काश मे पाकिस्तानी मौलवी होता

पाकिस्तान के मशहूर लेखक व कवि मुबाशशिर अकरम की एक नज्म आप सभी के लिये जो पाकिस्तान मे मुल्लाओ के द्वारा किये जा रहे जुल्म के खिलाफ है-
पाकिस्तान के मशहूर लेखक व कवि मुबाशशिर अकरम की एक नज्म आप सभी के लिये जो पाकिस्तान मे मुल्लाओ के द्वारा किये जा रहे जुल्म के खिलाफ है-

काश मे पाकिस्तानी मौलवी होता
जो दिल मे आता
वही बोलता
न सोचता
न तौलता
काश मे पाकिस्तानी मौलवी होता

मुझ से सब डरते
मेरा दम भरते
मुझ से न लड़ते
अगर लड़ते तो मे उनकी गर्दन मरोडता
काश मे पाकिस्तानी मौलवी होता

तहजीब से क्या वास्ता रखना
साइन्स व तरक्की से क्या वास्ता रखना
के दुनिया मुस्लिम के लिये क़ैदखाना
और बस इधर हलवा ही खाना
अपना दिमाग कभी न टटोलता
काश मे पाकिस्तानी मौलवी होता

जब चाहता अपना जी
करता हमेशा अपनी करनी
फसाद को बनाता जेहाद
और जेहाद को फसाद
जेहाद फसाद, फसाद जेहाद
कभी कोई न मुझ से पूछता
काश मे पाकिस्तानी मौलवी होता

कुत्ते को शहीद कहता
डीजल को दवा कहता
फ़ौजी को करता हलाक
न कर सकता कोई मेरी जबान हलाक
कोई ऐसा करता तो मरता
काश मे पाकिस्तानी मौलवी होता

शहादत के बांटता सर्टिफिकेट
जिस को चाहता जन्नत देता
जिस को चाहता काफ़िर कहता
जो भी मेरे खिलाफ बोलता
उस को जहन्नम भेजता
काश मे पाकिस्तानी मौलवी होता

इल्म मोमिन की मीरास तो क्या
मुस्लिम दुनिया मे जलील तो क्या
जहालत के यू डेरे तो क्या
मे तो क़िस्सा हुर व अप्सरा छेडता
काश मे पाकिस्तानी मौलवी होता

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9 thoughts on “काश मे पाकिस्तानी मौलवी होता

  • May 20, 2014 at 5:58 am
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    कुफ्र का फतवा वाक़ई में बहुत अफसोसनाक और ‎परेशान करने वाला मामला है। लेकिन इस मामले ‎में सच्चाई क्या है, उसे इस लेख में बहुत अच्छे ‎तरीके से पेश किया गया है। वक्त हो तो पूरा लेख ‎ज़रूर पढ़ें…….. ‎‎=================================‎‎== दूसरों को काफ़िर कहने से बचें माइक ग़ौस, न्यु ‎एज इस्लाम के लिए 12 जुलाई, 2012 अल्लाह ‎आपको शांति के साथ सोचने में सक्षम बनाए? ये ‎लेख मुसलमानों के द्वारा दूसरे मुसलमानों के ‎विश्वास के बारे में फैसला करने और ऐसा करने में ‎एक ही इस्लाम का सहारा लेने से सम्बंधित ‎पत्राचार के जवाब में है। काफ़िर शब्द का मतलब ‎सच्चाई को छिपाने वाला या उससे इंकार करने ‎वाला है। हालांकि इस शब्द का उपयोग दूसरे को ‎अपमानित करने के लिए होता रहा है। ये नाकामी ‎शब्द की तरह है। आपकी अपनी प्राथमिकता है, ‎और मेरा ये मानना है कि इस समझ के बिना ‎सामान्य बातचीत में भी इस शब्द का प्रयोग नहीं ‎किया जाना चाहिए। नबी सल्लल्लाहू अलैहि ‎वसल्लम ने इसका इस्तेमाल अपमानजनक शब्द ‎के रूप में नहीं किया, लेकिन इसका मतलब सिर्फ ‎ऐसे पहचानकर्ता के रूप में था जो सच्चाई के उनके ‎संस्करण के साथ सहमत नहीं था। (सूरे अल-‎काफेरून को देखें- पैगम्बर सल्लल्लाहू अलैहि ‎वसल्लम की ज़बान को नागरिक संवाद में ‎पाठ्यक्रम के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए) ‎अहमदिया लोग मुसलमान हैं, इसलिए कि वो लोग ‎भी खुदा में यक़ीन रखते हैं जैसा कि दूसरे सभी ‎मुसलमान अल्लाह पर विश्वास करते हैं, इसके ‎अलावा उनकी प्रतिज्ञा- शहादत ‘लाइला इल्लल्लाह ‎मोहम्मदुर रसूलुल्लाह’ वही है जो दूसरे सभी ‎मुसलमानों की है। हमें दूसरों के बारे में चिंता करने ‎के बजाय अपने काम पर ध्यान देना चाहिए। दूसरों ‎के काम के लिए कोई अन्य ज़िम्मेदार नहीं है, और ‎अन्तिम निर्णय के दिन आप अपने कामों की ‎जवाबदेही के लिए अकेले खड़े होंगे। वहाँ कोई ‎आपका साथ नहीं देगा, आपको अपने कामों के ‎लिए ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए। आइए हम अपनी ‎जनजातियों, धर्मों के परिवार में दूसरे धर्मों के ‎मानने वाले हर एक इस मामले में सबसे अच्छा ‎करें। हम सभी के बीच सबसे अच्छे वो लोग हैं जो ‎अपने पड़ोसियों का ध्यान रखते हैं, और खुदा की ‎रचनाओं का सम्मान करते हैं और वो जो सद्भाव ‎पैदा करने की कोशिश करते हैं, जैसा खुदा नें इस ‎दुनिया को बनाया था वैसा ही इसे बनाने की ‎कोशिश करते हैं। सभी लोगों के ��‎

    good

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  • May 20, 2014 at 6:02 am
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    जो आपने कविता में लिखा वो सब करने के लिये ‎पाकिस्तानी मौलवी बनने की जरूरत नहीं है, ‎हिन्दुस्तान में भी कुछ मौलवी और नेता यही सब ‎करते हैं.‎

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  • May 20, 2014 at 6:37 am
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    लेकिन मीनू जी और सभी पाठको से मे कहता हु ‎की य याद रखिये की अगर उपमाहादीप के बढते ‎मुस्लिम कट्टरपंथ का सामना अगर आप हिन्दू ‎यूनिटी या हिन्दू कट्टरपंट से करने की कोशिश ‎करेंगे तो य बहुत बड़ी भूल होगी इस विष्य पर मे ‎नही विस्फोट पर बड़े सर्वोदयि विध्वान जो पूर्व मे ‎संघ मे भी रह चुके है वो भी कहते है की मुस्लिम ‎कटरपंत के मुकाबिल अगर हिन्दू कट्टरपंत को ‎किया गया तो मुस्लिम कटरपन्ति अलगावादी ‎आदि फायदे मे ही रहेंगे तो बेहतर यही होगा की ‎मुस्लिम कट्टरपंथ का मुकाबला आप जोर शोर से ‎हिन्दू मुस्लिम एकता की बात करके करे इसलिए ‎मेने य सुझाव भी दिया था की अगर कुछ मुस्लिम ‎पाक क्रिकेट टीम का समर्थन भी करते है तो करने ‎दे बुरा ना माने आदि मेरी इस बात का कुछ लोगो ने ‎गलत मतलब भी समझ लिया था

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  • May 20, 2014 at 12:22 pm
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    हमें मुस्लिम धर्म की यही बातें सबसे अधिक प्रभावित करती है के अधिकांश वो लोग सत्य बोलने की साहस रखते हैं और अपने बातों को सत्य सिद्द करने की क्षमता भी रखते हैं. जो कोई अपने अंदर की बुराईयों को गिनता/ निकलता है असल में वहीं सत्य के मार्ग पे होता है ईश्वर ऐसे लोगों को सत्य की राह चलने की शक्ति प्रदान करे…….आएमिन.

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  • May 21, 2014 at 4:47 am
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    पाकिस्तान एक अच्छा खासा देश था शरू से ही अमेरिका से नज़दीकी से इसे खूब मदद मिली इनकी इकनॉमी शरू से ही खुली हुई थी जमकर विकास हुआ हालात ये थे की भारत के लोग यकीं नहीं करेंगे मगर शायद पूर्व विदेश सचिव मुचकुन्द दुबे जी के अनुसार 60 के दशक में पाक विकास दर पाकिस्तान एशिया में जापान के बाद दूसरे नंबर पर था जो मलेशिया आज यूरोप की टक्कर का देश हे वह के लोग तब पढ़ने पाक जाया करते थे इसकी फिल्म इंडस्ट्री भी 70 के दशक तक बॉलीवुड से थोड़ी ही पीछे थी पाकिस्तान की टीम क्रिकेट और हॉकी में आकर्षण का केंद्र रहती थी कटटरता भी बहुत कम थी 65 की जंग लड़ चुके ब्रिगेडियर वाजपेयी कहते थे की तब पाक सैनिक हमें दुसरे देश के सैनिक ही समझते थे कोई मज़हबी दुश्मन नहीं हे कठमुल्लाशाही ने इस देश का बेड़ागर्क कर दिया हे इससे भारत के मुस्लिमो को भी सबक लेना चाहिए की जहा जहा कठमुल्लाओं या कटटरपन्तियो के कदम पड़ेंगे वहा वहा तबाही आएगी चाहे वो घर हो या मुल्क (याद रहे की कठमुल्लवाद एक सोच का नाम हे इसका दाढ़ी रखने या न रखने से कोई सम्बन्ध नहीं हे )

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  • May 21, 2014 at 5:04 am
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    अफज़ल भाई ऊपर शायर और कार्टून में जो बात कही गयी थी वो इस लाल मस्जिद से बुरका पहन कर भागे मौलाना ने सही साबित कर दी हे देखिये इस वीडियो में 18 : 43 पर httpps://www.youtube.com/watch?v=E28iZNaqtHA

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    • May 24, 2014 at 3:41 am
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      अफज़ल भाई कोई तकनिकी खराबी हे शायद ? क्योकि ये कॉमेंट मेरा था

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      • May 24, 2014 at 6:00 am
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        Sikandar hayat ji

        Shayed aap hi ka comment hai, me admin se request karu ga ke woh is ko sahi kar de. aap ke comment ka intazaar rahe ga.

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  • July 16, 2014 at 3:00 pm
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    बहुत सुंदर लेख है । काश मुसलमानों को भी हिन्दुओं की तरह अपने धर्म ग्रंथों को स्वयं पढ कर अर्थ निकालने की स्वतंत्रता होती! !! उन्हें इसके लिए किसी मौलाना के पास जाकर फतवा लेना पड़ता है ।
    लाइलाहीइलल्लाहमुहम्मदेर्रसूलल्लाह”
    का अर्थ किसी भी प्रकार से वेदांत सिद्धांत से अलग नहीं है, हमारे देश में एक ही वेद वाक्य पर न जाने कितने मत मतांतर हैं मतभेद भी हैं, कोई पर वेदांत ने हमें भेद में अभेद देखने की जो धृष्ट प्रदान की है वह दृष्टि दुनिया के और किसी संस्कृति में नहीं है ।
    भारत ने ही दुनिया को बताया कि , अल्लाह ईश्वर या God शब्दों से खुदा नहीं बदला करता। क्योंकि हिन्दू राम कृष्ण शिव विष्णु आदि अनेक नामों में उसी एक परमब्रह्म की उपासना करने की कला जानते रहे हैं ।
    अब तो सुना है, मुसलमानों ने अल्लाह और खुदा को भी बाट दिया है ।

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