इसलिये उर्दू मुसलमान है !

urdu

आज जब एक भाषा के रूप में उर्दू के सामने पहचान का संकट खड़ा है तो स्वाभाविक है इससे मुहब्बत करने वाले उर्दू की इस बदहाली की वजहें तलाश कर रहे हैं ! मगर अफ़सोस है कि इन सबका चिंतन उर्दू की बदहाली की वास्तविक वजह नहीं तलाश पा रहा हैं ! इसकी बदहाली की माकूल वजहें तलाशने की बजाये आरोप हिन्दू साम्प्रदायिकता और सरकारों के ऊपर डाला जाता रहा है ! अगर उर्दू के बदहाली की माकूल वजह तलाश पाते तो उर्दू पुःन अपने उस गौरव को प्राप्त कर लेती जो प्रतिष्ठा उसकी अतीत में रही थी !

उर्दू की बदहाली के कारण

तारीख गवाह है कि उर्दू तब तक तरक्की करती रही जब तक यह हिन्दू और मुस्लिमों के बीच समान रूप से स्वीकृत जुबान थी और इस पर जान छिड़कने वाले हिन्दू और मुसलमान दोनों थे परन्तु इसकी बदहाली तब से शुरू हो गई जब इसको लेकर मजहब बीच में आ गया और उर्दू को मुसलमान अपनी जुबान बताते हुए सामने आ गये ! और सच तो ये है उर्दू को इस हाल में पहुँचाने के गुनाहगार और कोई नहीं वरन इस भाषा पर सबसे अधिक अधिकार भाव जताने वाले मुसलमान ही हैं ! उर्दू सबकी जुबान थी, इससे मुहब्बत करने वालों और इस भाषा पर महारत रखने वालों की सूची में अग्रणी स्थान हिन्दुओं का भी रहा है ! पंडित दयाशंकर ‘नसीम’,पंडित रतननाथ ‘सरशार’, नरेश कुमार ‘शाद’, मुंशी प्रेमचंद, जगत मोहन लाल ‘खां’, बेनी नारायण ‘जहां’, तिलोक चंद ‘महरूम’, रघुवीर सहाय ‘फ़िराक’, जगन्नाथ ‘आजाद’, आनंद नारायण ‘मुल्ला’, राजेन्द्र सिंह ‘बेदी’, किशन चंदर ये तमाम हिन्दू नाम है पर उर्दू की खिदमत में इनकी बराबरी करने वाले कम ही मुसलमान होंगे ! ये उर्दू से इनकी मुहब्बत की इंतेहा ही थी जिसने इन्हें अपना तखल्लुस (उपनाम) भी उर्दू नाम पर ही रखने को प्रेरित किया ! मुंशी प्रेमचंद की कालजयी रचना ‘सोजे-वतन’ उर्दू में ही लिखी गई थी ! जंगे-आजादी में बलिदान होने वाले सपूत ‘इन्कलाब-जिंदाबाद’ के नारे लगाते हुए फांसी के फंदे पर झूल गए थे ! ‘इन्कलाब जिंदाबाद’ का नारा उर्दू जुबान से निकली थी! इसलिए उर्दू अपने आरंभिक काल से लेकर आज तक में कभी भी मुसलमान नहीं थी पर जब से उर्दू को सिर्फ इस्लाम की भाषा के रूप में रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रयास शुरू हुआ तब से उर्दू मुसलमान और परायी हो गई !

उर्दू के गुनाहगार

उर्दू को इस्लाम में दीक्षित करने का काम करने वाले गुनाहगारों की सूची बड़ी लम्बी है जिसे अंग्रेजों के काल से लेकर वर्तमान वक़्त तक के कालखंड में आसानी से ढूंढा जा सकता है ! उर्दू न तो हिन्दू है न मुसलमान है ,उर्दू तो हिंदुस्तान की बेटी है जैसे खुबसूरत तराने लिखने वालों ने उर्दू को हिन्दुओं से अलग करने का पहला प्रयास और उर्दू पर अपना पहला दावा तब पेश किया जब भारत के स्वाधीनता संग्राम के दौरान तमाम राष्ट्रवादियों ने एक विदेशी और गुलामी की भाषा फारसी को हटाकर उसकी जगह हिंदी को प्रतिष्ठित करने का आग्रह शुरू किया था ! मुसलमाओं को राष्ट्रवादियों की यह मांग उर्दू को पददलित करने वाला और इस्लाम विरोधी लगा और वो ‘ये उर्दू का जनाजा है ज़रा शान से निकले’ के नारे के साथ सड़कों पर उतर पड़े ! (भाषा-विज्ञान कि दृष्टि से तो उर्दू एक स्वतंत्र भाषा भी नहीं है क्यूंकि भाषा-शास्त्र के लिए ये ये अनिवार्य शर्त है कि उसका अपना एक व्याकरण और क्रियापद हो ! उर्दू इन दोनों से ही वंचित है ! उर्दू अधिक से हिंदी हिंदी की फ़ारसी प्रभावित बोली मात्र है! इन कारणों से भी राजकीय भाषा के रूप में इसे स्थापित करना संभव नहीं था ! )

जबकि ऐसा बिलकुल भी नहीं था ! हिन्दी को राष्ट्रीय संपर्क की भाषा बनाने का आग्रह कतई धार्मिक मसला नहीं था क्यूंकि हिंदी को प्रतिष्ठित करने की मांग करने वालों से कोई भी ऐसा नहीं था जिसकी धर्मनिरपेक्षता संदिग्ध हो ! आश्चर्य तो ये है कि तब भारत में केवल कुछ ही हिस्से ऐसे थे जहाँ के मुसलमान उर्दू बोलते थे, देश के हिस्से मसलन बंगाल, तमिलनाडु, केरल, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक आदि राज्यों में रहने वाले मुसलमानों की मादरी जुबान उर्दू नहीं वरन इन राज्यों की स्थानिक जुबान थी पर उर्दू के नाम पर वो सब इकट्ठे हो गए ! इसलिए जब उर्दू को मुसलमानों ने केवल मजहबी आधार पर अपनी एकता और शक्ति प्रदर्शन का जरिया बना लिया तो इसे तो पराया होना ही था !

यहाँ एक बात यह भी ध्यान में रखने योग्य है कि हिंदी को राष्ट्रीय संपर्क भाषा के रूप में स्थापित करने का अभियान जब भी चलाया गया तो उस आन्दोलन में जो लोग सबसे आगे थे उनमें अधिकांश ऐसे थे जिनकी मादरी जुबान हिंदी नहीं थी ! गुजरात के स्वामी दयानंद सरस्वती ने हिंदी को राष्ट्रीय एकता को पुष्ट करने वाली कड़ी के रूप में देखा था और उनके इस काम को बंगाल से बंकिम चन्द्र चटर्जी, सुभाष चन्द्र बोस और रविंद्रनाथ टैगोर आगे बढ़ा रहे थे तो गुजरात से महात्मा गांधी ! महाराष्ट्र से बाल गंगाधर तिलक भी इसके लिए प्रयासरत थे ! उर्दू को आधार बनाकर मजहबी एकता दर्शाने के इन प्रयासों का बिषफल तब सामने आया जब अलगाववादी मुस्लिम लीग ने उर्दू का दामन पकड़ लिया ! ये वो वक़्त था जब अपनी मादरी जुबान को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करने का मोह छोड़ तमाम राष्ट्रवादी नेता हिंदी के समर्थन में खड़े थे सिवाये मुस्लिम लीग के ! मुस्लिम लीग ने खुला ऐलान कर दिया था कि हिंदी को सम्मान देने का अर्थ होगा हिन्दू आधिपत्य को मान लेना और इसी के तहत उसने घोषणा कर दी कि जब तक कांग्रेस हिंदी की जगह उर्दू को प्रतिष्ठित नहीं करेगी हम हिंदी का विरोध करेंगे ! हद तो ये हो गई जब मुहम्मद अली जिन्ना ने एक कदम आगे बढ़कर पकिस्तान के अपने मांग को पुष्ट करने वाली दलीलों में उर्दू को भी घसीट लिया ! 1944 में महात्मा गाँधी को लिखे अपने पत्र में उन्होंने द्विराष्ट्रवाद की अपनी अवधारणा को बल देने हेतु उर्दू को हथियार बनाया और दलील देते हुए कहा –

“हम 10 करोड़ लोगों के एक मुक़म्मिल राष्ट्र हैं, हम अपनी विशिष्ट संस्कृति, सभ्यता, भाषा, साहित्य, कला, भवन निर्माण कला, नाम, उपनाम, मूल्यांकन की समझ, अनुपात, क़ानून, नैतिक आचार संहिता, रिवाज़, कलेंडर, इतिहास, परंपरा, नज़रिया, महत्वाकांक्षाओं के चलते एक राष्ट्र हैं. संक्षेप में हमारा जीवन पर और जीवन के बारे में एक विशिष्ट नज़रिया है लिहाजा किसी भी अंतर्राष्ट्रीय नियम क़ायदे-क़ानूनों के मद्देनज़र हम एक राष्ट्र हैं.”

जिन्ना ने गाँधी जी को लिखे अपने इस पत्र में जिस भाषा का जिक्र किया वो उर्दू थी ! जिन्ना ने उर्दू को अपने मजहब का आधार और भारत विभाजन की अपने मांगों के लिए एक मजबूत तर्क बना लिया जबकि उर्दू की तारीख अगर देखी जाये तो उर्दू मुसलमानों की धर्म भाषा कभी नहीं रही थी और कभी हो भी नहीं सकती थी क्यूंकि मुसलमानों के लिए अगर कोई भाषा धर्मभाषा के रूप में प्रतिष्ठित हो सकती है है तो वो है अरबी क्यूंकि पवित्र कुरान अरबी में है ! जहाँ तक उर्दू की बात है तो न तो मुस्लिम सल्तनत युग में और न ही मुग़ल काल में भी कभी इसे राजकीय भाषा का दर्जा हासिल था ! बाबर से लेकर औरंगजेब तक सब के सब तुर्की अथवा फ़ारसी बोलते थे और उर्दू से उनका दूर-२ तक नाता नहीं था ! अकबर के समय में तो बाकायदा फ़ारसी को राजभाषा घोषित किया गया था ! जिन्ना द्वारा उर्दू को विभाजन की दलील के रूप से पेश करना दूसरा वक़्त था जब मुस्लिमों ने उर्दू को सिर्फ अपना माना था !

उर्दू को मुसलमान बनाने की एक और कोशिश –

उर्दू मुसलमानों की और इस्लाम की जुबान है इस भाव पर तीसरी मुहर तब लगी जब पाकिस्तान बना ! उस वक़्त के पूर्वी पाकिस्तान के लोग बंगाली बोलते थे, पश्चिमी पकिस्तान में पंजाबी, बलूच, पश्तो का चलन था और उर्दू बोलने वाले प्रायः वही लोग थे जो बिहार, उत्तरप्रदेश आदि राज्यों से हिजरत कर पकिस्तान गए थे यानि जो भाषाई लिहाज से पाकिस्तान में अल्पसंख्यक थे ! यहाँ भी जिन्ना ने उर्दू को पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा बनाने की जिद पकड़ ली और बहुसंख्यक पाकिस्तानियों की भाषाई भावनाओं की अनदेखी करते हुए महज इस्लाम के नाम पर उर्दू को उनपर थोप दिया !

पहले उर्दू को अपना मानकर हिंदी को हिन्दुओं की जुबान मानते हुए उसका विरोध, फिर द्विराष्ट्रवाद सिद्धांतों की दलीलों में उर्दू को लेकर भारत विभाजन और फिर एक इस्लामी मुल्क के राज्यभाषा के रूप में उर्दू को प्रतिष्ठित करने के कार्यों ने हिन्दुओं और उन मुसलमानों के मन में (जो उर्दू को हिन्दू-मुस्लिम मुहब्बत की सांझी जुबान मानते थे) यह बात डाल दी कि उर्दू तो मुसलमानों की जुबान है जो एक इस्लामी मुल्क के स्थापना का आधार है !

हिन्दुस्तानी मुसलमानों की गलती

पकिस्तान बनने के बाद जो मुसलमान हिंदुस्तान में रह गए थे उनके ऊपर यह जिम्मेदारी थी कि वो मजहबी लबादा ओढ़े उर्दू को पुनः हिन्दू-मुस्लिम मुहब्बत की जुबान रूप में पेश करते पर वो तो इन मामलों में जिन्ना के ही दृष्टिहीन अनुचर साबित हुए ! ऐसा कहना जायज इसलिए है क्यूंकि आजादी के बाद से जितने भी उर्दू अख़बार निकाले गए या आज भी जितने उर्दू टीवी चैनल है उन सबका व्यवहार पूर्णतया इस्लामी है ! आप कोई भी उर्दू अखबार उठा लें उसके अन्दर सम्पादकीय का पन्ना खोलें तो बस हिन्दुवादी संगठनों की आलोचना, भाजपा और संघ के विरोध में लिखे आलेख, मुस्लिम समाज की समस्यायें और मुसलमानों के खिलाफ हो रही नाइंसाफी के ऊपर लिखे आलेख ही नज़र आतें है ! आप कभी भी इन अख़बारों के सम्पादकीय में देश के दूसरे समुदायों की समस्याओं पर आलेख या फिर भाजपा आदि पार्टियों के अच्छे फैसलों और कामों का सटीक विश्लेषण नहीं पाएंगे ! उर्दू अखबारों के पत्रकार और संपादक (कुछ अपवाद को छोड़ कर) भी जबरदस्त सांप्रदायिक मनोवृति के होते हैं, तथ्यों की सही छानबीन कर खबर पेश करने के बजाए उनका नजरिया पूर्वाग्रहग्रस्त और संकीर्ण होता है ! उदहारण के लिए अज़ीज़ बर्नी साहब जो राष्ट्रीय सहारा उर्दू के संपादक रहे हैं ने मुंबई पर हुए आतंकी हमले के पश्चात “26/11 का षड़यंत्र और आर0 एस0 एस” नाम से एक किताब लिखी थी और तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हुए ये साबित करने का झूठा प्रयास किया था कि मुंबई पर हुए आतंकी हमले के पीछे पकिस्तान का नहीं वरन संघ का हाथ था ! इस किताब के विमोचन के अवसर पर आये मौलानाओं ने बर्नी साहब की इन कोशिशों के बारे में कहा था कि अज़ीज़ साहब जो काम कर रहे हैं यही तो जिहाद-बिल-कलम है ! बाद में जब मुंबई हमले के षड़यंत्र सामने आयें तो बर्नी साहब ने अपने उस कूड़ा किताब के लिए लिखित माफ़ी मांगी ! (इस बात का जबाब भी बर्नी साहब के पुस्तक विमोचन पर उपस्थित मौलानाओं से अपेक्षित है कि ये कौन सा जिहाद-बिन-कलम है जिसे करने के लिए बाद माफ़ी मांगनी पड़े ? क्या ये सब इस्लाम का मजाक नही बनाता?) अजीज़ साहब एक और उर्दू अख़बार अजीजुलहिन्द भी निकालते हैं, हालिया लोकसभा चुनाव परिणामों में मोदी के जीत पर इन साहब ने अपने अखबार के पहले पन्ने को पूरा काला (जो विरोध का प्रतीक है) रखते हुए इसे भारत के इतिहास का सबसे काला दिन बताया ! एक पूर्ण बहुमत से निर्वाचित व्यक्ति और सरकार का आकलन अपने उर्दू अख़बार में एक पत्रकार और संपादक के नजरिये से न कर मज़हबी लिहाज से करना क्या उर्दू को मुसलमानों का मुखपत्र नहीं बनाता और क्या ये देश के लोगों ने जनादेश का अपमान करना नहीं है ? मोदी के लाखों चाहने वाले जब अज़ीज़ बर्नी साहब के इस कृत्य को देखेंगे तो क्या उर्दू उन्हें मुहब्बत की जुबान लगेगी ? यही तंग नजरिया इन अख़बारों का देश में होने वाले सांप्रदायिक दंगों को लेकर भी है जब उर्दू अखबारों के पत्रकार इन दंगों की एकतरफा रिपोर्टिंग करते हैं !

उर्दू अखबारों में हज, रोज़ा, ज़कात, नमाज़, ईद, बकरीद, आबे-जमजम, मस्जिदे-हरमैन को लेकर तो खूब आलेख छपते हैं पर कभी किसी दूसरे समुदायों की परम्पराओं, तीर्थों, पर्व-त्योहारों और रीति-रिवाजों पर आलेख नहीं छपते ! अहमदियों को लेकर शेष मुस्लिम समाज का जो नजरिया है वही नजरिया अहमदियों के बारे में उर्दू अख़बारों का भी है ! इन अख़बारों में अहमदियों के बारे में सिर्फ बिषवमन ही किया जाता है, यानि अहमदियों के प्रति भी इनकी दृष्टि निष्पक्ष न होकर पूर्वाग्रहग्रस्त ही है ! भारत के अन्य अखबार और पत्र-पत्रिका जहाँ आर्याभट्ट, वराहमिहिर, भास्कराचार्य, चरक और सुश्रुत जैसे महान बिभूतियों पर अपने स्तंभों में जानकारी देते हैं वही उर्दू अखबार कभी इब्ने-सीना और जाबिर इब्ने-हैयान जैसे इस्लामिक नामों से आगे नहीं बढ़ पाते ! इन अख़बारों पर अंकित तारीख हिजरी संवत अथवा ग्रेगरी संवत् के होते हैं, उनमें इस मुल्क के किसी संवत् (विक्रमी, युगाब्द अथवा शक संवत्) पर आधारित तिथि नहीं दी जाती ! ये भेदभाव सिर्फ इन अखबारों के ऑनलाइन संस्करणों में भी स्पष्ट दिखता है ! उर्दू अखबारों के ऑनलाइन संस्करणों में कुरान, हदीस, इस्लामी मालूमात के section तो रहते हैं पर बाकी मजहबों के धर्मग्रंथ तो दूर उनके बारे में कोई जानकारी तक नहीं होती !

यही हाल उर्दू टीवी चैनलों का भी है, इन चैनलों की सुबह नात-पाक या तिलावते-कुरान से होती है, कार्यक्रमों का आगाज़ और समाप्ति ‘अस्स्लामअलैकुम’, आदाब, शब्ब-खैर या खुदा-हाफिज जैसे इस्लामिक संबोधनों के साथ होती है और लगभग सारे कार्यक्रम इस्लाम की छाप लिए होते हैं, समसामयिक बिषयों पर जब चर्चा होती है तो प्रायः इस्लामी समाज के विषय ही केंद्र में रहतें हैं और मुसलमान विद्वानों को ही इन कार्यक्रमों में आमंत्रित किया जाता है ! इन चैनलों पर आने वाले समाचारों में अधिकांश फोकस इस्लामिक विषयों पर और मुस्लिम मुल्कों पर ही रहता है !

अपने अख़बारों और चैनलों पर देश के बाकी तमाम समुदायों की लगातार उपेक्षा करते चले जाना और फिर उनसे ये उम्मीद करना कि वो उर्दू को सर-आँखों पर बिठाएंगे एक मूर्खतापूर्ण सोच ही हो सकती है ! पर इतना जरूर है कि इन सबके बाबजूद हिन्दुओं में मुझ जैसे लाखों लोग हैं जो इनकी तमाम उपेक्षाओं के बाबजूद उर्दू से बेइंतहा मुहब्बत करने वाले हैं और इसकी बेहतरी की चाहत रखते हैं ! इसलिए आज मुसलमानों को अगर सच में उर्दू के बेहतरी चाहिए तो उसे ये समझना होगा कि भाषा को किसी एक मजहब के दायरे में सीमित करना कही से भी जायज नहीं है ! अगर वैश्विक स्तर पर मुसलमानों की बात की जाये तो धार्मिक लिहाज से अरबी जरूर उनकी धर्मभाषा है (क्यूंकि पवित्र कुरान अरबी में है) परन्तु अरबी केवल मुसलमाओं की भाषा है ऐसा कहना भी गलत है क्यूँकि अरबी अरब के आस-पास के मुल्कों में बसने वाले कई ईसाइयों की भी मादरी जुबान है ! अरब के पड़ोस में ईरान, इराक और तुर्की जैसे बड़े मुस्लिम मुल्क है पर उनकी जुबान तो अरबी नहीं है ! यही बात उर्दू के संबंध में भी उतनी ही सत्य है ! उर्दू मुसलमानों की जुबान है ये जुमला ही उर्दू की बदहाली का सबसे बड़ा कारण है ! उर्दू अखबार और टीवी चैनल समाज के तमाम धर्मों और समुदायों की समस्याओं, उनकी तहजीब, परम्पराओं को अपने पत्र और कार्यक्रमों में स्थान दे और उपरोक्त तमाम बिन्दुओं पर आत्मविश्लेषण करें ये उर्दू के हक में सबसे बेहतर कोशिश होगी और इसी से उर्दू इस्लामी लिबास से बाहर आएगी और इसके चाहने वालों की संख्या में भी इजाफा होगा !

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11 thoughts on “इसलिये उर्दू मुसलमान है !

    • June 24, 2015 at 7:39 pm
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      उर्दू भाषा को सच्ची राह और दिशा हिंदुस्तान के गली कूचों से ही मिलेगी, इस भाषा का प्रचार जितना जड़ों में होगा उतना ही इसके सिर से सामंति बोझ कम होगा, जितनी भी यह जन भाषा होगी उतनी ही सरस और सहज होगी. (गांधी ने जिस भाषा को “हिंदुस्तानी” नाम दिया था- वह यही थी) जब-जब इसे महारानी बना कर पेश किया जाता रहेगा तब-तब इसके वंश और खानदान की पड़ताल होगी, इसके खिलाफ़ साजिशें होंगी, इसे हुक्मरान की नज़र से देखा जाता रहेगा जिसका नतीजा हम देख ही चुके हैं, जिस दिन यह दूसरी भाषाओं की बहन बन गयी, तभी से इसकी हिफ़ाज़त का जिम्मा स्वत: सभी ले लेंगे (आज भी इस सोच के लोग है जो इसी जज़्बे के चलते इसे न केवल सम्मान देते हैं बल्कि उसे अपने कुनबे की समझ कर इसकी सेवा करते हैं), सभी इसकी सेहत का, दाने-पानी का, इसके मिलने जुलने वालों को वही तवज्जों देंगे जैसे बहनों को मिली है, उन्हें दी जाती है, इसे भी दी जायेगी..शर्त यह है कि इसे महारानी के दंभी तख्तोताज़ से उतरना होगा जहां इसे नाजायज़ तरीके से कुंठित, दूषित, मानसिक तौर पर दिवालिया सियासी लोगों ने जबरन बैठा दिया है.( शम्शादी इलाही शम्स जी मेरठ मूल के और अब कनाडा में बसे पक्के वामपंथी चिंतक लेखक और कार्यकर्त्ता हे उनके ब्लॉग से ये लेख साभार लिया गया हे )

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  • June 25, 2015 at 2:29 am
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    उर्दू अखबारों में हज, रोज़ा, ज़कात, नमाज़, ईद, बकरीद, आबे-जमजम, मस्जिदे-हरमैन को लेकर तो खूब आलेख छपते हैं पर कभी किसी दूसरे समुदायों की परम्पराओं, तीर्थों, पर्व-त्योहारों और रीति-रिवाजों पर आलेख नहीं छपते ! अहमदियों को लेकर शेष मुस्लिम समाज का जो नजरिया है वही नजरिया अहमदियों के बारे में उर्दू अख़बारों का भी है !

    यही हाल उर्दू टीवी चैनलों का भी है, इन चैनलों की सुबह नात-पाक या तिलावते-कुरान से होती है, कार्यक्रमों का आगाज़ और समाप्ति ‘अस्स्लामअलैकुम’, आदाब, शब्ब-खैर या खुदा-हाफिज जैसे इस्लामिक संबोधनों के साथ होती है और लगभग सारे कार्यक्रम इस्लाम की छाप लिए होते हैं, समसामयिक बिषयों पर जब चर्चा होती है तो प्रायः इस्लामी समाज के विषय ही केंद्र में रहतें हैं और मुसलमान विद्वानों को ही इन कार्यक्रमों में आमंत्रित किया जाता है ! इन चैनलों पर आने वाले समाचारों में अधिकांश फोकस इस्लामिक विषयों पर और मुस्लिम मुल्कों पर ही रहता है !

    I AM AGREE WITH ABHIJIT OF ABOVE POINT. GOOD AND INFORMATIVE ARTICLE.

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  • June 25, 2015 at 10:12 am
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    उर्दू चैनल्स, उर्दू समाचार पत्र भले ही इस्लामी विषयो से भरे हो, लेकिन उर्दू को कोई ख़तरा नही है, पाकिस्तान की तो राष्ट्र भाषा ही उर्दू है. इसके अतिरिक्त भारत का हिन्दी सिनेमा मे उर्दू बहुत है. ये आदमी की ज़ुबान पे है, जिसमे हिंदू और मुस्लिम दोनो है.

    हिन्दी दिवस मना ने या उर्दू की साफ-सफाई से भाषाए नही फैलती. ये तो अपने आप, पानी की तरह, अपना रास्ता खुद बनाती है. हिन्दी और उर्दू को एक दूसरे से मिला कर, फिल्म जगत ने दूर तक फैला दिया है.

    जहाँ तक बात मज़हब की है तो जनाब, जब अरबी का ही इस्लाम से कोई लेना देना नही तो उर्दू का तो सवाल ही नही.

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  • June 25, 2015 at 12:35 pm
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    MaiN is,se sahmat nahiN hooN. Sara ilzam musalmanoN qat,yi sahi nahiN. Urdu ka naam hindustani bhi ho sakta tha. Aik chupa agenda ke tahat hi aisa kiya gaya. Pahle hindi ko hindu se joRa gaya. Nara diya gaya ” hindi hindu hindustan ” phir dheerey dheerey school se urdu meN nisabi kitaboN ko khatm kar diya gay. Jo chhapti hi nahiN. Doosre subject ko urdu paRhaney waley teachar nahiN .hindu student 4th languege kyoN nahi paRhte ? Ab pani, libas, bhasha aur insan sab hindu musalman ho gaya. Abhi ke haalat se bakhoobi andaza lagaya ja sakta hai.

    ham aah bhi kartey haiN to ho jatey haiN badnam
    wo qatl bhi kartey haiN to charcha nahiN hota.

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  • June 25, 2015 at 1:17 pm
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    उर्दू जबान को असल मे मुसलमानो की जुबान बताना गलत है . उर्दू भारत की जुबान है और राजनीति ने इसे मुसलमान बना दिया. लेखक ने जो बाते लिखी एक दम सही है के उर्दू के पिछड़ने मे हमारा भी बहुत बड़ा हाथ है.

    अभिजित जी को अच्छे लेख के लिये बधाई

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  • June 25, 2015 at 10:32 pm
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    वो करे बात तो हर लफ्ज़ से खुश्बू आए
    ऐसी बोली वही बोले जिसे उर्दू आए

    यह बात सच है की उर्दू अख़बार बी जे पी और संघ के फोबीया मे गिरफ्तार दिखते हैं. इसके पीछे कुछ कुछ कारण भी है. पहली बात तो यह है की उर्दू मीडीया के अलावा कोई दूसरा मीडीया उनकी समस्याओं को सही ढंग से पेश नहीं करता ,करता भी है तो सरसरी तौर से. हिन्दी मीडीया तो पूरी तरह से मोदीग्रस्त दिखाई पड़ता है.उस्को अपने आका की तारीफ से फ़ुर्सत नहिन.फिर मुसलमानो की समस्याएँ तो बहुत दूर की बात है.दूस्रे ये की उर्दू ज़बान अब ज़्यादा तर मुसलमानो तक सीमित हो कर रह गयी है इस लिए भी ये मीडीया दूसरी खबरों मे कम दिलचस्पी दिखता है. उर्दू अख़बार के माध्यम से बहुत सी ऐसी खबरें मिल जाती हैं जो हिन्दी या अँग्रेज़ी अख़बारों मे नहीं मिलतीं. लेकिन उर्दू अख़बारों की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ मुस्लिम खबरों तक ही नहीं है उनको भी थोड़ा आगे सोचना पड़े गा. उनको मेन स्ट्रीम मे आना पड़े गा अगर उनकी यही रविश रही तो वो कूप मंडूक हो कर रह जाएँ गे. उर्दू अख़बारों मे इस्लाम या रोज़ो से संबंधित लेख छापना कोई बुरी बात नहीं हाँ इनको अगर और तरक़्क़ी करनी है तो देश की दूसरी समस्याओं पर भी खुल कर लिखना पड़े गा. सिर्फ़ एक पार्टी या विचारधारा के पीछे पड़े रहने से काम नहीं चले गा. अज़ीज़ बर्नी या शाहिद सिद्दीक़ी मार्का पत्रकारिता से अब भला नहीं होने वाला. केवल जज़्बात उभार कर अख़बार की प्रतियाँ तो ज़्यादा बिक सकती हैं लेकिन समस्याओं का समाधान नहीं. यह भी सही है उर्दू का बड़ा नुकसान उर्दू वालों ने ही किया है. उर्दू और हिन्दी दो सग़ी बहनें हैं. एक आँगन मे फली फूली हैं .उर्दू वालों को चाहिए की हिन्दी वालों के साथ क़दम से क़दम मिला कर चलें उर्दू का तभी विकास संभव है…मुनव्वर राणा ने क्या खूब कहा है…
    लिपट पड़ता हूँ माँ से और मौसी मुस्कराती है
    मैं उर्दू मे ग़ज़ल कहता हूँ हिन्दी मुस्कराती है…

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  • June 25, 2015 at 11:46 pm
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    Urdu (/ˈʊərduː/; Urdu: اُردُو‎ ALA-LC: Urdū; IPA: [ˈʊrd̪uː] ( listen)), or more precisely Modern Standard Urdu, is a standardised register of the Hindustani language. Urdu is historically associated with the Muslims of the region of Hindustan. It is the national language and lingua franca of Pakistan, and an official language of six Indian states and one of the 22 scheduled languages in the Constitution of India. Apart from specialized vocabulary, Urdu is mutually intelligible with Standard Hindi, which is associated with the Hindu community. The Urdu language received recognition and patronage under the British Raj when the British replaced the Persian and local official languages of North Indian states with the Urdu and English language in 1837.[9]

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  • June 26, 2015 at 11:38 pm
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    उर्दू की बदहाली के लिये ना तो सिर्फ मुसलमान ही जिम्मेदार है और ना ही कोई हिन्दू कट्टरपंथि इसका गुनाहगार है !! दरअसल लोगो के दिमाग मे हिन्दू-मुसलमान इतना अंदर तक घुस गया है कि किसी भी मुद्दे पर कोई और वाजिब वजह पर उनका दिमाग काम ही नही करता ??

    सूचना क्रांति के इस दौर मे हिन्दी-उर्दू-अंग्रेज़ी-फ्रेंच यानि कोई भी भाषा हो जब तक वह भाषा अलग-2 विषयो पर जानकारिया उपलब्ध नही करवाएगी तब तक उसका बचे रहना मुश्किल है (हो सकता है भविष्य मे मुट्ठी भर लोग ही उसे बोलने वाले रह जाये या वह भाषा ही गायब हो जाये)…..

    हिन्दी इसलिये टिकी हुई है क्योकि हर क्षेत्र और हर विषय मे कोई भी जानकारी आज हिन्दी मे उपलब्ध है (अंग्रेज़ी की तुलना मे कम है) और यहा तक कि इसका इस्तेमाल करने वालो ने अपनी इतनी मजबूत उपस्थिति दिखाई है कि ट्विटर जैसी सोशल साइट पर हिन्दी मे माइक्रो ब्लॉग्गिंग हो रही है !!……आज की इस तेज रफ्तार जिंदगी और गलाकाट कम्पीटीशन के माहौल मे आखिर कोई दिन भर मे कितना समय शायरी और गज़लो के नाम पर उर्दू के लिये निकाल सकता है ??

    उर्दू इस्तेमाल करने वालो की 90% कलम दूसरो को रोचक और तथ्यपरक जानकारिया उपलभ करवाने की बजाय औरो को कोसने और अपना रोना रोने मे ही घिस जाती है तो ऐसे मे उर्दू से जुड़ेगा कौन ??

    ये हमारे निजी विचार है और जरूरी नही है कि अन्य पाठक इससे सहमत हो.

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  • July 25, 2018 at 10:30 pm
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    सारे जहां में धूम हमारी ज़बां की है।
    शेष नारायण सिंहकभी उर्दू की धूम सारे जहां में हुआ करती थी, दक्षिण एशिया का बेहतरीन साहित्य इसी भाषा में लिखा जाता था और उर्दू जानना पढ़े लिखे होने का सबूत माना जाता था। अब वह बात नही है। राजनीति के थपेड़ों को बरदाश्त करती भारत की यह भाषा आजकल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।
    वह उर्दू जो आज़ादी की ख्वाहिश के इज़हार का ज़रिया बनी आज एक धर्म विशेष के लोगों की जबान बताई जा रही है। इसी जबान में कई बार हमारा मुश्तरका तबाही के बाद गम और गुस्से का इज़हार भी किया गया था।आज जिस जबान को उर्दू कहते हैं वह विकास के कई पड़ावों से होकर गुजरी है। 12वीं सदी की शुरुआत में मध्य एशिया से आने वाले लोग भारत में बसने लगे थे। वे अपने साथ चर्खा और कागज भी लाए जिसके बाद जिंदगी, तहज़ीब और ज़बान ने एक नया रंग अख्तियार करना शुरू कर दिया। जो फौजी आते थे, वे साथ लाते थे अपनी जबान खाने पीने की आदतें और संगीत। वे यहां के लोगों से अपने इलाके की जबान में बात करते थे जो यहां की पंजाबी, हरियाणवी और खड़ी बोली से मिल जाती थी और बन जाती थी फौजी लश्करी जबान जिसमें पश्तों, फारसी, खड़ी बोली और हरियाणवी के शब्द और वाक्य मिलते जाते थे। 13 वीं सदी में सिंधी, पंजाबी, फारसी, तुर्की और खड़ी बोली के मिश्रण से लश्करी की अगली पीढ़ी आई और उसे सरायकी ज़बान कहा गया। इसी दौर में यहां सूफी ख्यालात की लहर भी फैल रही थी।
    सूफियों के दरवाज़ों पर बादशाह आते और अमीर आते, सिपहसालार आते और गरीब आते और सब अपनी अपनी जबान में कुछ कहते। इस बातचीत से जो जबान पैदा हो रही थी वही जम्हूरी जबान आने वाली सदियों में इस देश की सबसे महत्वपूर्ण जबान बनने वाली थी। इस तरह की संस्कृति का सबसे बड़ा केंद्र महरौली में कुतुब साहब की खानकाह थी। सूफियों की खानकाहों में जो संगीत पैदा हुआ वह आज 800 साल बाद भी न केवल जिंदा है बल्कि अवाम की जिंदगी का हिस्सा है।
    अजमेर शरीफ में चिश्तिया सिलसिले के सबसे बड़े बुजुर्ग ख़्वाजा गऱीब नवाज के दरबार में अमीर गरीब हिन्दू, मुसलमान सभी आते थे और आशीर्वाद की जो भाषा लेकर जाते थे, आने वाले वक्त में उसी का नाम उर्दू होने वाला था। सूफी संतों की खानकाहों पर एक नई ज़बान परवान चढ़ रही थी। मुकामी बोलियों में फारसी और अरबी के शब्द मिल रहे थे और हिंदुस्तान को एक सूत्र में पिरोने वाली ज़बान की बुनियाद पड़ रही थी। इस ज़बान को अब हिंदवी कहा जाने लगा था। बाबा फरीद गंजे शकर ने इसी ज़बान में अपनी बात कही। बाबा फरीद के कलाम को गुरूग्रंथ साहिब में भी शामिल किया गया। दिल्ली और पंजाब में विकसित हो रही इस भाषा को दक्षिण में पहुंचाने का काम ख्वाजा गेसूदराज ने किया। जब वे गुलबर्गा गए और वहीं उनका आस्ताना बना। इस बीच दिल्ली में हिंदवी के सबसे बड़े शायर हज़रत अमीर खुसरो अपने पीर हजरत निजामुद्दीन औलिया के चरणों में बैठकर हिंदवी जबान को छापा तिलक से विभूषित कर रहे थे। अमीर खुसरो साहब ने लाजवाब शायरी की जो अभी तक बेहतरीन अदब का हिस्सा है और आने वाली नस्लें उन पर फख्र करेंगी। हजरत अमीर खुसरों से महबूब-ए-इलाही ने ही फरमाया था कि हिंदवी में शायरी करो और इस महान जीनियस ने हिंदवी में वह सब लिखा जो जिंदगी को छूता है। हजरत निजामुद्दीन औलिया के आशीर्वाद से दिल्ली की यह जबान आम आदमी की जबान बनती जा रही थी।

    उर्दू की तरक्की में दिल्ली के सुलतानों की विजय यात्राओं का भी योगदान है। 1297 में अलाउद्दीन खिलजी ने जब गुजरात पर हमला किया तो लश्कर के साथ वहां यह जबान भी गई। 1327 ई. में जब तुगलक ने दकन कूच किया तो देहली की भाषा, हिंदवी उनके साथ गई। अब इस ज़बान में मराठी, तेलुगू और गुजराती के शब्द मिल चुके थे। दकनी और गूजरी का जन्म हो चुका था।इस बीच दिल्ली पर कुछ हमले भी हुए। 14वीं सदी के अंत में तैमूर लंग ने दिल्ली पर हमला किया, जिंदगी मुश्किल हो गई। लोग भागने लगे। यह भागते हुए लोग जहां भी गए अपनी जबान ले गए जिसका नतीजा यह हुआ कि उर्दू की पूर्वज भाषा का दायरा पूरे भारत में फैल रहा था। दिल्ली से दूर अपनी जबान की धूम मचने का सिलसिला शुरू हो चुका था। बीजापुर में हिंदवी को बहुत इज्जत मिली। वहां का सुलतान आदिलशाह अपनी प्रजा में बहुत लोकप्रिय था, उसे जगदगुरू कहा जाता था।
    सुलतान ने स्वयं हजरत मुहम्मद (सलल्लाहो अलैहि वसल्लम), ख्वाजा गेसूदराज और बहुत सारे हिंदू देवी देवताओं की शान में शायरी लिखी। गोलकुंडा के कुली कुतुबशाह भी बड़े शायर थे। उन्होंने राधा और कृष्ण की जिंदगी के बारे में शायरी की। मसनवी कुली कुतुबशाह एक ऐतिहासिक किताब है। 1653 में उर्दू गद्य (नस्त्र) की पहली किताब लिखी गई। उर्दू के विकास के इस मुकाम पर गव्वासी का नाम लेना जरूरी हैं।

    गव्वासी ने बहुत काम किया है इनका नाम उर्दू के जानकारों में सम्मान से लिया जाता है। दकन में उर्दू को सबसे ज्यादा सम्मान वली दकनी की शायरी से मिला। आप गुजरात की बार-बार यात्रा करते थे। इन्हें वली गुजराती भी कहते हैं। 2002 में अहमदाबाद में हुए दंगों में इन्हीं के मजार पर बुलडोजर चलवा कर नरेंद्र मोदी ने उस पर सड़क बनवा दी थी। जब तुगलक ने अपनी राजधानी दिल्ली से दौलताबाद शिफ्ट करने का फैसला लिया तो दिल्ली की जनता पर तो पहाड़ टूट पड़ा लेकिन जो लोग वहां गए वे अपने साथ संगीत, साहित्य, वास्तु और भाषा की जो परंपरा लेकर गए वह आज भी उस इलाके की थाती है1526 में जहीरुद्दीन बाबर ने इब्राहीम लोदी को हराकर भारत में मुगुल साम्राज्य की बुनियाद डाली। 17 मुगल बादशाह हुए जिनमें मुहम्मद जलालुद्दीन अकबर सबसे ज्यादा प्रभावशाली हुए। उनके दौर में एक मुकम्मल तहज़ीब विकसित हुई। अकबर ने इंसानी मुहब्बत और रवादारी को हुकूमत का बुनियादी सिद्घांत बनाया। दो तहजीबें इसी दौर में मिलना शुरू हुईं। और हिंदुस्तान की मुश्तरका तहजीब की बुनियाद पड़ी। अकबर की राजधानी आगरा में थी जो ब्रज भाषा का केंद्र था और अकबर के दरबार में उस दौर के सबसे बड़े विद्वान हुआ करते थे।

    वहां अबुलफजल भी थे, तो फैजी भी थे, अब्दुर्रहीम खानखाना थे तो बीरबल भी थे। इस दौर में ब्रजभाषा और अवधी भाषाओं का खूब विकास हुआ। यह दौर वह है जब सूफी संतों और भक्ति आंदोलन के संतों ने आम बोलचाल की भाषा में अपनी बात कही। सारी भाषाओं का आपस में मेलजोल बढ़ रहा था और उर्दू जबान की बुनियाद मजबूत हो रही थी। बाबर के समकालीन थे सिखों के गुरू नानक देव। उन्होंने नामदेव, बाबा फरीद और कबीर के कलाम को सम्मान दिया और अपने पवित्र ग्रंथ में शामिल किया। इसी दौर में मलिक मुहम्मद जायसी ने पदमावती की रचना की जो अवधी भाषा का महाकाव्य है लेकिन इसका रस्मुल खत फारसी है।
    शाहजहां के काल में मुगल साम्राज्य की राजधानी दिल्ली आ गई। इसी दौर में वली दकनी की शायरी दिल्ली पहुंची और दिल्ली के फारसी दानों को पता चला कि रेख्ता में भी बेहतरीन शायरी हो सकती थी और इसी सोच के कारण रेख्ता एक जम्हूरी जबान के रूप में अपनी पहचान बना सकी। दिल्ली में मुगल साम्राज्य के कमजोर होने के बाद अवध ने दिल्ली से अपना नाता तोड़ लिया लेकिन जबान की तरक्की लगातार होती रही। दरअसल 18वीं सदी मीर, सौदा और दर्द के नाम से याद की जायेगी। मीर पहले अवामी शायर हैं। बचपन गरीबी में बीता और जब जवान हुए तो दिल्ली पर मुसीबत बनकर नादिर शाह टूट पड़ा।
    उनकी शायरी की जो तल्खी है वह अपने जमाने के दर्द को बयान करती है। बाद में नज़ीर की शायरी में भी ज़ालिम हुक्मरानों का जिक्र, मीर तकी मीर की याद दिलाता है। मुगलिया ताकत के कमजोर होने के बाद रेख्ता के अन्य महत्वपूर्ण केंद्र हैं, हैदराबाद, रामपुर और लखनऊ। इसी जमाने में दिल्ली से इंशा लखनऊ गए। उनकी कहानी ”रानी केतकी की कहानी” उर्दू की पहली कहानी है। इसके बाद मुसहफी, आतिश और नासिख का जिक्र होना जरूरी है। मीर हसन ने दकनी और देहलवी मसनवियां लिखी।
    उर्दू की इस विकास यात्रा में वाजिद अली शाह ‘अख्तर’ का महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन जब 1857 में अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया तो अदब के केंद्र के रूप में लखनऊ की पहचान को एक धक्का लगा लेकिन दिल्ली में इस दौर में उर्दू ज़बान परवान चढ़ रही थी।
    बख्त खां ने पहला संविधान उर्दू में लिखा। बहादुरशाह जफर खुद शायर थे और उनके समकालीन ग़ालिब और जौक उर्दू ही नहीं भारत की साहित्यिक परंपरा की शान हैं। इसी दौर में मुहम्मद हुसैन आज़ाद ने उर्दू की बड़ी सेवा की उर्दू के सफरनामे का यह दौर गालिब, ज़ौक और मोमिन के नाम है। गालिब इस दौर के सबसे कद्दावर शायर हैं। उन्होंने आम ज़बानों में गद्य, चिट्ठयां और शायरी लिखी। इसके पहले अदालतों की भाषा फारसी के बजाय उर्दू को बना दिया गया।
    1822 में उर्दू सहाफत की बुनियाद पड़ी जब मुंशी सदासुख लाल ने जाने जहांनुमा अखबार निकाला। दिल्ली से ‘दिल्ली उर्दू अखबार’ और 1856 में लखनऊ से ‘तिलिस्मे लखनऊ’ का प्रकाशन किया गया। लखनऊ में नवल किशोर प्रेस की स्थापना का उर्दू के विकास में प्रमुख योगदान है। सर सैय्यद अहमद खां, मौलाना शिबली नोमानी, अकबर इलाहाबादी, डा. इकबाल उर्दू के विकास के बहुत बड़े नाम हैं। इक़बाल की शायरी, लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी और सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा हमारी तहजीब और तारीख का हिस्सा हैं। इसके अलावा मौलवी नजीर अहमद, पं. रतनलाल शरशार और मिर्जा हादी रुस्वा ने नोवल लिखे। आग़ा हश्र कश्मीरी ने नाटक लिखे।
    कांग्रेस के सम्मेलनों की भाषा भी उर्दू ही बन गई थी। 1916 में लखनऊ कांग्रेस में होम रूल का जो प्रस्ताव पास हुआ वह उर्दू में है। 1919 में जब जलियां वाला बाग में अंग्रेजों ने निहत्थे भारतीयों को गोलियों से भून दिया तो उस $गम और गुस्से का इज़हार पं. बृज नारायण चकबस्त और अकबर इलाहाबादी ने उर्दू में ही किया था। इस मौके पर लिखा गया मौलाना अबुल कलाम आजाद का लेख आने वाली कई पीढिय़ां याद रखेंगी। हसरत मोहानी ने 1921 के आंदोलन में इकलाब जिंदाबाद का नारा दिया था जो आज न्याय की लड़ाई का निशान बन गया है।

    आज़ादी के बाद सीमा के दोनों पार जो क़त्लो ग़ारद हुआ था उसको भी उर्दू जबान ने संभालने की पूरी को कोशिश की। हमारी मुश्तरका तबाही के खिलाफ अवाम को फिर से लामबंद करने में उर्दू का बहुत योगदान है। आज यह सियासत के घेर में है लेकिन दाग के शब्दों में
    उर्दू है जिसका नाम, हमीं जानते हैं दागसारे जहां में धूम हमारी ज़बां की हैगंगा जमुना के दो आब में जन्मी और विकसित हुई इस जबान की ऐतिहासिक यात्रा के बारे में विदेश मंत्रालय की ओर से एक बहुत अच्छी फिल्म बनाई गई है। इस फिल्म का नाम है, ”उर्दू है जिसका नाम’। इसके निर्देशक हैं सुभाष कपूर। फिल्म की अवधारणा, शोध और कहानी सुहैल हाशमी की है। इस फिल्म में संगीत का इस्तेमाल बहुत ही बेहतरीन तरीके से किया गया है जिसे प्रसिद्घ गायिका शुभा मुदगल और डा. अनीस प्रधान ने संजोया है। शुभा की आवाज में मीर और ग़ालिब की गज़लों को बिलकुल नए अंदाज में प्रस्तुत किया गया है।फिल्म पर काम 2003 में शुरू हो गया था और 2007 में बनकर तैयार हो गई थी। अभी तक दूरदर्शन पर नहीं दिखाई गई है। इस फिल्म के बनने में सुहैल हाशमी का सबसे ज्य़ादा योगदान था और आजकल वे ही इसे प्राइवेट तौर पर दिखाते हैं। पिछले दिनों प्रेस क्लब दिल्ली में कुछ पत्रकारों को यह फिल्म दिखाई गई। मैंने भी फिल्म देखी और लगा कि उर्दू के विकास की हर गली से गुजर गया।
    Posted by शेष नारायण सिंह at 8:59 AM

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  • July 25, 2018 at 10:47 pm
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    Pawan S 5 hrs · मेरे वरिष्ठ थे..श्री सतीश मिश्र जी..कन्नौजिया अक्खड़ व्यक्तित्व था उनका…मगर खरे खूब थे…जो बात पसंद नहीं…कहने से चूकते नहीं थे..जो बात सीधे नहीं कह पाते..अक्सर कहावतों, चुटकुलों और किस्सों के माध्यम से कह देते थे..घोर हिंदुनिष्ठ थे…मेरी संगति से इसमे और तीव्रता आ गई थी..उनके घर के बाहर एक बड़ा अहाता था..एक पेड़ के नीचे हम सब की बैठक जमती…मिश्रा जी सामने अपने घर, हम लोगों के लिए चाय का आर्डर भिजवाते..चाय पौन घंटे से पहले नहीं आती…बातों की लंतरानी चलती रहती थी…कन्नौज,फर्रुखाबाद,कानपुर,उन्नाव और इटावा के लोग आज भी अच्छे किस्सागो होते हैं…हर शख्स के पास किस्सा तैयार होता था..रामजन्मभूमि आंदोलन और दूरदर्शन पर रामायण जैसे सीरियलों का समय था…मोबाइल जैसी निकृष्ट चीज़ का ज़माना नहीं था…लोग उस वक्त मेल-मिलाप..गप्प-शप से मनोरंजन करते थे…..
    एक दिन मिश्राजी के अहाते पर पहुँचा तो देखा कि मिश्रा जी के सामने एक मुल्लाजी विराजमान थे..सांप-नेवला…एक साथ ? पता चला मुल्लाजी…हमारे मिश्राजी को उर्दू की ट्यूशन दे रहे थे…मुल्लाजी हमारे जानकार थे… सो हमने डायलाग उछाला….” क्यो मुल्लाजी… कोई घर मत छोड़ियों.. हम भाजपाइयों के घर मे भी घुस ही लिए…बूढे तोतों को ट्यूशन पढ़ाने के बहाने “…ठहाका लगा…उन दिनों लोग, मज़ाक को मज़ाक ही समझते थे…आक्षेप नहीं !!..चाय आयी…हम सब ने पी..मुल्लाजी ने रवानगी ली…
    मुल्लाजी के जाने के बाद मैंने मिश्राजी से पूंछा कि यह बुढ़ापे में उर्दू सीखने की क्या ज़रूरत आन पड़ी..मिश्राजी मुस्कराये बोले कि ” आजकल एक उर्दू अखबार जिसका नाम #जदीद_मरकज़’ है…हर मोमिन घर मे फ्री बांटा जा रहा है…खास बात यह है कि मौलाना और इमाम इस अखबार को बंटवाने में खास दिलचस्पी दिखा रहे हैं…मस्जिदों में मीटिंगें भी बहुत बढ़ गईं हैं…चूंकि उर्दू अपने लिए काला अक्षर भैंस बराबर है तो कोई यह बताने वाला नहीं है कि आखिर यह कानपुर से छपने वाला उर्दू अखबार क्या षड्यंत्र फैला रहा है ?…जब उर्दू सीख ली जाएगी तो कुरान और हदीस भी पढ़ेंगे कि आखिर इसमे ऐसा क्या लिखा है कि यह तास्सुबी लोग पूरी दुनिया मे बबाल मचा रहे हैं “…चंद हफ्तों में मिश्राजी पूरी प्रवीणता से उर्दू पढ़ने लगे…’जदीद मरकज़’ को उन्होंने प्रति दिन चाटना शुरू कर दिया…
    विश्वास मानिए…. अखबार के डीलर को उन्होंने घर बुलाया…चेतावनी और वाकायदा धमकी दी कि अगर कल से ‘जदीद मरकज़’ कन्नौज में बांटा गया तो वह डीलर और हॉकर को जेल में सड़वा देंगे…उस दिन से ‘जदीद मरकज़ ‘ कन्नौज में इतिहास बन गया..मिश्राजी दबंग हिन्दू थे…दबाव देना और झेलना दोनों जानते थे…वह झुके नहीं…जीत ‘सनातन प्रेम’ की हुई….
    मित्रों…उंगलियों के पोर और आंखे इसलिए थकाता हूँ कि हम हिन्दू पढ़ना सीखें… Between the lines पढ़ें… वह भी पढ़ें जो हमारा दुश्मन लिखता है..जब विपक्षी का लिखा पढ़ेंगे तो मामलों की गंभीरता का भान होगा…हम कुछ तैयारी कर सकेंगे…वक्त आ गया है कि हम उर्दू पढ़ें…अपनी संतति को उर्दू पढ़ाएं…आज उर्दू के बल पर प्रतिवर्ष 50 से ज़्यादा मोमिन आईएएस बन रहे हैं…उर्दू में अब करियर और नौकरी छुपी है…उर्दू से हम उस मानसिकता और कूटनीति को समझेंगे…जिसने साम-दाम-दंड-भेद से 60 देश अपने बना लिए हैं और अगले 20 साल में यह संख्या 100 से ऊपर होगी ….

    जय हिन्दुराष्ट्र !!

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    Ravi Kant Mishra
    Ravi Kant Mishra वाह भाई… हमने भी आज से पंद्रह साल पहले इसी वास्ते उर्दू सीखी थी
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    Pawan S
    Pawan S तो फिर अपनी विशेषज्ञता का प्रयोग कीजिए …
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    Robespiyar French

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    निखिल रंजन
    निखिल रंजन गूगल से सीखा जा सकता है?
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    Shriprakash Gupt
    Shriprakash Gupt कैसे
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    Pawan Saxena
    Pawan Saxena Shriprakash Gupt बेहतर है कि यूट्यूब से सीखें…बस सर्च में लिखें…” उर्दू सीखें ”
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    Robespiyar French

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    Pawan S
    Pawan S बिल्कुल !!
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    Pawan Saxena
    Pawan Saxena Shriprakash Gupt बेहतर है कि यूट्यूब से सीखें…बस सर्च में लिखें…” उर्दू सीखें ”
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    धर्मेन्द्र कुमार आर्य
    धर्मेन्द्र कुमार आर्य सत्य कथन यही दूरदृष्टि की हर हिन्दू को आवश्यकता है हमे दुश्मन की हर बात पर नज़र आवश्यक है आज कोई हिन्दू यह नही जान पाता उसके बगल में क्या लिखा है ।
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    मनुवादी मधुरेन्द्र पाण्डेय
    मनुवादी मधुरेन्द्र पाण्डेय मिश्राजी सोची समझी रणनीति के तहत ऊर्दू पढ़ रहे थे तथा सनातन निष्ठा भी भरी हुई थी,इसलिये उनमें सेंध नहीं लग पाई,लेकिन ऐसा कोई दूसरा आदमी मुझे आज तक ऐसा नहीं दिख पाया जो ऊर्दू भली प्रकार जानता पढ़ता हो फिर भी वो सनातन निष्ठ रह गया हो,मैंने अभी तक यही देखा है फिर भी आपने जो बात कही है उसे सनातन निष्ठ होकर किया जा सके तो अति उत्तम है और आपकी बात भी स्वागतयोग्य है।
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    D K Verma
    D K Verma Pawan Saxena जी,वर्षों पहले मैंने उर्दू लिखना पढ़ना थोड़ा बहुत सीख लिया था पर निरन्तर अभ्यास नहीं रहने से अब काफी मुश्किल आती है । आपका सुझाव विचारणीय है ।
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    Rajesh Kumar Srivastava
    Rajesh Kumar Srivastava बड़ी तथ्यपरक बात कही आपने।अगर उर्दू विषय लेकर मुसलमान आईएएस बन सकते हैं तो हिंदुओं को भी उर्दू पढ़कर आईएएस की परीक्षा देनी चाहिये। पर इसमें एक बाधा है कॉपी जांचने वाले भी मुसलमान ही हैं वो हिन्दू को जानबूझकर फेल करेंगे।
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    Pawan Saxena
    Pawan Saxena हिंदी माध्यम लेकर मेंस में बैठने वाले परीक्षार्थियों का सफलता प्रतिशत अब लगभग जीरो हो चुका है…
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    Rajesh Kumar Srivastava
    Rajesh Kumar Srivastava Pawan Saxena मेरा भांजा खुद इस व्यवस्था का भुक्तभोगी है। दो बार मेंस में असफल हो चुका है।
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    Robespiyar French

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    Anand Sharma
    Anand Sharma फूफाजी उर्दू के अच्छे जानकार थे। और उर्दू से हिंदी में, तमाम अनुवाद भी, उन्होंने किए थे।
    एक दिन, पहले दर्जे की उर्दू की किताब,
    जिस पर देव नागरी लिपि उकेरी गई थी, मुझे दे गए..?
    यह बात तब की है, जब गाय भैंस बड़ी और हम छोटे थे…?
    दो दिन में तोते जैसे ही, सारे अक्षर भी रट ही लिए थे…?
    बारी थी, अब आगे संयुक्त लिखाबट समझने की..? एक से अधिक अक्षर मिलकर, अपनी आकृति बदल देते हैं..?
    फिर, आगे, एक दिन उर्दू किताबों को, बुक स्टाल पर खरीदने का जमाना भी आ गया था..?
    और, यात्रा में भी, दुआ सलाम का सिलसिला, कब जहेनसीब हुआ, कि कुछ पता ही नहीं चला..?
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    Tej Rawat
    Tej Rawat उर्दू या अरेबिक
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    Naresh Tejpal
    Naresh Tejpal बहुत ही सटीक व सुंदर सुझाव ।

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