतुर थे इसलिए उन्होंने दोनों परिवार ( माँ बाप भाई बहन – और बीवी ) को त्याग दिया मोदी जी अगर परिवार के साथ ही रहते तो चाहे जीयन भी काबिल होते मगर आज सिर्फ ज़्यादा से ज़्यादा से ज़्यादा गुजरात के सांसद या विधायक ही होते

    Reply
    • March 17, 2015 at 11:48 am
      Permalink

      सिकंदर भाई एक बार फिर मेरी पूर्ण सहमति है! अगर कोई ईमानदार व्यक्ति राजनीती में आता है और इतने ऊपर तक जाता है तो इसका मतलब है की उस के ऊपर किसी न किसी का हाथ जरूर था!
      वरना तो आजकल बेईमानी राजनीती की सीढ़ी बन चुकी है!

      Reply
  • March 17, 2015 at 8:14 am
    Permalink

    बधाई हो तेजस भाई इस बढ़िया व्यंग के लिए | केजरीवाल जी की साधारण खांसी तो नचुरोपैथी से दूर हो गयी होगी शायद , पर आप की कुक्कुर खांसी का क्या इलाज करेंगे वो | लेकिन सच बात ये है की आप को मीडिया मे बने रहने की कला का ज्ञान है | मई से लेकर अक्तूबर तक आप रहस्यलोक मे थी पर अक्तूबर से लेकर अब तक सुर्खियों मे हैं | पहले चुनाव और नतीजो को लेकर अब आपसी जूतम पैजार को लेकर | अरविंद को भी चाटुकार अत्यंत पसंद हैं | जिनमे एक भांड भी शामिल है जो मोदी जी के चरण चुंबन भी कर चुका है , एक बिका हुआ फ़ेल पत्रकार और चार पाँच पंडोहियों की टीम है जिसने आप के पहले बसंत मे ही उसे मुरझवाने का इतेजाम कर लिया है |

    Reply
    • March 17, 2015 at 11:45 am
      Permalink

      हर्ष भाई धन्यवाद सराहना के लिए!
      सच कहा जाये तो ऐसी ही उम्मीद थी जब से अरविन्द केजरीवाल अन्ना हज़ारे से अलग हुए और उनके आंदोलन का भट्ठा बैठा दिया! फिर भी एक उम्मीद तो थी ही, क्योंकि केजरीवाल जी परंपरागत राजनीती की उपज न होकर एक जनचेतना क्रांति की देन थे! लेकिन जी तरह से उन्होंने पाना कुनबा बढ़ने के लिए खुद ही ईमानदारी का सर्टिफिकेट दे दे कर भर्तियां करनी शुरू की आप का पतन शुरू हो गया! जो थोड़ी बहुत उम्मीद बची हुई थी की पूर्ण बहुमत पाने के बाद शायद कुछ अच्छा हो वो भी इस स्टिंग एपीसोड से जाती सी रही!
      अब देखना है की केजरीवाल जी क्या करते हैं अपनी और आप की विश्वसनीयता बहाल करने के लिए!

      Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *