कन्हैयाओ न साथ दो न लो मुस्लिम कटटरपन्तियो का !

khalid-kanhaya

यहाँ ”कन्हेयाओ” मेरा आशय देश की सभी सेकुलर और प्रगतिशील वाम और गांधी वादी आदि ताकतों से हे जो आज अपने सामने सबसे बड़ी चुनौती देश की पहली शुद्ध संघी सरकार से मुखातिब हे सभी की और हरचंद कोशिश हे की कैसे भी करके अगले लोकसभा चुनावो में इस सरकार को हटाया जाए और लगातार इसे राज्यों में हराकर हराकर राज़्यसभा में कमजोर किया जाए ताकि ये संसद में अपनी कोई गंभीर समस्या पैदा कर देने वाली मनमानी ना कर सके सही हे जे एन यु काण्ड में आज कन्हैया की जमानत हो गयी कुल मिलाकर मामला यही लग रहा हे की अफज़ल गुरु की फांसी की बरसी पर उसके विरोध में रखे प्रोग्राम में कुछ कश्मीरी छात्रों ने देश विरोधी और आज़ादी समर्थक नारे लगाय जिसे वीडियो में छेड़छाड़ करके वाम शक्तियों के नाम कर दिया गया किसने किया क्यों किया ? क्या मकसद था दुनिया जानती ही हे सब कुछ साफ़ हो चूका हे लेकिन हमारी अपील सभी वाम और सभी सेकुलर प्रगतिशील ताकतों से की वो किसी हालत में भी हिन्दू कटटरपन्तियो से लड़ते हुए ये भूल ना करे की आप किसी भी मुस्लिम कटटरपन्ति या कश्मीरी अलगाववादी ताकतों के साथ मानवाधिकार की खातिर ही सही मगर ना खड़े हो उनके साथ ,ऐसे लोगो को साथ ना ले आप लोगो ने कभी कश्मीरी पंडितो या पाकिस्तान और बांग्लादेश से भगाय जा रहे हिन्दुओ के साथ हुए जुल्म और उनके पलायन का मुद्दा कभी नहीं उठाया कारण ये नहीं हे की आपको उनके साथ सुहानुभूति ना थी कारण था कश्मीरी पंडितो और उनके के मुद्दे उनके नेताओ का पूरी तरह से संघ परिवार का हाईजैक और इस्तेमाल और आपकी मज़बूरी हे की आप कभी हिन्दू कटट्रपंथ के साथ नहीं दिख सकते हे इनके साथ आप कोई मंच शेयर नहीं कर सकते हे सही भी हे मेरी अपील यही हे की यही सख्ती आप मुस्लिम कटटरपन्तियों कश्मीरी अलगावादी लोगो से भी करिये उनका साथ भी कभी भी ना ले ना दे मानवाधिकार की खातिर भी नहीं जो लोग भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशाअल्लाह जैसे नारे लगाते हे वो पुरे भारत के और खासकर भारत के मुसलमानो के सबसे बड़े दुश्मन और पुरातनपंथी हे ऐसे लोगो का मानवाधिकार सेक्लुरिसम सबको न्याय आदि प्रगतिशील मूल्यों से भला क्या लेना देना हो सकता हे ? आप सेकुलर पगतिशील और सबको न्याय समानता और शोषणरहित भेदभाव रहित समाज बनाने के लिए ज़द्दोज़हद कर रहे लोगो का भला मुस्लिम कटटरपन्तियो से क्या मेल ?

आप लोगो का भी मकसद समाजवाद हे और इस्लाम भी अपने मूल रूप में सबसे समाजवादी धर्म हे इस्लाम के मूल्यों और समाजवाद के मूल्यों में बहुत कुछ साझा हे शायद ये कारण हो सकता हे की आप लोग जो सख्त रवैया हिन्दू कटट्रपंथ के खिलाफ रखते हे वो मुस्लिम कटट्रपंथ के खिलाफ नहीं रखते हे ? मगर वो मज़हब की बाते हे वो आदर्शवाद हे सही हे वो अपनी जगह हे लेकिन में एक आम और वैचारिक मुस्लिम अपने गहन अध्यन और जीवन में मिले जमीनी अनुभवों से साफ़ साफ़ जान गया हु आप भी जान ले की एक मुस्लिम कटटरपंथी आदमी वो होता हे जिसका एकमात्र काम मकसद और लब्बोलुआब होता हे जनता का ध्यान उसके शोषण पर से हटाकर गैर मुस्लिमो या फिर इस्लाम के ही कुछ फिरको के खिलाफ भड़काना और कुछ नहीं एक मुस्लिम कटटरपन्ति इस्लाम इंसानियत और सेकुलर इण्डिया का दुश्मन ही हो सकता हे और कुछ नहीं भारत की वाम ताकतों और चिंतन पर पहले भी ये आरोप लग चूका हे की उन्होंने पाकिस्तान निर्माण को समर्थन दिया था ( आरोप ) ? खेर हम आज की बात करे तो आखिर कैसे कश्मीरी अलगावादियों ने चाहे वो छात्र या कोई बाहर से आये लोग थे आखिर कैसे उन्होंने आपके सामने आपके भारत तेरे टुकड़े होंगे या कश्मीर आज़ाद होगा जैसे नारे लगाने की बात सोची भी कैसे ? ज़ाहिर हे उन्होंने आपको अपना थोड़ा बहुत हमदर्द समझा होगा तभी उनकी हिम्मत हुई ?

उनकी इस ग़लतफ़हमी को सख्ती से दूर कर कर दीजिये की आप उनके साथ नहीं हे एक इंच भी नहीं एक आम आदमी और शुद्ध बिलकुल शुद्ध सेकुलर भारतीय मुस्लिम होने के नाते हमारा सुझाव हे की कोई ऐसा काम या भूल या कोई ऐसी बात ना करे जिससे कोई मुस्लिम कटटरपन्ति या कश्मीरी अलगावादी आपको अपना हमदर्द समझे जो कश्मीरी कश्मीर को भारत से अलग करना चाहते हे हे वो पुरे साम्प्रदायिक और सामंतवादी लोग हे आपका उनका भला क्या मेल ? इन कश्मीरी अलगावादियों ने कश्मीर की भयंकर समस्या के माध्यम से पुरे दक्षिण एशिया की गरीब आबादी को बंधक बना रखा हे खुद को ये बाकी उपमहादीप की जनता से अलग ऊँचा और खास समझते हे ये ना भारत में मिलना चाहते हे न पाकिस्तान में इनका सपना वही हे जो महाराजा हरी सिंह 23 अक्टूबर 1947 तक संजोय थे की कश्मीर का स्विट्ज़रलैंड जैसा तटस्थ और अलग देश बनना इनको बढ़ावा दिया पाकिस्तान के खून चूसने वाले जमींदारो बेलगाम फ़ौज़ और मुल्लाओ और नेताओ ने जिनका एकमात्र मकसद पाकिस्तान की जनता का घोर शोषण फिर उसके शोषण से उसका ही ध्यान बटवाना था ऐसे मकसद के साथ कोई शुद्ध सेकुलर और प्रगतिशील आदमी कैसे एक सेकण्ड भी खड़ा रह सकता हे ? फिर भी सही हे की आप लोग कश्मीर से सेना की वापसी , मानवाधिकार की बेहतर इस्तिति और कश्मीर में शान्ति और वहा के लोगो की खुशहाली चाहते हे मगर उसके लिए कश्मीरी अलगावादियों के साथ खड़े होकर अफज़ल गुरु और मकबूल बट्ट की बरसी मानाने के बजाय अगर आप लोग भारत पाकिस्तान के शुद्ध सेकुलर और प्रगतिशील लोगो को ज़्यादा से ज़्यादा एक साथ बैठाने की कोशिश करे वो ही बेहतर नहीं होता क्योकि कश्मीर की समस्या का एकमात्र हल भारत पाक में शान्ति दोस्ती और पुरे कश्मीर में कश्मीरियों की आवाजाही की खुली छूट ही हे और इस समस्या का कोई हल ही नहीं हे कश्मीर को स्विट्ज़रलैंड बनाने का सपना देखने वाले अलगावादियों की मिाजाजपुर्सी करना तो कतई नहीं दुनिया की एक सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी का देश भारत भला क्यों अब टू नेशन थ्योरी के आधार पर कश्मीर छोड़ेगा और क्यों भला ?

फिर भी अगर आपको लगता हे की अफज़ल गुरु की फांसी गलत थी तो उस पर विरोध के साथ साथ आप अपने मुस्लिम नेताओ चिंतको और कार्यकर्ताओ को भी आगे करे की वो उसी जोश और ज़ज़्बे के साथ आगे आकर कश्मीरी पंडितो पाकिस्तान और बांग्लादेश से भाग रहे हिन्दुओ के लिए भी आवाज़ उठाय ? कश्मीर समस्या से इतर भी बात करे तो कोई ऐसा काम कभी ना करे जिससे मुस्लिम कटटरपन्तियो का ज़रा भी हौसला या बचाव हो हिन्दू कटट्रपंथ से लड़ाई में आपका बेहतरीन इतिहास और योगदान रहा हे मगर इस बात को भी समझे की मुस्लिम कटट्रपंथ भी बहुत भारी समस्या हे और ऐसा नहीं हे की उसे ज़रा भी ढील दी जाए या नज़रअंदाज़ किया जाये साम्प्रदयिक समस्या को कश्मीर को अयोध्या को इस तरह से समझे की ये सब उपमहादीप में हिन्दू और मुस्लिम कटटररपन्तियो के बीच पूर्ण वर्चस्व की लड़ाई के हिस्सा हे ये ऐसा नहीं हे की सिर्फ हिन्दू कटट्रपंथ से ही जुडी हुई समस्याए हे ये दोनों कटट्रपंथ अगर खत्म होंगे तो एक साथ खत्म या कमजोर होंगे वार्ना बड़े आराम से फलते फूलते रहेंगे में आपको साफ़ बता देना चाहूंगा की मुस्लिम कटट्रपंथ भारत के लिए भारतीय उपमहादीप के लिए एक बड़ा और गंभीर खतरा हे कोई ऐसा काम बिलकुल ना करे जिससे इन कटटरपन्तियो का हौसला बढे इस बात की फ़िक्र मत कीजिये की मुस्लिम कटट्रपंथ के खिलाफ भी सख्त रवैया रखने पर आम मुस्लिम आपसे दूर हो जाएगा नहीं ऐसा नहीं होगा ना ही ऐसा हुआ की हाल ही में जैसा की बड़ी आशंका थी की कही इस संघी सरकार से परेशान होकर बिहार का मुस्लिम विधानसभा चुनावो में जो लगभग ” स्टालिग्राड 1943” जैसा बन गए थे ओवेसी जेसो के पाले में ना चला जाए मगर ऐसा नहीं हुआ इस समय आम मुस्लिम इस सरकार से बेहद चिंतित और आशंकित हे मोदी सरकार से छुटकारा के लिए उसे हर हाल में आपका साथ देना ही पड़ेगा यानी ये बिलकुल सही मौका हे की एकतरफ तो मुस्लिम कटरपंथ के खिलाफ भी स्टैंड ले लिया जाए और दूसरा मोदी साकार के अगला चुनाव हारते ही ही हिन्दू कटट्रपंथ को भी बेहद गहरा झटका लगेगा जिससे वो कोमा में भी जा सकता हे अभी नहीं तो कभी नहीं दोनों कटट्रपंथ के खिलाफ जिहाद छेड़ने का ये बिलकुल सही समय भी नियति की तरफ से मुकर्रर हो सकता हे फिर ये भी याद रखिये की हर आदमी वामपंथी या दक्षिण पंथी नहीं होता हे बहुत से लोग तटस्थ भी होते हे ऐसे भी करोड़ो आम आदमी भारत में हे इस बात का ध्यान रखना हे की कोई ऐसा काम भूल कर भी हो जिससे संघी मिडिया को प्रोपेगेंडा करके ऐसे लोगो को अपने मोदी खेमे में लाने में ज़रा भी सफलता मिले इसलिए मेरी बात हमेशा याद रखे की किसी भी हालात में किसी भी मुस्लिम कटटरपंथी का साथ ना तो दे ना ही ले कभी भी नहीं

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23 thoughts on “कन्हैयाओ न साथ दो न लो मुस्लिम कटटरपन्तियो का !

  • March 7, 2016 at 11:46 pm
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    बहुत सुंदर

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  • March 8, 2016 at 1:25 am
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    इस्लाम धर्मनिरपेक्ष व् समाजवादी कब से हो गय जब मुस्लिमो के उपास्य ही गैरमुस्लिमो को सबसे निकृष्ट जीव कहते हो उन्हें हमेशा की आग में जलाने की धमकी देते हो तो मुस्लिम कैसे पीछे हट सकते हैं
    या रखिये मुस्लिम में कुछ धर्मनिरपेक्ष हो सकते है पर इस्लाम नही
    कट्टरपंथ का विरोध करना हो पहले इस्लाम का विरोध कीजिये उसे कमज़ोर कीजिये संघी कट्टरपंथ तो फिर अपने आप कमज़ोर हो जायेगा दोनों एक दूसरे के पूरक नही है संघ इस्लामी अतिवाद के खिलाफ खड़ा किया गया संघटन ह संघ इस्लामी कट्टरपंथ से खाद पानी पता है इस्लामी कट्टरपंथ संघ से खाद पानी नही पा सकता ठीक वैसे जैसे धरती सूर्य से गर्मी पाती है सूर्य धरती से गर्मी नही पाटा हैहै
    संघ या हिन्दू कट्टरपंथ तो असल में केवल प्रतिक्रिया में खड़े किये गए गली के छोटे मोठे मवाली है जबकि असली खलनायक पर तो किसी का ध्यान ही नही जा रह सब आके संघ का हो गला पकड़ लेते है जबकि वो केवल मज़बूरी व् लाचारी में खड़ा हुवा है बेशक वो गलत ह पर जब आप बड़े खतरे से लड़ेंगे और उसे कमजोर करेंगे तो छोटे मोठे तो ऐसे ही भाग खड़े होंगे
    इसलिए जरूरत है असली खतरे से निपटने को वर्ना ऐसे ही लकीर पीट ते रहिये कुछ नही हासिल होगा

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  • March 8, 2016 at 7:24 am
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    दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक और सेकुलर देश पर इस समय मुस्लिम कटटरपन्तियो का नहीं हिन्दू कटटरपन्तियो का राज़ हे पहले उन्हें हटाया जाए बाकी बातो पर विमर्श चलता रहेगा मगर आज की तारीख में सबसे बड़ा मुद्दा हे मोदी हराओ मोदी हटाओ ये लेख भी उसी संदर्भ में हे

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  • March 8, 2016 at 7:54 pm
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    BAHUT SAHI KAHA AAP NE , SIRF MUSALMAN HI NAHI HINDU KATTARPANTHI SE DUR RAHNE KI JARURAT HAI.SOCHNA CHAAHIYE LOGO KO

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  • March 8, 2016 at 8:53 pm
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    सिकंदर जी आप यदि उदारवादी सोच रखते है तो आप बधाई के पात्र है पर ९९ प्रतिशत मुसलमान (शायद मैं ग़लत हूँ) जिनको मई जनता हूँ वे सभी कट्टरपंथी विचारधारा के है| उनको हिंदुओं को चिढ़ने मे बहुत मज़ा आता है| हम चुप बैठते है तो क्या ये हमारी सहिष्णुता नही है| आप आज़ादी के बाद से पाकिस्तान बांग्लादेश और भारत मे हिंदू और मुसलमानो की जनसंख्या का आँकड़ा उठा कर देख लीजिए आप को सब कुच्छ समझ मे आ जाएगा| केरल आसाम और कश्मीर तो जगजाहिर है| आप भी मुझे उन लोगो से प्रभावित दिखते है पर उतने नही| बस एक अच्छा लगा जो की आप कॉंग्रेस के सपोर्टर नही है| वैसे लिखते अच्च्छा है| मै एक कट्टर हिंदू हूँ पर नफ़रत उसी से करता हूँ जो मेरी मातृभूमि से करता है| आज ही ऑफीस के ज़रिए एक पाकिस्तानी व्यक्ति से बात हुई| जो की लंडन मे रहते है पहले तो सब कुच्छ इंग्लीश मे चलता रहा फिर अचानक से उन्होने कहा अगर हिन्दी आती हो तो हम अपनी भाषा मे बात करे| उसके बाद पता चला की वे लाहौर के है| आप जैसे लोग जो अच्छा लिख लेते है अपने विचारों को उस दिशा मे फैलाइए की दोनो मुल्क (एक ही मुल्क) एक हो सके| शरहदें अलग हुई है दिल और सोचने का तरीका आज भी एक है| जै श्री राम|

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    • March 10, 2016 at 11:08 pm
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      शुक्ला जी आप हमें बताइये की वो लोग जो आप बता रहे हे वो ” हिन्दुओ को या आपको चिढ़ाने को क्या कहते हे ” हमें तफ्सील से बताइये हम फिर ऐसा जवाब लिख कर देंगे की उनकी बोलती बंद हो जायेगी उसके बाद आप उनसे कहिये की यहाँ हम से बहस कर ले इंशाअल्लाह हम किसी हद तक उनका ब्रेनवाश कर देंगे और आपने कहा की आप कटटर हिन्दू हे तो याद रखिये की इन बातो का हासिल आम आदमी के लिए कुछ भी नहीं हे मुसलमानो ने कटटरवाद पर चल कर भला क्या पाया ? भारतीय उपमहादीप में कटटर साम्प्रदायिक होने का नतीजा एक ही हो सकता हे हे या आप शोषक बनेगे या शोषित ? मेरी सलाह हे की न शोषक बनिए न शोषित इसके लिए शुद्ध सेकुलर बनिए ये मत कहिये की ये ऐसा वो ऐसा ? उसे उसके हाल पर छोड़िये आप शुद्ध सेकुलर बनिए यकीन कीजिये अच्छा लगेगा अच्छा होगा आमीन

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  • March 9, 2016 at 2:03 pm
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    आपकी इन खोखली और बेदम अपीलों का कोई फर्क नही पडेगा ऐसे कट्टरवाद कभी खत्म नही होगा क्योकि जब कट्टरवाद के खिलाफ दोहरा रवय्या रहेगा तब तक कट्टरपंथ नही खत्म होगा ये कन्हिया नामक कथित क्रन्तिकारी भी दूसरे महान सेक्युलर नेताओ की तरह संघ व् हिन्दू कट्टरपंथ पर तो आग उगल लेगा पर मुस्लिम कट्टरपंथ को अनदेखा करेगा बल्कि दंडवत करेगा लिख लीजिये किसी की हिम्मत नही पड़ती मुस्लिम कट्टरपंथ के खिलाफ बोलने की चाहे सोनिया मुलायम ममता वामपंथी लालू या युगपुरुष जी हो वो मुस्लिम कट्टरपंथ के आगे घुटने टेक देते है मुस्लिम कट्टरपंथ तो वैसे स्वपोषित है ही पर ये महान नेता भी खाद पानी में कोई कसार नही छोड़ते हाल ही में कुलदीप नय्यर का कट्टरपंथ के खिलाफ लेख पढ़ा उन्होंने सङ्घ व् हिन्दू कत्तरपंथ को जमकर कोसा पर मुस्लिम कत्तरपंथ को दो लाइन में समेत दिया ऐसे खत्म होगा कत्तरपंथ
    सङ्घ इस समय गरीब की लुगाई बन गया है उसकी गर्दन चारो तरफ से दबी है उसका विरोध कीजिये सेकलुरिस्म की डिग्री पाइए
    मई फिर से चेतावनी देते हुए कहता हु इस्लामी कत्तरपंथ ही दुनिया के लिए असली खतरा है वो सङ्घ से हजारो गुना खतरनाक ह वो एक कत्तरपंथ रूपी विशाल बरगद है उसे गिराए उसके गिरते ही उसके नीचे दबकर संघ बजरङ्गी जैसे खरपतवार अपने आप नस्ट हो जाएंगे

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    • March 9, 2016 at 3:35 pm
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      हम उन लोगो में से नहीं हे इसलिए हरिप्रकाश जी ने लिखा था habarkikhabar.com/archives/1290 Hari Prakash LattaJanuary 5, 2015आज पहली बार ” खबर की खबर ” को देखा ।बहुत अच्छा लगा ————-।मुस्लिम समाज में इस आवश्यकता की पूर्ति आपलोग कर रहें हैहिन्दू समाज में तो यह काम सदियों से होता आया है ।हिन्दू धार्मिक पुस्तकों में लिखी कुछ गलत बातों का विरोध हिन्दू समाज के बीच से ही होता आया है ।अब यह मत कहियेगा की इन गलत बातों का विरोध सिर्फ भुक्त भोगियों द्वारा ही किया जाता है ।क्योंकि यह गलत होगा ।इसी प्रकार कुरीतियों की बात हो या गलत धार्मिक मान्यताओं या परम्पराओं की बात हों , हिन्दू समाज के ही महापुरुषों द्वारा तार्किक और प्रभावशाली आवाज उठती रही है ।ईश्वर आराधना या साधना के भी अलग अलग मार्ग अपने अपने अनुभव और सफलता के आधार पर संतो द्वारा बताये जाते रहे हैं और अपनी अपनी प्रवृति – प्रकृति के अनुसार लोग उनके अनुयायी भी बनते रहे हैं ।सदियों से चल रही इसी प्रकिया के ही कारण हिन्दू धर्म और समाज अधिकांशतः उदार है । मैं आपलोगों के किसी पोस्ट में हिन्दू समाज की उदारता के लिए भौगोलिक या क्षेत्र विशेष की परिस्थियों के तर्क से सहमत नहीं हूँ ।सत्य सत्य ही होता है ।और विवेकशील और ज्ञानवान लोग स्वयं ही सत्य की और अग्रसर होते हैं ।धर्म या यों कहे कि ईश्वर आराधना के मार्ग को फ़ैलाने के लिए सेनापति या शक्ति की आवश्यकता नहीं होती और न ही यह उचित रास्ता है ।हाँ कई बार दुष्ट प्रवृति के राजाओं और लोगों से सज्जन लोगों को बचाने के लिये अवश्य अच्छे सेनापति और सेना की आवश्यकता होती है ।मुस्लिम समाज में यह काम आपलोग कर रहे हैं । बहुत ही गहरी जानकारी , समझ और विवेक के साथ ।सतही पोस्टें तो हजारों देखी है पर प्रभावित आप ही लोगों ने किया है ।आपलोगों के कुछ विचारों से मतभिन्नता के बावजूद आपलोगों की सकारात्मकता की सराहना करता हूँ और शुभकामना देता हूँ कि आप लोगों का दायरा बढे और आपलोगों के विचार मुस्लिम समाज के अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचे ।अपना यह काम जारी रखें । इसी में मुस्लिम समाज और देश का भला है ।सधन्यवाद !हरि प्रकाश लाटा

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  • March 10, 2016 at 10:33 pm
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    बहुत बदिया . Great write

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  • March 10, 2016 at 10:46 pm
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    शुक्रिया मिश्रा जी बीरू और प्रवीण जी शुक्रिया अभी तो शुरुआत ही हे आगे और बहुत बेहतर लेखन पेश करने की कोशिश रहेगी जनता तक सही विचार पहुँचाना ही सभी समस्याओ का हल हो सकता हे

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  • March 13, 2016 at 8:47 pm
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    शुक्रिया भाई हमारा तो एक ही मकसद हे शुद्ध विशुद्ध सेकुलरिस्म फैलाना जिसके बलबूते पर हिन्दू मुस्लिम एकता हो फिर एक दक्षिण एशिया महासंघ बने और फिर इस पुरे इलाके की वो भयावह गरीबी और शोषम खत्म हो जैसा बाकी दुनिया में कही भी नहीं हे

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  • March 16, 2016 at 9:53 am
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    आपने बहुत अच्छा लेख लिखा है. किसी भी कट्टर विचारधारा का विरोध करते हुए, हम हर किसी का साथ, सिर्फ़ इसलिए ना दें कि वो भी उसी संगठन या विचारधारा का विरोध कर रहा है.

    विरोध का कारण क्या है, बहुत महत्त्व रखता है. प्रोफ़ेसर परांजपे ने भी इस विषय पे लिखा और बोला. लेकिन आप कुछ बातो मे ज़्यादा स्पष्ट हैं.

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    • March 16, 2016 at 4:38 pm
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      शुक्रिया जाकिर भाई , अंदेशा ये भी हे जाकिर भाई और पाठको की आने वाले समय में इस संघी सरकार की करतूतो के कारणमुस्लिम बहुल इलाको में भीड़ और बढ़ेगी जिससे मुस्लिम कटट्रपंथ और बढ़ेगा उधर 2019 इस सरकार को हटाने के लिए लाज़मी हे की जो भी पार्टी या घटबन्धन सत्ता में आये तो उसके लिए आवशयक होगा की वह मुसलमानो के एकमुश्त वोट हासिल करे इसके लिए हो सकता हे मुस्लिम नेताओ रहनुमाओ की खूब लल्लो चप्पो हो और एक भी मुस्लिम नेता या रहनुमा ऐसा दीखता नहीं हे जो कटट्रपंथ के खिलाफ कोई दीवार हो ? सभी कम या ज़्यादा मगर कटट्रपंथ बढ़ाएंगे ही तो इसलिए ”कन्हेयाओ ”से ये अपील की गयी हे

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  • February 7, 2017 at 1:36 pm
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    Shamshad Elahee Shams
    14 hrs ·
    आस्ट्रिया में कल मुसलमानों ने बुर्के पर लगी पाबंदी के विरुद्ध बड़ा प्रदर्शन किया जिसमें लिबरल और वाम तत्वों ने भी शिरकत की. जाहिर है यूरोपीय लिबरल और वाम अपनी अपनी सरकारों में बढ़ रहे दक्षिणपंथी असर के विरुद्ध है, लेकिन जिनके समर्थन में वह खड़े है उन्होंने बुर्के को सरेआम महिला सशक्तिकरण बताया, कल यही खौफनाक चेहरे शरिया के समर्थन में भी सडकों पर उतरेंगे तब क्या करेंगे आप? ——— दाढी और सर से पाँव तक काले लबादे में ढकी औरत एक राजनीतिक व्यक्तव्य है. राजनीतिक इस्लाम एक सच्चाई है और वास्तविकता भी, और अपनी अंतर्वस्तु में यह सबसे पुरानी फासीवादी विचारधारा है. एक दक्षिणपथ का विरोध करने के लिए यह जरुरी नहीं कि प्रतिक्रियावादी दूसरे दक्षिणपंथ का साथ दिया जाए. फासीवाद की किसी भी विकसित समाज में कोई जरुरत नहीं. इस हुजूम में से आपने कितनी बार देखा कि ये लोग सऊदी अरब में दूसरे मजहबो की आज़ादी के लिए सड़क पर आये हो? ये नहीं आयेंगे, और आप बौड़म लोग इन्हें जनवादी अधिकार दे रहे हो, ये वही ताकते हैं जो इस विश्व को सातवी सदी में घसीटकर ले जाने में लगे है ..इनके चेहरे देखो और हुलिए, इससे बड़ा सबूत और क्या चाहिए ?
    हमें सभी प्रकार के दक्षिणपंथ और फासीवाद के विरुद्ध लड़ना है और इसमें राजनीतिक इस्लाम भी है, जितनी जल्दी समझ में आ जाये उतना अच्छा.Shamshad Elahee Shams

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  • February 18, 2017 at 11:30 am
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    हलाकि मुझे खुद न सूफीज्म में कोई दिलचस्पी हे न किसी रूमी में , न ही में कनपटी पे बन्दुक या सामने करोड़ो रूपये भी रख दो तो भी में जिदगी में भी किसी मजार दरगाह पर कदम नहीं रखूँगा . शीबा असलम फहमी जी के के लेख के अनुसार इस अक़ीदे में होने वाली लूट का भी में विरोधी हु लेकिन फिर भी में पक्के बरेलवी ताबिश सिद्दकी लखनऊ से सहमत हु उनकी बात बहुत से लोगो को समझनी चाहिए खासकर कुछ सेकुलर हिन्दुओ को इन बातो की समझ बिलकुल नहीं हे और समझना भी नहीं चाहते हे ये कोई अच्छाई या भलाई भी नहीं हे एक किस्म का तक्क्बुर हे कुछ लोगो में की , मानो सारे भारतीय मुस्लिम भोले भाले पीड़ित हे और ये इनके महान खैरख्वाह हे . अभी रविश कुमार की तरबियत पाया एक करेक्टर ऐसे ही मुद्दे पर इन लोगो को सपोर्ट देने पंहुचा https://khabarkikhabar.com/archives/3054 जाहिर हे की उसे मुद्दे की समझ नहीं हे . Tabish Siddiqui
    1 hr ·
    जब मैं सूफ़ियत पर लिखता हूँ कभी और ये ज़िक्र कर देता हूँ कि रूमी ने नाच नाच के ख़ुदा को पाया तो एक बहुत बड़ा तबक़ा मेरी इस बात का विरोध करता है.. वो आ के बहस करते हैं कि वो साबित कर सकते हैं कि रूमी डांस नहीं करते थे.. जब मैं पूछता हूँ कि रूमी अगर डांस करते थे तो आपको परेशानी क्या है? तो कहेंगे कि “नौज़बिल्लाह, नाचना गाना हराम है इस्लाम में.. आप कैसे एक अल्लाह के वली के बारे में ये लिख सकते हैं कि वो नाचते थे?”
    जिस वक़्त शाह कलंदर की दरगाह पर जो अटैक हुवा पाकिस्तान में उस वक़्त वहां दरवेश डांस हो रहा था.. नाचना और गाना (क़व्वाली) सुफ़िस्म में प्रार्थना का एक अहम हिस्सा रहा है हमेशा.. जिन लोगों ने वहां बम ब्लास्ट किया है उनके हिसाब से वहां हराम काम हो रहा था.. वही हराम काम जो रूमी करते थे
    आप कम्युनिस्ट हैं, नास्तिक हैं, धार्मिक हैं या कोई भी.. आप अपनी फेसबुक दोस्तों की लिस्ट ध्यान से देखिये.. जो सीरिया के लिए आपको रोते मिलेंगे, पाकिस्तानी जहाज़ के गिरने पर जो दुवाये ख़ैर करते मिलेंगे वो आपको कभी भी ऐसे ब्लास्ट पर रोते नहीं दिखेंगे और आप उन्हें अपना दोस्त समझते हैं.. उनके साथ बौद्धिक लड़ाई में आप सरकार/समाज का विरोध करते हैं और आपको लगता है कि वो आपके साथ किसी क्रान्ति का हिस्सा हैं
    नहीं.. ये लोग किसी भी क्रान्ति में आपके साथ कभी नहीं होते हैं.. आज इनके लिए नाचना, गाना, ख़ुश होना हराम है और उसे आप नज़रंदाज़ कर देते हैं मगर यक़ीन मानिये कल को यही उस फ़तवे पर भी ईमान ले आएंगे जिसमे कहा जायेगा कि “क्रान्ति” हराम है और फिर आप भी नाचने वाले सूफ़ियों की तरह इनके लिए वाजिबुल क़त्ल हो जाएंगे
    इसलिए आतंकवादियों का सीधे तौर पर आप कोई बहिष्कार नहीं कर सकते हैं मगर ये जो हराम और हलाल के ठेकेदार हैं जिन्हें लात मार अपनी दोस्ती के दायरे से बाहर कीजिये.. जैसे आप पूछते हैं कि “कौन कौन है जो गोडसे को हुतात्मा मानता है?” और ये पूछ कर आप अपनी लिस्ट की सफ़ाई करते हैं वैसे ही अब ये पूछिए कि “कौन कौन है जो ये मानता है कि सूफ़ियों का मज़ार पर नाचना और गाना हराम है?”.. और जो भी बौद्धिक दलील देने आये उसे अलविदा बोलये और उनका सामाजिक बहिष्कार भी कीजिये
    आतंकवाद की सोच को आप ऐसे ही लगाम लगा सकते हैं.. आप सीधे सीधे तालिबान या isis से वार्तालाप नहीं कर सकते हैं.. उनकी विचारधारा को चाहने वाले आपको अपनी लिस्ट में ही मिल जाएंगे.. उनसे यहीं निपट लीजिये
    ~ताबिश सिद्दकी लखनऊ

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  • March 1, 2017 at 9:20 pm
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    भारत में सबसे बेहतर वाम दल ही रहे हे देश हित में पुरे वाम का ही मज़बूत होना जरुरी हे यु पि ए वन सर् कार जब तक वाम कब्ज़े में रही तब तक करप्शन महंगाई साम्प्रदायिकता सीमा पर तनाव सब काफी काबू मे रहा प्रकाश करात ने हरकिशन जी के सब किये कराय पर पानी फेर दिया खेर वाम का मज़बूत होना जरुरी हे लेकिन जो भि हो तिवारी की भि ये बात जायज़ हे ” Sanjay Tiwari
    11 hrs · चालीस में जब जिन्ना को समर्थन देने का सवाल सामने आया तो सीपीआई पोलित ब्यूरो में खूब बहस हुई। दो साल तक बहस होती रही। टू नेशन थ्योरी और वो भी धर्म के आधार पर, समर्थन कैसे किया जा सकता है? लंबी बहस के बाद तोड़ निकाल लिया गया। जिन्ना मास लीडर हैं। वैसे ही जैसे गांधी। इसलिए हम जिन्ना का समर्थन इसलिए करेंगे क्योंकि वो मास लीडर हैं, इसलिए नहीं कि वो अलगाववादी मुसलमानों के लीडर हैं। हां, गांधी जरूर कम्युनल लीडर थे क्योंकि वो हिन्दुओं की तरह प्रार्थना करते थे और मास लीडर की आड़ में हिन्दूवादी एजेण्डा चला रहे थे।
    भारत में साम्यवाद का इतिहास स्याही की तरह सफेद है। उन्हें जब जहां मौका मिला है उन्होंने समाज को फोड़ने या देश को तोड़ने में तनिक भी देर नहीं की है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि सामने गांधी हैं या गांधी के हत्यारे। उनका बुनियादी एजेण्डा बर्बादी है वह किसी भी तरीके से हासिल हो, होना चाहिए। पाकिस्तान से लेकर कश्मीर तक वो इसी बुनियादी सिद्धांत पर काम कर रहे हैं। उनके साथ थोड़ा दुर्भाग्य ये हो गया है कि अब भारत में ब्रिटिश हुकुमत नहीं है, इसलिए चाहकर भी वह स्टेज नहीं सजा पा रहे हैं कि कश्मीर पाकिस्तान का अविभाजित अंग बन जाता। लिहाजा जेएनयू से डीयू तक फड़फड़ाकर रह जा रहे हैं। Sanjay Tiwari
    11 hrs ”· वैसे इसमें असल दोष मुझे अपनी मोटी बुद्धि से तो बहुत से सेकुलर मुस्लिम बुद्धजीवियों का भी लगता हे जो मुस्लिम कट्टरता के शोषणकारी आयामो को समझ और समझा नहीं पाए . इनमे से अधिकतर या तो शिया थे या बरेलवी और ये बात भी मुझे खटकती हे की अपनी ये पहचान ये दर्शाते नहीं थे , हे . फिर आज भी सेक्लुरिजम के किले जे एन यु में भी काफी मुस्लिम नाम दीखते हे हे कोई इनका योगदान —– ? हिन्दू कटरपंथ पर ही गला फाड़ कर ये अपने कर्तव्यों की इतिश्री और सेकुलरिज्म की मलाई सी खाते रहे उमर खालिद पर लेख की कोशिश रहेगी की बस्तर के शोषित आदिवासियों पर पि एच डी कर रहा ये लड़का कश्मीरियो की अलगावादी साइकि पर क्यों नहीं पि एच डी करता जिन्होंने पुरे उपमहादीप की गरीब जनता को बंधक बना रखा हे )

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  • January 3, 2018 at 10:11 am
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    H L Dusadh Dusadh
    वैसे उमर के प्रति खासा सहानुभूति रखने के बावजूद मेरा मानना है कि जेएनयू के दोनों जोशीले बच्चे- कन्हैया और उमर- भले ही लोगों में थोडा जोश भर दें, किन्तु इनका भाषण अंततः हिन्दू ध्रुवीकरण में ही सहायक होता है. ऐसे में वर्ण -व्यवस्था के विशेषाधिकारयुक्त तबकों(सवर्णों ) का शक्ति के स्रोतों पर ८०-८५ % कब्जे को बनाये रखने में मुस्तैद संघ व उसका राजनीतिक संगठन जिग्नेस के लिए कोई समस्या है, तो वह व्यक्तिगत जीवन में भले इन दोनों जेनुआइट लड़कों से मित्रता बनाये रखें, किन्तु सार्वजानिक जीवन में इनसे दूरी बनाये रखेने पर विचार करें . क्योंकि ये दोने अनजाने में, हिन्दू ध्रुवीकरण में भारी योगदान किये जा रहे हैं. H L Dusadh दुसाध
    दुसाध साहब का कहना सही हे उमर ख़ालिदो ( इमरानो ओवेसियो आज़मो अज़मलो ) को चढाने से आख़िरकार भाजपा ही मज़बूत होगी इन्हे अपना काम करना चाहिए वो नहीं करते हे ———————————–Pawan
    23 hrs ·17 वर्षीय फरदीन अहमद खांडे, जो एक कश्मीर पुलिस के कांस्टेबल का ‘नूर ए चश्म’ था ,ने पिछले 70 बरस से भारत की सरकारों द्वारा लगातार बोले जा रहे झूठ और फरेब को बेपर्दा कर दिया है ! फरदीन,जो कुरान का आलिम था, सिर्फ तीन महीने पहले फिदायीन आतंकी बना था !
    31 दिसंबर को CRPF ट्रेनिंग सेंटर,लथपुरा, ऑपरेशन पर जाने से पहले फरदीन ने एक वीडियों बनाया ! सिर्फ 17 साल के कश्मीरी लड़के का हौंसला, Determination और समर्पण देखिए ,वीडियो में कहता है ” जब आप यह वीडियों देख रहे होंगे,तब मैं जन्नत में होऊंगा ! लेकिन भारत के इस झूठ को, कि मिलिटेंसी बेरोजगारी की वजह से है, का पर्दाफाश करता हूँ ! कश्मीरियों का संघर्ष वास्तव में जिहाद है,हर मुस्लिम का फर्ज है कि वह जिहाद करे ! कश्मीर में ‘निज़ाम ए मुस्तफा’ ही हमारा पहला और आखिरी मकसद है !”
    कश्मीर घाटी में सरकारी नौकरियों को रेवड़ियों की तरह बांटा जाता रहा है,आज भी शेष भारत के मुकाबले कश्मीर ‘सरकारी रोजगार औसत’ कई गुना ज़्यादा है ! वहां के सरकारी कर्मचारी के पास सेब के बागान,खेती और ट्रेवल एजेंसियां भी होती हैं ,यहीं लोग आतंकी और पाक समर्थक भी हैं ! आम हिंदुस्तानी को मालूम नहीं है कि घाटी के ‘मैट्रिक पास’ के सामने दिल्ली का ‘पोस्ट ग्रेजुएट’ बहस, ज्ञान और अंग्रेज़ी में टिक नहीं पाता ! यही नहीं पहनने-ओढ़ने में घाटी के लोग , समृद्धता के चलते कहीं आगे हो चुके हैं, पत्थर चलाते युवकों और किशोरों को आप leading ब्रांड्स के कपड़े ,जूते पहने, आप TV पर देख सकते हैं !
    भारत के नीति नियंताओं,अब तो आंख खोलो ! असली दुश्मन के असली चेहरे पर पर्दा डालने का वक्त नहीं रहा !! तुम्हारी रिश्वतें,रेवड़ी रूपी नौकरियां और चाटुकारिता अब कश्मीर घाटी की जेहादी आकांक्षाओं को रोक नहीं पाएगी !!……
    चलते-चलते यह बताना भी ज़रूरी है कि 205 आतंकियों को मारने में हमने अपने 131 फौजी नौनिहालों को खोया है ! पूरे विश्व मे काउंटर इंसर्जेंसी ऑपरेशंस में सुरक्षा बलों की मृत्यु का इतना उच्च औसत कहीं नहीं होता…….”

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  • January 3, 2018 at 7:05 pm
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    कोई शक नहीं की उपमहाद्वीप में मुस्लिम यूनिटी सुप्रियॉरिटी इकवेल्टी की नॉनसेंस और उसका फालतू बचाव , वाम और सभी लिबरल्स के लिए सरदर्द और फालतू का बोझ ही हे
    ”Shailendra Singh
    19 hrs ·
    टीपूँ सुल्तान देश की आज़ादी के लिए अंगरेजो से लड़ा था और पेशवा अपना राज्य बचाने के लिए वामपंथी ज्ञान ”

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  • January 5, 2018 at 11:11 am
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    अशोक जी को तो अब पता चला हमें तो हमेशा से इन सूफियों की भी असलियत पता थी हम शुद्ध देवबंदी हे और देवबंद और धर्मांतरण की दुनिया के एक बड़े खिलाडी हमारे ही रिश्तेदार हे वही दूसरी तरफ निजामुद्दीन वालो में भी रिश्तेदारी हे सबको जानते हे -Ashok Kumar Pandey
    3 January at 21:28 ·
    #कश्मीरनामा के लिए पढ़ने का एक नुकसान यह हुआ कि सूफ़ीवाद को लेकर जो एक रूमान था वह ख़त्म हो गया। समझ आया कि उस दीवानगी से आगे एक बहुत कठोर यथार्थ था जिसकी अपनी राजनीति थी। एक पूरा चैप्टर लिखा भी है सूफ़िज़्म और ख़ासतौर पर भारत मे सूफ़िज़्म को लेकर।
    आज जब कई लेखकों/ कवियों को ख़ुद को सूफी कहते देखता हूँ तो उनकी भौतिक लिप्साओं और आकांक्षाओं से जोड़कर देखने पर लगता है वाकई ये भी वैसे ही “सूफी” हैं।—————————-Ashok Kumar Pandey
    23 hrs · New Delhi ·
    दलित मुस्लिम : एकता वेकता
    _____________यह बहस कई बार उठ चुकी कि दलित मुस्लिम एकता संभव है या नहीं? ज़रूरी भी है या नहीं?
    मेरा सवाल है कि कोई एकता आख़िर क्यों? ज़ाहिर है एकतायें समान लक्ष्यों के लिए समान शत्रुओं के खिलाफ ही संभव हैं। जब हम कहते हैं कि सभी कम्युनिस्टों को एक हो जाना चाहिए तो हमारा उद्देश्य होता है कि वे एक होकर पूँजी की ताक़तों के विरूद्ध संघर्ष तेज़ करें। इसी क्रम में दलित-मुस्लिम एकता का मानी क्या होगा?
    कुछ मित्रों ने लिखा कि जहां दलितों का शत्रु ब्राह्मणवाद है वहीं मुसलमानों का शत्रु सांप्रदायिकता। मेरा सवाल है कि क्या आज सांप्रदायिक और ब्राह्मणवादी शक्तियाँ अलग अलग हैं? क्या जो ताक़तें अफ़लू खान की हत्या करती हैं वही कोरेगांव पर हमला नहीं करतीं? फिर? क्या इतना ही मुस्लिम दलित एकता के लिए काफी होगा?मेरा मानना है नहीं। असल में न तो दलित कोई मोनोलिथ रह गया है न ही मुसलमान। दलितों का एक हिस्सा संघ की ओर गया है, दूसरे ने मध्यवर्गीय लक्ष्य हासिल कर लिए हैं और सत्ता का भागीदार हो चुका है तो मुसलमानों में किसी भी संघर्ष का लाभ अक्सर अशराफ़ तक पहुँचा है। फिर दलितों और मुसलमानों के अलावा भी अल्पसंख्यक और वंचित तबके हैं। स्त्रियाँ हैं, आदिवासी हैं, कश्मीर तथा उत्तर पूर्व की उत्पीड़ित राष्ट्रीयताएं हैं और छोटा सा सही पर प्रगतिशील लोगों का एक तबका है जो गौरी लंकेश की तरह दक्षिणपंथ की आँख की किरकिरी है। देखें तो इन सबका समान शत्रु है दक्षिणपंथी फ़ासीवाद। कोई एकता उस फ़ासीवाद से फैसलाकुन मुकाबिले के लिए इन सब वंचित और मुक्तिकामी जनता की व्यापक एकता ही होगी। वही फ़ासीवाद के चंगुल से आज़ाद करेगी।

    लेकिन यह एकता आसमान से नहीं टपकेगी। इसके लिए संघर्षों में साझा मोर्चे बनाकर भरोसा हासिल करना होगा एक दूसरे का। इसीलिए जहाँ बन सके वहाँ दलित-मुस्लिम एकता, दलित-वाम एकता आदि के साझा मोर्चों का स्वागत होना चाहिए। ये टूटे भी तो आगे की राह दिखाएंगे। घंटे भर में एकता खाली चुनाव लड़ने/जीतने वाली एकता होती है। मुक्ति संघर्ष की एकता लंबी प्रक्रिया में हासिल होती है।

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  • June 26, 2018 at 10:35 am
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    Ashok Kumar Pandey
    13 hrs · नब्बे का मई का महीना था। तत्कालीन मीरवाइज़ की श्रीनगर में अज्ञात बंदूकधारियों ने हत्या कर दी। जनता में आम चर्चा थी कि यह हरक़त हिज़्बुल मुजाहिदीन की है। हज़ारो लोग उनकी शवयात्रा में निकले। जगमोहन साहब राज्यपाल हुआ करते थे उन दिनों। अधिकारियों ने सलाह दी कि वह मीरवाइज़ के शव पर फूलमाला चढ़ा दें। जगमोहन साहब नहीं माने।
    ख़ैर, जुलूस जब शेर ए कश्मीर मेडिकल कॉलेज से निकलकर इस्लामिया कॉलेज के आगे पहुँचा तो अचानक अर्द्धसैनिक बलों ने फ़ायरिंग शुरू कर दी। मृतकों की संख्या 50 से 100 के बीच बताई जाती है। हालात यह कि दो गोलियाँ मीरवाइज़ की लाश को भी लगीं। इसके बाद माहौल बदल गया। हिज़्ब के ख़िलाफ़ जो गुस्सा था वह भारत के ख़िलाफ़ हो गया। दुनिया भर में थू थू हुई, लोकसभा में हंगामा मचा और जगमोहन साहब को लौटना पड़ा।
    जम्मू के परमआदरणीय विधायक महोदय का शुजात बुखारी से जुड़ा बयान पढ़कर यह याद आया।
    #कश्मीरनामा—————————–Follow

    शंभूनाथ शुक्ल
    15 hrs ·
    पानी को उतरने से बचाओ महाराज!
    शंभूनाथ शुक्ल
    यूपी में पानी है और नहीं भी है। प्रदेश सरकार का कहना है कि यूपी में पानी भरपूर है लेकिन यूपी में पानी का तल निरंतर नीचे ही जा रहा है। गाज़ियाबाद शहर में तो पानी उतरा ही है, कानपुर में तो वह और रसातल में चला गया है। पिछले तीने महीने में मुझे कानपुर के अपने घर में दो बार बोरिंग और नीचे करानी पड़ी। जबकि शहर गंगा किनारे है और दूसरे किनारे यमुना। बीच में सात और नदियाँ। मगर पानी है कि नीचे की ओर भागा ही जा रहा है। बहरहाल पानी के उतरने पर मेरा यह निजी अनुभव पढ़िए।
    “कई साल पहले की बात है। मुझे एक शादी में जाना था। उस शादी में जिसका न तो दूल्हा मेरा परिचित था न दूल्हे का बाप न लड़की वाले। दूल्हे का बड़ा भाई मेरा ड्राइवर था और वह पीछे पड़ा था कि सर आप चलेंगे तो शोभा रह जाएगी। मैं भी खाली था सो कह दिया कि चलो। उसने कहा कि बारात औरय्या के पास जानी है। इसलिए आप तो सीधे कानपुर आ जाओ वहां से हम ले लेंगे। बारात कानपुर देहात के गौरा नामक गांव से चलनी थी, जो वहां की एक बड़ी तहसील पुखरायां के करीब गौर ठाकुरों का बड़ा गांव है। मेरा वह ड्राइवर पहले किसी जिला पंचायत अध्यक्ष की गाड़ी चलाता था इसलिए उसके पास एक बंदूक थी जिसे वह गाड़ी चलाते समय भी साथ रखता था। एक तो ठाकुर ऊपर से बंदूक वाला ठाकुर, तो उसका जलवा आप सब समझ ही सकते हैं। जब वह गाड़ी चलाता था तब क्या मजाल कि कोई उसकी पुलिस वाला गाड़ी रोक ले। मुझे उसने कहा था कि “सर आप कानपुर आ जाओ, हम आपको ले लेंगे”। इसलिए उसने मेरे शताब्दी से उतरते ही अपने साथ ले लिया। उसके पास एक जीप थी और वह मेरे लिए रिजर्ब कर दी। शाम को सात बजे के आसपास बारात निकली। औरय्या पहुंच कर रात वहीं विश्राम हुआ यानी रात गुजारने का आग्रह हुआ। अब रात कहां गुजारी जाए, इसके लिए कोई होटल तो था नहीं। सारे बाराती वहीं बस अड्डे के पास लेट लिए। गर्मी, मच्छर और दुर्गन्ध के बीच रात कैसे गुजरी बस पूछिए मत। सुबह सब वहां से फारिग होकर चले। पहला स्टाप था अजीतमल। वहीं पर सबको समोसे खिलाए गए और चाय पिलाई गई। फिर बारात चली और पहुंची महेवा, बकेवर होती हुई लखना। वहां पर आते-आते दोपहर हो गई और रोडवेज बस की सेवा भी वहां से समाप्त हो गई जो हम बारातियों को लेकर आई थी। अब भोजन के वास्ते दूल्हा समेत सब चले एक हलवाई की दूकान पर जहां पूरियां बिक रही थीं। पांच रुपये में चार की दर से। साथ में आलू तथा सीताफल की सब्जी साथ में आम का अचार व एक गिलास मठ्ठा। अब आगे की यात्रा का पता करना था। दूल्हा भी साथ चल रहा था जो पूरी यात्रा में पीले रंग का एक जामा पहने रहा था। मैने दूल्हे के बड़े भाई और अपने ड्राइवर श्री रामलखन सिंह गौर से पूछा कि ‘भैया ठाकुर साहब बारात जानी कहां है?’
    ड्राइवर के जवाब से होश उड़ गए। उसने कहा कि “सर लड़की वालों ने कहा था कि लखना आ जाना वहां से हम ले लेंगे”। अब यह भी नहीं पता था कि बारात का गंतव्य कहां है। साथ में बंदूकें थीं, बहू के चढ़ावे के लिए ले जाए जाने वाले जेवरों और कपड़ों से भरा एक बक्सा था और नकद रुपया भी था पर गंतव्य का पता नहीं तो इस बीहड़ और बागियों के इलाके में सुरक्षा की गारंटी क्या है, इसका कोई भरोसा नहीं। लड़की वालों का कोई संपर्क साधने का जरिया भी किसी के पास नहीं था। बस गांव का नाम पता था बुर्तोली। लखना में जिससे पूछो वह इस गांव के नाम से ही मुंह बिचकाता और फिर सिर हिलाने लगता। एक बजाज की दूकान का पता जरूर दर्ज था जिससे जाकर पूछा जा सकता था। उस दूकान में जाकर पूछा गया तो बजाज ने बताया कि लड़की वाले भोले सिंह हमारी दुकान पर आए थे। आप ऐसा करो कि लखना से आगे जाकर चकरनगर से पता कर लो। वहां से करीब ही है। और हां, जीप यहीं पर छोड़ दो क्योंकि आगे जीप जा नहीं पाएगी। वहां पर लड़की वाले मिल जाएंगे कुछ ऊँट लेकर वह अपने साथ आए होंगे। अब पीतवर्णी जामा पहने वह दूल्हा, उसके भाई तथा अन्य बिरादरी वाले और मैं सब चल पड़े पैदल। दूल्हे के एक चाचा ने वह बक्सा सिर पर उठा रखा था जिसमें कपड़े व जेवर थे। जीप वहीं बजाज की दूकान पर छोड़ दी गई। करीब चार किमी पैदल चलने के बाद हमने एक पीपों से बने अस्थायी पुल से जमना पार की तब वहां पर किसी को भी अपना इंतजार करते नहीं पाया। मीलों तक बस बीहड़ और धूसर कगार थे। बीच-बीच में करील और बबूल की झाडिय़ाँ। मध्यान्ह का सूर्य तप रहा था और किसी के पास पानी तक का इंतजाम नहीं था। सो वापस लौटकर चकरनगर से एक मटका खरीदा गया और बम्बे के पानी से उसे भरा गया जिसे एक बाराती ने अपने सिर पर रखा। वहां से बुर्तोली का रास्ता पूछा गया जिसके बारे में बताया गया जो पता चला कि यहां से चार-पांच कोस होगा। और रास्ता पूरा बीहड़ होगा। हां अगर ऊँट मिल गए तो सुभीते से पहुंच जाएंगे।
    मरते क्या न करते पैदल ही चल पड़े इस आस में, कि शायद आगे कोई सवारी मिल जाए। पर एक कोस हो गया और दो कोस की दूरी तय कर ली मगर ऊँटों का पता नहीं। और शाम ऊपर से ढल आई तथा बीहड़ में सन्नाटा डराने लगा। कहीं कोई कुआं न पानी न बंबा। हम चलते रहे और शाम रात में बदल गई। यह भी नहीं पता था कि सही चल रहे हैं या गलत। बस चले जाओ। रास्ते में एक जगह रुक कर मन्नू सिंह ने अपने अंगौछे में सतुआ मांड़े और वहीँ एक-एक सत्तू का लड्डू अचार और मिर्च के साथ उदरस्थ किये गए। उसी मटके का पानी पिया गया। रात में हम पगडंडी के भरोसे आगे बढ़ रहे थे अचानक थोड़ी रोशनी दिखी। हम और तेज चले और एक घर के पास पहुंच गए। छप्पर की एक झोपड़ी थी जिसमें एक अधेड़ और उसकी बीवी बैठे थे। हमने अपने गंतव्य गांव का नाम बताया तो बोला यही गांव है। थोड़ा सा और आगे चले जाओ घर मिल जाएगा। हमारा पानी खत्म हो चुका था इसलिए हमने पानी मांगा तो रूखा-सा जवाब मिला कि लड़की वालों के घर पहुंच जाओ वहीं पी लेना। पर उसके घर के बाद से ही गांव खत्म हो गया। मानों एक ही घर का गांव था। हम और आगे बढ़े तो कुछ पशुओं की आवाज से हम उत्साहित हुए और लगा कि किसी गांव के करीब हैं। आधे घंटे बाद एक गांव मिल गया और वहां की गलियों में घूमते हुए हम लड़की वाले यानी ब्रजभान सिंह उर्फ भोले सिंह के घर पर पहुंच ही गए।
    बारात के वहां पहुंचने पर चहल-पहल शुरू हुई। एक बाल्टी और लोटा रख दिया गया और कहा गया कि पानी स्वयं खींच कर भर लें। हमारे दो जवान पानी भरने के लिए कुआं पर चढ़े मगर उसमें पानी कहां है, यह पता नहीं चल रहा था। और रस्सी भी इतनी लंबी कि लग रहा था मानों रस्सी न हुई सीधे पाताल लोक तक पहुंचाने की सीढ़ी हो गई। कुएं में बाल्टी गिराई गई और सारी रस्सी खत्म। उसके बाद उसकी खिंचाई शुरू हुई तो उन दोनों ही पहलवानों के सारे पुठ्ठे निकल आए और वे लगभग हाँफने लगे। करीब बीस मिनट बाद जब वे एक बाल्टी पानी खींच कर आए तो आते ही लेट गए और बोले इतनी थकावट तो यात्रा में नहीं हुई। उस रात थके-मांदे हम लोगों ने किसी तरह चकले जैसी पूरियों को कद्दू के साग के साथ निगला। हमें झन्नाटा (कई दिनों के बासी मठ्ठे को सड़ा कर बनाया गया रायता, जिसमें लाल मिर्च का झोल मिलाया जाता है) भी परोसा गया था। मैंने तो वह पिया नहीं, लेकिन जिन्होंने पिया, वे रात भर सी-सी करते रहे और सुबह फारिग होने गए तो चीखते हुए लौटे। अगले रोज सुबह से कुएं के पास से अजीब-सी आवाजें आने लगीं तो हम लोग उठकर देखने गए तो पाया कि दो लड़कियां कुएं के पास से शोर मचाती हुई कूदतीं और बैलों की जोड़ी की तरह रस्सी लेकर भागतीं तब वह बाल्टी ऊपर आ पाती। तब हमें पता चला कि यहां पानी क्यों इतना कीमती है कि एक लोकगीत ही है कि ‘मटकी न फूटे खसम मर जाए’। उन्हीं लड़कियों ने दो बाल्टी पानी हम बरातियों के लिए भी रख दीं और कहा कि अगर नहाना है तो पास में चंबल नदी है वहां चले जाओ। एक ऐसे प्रदेश में जहां पानी इतना कम उपलब्ध हो वहां पर पानी तो उतरेगा ही! पर आप तो योगमाया से यूपी को दुरुस्त कर दो महाराज!”
    (मेरे ब्लॉग “टुकड़ा टुकड़ा ज़िन्दगी” से)
    नोट- बीहड़ का यह फोटो गूगल सेFollow

    शंभूनाथ शुक्ल
    17 hrs ·
    यूँ धरने से उठे वीपी सिंह
    कुछ लोग अपनी कार्यनीति और रणनीति तथा स्पष्ट चिंतन से सबको प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे ही अधिकारी नौकरशाही और पुलिस प्रशासन में हों तो काफ़ी हद तक समस्याओं को बातचीत से हल किया जा सकता है। मेरठ के डीआईजी रहे श्री Shailendra Pratap Singh Singh ने किस तरह पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय वीपी सिंह को ग़ाज़ियाबाद जिले के धौलाना गाँव में धरने पर नहीं बैठने के लिए मना लिया। इसकी एक बानगी-
    “फ़ेसबुक से ज्ञात हुआ कि आज पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह का जन्म दिन है। मै विद्यार्थी जीवन से ही कुछ अलग सोचता था। जाति पाँति को उचित नही समझता था। बाद में जब मैने गौतम बुद्ध की कही बातों को गहराई से समझना शुरु किया तो लगा कि यही तो मै भी सोचता था। मैं जब इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में था तो वर्ष 1973 के हालैण्ड हाल हास्टल के सोशल सेक्रेटरी के पद के चुनाव में मैने राजनीति विभाग में अपने सहपाठी श्री श्रीकृष्ण ( बाद में आइएएस यूपी रीडर) को चुनाव में समर्थन कर जितवाया जो उस समय के लिहाज से एक मील का पत्थर थी और शायद पहली बार ही कोई अनुसूचित जाति का छात्र वह चुनाव जीत पाया था।
    वीपी सिंह जी की इमानदार सोच और उनकी कार्य शैली मुझे प्रभावित करती रही। वैसे भी मैं उनके पहले चुनाव (1971) में उन्हें इलाहाबाद में सुन चुका था। तब वह राजा अधिक राजनेता कम थे। धीरे-धीरे वह राजनेता और फिर कुछ लोगों के लिये फ़क़ीर, कुछ के लिये मसीहा तो कुछ के लिये खलनायक तक का सफ़र किए। मेरे लिये वह देश के बारे में सही सोच और सही दृष्टि वाले राजनेता थे। नौकरी के मध्य 2005 के आसपास प्रकाशित किताब ‘ बुद्ध के बढ़ते क़दम ‘ में मैने उन्हे देश के हाशिये पर पड़े लोगों के लिये चिंतित राजनेता के रूप में याद किया ।
    खैर, आज उनके जन्म दिन पर जो एक विशेष घटना मुझे याद आ रही है वह मै सुनाने के लिये यह पोस्ट लिख रहा हूँ। हुआ यह कि जब मैं डीआईजी मेरठ था , 2006 के मध्य श्री वीपी सिंह ने किसानों के हितों को लेकर ग़ाज़ियाबाद के धौलाना थाना क्षेत्र में शासन द्वारा रिलायंस को आबंटित ज़मीन पर ट्रैक्टर चलाने का कार्यक्रम निश्चित किया। शासन ने निर्णय लिया कि उन्हे ऐसा करने से रोका जाए। यूपी के डीजी श्री बुआ सिंह साहब भी ग़ाज़ियाबाद भेजे गये। मीटिंग हुई। मुझे उस गांव / जगह का प्रभारी बनाया गया जहाँ ट्रैक्टर चलना था। तमाम लोग, मीडिया, राजनेता वहां पहुँच रहे थे पर मैने किसी को नजदीक नहीं आने दिया। इस बीच श्री वीपी सिंह ग़ाज़ियाबाद में प्रवेश करते समय सीमा पर गिरफ़्तार कर मेरठ रोड पर बने उप्र. आवास विकास के गेस्ट हाउस लाये गये। शाम मैं मौक़े पर सब ठीक ठाक निपटा कर लौटा ही था कि थोड़ी देर में डीजी साहब की सूचना आई कि उस गेस्ट हाउस में पहुँचू और श्री वीपी सिंह को वापस दिल्ली भिजवाऊं। मै तत्काल गेस्ट हाउस ग़ाज़ियाबाद पहुँचा। पता चला कि गिरफ़्तारी के बाद वी पी सिंह साहब ने वही धरना देना शुरू कर दिया था और वापस दिल्ली जाने को तैयार नही हो रहे थे। एसएसपी पीयूष मोर्डिया और जीएम ग़ाज़ियाबाद श्री सुंदरम् साहब उनसे अनुरोध करते रहे पर सफल नहीं हुये। पिछड़ों के मसीहा और पूर्व प्रधानमंत्री का यह धरना राज्य सरकार के लिये निश्चित ही एक बडी किरकिरी थी। मीडिया इसे खूब उछाल रही भी थी। ऐसे मे मैं भी पहुँच गया। वहाँ राजबब्बर जी भी थे। सारे अधिकारियों को हटाकर मैने श्री वीपी सिंह जी से बाततीत शुरू की। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी, उनके बिचार, मेरा इलाहाबाद से नाता, मेरी किताब में भी उनके बिचारों का न केवल उल्लेख वरन उनका समर्थन, नाते रिश्ते, तमाम दाँव पेंच मैने मारे पर वे बहुत पसीजते प्रतीत नही हुये। मै कभी असफल नही हुआ था, न होना चाहता था, न मैं मौक़े पर किसी वरिष्ठ को बुलाने के कभी पक्ष में रहा। पर यहाँ सामने वाला टस से मस नही हो रहा था या यूं कहे कि कुछ बोल ही नही रहा था। मैने भी कहा क्या होगा? आप नही उठेंगे, दिल्ली नही जायेंगे तो शासन मेरा ट्रांसफ़र कर देगा कि जब इस छोटे से काम में डीआईजी सफल नहीं हो सकता तो ऐसे आफीसर से क्या फ़ायदा और यह भी कहां कि यहाँ ज़ोन के आईजी श्री एनबी सिंह और ज़ोन में आधे से ज्यादा पुलिस कप्तान राजपूत हैं। सब के बारे में आपके कारण शासन यह धारणा बनायेगा कि सब राजपूत नकारे हैं। मेरा यह सब भाषण एक पक्षीय ही था। वह तो बस निर्लिप्त भाव से बिलकुल शांत होकर टुकुर टुकुर ताक भर रहे थे। बीच बीच में राजबब्बर से कहते कि फ़लाँ मुख्यमंत्री, कभी फ़लाँ कम्युनिस्ट नेता से बात कराओ और मोबाइल से किसान आंदोलन की देश में जरूरत पर बाते करते। मैं उठने को ही था तो उन्होंने कहा कि मैं आपस में मीटिंग कर आपको बताता हूँ। कुछ देर उनकी आपसी मीटिंग हुई और मुझे फिर बुलाया गया और कहा कि ठीक है, हमने वापस दिल्ली जाने का निर्णय लिया है। उस समय रात के करीब नौ बज रहे थे।
    समस्या का समाधान मेरे पहुँचने के थोड़ी देर बाद ही हो गया था। सारे अधिकारियों के साथ मैं भी ख़ुश था । डीएम/एसएसपी पूछते रहे कि ‘सर आपने कैसे उन्हें वापस जाने के लिये सहमत करा लिया?’ मै भी उन्हे क्या बताता? कहा- “यह सब छोड़ो, बस मस्त रहो”।
    आज इस इस घटना को याद करते हुये , उनके जन्म दिन पर मैं उन्हें हार्दिक नमन करता हूँ।”

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  • July 9, 2018 at 7:06 pm
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    2012 में मोहल्ला लाइव पर मेरी और विश्व दीपक की इस मुद्दे पर बहस हुई थी मेने तभी कहा था की मुस्लिम कटटरपंथ के कारण हमें हिन्दू कटटरपंथी — मीनी सरकार झेलनी पड़ेगी http://www.mediavigil.com/media/statement-of-vishwadeepak-on-freedom-of-press-and-press-club-episode/

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  • October 29, 2018 at 5:32 pm
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    उपमहाद्वीप में सच्चा सेकुलर वो हे जो पूरी तरह निष्पक्ष हो में खुद सुन्नी सय्यद देवबंदी मुस्लिम हु हु हु में हु मगर किसी के भी इस्लाम या कोई भी अक़ीदा पकड़ने छोड़ने कन्वर्ट होने दुनिया का सबसे अच्छा कच्चा सच्चा ऊँचा नीचा जो मन में आये वो धर्म बताने से मेरे कानो पर कोई ज़ू नहीं रेंगती हे में ना खुश हु ना दुखी हु इस आधार पर मेरे लिए ना कोई अच्छा हे ना बुरा , न ईमानदार न बईमान ना सादा हे ना भोगी इस आधार पर मेरे लिए ना कोई दोस्त हे ना कोई दुश्मन न अपना हे न पराया ये सब मेरा मुद्दा नहीं हे अधिक से अधिक लोगो को हमने सच्चा सेकुलर बनाना हे ——————————————————————
    Sanjay Tiwari28 mins · जेएनयू की कोई कश्मीरी छात्र है शेहला राशिद. भारत के टुकड़े करनेवाली गैंग की मेंम्बर. उसने घोषित किया है कि वह कम्युनिस्ट नहीं है और न ही उसने इस्लाम छोड़ा है. जो नहीं कहा वह यह कि वह तो कम्युनिस्टों के मंच का इस्तेमाल अपना एजंडा आगे बढ़ाने के लिए करती है.

    उसका एजंडा क्या है? वही जो जिन्ना का था. वही जो हामिद अंसारी का है. उस वक्त भी कम्युनिस्ट इस्लामिक एजंडे को ही पूरा करने के लिए जिन्ना के पीछे खड़े हो गये थे. इस वक्त भी शेहला राशिद के पीछे खड़े हैं. उसे सेकुलर, लिबरल लीडर बना रहे हैं.

    आप देश को तोड़ने की बात शुरु करिए कम्युनिस्ट पत्रकार और बुद्धिजीवी आपके पीछे खड़े हो जाएंगे. शेहला राशिद की जात में नहीं, कम्युनिस्टों की जात में खोट है. ये वो लोग है जो हर तरह के अलगाववाद को हवा देते हैं. देश समाज को तोड़ने का कोई मौका छोड़ते नहीं हैं.

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