उठाईगीर पुस्तक अंश -2 !

uthaigiri
प्रस्तुति सिकन्दर हयात

(साहित्य अकादमी दुवारा पुरुस्कृत मराठी आत्मकथा लेखक लक्ष्मण गायकवाड़ अनुवादक सूर्यनारायण रणसुभे ) एक बार हम लोग करीब नो दिनों से भूखे थे केवल पानी पीकर जी रहे थे तब बाबा एक आना कही से उधर ले आया एक छटांक गुड वह ले आया और एक बर्तन में काफी पानी डालकर उसमे गुड उबाला गया बाद में इस गुड के पानी को हम सबने पी लिया उस दिन बाबा हम सबको बाँहो में लिए रोने लगा उन दिनों में दिन भर गहरे पर भटकता इमली के बीज या आम की गुठलियों को इकट्ठी करता उन्हें भून कर खाता कभी कभार बाबा या दादा किसी दूसरे गांव में जाकर सूअर के किसी पिल्लै को पकड़ कर ले आते उसे भून कर हम सब लोग खा लेते पेट की आग से परेशान होकर में कई बार बार चक्की के दो पाटो पर नमक छिड़क कर उन्हें चाटता .

कई बार तो इस्थिति इससे भी बदतर हो जाती तब बाबा दादा भाऊ अन्ना नयाँ तुलसीराम और भीमा सब इक्कठे होकर दूर किसी खेत में जाते जहां अच्छी फसल खड़ी हो उसे पहले ही देख आते रात में वहां चोरी छिपे घुसकर भुट्टे हरी मिर्च फलिया तोड़ कर लाते रात में ही चोरी का बटवारा होता इस चोरी का पता सवेरे किसी को न हो इसलिए रात में ही भुट्टो को तोड़ कर दाने निकाले जाते चूल्हा सुलगा कर वे कच्चे दाने भुने जाते चोरी का कोई संकेत न मिले इसलिए भुट्टो के अवशेष जलाय जाते उतनी रात औरते उन दनो को कूटती तबतक में चूल्हे पर बड़े बर्तन में पानी रखता कुत्ते हुए दाने पकाय जाते और तीन चार दिन की भूख इस तरह बुझाई जाती परन्तु पेट की आग इससे पूरी बुझती नहीं . सवेरे उठने पर में चूल्हे के आस पास बिखरे दाने के कणो को चुन चुन कर खाता . उन दिनों दो दो महीने मुझे रोटी नहीं मिलती थी हमारे घर के लोग जब चोरी करने जाते और अगर किसी कारण अथवा संदेह से किसान जाग जाते ———— एक बार शिवनी नमक गाँव के खेतों में चोरी हेतु जब हमारे लोग गए तब एक किसान ने भुट्टे तोड़ते हुए इन्हे देख लिया वह जोर जोर से चिल्लाने लगा और पथर बरसाने लगा तब हमारा गिरोह भाग खड़ा हुआ चुराए हुए भुट्टे उन्होंने फेंक दिए परन्तु दादा को इसका अहसास था की घर के सभी लोग दो दिन से भूखे हे , इस कारण उसने भुट्टे फेंके नहीं . भुट्टो को लेकर तेजी से दौड़ने सम्भव नहीं था इस आपाधापी में एक पथर उसे लग गया सर फट गया बववजूद इसके दादा भुट्टे फेंक ही नहीं रहा था काफी दूर आने के बाद गिरोह के साथियो ने उसकी सहायता की .उसके जख्म को जंगली पत्तो से भरा गया . देर रात घर आने के बाद खून से लथ पथ धोती को भाभी ने धो दिया दादा सुरक्षित आया इसकी हमें ख़ुशी ख़ुशी थी अगर उस दिन दादा पकड़ा जाता तो उसकी खेर न थी वे उसे जान से मार देते

हमारी बिरादरी के सम्भा भीमा और तुलसीराम हमे पड़ोस में रहते थे कभी कभार हमारे बीच झगडे होते थे और ये झगडे किसी एक का सर फूटने पर ही रुकते ——- कारण सूअर के पिल्ले तूक्या शशि नया हमारे सूअर के पिल्लो को चुरा कर ले जाते और भूनकर खाते ——– तुलसीराम पांडुरंग माणिक दादा भगवान अन्ना किसी बड़े त्यौहार के दूसरे दिन जवान सूअर या मादा सूअर को काटते इस समय हम छोटे बच्चे सूअर को पकड़ने में मदद करते तुलसीराम सूअर पकड़ने हेतु उनके पीछे जाल लेकर गलियों में दौड़ता जाल में फंसने के बाद सूअर के चार पैरो को वह रस्सी से बांधता और माणिक दादा के कंधो पर रखता झोपडी के पास ही सूअर को काटने की जगह बनाई गयी थी हमारी छोटी फौज पुरे गाँव में घूम घाम कर घास फुस लकड़ियाँ उपले आदि इकट्ठी करती सूअर भूनने की जगह पर हम इस जलावन को लेकर रख देते गाँव की सवर्ण औरते इसी स्थान पर शौच के लिए आती दादा अन्ना हम बच्चों को कहते देखो बच्चों हम तुम्हे सुर का सबसे बढ़िया मांस ( सूअर की पीठ के नीचे का मांस ) देंगे पहले किसी झाड़ू से पुरे मेले को हटाकर जमीं साफ करो हमारी फौज झाड़ू बनती और पुरे मैदान को साफ़ करती . फिर तुलसीराम लोहे की सब्ब्ल से उस सूअर को मारता धीरे धीरे सूअर निष्प्राण हो जाता उसके बाद उस सूअर के आस पास आग लगाकर उसे भून लिया जाता . उस समय गांव की सवर्ण औरते थोड़ी दूर शौच के लिए आती गाँव की सभी औरते दिशा मैदान के लिए हमारी झोपडी के पास आती . सवेरे सवेरे दर्जन औरते वहां आती सभी और मैल ही मैल हमें वहां से चलना भी मुश्किल हो जाता ऐसे में हम इस हगनहट को हम साफ़ करते यही सूअर भुनते और खाते सूअर को ठीक से भूनने के बाद तुलसीराम उसे काटता पहले पेट फाड़ उसकी अंतड़िया बाहर निकाल देता . माणिक दादा कलेजी निकाल कर उसके छोटे छोटे टुकड़े हम में बाँट देता हम बच्चे उस गरम कलेजी के टुकड़े को बगैर चबाय निगल लेते हाथ और मुंह खून से लाल हो जाता . बार बार हम हाथ फैलाते और कलेजा मांगते बस्ती के कुत्ते वहां इकट्टे हो जाते . वे अंतड़िया उठाने के लिए झगडते . तुलसी राम अंतड़िया दूर लेकर फेंकता . सभी कुत्ते इकठ्ठा होकर वह झपटते भोकते . तुलसीराम धीरे धीरे मांस के टुकड़े काटने लगता चर्बीदार मांस हम सीधे वाही कहना शुरू कर देते . कलेजा और चर्बी खाते समय मैदान में सवर्ण हगते हुए दिखती हमें यह सब खता देख वे नाक पर साडी औढ लेती . में सकता चर्बी और भी मिलती रही और में खाता रहू नारियल की तरह यह चर्बी जायकेदार लगती . सवर्ण औरतो को नाक पकड़ कर बैठना हमें कुछ न लगता अगर हमारे खाने से इतनी ही नफरत तो ये यहाँ हगने ही क्यों आती हे ऐसा में सोचता वैसे उनके हगने से हमारा फायदा ही होता था हमारे सूअर उनका गु खाकर ही तैयार होते थे इस कारण औरते यहाँ हमारे घर के आस पास हगती रहे ऐसा मुझे लगता

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5 thoughts on “उठाईगीर पुस्तक अंश -2 !

  • July 16, 2016 at 9:07 pm
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    माफ़ी कई जगह टाइपिंग मिस्टेक हुई हे हे ” चर्बीदार मांस हम सीधे वाही कहना शुरू कर देते ” कहना नहीं खाना , ”में सकता चर्बी और भी ” सकता नहीं सोचता . ” खाते समय मैदान में सवर्ण हगते हुए दिखती ” स्वर्ण औरते ”बच्चों हम तुम्हे सुर का सबसे बढ़िया मांस ” सुर नहीं सूअर आदि टाइपिंग मिस्टेक के लिए माफ़ी चाहूंगा दलित शोषित लेखकों की आत्मकथाय हमें जरूर ही पढ़नी चाहिए एक अलग ही अनुभव होता हे खेर पिछली बार मेने लिखा था सिकंदर हयातJune 15, 2016”चूहे खरगोश मछली नेवला हिरन गोह लखापक्षी बदक बगुला कछुआ पांगली बिल्ली सूअर गीदड़ कबूतर केंकड़ा भेद बकरी मेना सरस मोर किते नाम गिनाऊ इन सबके मांस मेने खाये हे ” और आगे अफ़ज़ल भाई की इज़ाज़त रही तो पुस्तक के वो अंश पेश करने की कोशिश करूँगा जिसमे लेखक बताते हे की किस तरह से वो और उनकी जाती के लोग सूअर कैसे और किस जगह पर खाया करते थे ? पढ़ कर दिल दहल जाता हे तो ये हे उधर इन सोशल मिडिया के संघी बुडबकियो को देखिये जो रात दिन मांसाहार को राक्षसी मानसिकता बतलाते रहते हे ( निशाना मुस्लिम विरोध और कम्युनलिस्म की फसल काटने पर ) और शाकाहार का गुणगान करते हे शाकाहार के गुणगान से मुझे कोई एतराज़ नहीं हे बहुत अच्छी बात हे मगर ये भी सच हे की देश में सबसे अधिक संसधान इन्ही शुद्ध शाकाहारियों की जेब में हे और रहे हे और इन्ही के कारण भी लेखक को ये सब खाना पड़ा ( ”चूहे खरगोश मछली नेवला हिरन गोह लखापक्षी बदक बगुला कछुआ पांगली बिल्ली सूअर गीदड़ कबूतर केंकड़ा भेद बकरी मेना सरस मोर ) असली राक्षस कौन हुआ —– ? ” अब भी इन्ही कुछ राक्षस लोगो ने गुजरात में अपनी रोजी कमा रहे कुछ दलितों की चमड़ी उधेड़ डाली

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  • July 17, 2016 at 11:55 am
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    ”Urmilesh Urmil
    14 July at 10:13 ·
    गुजरात के ऊना में गो-रक्षा के नामं पर आतंक मचाने वाले उग्रवादियों में कुछेक की अंततः गिरफ्तारी हुई है। दलित-पिछड़ों की एकजुटता के चलते ऐसा हो सका। जनता ने बड़ा प्रदर्शन करके गुंडों का जवाब दिया। सरकार को मजबूर होकर इन असामाजिक तत्वों को हिरासत में लेना पड़ा। दलित-पिछड़ों-अल्पसंख्यकों की फौलादी एकता नहीं हुई तो यह देश बचेगा नहीं। सांप्रदायिक फासीवादी ताकतें इसे खत्म कर डालेंगी। देश बचाने के लिये अवाम को एकजुट होना होगा। ऊना सहित देश के अनेक हिस्सों में ऐसी एकता उभर रही है। ऐसी एकता चुनावबाज नेताओं से नहीं बनेगी, इसी तरह जनता की पहल पर उभरेगी। ” बहुत से मुस्लिम भी इस एकता के लिए बहुत उत्सुक हे मगर वो इसका बेसिक नहीं समझते हे बेसिक है मुसलिम कटरपंथ का विरोध और खात्मा जब तक कटटरपंथ और कठमुल्लाशहि ख़त्म या कमजोर नहीं होगी मुसलमानो की किसी से भी नहीं जम सकती है आपस में भी नहीं कोई सवाल हीनहीं उठता

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  • July 17, 2016 at 2:14 pm
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    Shamshad Elahee Shams
    14 July at 23:38 ·
    गौपुत्रो- पशुपुत्रों का यह रहम; पृथ्वी पर विकास के चरम बिंदु से पलट आए स्थान, (ऊना) गुजरात का है. चार आदिवासियों की खाल उधेड़ कर जिन्दगी बख्श दी गयी क्योकि ये उनकी मृत ‘माता’ की खाल उतार रहे थे. काश इनका नाम अब्दुल, मुन्ना, करीम या हामिद होता तो ये वही होते जहाँ ‘विकास’ के बाप ने हजारो को २००२ में पहुंचाया था.
    खैर…. नरभक्षी जब हाकिम हुआ तब उसने कुछ रोटियां उछाली, उसके आँगन में सबसे पहले हड्डियाँ झपटने में इसी समाज की हिफाज़त के नाम पर धंधा करने करने कुछ खास रजिस्टर्ड ‘हम्बेडकरवादी’ थे, उनकी पथराई आँखों को ये तस्वीरे जरुर कोई भिजवा दे तो भला होगा. हठावले, पासवान, हुदितराज जैसे कई है ..
    बारहाल, पी साईनाथ ने गौरक्षा पर बहुत स्पष्ट कहा था कि यह काम दलित, आदिवासी और मुसलमानों को आर्थिक रूप से कंगाल करने के लिए सोच समझ कर चलाया जा रहा संघी कार्यक्रम है.

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  • July 22, 2016 at 7:28 pm
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    Shamshad Elahee Shams
    19 July at 11:29 ·
    आरक्षण की सुनहरी पिन्नी में लिपटी टाफी से बाहर, सड़क पर उतरे बिना कुछ भी न बदलेगा. गुजरात में दलितों का झुझारू तेवर पूरे देश के दलित समाज को एक दिशा दे सकता है. ये शुरुआत अच्छी है इसका तहेदिल से स्वागत किया जाना चाहिए. संघ ने इसी समाज के बिकाऊ तबके को इस्तेमाल करके ‘दंगामशीन’ का कामयाब पुर्जा बनाया था, इसी समाज में यह क्षमता भी है कि संघ को धूलधूसरित कर दे. गलत हाथो में हथियार अक्सर डकैती करते है, सही हाथो में हो तो इन्कलाब भी कर सकते हैं.

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  • November 22, 2019 at 6:07 pm
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    दलितों आदिवासियों की आत्मकथाएं हम सभी को पढ़नी चाहिए एक अलग ही अनुभव होता हे

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