इस्लाम फोबिया !

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अनुवाद – अफज़ल खान

सऊदी अरब से प्रकाशित अखबार वतन में इस्लामी सहयोग संगठन के सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों ने इस्लाम फ़ोबिया से की आवश्यकता पर बल देते हुए विश्व समुदाय से मांग की है कि मुसलमानों के ख़िलाफ़ कथित अपमानजनक कदम को रोकने विभिन्न सभ्यताओ में आपसी टकराव को रोकने के लिए क़दम उठाये जाए .

आतंकवाद एक जटिल समस्या है उसका किसी देश, धर्म और नागरिकता से कोई संबंध नहीं है और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस्लामी देशों और मुस्लिम आतंकवाद का सबसे निशाना बने हीं.इस्लाम फ़ोबिया के शिकार पश्चिमी देशों का यह रवैया घटना सितंबर के बाद तीव्रता अधिकार कर गया, खासकर अमेरिकी समाज में असहिष्णुता और धार्मिक सहिष्णुता तेजी से समाप्त होना शुरू हुई नाइन इलेवन की घटना के बाद मुसलमानो के खिलाफ एक दुष्प्रचार शुरू कर दिया गया और एक रणनीति के तहत इस्लाम को बदनाम करना शुरू कर दिया गया .

पूरी दुनिया जिस तरह इस्लाम मुखालिफ हो गयी है खास तौर से अमरीका , उरोप, इंग्लॅण्ड आदि मुल्के ऐसा लग रहा है जैसे साड़ी दुनिया इस्लाम फोबिया का शिकार हो गयी है उन्हें सोते जागते इस्लाम से चीड़ होने लगा है . पूरी दुनिया देख रही है के जिस तरह से दूसरे मुल्क इस्लाम को बदनाम कर रहे है इस्लाम धर्म उतनी ही तेजी से फैलता जा रहा है और उन की संख्या में विर्धि हो रही है . हम ये कह सकते है के आज सिर्फ इस्लाम ही एक ऐसा मजहब है जो सब से तेजी से फ़ैल रहा है.

इस्लाम फ़ोबिया मुख्य कारणों में सबसे बड़ा कारण गैर मुसलमानों का इस्लाम में दाख़िल होना और मुसलमानों की तेजी से बढ़ती संख्या है। इंगलिस्तान और ोलीज़ में ताजा जनगणना के विश्लेषण के अनुसार पांच साल तक की उम्र के हर दस बच्चों में से एक मुसलमान है, राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के अनुसार साढ़े चार साल तक की उम्र के कुल साढ़े तीन लाख बच्चों में से लगभग तीन लाख बीस हजार बच्चे मुसलमान हैं, मुसलमान बच्चों की दर 9 फीसदी है, ाोकसतुरड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डेविड को लीमन ने कहा कि उक्त आंकड़े आश्चर्यजनक है, समय दराज से इंगलिस्तान मुसलमानों को शरण दे रहा है, पहले यहां पाकिस्तान बांग्लादेश और भारत मुसलमान आया करते थे लेकिन अब अफ्रीकी देशों और मध्य पूर्व से भी मुसलमान इंगलिस्तान का रुख कर रहे हैं।

अमरीका में मुसलमानों की आबादी 30 लाख बताई गई जो 2030 ई। तक बढ़कर 60 लाख 20 हजार तक पहुंच जाए गी.श्माली अमेरिका में 1990 से 2010 तक मुसलमानों की आबादी में 91 प्रतिशत की गति से वृद्धि हुई और मुस्लिम लोगों की संख्या 10 लाख 80 हजार से बढ़कर 30 लाख 50 हजार तक पहुंच गई जबकि आने वाले बीस वर्षों में उत्तरी अमेरिका में मुस्लिम लोगों की संख्या 80 लाख 90 हजार होने की संभावना हे.बर्तानिया में मुसलमानों की आबादी 20 लाख 30 हजार से बढ़कर 50 लाख 60 हजार और फ्रांस में 40 लाख 70 हजार से बढ़कर 60 लाख 90 हजार के करीब पहुंच जाएगी जबकि फ्रांस में उस समय भी मस्जिदों की संख्या खतोलक चर्च से अधिक है .2010 ई तक यूरोप में मुसलमानों की आबादी 5 करोड़ के करीब थी जो 2030 तक बढ़कर 6 करोड़ के करीब पहुंच जाए गी.तुरम ऑन रिलजन एंड पब्लिक लाइफ नामक एक अमेरिकी संस्था की ओर से बेन ालमज़ाहब दर जनसंख्या का एक सर्वेक्षण किया गया जिसमें के अनुसार 2030 में जब दुनिया की आबादी लगभग 8 अरब 3 करोड़ से अधिक जायेगी तो उस समय दुनिया में मुसलमानों की आबादी 2 अरब 20 करोड़ होगी।

मीडिया और सामाजिक मीडिया के कारण दुनिया सिमट गई है और मनुष्य का आपस में संपर्क और हाल बहुत आसान हो गया है इसलिए दुनिया जहां एक जेब में जगह पा लेती है तब किसी के लिए तथ्यों को जानना मुश्किल नहीं रहा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मुसलमानों के खिलाफ पश्चिमी मीडिया का प्रचार सारी संसाधनों के बावजूद बेअसर हो रहा है, जो ताजा उदाहरण गाजा में पश्चिमी मीडिया का पक्षपातपूर्ण रवैया था जिसमें दुनिया एकतरफ़ा खबर दी जा रही थी, लेकिन जब सामाजिक मीडिया के माध्यम से वास्तविक तथ्यों और तस्वीरें सामने आईं तो वास्तव लाख छिपाने के बावजूद असफलता का सामना करना पड़ा और पश्चिम को शर्मिंदगी मिली।

इस्लाम फ़ोबिया के शिकार, चरमपंथ तत्वों से मस्जिदों पर हमले, गस्ताखाना रसूल और कुरान का अपमान जैसी घटनाओं को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम देकर मुस्लिम उम्मा के खिलाफ घृणा परवान चढ़ाने का मौका पश्चिम देशो ने खुद प्रदान किया है. जिसके बाद इन देशों ने पढ़ी लिखी जनता ने अपने आप इस्लाम का अध्ययन शुरू किया और प्रकाश प्राप्त करने वालों को अल्लाह तआला ने रास्ता दिखाया कि अब यह कहा जा रहा है, अगले कुछ वर्षों में यूरोप मुसलमानों द्वारा नगें इसलिए हो क्योंकि इस्लाम तलवार से नहीं बल्कि विचारों से तेजी के साथ फैल रहा है। मुसलमानों के खिलाफ एकतरफा प्रचार करके उन्हें चरमपंथी, उग्रवादी और आतंकवादी सिद्ध करने के लिए बार बार मुस्लिम देशों में रोमांच की जाती है लेकिन जितनी शक्ति से पश्चिम इस्तेमारी कूतें आक्रामकता करती हैं उन्हें उसी शिद्दत के साथ हार का सामना करना पड़ता है ।

Sources—- http://www.express.pk/story/303019/#.VGg6-l9ECq4.facebook

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14 thoughts on “इस्लाम फोबिया !

  • November 20, 2014 at 11:10 am
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    हरियाणा सरकार ने अपना फर्ज निभाया ।
    कई दिन की मेहनत के बाद #रामपाल को गिरफ्तार कर लिया गया ।।
    अब मिडिया और सभी फेसबुकिया मित्रों से अनुरोध है #इमाम_बुखारी की गिरफ्तारी के लिये भी केंद्र सरकार पर दबाव बनाये जिसपर बहुत से केस चल रहे है और वो आज तक कानून से खिलवाड़ करता आ रहा है ।

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  • November 20, 2014 at 11:35 am
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    अफ़ज़ल साहब अपने बहुत बढिया तरीके से विषय को कवर किया है जिसके लिये हार्दिक बधाई !!

    आज अगर उच्च शिक्षित मुस्लिम परीवारो के बच्चे अच्छे स्कूलो मे पढने के बाद भी आतंकवाद को अपना रहे है और बिना वजह बेगुनाह लोगो के गले काटने तक से भी उनको परहेज नही है तो गुस्ताखी माफ पर इसके लिये किसी हद तक पारिवारिक स्तर पर धर्म के बारे मे उन्मादी स्तर के बीज डालना भी जिम्मेदार है !! ….जब बच्चे को बचपन से ही इंसानियत की बजाय धर्म को उपर रखने की शिक्षा उठते बैठते दी जायेगी तो आगे चल कर आतंकवाद की मार्केटिंग करने वाला कोई भी ….<>……. की बात कह कर उन बच्चो को गलत रास्ते पर ले जेया सकता है !!……

    हालांकि विषय से अलग है पर ताजा उदाहरण खुद को संत कहने वाले रामपाल का है जिसके हरयाणा आश्रम मे गलत कामो की जानकारी मिलते ही उस खबर पर रामपाल के खिलाफ लिखने वाले हिन्दुओ की बाढ़ सी आ गयी थी जबकि रामपाल गिरफ्तार भी नही हुआ था !!…..दूसरी तरफ ओसामा बिन लादेन और दाउद इब्राहीम की खबरो पर पूरा मुस्लिम समाज मौन रहता है ??….दरअसल ये सामाजिक माहौल की देन है….बौध और हिन्दू भी विश्व मे अच्छी खासी सांख्या रखते है मगर वहा बच्चो को पारिवारिक स्तर पर धर्म की शिक्षा उन्मादी स्तर पर नही दी जाती और नतीजा आप देख सकते है कि धर्म के नाम पर संगठन बना कर आतंकवाद फैलाने मे ना बोध मिलेंगे और ना ही चीनी…… मुस्लिम परिवारो को गंभीरता से इस पर विचार करने की जरूरत है !!

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    • November 20, 2014 at 11:53 am
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      शरद जी

      आप के विचार का स्वागत है , मेरा मन्ना है के धर्म के नाम पे सब से ज्यादा अधर्म होता है वह चाहे किसी भी धर्म को उठा ले . धर्म के ठेकेदारो ने धर्म की ऐसी की तैसी कर दी यही कारन है के नवयुवक धर्म से लगभग दूर होता जा रहा है . में एक लेख पद रहा था और कुछ मेरे दोस्त इंग्लैंड और अमरीका में है उन्हों ने बताया के पश्चिम देशो के लोगो इस्लाम की तरफ ज्यादा जा रहे है और वह के लोग इस्लाम क़बूल कर रहे है .सवाल यहाँ मजहब का नहीं है के मजहब अच्छा है के नहीं असल में सभी धर्मो में इंसानियत की बात कही जाती है मगर उसे धार्मिक गुरु ने अपने लाभ के लिए मजहब को बदनाम करते है . जैसा के आप रामपाल या आशा राम आदि. जिस तरह बगदादी ने लोगो को हत्या की है या लोगो को एक साथ मार है , क्या ये इस्लाम कहता है बिलकुल नहीं -? हर आदमी को सत्ता की लालच है जैसा के आप देख रहे है सभी अपनी हुकूमत बनाना चाहते है किसी को धर्म से मतलब है चूंकि धर्म का सहारा ले कर आगे बड़ा जा सकता है आईएसएम लिए जब से दुनिया का अस्तित्व आया है लोग धर्म का सहारा ले रहे है . में कल मार्क्स के इस बात से सहमत हु के मजहब एक अफीम की तरह है.

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  • November 20, 2014 at 11:40 am
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    ….……. के स्थान पर …. इस्लाम पर खतरा….शब्द समज्हा जाये जो पिचले कमेन्त मे पोस्त नहेी हुआ हे

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  • November 20, 2014 at 5:20 pm
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    मुसलमानों की सबसे बड़ी समस्या यही है कि इनकी कथनी और करनी में बहुत बड़ा फर्क रहता है. इस लेख के अनुसार तो शिक्षा में सरकार को इनकी सहायता करनी चाहिये, लेकिन जैसे ही सरकार मदरसों के आधुनिकीकरण की बात करती है तो सबसे पहले यही लोग शोर मचाना शुरु कर देते हैं. ये चाहते हैं की सरकार इनकी आर्थिक स्तिथि सुधारने में सहायता करे, लेकिन जैसे ही सरकार छोटा परिवार सुखी परिवार का नारा लगाएगी, इनका इस्लाम खतरे में पड जायेगा. हमेशा दूसरों पर उंगली उठाते हो और दूसरों से सवाल करते हो, कभी खुद से भी पूछ लिया करो के क्या कारण है कि 8-10% सिक्ख, जैन, बौद्ध, पारसी किसी भी शॉपिंग मॉल में आसानी से जा सकते हैं लेकिन 20% मुसलमान की तलाशी ले ली जाती है? क्या कारण है कि जिन इलाकों में 20% मुसलमान को घर मिलने में परेशानी होती है (जैसा कि मुसलमान दावा करते हैं), उन्ही इलाकों में 8-10% सिक्ख, जैन, बौद्ध, पारसी आसानी से घर पा सकते हैं? क्या कारण है की ईद की बधाई संसद से निकलती है लेकिन बैसाखी, नवरोज़, बुद्ध पूर्णिमा और क्रिस्मस की बधाई गाली मुहल्लों से निकलती है? क्या कारण है की देश के 1% से लेकर 10% जनसंख्या वाले अल्पसंख्यक सिक्ख, जैन, बौद्ध, पारसी, यहूदी इस देश में खुश हैं लेकिन 20% आबादी होने के बाद भी मुसलमान हमेशा रोता चिल्लाता रहता है? यदि बहुसंख्यक गलत होते तो सिर्फ मुसलमान के लिये नहीं बल्कि सिक्ख, जैन, बौद्ध, पारसी, यहूदी के लिये भी गलत होते. यदि सरकारी तंत्र गलत होता तो केवल मुसलमान के लिये नहीं बल्कि सिक्ख, जैन, बौद्ध, पारसी, यहूदी के लिये भी गलत होता. तो यदि सुख से जीना है तो दूसरों पर उंगली उठने और बहाने बनाने की बजाय अपने अंदर झाँको “बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलया कोय, जो मन खोजा आपना, मुझसा बुरा ना कोय”.

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  • November 20, 2014 at 5:20 pm
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    मुसलमान और इस्लाम मे बुनियादी फर्क है. विचारधारा और समुदाय के अंतर को समझना चाहिये. इस्लाम की मुखर आलोचना, मुस्लिमो के खिलाफ नफरत नही है. बल्कि वैचारिक मंथन की कवायद. लेकिन कुछ कट्टरपंथि मुस्लिम, इस्लाम और उसके प्रवर्तक की आलोचना को मुस्लिमो के खिलाफ नफरत मानते हैं. जिस प्रकार कम्युनिज़्म की आलोचना, कम्युनिस्टो से नफरत नही कही जा सकती. इस्लाम की आलोचना को भले ही इस्लामॉफ़ोबिया नाम दे दिया जाये, लेकिन मुस्लिमो से नफरत तो कतई नही है. इस्लाम की आलोचना को मुस्लिम अगर विरोधी मत से चर्चा का अवसर समझेंगे तो बेहतर होगा. और सिर्फ इस्लाम की आलोचना पे अहिंसक चर्चा ही इस्लामॉफ़ोबिया को दूर कर सकती है.

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    • November 20, 2014 at 8:15 pm
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      सुमित जी

      आप के इस बात से हम सहमत है .सही बात है के और धर्मो की तरह इस्लाम में कही बुराइया आ गयी है इस में इस्लाम का दोष नहीं है बल्कि इस के माने वाल्व या धर्म गुरु जो अपने लाभ के लिए धर्म का इस्तेमाल करते है.हमें समझना चाहिए .

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  • November 20, 2014 at 5:22 pm
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    अफ़ज़ल साहब इस पर तो मे यह ही कह सकता हूँ की ज़ंगल मे शेर एक ही होता है जबकि हिरन हज़ारो की सँख्या मे मिलते है, क्या यह मुस्लिमो की सोची समझी चाल नही है की भेड़ो बकरियो की तरहा बच्चे पेदा करके के जनसंख्या बड़ाओ ओर दुनिया को फ़तेह करो? गनीमत है यहूदी वा ईसाई अभी इस्लामिक आतंकवादियो की तरहां बर्बरता पर नही उतरे है नही तो एक ज़्हटके मे ईमानवालो को अल्पसंख्यो मे बदल देने वाले हतियारो के ज़ख़ीरे पर वह बेठे हुए है ओर तब यह गाहे बेगाहे सबसे ज़ायदा जनसंख्या का गाना अपने आप बंद हो जायेगा

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  • November 20, 2014 at 5:24 pm
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    मुबारक हो ! अफज़ल साहब लगता है इस्लाम क़बूल कर लिया है.

    आज आप ने इस्लाम और मुस्लमान के बारे में लिख कर बहुत अच्छा किया और आप ने सच्चाई लिखी है – इस के लिए मुबारकबाद .

    अब देखिये सिकंदर हयात साहब आप के खिलाफ हो जाये गए .

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  • November 20, 2014 at 5:26 pm
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    अफ़ज़ल जी, अभी मैं श्री एम.जे. अक़बर द्वारा लिखित क़िताब ’चिंगारीः पाकिस्‍तान का अतीत और भविष्य’। मुझे लगता है कि यह क़िताब कम से कम भारत के मुसलमानों को तो अवश्य ही पढ़ना चाहिए। सईद नक़वी जैसे प्रबुद्ध इंसान के ’हिन्‍दुस्‍तानी मुसलमानों के बारे में’ विचार भी इस्‍लाम् के चाहने वालों को जानना अवश्य चाहिए। मुझे लगता है कि इस्‍लाम् के बारे में लिखने वाले जाहिलों की बाढ़ आ गई है, जो व्यर्थ के लेख लिखकर इस्‍लाम् को और बदनाम करने पर तुले हुए हैं। कभी कुछ अच्‍छे कार्य भी करके दिखाईये। वैसे हमारा देश व पूरी दुनिया इस्‍लामी आतंकवाद से त्रस्‍त है, कभी उसके ख़िलाफ़ भी कुछ लिख लिया कीजिए।

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  • November 21, 2014 at 2:16 pm
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    अफज़ल भाई नेट ख़राब हुआ पड़ा हे इस कारण साज़िद रशीद साहब का ”जाकिर नाइको ” पर लिखा लेख न भेज सका नेट आते ही भेज़ता हु

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  • November 21, 2014 at 6:53 pm
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    अफज़ल भाई आतंकवाद पंगे की बाते तो उसमे तो खेर कई पेंच हे मगर इनसे अलग भी देखे की दुनिया में ऐसा कोई कोना नही हे जहा मुसलमान गैर मुस्लिमो से पूरी तरह घुल मिल कर रह पाता हो इसकी मेन वजह हे की इस्लाम एक ईश्वर पर अल्लाह पर सबसे गहरी आस्था का नाम हे अधिकतर मुस्लिम धार्मिक होते ही हे वही इस्लाम में शिर्क की मनाही हे जबकि यहूदियों को छोड़कर सभी सभ्यताओ में शिर्क हे या बुतपरस्ती हे या नास्तिकता हे ही अब मुसलमान इनसे अधिक घुलेगा मिलेगा तो ज़ाहिर हे गैर मुस्लिम को तो इस्लाम का सम्मान करने में कोई दिक्कत नहीं हे वही मुस्लिम के लिए मसला हे की वो शिर्क बुतपरस्ती या नास्तिकता में बिलकुल अड्जस्ट नहीं हो पाता हे यही मेन बिंदु हे मुझे भी नहीं पता की इस का क्या हल हे में इतना जानता हु की हम शिर्क नहीं कर पाएंगे और ये भी सच हे की इस दुनिया में रहना दुसरो के साथ भी हे ही लड़ाई झगडे से फायदा नहीं हे तो अफज़ल भाई एक तो ये की उलेमा बुद्धजीवी इस की चर्चा करे और हल सोचे दूसरा की एक लेख सुहेल वाहिद साहब का हे ” गैर मज़हबी मुस्लिम समाज की जरुरत ” जो हिंदुस्तान में छपा था कुछ लोगो को पसंद भी नहीं आया था वो में भेज़ता हु . बहुत बड़े लेखक रफीक जकारिया ( फरीद जकारिया के अब्बु ) ने शायद अपने आखिर भाषण में कहा था की ” मुस्लिमो को आत्मनिरीक्षण की जरुरत हे ” वो में टाइप करके यहाँ लगाता हु चर्चा बहस चिंतन से ही इन बातो का कोई हल निकलेगा

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  • November 22, 2014 at 10:34 am
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    जनसत्ता 19 अक्टूबर 2004 ”मुस्लिमो को आत्मनिरीक्षण की जरुरत रफीक जकारिया ” इस्लामी विद्वान डॉक्टर रफीक जकारिया ने पश्चमी बंगाल अलपसंख्यक विकास वित्त निगम की गोष्ठि में आतंकवाद इस्लाम शिक्षा साम्प्रदायिकता पाकिस्तान इज़राइल समेत तमाम उन मुद्दो पर अपनी बात जो मुसलमानो से जुडी हुई हे डॉक्टर जकारिया ने कहा – भारत का विभाजन भारत के मुसलमानो के लिए सबसे बुरा हुआ क्योकि इससे एक बड़ा विकासशील मुस्लमान समाज तीन हिस्सों में बट गया . दूसरा विभाजन के कारण मुसलमानो के पार्टी लोगो का भेदभाव बढ़ गया . कांग्रेस के समय ये भाव दबा हुआ था जो अब खुल कर सामने आ गया हे मुसलमानो को इस भाव को धीरे धीरे दूर करना होगा इसके लिए आवशयक हे की वे शिक्षा पर जोर दे . अपने को उदार बनाय और हिन्दुओ के साथ मिलकर रहे वे अपने को आधुनिक बनाय इन तरीको से वे अपनी छवि ठीक करने के साथ साथ अपने पेरो पर भी खड़े हो सकेंगे . अमेरिका में भी मुसलमानो के प्रति यह धारणा हे की वे दूसरे धर्म के लोगो को नापसंद करते हे जिस कारण वहा भी लोग मुसलमानो से घुलना मिलना पसंद नहीं करते हे . उन्होंने कहा की इस्लाम में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं हे और इसे आतंकवाद के साथ जोड़ना पूरी तरह गलत हे पर जो मुस्लमान आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त होते हे वे खुद ऐसा कहते हे की यह जिहाद हे और इस्लाम में ऐसा ही कहा गया हे वे अपने कुकर्त्य को इस्लाम से सही ठहराने की कोशिश करते हे ऐसे में छवि यह बनती हे की इस्लाम से आतंकवाद का कोई रिश्ता तो हे डॉक्टर जकारिया ने कहा की सबसे बड़ा आतंकवादी पाकिस्तान हे वहा ऐसे लगभग एक लाख मदरसे हे जहा कटटर इस्लाम की शिक्षा देकर आतंकवादी ही तैयार किये जाते हे तालिबान व् अलकायदा यही की उपज हे अमेरिका ने अफगानिस्तान में रुसी सेनिको का सामना करने के लिए यहाँ कटटरवादी इस्लामी शिक्षा को बढ़वा ही दिया अब वे ही उसके नियंत्रण से बाहर हो गए हे उन्होंने मुसलमानो के आत्ममंथन की बात को ही आगे बढ़ाते हुए कहा की भारत का मुस्लमान देश में तो मानवाधिकार लोकतंत्र अलप्संख्यको के अधिकार वगेरह की बात करता हे पर वह सऊदी अरब और पाकिस्तान का समर्थन भी करता हे जहा न लोकतंत्र हे और न मानवाधिकार इस मामले में वह बहुराष्ट्रीय आयाम रखता हे और अपने को वहा के मुसलमानो से जोड़ कर देखता हे

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