क्या देश में रहने भर से किसी को भारतीय मान लिया जाना चाहिए ?

india

by –तुफैल चतुर्वेदी

नरेंद्र मोदी जी ने लोकसभा में भारतीयों की बारह सौ साल की गुलामी की मानसिकता का जिक्र किया है. जे.एन.यू. के वामपंथी ढपोरशंखों, ऐ.सी. कमरों में बैठे झूठे सेकुलरों ने इसे ” संघ परिवार की पुख्ता विचारधारा का यह प्रहार अरब मुल्कों से आई उस इस्लामी सभ्यता पर माना है, जिसका एक तबका उनके अनुसार देश का हिस्सा बन चुका है”.इतिहास की रौशनी में बात करें तो भारत पर हूणों, शकों, कुषाणों, यवनों, अरबों, ईरानियों, तुर्कों, मंगोलों के प्रमुख हमले हुए हैं. सारे ही हमले अभी तक इतिहास में पढ़ाये जाते हैं. इनमें से कौन से हमले इतिहास से बाहर हो गए ? फिर इस्लाम के सन्दर्भ में ही देश का हिस्सा बनने से क्या अभिप्राय है ?

आज कोई भी व्यक्ति हूणों, शकों, कुषाणों का भारत में अस्तित्व ढूंढना चाहे तो यह संभव नहीं है. भारतीयता की वेगवती गंगा ने बाहर से आये पानी के इस रेले को कब का अपना लिया और वो पानी अब गंगा से अलग नहीं ढूँढा जा सकता. यवनों के हमले भारत की धुर पश्चिमी सीमा ईरान से लगते क्षेत्र से शुरू हो कर मथुरा तक हुए थे. माना जाता है कि मथुरा के चतुर्वेदी समाज में यवन रक्त है. अतिरिक्त गोरा रंग, नीली आँखें, धारदार तीखी नाक जिसे आज भी यूनानी नाक कहा जाता है, इत्यादि गुण उन्हें यूनानी मूल से प्राप्त हुए हैं मगर मथुरा के चतुर्वेदियों में यवन रक्त नहीं ढूँढा जा सकता, न ही वो अपना उत्स यूनानियों में ढूंढने में उत्सुक हैं. मंगोल दिल्ली के मुस्लिम सुलतानों की लूट-मार, ठुकाई-पिटाई कर के हमलों के साथ ही साथ वापस चले गए थे.

किन्तु अरबों, ईरानियों, तुर्कों को आज भी भारत में पहचाना जा सकता है. उनकी भाषा में आज भी अरबी, फारसी, तुर्की के शब्दों की भरमार है. उनका पहनावा आज भी सीमा पार अपने स्रोत ढूंढता है. मुसलमानी जुलूसों में आज भी घोड़े पर सवार चार-छह लोगों को अरबी कपडे पहने उसका नेतृत्व करते पाया जाता है. जुलूस के आगे-आगे तलवार लिए ये लोग स्वयं को काफिरों को क़त्ल करती हुई ऐतिहासिक गाजी मनस्थिति में होते हैं. जुलूस में लगने वाले नारे “नारा ए तकबीर-अल्लाहो अकबर” “देखो हमारे नबी की शान-बच्चा बच्चा है कुर्बान” “देखो हमारे अली की शान-बच्चा बच्चा है कुर्बान” भी इसी बात का ढिंढोरा पीटते हैं कि हमारा इतिहास यहाँ का नहीं है. हम आज भी नबी, अली और न जाने किन-किन से मानसिक, आत्मिक रूप से जुड़े हुए हैं….तो इन वामपंथी ढपोरशंखों, झूठे सेकुलरों का इस्लामी सभ्यता के देश का हिस्सा बन जाने से क्या अभिप्राय है ?

क्या देश पर हमला करने के बाद हमें लूट कर वापस चले जाने वाले ही आक्रमणकारी कहलायेंगे और देश में रह कर ही लूट की सदियों व्यवस्था करने वाले देशवासी कहलायेंगे ? जिस जघन्य आपराधिक व्यवस्था ने हमारे प्रत्येक महत्वपूर्ण मंदिर को तोड़ा, जिस व्यवस्था ने हमारे माथे दाग कर हमें गुलाम बनाने का महापराध किया, जिस घृणित व्यवस्था ने हमारे लाखों लोग गुलाम बना कर मध्य एशिया के बाजारों में बेच दिए, उसे देश का हिस्सा बन चुका माना जायेगा ? और ऐसा तर्क, तथ्य दिए बिना केवल मनमर्जी ठूंसठांस के बल पर होगा ?

कोई मूढ़ से मूढ़ व्यक्ति भी इसराइल में हिटलर के नाम की सड़क जैसे हिटलर मार्ग, हिटलर भवन या हिटलर के नाम के डाक टिकिट की कल्पना कर सकता है ? पूरी छूट लीजिये. किसी वज्र मूर्ख, परले सिरे के बुद्धू यहाँ तक कि शहज़ादे की भी कल्पना कीजिये और उनकी ओर से उत्तर दीजिये. निश्चित रूप से महान बौड़म भी ऐसी कल्पना नहीं कर सकता. अब दिल्ली में राज-पथ के दाएं-बाएं केवल पंद्रह मिनिट के लिए सडकों पर निकलिए. आप बाबर रोड, हुमायूँ रोड , अकबर रोड, शाहजहाँ रोड, औरंगज़ेब रोड पाएंगे. मैं इन वामपंथी ढपोरशंखों, झूठे सेकुलरों से इस बारे में प्रश्न करता हूँ तो वो कहते हैं कि मुसलमान स्वयं को अल्पसंख्यक उपेक्षित, दमित न मानें इसके लिए ये मानसिक उपचार है.

मेरे जानकारी के अनुसार भारतीय महाद्वीप में मुसलमान कभी भी बहुसंख्यक नहीं रहे. हमारे सारे गुलाम हिस्से जोड़ कर उनकी जनसँख्या की तुलना की जाये तो भी आज तक मुसलमान बहुसंख्यक नहीं हुए हैं. इस्लाम जब बहुसंख्यक रहा ही नहीं तो अल्पसंख्यक होने का रोना कैसा और उसके उपचार की क्या आवश्यकता ? हाँ इसमें एक पेंच है. अब इस्लामी ताकत सत्तासीन नहीं है और वो हमें गुलाम बना कर बेचने, हमारे मंदिर तोड़ने, हमारी स्त्रियों से बलात्कार करने, हमारे माथे दागने और हमसे जजिया वसूलने की स्थिति में नहीं है. ये वो ग्रंथि है जिसके उपचार की बात दबा-छुपा कर की जाती है. क्या इस ग्रंथि का ऐसा इलाज जिससे ये और बढे कोई देशभक्त सोच सकता है ? देश का पैंतीस प्रतिशत हिस्सा गुलाम बन चुका है शेष को बनाने की जोर-शोर से तैयारी चल रही है. संसार भर से इस काम के लिए धन आ रहा है. जनसँख्या में परिवर्तन, धर्मान्तरण, आतंरिक सुरक्षा पर संकट खड़े किया जाना…हर तरह से भारत को खंड-खंड करने का काम चल रहा है.

यहाँ एक गंभीर प्रश्न मेरे मन में बार-बार उठता है. हम भारतवासी राष्ट्रीयता को कब परिभाषित करेंगे ? किसी भी वस्तु, विचार, भाव की स्पष्ट परिभाषा न होने से उसका बिम्ब नहीं बनता. ऐसा न होने से उसके नियम, करणीय और अकरणीय नहीं तय होते. उसके प्रति लगाव उत्पन्न नहीं होता. ये अकारण नहीं है कि सेना में सैनिकों की कमी है. ये अकारण नहीं है कि भारत के श्रेष्ठतम वैज्ञानिक, इंजीनियर, डाक्टर विदेश चले जाते रहे हैं. ये अकारण नहीं है कि देश का धन विदेशी बैंकों में छुपा कर रखा गया है. ये रोग का लक्षण मात्र है और इसका कारण देशवासियों का राष्ट्र के प्रति निष्ठा कम होते जाना है.

एक उदाहरण से बात और स्पष्ट हो जाएगी. अंग्रेजी के मसखरे लेखक खुशवंत सिंह, जो हिजड़े से इश्क और न जाने कौन-कौन सी बेहूदा कहानियां लिखने के कारण चर्चित थे, ने दिल्ली के आस-पास बसे गूजरों और जाटों को स्वाभाविक लुटेरी जाति लिखा था और कहा था कि इन जातियों के लोग मुगलों को भी लूट-मार से तंग करते रहते थे. इन्हें ऐसा लिखते हुए ये ध्यान नहीं आया कि दिल्ली मुगलों की नहीं है और वो इसके स्वाभाविक उत्तराधिकारी नहीं थे.

इस बौड़म सोच का कारण ही ये है कि खुशवंत सिंह की राष्ट्रीयता की सोच दूषित थी. खुशवंत सिंह ठेकेदार सोभा सिंह के बेटे थे. इसी सोभा सिंह ने वर्तमान राष्ट्रपति भवन, कनॉट प्लेस, लुटियंस दिल्ली के लगभग सभी मुख्य भवन बनाये हैं. अंग्रेजों से इसको ये सारे ठेके मिलने का कारण ये था कि ठेकेदार सोभा सिंह की अकेली गवाही पर शहीद भगत सिंह, शहीद सुख देव और शहीद राजगुरु को फांसी हुई थी. देश की पीठ में छुरा भोंकने वाले ठेकेदार सोभा सिंह केंद्रीय सत्ता के बगलगीर रहे. आज तो लोग भूल चुके हैं मगर उस समय के लोगों को पता था और उस काल के समाज ने इसे सहन किया. यदि समाज के लोग ठेकेदार सोभा सिंह से थू-थू करते, केवल सामान्य दैनंदिन व्यवहार ही बंद कर देते तो सदैव के लिए उदाहरण बन जाता.

भारत में मुस्लिम सत्ता के इतिहास को पढ़ाने के समय मुस्लिम राजवंशों को याद कराने के लिए शिक्षक एक सूत्र का प्रयोग करते हैं. गू खा तसले में. इस सूत्र का विस्तार गुलाम वंश, ख़िलजी वंश, तुगलक वंश, सैय्यद वंश, लोधी वंश और मुग़ल वंश होता है. मैं इन इन वामपंथी ढपोरशंखों, झूठे सेकुलरों को तसले के इस उपयोग का प्रस्ताव नहीं दे रहा हूँ मगर एक प्रश्न निश्चित रूप से पूछना चाहता हूँ कि मेरे घर में किसी ने चोरी की तो वो चोर और किसी ने मेरे घर पर कब्ज़ा कर लिया तो घर का मालिक ? आक्रमणकारी राष्ट्र का हिस्सा कैसे और कब बने ? क्या देश में रहने भर से किसी को भारतीय मान लिया जाना चाहिए ? इस तर्क से तो विदेशी दूतावासों में काम करने वाले सारे विदेशी भारतीय हैं. नागरिकता ही पैमाना है तो देश में घुस आये सारे बांग्लादेशी जिन्होंने कबके राशन कार्ड, वोटर कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस बनवा लिए भारतीय हैं. क्या ये अनर्गल प्रलाप पेट में भरी गैस को उपयुक्त मार्ग से बाहर निकालने की जगह मुंह से निकालना नहीं है ?

(Visited 15 times, 1 visits today)

11 thoughts on “क्या देश में रहने भर से किसी को भारतीय मान लिया जाना चाहिए ?

  • August 25, 2015 at 7:57 am
    Permalink

    तुफैल चतुर्वेदी साम्प्रदयिक लेखन की दुनिया के नए उभरते हुए खिलाड़ी हे एक फ्लॉप ग़ज़ल लेखक भी हे शायद एक साहित्यिक पत्रिका भी निकालते हे लफ्ज़ नाम से घोर साम्प्रदायिक होने के कारण शायद ग़ज़लों और साहित्य की दुनिया में नहीं चल पाये क्योकि भारतीय उपमहादीप में कलाकार का सौ % सेकुलर होना अनिवार्य हे वर्ना उसकी कला ही मर जायेगी या दब जायेगी खेर संघ के लिए ये कई एकतरफा साम्प्रदयिक लेख लिखते रहते हे एक मुस्लिम जुलुस से कुछ घंटो के लिए जाम हुआ था ( हालांकि इनका जुमला अच्छा था की सभी गाड़ियों को नयी नवेली दुल्हन की तरह सिमट कर चलना पड़ रहा था ) तो इन्होने इस” गुंडागर्दी ” के खिलाफ फ़ौरन लेख लिखा था जबकि जुलुस और जाम मामूली ही होगा एकाध सड़क और कुछ घंटो की हि बात होगी क्योकि मुसलमानो में बहुमत तो हम देवबंदियों का हि हे जो ना तो कोई भि जुलुस निकालते हे ना उसका हिस्स्सा बनते हे खेर तुफैल साहब को सख्त तकलीफ हुई और अब जब सावन में पुरे कई कई दिनों के लिए पुरे इलाके जाम हो जाते हे तो तुफैल साहब ज़ाहिर हे एक ”लफ्ज़ ” नहीं फूटता

    Reply
  • August 25, 2015 at 11:47 am
    Permalink

    सिकंदर साहब

    आप सही कह रहे है , अब इसी लेख को देख लीजिये — क्या कहना चाहते है समझ में नहीं आ रहा है .

    कही का ईंट कही का कही का लोढ़ा,
    भानुमति ने कुनबा जोड़ा .

    तुफैल जी को साहित्यिक दुनिआ में वह इज्जत नहीं मिल पायी इस लिए अब साम्प्रदायिक लेखन की तरफ आ गए है . आप की बात से सहमत हु .

    Reply
    • August 25, 2015 at 2:28 pm
      Permalink

      हसन भाई संकीर्णता का और कलाकार का छत्तीस का आंकड़ा होता हे ये बात समझाने का क्रेडिट फिल्मो के शायद सबसे बढ़िया लेखक दीपक असीम उर्फ़ अनहद को हे जिन्होंने सरफ़रोश फिल्म के बारे में लिखता था की इस फिल्म ” गुलाम अली टाइप किसी ग़ज़ल गायक को आतंकवादी दिखाया जाना बिलकुल गलत था क्योकि कोई आतंकवादी अच्छा ग़ा ही नहीं सकता ” या लिख ही नहीं सकता हँसा ही नहीं सकता या चित्र बना ही नहीं सकता हे अगर कोई अच्छा कलाकार संकीर्ण बनेगा तो उसकी कला ही मर जायेगी इसका लाजवाब उदहारण वो मुस्लिम कलाकार हे जो भारत छोड़ कर पाकिस्तान चले गए थे इन सबकी कला मर गयी चाहे वो नूरजहाँ हो या जोश मलीहाबादी , मंटो जबकि जिन मुस्लिम कलाकारों ने गांधी नेहरू के पीछे चलना उचित समझा वो छा गए जैसे रफ़ी दिलीप बिस्मिल्लाह खान नौशाद मकबूल फ़िदा और सेकड़ो नाम

      Reply
      • September 9, 2015 at 6:08 pm
        Permalink

        2012 ”बंजर भूमि
        विभाजन से पूर्व पाकिस्तान में इतनी प्रतिभाएं भरी पड़ी थीं कि जो यहां आता था बड़ा कलाकार, कवि, लेखक और संगीतकार बन जाता था। लेकिन पाकिस्तान बनते ही पता नहीं इस बौद्धिक कौशल को कौन-सा सांप सूंघ गया? जो भाग विविध कलाओं का सर्जक था वह अचानक ही बंजर भूमि में बदल गया। दस-बीस नुसरत फतेह अली जैसे पैदा भी हुए तो उन्हें बहुत जल्द ग्रहण लग गया। केवल इतना ही नहीं, पाकिस्तान बन जाने के पश्चात मजहबी जुनून में पागल होकर अथवा अपनी सुरक्षा की चिंता करके जो पाकिस्तान पलायन कर गए उनके भविष्य के आगे प्रश्नवाचक चिन्ह लग गया। भारत में अपनी आवाज से लोगों को दीवाना बनाने वाली नूरजहां के जीवन का नूर ही उतर गया। पाकिस्तान में उनकी बनी फिल्म दुपट्टे में वे लिपट कर रह गईं। उनके पति शौकत, जो सफल निदेशक थे, गुमनामी के गर्त्त में चले गए। जुगुनू फिल्म के संगीत निदेशक फिरोज निजामी कहां लुप्त हो गए? चर्चित कमेडियन नूर मोहम्मद चार्ली, चरित्र अभिनेता शाह नवाज, एस. नजीर पाकिस्तान की धरती में कहां समा गए, इसका उत्तर देने वाला कोई नहीं है। बेगम पारा से पूछिए कि वे पाकिस्तान से पुन: भारत क्यों लौट आईं?सिद्ध उर्दू कवि जोश मलीहाबादी, महान कहानीकार हसन मंटो और नियाज फतेहपुरी को कौन से नाग ने डंस लिया, इसका उत्तर पाकिस्तान के पास नहीं है। प्रसिद्ध कवि फैज अहमद फैज का इन दिनों शताब्दी समारोह चल रहा है। लेकिन पाकिस्तान में नहीं, भारत में। 17 दिसम्बर को फैज की याद में एक विशाल मुशायरा मुम्बई के नेहरू सेंटर में आयोजित किया गया। ” याद रहे की मोदी सरकार भारत की पहली गैर नेहरूवादी सरकार हे इसने भी भारत को हिन्दू पाकिस्तान बनाने की ठानी हुई हे ये भारत को भी बंजर भूमि बना देंगे

        Reply
      • September 9, 2015 at 6:20 pm
        Permalink

        एक और महत्वपूर्ण नाम हे साहिर लुधियानवी जिन्होंने ये कमाल किया की मुसलमान होने के बाद भी पाकिस्तान बनने के बाद उल्टा वहा से भाग आये वो भी लाहोर जैसे जीवंत शहर से वहा से ये आ गए औ मंटो की अक्ल पर पत्थर पड़ गए थे की गैरसाम्प्रदयिक कारणों से नाराज़ होकर वो मुंबई से लाहोर चले गए ये मंटो की भयंकर भूल थी वो चाहे भूटान चले जाते मगर उन्हें पाकिस्तान कतई नहीं जाना चाहिए था नतीजा कुछ ही साल में चल बसे उधर टू नेशन थ्योरी को लात मारकर भारत चले आये साहिर बहुत ही बड़े शायर और शायद की फ़िल्मी दुनिया में सबसे महंगे गीतकार बने ये हे की जो कोई टू नेशन थ्योरी पर ईमान लाएगा उसकी कला मर जायेगी यही कारण हे की इतना बड़ा संघ परिवार एक भी ढंग का लेखक कलाकार रंगकर्मी नहीं दे सका हे फ़िल्मी दुनिया में जो इनके समर्थक से हे वो कितने मामूली हे सब जानते हे और तो और देखे अल्लाह माफ़ करे अनुपम खेर जैसा कलाकार जो यदा कदा भाजपा के समर्थन में ट्वीट करते हे उसका भी नतीजा देखिये बरसो से उन्होंने सिर्फ साधरण रोल और फिल्मो की ही झड़ी लगाईं हुई हे कोई यादगार नहीं बरसो हो गए ? मतलब आप समझ सकते हे की टू नेशन थ्योरी का हल्का से टच भी कितना घातक होता हे

        Reply
        • October 14, 2015 at 6:16 pm
          Permalink

          अब देखिये अनुपम खेर खुल कर मोदी समर्थन में आ गए हे मतलब ये हे की वो टू नेशन थ्योरी में विश्वाश करते हे और भारत को हिन्दू राष्ट्र समझते हे तो नतीजा वही जो होता हे साम्प्रदायिकता की दुनिया में जाते ही कला मर जाती हे अनुपम खेर की भी कला मर चुकी हे पिछले दसियों बरसो से अमिताब की तरह ही अनुपम खेर ने भी बेहिसाब और बेकार फिल्मे ही दी हे हमें इनसालो में दीपक डोबरियाल तक का अभिनय तो याद हे ( ओमकारा तनु ) मगर अनुपम खेर की कोई परफॉर्मेंस हमे याद नहीं हे क्योकि उनकी कला मर चुकी हे

          Reply
  • August 25, 2015 at 2:06 pm
    Permalink

    वैसे तो संघ एड़ी चोटी का जोर लगा रहा हे सिर्फ ये साबित करने में की आर्य बाहर से नहीं आये थे और ये संघी साहब खुद ही अपना यूनानी मूल बता रहे हे ? खेर आप गौर करे तो पाएंगे इस तरह के लेख केवल दो ही जातिया लिखती हे सारे नाम यही होंगे मिश्रा शर्मा पाण्डेय गुप्ता चतुर्वेदी 99 % नाम यही होंगे में नहीं कहता की मुसलमानो ने अत्याचार नहीं किये हां किये थे मगर क्या इन महापुरुषों ने कुछ कम किये ? क्या खून पीने में और खून चूसने में कोई बहुत बड़ा फर्क हे क्या मध्य एशिया के बाज़ारो में बेचने में और भारत में ही भारत के मूल निवासियों से गुलामी करवाने में कोई बहुत बड़ा फर्क हे ? लेख पढ़े तो हमारी बात सही सिद्ध होगी की आखिरकार ये सब संघ सावरकर पाकिस्तान कश्मीर अयोध्या जाकिर नाइक ज़ैद हामिद वगेरह वगेरह ये सब लालकिले पर से तिरंगा हटाने और उसकी जगह भगवा या हरा झंडा फहराने की जद्दोजहद ही तो हे पिछले दिनों आतंकवाद के ” भीष्म पितामह ”यानी हमीद गुल तो यही सपना लिए लिए फौत हो गए हे

    Reply
  • August 25, 2015 at 9:45 pm
    Permalink

    ”ग्रेजों से इसको ये सारे ठेके मिलने का कारण ये था कि ठेकेदार सोभा सिंह की अकेली गवाही पर शहीद भगत सिंह, शहीद सुख देव और शहीद राजगुरु को फांसी हुई थी. देश की पीठ में छुरा भोंकने वाले ठेकेदार सोभा सिंह केंद्रीय सत्ता के बगलगीर रहे. आज तो लोग भूल चुके हैं मगर उस समय के लोगों ” ” झूठ बोलना तथ्यों की माँबहन एक करना साम्प्रदायिक शक्तियों के लिए रोजमर्रा का काम हे यही इनका आक्सीजन हे अब देखिये अंग्रजो की नई दिल्ली तो 1911 से होकर 1931 में बनकर पूरी हो चुकी थी इसी वर्ष भगत सिंह को फांसी हुई थी फिर भला कौन से ठेके शोभा सिंह भगत सिंह पार्लियामेंट बम कांड में गवाही से मिले होंगे ? फिर शोभा सिंह ने भगत सिंह पर कोई आरोप नहीं लगाया था सिर्फ पहचाना था की हां यही थे जिन्होंने बम फेका था इस बात से जब भगत सिंह ने ही इंकार नहीं किया था वो खुद भी जार विरोधी रुसी शहीदो के ” प्रोपेगेंडा विथ डेथ ” से प्रभावित थे उन्होंने बम के बाद भागने की या बचने की कोई कोशिश ही नहीं की थी तो फिर भला कैसे कह सकते हे की शोभा सिंह की गवाही से ही भगत सिंह को सजा हुई ? दूसरा की भगत सिंह को इस केस में तो शायद उम्रकैद ही हुई थी भगत सिंह को फांसी तो सांडर्स मर्डर में हुई थी तुफैल सर संघी साहित्य छोड़ कर और भी बुक पढ़ा करे बहुत ही अच्छी अच्छी किताबे हे दुनिया में सिर्फ अपने पि एन ओक साहब को ही पढ़ेंगे तो यही होगा

    Reply
  • August 26, 2015 at 10:34 am
    Permalink

    Dear mr. Caturvrdi ji aap ne lambi chori ek lekh me bhartye muslmano per ek question mark lagaya hai, kripya aap batayenge jo log sadiyn se is desh me rahte hai aap un logon ko kahan jane ki salah dete hai ? Aap is se saabit ky karna chahte hai ?

    Reply
    • August 27, 2015 at 7:29 am
      Permalink

      मिश्रा जी ये लोग खासकर लोकसभा चुनाव के बाद खुल कर भड़काऊ लेखन कर रहे हे इस विषय में सारी शर्म इन लोगो ने छोड़ दी हे जैसे इन्ही के एक वैचारिक ”साढू भाई ” संघी प्रोपगेंडिस्ट हे तो वो पिछले दिनों दिनों ताज़महल को एक मनहूस मक़बरा लिखते हे उस ताज महल जिसे देखने भारत का हर दूसरा तीसरा टूरिस्ट आता हे जो भारत की पहचान हे यानी मक्सद् साफ़ हे की अधिक से अधिक घिनोनी और घटिया बाते लिखो ताकि माहोल में तनाव हो मुस्लिम धुर्वीकरण हो फिर हिन्दू धुरीवीकरण हो जो जाहिर हे इन्ही लोगो की झोली में गिरेगा ये असल में घबराये हुए हे की मोदी जी नाम के इनके प्रोपेगण्डे की पोल धीरे धीरे खुल रही हे और पता चल रहा हे की मोदी जी तो बेहद साधारण प्रतिभा और सोच के इंसान हे जिनकी क़ाबलियत सिर्फ ये हे की वो गुजरात के मुख्यमंत्र उस समय बने जब उदारीकरण का पहला चक्र पूरा हो चूका था दूसरा स्टार्ट हुआ था वही से अमीरी बेहद बढ़ी उसी का लाभ मोदी जी को मिला और हज़ारो करोड़ के खर्च से वो पि एम बन गए अब डर ये हे की जनता क्रिया की पर्तिकिर्या करेगी और वादे पुरे ना होने पर फट सकती हे इसी डर से ये लोग साम्प्रदायिकता सीमा पर तनाव का विस्फोट करके जनता का ध्यान भटकाने के मिशन पर हे

      Reply
      • August 27, 2015 at 11:29 am
        Permalink

        मोदी जी की सेल्फिशनेस् की कोई इंतिहा नहीं हे रणधीर सिंह सुमन जी ठीक कहते हे की गुजरात दंगो से जब इनका वोट बैंक मज़बूत हो रहा था तब तो गांधी नहीं याद आये थे तब तो कोई अपील नहीं की गयी थी टीवी पर आकर ? लेकिन अब जबकि गुजरात फिर हिंसा की लपेट में हे मगर इस बार उनका वोट बैंक दरक रहा हे तो फ़ौरन आ गए शान्ति के कबूतर उड़ाने ? मोदी हटाओ देश बचाओ

        Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *