इस “युद्ध” में कहीं आतंक जीत न जाए!

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आतंकवाद और पाकिस्तान को लेकर संयुक्त राष्ट्र में सुषमा स्वराज ने कुछ झूठ नही कहा और इसे दुनिया भी मानती है कि हर आतंक का कोई ना कोई सिरा पाकिस्तान तक पहुंच ही जाता है। लेकिन जो खतरा पाकिस्तान को लेकर है, वह आतंक से कही आगे आंतक के रास्ते एशिया को युद्द में झोंकने वाला भी है। क्योंकि पाकिस्तान के दो सवाल दुनिया को हमेशा डराते हैं। पहला पाकिस्तान के परमाणु हथियार कहीं कट्टरपंथियों-आतंकवादियों के हाथ ना पहुंच जाए। दूसरा पाकिस्तान का पॉवर बैलेंस जरा भी डगमगाया तो दुनिया का कोई दबाब युद्द को रोक नहीं पायेगा। क्योंकि पाकिस्तान के भीतर के हालातो को समझे तो संयुक्त राष्ट्र का डिसआर्मामेंट अफेयर के सामने भी पाकिस्तान का चैक बैलेंस उसके कहे अनुसार नहीं चलता। पाकिस्तान में चुनी हुई सत्ता पर सेना भारी पड़ती है। और आईएसआई का झुकाव जिस दिशा में होता है वह उस दौर में ताकतवर हो जाता है। यानी सत्ता पलट तभी हुआ जब सेना के साथ आईएसआई खडी हो गई ।

और फिलहाल कश्मीर के मुद्दे ने पाकिस्तान की सत्ता के हर ध्रुव को एक साथ ला खड़ा किया है। ऐसे में हर की भूमिका एक सरीखी है । और आईएसआई जिस जेहादी काउंसिल के जरीये कश्मीर मुद्दे पर अपनी ताकत हमेशा बढ़ाकर रखती है । उस जेहाद काउंसिल के 13 आतंकी संगठनों में तीन प्रमुख प्लेयर लश्कर, जैश और हिजबुल का कद भी इस दौर में बढ़ा है क्योंकि एक तरफ तीनों का दखल कश्मीर में बढा है तो दूसरी तरफ लश्कर के संबंध अलकायदा से तो जैश के संबंध तालिबान से और हिजबुल के संबंध आईएस के साथ है। यानी अंतराष्ट्रीय आतंकवाद का जो चेहरा अफगानिस्तान, सीरिया, इराक से होते हुये दुनिया को डरा रहा है, उसका सिरा भी कही ना कही पाकिस्तान की जमीन से जुडा है । और असल सवाल यही हैकि अगर पाकिस्तान की दिखायी देने वाली सत्ता जो फिलहाल राहिल शरीफ और नवाज शरीफ में सिमटी है अगर वह संयम बरत भी लें और हालात सुधारने की दिशा में कदम बढा भी लें तो क्या कश्मीर कौ लेकर मौजूदा वक्त में तमाम आतंकवादी संगठन क्या करेंगे। क्योंकि भारत पाकिस्तान के संबंध जिस उबाल पर है । उसमें पहली बार आंतकवादी संगठन कानूनी सत्ता के विशेषाधिकार को पाकिस्तान में भोग रहे है । क्योकि पाकिस्तान की चुनी हुई सत्ता हो या सेना दोनो के लिये आतंकी संगठन फिलहाल हथियार भी है और ढाल भी । और संयुक्त राष्ट्र में उठे सवालों ने आतंक और पाकिस्तान के बीच की लकीर भी मिटा दी है ।

तो सबसे बड़ा खतरा यही है कि एक वक्त के बाद अगर युद्द आंतकवाद के लिये जरुरी हथियार बन जाये तो पाकिस्तान में परमाणु हथियारो को कौन कैसे संभालेगा । क्योकि पाकिस्तान के परमाणु हथियार कराची के पैराडाइड पाउंट और पंजाब प्रौविंस के चश्मा में है। जहा पाकिस्तान के जेहादी और आंतकी संगठनों के हेडक्वाटर भी है । तो नया सवाल ये भी है कि एशिया में सार्क की भूमिका भी अगर खत्म हो गई तो सबसे ज्यादा लाभ आंतकवाद को ही होगा । क्योकि सार्क देसो की पहली बैठक 1985 में जब ढाका में 7-8 दिसबंर को हुई तो सार्क के एजेंडे में आतंकवाद और ड्रग ट्रैफिकिंग ही थी । और करगिल के वक्त जब सार्क पर पहला बडा ब्रेक लगा था तो यही सवाल उठा था कि पाकिस्तान आतंकवाद को प्रश्रय क्यों दे रहा है। तो याद कीजिये 1999 में पाकिस्तान में सत्ता पलट और फिर करगिल से डिरेल सार्क सम्मेलन की बैठक जब 2002 में काठमांडू में शुरु हुई तो जनरल मुर्शरफ अपने भाषण के बाद नियम कायदों को छोडकर सीधे वाजपेयी जी के पास पहुंचे और हाथ मिलाकर गिले शिकवे मिटाने का मूक आग्रह कर दिया। और तब वाजपेयी ने भी कहा अब पडोसी तो बदल नहीं सकते। लेकिन इसके बाद की बैठक में वाजपेयी ने मुशर्ऱफ ही नहीं सार्क देशों को भी यही समझाया कि सार्क अगर अपनी उपयोगिता खो देगा या खत्म हो जायेगा तो उसी आंतकवाद को इसका लाभ होगा जिस आंतकवाद को खत्म करने के लिये सार्क देश जुटे है । लेकिन सार्क के 36 बरस के इतिहास में पहली बार सार्क देसो के सामने जब ये सवाल बड़ा हो रहा है कि वह आतंकवाद और पाकिस्तान के बीच लकीर कैसे खींचे। तो नया सवाल ये भी खड़ा होने लगा है कि क्या पाकिस्तान को पटरी पर लाने के सारे रास्ते बंद हो चुके है। य़ा फिर अलग थलग पड़ने के बाद ही पाकिस्तान पटरी पर आयेगा। जाहिर है दोनो हालात में मैसेज यही जाता है कि पाकिस्तान या तो आतंकी राज्य है या फिर आतंकवाद का दायरा पाकिस्तान से बड़ा हो चला है। तो आगे का रास्ता सार्क देशों को पाकिस्तान से अलग थलग कर आंतकवाद के खिलाफ एकजुट करने का है। या फिर आगे का रास्ता आतंकवाद के खिलाफ युद्द की मुनादी होगी। और ये दोनों हालात, क्षेत्रीय संबंधों में सुधार और व्यापार जैसे मुद्दों के लिए बनते माहौल को बिगाड देगा। और सार्क की 150 करोड की आबादी हमेशा आतंक के मुहाने पर बैठी दिखायी देगी।लेकिन सार्क के फेल होने से नया खतरा एशिया में ताकत संघर्ष की शुरुआत और नये गुटो के बनने का भी है। क्योंकि पाकिस्तान काफी पहेल से सार्क में चीन को शामिल करने की बात कहता रहा है। और सार्क के तमाम देश सार्क को भारत पाकिस्तान के बीच झगडे के मंच के तौर पर मानते रहे है। यानी नये हालात आतंक के सवाल पर सार्क की उपयोगिता पर ही सवालिया निशान तो लगा रहे है लेकिन ये हालात आंतक को मान्यता देते हुये एक ऐसे युद्द की मुनादी भी कर रहे है जिसमें विकास और गरीबी से लड़ने के सवाल बारुद की गंध और परमाणु युद्द की आंशाका तले दफ्न हो जायेंगे।

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3 thoughts on “इस “युद्ध” में कहीं आतंक जीत न जाए!

  • September 29, 2016 at 7:12 pm
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    Sheetal P Singhदिल्ली में एक लड़की ने कुछ दिन पहले आत्महत्या कर ली थी । उसके सुसाइड नोट में एक विधायक के चपरासी का नाम था । दिल्ली पुलिस ने विधायक जी को टाँग दिया । सप्ताह जेल में बीता , वो तो भला हो मजिस्ट्रेट का कि उसने पूछा भई विधायक पर आरोप क्या है ? पुलिस दांये बांये और विधायक को जमानत मिल गई !अब उसी पुलिस के पास चार लाशें हैं ! प्रथम श्रेणी का अफ़सर उसकी बीबी बेटी बेटा और सुसाइड नोट भी है जिसमें सीबीआई के चार अफ़सरों के नाम हैं और दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जी का नाम भी है ।
    यह सुसाइड नोट पुलिस गायब कर देती पर आत्महत्या से पहले इस अफ़सर ने तमाम मीडिया वालों को सुसाइड नोट पोस्ट कर दिया था सो बात खुल गई !
    अब पुलिस खुद फ़रार चल रही है और मीडिया कैमरा भूल गया है !Sheetal P Singh
    · Himanshu Kumar4 hrs · आमित शाह का नाम चार लोगों को आत्महत्या के लिये मजबूर करने के मामले में फंसते ही ,सर्जिकल स्ट्राइक का शगूफा छेड़ दिया गया,पब्लिक भी खुश ,आमित शाह भी बच गयाएलओसी पार कर सर्जिकल स्ट्राइक करने का दावा इस बार सेना का है-Samar हांकांगवी पिछली बार की तरह मोदी सरकार के मंत्री राज्यवर्धन राठौर का नहीं सो क़ायदे से विश्वास करना बनता है। बावजूद इसके कि पाकिस्तान ने यह दावा ठुकराते हुए इसे ‘बिना किसी उकसावे के भारी गोलीबारी कहते हुए अपने दो सैनिकों के मारे जाने का दावा किया है’। ध्यान दें कि भारतीय सेना ने सिर्फ़ आतंकवादियों के मारे जाने का ज़िक्र किया है।
    बाक़ी उम्मीद इतनी ही कि यह दावा भी पिछली बार म्यांमार में सर्जिकल स्ट्राइक वाला जैसा न निकले, यह भी कि सेना सतर्क रहे और सर्जिकल स्ट्राइक (या दावे) से खिसियाए आतंकियों को कहीं हमला करने का मौक़ा न दे।
    Samar हांकांगवी

    Reply
  • September 29, 2016 at 7:12 pm
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    Sheetal P Singhदिल्ली में एक लड़की ने कुछ दिन पहले आत्महत्या कर ली थी । उसके सुसाइड नोट में एक विधायक के चपरासी का नाम था । दिल्ली पुलिस ने विधायक जी को टाँग दिया । सप्ताह जेल में बीता , वो तो भला हो मजिस्ट्रेट का कि उसने पूछा भई विधायक पर आरोप क्या है ? पुलिस दांये बांये और विधायक को जमानत मिल गई !अब उसी पुलिस के पास चार लाशें हैं ! प्रथम श्रेणी का अफ़सर उसकी बीबी बेटी बेटा और सुसाइड नोट भी है जिसमें सीबीआई के चार अफ़सरों के नाम हैं और दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जी का नाम भी है ।
    यह सुसाइड नोट पुलिस गायब कर देती पर आत्महत्या से पहले इस अफ़सर ने तमाम मीडिया वालों को सुसाइड नोट पोस्ट कर दिया था सो बात खुल गई !
    अब पुलिस खुद फ़रार चल रही है और मीडिया कैमरा भूल गया है !Sheetal P Singh
    · Himanshu Kumar4 hrs · आमित शाह का नाम चार लोगों को आत्महत्या के लिये मजबूर करने के मामले में फंसते ही ,सर्जिकल स्ट्राइक का शगूफा छेड़ दिया गया,पब्लिक भी खुश ,आमित शाह भी बच गयाएलओसी पार कर सर्जिकल स्ट्राइक करने का दावा इस बार सेना का है-Samar हांकांगवी पिछली बार की तरह मोदी सरकार के मंत्री राज्यवर्धन राठौर का नहीं सो क़ायदे से विश्वास करना बनता है। बावजूद इसके कि पाकिस्तान ने यह दावा ठुकराते हुए इसे ‘बिना किसी उकसावे के भारी गोलीबारी कहते हुए अपने दो सैनिकों के मारे जाने का दावा किया है’। ध्यान दें कि भारतीय सेना ने सिर्फ़ आतंकवादियों के मारे जाने का ज़िक्र किया है।
    बाक़ी उम्मीद इतनी ही कि यह दावा भी पिछली बार म्यांमार में सर्जिकल स्ट्राइक वाला जैसा न निकले, यह भी कि सेना सतर्क रहे और सर्जिकल स्ट्राइक (या दावे) से खिसियाए आतंकियों को कहीं हमला करने का मौक़ा न दे।
    Samar हांकांगवी

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  • September 30, 2016 at 2:01 pm
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    Shamshad Elahee Shams
    14 hrs ·
    जुमलेबाजों के गिरोह ने भारतीय फ़ौज को भी जुमलेबाजी के वायरस से अब पूरी तरह संक्रमित कर उसकी रही सही क्रेडिबिलिटी को आखिर ध्वस्त कर ही दिया. खैर जब अँधेरा होता है तो कोई इदारा आखिर बच कैसे सकता है?
    पाकिस्तानी चैंनेल देखा, काजोल-अजय वहां लाइफबाय बेच रहे थे और एंकर ‘बूचर ऑफ गुजरात’ की हंसी उडा रहे थे, मांग कर रहे थे कि इस पर इंटरनेशनल कोर्ट में मुक़दमा चलाया जाना चाहिए.
    १२५ करोड़ की जनता को लाइन आफ कंट्रोल पर गोली चलाकर, हल्ला गुल्ला कर उन दडसाधे भक्तों को सर्जिकल अटैक की हड्डी डाल परोस दी गयी है, ताकि वे देशभर में युद्ध उन्माद बनाये रखने के लिए उसे चबाते फिरे. इस धूलगुसार में एक भारतीय फ़ौजी चंदूबाबूलाल चौहान जिसे पाकिस्तानी फ़ौज ने पकड़ लिया उसका कोई जिक्र नहीं होगा. इन्होने कथित रूप से ३८ आतंकियों को पाकिस्तान के भीतर जो मार गिराया है.
    इस झंडूखाने की खबर को उसके नियोक्ता के साथ मैं पूरी तरह ख़ारिज करता हूँ, कुशल राजनीतिज्ञ, राजनीति -कूटनीति से मसले हल करता है युद्ध से नहीं.Shamshad Elahee Shams

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