क्या अशोक के बौद्ध धर्म स्वीकार करने और अहिंसा को बढ़ावा देने से भारत कमज़ोर हुआ?

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सांप्रदायिक राजनीति अपना एजेंडा लागू करने के लिए अतीत के इस्तेमाल में सिद्धस्त होती है। भारत के मध्यकालीन इतिहास को पहले ही तोड़ा-मरोड़ा जा चुका है। मुस्लिम राजाओं को विदेशी आक्रान्ता व हिन्दुओं के पीड़क के रूप में प्रस्तुत किया जाना आम है। और अब, प्राचीन इतिहास को तोड़-मरोड़ कर ब्राह्मणवाद को बौद्ध धर्म से श्रेष्ठ सिद्ध करने का अभियान चल रहा है।

इस अभियान के अंतर्गत सांप्रदायिक ताकतों ने सम्राट अशोक पर निशाना साधा है। नोबेल पुरस्कार विजेता अमृत्य सेन के अनुसार, हमारे देश के दो सबसे महान शासक थे अषोक और अकबर। आरएसएस के अनुषांगिक संगठन वनवासी कल्याण परिषद की राजस्थान शाखा के एक प्रकाशन के अनुसार, अशोक के बौद्ध धर्म ग्रहण करने और अहिंसा को बढ़ावा देने से विदेशी आक्रांताओं के लिए भारत पर हमला करना और उस पर विजय प्राप्त करना आसान हो गया। प्रकाशन में यह भी कहा गया है कि अशोक के नेतृत्व में बौद्ध धर्मावलंबियों ने राष्ट्रविरोधी भूमिका अदा की। उन्होंने यूनानी आक्रांताओं की मदद की ताकि वे ‘‘वैदिक धर्म’’ का नाश कर बौद्ध धर्म को उसकी खोई प्रतिष्ठा फिर से दिलवा सकें। यहां जिसे वैदिक धर्म बताया जा रहा है, वह, दरअसल, ब्राह्मणवाद है।

यह दिलचस्प है कि इस लेख में कहा गया है कि बौद्ध धर्म अपनाने के पहले तक अशोक एक महान शासक थे। इसके विपरीत, अधिकांश इतिहासविदों और चिंतकों का मानना है कि अशोक की वे मानवीय नीतियां, जिन्होंने उन्हें महान बनाया, उनके द्वारा बौद्ध धर्म अपनाने के बाद ही अस्तित्व में आईं। अषोक के बारे में जो भ्रम फैलाया जा रहा है उसके कई आयाम हैं, जिन्हें ब्राह्मणवादी हिंदू धर्म की राजनैतिक आवष्यकताओं के अनुरूप गढ़ा गया है। इनमें से बसिरपैर की एक मान्यता यह है कि भारत हमेशा से राष्ट्र रहा है। तथ्य यह है कि भारत स्वाधीनता संग्राम के दौरान राष्ट्र-राज्य के रूप में उभरा। इसके पहले तक भारत में रियासतें और साम्राज्य थे। इन रियासतों और साम्राज्यों की सीमाएं निष्चित नहीं होती थीं और किसी रियासत या राज्य का आकार उसके शासक के साहस, महत्वाकांक्षा और सैन्य शक्ति सहित अन्य कारकों के आधार पर घटता बढ़ता रहता था। कई बार कुछ शासकों को अपने राज्य से पूरी तरह से हाथ धोना पड़ता था। अशोक के शासन के पहले भी सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया था। उस दौर में राजाओं द्वारा दूसरे शासकों की भूमि को हड़पने के प्रयास बहुत आम थे। प्राचीन भारत में मौर्य एक बड़ा साम्राज्य था।

भारतीय उपमहाद्वीप पर कई राजवंषों का शासन रहा है। परंतु ऐसा कोई शासक नहीं है जिसने आज के संपूर्ण भारत पर शासन किया हो। तो फिर अशोक को निशाना क्यों बनाया जा रहा है? अशोक, मौर्य वंश के शासक बिंदुसार के उत्तराधिकारी थे। चंद्रगुप्त मौर्य ने इस साम्राज्य की नींव रखी थी और अशोक ने कलिंग (आज का ओडिसा) को साम्राज्य का हिस्सा बनाया था। कलिंग के युद्ध में भारी हिंसा हुई थी और इस खून-खराबे ने अशोक पर इतना गहरा प्रभाव डाला कि उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाने का निर्णय ले लिया। इस तरह एक आक्रामक व असंवेदनशील शासक के मानवतावादी व्यक्ति में बदलने की प्रक्रिया अशोक द्वारा बौद्ध धर्म अपनाने से शुरू हुई। उन्होंने लोगों की भलाई के लिए कई कदम उठाए। ब्राह्मणवादी रूढ़ियों का विरोध किया और अपने महल के दरवाज़े, अपने साम्राज्य के उन लोगों के लिए खोल दिए जिन्हें किसी भी प्रकार की कोई परेशानी थी। बुद्ध की शिक्षाओं से प्रभावित होकर उन्होंने एक ऐसे राज्य का निर्माण किया जो सहृदय और जनता का संरक्षक था।

उनके विचार और उनकी नीतियां उनके शिलालेखों से जानी जा सकती हैं, जो देश के कई हिस्सों में स्तंभों और चट्टानों पर उत्कीर्ण हैं। इन शिलालेखों से पता चलता है कि ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में अशोक ने ऐसी नीतियां अपनाईं जो लोगों के प्रति प्रेम और सहानुभूति से प्रेरित थीं और जिनसे कोई भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था। यह महत्वपूर्ण है कि बौद्ध धर्म अपनाने के बाद भी अशोक ने समाज की विविधता को खुले दिल से स्वीकार किया। उनका एक शिलालेख कहता है कि शासक को अपनी प्रजा की आस्थाओं में विविधता को स्वीकार करना चाहिए। उन्होंने बौद्ध धर्म को विष्व धर्म बनाया। उन्होंने अपने विचार तलवार के ज़ोर पर नहीं बल्कि षब्दों और तर्कों से फैलाए। उनका संदेष था कि दुनिया में कष्ट और दुःख कम करने के लिए हमें षांति, सहिष्णुता और खुलेपन की नीतियां अपनानी होंगी। इन कारणों से अशोक को महान बताया जाता है। इसके उलट, लेख में कहा गया है कि अशोक, बौद्ध धर्म अपनाने के पहले तक एक महान षासक थे।

भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में अशोक से बड़े साम्राज्य पर किसी ने शासन नहीं किया। उनका धम्म शासक और प्रजा दोनों के लिए नैतिक संहिता का निर्धारण करता है। अषोक अपने प्रजाजनों से यह अपेक्षा करते थे कि वे भी नैतिकता के पथ पर चलेंगे। उनके षिलालेख 12 में जो लिखा है उसकी प्रासंगिकता आज भी है और हमें उसके षब्दों को याद रखना चाहिए। इस षिलालेख में सार्वजनिक जीवन में सहिष्णुता और सभ्य व्यवहार अपनाने की बात कही गई है। यह षिलालेख ‘‘वाणी के संयम’’, ‘‘अपने धर्म की तारीफ न करने’’ और ‘‘दूसरे के धर्म की निंदा न करने’’ की बात कहता है (सुनील खिलनानी, इंकारनेषन्सः इंडिया इन 501 लाईव्स, पृ. 52)। ‘‘उन्होंने बौद्ध धर्म को अपने प्रजाजनों पर नहीं लादा। उनकी षांति, दूसरों पर आक्रमण न करने और सांस्कृतिक विजय की नीतियों के कारण वे एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक चरित्र हैं’’ (आरएस षर्मा, एन्षियेंट इंडिया, एनसीईआरटी, 1995, पृ. 104)। वे उसी सांस्कृतिक व राजनैतिक बहुवाद के प्रतीक थे जो गांधी और नेहरू की विचारधारा के केंद्र में थी। चार सिंहों का उनका प्रतीक, भारतीय मुद्रा में अंकित है और उनका चक्र, भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का भाग है।
अशोक के षासन को कभी कोई सैन्य चुनौती नहीं मिली। वे 50 से भी अधिक वर्षों तक षासक रहे। 205 ईसा पूर्व में यूनानी सम्राट एन्टियोकस ने उत्तर-पष्चिम से आक्रमण किया और पंजाब व अफगानिस्तान सहित कुछ उत्तर-पष्चिमी हिस्सों पर कब्ज़ा कर लिया। अशोक को असली चुनौती बाहरी आक्रांताओं से नहीं बल्कि उनके साम्राज्य के अंदर से मिली। बौद्ध धर्म के बढ़ते प्रसार पर ब्राह्मणवादी प्रतिक्रिया उनके लिए सबसे बड़ी समस्या थी। अशोक ने धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान जानवरों की बलि देने पर प्रतिबंध लगा दिया था। इससे ब्राह्मणों की आय में कमी आई। बौद्ध धर्म के प्रसार के कारण वर्ण और जाति व्यवस्था कमज़ोर पड़ी। जिस धार्मिक धारा को सांप्रदायिक ताकतें वैदिक धर्म बता रही हैं वह दरअसल तत्समय में प्रभावकारी ब्राह्मणवाद था।

इन कारकों के चलते अशोक के साम्राज्य में प्रतिक्रांति हुई। प्रतिक्रांति का नेतृत्व किया अशोक के पोते बृहद्रथ के सेनापति पुष्यमित्र षुंग ने, जो कि एक ब्राह्मण था। उसने सम्राट को मौत के घाट उतार दिया और अशोक के साम्राज्य के सिंध के हिस्से में षुंग वंष के षासन की स्थापना की। इस प्रतिक्रांति के परिणामस्वरूप बौद्ध धर्म उसके मूल देष से गायब हो गया। अंबेडकर लिखते हैं, ‘‘सम्राट अशोक ने जानवरों की बलि देने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया। इसके कारण लोगों ने धार्मिक कर्मकांड संपन्न करवाने के लिए ब्राह्मणों को बुलाना बंद कर दिया। ब्राह्मण पुरोहित बेरोज़गार हो गए। उनका महत्व और सम्मान भी कम हो गया। इसलिए ब्राह्मणों ने मौर्य सम्राट बृहद्रथ के विरूद्ध पुष्यमित्र षुंग के नेतृत्व में विद्रोह किया। षुंग एक सामवेदी ब्राह्मण था और बृहद्रथ की सेना का सेनापति भी’’ (राइटिंग एंड स्पीचेस, खंड-3, पृ. 167)।

आठवीं शताब्दी के बाद से षंकर ने बुद्ध की विचारधारा के खिलाफ वैचारिक लड़ाई जारी रखी। बुद्ध कहते थे कि यही दुनिया असली दुनिया है और हमें इसी पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। षंकर कहते थे कि यह दुनिया एक माया है। शंकर की विचारधारा ने अंततः ब्राह्मणवाद को देश में पुनस्र्थापित कर दिया और 1200 ई. के बाद बौद्ध धर्म यहां से पूरी तरह गायब हो गया। फिर अषोक के षासनकाल को आलोचना का विषय क्यों बनाया जा रहा है? अषोक के बौद्ध धर्म अपनाने से ब्राह्मणवाद को बहुत बड़ा धक्का लगा। ब्राह्मणवाद, हिंदू धर्म पर हावी था। अषोक, अहिंसा और बहुवाद में विष्वास करते थे। ये दोनों ही मूल्य हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडे के खिलाफ हैं, जिसकी राजनीति का हिंसा अभिन्न भाग होती है। हिंदू राष्ट्रवादी भी ब्राह्मणवादी मूल्यों को बढ़ावा देना चाहते हैं। तो जहां एक ओर दलितों को संघ परिवार के झंडे तले लाने के प्रयास हो रहे हैं, वहीं बौद्ध धर्म पर हल्ला बोला जा रहा है और सामाजिक पदक्रम को बनाए रखने के सघन प्रयास हो रहे हैं। बौद्ध धर्म जातिविहीन समाज का प्रतीक था। वह बहुवाद और षांति का पैरोकार था। हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा अषोक पर हमला, दरअसल, इन्हीं मूल्यों पर हमला है। यह कहा जा रहा है कि अषोक के बौद्ध धर्म ग्रहण करने से ‘भारत’ कमज़ोर हुआ। सच यह है कि उस समय भारत अस्तित्व में ही नहीं था। मौर्य एक साम्राज्य था राष्ट्र-राज्य नहीं। साम्राज्य बनते-बिगड़ते रहते हैं। अहिंसा की नीति अपनाने के बाद भी मौर्य साम्राज्य 50 वर्षों तक बना रहा। उसे कमज़ोर किया ब्राह्मणवादियों ने। प्राचीन भारत के इतिहास के लेखन के काम में संघी इतिहासविदों की घुसपैठ का लक्ष्य अशोक और उन जैसे अन्य शासकों के महत्व को कम करना और उन्हें बदनाम करना है।

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One thought on “क्या अशोक के बौद्ध धर्म स्वीकार करने और अहिंसा को बढ़ावा देने से भारत कमज़ोर हुआ?

  • July 14, 2016 at 3:02 pm
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    ashok ne kaling ke yudh me lakho logo ki jaan li or jb usne bodh dharm kabul kiya tb uske gunah maaf ho gae, or india ke histry me kisi bhi mughal ne itna bda yudh or itne logo ko nhi mara fir bhi unpe ilzam jabki wo sn duniya ke sabse shanti ke majhb ke bhakt the

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