क्या इंदिरा गाँधी सांप्रदायिक थीं ?

By- Mohd.Zahid

देश के विभाजन को सांप्रदायिक समस्या का अंतिम समाधान मानकर देश को विभाजित कर दिया गया। और इसी प्रक्रिया में देश में सांप्रदायिक हिंसा फैल गयी।जिसका अंत हुआ 30 जनवरी 1948 को हुई गांधी जी की हत्या के बाद। सांप्रदायिक दंगों में झुलस रहा देश गाँधी जी की हत्या के बाद अचानक रुक गया। दंगे भी अचानक रुक गये।इसके बाद अगले 14 साल देश में एक भी सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ ना कहीं से कोई सांप्रदायिक तनाव की खबर आई। ऐसा लगा कि देश में सांप्रदायिकता रोकने के लिए गाँधी जी के खून की ही ज़रूरत थी और वह बहा उसके बाद सांप्रदायिक समस्या खत्म हो गयी।

पर यह गलतफहमी ही सिद्ध हुआ और 1962 में जबलपुर (मध्य प्रदेश) में हुए भीषण सांप्रदायिक दंगें ने एक बार फिर देश में अपने वजूद का एहसास कराया।जबलपुर दंगा दो बीड़ी निर्माताओं के बीच आर्थिक परिस्पर्धा का परिणाम था। मगर इस परिस्पर्धा के इतर इस हिन्दू बीड़ी निर्माता की बेटी और मुस्लिम बीड़ी निर्माता के बेटे के बीच प्यार हो गया और दोनों के शादी करने के फैसले ने धार्मिक उन्माद पैदा किया।इसमें बड़ी भूमिका निभाई एक दैनिक समाचार पत्र ने। जिसने लिखा कि मस्जिद में लगे ट्रांसमीटर के ज़रिए पाकिस्तान जबलपुर के मुसलमानों से जुड़ा था और दंगे भड़कते गये।दरअसल 1962 के बाद भारत में दंगों का कारण पूर्वी पाकिस्तान से आए हिन्दू शरणार्थी का वर्ग था। उनके दुखों की कहानियाँ भारत के दुर्गापुर , रांची , पश्चिम बंगाल और कुछ अन्य जगहों पर दंगों का कारण बनीं।कुछ दिनों तक यह सब चलता रहा मगर 60 के दशक के अंत में इंदिरा गाँधी के आने के बाद राजनैतिक परिदृश्य बदलना शुरू हुआ।

इंदिरा गाँधी ने काँग्रेस के पुराने मठाधीशों से छुटकारा पाने के लिए काँग्रेस को तोड़ कर काँग्रेस(आई) अर्थात काँग्रेस (इंदिरा) बना ली।उसके बाद उन्होंने ताबड़तोड़ फैसले लिए , बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया , “गरीबी हटाओ” का नारा दिया और धर्मनिरपेक्षता को भारतीय लोकतंत्र का आधारस्तंभ माना।इस कारणों से दलित , मुसलमान , वामपंथी और ब्राम्हण उनके कट्टर समर्थक हो गये। और उनकी चुनावी जीत का एक ठोस वोटबैंक तैय्यार हो गया।इंदिरा गाँधी का राजनीति और सत्ता पर एकाधिकार को चुनौती देने के लिए ही काँग्रेस(ओ) , स्वतंत्र पार्टी और संघ का राजनैतिक दल जनसंघ ने गुजरात में हाथ मिला लिया।इंदिरा गाँधी के राजनैतिक आधार को तोड़ने के लिए “संघ” ने सांप्रदायिक दंगे भी कराए , 1969 में अहमदाबाद में भीषण दंगा हुआ और देश हिल गया।

इसके बाद 1970 में भिवंडी और जलगाँव में दो साल पहले ही आस्तित्व में आई बाल ठाकरे की शिवसेना की मदद से संघ ने दंगे करवाए।यही नहीं उन दंगों में शिवसेना को काँग्रेस की एक लाॅबी ने भी समर्थन दिया जिसे वामपंथ विरोधी लाॅबी कहा जाता था। यही वामंथ विरोधी लाॅबी संघ के समर्थित लोग थे मगर इंदिरा गाँधी इस सबसे आँखें मूदें रहीं।1970 के आरंभ में कोई दंगे नहीं हुए और देश भारत बंगलादेश की मुक्ति संघर्ष के लिए मदद में व्यस्त था और उस समय इंदिरा गाँधी की लोकप्रियता व देश पर पकड़ चरम पर थी।यहाँ तक कि तब के जनसंघ के अटल बिहारी बाजपेयी ने इंदिरा गाँधी को संसद में “दुर्गा” तक कहा था।यद्धपि उनकी लोकप्रियता जयप्रकाश नारायण और लोहिया के उभार के साथ गिरती गयी और इंदिरा गाँधी ने “आपातकाल” की घोषणा कर दी।

ध्यान देने की बात है कि “आपातकाल” की तमाम अफरातफरी के बावजूद देश में कोई सांप्रदायिक हिंसा नहीं हुई क्युँकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और जनसंघ के लोगों को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया।अगले चुनाव में इंदिरा गाँधी चुनाव हार गयीं।मोरारजी देसाई के नेतृत्व में समाजवादी और जनसंघ एक होकर “जनता पार्टी” बनाई और सरकार बनाई जो दोहरी सदस्यता के नाम पर गिर गयी। क्योंकि जनसंघ के नेताओं ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की सदस्यता छोड़ने से इंकार कर दिया। वह जनता पार्टी और संघ दोनों के सदस्य बने रहना चाहते थे।मगर संघ ने जैसे ही जनता पार्टी की सरकार बनी जमशेदपुर , अलीगढ , बनारस और अन्य स्थानों पर भयानक दंगे करवाए और 1977-78 में देश को भयंकर दंगे देखने को मिले।

1980 में इंदिरा गाँधी फिर चुन कर आईं मगर सांप्रदायिक दंगों के कारण इस बार मुसलमानों को लेकर उनकी सोच बदली हुई थी। वह ऐसे मध्यमवर्ग के हिन्दूओं को आकर्षित करने लगीं जिन्होंने भूमि सुधार और हरित क्रांति के कारण आर्थिक रूप से बहुत मज़बूत हो गये थे।इस दौर में इंदिरा गाँधी का ज़ोर अब धर्मनिरपेक्षता पर इतना नहीं था। यही नहीं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को लेकर भी अब वह नरम हो गयीं।इस बात के सबूत स्पष्ट दिख रही थी कि “आयरन लेडी” कहे जाने वाली इंदिरा गाँधी की काँग्रेस शासित यूपी के सारे दंगों में पीएसी मुस्लिम विरोधी भूमिका निभाती और वह आँख बंद किए मूक दर्शक बनी रहीं।यूपी पुलिस 1970 और 1980 के दशकों में पूरे राज्य में भयावह हिंसा में लिप्त पाई गई थी जिनमें फिरोज़ाबाद (1972), मुज़फ्फरनगर (1975), सुल्तानपुर (1976), संभल (1978), अलीगढ़ (1978 और 1980), मुरादाबाद (1980), मेरठ (1982 ), बहराइच (1983) और मऊ (1983) में भयानक मुस्लिम विरोधी खेल खेला।इंदिरा गाँधी का कोर वोटर होने के बावजूद मुसलमान इंदिरा गाँधी से किसी भी प्रकार की हमदर्दी हासिल ना कर सका।13 अगस्त 1980 में ईद के दिन मुरादाबाद ईदगाह में हुई पुलिस फायरिंग तो भयावह घटना थी जिसे लेकर इंदिरा गाँधी चुप रहीं और “टाइम्स आफ इंडिया” जैसे पक्षपाती रिपोर्ट पर भरोसा करती रहीं जिसके गिरिलाल जैन ने ईदगाह में हुए खून खराबा और उसके बाद हुए दंगों में विदेशी हाथ होने की बात कही और वह उसी पर यकीं करती रहीं।आयरन लेडी इस एक घटना से ही गूँगी सांप्रदायिक गुड़िया सिद्ध हो जाती है।

जो इंदिरा गाँधी बिहार के बेलछी गाँव में 10 दलितों की हत्या पर तुरंत बेलछी गाँव दौड़ी चली गयीं और बाढ़ के बावजूद हाथी पर बैठकर पीड़ितों के घर उनके दुख बाटने गयीं वही इंदिरा गाँधी दिल्ली से 140 किमी दूर 600 से अधिक मुसलमानों के पीएसी के हाथों मारे जाने के बावजूद मुरादाबाद ना जाकर मुसलमानों को ही घटना के लिए जिम्मेदार ठहराती रहीं और मुरादाबाद नहीं गयीं।यह निश्चित रूप से उनकी एक सांप्रदायिक सोच थी।क्युँकि तब आज जैसी स्थीति नहीं थी कि उनके पीड़ित मुसलमानों से मिलने पर नुकसान होता जैसे आज अखिलेश यादव और राहुल गाँधी को डर लगता है।उनके सांप्रदायिक होने का दूसरा सबूत मिनाक्षीपुरम के कुछ दलितों के इस्लाम धर्म अपनाने पर उनका खेला खेल था।दरअसल मिनाक्षीपुरम के उच्चजाति के थेवरों ने दलितों को अपमानित किया था और दलितों ने इस्लाम ग्रहण कर लिया जिससे हिन्दू सांप्रदायिक तापमान बढ़ गया और विश्व हिन्दू परिषद ने धर्म परिवर्तन के खिलाफ उग्र अभियान छेड़ दिया।

इंदिरा गाँधी ने हिन्दुओं का समर्थन लेने के लिए विहिप को प्रोत्साहित किया।इसका परिणाम यह निकला कि बिहार शरीफ (1981) , मेरठ (1982) , बंबई-भिवंडी (1984) आदि में दंगे भड़क गये जिसमें विश्व हिन्दू परिषद की उग्र भूमिका थी।इंदिरा गाँधी ने कभी भी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और विहिप की आलोचना नहीं की ना ही दंगों में उनकी भूमिका को लेकर कोई कार्यवाही की।स्पष्ट था कि इंदिरा गाँधी हिन्दू सांप्रदायिकता के पथ पर चल चुकी थीं , और इनके कार्यकाल में हुए तमाम सांप्रदायिक दंगों में पुलिस फोर्स के मुस्लिम विरोधी हिंसा की ना तो निंदा की और ना ही कोई कार्यवाही की।

जबकि यह “आयरन लेडी” चाहतीं तो संविधान में संसोधन करके सांप्रदायिक संगठनों समेत विहिप , संघ और बजरंग दल जैसों पर हमेशा के लिए प्रतिबंध लगा सकती थीं और देश को सदैव के लिए सांप्रदायिक खतरे से बचा सकती थीं।उनकी सांप्रदायिक सोच तब इन संगठनों के सहारे हिन्दू वोटों को साध रही थी , वह संघ और विहिप को समर्थन देकर मज़बूत करती रहीं और यह संगठन 1984 में उनकी हत्या के बाद ऐसा मजबूत हुए कि आज पूरी काँग्रेस को ही निगल गये।

स्पष्ट रूप से कहता हूँ कि हाँ इंदिरा गाँधी सांप्रदायिक थीं , इसके बावजूद कि वह गाँधी जी के सानिध्य में अपना बचपन गुज़ारीं।इसके अतिरिक्त वह देश के लिए बहुत कुछ कीं जिसकी तारीफ की जानी चाहिए , बस मुसलमान उनके हाथों ठग लिए गये।

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