इस्लाम और दूसरे धर्मों में महिलाओं के अधिकार

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by- अलहाज अंसारी मोहम्मद परवेज़

इस्लाम से पहले महिलाओं के सम्मान का हनन होता था। औरत जब वो बीवी का रूप लेती थीं तो उसकी स्थिति लौंडी और गुलाम से अधिक नहीं थी। यहूदी, ईसाई और हिंदू धर्म में महिलाओं का शोषण किया जाता रहा है। अरब वाले महिलाओं की मजबूरी और बेचारगी का पूरा फायदा उठाते थे। उनके जन्म को अपमान समझा जाता था। मासूम और नवजात लड़कियों को जिंदा दफन कर देने का उनमें रिवाज था। औरतों को मनहूस समझा जाता उससे नफरत और उसका तिरस्कार किया जाता था। उसको अपनी संपत्ति और खरीदने और बेचने ​की वस्तु माना जाता था। लेकिन इस्लाम ने औरत को सक्षम बनाया, उन्हें सम्मान और इज़्ज़त दिया।

यहूदियों और उनके पुराने नियमों के अनुसार व्यक्ति के खत्म होने और तकलीफ देने वाली दुनिया में आने का कारण सिर्फ और सिर्फ औरत है और निंदा के लायक है। उन्हें विरासत का हक़ नहीं, यहूदियों में औरतों को कोई विशेष महत्व नहीं दिया गया।

ईसाइयों में औरतों को जिस कदर पीछे फेंका जा सकता था, फेंक दिया। इसलिए तरतूलीन (धार्मिक शब्द) के अनुसार औरतें मुजरिम होती हैं। वो शैतान का दरवाज़ा हैं। महिलाओं ने ही खुदा की हसीन तस्वीर यानि मर्दों को तबाह किया। सेंट पॉल (धार्मिक नेता, पादरी) के अनुसार महिलाओं को चुपचाप मर्दों की आज्ञा का पालन करना चाहिए और महिलाएं शिक्षक नहीं हो सकती और मर्द पर हुक्म नहीं चला सकतीं। एक दूसरी जगह ही पादरी कहते हैं कि औरत मर्द के लिए पैदा की गयी है न कि मर्द औरते के लिए। इसलिए महिला हर हाल में अधिनस्थ हैं और उसे अधिनस्थ ही रहना होगा।

हिंदू धर्म ने तो महिलाओं को अपमानित करने की हद ही पार कर दी। हिंदुओं की पवित्र पुस्तक मनु स्मृति के अध्याय 5 और पंक्ति 147 में दर्ज है कि औरतें लड़कपन में अपने माँ बाप, जवानी में अपने पति और बेवा होने पर अपने बेटे और रिश्तेदारों के अधिकार में रहे, सशक्त होकर कभी न रहे। आगे और दर्ज है कि औरतें चाहे नाबालिग़ हो, चाहे जवान हो, चाहे बूढ़ी हो, घर में कोई काम सशक्त होकर न करे। पंक्ति 155 और 157 में दर्ज है कि औरत के लिए बलिदान और व्रत करना पाप है। सिर्फ पति की सेवा करनी चाहिए। औरत को चाहिए कि अपने पति के मरने के बाद दूसरे पति का नाम भी न ले। कम खुराक और बहुत ही सादगी से बिना बनाव सिंगार के जीवन के दिन पूरे कर ले। मनु स्मृती के अध्याय 9 पंक्ति 17 पर दर्ज है कि झूठ बोलना महिलाओं की व्यक्तिगत विशेषता है। चाणक्य हिंदुओं का बड़ा धार्मिक सुधारक हुआ है। चाणक्य नीति के प्रथम पाठ की पंक्ति 15 में दर्ज है कि नदी, सशस्त्र सैनिक, पंजे और सींग रखने वाले जानवर, राजा और औरत पर भरोसा नहीं करना चाहिए। अध्याय दो में लिखता है कि झूठ बोलना, बिना सोचे काम करना, धोखा, मूर्खता, भौतिक चीज़ों का लालच, बेरहमी ये औरतों के स्वाभाविक दोष हैं। अध्याय 12 की पंक्ति 8 में वर्णित है कि राजकुमारों से सभ्यता, नैतिकता, आलिमों से मीठी बात, जुआरियों से झूठ और औरतों से मक्कारी सीखनी चाहिए।

अध्याय 14 के पंक्ति 12 में दर्ज है कि आग, पानी, जाहिल, सांप, शाही परिवार और औरत ये सब मौत के कारक होते हैं उनसे हमेशा सावधान रहना चाहिए। अध्याय 15, पंक्ति 5 में दर्ज है कि दोस्त, सेवक और औरत दरिद्र व्यक्ति को छोड़ देते हैं और जब वो धनवान हो जाते हैं तो ये वापस आ जाते हैं।

इस्लाम ने महिलाओं के सामाजिक और संस्कृति अधिकार निर्धारित किये ताकि उसे प्रतिष्ठित जीवन जीने का मौका मिले। जन्म से मृत्यु तक हर मामले और हर नज़रिये से इस्लाम ने औरतों का मार्ग दर्शन किया है। इंसान आदर के लायक है और औरत भी इंसान है इसलिए हर व्यक्ति को इसका सम्मान करना अनिवार्य है। अल्लाह ने अपनी रचनाओं में से इंसान को महत्ता दी है और इंसान में औरत भी शामिल है। मानक जीवन को विश्वास और अमल की परख पर बताया। इसलिए अलनहल के रुकू 13 में दर्ज है जिस मर्द और औरत ने भी अच्छा काम किया अगर वो मोमिन है तो हम उसको एक अच्छा जीवन प्रदान करेंगे और उनके बेहतर कार्यों का जिन्हें वो करते हैं इनाम देंगे।

यूसुफ अल-करज़ावी आज दुनिया के बड़े विद्वान और मुफ्ती हैं। मिस्र और दुबई में उनके फतवों को कानूनी हैसियत है और औरतों से सम्बंधित फतवे में दर्ज करते हैं कि इस्लाम के अलावा कोई ऐसा दीन, धर्म या जीवन दर्शन नहीं है जिसने औरत को उसका पूरा जायज़ अधिकार और न्याय दिया हो और उसके नारित्व की सुरक्षा की हो। इंसानी हैसियत से दायित्वों और कर्तव्यों के मामले में औरत मर्द के बराबर है। माँ की हैसियत ये बताई गयी है कि उसके पैरों तले जन्नत है।

नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के दौर में औरतों की ज़िंदगी हर प्रकार के अत्याचार से मुक्त थी। सारे मामलों की तरह इस मामले की औरतें पर्दे में रहें, उनके यहां उदारता थी न वो घरों में इस तरह कैद थीं जिस तरह कुछ नादान किस्म के दीनदार लोग औरतों को रखते हैं। न पश्चिमी देशों की औरतों की तरह सारा वक्त घर से बाहर निकलने की आज़ादी थी लेकिन नैतिक पाबंदियों के साथ, इसलिए औरतें मस्जिदों में पाँच वक्त की नमाज़ और जुमा की नमाज़ अदा करती थीं। ज्ञान प्राप्त करने के लिए शिक्षण और प्रशिक्षण की सभाओं में शामिल होतीं। जिहाद और जंग के मौक़े पर मैदाने जंग में भी कई जिम्मेदारियाँ उठातीं। समाज में फैली बुराइयों को दूर करने का प्रयास करतीं। हज़रत उमर रज़ियल्लाहू अन्हू ने अपने दौरे खिलाफत में हज़रत शिफा बिन्त अब्दुल्ला को बाज़ार का निरीक्षक नियुक्त किया था कि बाजार में लूटपाट न हो। वस्तुओं को स्टोर करके अधिक दामों में न बेचा जाए। कम तौल या माल को उच्च बताकर बेचा न जाए।

मर्द और औरतें दोनों समाज का हिस्सा हैं और दोनों को मिलकर समाज के कल्याण के लिए काम करना है इसलिए संतुष्ट होकर किसी स्थान पर उठना बैठना भी ज़रूरी हो। जब कोई महान उद्देश्य की प्राप्ति मकसद हो या किसी भलाई और नेक काम को अंजाम देने में औरत और मर्द दोनों के संयुक्त संघर्ष और आपसी सहयोग की ज़रूरत हो। लेकिन इस मेल जोल की भी इस्लाम (शरीयत) ने एक सीमा बताई है।

इस्लाम ने महिलाओं को बहुत से अधिकार दिए हैं। जिनमें प्रमुख हैं, जन्म से लेकर जवानी तक अच्छी परवरिश का हक़, शिक्षा और प्रशिक्षण का अधिकार, शादी ब्याह अपनी व्यक्तिगत सहमति से करने का अधिकार और पति के साथ साझेदारी में या निजी व्यवसाय करने का अधिकार, नौकरी करने का आधिकार, बच्चे जब तक जवान नहीं हो जाते (विशेषकर लड़कियां) और किसी वजह से पति और पुत्र की सम्पत्ति में वारिस होने का अधिकार। इसलिए वो खेती, व्यापार, उद्योग या नौकरी करके आमदनी कर सकती हैं और इस तरह होने वाली आय पर सिर्फ और सिर्फ उस औरत का ही अधिकार होगा। औरत को भी हक़ है। (पति से अलग होना का अधिकार)

http://www.newageislam.com/urdu-section/alhaj-ansari-muhammed-pervez/women-s-rights-in-islam-and-other-religions-اسلام–اور-دیگر-مذاہب-میں-عورتوں-کے-حقوق/d/66550

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7 thoughts on “इस्लाम और दूसरे धर्मों में महिलाओं के अधिकार

  • February 26, 2016 at 8:42 pm
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    COMMENT OF GABRI CHELURKAR
    महाशय अलहज अंसारी मोहम्मद परवेज कितना झुठ लिखते हो ? आज भी देखा जाता है इस्लाम मे औरतो को कितना अधिकार ।फिर भी दुसरे धमॅ पर ऊंगली उठाते हो ? आप को क्या पता है यहुदी धमॅ मे औरते को कितना अधिकार दिया है ? तलमुद मे लिखा है जब मोशे ( मुसा ) ने तोरा यहुदीयो को देना चाहा तब फरिश्तो ने मना किया था तब यहुदीयो ने कहा ” हम इसकी हमी देते है हम तोरा की पवित्र और उसे सम्मान से रखेगे ” फरिश्ते तयार नही हुऐ फिर से यहुदीयो ने कहा हमारे पुवंज इसका गवाह रहेगे फिर भी फरिश्ते नही माने तब मोशे ने यहुदी औरतो से पुछा तब उने ने जवाब दिया ” हमारी आने वाला वंश इसकी जिम्मेदारी लेगा ” तब तोरा यहुदीयो को मिला और तोरा का पढाई की जिम्मेदारी औरतो पर है वे आपने लडका या लडकी को तोरा की पढाई कर दे आदमी पर नही है ।यहुदी धमॅमे औरते भी नबी हुऐ है । और एक बात यहुदी धमॅ अनुसार हफ्ते की सुरूवात शुक्रवार शाम से होती है जो हर यहुदी घरो मे मोमबत्ती जलाकर करते है बाद मे सिनॅगाॅग मे नमाज आदा करते है जो अधिकार सिफॅ औरतो को है । और कुरान से पता चलता है क्या अधिकार है औरतो को ? ( आगे )

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  • February 26, 2016 at 10:27 pm
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    हो सकता है कि इसलाम अपने स्थापना के समय अन्य धर्मों से ज्यादा महिलाओं को अधिकार दिया हो लेकिन समय के साथ इसमें परिवर्तन नहीं हुआ आज अन्य सभी धर्मों के मुकाबले इसलाम मे महिलाओं का सबसे ज्यादा शोषण होता है

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  • February 27, 2016 at 11:45 am
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    इस्लाम् मे क्या लौन्देी से बगैर निकाह के सेक्स् करने केी सुविधा नहि दि गयि है क्य इस्से स्त्रेी कि इज्जत बध्ति है !
    क्या इस्लाम १२४००० कल्पित नबि रसुल मे कोइ महिला है? अगर कोइ महिल होति तो क्या इस्से इस्लाम् केी इज्जत कम हो जति ?
    कल्पित फरिश्तो मे क्या महिलाये है ?
    मस्जिदो मे मौलाना महिलये क्या होति है
    क्या अजान कोइ महिला दे पातेी है !
    क्या कोइ मुस्लिम महिला अप्ने पुत्रो के आगे नमाज पधतेी है !
    क्या कोइ मुस्लिम महिला अप्ने पति को एक हि पल मे तलाक्- तलाक -तलाक कहकर चुत्कारा पा सक्तेी है ?
    मुस्लिम महिलाओ कि गवाहेी आधेी क्यो मानेी गयेी है ?
    मनुस्म्रिति ३/५६ जिस परिवर मे महिलये दुखि रहतिहै उस परिवार मे सुख्शन्ति नहि रहतेी इस्लिये पत्नेी को सुख् देना चाहिये

    मनुस्म्रिति ५/१४७,१५५,१५७ और ९/१७ का जो सन्दर्भ लेख्क जि ने दिया है वह मिलावतेी अन्श् है “विशुद्ध मनुस्म्रिति “को पध लिजिये

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  • April 11, 2016 at 10:33 pm
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    ईस्लाम और मुसलमान का नाम सुनते ही कुत्सित , विदेशी मनुवादीयों की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है , अरे मुर्खों अपना देखो मनुवाद महिलओं का ब्लात्कार के अतिरिक्त क्या दिया है पुत्री से ब्लात्कार नाक कान काटना , पाप योनि की उत्पत्ति कहना , पहले अपना धर्म का ग्यान लो फिर टिप्पणि करो !

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  • December 21, 2017 at 7:49 pm
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    अलहज अंसारी मोहम्मद परवेजभाई जिस प्रकार वैदिक अपने स्थापना के समय महिलाओं को अधिकार दिया है लेकिन समय का साथ वैदिक परिवर्तन हुआ है इसलिए वैदिक मे महिलाओं का शोषण हुआ है उसी प्रकार इस्लाम मे महिलाओं को अधिकार दिया है लेकिन समय का साथ इस्लाम परिवर्तन हुआ है इसलिए इस्लाम मे महिलाओं का शोषण होता है. यह लेख से पता चलता है इस्लाम धर्म है सच्चा धर्म. यह लेख से पता चलता है इस्लाम ने सबसे ज्यादा महिलाओं को अधिकार दिया है. इस्लाम का अर्थ है अल्लाह को समर्पण.

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  • September 4, 2021 at 6:39 pm
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    This is a topic that’s near to my heart… Thank you!
    Exactly where are your contact details though?

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