क्या मुसलमान आतंकवाद का एकमात्र पोषक है ?

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पेरिस हमले का क्या मक़सद था उससे किसको और क्या फ़ायदा पहुचेगा ये धीरे धीरे पर्दे से बाहर आएगा । मगर इनबातों पर गौर करना भी जरूरी है …. सिरिया और इराक़ के शरणार्थी सबसे अधिक मुस्लिम देशो मे है और जो पलायन कर यूरोप जा रहे है उनकी तादाद बहुत मामूली है और उपर से यूरोपी के कई देशो ने केवल ईसाइयो को अपने मुल्क मे पनाह देने की घोषणा कर रखी है यानी की आप मुस्लिम है तो आप यूरोप के उन देशो मे पलायन नही कर सकते है लेकिन इसके बावजूद मीडिया के द्वारा प्रपगेंडा फैलाया गया की यूरोपियन देश सिरिया व इराक़ के शरणार्थियो को गले से लगा रहे है और हज़ारो लोग यूरोपियन देशो मे जा कर बस रहे है । अमेरिका और यूरोप के संबंध लगातार खराब हो रहे है अमेरिका की युद्ध पॉलिसी की वजह से क्यूंकी इसमे यूरोपियन देश भी शामिल होते है जिसके कारण एक तो उनकी आर्थिक स्थिति को धक्का पहुँचता है और दूसरे की अब अक्सर यूरोप की जनता लगातार युद्ध मे शामिल होने से उब चुकी है। यूरोपियन देश अब इस्राइल की अंधाधुन मदद के बजाय अब अपनी पुरानी पॉलिसी पे दुबारा गौर कर रहे है और फ़लस्तीन के प्रति उनका झुकाव सॉफ नज़र आ रहा है इसके पहले चार्ली हेब्डो अटैक के समय कई देश जिनमे फ्रांस भी शामिल था फ़लस्तीन को एक आज़ाद मुल्क की हैसियत से तसलीम करने का क़ानून अपनी पार्लियामेंट मे पेश कर रहे थे लेकिन मूसाद द्वारा प्लान किया गया अटैक सफल रहा जिसके बाद किसी भी देश ने पार्लियामेंट मे बिल नही पेश किया इसके अलावा हाल ही के दिनो मे यूरोपियन देश कई बार इस्राइल के द्वारा की जा रही हिंसा की आलोचना की थी और इस हमले के ठीक कुछ दिन पहले यूरोप यूनियन ने एक क़ानून पास किया था की इस्राइल ने 1976 के बाद फ़लस्तीन के जिन इलाक़ो पे क़ब्ज़ा किया है वो वहाँ के प्रोडक्ट नही ख़रीदेंगे । अमेरिका से पूर्व सोवियत यूनियन दुनिया का नेतृत्व करता था लेकिन सोवियत यूनियन के अफ़ग़ानिस्तान मे शिकस्त के बाद टूटने के कारण दुनिया का नेतृत्व अमेरिका के हाथो चला गया जिसे अब तक किसी ने भी चैलेंज नही किया था लेकिन अब हालात बदल रहे है रूस अब दुबारा अमेरिका को न सिर्फ़ टक्कर दे रहा है बल्कि अमेरिका का एक विकल्प भी पेश किया है जो सीरिया युद्ध मे बखूबी देखने मे नज़र आ रहा था लेकिन इस हमले के तुरंत बाद अमेरिका की स्थिति दुबारा से मज़बूत हो गयी है जो ढीली पड़ती नज़र आ रही थी। इसी के तहत एक झींका टूटा कि आज अमेरिका फिर से तनन गया है ॥
तुर्की ने रूस का एक विमान मार गिराया जिसके बाद रूस-तुर्की मे ठन गयी है । अब तभी से तमाम जानने वाले फोन कर के यह बता रहे हैं कि भाई रूस के पक्ष मे लिखिए ? अब इनको क्या समझाऊँ कि..रूसी विमान को मार गिराने पे तुर्की का पक्ष है की रूस का विमान तुर्की की सीमा मे घुस आया था इसलिये मार गिराया जिसपे रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने रूस का पक्ष रखते हुये कहा था की तुर्की ने योजनाबद्ध रूप से उसका विमान मार गिराया था लेकिन अब रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने तुर्की व तुर्की द्वारा विमान गिराय जाने पे प्रतिक्रिया देते हुये रूस और तुर्की के बिगड़ते संबंध की असल वजह ब्यान कर दी है पुतिन का ब्यान है की ”तुर्की द्वारा रूसी विमान गिराना समस्या नही है बल्कि समस्या बहुत गहरी है और वो है की तुर्की की नीतिया इस्लामीकरण है”। अब पुतिन के इस ब्यान को जब उनसे कहता हूँ कि क्या आप सहमत हैं कि तुर्की की इस्लामीकरण की या रूस के द्वारा सिरिया मे बम बरसाय जाने के .?साँप सूंघ जा रहा है अब घंटी बजनी बंद हो गयी !! लेकिन असल बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता ? अरब भूमि के सृष्टि पर राजनीतिक सोच को जेहन मे रखते हुवे समीक्षा करनी होगी ….

जी अब इज़रायली-फिलिस्तीनी संघर्ष जो राजनीतिक विसतारवाद और एकाधिकार का अनसुलझआ मसला, नासूर हो चुका है ।इसके घाव का रिसाव अभी तक जारी है। PLO के नेता यासिर अराफ़ात के बाद कोई ठोस नेतृत्व नहीं मिला और हम्मास को इसे बिल्ली के भाग से झींका टूट गया । अमेरिका मानव वाद कितना भी पाठ पढ़ाये मगर उसकी करनी और कथनी का अंतर समझ मे आने लगा है । पश्चिमी देश यहूदियों से पीछा छुड़ाने के लिए मानव नरसनहार का मौन समर्थन करते रहे हैं । इज़राइल और फिलिस्तिनियों के बीच का एक संघर्ष जो अरब-इजराइल संघर्ष की एक लम्बी कड़ी है। वास्तव में, यह दो समूहों के बिच एक ही क्षेत्र पर किये गए दावे का संघर्ष है। द्वि-राज्य सिद्धांत के लिए यहाँ कई प्रयास किये गए जो भारत मे भी एक वक़्त जिन्ना ने उठाया था ,उसी तरह इजराइल से अलग एक स्वतंत्र फिलिस्तीन राज्य बनाने के लिए कहा गया था। वर्तमान में, इसरायली और फिलिस्तीनियों की बहुमत चाहती है की, द्वि-राज्य सिद्धांत पर इस संघर्ष को ख़त्म कर दिया जाय। कई फिलिस्तीनी हैं जो पश्चिम किनारे और गाज़ा पट्टी को भविष्य का अपना राज्य के रूप में देखते हैं, जिस नजरिये को कई इसरायलीयों ने स्वीकारा भी है। कुछ शिक्षाविद एक-राज्य सिद्धांत की वकालत करते हैं और पुरे इजराइल, गाज़ा पट्टी और पश्चिम किनारे को एक साथ रखकर, दो राष्ट्रीयता को एक साथ रखकर एक राज्य बने जिसमें सब के लिए समान अधिकार हो। यद्यपि, कुछ ऐसे महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं जिनके कारण किसी भी अंतिम निर्णय पर पहुँचने में दोनों पक्ष में असंतोष दिखाई देता है और दोनों पक्षों में एक दुसरे के ऊपर विश्वास का स्तर भी कमजोर है, और यही असली विवाद की जड़ है ॥

असल मसले को समझने के लिए सर्वप्रथम इज़राइल की पृस्ट्भुमी और इसका इतिहास समझना आवश्यक है ।
वस्तुतः इज़राइल संसार के यहूदी धर्मावलंबियों के प्राचीन राष्ट्र का नया रूप है। इज़रायल का नया राष्ट्र 14 मई, सन् 1948 को अस्तित्व में आया। इज़रायल राष्ट्र, प्राचीन फ़िलिस्तीन अथवा पैलेस्टाइन का ही बृहत् भाग है।तब और अब क्यों कैसे ॥ इसके लिए आदिकाल का अवलोकन अति आवश्यक होगा । यहूदियों के धर्मग्रंथ “पुराना अहदनामा” के अनुसार यहूदी जाति , पैगंबर हज़रत अबराहम (इस्लाम में इब्राहिम, ईसाइयत में Abraham) से प्रारम्भ होता है। अबराहम का समय ईसा से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व है। अबराहम के एक बेटे का नाम इसहाक और पोते का नाम याकूब (ईसाईयत में Jacob) था। याकूब का ही दूसरा नाम **इज़रायल** था। याकूब ने यहूदियों की 12 जातियों को मिलाकर एक किया। ये सब जातियाँ अलग अलग क़बीलों मे बनती थी । इन सब जातियों का यह सम्मिलित राष्ट्र इज़रायल के नाम के कारण “इज़रायल” कहलाने लगा। आगे चलकर इबरानी भाषा में इज़रायल का अर्थ हो गया-“ऐसा राष्ट्र जो ईश्वर का प्यारा हो”।
याकूब के एक बेटे का नाम यहूदा अथवा जूदा था। यहूदा के नाम पर ही उसके वंशज यहूदी (जूदा-ज्यूज़) कहलाए और उनका धर्म यहूदी धर्म (जुदाइज्म) कहलाया।
प्रारंभ की शताब्दियों में याकूब के दूसरे बेटों की संतानें इज़रायल या “बनी इज़रायल” के नाम से प्रसिद्ध रही। फ़िलिस्तीन और अरब के उत्तर में याकूब की इन वंशजों की “इज़रयल” और “जूदा” नाम की एक दूसरी से मिली हुई किंतु अलग-अलग दो छोटी-छोटी सल्तनतें थीं। दोनों में शताब्दियों तक गहरी शत्रुता रही। अंत में दोनों मिलकर एक हो गईं। इस सम्मिलन के परिणामस्वरूप देश का नाम **इज़रायल** पड़ा और जाति इनकी थी यहूदी।

एक मत यह भी कि यहूदियों के प्रारंभिक इतिहास का पता अधिकतर उनके धर्मग्रंथें से मिलता है जिनमें मुख्य बाइबिल का वह पूर्वार्ध है जिसे “पुराना अहदनामा” (ओल्ड टेस्टामेंट) कहते हैं। पुराने अहदनामे में तीन ग्रंथ शामिल हैं। सबसे प्रारंभ में “तौरेत” है। तौरेत का शब्दिक अर्थ वही है जो “धर्म” शब्द का है, अर्थात् धारण करने या बाँधनेवाला। दूसरा ग्रंथ “यहूदी पैगंबरों का जीवन चरित” और तीसरा “पवित्र लेख” है। इन तीनों ग्रंथों का संग्रह “पुराना अहदनामा” है। पुराने अहदनामें में 39 खंड या पुस्तकें हैं। इसका रचनाकाल ई.पू. 444 से लेकर ई.पू. 100 के बीच का माना जाता है। पुराने अहदनामे में सृष्टि की रचना, मनुष्य का जन्म, यहूदी जाति का इतिहास, सदाचार के उच्च नियम, धार्मिक कर्मकांड, पौराणिक कथाएँ और यह्वे के प्रति प्रार्थनाएँ शामिल हैं।
यहूदी धर्म , ईसाई धर्म, तथा इस्लाम धर्म को संयुक्त रूप से इब्राहिमी धर्म भी कहते हैं क्योंकि इब्राहम तीनों धर्म के मूल में हैं ।
यहूदी जाति के आदि संस्थापक अबराहम को अपने स्वतंत्र विचारों और ईश्वरीय संदेशों के कारण दर-दर की खाक छाननी पड़ी। अपने जन्मस्थान ऊर (सुमेर का प्राचीन नगर) से सैकड़ों मील दूर निर्वासन में ही उनकी मृत्यु हुर्ह। अबराहम के बाद यहूदी इतिहास में सबसे बड़ा नाम मूसा का आता है। मूसा ही यहूदी जाति के मुख्य व्यवस्थाकार या स्मृतिकार माने जाते हैं। मूसा के उपदेशों में दो बातें मुख्य हैं : एक–अन्य देवी देवताओं की पूजा को छोड़कर एक निराकार ईश्वर की उपासना और दूसरा — सदाचार के दस नियमों का पालन करना । मूसा ने अनेकों कष्ट सहकर ईश्वर के आज्ञानुसार जगह-जगह बँटी हुई अत्याचार पीड़ित यहूदी जाति को मिलकार एक किया और उन्हें फ़िलिस्तीन में लाकर बसाया । यह समय ईसा से प्राय: 1,500 वर्ष पूर्व का था। मूसा के समय से ही यहूदी जाति के विखरे हुए समूह स्थायी तौर पर फ़िलिस्तीन में आकर बसे और उसे अपना देश समझने लगे। बाद में अपने इस नए देश के नाम को उन्होंने “इज़रायल” की संज्ञा दी।
उस काल के दौर मे राजनीतिक फैलाव के कारण ही अबराहम ने यहूदियों का उत्तरी अरब और ऊर से फ़िलिस्तीन की ओर संक्रमण कराया। यह उनका पहला संक्रमण था । दूसरी बार जब उन्हें मिस्र छोड़ फ़िलिस्तीन भागना पड़ा तब उनके नेता हज़रत मूसा थे (प्राय: 16वीं सदी ई.पू.)। यह यहूदियों का दूसरा संक्रमण था जो महान् बहिरागमन (ग्रेट एग्ज़ोडस) के नाम से प्रसिद्ध है।यह एक अलग वाकया है ।

अबराहम और मूसा के बाद इज़रायल में जो दो नाम सबसे अधिक आदरणीय माने जाते हैं वे दाऊद (ईसाइयत में David) और उसके बेटे सुलेमान (ईसाइयत में Solomons) के हैं । सुलेमान के समय दूसरे देशों के साथ इज़रायल के व्यापार में खूब उन्नति हुई। सुलेमान ने समुद्रगामी जहाजों का एक बहुत बड़ा बेड़ा तैयार कराया और दूर-दूर के देशों के साथ तिजारत शुरु की। अरब, एशिया कोचक, अफ्रीका, यूरोप के कुछ देशों तथा आज के आधुनिक भारत सिंध के साथ इज़रायल की तिजारत होती थी। सोना, चाँदी, हाथीदाँत और मोर भारत से ही इज़रायल आते थे। सुलेमान उदार विचारों का धनी था । सुलेमान के ही समय इबरानी यहूदियों की राष्ट्रभाषा बनी । 37 वर्ष के योग्य शासन के बाद सन् 937 ई.पू. में सुलेमान की मृत्यु हुई।सुलेमान की मृत्यु से यहूदी एकता को बहुत बड़ा धक्का लगा। सुलेमान के मरते ही इज़रायली और जूदा (यहूदा) दोनों फिर अलग–अलग स्वाधीन रियासतें बन गईं । सुलेमान की मृत्यु के बाद 50 वर्ष तक इज़रायल और जूदा के आपसी झगड़े चलते रहे । इसके बाद लगभग 884 ई.पू. में उमरी नामक एक राजा इज़रायल की गद्दी पर बैठा । उसने फिर दोनों जतियों , , ,शाखों में प्रेमसंबंधस्थापित किया। किंतु उमरी की मृत्यु के बाद यहूदियों की ये दोनों शाखें सर्वनाशी युद्ध में उलझ गईं और जिसके परिणाम स्वरूप खाई बढ़ गई ।यहूदियों की इस स्थिति को देखकर असुरिया के राजा शुलमानु अशरिद पंचम ने सन् 722 ई.पू. में इज़रायल की राजधानी समरिया पर चढ़ाई की और उसपर अपना अधिकार कर लिया। अशरिद ने 27,290 प्रमुख इज़रायली सरदारों को कैद करके और उन्हें गुलाम बनाकर असुरिया भेज दिया और इज़रायल का शासन प्रबंध असूरी अफसरों को सपुर्द कर दिया। सन् 610 ई.पू. में असुरिया पर जब खल्दियों ने आधिपत्य कर लिया तब इज़रायल भी खल्दी सत्ता के अधीन हो गया।इसके बाद हख़ामनी राजवंश सन् 550 ई.पू. में ईरान सुप्रसिद्ध हख़ामनी राजवंश का समय आया। इस कुल के सम्राट् कुरुश ने जब बाबुल की खल्दी सत्ता पर विजय प्राप्त की तब इज़रायल और यहूदी राज्य भी ईरानी सत्ता के अंतर्गत आ गए।

आसपास के देशों में उस समय ईरानी सबसे अधिक प्रबुद्ध, विचारवान् और उदार थे। अपने अधीन देशों के साथ ईरानी सम्राटों का व्यवहार न्याय और उदारता का प्रतीक होता था। प्रजा के उद्योग धंधों को वे संरक्षा देते थे। समृद्धि उनके पीछे-पीछे चलती थी। उनके धार्मिक विचार उदार थे। **ईरानियों का शासनकाल यहूदी इतिहास का कदाचित् सबसे अधिक विकास और उत्कर्ष का काल था**। जो हजारों यहूदी बाबुल में निर्वासित और दासता में पड़े थे उन्हें ईरानी सम्राट् कुरु ने मुक्त कर अपने देश लौट जाने की अनुमति दी। कुरु ने जेरूसलम के मंदिर के पुराने पुरोहित के एक पौत्र योशुना और यहूदी बादशाह दाऊद के एक निर्वासित वंशज जेरुब्बाबल को जरूसलम की वह संपत्ति देकर, जो लूटकर बाबुल लाई गई थी, वापस जेरूसलम भेजा और अपने खर्च पर जेरूसलम के मंदिर का फिर से निर्माण कराने की आज्ञा दी। इज़रायल और यहूदा के हजारों घरों में खुशियाँ मनाई गईं। शताब्दियों के पश्चात् इज़रायलियों को साँस लेने का अवसर मिला।
अब यही वह समय था जब यहूदियों के धर्म ने अपना परिपक्व रूप धारण किया। इससे पूर्व उनके धर्मशास्त्र एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को जबानी प्राप्त होते रहते थे। अब कुछ स्मृति के सहारे, कुछ उल्लेखों के आधार पर धर्म ग्रंथों का संग्रह प्रारंभ हुआ। इनमें से थोरा या तौरेत का संकलन 444 ई.पू. में समाप्त हुआ।** खास बात यह की दोनों समय का हवन , जिसमें लोहबान जैसी सुगंधित चीजें, खाद्य पदार्थ, तेल इत्यादि के अतिरिक्त किसी मेमने, बकरे, पक्षी या अन्य पशु की आहुति दी जाती थी, यहूदी ईश्वरोपासना का अवश्यक अंग था। ध्यान देने वाली बात यह की ऋग्वेद के “आहिताग्नि” पुरोहितों के समान यहूदी पुरोहित इस बात का विशेष ध्यान रखते थे कि वेदी पर की आग चौबीस घंटे किसी तरह बुझने न पाए ।**

जैसा की इसराइलियों का मानना है कि इज़रायली धर्मग्रंथों में सबसे सुंदर पुस्तक “दाऊद के भजन” हैं।
सन् 330 ई.पू. में सिकंदर ने ईरान को जीतकर वहाँ के हख़ामनी साम्राज्य का अंत कर दिया । सन् 320 ई.पू. में सिकंदर के सेनापति तोलेमी प्रथम ने इज़रायल और यहूदा पर आक्रमण कर उसपर अपना अधिकर कर लिया। बाद में सन् 198 ई.पू. में एक दूसरे यूनानी परिवार सेल्यूकस राजवंश का अंतिओकस चतुर्थ यहूदियों के देश का अधिराज बना। जेरूसलम के बलवे से रुष्ट होकर अंतिओकस ने उसके यहूदी मंदिर को लूट लिया और हजारों यहूदियों का वध करवा दिया, शहर की चहारदीवारी को गिराकर जमीन से मिला दिया और शहर यूनानी सेना के सपुर्द कर दिया।
अंतिओकस ने यहूदी धर्म का पालन करना इज़रायल और यहूदा दोनों जगह कानूनी अपराध घोषित कर दिया । यहूदी मंदिरों में यूनानी मूर्तियाँ स्थापित कर दी गईं और तौरेत की जो भी प्रतियाँ मिलीं आग के सपुर्द कर दी गईं । लगभग यह स्थिति सन् 142 ई.पू. तक चलती रही। सन् 142 ई.पू. में एक यहूदी सेनापति साइमन ने यूनानियों को हराकर राज्य से बाहर निकाल दिया और यहूदा तथा इज़रायल की राजनीतिक स्वाधीनता की घोषण कर दी। यहूदियों की यह स्वाधीनता 141 ई.पू. से 63 ई.पू. तक बराबर बनी रही। यह वह समय था **जब भारत में बौद्ध भिक्षु और भारतीय महात्मा अपने धर्म का प्रचार करते हुए पश्चिमी एशिया के देशों में फैल गए**। इन भारतीय प्रचारकों ने यहूदी धर्म को भी प्रभवित किया। इसी प्रभाव के परिणामस्वरूप यहूदियों के अंदर एक नए “एस्सेनी” नामक संप्रदाय की स्थापना हुई । हर एस्सेनी ब्राह्म मुहूर्त में उठता था और सूर्योदय से पहले प्रात: क्रिया, स्नान, ध्यान, उपासना आदि से निवृत हो जाता था । सुबह के स्नान के अतिरिक्त दोनों समय भोजन से पहले स्नान करना हर एस्सेनी के लिए आवश्यक था। उनका सबसे मुख्य सिद्धांत था-अहिंसा । हर एस्सेनी हर तरह की पशुबलि, मांसभक्षण या मदिरापान के विरुद्ध थे। हर एस्सेनी को दीक्षा के समय प्रतिज्ञा करनी पड़ती थी ::: “”मैं यह्वे अर्थात् परमात्मा का भक्त रहूँगा। मैं मनुष्य मात्र के साथ सदा न्याय का व्यवहार करूँगा। मैं कभी किसी की हिंसा न करूँगा और न किसी को हानि पहुँचाऊँगा। मनुष्य मात्र के साथ मैं अपने वचनों का पालन करूँगा। मैं सदा सत्य से प्रेम करूँगा।”” आदि।
उसी समय के निकट हिंदू दर्शन के प्रभाव से इज़रायल में एक और विचारशैली ने जन्म लिया जिसे क़ब्बालह कहते हैं। क़ब्बालह के थोड़े से सिद्धांत ये हैं- “”ईश्वर अनादि, अनंत, अपरिमित, अचिंत्य, अव्यक्त और अनिर्वचनीय है। वह अस्तित्व और चेतना से भी परे है। उस अव्यक्त से किसी प्रकार व्यक्त की उत्पत्ति हुई और अचिंत्य से चिंत्य की। मनुष्य परमेश्वर के केवल इस दूसरे रूप का ही मनन कर सकता है। इसी से सृष्टि संभव हुई।””।

यहूदियों की राजनीतिक स्वाधीनता का अंत…………
यहूदियों की राजनीतिक स्वाधीनता का अंत उस समय हुआ जब सन् 66 ई.पू. में रोम के जनरल पांपे ने तीन महीने के घेरे के पश्चात् जेरूसलम के साथ-साथ सारे देश पर अधिकार कर लिया। इतिहासलेखकों के अनुसार हजारों यहूदी लड़ाई में मारे गए और 12,000 यहूदी कत्ल कर दिए गए । इंसानी कत्लेआम कि शर्मनाक घटना उस दौर के लिए आप बात थी।
इसके बाद सन् 135 ई. में रोम के सम्राट् हाद्रियन ने जेरूसलम के यहूदियों से रुष्ट होकर एक-एक यहूदी निवासियों का कत्ल करवा दिया । वहाँ की एक-एक ईंट गिरवा दी और शहर की समस्त जमीन पर हल चलवाकर उसे बराबर करवा दिया। इसके पश्चात् अपने नाम एलियास हाद्रियानल पर ऐंलिया कावितोलिना नामक नया रोमी नगर उसी जगह निर्माण कराया और आज्ञा दे दी कि कोई यहूदी इस नए नगर में कदम न रखे। नगर के मुख्य द्वार पर रोम के प्रधान चिह्न **सुअर** की एक मूर्ति कायम कर दी गई। इस घटना के लगभग 200 वर्ष बाद रोम के पहले ईसाई सम्राट् कोंस्तांतीन ने नगर का जेरूसलम नाम फिर से प्रचलित किया।

अरबों का अधिकार छठी ई. तक इज़रायल पर रोम और उसके पश्चात् पूर्वी रोमी साम्राज्य बीज़ोंतीन का प्रभुत्व कायम रहा । खलीफ़ा अबूबक्र और खलीफ़ा उमर के समय अरब और रोमी(Bizantine) सेनाओं में टक्कर हुई। सन् 636 ई. में खलीफ़ा उमर की सेनाओं ने रोम की सेनाओं को पूरी तरह पराजित करके फ़िलिस्तीन पर, जिसमें इज़रायल और यहूदा शामिल थे, अपना कब्जा कर लिया । खलीफ़ा उमर जब यहूदी पैगंबर दाऊद के प्रार्थनास्थल पर बने यहूदियों के प्राचीन मंदिर में गए तब उस स्थान को उन्होंने कूड़ा कर्कट और गंदगी से भरा हुआ पाया । उमर और उनके साथियों ने स्वयं अपने हाथों से उस स्थान को साफ किया और उसे यहूदियों के सपुर्द कर दिया।जेरुसलम पर इसाइयों का अधिकार. ***********इज़रायल और उसकी राजधानी जेरूसलम पर अरबों की सत्ता सन् 1099 ई. तक रही। सन् 1099 ई. में जेरूसलम पर ईसाई धर्म के जाँनिसारों ने अपना कब्जा कर लिया और बोलोन के गाडफ्रे को जेरूसलम का राजा बना दिया। ईसाइयों के इस धर्मयुद्ध में 5,60,000 सैनिक काम आए, किंतु 88 वर्षों के शासन के बाद यह सत्ता समाप्त हो गई ।ईसाई अब सत्ता नहीं धर्म युद्ध कि तरफ बढ़े और सन् 1147 ई. से लेकर सन् 1204 तक उन्होने ने धर्मयुद्धों (क्रूसेडों) द्वारा इज़रायल पर कब्जा करना चाहा किंतु उन्हें सफलता नीं मिली। सन् 1212 ई. में ईसाई पादरियों ने 50 हजार किशोरवयस्क बालक और बालिकाओं की एक सेना तैयार करके पाँचवें धर्मयुद्ध की घोषणा की। इनमें से अधिकांश बच्चे भूमध्यसागर में डूबकर समाप्त हो गए। इसके बाद इस पवित्र भूमि पर आधिपत्य करके लिए ईसाइयों ने चार असफल धर्मयुद्ध और किए।

13वीं और 14वीं शताब्दी में हलाकू खान और उसके बाद तैमूर लंग ने जेरूसलम पर आक्रमण करके उसे नेस्तनाबूद कर दिया । इसके पश्चात् 19वीं शताब्दी तक** इज़रायल पर कभी मिस्री आधिपत्य रहा और कभी तुर्क **। सन् 1914 में जिस समय पहला विश्वयुद्ध हुआ, इज़रायल तुर्की के कब्जे में था । तब तक यहूदी बिखर चुके थे और पूरी दुनिया मे पलायन कर अपना कारोबार भलीभाँति फलीभूत कर चुके थे । तभी यहूदियों के साथ एक त्रासदी शने शने जन्म ले रही थी । अडोल्फ हिटलर का जन्म आस्ट्रिया में 20 अप्रैल, 1889 को हुआ। उसकी प्रारंभिक शिक्षा लिंज नामक स्थान पर हुई। पिता की मृत्यु के पश्चात् 17 वर्ष की अवस्था में वे वियना गया । कला विद्यालय में प्रविष्ट होने में असफल होकर वो पोस्टकार्डों पर चित्र बनाकर अपना निर्वाह करने लगा । इसी समय से वो साम्यवादियों और यहूदियों से घृणा करने लगा ।1918 ई. में उसने नाजी दल की स्थापना की। इसका उद्देश्य साम्यवादियों और यहूदियों से सब अधिकार छीनना था। इसके सदस्यों में देशप्रेम कूट-कूटकर भरा था। इस दल ने यहूदियों को प्रथम विश्वयुद्ध की हार के लिए दोषी ठहराया। आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण जब नाजी दल के नेता हिटलर ने अपने ओजस्वी भाषणों में उसे ठीक करने का आश्वासन दिया तो अनेक जर्मन इस दल के सदस्य हो गए। हिटलर ने भूमिसुधार करने, वर्साई संधि को समाप्त करने, और एक विशाल जर्मन साम्राज्य की स्थापना का लक्ष्य जनता के सामने रखा जिससे जर्मन लोग सुख से रह सकें। इस प्रकार 1922 ई. में हिटलर एक प्रभावशाली व्यक्ति के रूप मे स्थापित हो गया । उसने **स्वस्तिक** को अपने दल का चिह्र बनाया जो कि हिन्दुओ का शुभ चिह्र है। समाचारपत्रों के द्वारा हिटलर ने अपने दल के सिद्धांतों का प्रचार जनता में किया। भूरे रंग की पोशाक पहने सैनिकों की टुकड़ी तैयार की गई। 1923 ई. में हिटलर ने जर्मन सरकार को उखाड़ फेंकने का प्रयत्न किया। इसमें वह असफल रहा । और जेलखाने में डाल दिया गया । वहीं उसने मीन कैम्फ (“मेरा संघर्ष”) नामक अपनी आत्मकथा लिखी। इसमें नाजी दल के सिद्धांतों का विवेचन किया। उसने लिखा कि आर्य जाति सभी जातियों से श्रेष्ठ है और जर्मन आर्य हैं। उन्हें विश्व का नेतृत्व करना चाहिए। यहूदी सदा से संस्कृति में रोड़ा अटकाते आए हैं। जर्मन लोगों को साम्राज्यविस्तार का पूर्ण अधिकार है। फ्रांस और रूस से लड़कर उन्हें जीवित रहने के लिए भूमि प्राप्ति करनी चाहिए।

1930-32 में जर्मनी में बेरोज़गारी बहुत बढ़ गई। संसद् में नाजी दल के सदस्यों की संख्या 230 हो गई। 1932 के चुनाव में हिटलर को राष्ट्रपति के चुनाव में सफलता नहीं मिली। जर्मनी की आर्थिक दशा बिगड़ती गई और विजयी देशों ने उसे सैनिक शक्ति बढ़ाने की अनुमति की। 1933 में चांसलर बनते ही हिटलर ने जर्मन संसद् को भंग कर दिया, साम्यवादी दल को गैरकानूनी घोषित कर दिया और राष्ट्र को स्वावलंबी बनने के लिए ललकारा। हिटलर ने ”डॉ. जोज़ेफ गोयबल्स” को अपना प्रचारमंत्री नियुक्त किया। नाज़ी दल के विरोधी व्यक्तियों को जेलखानों में डाल दिया गया। कार्यकारिणी और कानून बनाने की सारी शक्तियाँ हिटलर ने अपने हाथों में ले ली। 1934 में उसने अपने को सर्वोच्च न्यायाधीश घोषित कर दिया। उसी वर्ष हिंडनबर्ग की मृत्यु के पश्चात् वे राष्ट्रपति भी बन बैथा । नाजी दल का आतंक जनजीवन के प्रत्येक क्षेत्र में छा गया। 1933 से 1938 तक लाखों यहूदियों की हत्या कर दी गई। नवयुवकों में राष्ट्रपति के आदेशों का पूर्ण रूप से पालन करने की भावना भर दी गई और जर्मन जाति का भाग्य सुधारने के लिए सारी शक्ति हिटलर ने अपने हाथ में ले ली।हिटलर ने 1933 में राष्ट्रसंघ को छोड़ दिया । यूरोप की धरती पर कत्लेआम मचा कर हिटलर को सबसे ज्यादा क्रूर आदमी के रूप में जाना गया। हिटलर नाम दुष्टता का पर्याय बन गया। प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटिश सैनिकों ने एक घायल जर्मन सैनिक की जान बख्श दी थी। वह खुशनसीब सैनिक एडोल्फ हिटलर ही था, जिसने चुन-चुन के यहूदियों को कत्लेआम किया। वहीं, सिर्फ चार साल की उम्र में एक पादरी ने हिटलर को डूबने से बचाया था। द्वितीय विश्व युद्ध के यातना गृह के बारे में सभी जानते हैं। यहां यहूदी लोगों को इकट्ठा कर गैस चैंबर में ठूस दिया जाता था। यह आश्चर्य की बात है कि हिटलर ने इन यातनागृहों का कभी भी दौरा नहीं किया। भले ही द्वितीय विश्व युद्ध में यूरोप की धरती को यहूदियों के खून से लाल कर दिया गया हो, लेकिन हिटलर का पहला प्यार एक यहूदी लड़की ही थी। तब वह इतना साहस भी नहीं बटोर पाया कि उससे अपनी दिल की बात कह सके। इतना कत्लेआम मचाने के बाद भी हिटलर शुद्ध रूप से शाकाहारी था। इतना ही नहीं, उसने पशु क्रूरता के खिलाफ एक कानून भी बना दिया। वहीं, हिटलर अमेरिकी कार निर्माता हेनरी फोर्ड से बहुत ज्यादा प्रभावित था। इसलिए वह अपनी डेस्क के पीछे उनकी तस्वीर लगा कर रखता था। हिटलर पेट फूलने की समस्या से ग्रस्त था। इसके लिए वह 28 तरीके की दवाइयां लेता था। इतना ही नहीं, वह 80 तरह की नशीली दवाओं (ड्रग्स) का लती भी था। इनमें एम्फैटेमिन का कॉकटेल, बैल का वीर्य, चूहे मारने वाली दवाई और मॉर्फिन हिटलर को अत्यधिक पसंद थी। इसमें कोई शक नहीं कि 80 तरीके की नशीली दवाओं का उपयोग हिटलर अपनी सेक्स ताकत बढ़ाने के लिए करता था। लेकिन कि हिटलर के पास सिर्फ एक ही अंडकोष था। एंटी स्मोकिंग कैम्पेन (धूम्रपान विरोधी अभियान) के आधुनिक इतिहास में पहली बार हिटलर ने सार्वनिक रूप से धूम्रपान के खिलाफ कैम्पेन का आगाज किया।॥

ब्रिटेन के अधीनता एवं नये राष्ट्र का उदय…… …
सन् 1917 में ब्रिटिश सेनाओं ने इस पर अधिकार कर लिया ।यह भी घटना इंग्लैंड कि सोची समझी राजनीति कि एक कड़ी थी 2 नवंबर, सन् 1917 को ब्रिटिश विदेश मंत्री बालफ़ोर ने यह घोषणा की कि ”इज़रायल” को ब्रिटिश सरकार यहूदियों का धर्मदेश बनाना चाहती है। जिसमें सारे संसार के यहूदी यहाँ आकर बस सकें ।ब्रिटेन के मित्रराष्ट्रों ने इस घोषण की पुष्टि की अर्थार्त समर्थन किया । इस घोषणा के बाद से इज़रायल में यहूदियों की जनसंख्या निरंतर बढ़ती गई और बढ़ती गई । लगभग 21 वर्ष बाद (दूसरे विश्वयुद्ध) के पश्चात् मित्रराष्ट्रों ने सन् 1948 में एक इज़रायल नामक यहूदी राष्ट्र की विधिवत् स्थापना कि घोषणा की । सन्‌ 1948 ई. से पहले फिलिस्तीन (इज़रायल जिसका आजकल एक भाग है) ब्रिटेन के औपनिवेशिक प्रशासन के अंतर्गत एक अधिष्ठित (मैनडेटेड) क्षेत्र था। यहूदी लोग एक लंबे अरसे से फिलिस्तीन क्षेत्र में अपने एक निजी राष्ट्र की स्थापना के लिए प्रयत्नशील थे । इसी उद्देश्य को लेकर संसार के विभिन्न भागों से आकर यहूदी फिलिस्तीनी इलाके में बसने लगे। अरब राष्ट्र भी इस स्थिति के प्रति सतर्क थे। फलत: 1947 ई. में अरबों और यहूदियों के बीच युद्ध प्रारंभ हो गया। 14 मई, 1948 ई. को अधिवेश (मैनडेट) समाप्त कर दिया गया और इज़रायल नामक एक नए देश अथवा राष्ट्र का उदय हुआ । युद्ध जनवरी, 1949 ई. तक जारी रहा। न तो किसी प्रकार की शांतिसंधि हुई, न ही किसी अरब राष्ट्र ने इज़रायल से राजनयिक संबंध स्थापित किए। अलबत्ता संयुक्त राष्ट्रसंघीय युद्धविराम–पर्यवेक्षक–संगठन इस क्षेत्र में शांति स्थापना का कार्य करता है । एक दूरगामी निष्कर्ष के लिए ।

सन्‌ 1957 में इज़रायल ने पुन: ब्रिटेन तथा फ्रांस से मिलकर स्वेज की लड़ाई में गाजा क्षेत्र में अधिकार कर लिया ( गज़ापट्टी का इतिहास तो 1948 में इस्राइल के निर्माण के साथ शुरु होता है पर इस क्षेत्र के सम्पूर्ण इतिहास के लिए इसरायल का इतिहास देखा जा सकता है । 1948 में इसरायल के निर्माण के बाद यहाँ बसे अरबों के लिए अर्मिस्टाइस रेखा बनाई गई जो ब्रिटानिया सरकार की दें थी के तहत गजा पट्टी में अरब, जो सुन्नी मुस्लिम हैं, रहेंगे तथा यहूदी इसरायल मे रहेंगे । 1948 से लेकर 1967 तक इसपर मिस्र का अधिकार था पर 1967 के छःदिनी लड़ाई में, जिसमें इसरायल ने अरब देशों को निर्णायक रूप से हरा दिया, इसरायल ने मिस्र से यह पट्टी भी छीन ली जिसके बाद से इसपर इसरायल का नियंत्रण बना हुआ है 2005 में इसरायल ने फ़िलीस्तीनी स्वतंत्रता संस्था के साथ हुए समझौते के तहत ग़ज़ा और पश्चिमी तट से बाहर हट जाने का फेसला किया । साथ ही इसरायल ने ग़ज़ा तथा पश्चिमी तट परस्हदीबस्तियों को भी हटाने का काम शुरु किया । २००७ में हुए चुनाव में *हमास* ने इसकी सत्ता हथिया ली जो इसरायल और संयुक्त राष्ट्र सहित कई देशों के अनुसार एक आतंकवादी संगठन है । हमास ने पश्चिमी तट पर स्थित अरबों से भी सम्पर्क तोड़ लिया जो 1948 में इसरायल के निर्माण का ही परिणाम हैं और इस कारण गजावासियों से अब तक जुड़े हुए थे । यह भी एक दिलचस्प वाक्य है जिसे अगले लेख मेन स्पस्ट करूंगा ,)। परंतु राजनीतिक कारण के चलते, संयुक्त राष्ट्रसंघ के आज्ञानुसार उसे इस भाग को अंतत: छोड़ना पड़ा। प्रथम युद्ध एक प्रकार से समाप्त हो गया, लेकिन अप्रत्यक्ष तनातनी बनी रही ।

1967 ई. में स्थिति बहुत खराब हो गई और इज़रायल-सीरिया-सीमाक्षेत्र में हुई झड़पों के बाद मिस्र ने इज़रायल की सीमा पर अपनी सेना बड़ी संख्या में तैनात कर दी। राष्ट्रसंघीय पर्यवेक्षक दल को निष्कासित कर दिया गया और रक्तसागर में इज़रायल की जहाजरानी पर मिस्र द्वारा रोक लगा दी गई। 5-6 जून की रात्रि को इज़रायल ने मिस्र पर जमीनी और हवाई आक्रमण शुरू कर दिए। जार्डन भी इज़रायल के विरुद्ध युद्ध में सम्मिलित हो गया और सीरिया की सीमाओं पर भी लड़ाई जारी हो गई। 11 जून को राष्ट्रसंघ द्वारा की गई युद्धविराम की अपील लगभग सभी युद्धरत राष्ट्रों ने स्वीकार कर ली। लेकिन इस समय तक इज़रायल गाज़ा पट्टी, स्वेज़ नहर के तट तक सिनाई प्रायद्वीप के भूभाग, जार्डन घाटी तक जार्डन के भूभाग, जेरूसलम तथा गैलिली सागर के पूर्व में स्थित सीरिया के गालन नामक पर्वतीय भाग (जिसमें क्यूनेत्रा नामक नहर भी है) पर अधिकार कर चुका था ।एक राजनीतिक निर्णय के अनुसार जेरूसलम को तत्काल इज़रायल का अभिन्न अंग घोषित कर दिया गया, लेकिन शेष विलित इलाके को ‘अधिकृत क्षेत्र’ के रूप में ही रखा गया।आज फ़्रांसिसी साम्राज्यवादी भेड़ियों की बमबारी में आइसिस के बजाए चुन चुनकर रिहायशी इलाकों को निशाना बनाया जा रहा है l भारी संख्या में छोटे छोटे बच्चों के मारे जाने की खबरें आ रहीं हैं । अब इसके बावजूद भी आप पूर्वाग्रह से पीड़ित हैं की मुसलमान आतंकवादी हैं तो रहिए ग्रसित भस्म होना आपकी नियतती है ।

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31 thoughts on “क्या मुसलमान आतंकवाद का एकमात्र पोषक है ?

  • December 14, 2015 at 6:56 pm
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    आप से पूरी तरह सहमत नहीं , मगर लेख से बहुत इतिहासिक घटना की जानकारी हुई . पहले क्या हुआ ये अलग बात है मगर अभी तो फिलहाल मुस्लमान ही आतंकवादी है , इस से आप झुटला नहीं सकते .

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  • December 14, 2015 at 8:28 pm
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    आईसिस के हम्ले पर एक् शब्द नहेी लिखा लेकिन् फ्रान्स के हम्ले को जो बहुत बाद् मे हुये उस्का उल्लेख आप जरुर कारते है यहेी आप्का पस्ख्पात दिख्ता है और बाद मे आप इन्सनियत् केी बात भेी कार्ते है यह् आप्कि इन्सनियत् कैसेथै यह सब् दिख्ता है ! यमन मे सऊदेी अरब बच्हो को “भेी ” मारता है तब आप उस्को भेी भुल जाते है !
    वाह रेी आप्केी इनसानियत !

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  • December 14, 2015 at 10:22 pm
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    ब्राह्मण और क्रोनी मिडिया ने मुंबई हमले में ऐसी छबि बनाई की मुंबई आतंकवादी हमलो का दोषी मुसलमान है जब की इसका मुख्य आरोपी अमेरिकी नागरिक ईसाई धर्म वाला क्रिस्चियन रिचर्ड हेडली है !! आईएसआईएस का डीटेल है इसमे पढ़िये तो अपना पूर्वाग्रह त्याग कर ?

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    • December 15, 2015 at 9:46 am
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      हन्नान साहब, मुसलमान एक मानसिक अवस्था है, अब हम किसी भी आतंकी संगठन, जो इस्लाम के नाम पे बना है को ईसाई या यहूदी या ब्राह्मण कह सकते हैं.

      मुंबई हमले मे शामिल रिचर्ड हेडली इसका निकनें है, जबकि वो मुस्लिम था. चलिए हेडली के अलावा, भी मुंबई हमले मे अनेको लोग थे, ज़कीउर रहमान लखवी, हाफ़िज़ सईद, कसाब के 9 अन्य साथी, क्या ये सब भी ईसाई, ब्राह्मण या यहूदी थे.

      आप जैसे लोगो के साथ समस्या यह है कि आप अपने गिरेबान मे झाँकना ही नही चाहते, हमारे समाज मे अतिवादी और चरमपंथ को बढ़ावा देने वाली बाते करते हुए अनेको लोग हर गली-मुहल्ले मे मिल जाएँगे, लेकिन हम उनपे ध्यान नही देंगे, और जब कोई बड़ी वारदात हो जाएगी, हम ब्राह्मण, यहूदी, ईसाई, मोसाद पे ठीकरा फोड़ देंगे.

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      • December 15, 2015 at 9:29 pm
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        ज़ाकिर हुसैन साहब …….. आपके मशवरे की जरूरत नहीं हमे । गली मुहल्ले की सैर आपको मुबारक । इसके आगे आपकी सोच जा ही नहीं सकती ॥
        1990 मे अल्जीरिया मे इलेक्शन हुआ जिसमे 1989 मे बनी एक इस्लामिक पॉलिटिकल पार्टी जिसका नाम Islamic Salvation Front था ने हिस्सा लिया जिसमे Islamic Salvation Front 54% वोट पा कर सबसे बड़ी पार्टी बन कर सामने आई और वो अपने चुनावी वादे के मुताबिक अल्जीरिया के निज़ाम(Systems) को एक इस्लामिक लोकतंत्र(ISLAMIC DEMOCRACY) मे बदलने की तरफ बढ़ी और ध्यान रहे की इसी वादे के कारण अल्जीरिया की जनता ने उसे बहुमत दिया था था जब यूरोपियन देशो ने देखा की अगर ये सत्ता पे पूर्ण क़ब्ज़ा कर लेंगे तो वहाँ इस्लामिक लोकतंत्र नाफीज़(लागू) कर देंगे ध्यान रहे की इस्लामिक शरीयत नही बल्कि लोकतंत्र और एक बात की ये अल्जीरिया की आज़ादी के बाद पहला आज़ाद चुनाव भी था जिसमे इस इस्लामिक पार्टी को बहुमत हासिल हुआ
        जिसके बाद फ्रांस की सेना ने वहाँ के जनता के द्वारा चुनी गई सरकार के खिलाफ फौज उतार दी और वहाँ हमले शुरू कर दिये जिसके नतीजे मे 1.5 लाख से अधिक मुसलमान मारे गये और अल्जीरिया बर्बादी के दहाने पे पहुँच गया……
        ”मैं कहा तक सुनाऊ अपनी मज़लूमियत की दास्ताने
        उम्र गुज़र जाएगी सुनाते सुनाते लेकिन लेकिन अधूरी रह जाएगी दास्तान”

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        • December 30, 2015 at 6:03 pm
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          हन्नान साहब, अल्जीरिया मे शरीयत लागू नही हो पाई, क्यूंकी पश्चिमी देशो ने हस्तक्षेप किया. पश्चिमी देशो को तो मैं सही बता ही नही रहा, लेकिन जहाँ शरीयत नाफिज़ ही नही हो पाई, उसकी क्या मिसाल देना. क्या शरीयत कहीं भी नाफिज़ नही हो पाई?
          तालिबान के प्रति आपका क्या दृष्टिकोण है. आप अपनी सुविधा के अनुसार, बेहद छोटे छोटे उदाहरण लेते हैं, वो भी जो अमल तक नही पहुँचे.
          अब पश्चिमी देश isis पे भी हमला कर रहे हैं, isis भी शरीयत आधारित राज्य व्यवस्था ही चाहता है. आज isis को उखाड़ फैंका तो आप इसकी भी मिसाल दे देंगे, नही उखाड़ पाए तो ये मोसाद के एजेंट बन जाएँगे. यानी चित भी मेरी पुट भी मेरी.
          मैं तो तालिबान हो या isis या अल शबाब या बोको हराम, आप इन संगठनो को इस्लामिक मानते हैं तो मैं उस अनुसार भी आपसे बहस करने को तैयार हूँ, इन्हे अमेरिका और मोसाद के एजेंट मानते हैं तो मैं उसपे भी आप से चर्चा करना चाहता हूँ. मैं आतंकवाद के डॉट कनेक्ट करने की चेष्टा मे हूँ.

          ना तो आप गली-मुहल्ले मे नज़र घुमाना चाहते, जो आपकी नज़र मे मेरे जैसे छोटी सोच के लोग करते हैं, ना ही वैश्विक पटल पे मचे घमासान पे स्पष्ट मत के साथ आ रहे.

          बचिए, आप जितना बचना चाह रहे हो. मैं रोज अपने रिश्तेदारो और दोस्तो मे ऐसे लोगो से मिलता हूँ, लेकिन अब ये सवाल रुकने वाले नही, भले ही इन्हे नज़र-अंदाज करते रहो.

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    • December 15, 2015 at 9:49 am
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      डेविड हेडली का असली नाम दाऊद सैयद गिलानी है.

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    • December 15, 2015 at 10:09 am
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      isis के लिए एक थ्योरी है कि ये अमेरिका और मोसाद का संगठन है, इसमे मुसलमान शामिल नही है. वो फिलिस्तीनी मुसलमान जो 60 साल मे इजरायल के आगे नही झुके, वो सीरिया और इराक़ के एक भू-भाग मे इन यहूदियो के आगे समर्पण कर गये? तमाम मस्जीदो के इममो ने बग़दाडी को अपना खलीफा कैसे मान लिया?

      चलिए, अब इसे दूसरे तरीके से भी देखते हैं. इस्लाम एक शांति-प्रिय मज़हब है, इस्लाम के नाम पे, रसूल के नाम पे आतंक और हिंसा की वकालत करने वाले, मुनाफिक है, और इस्लाम को बदनाम करने के लिए ऐसा कर रहे हैं, अमेरिका और मोसाद या रॉ की साजिश के तहत. ये भी एक थ्योरी है.

      अब कुछ दिनो पहले सहारनपुर मे एक व्यक्ति ने पैगंबर मुहम्मद के उपर अभद्र टिप्पणी कर दी, उसकी फाँसी की सज़ा मी माँग करते हुए, हज़ारो मुस्लिमो ने प्रदर्शन किया. एक मुस्लिम होने के नाते, नबी करीम पे आपत्तिजनक बयान से आहत होना स्वाभाविक है, लेकिन आशिके रसूल होने का दावा करते हुए, उसकी मौत के फ़तवे देने वाले क्या रसूल को बदनाम नही कर रहे? क्या इस्लाम को आतंक का मज़हब कहने वालो को हौसला इससे नही बढ़ेगा?

      क्या ये मान लिया जाए की ये तमाम लोग भी यहूदी है? असहिष्णुता का राग हम कुछ महीनो पहले अलाप रहे थे, मैने भी अवॉर्ड वापसी का समर्थन किया, कई मुस्लिम अतिवादियो ने भी किया, लेकिन बताए कि क्या सिर्फ़ मोदी-भक्त ही असहिष्णु है, अपने आपको आशिके रसूल कहने वाले नही?

      जनाब, जहाँ तक इस्लाम को बदनाम करने की बात है तो आतंक और असहिष्णुता से अधिक हमारे मज़हब की कोई बदनामी नही कर सकता. अगर किसिको मुसलमानो के भीतर यहूदी, मोसाद कहना है तो इन असहिष्णु लोगो को कहो. जिससे की इनके हौसले पस्त हो.

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  • December 15, 2015 at 9:40 am
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    दो राष्ट्र के सिद्धांत का इजरायल-फ़िलिस्तीन मसले पे ज़िक्र हुआ इस लेख मे, इसके लिए जिन्ना का हवाला दिया. हम सब जानते है कि दो-राष्ट्र के सिद्धांत के बावजूद, लगभग एक तिहाई मुस्लिम, पाकिस्तान नही गये. इसी प्रकार, पाकिस्तान के कुछ ही वर्षो मे टुकड़े हो गये, दो राष्ट्र के सिद्धांत की हवा निकल गयी.

    फिर पाकिस्तान मे भी दो-राष्ट्र के सिद्धांत पे बनने के बावजूद, मुस्लिम, इस्लाम के नाम पे ही लड़ रहे हैं. जबकि भारत का मुस्लिम, कम से कम उतनी ही तादात मे होने के बावजूद, एक दूसरे से नही लड़ रहा, और आर्थिक और शैक्षणिक स्तर पे भी पाकिस्तान के मुस्लिम से बेहतर स्थिति मे है.

    यही हाल, इजरायल की 20% आबादी, जो मुस्लिम है, उसका है. वो ना सिर्फ़ फ़िलिस्तीन, बल्कि अन्य अरब देशो से बेहतर स्थिति मे है.

    हमे समझना होगा कि दो-राष्ट्र का सिद्धनत, अव्यावहारिक है. हमे ऐसी राजनैतिक व्यवस्था ढूँढनी होगी, जो सभी समुदायो को स्वीकार हो, और वो सेक़ूलेरिज़्म के भीतर ही संभव है. इस समस्या को हमे सिर्फ़ इजरायल-फ़िलिस्तीन तक ही नही देखना चाहिए, संपूर्ण अरब जगत मे राजनैतिक सहिष्णुता और बहुलातावाद के प्रति सहिष्णुता को बढ़ावा देना होगा, इस पूरे भूभाग मे सेक़ूलेरिज़्म की बयार को बढ़ाना होगा, तभी स्थाई शांति हो सकेगी. ये स्थिति अरब मे रह रहे गैर मुस्लिमो को भी समान अधिकार देगी, और यहूदी बहुल इजरायल मे रह रहे अल्प-संख्यक मुस्लिमो को भी.

    इस लेख मे कई मुद्दे है, बाकी पे भी अपनी राय रखूँगा.

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  • December 15, 2015 at 9:44 am
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    हेद्लेी मुख्य अरोपि नहेी बल्कि सहयोगि था वर्ना वह सर्कारेी गवाह् नहि बनाया जाता /
    पुर्वाग्रह तब होता जब हम् पहले से हेी कोई धार्ना बना ले हम्ने अप्नेी धार्ना कुरान् पध कर बनायेी है

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  • December 15, 2015 at 10:14 am
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    हन्नान महोदय जी आप बकवास लिखना बंद करे . आप ने जो भी लिखा है काल्पनिक है इस का सत्य से कोई संबंध नहीं है . इस दुनिया के लिए मुस्लमान बहुत बड़ा खतरा है इन्हे रोकना होगा नन्ही तो ये विशव युद्ध करा दे गे. दुनिया का आज माहौल इन्ही मुसलमानो के कारन ख़राब हुआ है नहीं तो इस धरती पर शान्ति ही शान्ति थी .

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    • December 15, 2015 at 10:29 am
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      प्रीत सिंह जी ऐसा नही है, एटम बम जापान पे मुस्लिमो ने नही गिराया, लिट्टे जैसा ख़तरनाक आतंकी संगठन मुस्लिम नही था, नक्सली मुस्लिम नही है. इसके अतिरिक्त इतिहास मे दलितो पे अत्याचार के पीछे जो नस्लवाद था, उसके पीछे मुस्लिम नही थे, ना ही वो किताबे मुसलमानो की थी.

      लेकिन ये भी सही है कि अन्य संगठनो की हिंसा की आड़ मे हम अपने गिरेबान मे झाँकना ही छोड़ दे.

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    • December 15, 2015 at 11:31 pm
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      प्रीत सिंह मोहतरमा जी आप बेचैन क्यों हैं लेख की सच्चाई से या आपके उखड़ते पाँव से हमारा मतलब आरएसएस के क़िले से ॥ आप जिस खेमे मे हैं वहाँ अशांति है आप आइये न यहाँ मैं डावात देता हूँ शांति का हमेशा हमेशा के लिए ।

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      • December 16, 2015 at 7:49 am
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        महोदय जी आप कि दवत क धन्य्वाद. पर यह तो बतऐये कि हम शिया बने सुन्नेी बने य वहाबेी बने

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  • December 15, 2015 at 4:46 pm
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    पेरिस हमला इस्लाम को बदनाम करने की शाजिस है हम इस हमले को इस्लाम समेत किसी भी धर्म से मंसूब नही करेंगे क्यूंकी कोई भी धर्म आतंकवाद की शिक्षा नही देता-:Manuel Valls(फ्रांस के प्रधानमंत्री)

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  • December 15, 2015 at 7:51 pm
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    बक्लोल !!!! टमाटर नाम से बदनाम है वरना भिन्डी भी 60 रुपए किलो है
    **********************************************************************
    कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए;
    जो बे-अमल है वो बदला किसी से क्या लेगा;?……………………
    ** आतंकवाद का शिकार होने वाले, या आतंकवाद से लड़ने वाले मुस्लिमों का ज़िक्र लगभग न के बराबर होता है, जबकि उन्हीं मामलों मे मरने वाले गैर मुस्लिमों पर मीडिया के अनगिनत प्रोग्राम महीनों तक चलते हैं, और “इस्लामी आतंकवाद” और “मुस्लिमों की कट्टरता” शेष दुनिया के अन्य धर्मों मे विश्वास रखने वाले लोगों के लिए कितनी खतरनाक है इसपर विचार विमर्श होते रहते हैं। खबरिया चैनल वाले 4 – 6 घिसे पिटे तावा जमा कर लेते हैं फिर शुरू होता है रिघों रिघों ……… निष्कर्ष ……… बस मुस्लिम आतंकवादी …… मिलगाया टीआरपी !!!!!!!
    स्पष्ट है कि दुनिया की चौथाई आबादी जो इस्लाम का प्रतिनिधित्व करती है, को ऐसी चर्चाओं से खीज होनी ही है, जहाँ सीधे सीधे उनकी आस्था को निशाना बनाया जाता है ….
    … जबकि वास्तविकता ये है कि आतंकवाद का मुख्य शिकार मुस्लिम समुदाय ही है, ये बोको हराम, तहरीके तालिबान और संदिग्ध आईएस आदि मुख्यत: मुस्लिमों को ही निशाना बनाते हैं, पर ये खबरें कौन सी ताकत नियंत्रित करती है, बताने की जरूरत नहीं………

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    • December 15, 2015 at 10:07 pm
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      वास्तविकता ये भी है हन्नान साहिब कि बोको हराम, तहरीके तालिबान और संदिग्ध आईएस आदि मुख्यत: मुस्लिमों बहुल्य क्षेत्रो की ही पैदाईस है इसलिये मरने वाले मासुम मुस्लिम ज्यादा है

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      • December 16, 2015 at 9:45 am
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        उमाकांत जी, वो आपकी नज़र मे मुसलमान है, मारने वाले की नज़र मे नही. मारने वाले की नज़र मे वो इस्लाम के दुश्मन है, जो मुसलमान होने का ढोंग कर, उसको बदलना चाह रहे हैं. और ऐसे लोगो से लड़ना, उनको मारना, इस्लाम की सेवा है. ये इस्लाम के दुश्मन नाम का कीड़ा, जब तक दिमाग़ से नही निकलेगा, तब तक मुसलमानो के भीतर ये संघर्ष चलता रहेगा. अगर पूरी दुनिया भी मुसलमान हो गयी, तब भी इस्लाम के नाम पे ही लड़ेंगे.

        अगर इस्लामिक स्टेट यहाँ आया तो वो देवबंद को नही, बल्कि लखनऊ के इमामबाड़े को उड़ाएगा.

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      • December 17, 2015 at 11:34 am
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        ” बद अच्छा ,बदनाम बुरा”। दुनिया में
        कितने गैर मुस्लिम आतंकवादी संगठन है
        क्या किसी को आपने विडियो में अपनी ही पोल
        खोलते देखा??? नहीं न।।। शायद आप सोच रहे हो नॉन
        मुसलिम आतंकी संगठन है ही नहीं तो कुछ बाते समझ
        लीजिये…!! घोंघा बसंतों ??
        (आर्टिकल लंबा खिच जायेगा पढ़ना तो पूरा वरना ना ही पढ़ना )
        अमेरिका ही की बात की जाए तो ऍफ़.बी.आई के
        अनुसार
        ( http://www.fbi.gov/stats-services/publications/
        terrorism-2002-2005/terror02_05#disablemobile )
        वर्ष 1980 से 2005 तक 318 आतंकी हमले हो चुके थे। जिसमे
        209 बम से हुए थे। 42 फीसद लटिनो ग्रुप ने, 24 फीसद
        कट्टरपंथी लेफ्ट वविंग,7 फीसद कट्टर पंथी यहूदी, 6
        फीसद मुस्लिम कट्टरपंथी और 5 फीसद कम्युनिस्ट और
        बाकी अन्य ने किये
        11 सितम्बर 2001 के बाद से एक
        भी अमेरिकी किसी भी मुस्लिम
        आतंकी द्वारा नहीं मरा
        9/11 से 2009 तक अमेरिका में 83 आतंकी हमले हुए जिसमे
        केवल 3 मुस्लिम आतंकियो ने किये
        अमेरिका में 1970 के दशक में 2010 के दशक से
        ज़्यादा आतंकी गतिविधिया दर्ज की गयी जिसे
        करने वाले मुस्लिम नहीं थे
        तब हर साल 60 आतंकी हमले हर साल होते जो 9/11 से 15
        गुना ज्यादा है
        यदि मैं आपसे पूछू की अमेरिका में 3 आतंकी संगठन के नाम
        बताओ तो अल कायदा के अलावा कितने नाम
        गिनवा सकते हो??
        चलिए कुछ मैं गिन्वाता हूँ । लिंक भी दे रहा हूँ कभी आप
        कहो की एडमिन रात को दारु पिके बण्डल मार रहा है
        एनिमल लिबरेशन फ्रंट ( http://en.m.wikipedia.org/wiki/
        Animal_Liberation_Front )
        अल्फा66 और ओमेगा 7 : क्यूबा का संगठन है कई बम धमाके
        कर चुका है ( http://en.m.wikipedia.org/wiki/Alpha_66 )
        आर्मी ऑफ़ गोड : एंटी एबॉर्शन और एंटी समलैंगिक ,
        दो एबॉर्शन क्लिनिक और लेस्बियन नाईट क्लब
        उड़ा चुका है
        http://en.m.wikipedia.org/wiki/Army_of_God_(Uni
        ted_States)
        आर्यन नेशन : पहला गोरे इसाईयो का राष्ट्रीय स्तर
        का आतंकी संगठन
        http://en.m.wikipedia.org/wiki/Aryan_Nations
        ब्लैक लिबरेशन आर्मी ( http://en.m.wikipedia.org/wiki/
        Black_Liberation_Army )
        अर्थ लिबरेशन फ्रंट( http://en.m.wikipedia.org/wiki/
        Earth_Liberation_Front
        जेविश डिफेंस लीग: यहूदियों का ग्रुप ,रबी मीर कहने
        द्वारा निर्मित ,15 आतंकी हमले और 60 बमबारी के
        दोषी (अल कायदा से ज्यादा)
        http://en.m.wikipedia.org/wiki/Jewish_Defense_League
        कु क्लुक्स कलां : एंटी कम्युनिस्ट और एंटी कैथोलिक ग्रुप
        http://en.m.wikipedia.org/wiki/Ku_Klux_Klan
        मिलिशिया मूवमेंट : सरकार के कट्टर विद्रोही ,20000
        से 60000 की तादाद में
        http://en.m.wikipedia.org/wiki/Militia_organiza
        tions_in_the_United_States
        फिनेअस प्रीस्टहुड: अंतर्नास्लीय सम्भोग,गर्भपात और
        मल्टी कल्चर के धुर विरोधी
        http://en.m.wikipedia.org/wiki/Phineas_Priesthood
        सिमबायोनीस लिबरेशन आर्मी
        http://en.m.wikipedia.org/wiki/Symbionese_Liber
        ation_Army

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    • December 16, 2015 at 9:30 am
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      हन्नान साहब, गरम मत होइए, ठंडे दिमाग़ से सोचिए कि बोको हराम या इस्लामिक स्टेट वाले मुसलमानो को नही मार रहे, बल्कि उन लोगो को मार रहे हैं, जिनको वो मुसलमान नही समझते. आपकी नज़र मे पिछले 3 साल मे सीरिया और इराक़ मे 2 लाख लोग मरे, उनमे से ज़्यादातर, मुस्लिम थे, लेकिन इस्लामिक स्टेट की नज़र मे वो शिया थे, मुनफिक थे, इस्लाम के दुश्मन थे.

      अहमदी समुदाय जिसने आज तक किसी भी हमला नही किया, उसको कैसे पाकिस्तान मे निशाना बनाया जा रहा है, शियाओ को कई जगह खुले आम काफ़िर कहा जा रहा है, इस तकफ़िरी की साईकी को समझिए.

      आप मस्जीदे अल-ज़र्रार का उदाहरण देखिए, कि नबी करीम ने एक मस्जिद को उसके भीतर प्रार्थना कर रहे, लोगो के साथ जलवा दिया, हदीसो ही नही, क़ुरान की अल-तौबा मे भी इसका ज़िक्र आता है. उसी अध्याय मे बार बार इसका ज़िक्र आता है कि जो लोग, सशस्त्र जिहाद मे शामिल होने से ना-नुकर कर रहे हैं, उन्हे जहन्नुम की आग मे जलाया जाएगा.

      आप इस बात को समझिए कि मुस्लिमो मे एक छोटा ही सही, एक ऐसा वर्ग है, जो दूसरे फिरको को ना सिर्फ़ मुनफिक समझता है, बल्कि उनपे हिंसा को भी इस्लाम की रक्षा का पवित्र कार्य समझता है. उनकी नज़र मे वो किसी मुस्लिम को नही मार रहे, वो सिर्फ़ काफिरो को ही मार रहे हैं.

      इस साईकी से अगर आपको मुकाबला करना है, तो शरीयत आधारित राज्य व्यवस्था के सपने से अपना मोह भंग करना होगा.

      आप, जिन चैनलो की टी आर पी के लिए बोको हराम या इस्लामिक स्टेट के समाचारो से अपनी भावना क्यूँ आहत मानते हो, उन टीवी चैनलो ने इस्लाम की आलोचना नही की है, और अगर कुछ संगठन इस्लाम के नाम पे हिंसा करेंगे तो इस्लाम पे सवाल-जवाब होंगे ही, इसमे इतनी आग बबुला होने की कोई ज़रूरत नही. ज़रूरत है, आतंक की वजह जानने की.

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  • December 16, 2015 at 9:39 am
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    हन्नान साहब, किसी और पे अंगुली मत उठाइए, अपने दिल पे हाथ रख कर सोचिए की क्या मैं भी इस्लाम के नाम पे आतंक का समर्थन करता हूँ.

    1. क्या, मैं दूसरे फिरको को इस्लाम के विरुद्ध मानता हूँ?
    2. मानता हूँ तो क्या उनसे नफ़रत करता हूँ?
    3. क्या मैं इस्लाम को राजनीति से जुड़ा मानता हूँ, यानी शरीयत आधारित राज्य व्यवस्था का समर्थक हूँ?
    4. अगर हूँ तो अपनी राजनैतिक सोच की आलोचना के लिए मैं कितना सहज और सहिष्णु हूँ.
    5. जो लोग, क़ुरान और हदीसो के हवाले से दूसरे फिरके के लोगो को उनके धर्म-स्थलो को मारने और तोड़ने को इस्लाम की सेवा मानते हैं, उनको मैं किस प्रकार, इस्लाम के पैमाने पे ग़लत ठहरा कर, अपनी आने वाली पीडी और नौजवान नस्ल को आतंक से दूर रखने मे मदद कर सकता हूँ?

    बाकी दूसरे धर्मो, स्मृतीयो, वेदो, अमेरिका, इजरायल की बुराइयों पे तो खूब लिखा और बोला जा सकता है, लेकिन क्या हम अपने समाज के भीतर आतंक के बीजो की पहचान कर सकते हैं, जिससे उसे पौधा या पेड़ बनने से पहले ही कुचला जा सके?

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  • December 16, 2015 at 10:10 am
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    श्रेी जाकिर् जेी आपकेी बात का उत्तर सहेी धन्ग से नहि मिल सकेगा !

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  • December 16, 2015 at 11:34 am
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    आदमी दूसरो से झूठ बोल सकता है, खुद से नही.

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  • December 16, 2015 at 12:23 pm
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    इस्लमिक विदवान इस्लमेी अतन्क्वाद के सन्दर्भ मे आपस मे अत्म्मन्थन भि नहेी कार्ते है ,

    Reply
    • December 17, 2015 at 9:22 am
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      ऐसा नही है, अनेको मुस्लिम विद्वानों ने इस्लाम को लेके तार्किक चर्चा करी है. इसी फोरम पे असग़र अली इंजीनियर साहब के, वहिउद्दिन साहब के लेख आए हैं. इसके अतिरिक्त पाकिस्तान के जावेद अहमद गामिदि साहब के लेख और वीडियो भी सराहनीय है.

      लेकिन कट्टरपंथ से निकलने के लिए, धार्मिक गुरुओं का ही मुँह क्यूँ ताकना? आज़ाद ख़याली वाले वर्ग से मुझे ज़्यादा उम्मीदे है, हालाँकि पढ़े-लिखे बुद्दीजीवियों की मुस्लिम समाज मे कमी है, लेकिन कट्टरपंथ को लेके चर्चा कुछ समय से मुस्लिम समुदाय के भीतर भी बहुत तेज़ी से बढ़ी है, और मैं उम्मीद करता हूँ कि आने वाले कुछ समय मे कट्टरपंथ से चर्चा करते समय, उन सवालो पे भी चर्चा आम होगी, जिससे अब तक हम लोग बचते आए हैं.

      Reply
      • December 17, 2015 at 10:31 am
        Permalink

        श्रेी वहेी उद्देीन जेी से ४ साल पहले हम भेी उन्के निवास मे मिल चुके है उन्के पास समय कम् था इस्लिये इस्लमेी अतन्क्वाद पर चर्चा नहेी हो सकेी थेी !

        Reply
  • December 17, 2015 at 1:01 am
    Permalink

    ज़ाकिर हुसैन भाई हमने isis ही नहीं और भी बहुत सी तंजीमोन का और उनके मददगार देशों का जिक्र 2 लेखों के जरिये भेजा है अगर प्रकाशित हुआ तो पढ़िएगा उनकी जमीनी हक़ीक़त लिखा हूँ । कमेंट के जरिये इनके बारे मे कितना लिखा जा सकता है आप समझ सकते हैं ? वैसे मैं गरम मिजाज इंसान नहीं हूँ हाँ कोई भी लेख हो अगर उसे ठीक से पढ़ा जाए तो उसमे ही हर सवाल का उत्तर होता है मगर जब पढ़ने वाले लोग पूर्वाग्रह से पढ़ते हैं और गैर जरूरी सवाल करते हैं तो जरूर तकलीफ होती है ॥ फिर भी मैं ने पाठक मनुभावों के सवालों का उत्तर 2 लेखों के जरिये देने की कोशिश की है ॥ मोहतरम अफजल साहब अगर इसे पब्लिश किए तो जरूर पढ़िएगा ॥

    Reply
    • December 17, 2015 at 9:32 am
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      isis को लेके लिखे लेख का शीर्षक बताईएएगा. मैं आपके विचारों को पढ़ुंगा. लेकिन मैने एक आम मुस्लिम की उस सोच पे ज़रूर सवाल उठाए हैं कि isis और तालिबान के उदय के पीछे अमेरिका ही ज़िम्मेदार है. मेरा सदैव ये सवाल रहा है, कि isis और तालिबानी सोच को धर्म की किन व्याख्याओं से बॅल मिलता है? ये कैसे मुस्लिम समुदाय मे पैठ बना लेती है.
      इन सवालो से ठेस पहुँचती है, तो भी इन सवालो का सामना करना पड़ेगा. दूसरो की ग़लतियों से तो कोई इनकार नही कर रहा, लेकिन अपने घर मे भी कुछ समस्याए हैं. मैं, धर्म ग्रंथों के उन हिस्सो पे ध्यान आकर्षित करने की कोशिश करता हूँ, जिसकी एक विशेष व्याख्या, इस तरह की कट्टरता को बढ़ावा देती है. इस विषय पे हमे क्या करना चाहिए, हमे सोचना होगा.

      जैसे कि मस्जीदे अल जर्रार का ज़िक्र मैने इसलिए किया कि शियाओं और अहमदियो की मस्जिद पे हमले ठीक उसी तरह से किए जाते हैं, हमलावर उन्ही ग्रंथों की आड़ मे ये सोच लेता है कि उसने कोई इस्लाम के खिलाफ काम नही किया. देखिए समस्या तो है, लगातार बढ़ भी रही है.

      Reply
    • December 17, 2015 at 9:41 am
      Permalink

      एक बात और है, कोई भी व्यक्ति चाहे वो मुस्लिम हो, हिंदू हो, कट्टर हो, तालिबानी, जंगी, बजरंगी जो भी हो, बेगुनाहो की हत्या को उचित नही ठहराता. अंतर सिर्फ़ बेगुनाह की परिभाषा और समझ मे है.

      लादेन को भी अपनी हिंसक कृत्य, बेगुनाहो के खिलाफ नही, बल्कि इस्लाम के दुश्मनो के खिलाफ जंग लगी थी. isis वाले भी शियाओं को मुनफिक और इस्लाम का दुश्मन मानते आए हैं, इसीलिए उन्हे मार रहे हैं. तकफ़िरी के उदाहरण तो अपवाद नही. सऊदी के टीवी चैनल्स पे ये आता रहता है.

      इसरार अहमद साहब पाकिस्तान और पूरी दुनिया मे मुस्लिम आलीमो मे प्रतिष्ठित थे, वो टीवी पे बोलते हैं कि अहमाड़ियो को संसद मे प्रस्ताव पारित करके सिर्फ़ गैर मुस्लिम कह देना काफ़ी नही, पूरा इंसाफ़ तब होगा, जब इन्हे मुर्तिद घोषित करके फाँसी दी जाएगी.

      आप और हम लोग, उनकी इन बातो से असहमत होते हुए भी उन्हे, यहूदी या मोसाद का एजेंट नही कह पाते. इस्लाम से खारिज नही कर पाते, क्युन्कि वो इस्लाम के ग्रंथो का हवाला देते हैं, और हम तफसीरो की अनेको दलीलो के बावजूद उनके मुँह बंद नही कर पाते.

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      • January 26, 2016 at 8:08 pm
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        Comment. Zakir Ji मैं अाप की बात से सहमत हूँ हन्नान साहब तो बात को साच्चाइ और वास्तविकता की ओर न लेजाकर बल्कि बरगलाने और काल्पनिक ढन्ग से पेश करने का जिम्मेवारी ले रखा है जो कि यह पूरी तरह स्पष्ट करता है की इनका व्यक्तिगत विचार,समझ,बुद्धिमत्ता किस पेेमाने पर है

        Reply
  • October 21, 2017 at 8:38 pm
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    Purushottam Agrawal
    1 hr ·
    इधर देखा कि मुगलों से अंग्रेजों की तुलना करते हुए बताया जा रहा है कि अंग्रेजी राज तो बहुत अच्छा था, रेल लाया, टेलीग्राफ लाया…इस तरह के “राष्ट्रवादियों” के अलावा भी बहुत से जनवादी-प्रगतिशील लोग भी भारत में अंग्रेजी राज के प्रति भारी कृतज्ञता का अनुभव करते है। इन सबकी सेवा में अपनी पुस्तक “अकथ कहानी प्रेम की: कबीर की कविता और उनका समय” ( 2009) का एक अंश पेश कर रहा हूँ।
    भारत में अंग्रेजी राज की भूमिका के बारे में माइक डेविस की पुस्तक ‘ लेट विक्टोरियन होलोकॉस्ट्सः एल निनो फेमाइंस ऐंड मेकिंग ऑफ दि थर्ड वर्ल्ड ’(2001) में कुछ सूचनाएं हैं। यूरोप में ‘होलोकॉस्ट’ लगभग पारिभाषिक शब्द है। इसका प्रयोग बीसवीं सदी में, नाजियों द्वारा किये गये यहूदियों के जातिनाश के लिये किया जाता है। माइक डेविस याद दिलाना चाहते हैं कि परम उदार अंग्रेजी राज परम करुणामयी विक्टोरिया के शासन-काल में भारत में वैसा ही कुछ कर रहा था। डेविस के अनुसार, 1876-1878 के तीन सालों में साठ से अस्सी लाख हिन्दुस्तानी अकाल के कारण काल के ग्रास बने।1896-97 और फिर 1899-1900 के अकालों में मरने वालों की तादाद थी- पौने दो करोड़ से दो करोड़ के बीच। याने, राजराजेश्वरी, ‘चाँदी की कटोरी सी विक्टोरिया रानी’ के राज्यकाल के इन लगभग पचीस सालों में, औसतन हर साल, अधिक नहीं, केवल दस लाख लोग काल के गाल में समा गये थे।
    28 अप्रैल 2009 के ‘दि टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रसिद्ध जनवादी अर्थशास्त्री जां द्रेज ने एक लिखा। उनका इरादा नेक ही था। भारत की सारी समस्याएं विदेशियों ने ही पैदा की है इस धारणा का खंडन जरूरी है। लेकिन ऐतिहासिक तथ्यों का ध्यान रखना भी जरूरी है। दक्षिणपंथी राजनीति के विरुद्ध तात्कालिक पॉलिमिक्स के उत्साह में औपनिवेशिक सत्ता को नेकचलनी के निराधार प्रमाणपत्र देने के नतीजे खराब ही होते हैं, आपके इरादे कितने ही नेक क्यों न हों। जां द्रेज ने बड़े जोश के साथ रेखांकित किया है कि रामायण और महाभारत के जमाने में भी भारत में अकाल पड़ते थे। भारत इफरात का समाज (‘लैंड ऑफ एंबंडेस’) कभी भी नहीं था।
    सर्वथा सत्यकथन है। भला कौन ‘वस्तुनिष्ठ चेतना संपन्न’ व्यक्ति नकार सकता है, ब्रिटिशपूर्व भारत के पिछड़ेपन के ध्रुव सत्य को! निवेदन इसी के साथ माइक डेविस तथा अन्य गंभीर शोधकर्ताओं द्वारा रेखांकित किये गये इस छोटे से तथ्य को भी याद रखने का है कि 1770 से 1890 के बीच के एक सौ बीस सालों की “आधुनिक” अवधि में भारत में इकत्तीस बड़े अकाल पड़े थे और उसके पहले के “पिछड़ेपन” के पूरे दो हजार सालों में सत्रह। अकेले 1769-1770 में ही, कंपनी की लूट और मौसम के प्रकोप ने मिलकर , “बंगाल की एक तिहाई आबादी को भुखमरी और मौत के मुँह में धकेल दिया था”। उस समय बंगाल की आबादी थी, डेढ़ करोड़, इसका एक तिहाई याने पचास लाख लोग! यह सिलसिला दूसरे महायुद्ध के दौरान “प्रगतिशील” अंग्रेजी राज द्वारा पैदा किए गए, ‘बंगाल के काल’ तक जारी रहा।
    प्राकृतिक विपदा से अधिक क्रूर थी औपनिवेशिक शासकों की निष्ठुरता। अकाल पहले भी पड़ते थे, लेकिन ‘पौर्वात्य निरंकुशता’(ओरिएंटल डेस्पॉटिज्म) के शिकार जिन्हें बताया जाता है,वे ब्रिटिशपूर्व शासक फसल के आधार पर लगान लेते थे। जिस साल फसल अच्छी न हो, उस साल किसान की देनदारी अपने-आप घट जाती थी।‘प्रगतिशील’ अंग्रेजी राज को अपने साम्राज्यवादी युद्धों के लिये पैसा चाहिए था, उसने उपज के परिमाण की बजाय जोत के आकार के आधार पर ‘रेवेन्यू’ वसूलना शुरु किया। ऊपर से अकाल आदि के समय सरकार द्वारा राहत देने की ‘प्रतिक्रियावादी’ भारतीय शासकों की पिछड़ेपन से ग्रस्त पद्धति को पूरी तरह त्याग दिया। 1878 के अकाल आयोग की रिपोर्ट में दो टूक कहा गया, ‘ अकाल के समय किसानों और प्रजा को राहत देने का सिद्धांत यदि मान लें, तो यह भी मानना होगा कि अन्य स्थितियों में भी राहत दी जाए। ऐसा मान लेने के परिणाम घातक होंगे’। ऐसे घातक परिणामों से ‘राज’ को बचाने के लिये वायसरॉय लिटन ने स्थानीय प्रशासकों को कड़ी हिदायत दी कि ‘ कीमतें घटाने के लिये सरकारी तौर पर किसी भी तरह का कोई हस्तक्षेप करने की बात सोचें तक नहीं’ और ‘मानवतावादी प्रलाप’ ( ह्यूमनटेरियन हिस्टेरिक्स) की बीमारी से बच कर रहें। 1899 के अकाल के प्रसंग में लॉर्ड कर्जन ने फरमाया कि ‘अकालग्रस्त लोगों की सहायता करके उनकी आत्मनिर्भरता को घटाना और उनकी नैतिक शक्ति को कम करना, असल में पब्लिक क्राइम होगा’।
    भारत के आम लोगों के आत्मसम्मान की इस करुण कर्जनीय चिंता से जो गद्-गद् न हो जाए, अंग्रेजों के हिसाब से भी और आजकल के कुछ क्रांतिकारियों (और राष्ट्रवादियों) के हिसाब से भी, वह एहसान-फरामोश है!
    1899-1900 ईस्वी याने विक्रमी संवत 1956। ‘छप्पनिया अकाल’ उत्तर भारत की लोकस्मृति में लंबे अरसे तक प्रकृति के कोप और शासन की निष्ठुरता का रूपक बन कर मौजूद रहा। प्राकृतिक विपदा और शासकीय निष्ठुरता के डरावने संयोग को ‘छप्पनिया अकाल जैसा हाल’ कहते परिवार और मुहल्ले के बुजुर्ग मुझे आज तक याद हैं।
    अकाल निस्संदेह पहले भी पड़ते थे, हालाँकि अंग्रेजी राज के प्रगतिशील चरण पिछडे़ भारत में पड़ने के पहले न तो इतनी जल्दी-जल्दी पड़ते थे, न इतने लोगों को ग्रसते थे।‘पौर्वात्य निरंकुशता’ अकाल के समय राहत पहुंचाने को ह्यूमनटेरियन हिस्टेरिक्स की बीमारी नहीं, शासक का कर्तव्य मानती थी। 1857 के विद्रोही जिस “प्राचीन व्यवस्था” के पक्ष में होने के कारण रंग-बिरंगे क्रांतिकारियों के कोपभाजन बनते हैं, उसे यह गौरव सचमुच हासिल नहीं हो सकता था कि औसतन हर साल दस लाख मौतें अकाल के कारण हो जाएं, और प्रशासक ‘मानवतावादी प्रलाप की बीमारी’ से दूर बने रहें!
    ब्रिटिश राज को दलितों-पिछड़ो का उद्धारक और 1857 के विद्रोहियों को ब्राह्मणवादी बताने वालों को अनुमान लगाना चाहिए कि चौथाई सदी में अकाल के कारण काल के ग्रास में समा जाने वाले हमारे इन ढाई-तीन करोड़ अभागे पूर्वजों में से कितने दलित-पिछड़े रहे होंगे और कितने ब्राह्मणवादी!
    स्वयं ब्रिटिश प्रशासन की एक रिपोर्ट (1881) के अनुसार अकाल के शिकार बनने वालों में से अस्सी फीसदी समाज के दरिद्रतम तबकों के थे!
    गरीबी से लड़ने को प्रतिबद्ध जां द्रेज और विभिन्न क्रांतिकारियों के स्मृति-तंत्र से माइक डेविस द्वारा रेखांकित यह बात भी गायब है कि “ भारत में ब्रिटिश राज के इतिहास को यदि एक तथ्य में समेटना हो तो वह तथ्य है: 1757 से लेकर 1947 तक भारत की प्रति व्यक्ति आय में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई”। (जोर मेरा)
    भारत में अंग्रेजों के देर से आने और जल्दी चले जाने से दुखी आत्माएं जरा यह भी पता लगाएं कि इन एक सौ नब्बे सालों में इंग्लैंड की प्रति व्यक्ति आय में कितना इजाफा हुआ।
    नियाल फर्ग्युसन ने 2002 में एक किताब लिखी थी—‘एंपायर: दि राइज ऐंड डिमाइज़ ऑफ दि ब्रिटिश वर्ल्ड ऑर्डर ऐंड दि लेसंस फॉर दि ग्लोबल पॉवर’। इसमें उन्होंने ब्रिटिश राज को दुनिया भर में कानून का राज कायम करने, और बुद्धू गैर-यूरोपीयों की चेतना का “आधुनिकीकरण” करने का श्रेय तो दिया ही, गिरमटिया मजदूरी की “प्रगतिशील” भूमिका पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। बिहार, उ0प्र0, आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु से जो लाखों लोग दास बना कर मारीशस और वेस्ट इंडीज ले जाए गए, जिनके ऊपर दानवीय अत्याचार किए गए, फर्ग्युसन के अनुसार उन्हें भी ब्रिटिश राज का आभारी होना चाहिए, क्योंकि आखिरकार उन्हें रोजगार तो मिला। विश्व-व्यापार की तरक्की में तो इस कमखर्च, ‘रेशनल’ पद्धति का योगदान स्वयंसिद्ध है ही। पहले, कृत्रिम अकालों की रचना करना, करोड़ों लोगों को तड़प-तड़प कर मरने के लिए विवश कर देना—फिर, उन्हें दास बना कर हजारों मील दूर ले जाकर पटक देना, साम्राज्यवादी ‘रेशनलिटी’ और ‘सिविलाइजिंग मिशन’ का सार यही था। फर्ग्युसन साहब को अफसोस इसी बात का है कि एहसान फरामोश गैर-यूरोपीयों के कारण यह ‘मिशन’ पूरा न हो सका, और अब की ‘ग्लोबल पॉवर’ के लिए ‘लेसन’ यही है कि वह इस अधूरे छूट गए मिशन को जल्दी से जल्दी से पूरा करे।
    जहाँ तक असभ्य गैर-यूरोपीयों को कानून का राज सिखाने की बात है, तो एक कानून 1836 में बनाया गया ‘ठगी एक्ट’ भी था, जिसमें व्यवस्था की गयी थी, “जिस किसी के भी बारे में यह साबित हो कि वह इस कानून के पास होने के बाद या पहले ठगों के गिरोह से संबद्ध रहा है, उसे बामशक्कत उम्र कैद दी जाएगी”।
    याने जरूरी नहीं कि कोई ठगी का अपराध करे, सारी उम्र जेल में सड़ाने के लिए इतना ही काफी है कि कभी, किसी जमाने में उसका ताल्लुक ‘ठगों के किसी गिरोह से’ रहा हो।
    क्या हो सकता है,इससे उम्दा कानून का राज! क्या हो सकता है, इससे बढ़िया ढंग जड़, मूर्ख भारतीयों को कानून का राज सिखाने का। सारे के सारे जनसमूहों को जन्म से ही अपराधी घोषित कर देने के, उनसे कभी भी संबद्ध रहे किसी भी व्यक्ति को जन्म से ही सजा के लायक अपराधी मानने के ऐसे कारनामे और भी किए गए थे। औपनिवेशिक सत्ता और ज्ञानकांड की भारतीय समाज के वर्णाश्रमवादियों के साथ जुगलबंदी स्वाभाविक ही थी।
    Purushottam Agrawal

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