आतंक के बदलते चेहरे से कैसे निपटे भारत ?

kasab-naved

कसाब फरीदकोट के ओकारा गांव का था। नावेद फैसलाबाद की शहरी कालोनी गुलाम मोहम्मद अबद का है। कसाब गरीब परिवार का था । नावेद मध्यम वर्ग के परिवार का है। कसाब पेट के लिये लश्कर के साथ जुड़ा। नावेद इस्लाम के नाम पर जमात-उल-दावा के साथ जुड़ा। कसाब के वक्त लश्कर की पूरी ट्रेनिग तालिबानी अंदाज में थी। नावेद के वक्त इस्लाम और आईएसआईएस की थ्योरी ने जमात उल दावा की तकरीर में जगह ले ली थी। कसाब के वक्त लश्कर चीफ हाफिज सईद कश्मीर की आजादी के नाम पर उसी तरह गरीब परिवारो से एक लड़का मांगा करता था जैसे अफगानिस्तान में तालिबान के लिये लश्कर समेत आंतक की कई तंजिमो ने पाकिस्तान के गरीब इलाको में तक को हील रोजगार और ताकत से जोड़ दिया था। वहीं नावेद के वक्त तक पाकिस्तान में तालिबान को लेकर मोहभंग होने लगा था। और आईएसआईएस के जरीय इस्लामिक राज्य को नये तरीके से परिभाषित करने की दिशा में तमात-उल-दावा के चीफ हाफिज सईद ने तकरीर शुरु कर दी थी। तो 1986 में बने लश्कर तोएबा के भारतीय संसद पर हमले के बाद ही 2002 में जमात-उल-दावा बनाकर हाफिज सईद ने आंतक को सामाजिक कार्यों से जोड़ कर खुद को विस्तार दे दिया। और पाकिस्तान मे भी किसी सरकार ने पहले लश्कर फिर जमात-उल-दावा को रोकने की कोशिश इसलिये नहीं की क्योंकि सामाजिक- आर्थिक तौर पर जिन बदनसीब हालातो का सामना पाकिस्तान का एक बड़ा तबका कर रहा है उसमें लश्कर ने अपनी फौज में भर्ती कर गरीब परिवारों के लिये रोजगार के अवसर भी खोले और इस्लाम को लेकर पाकिस्तान के रईसों के सामने चुनौती भी रखी। जब दुनिया भर में लश्कर-ए-तोएबा पर प्रतिबंध लगाया जाने लगा तो जमात-उल-दावा बनाकर आंतकी गतिविधियों के लिये सामाजिक-आर्थिक कार्यो को ढाल बनाया गया।

लेकिन भारत के लिये यह सारे सवाल कोई मायने नहीं रखते है कि पाकिस्तान में किस तरह आंतक सामाजिक जरुरतों से जुड़ गया। लेकिन भारत सरकार यह अब भी नहीं समझ पा रही है कि पाकिस्तान ही नहीं दुनिया भर में आंतक की परिभाषा बदल रही है। और उसी की झलक हर शुक्रवार को जुमे की नवाज के बाद श्रीनगर ने निचले इलाके की जामा मस्जिद के बाहर आईएसआईएस के झंडे उसी तर्ज पर लहराते हैं, जैसे कभी पाकिस्तान के झंडे लहराया करते थे । अंतर सिर्फ झंडो का ही नही आया है बल्कि चेहरा ढक कर जो हाथ झंडे लहराते है और नारे लगाते है वह युवा चेहरे गरीब या अनपढ़ नहीं है बल्कि पढ़े लिखे है और अच्छे परिवारों से आते हैं। यानी कश्मीर में भी आतंकवाद का चेहरा बदल रहा है। अब कश्मीर का पढा-लिखा युवा मौजूदा मुफ्ती सरकार या दिल्ली की मोदी सरकार के खिलाफ नारे लगाते हुये अपनी मौजूदगी आतंक के साथ जोडने से नहीं कतरा रहा है । यानी एक तरफ लश्कर-ए-तोएबा और जमात-उल-दावा के साथ पाकिस्तान का पढा लिखा युवा जुड़ रहा है या कहें पहली बार पाकिस्तान के भीतर नजर यह भी आ रहा है कि कालेज और यूनिवर्सिटी तक में जमात-उल-दावा की तकरीर होती है । और जिस फैसलाबाद से नावेद निकला वहां के शहरी मिजाज और पाकिस्तान के तीसरे सबसे सपन्न जिले फैसलाबाद के कालेजों में भी हाफिज सईद बीते दो बरस में छह बार पहुंचे। यानी जिस नावेद का एक बाई कालेज में पढ़ाता है। एक भाई बिजनेस करता है । बहन यूनिवर्सिटी में पढ़ती है। उस परिवार से नावेद जमात-उल-दावा की तकरीर से प्रभावित होकर लश्कर से जुड़ता है। वही कश्मीर में डाक्टरी की पढाई करने वाले से लेकर इंजीनियर और पीएचडी करने वाले छात्र हाथो में बंधूक थाम कर जब खुद को आतंकवादी करार देने से नहीं कतराते और अपनी तस्वीर को सोशल मीडिया में शेयर करने से नहीं कतराते। तो संकेत साफ उभरते है कि युवाओं को मुख्यधारा से कैसे जोड़ा जाये या आंतकवाद को लेकर जो परिभाषा कश्मीर या दिल्ली की सरकारें अभी तक गढ़ती रही है और आतंकवाद पर नकेल कसने के लिये उसने जो भी उपाय किये है वह या तो फेल हो रहे है या उन्हीं तरीको को लेकर युवाओं में आक्रोश है।

पाकिस्तान की अपनी मजबूरी उसके पावर सेंटर को लेकर हो सकती है। क्योंकि पाकिस्तान में चुनी हुई सरकार के सामानांतर सेना और आईएआई की अपनी भूमिका ना सिर्फ बड़ी है बल्कि मौजूदा वक्त में तो नवाज शरीफ के हर कदम के उलट पाकिस्तानी सेना प्रमुख राहिल शरीफ ने पहल की है । लेकिन भारत में तो ऐसा बिलकुल नहीं है । चुनी हुई सरकार के साथ विदेश नीति को लेकर तो विपक्ष भी हम शा साथ खड़ा होता है। लेकिन पहली बार कश्मीर में पढे-लिखे युवा ही नहीं बल्कि कभी मुंबई, तो कभी हैदराबाद , कभी बैगलूर तो कभी केरल से किसी ना किसी युवा की आवाज आईएसआईएस को लेकर उभरती है तो नया सवाल यह होता है कि क्या आतंक की नई परिभाषा को गढते आईएस के लेकर युवा तबका समझ नहीं पा रहा है । कह सकते है कि आतंकवाद को लेकर बारत सरकार की पॉलसी हमेसा जीरो टालरेन्स की रही है। और पाकिस्तान के लिये आंतकवाद एक नेशवल पालेसी के तौर पर उभरती दिखायी देती है। जहां उसके कर्ता-धर्ता अलग अलग वक्त में अलग अलग प्लेयर हो जायें। क्योंकि आज अगर पाकिस्तानी सेना और आईएसआई भारत में तकवादियो की घुसपैठ करा रही है तो याद कीजिये मुशर्रफ के वक्त सरकार ही कश्मीर की आजादी की राग अलापने से नहीं कतरा रही थी । लेकिन फिर सवाल भारत की ही है। कश्मीर की सबसे बडी समस्या आज भी दिल्ली की नजर में आतंकवाद है। लेकिन इसके उलट अगर हकीकत को समझने का प्रयास करें तो कश्मीर का सबसे बडा संकट वह पढा लिखा है जिसके सामने आगे बढ़ने का कोई रास्ता है ही नहीं । क्योंकि कश्मीर को जब दिल्ली भी तक की जमीन के तौर पर देखती है तो वहां के युवा के लिये रास्ते खुद ब खुद बंद हो जाते हैं । जबकि होना तो यही चाहिये कि श्रीनगर देश के अलग अलग हिस्सो से वीकएंड स्पाट हो जाये । यानी दिल्ली , मुंबई, हैदराबाद या बैंगलूरु से शनिवार-रविवार रात गुजारने की जगह बन जानी चाहिये । विकास की जिस चकाचौंध को दिश में सरकार लाना चाहती हैल उतने ही जीने के विक्लप कश्मीरी युवाओं के पास होने चाहिये। यानी देश की मुख्यधारा में कश्मीरी खुद को जुड़ा आ कैसे महसूस करें और उसके भीतर कैसे यह एहसास जागे कि वह भारत से ना सिर्फ जुडा हुआ है बल्कि उसी के लिये उसे जीना-मरना है। यह मुश्किल इसलिये नहीं है क्योंकि घाटी में कल तक अलगाववादी पाकिस्तान के हक में खड़े थे तो युवा भी राजनीतिक विकल्प के साथ पाकिस्तान के हक में नारे लगाता था ।
लेकिन मौजूदा वक्त में पाकिस्तान के नहीं बल्कि आईएसआईएस और फिलिस्तीन के झंडे लेकर युवा लहराता है तो जुमे की नवाज के बाद हुर्रियत नेता उमर फारुक भी युवाओ के साथ खड़े हो जाते हैं। यानी अलगाववादियों को भी समझ में आ रहा है कि कश्मीर में आंतकवाद की 1989 वाली परिभाषा बदल रही है और अगर कश्मीरी युवा ही कोई लकीर खिंचना चाहता है तो वह उसके साथ चलेंगे।

अंतर सिर्फ यह नहीं आना चाहिये कि दिल्ली को लेकर कश्मीरी युवा का गुस्सा बरकरार रहे। तो अब सवाल तीन है । पहला क्या सरकार को कश्मीर समझने के लिये कश्मीरी युवाओं को समझना होगा । दूसरा क्या पाकिस्तान के साथ बातचीत को उस धरातल पर लाना होगा जहा पाकिस्तानी सत्ता के तीन ध्रुव भी उभरे और आंतक को लेकर उसकी स्टेट पॉलिसी भी दुनिया के सामने आये । और तीसरा पाकिस्तानी घुसपैठ करने वाले आंतकवादियो को मारने की जगह नावेद की तर्ज पर पकड़ कर संयुक्त राष्ट्र या दुनिया के अन्य मंचो को सबूत के तौर ऐसे जीवित आतंकवादियों को दिखाना चाहिये। यानी अभी तक पाकिस्तान और आंतकवाद को लेकर जो रास्ते अपनाये गये उन्हें बदलने की जरुरत है। क्योंकि मौजूदा हालात यह भी बताते है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी पंजाब में खालिस्तान को फिर से जिवित करना चाहता है । और खालिस्तान को लेकर पाकिस्तान का के-टू यानी कश्मीर-टू फार्मूला कोई आज का नहीं है । बल्कि दो दशक पहल ही इसकी बिसात बिछायी गई थी । लेकिन तब पंजाब पुलिस ने इसकी कमर तोड दी । लेकिन अभी पंजाब भी जिस तरह ड्रग का अड्डा है और वहा भी युवाओ के सामने मुख्यदारा को लेकर अंधियारी ज्यादा है । वैसे में गुरुदासपुर का हमला
चिंता का विषय तो है । और सबसे बडा सवाल यही है कि कश्मीर में अभी भी पाकिस्तानी घुसपैठ करने वाले आंतकवादियो को स्थानीय पनाह मिल रही है । नावेद के लिये सारे रास्ते अबु कासिम ने बनाये। लेकिन अबु कासिम के लिये कश्मीर में कौन रास्ते बताता रहा और कौन पनाह दिये हुये है यह भी सेना-पुलिस के पास जानकारी नहीं है । यानी नावेद तो रमजान के वक्त भारत में धुसा । लेकिन अबु कासिम तो 2008 में घुसा और कई आतंकी हिसा को अंजाम दिया । यानी किजिये तो 2013 में सेना के ट्रक पर किये गये हमले के पीछे भी अबु कासिम ही था, जिसमें 8 फौजी शहीद हो गये थे । ऐसे में आखिरी सवाल यही हाल कि जब 23 अगस्त को दिल्ली में पाकिस्तान के सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज बारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल से मिलेगें तो कसाब के तर्ज पर नावेद को लेकर भी सबूत और डोजियर सौपने का जिक्र होगा । या फिर भारत पहली बार जिन्दा तकवादी को पकडने के बाद भी बातचीत कर दुनिया को नया संदेश देगा कि अब पाकिस्तान क लेकर भारत का रवैया सिर्फ आंतक के मद्देनजर नहीं है बल्कि पाकिस्तान के भीतर का सच भी अब वह दुनिया के सामने ले कर आयेगा । इंतजार कीजिये क्योकि यह हर कोई जानता है कि पाकिस्तान पड़ोसी है जिसे बदला नहीं जा सकता।

(Visited 1 times, 1 visits today)

11 thoughts on “आतंक के बदलते चेहरे से कैसे निपटे भारत ?

  • August 9, 2015 at 5:31 pm
    Permalink

    We r much worried about the news channels who always tries to glorify terrorists nd demoralise forces on the pretext of human right .The people from the other religion have to come forward to condom it every level not by words but by gestures. After all fire do not discernment between religion it burns everyone .

    Reply
  • August 9, 2015 at 5:33 pm
    Permalink

    केवल और केवल नरसिम्हाराव की नीति ही आतंकवाद को रोक सकती है कि पाकिस्तान/आतंकवाद को सांस न लेने दिया जाए । दुशमन की बर्बादी ही शान्ति की गारन्टी है ।…. नरसिम्हाराव ने यही किया था । उसने पांच साल तक पाकिस्तान को अघोषित युद्ध की स्थिति में रखा और सांस लेने की फुरसत नहीं दी । परिणाम- उसे पंजाब से हाथ खिंचने पर मजबुर होना पडा जिससे हमारे देश में अमन चैन स्थापित हुआ ।

    Reply
    • August 10, 2015 at 8:33 am
      Permalink

      ” दुशमन की बर्बादी ही शान्ति की गारन्टी है ”जी नहीं आतंकवाद का कोई ” रेम्बो समाधान ” नहीं हे वो भी तब जब आतंकवाद के पीछे टू नेशन थ्योरी वाला न्यूयकिलयर पाकिस्तान और उसके पीछे गुरु घंटाल चीन हो ना ही पंजाब कोई बहुत ही ज़्यादा बड़ी नज़ीर हे और पाकिस्तान ने तो आज तक पंजाब से हाथ नहीं खींचे वो बात अलग हे की पाकिस्तानी उदारवादी ही बताते हे की कुछ चतुर सिख आतंकवादी पंजाब में ”फिर से आतंकवाद आ रहा आ रहा हे ठंड रखो आ रहा हे बस पिछले स्टॉप पर हे ” कह कह कर आई एस आई से नोट पीटते रहते हे और लाहोर में लस्सी पीकर दंड पेलते रहते हे और बहुत हुआ तो एकाध विस्फोट करवा देते हे फिर पंजाब पूरा का पूरा मैदानी इलाका था कोई खास गुरिल्ला वार वहा चल नहीं सकती थी फिर सिख और पंजाब बेहद समृद्ध हे ही पंजाब आतंकवाद का कोई ख़ास कारण भी नहीं था सिवाय इसके की 47 से ही कुछ सिखो के मन में कसक थी की हिन्दुस्तान- पाकिस्तान तो फिर खालिस्तान क्यों नहीं ? जैसे ही उन्हें महत्वांकांशी एन आर आई सिखो का सपोर्ट मिला तो गरीब सिखो को हथियार पकड़ा दिए गए मगर ज़ल्द ही सब खत्म हो गया क्योकि एक तो सिख ही कम हे उसमे भी गरीब शोषित सिख हे ही बहुत कम

      Reply
    • August 10, 2015 at 5:17 pm
      Permalink

      दुश्मन की बर्बादी? अच्छी बात है. दुश्मन कौन है, और उसे कैसे बर्बाद किया जाए?
      और उसकी बर्बादी से हम कैसे आबाद होंगे?

      Reply
      • August 10, 2015 at 7:06 pm
        Permalink

        जाकिर भाई और पाठको इनके रेम्बो का एक और कारनामा ”चरित्र, आदर्श और कॉर्पोरेट : पोर्न पर बैन लगा और हट गया। इसके पीछे की कहानी सुनिए। भाजपा के लोगों ने कोई 850 पोर्न साइट्स की सूची वाट्स एप और पूरे सोशल मीडिया पर डाली गई। मोदी सरकार ने ये साइट्स बैन कर फिर इसका प्रचार किया। अचानक बैन हट गया। पता चला कि जो कंपनी 4g लेकर आ रही है उसने मोदी सरकार के सामने एक सर्वे रखा जिस में भारतीय लोग दुनिया में सबसे जादा लोग पोर्न साइट्स देखते हैं। हम 4g ला रहे हैं। हमारा तो धंधा ही चौपट हो जायेगा। अरबों का घाटा हो जायेगा।
        डील क्या हुई ये तो पता नहीं पर बैन हट गया। आप को बता दे इस कारपोरेट घराने ने चुनाव के समय अरबो रूपर प्रसार प्रचार पर खर्च किये है। पर जय हो। एक खबर और है कि पोर्न साईट पर प्रतिबन्ध और उसे समाप्त करने के बीच नेट सेवाएं दे रही कम्पनियो को मुनाफा बड़ गया है क्यों की जो लोग आसानी से पोर्न सर्च नहीं कर पर थे उन के लिए अब आसानी हो गई है और वह कंपनी के नए ग्राहक होंगे। 4G इंटरनेट कनेक्शन ऐसे कनेक्शन को बोला जाता है जिसमें नेट की डाउनलोडिंग और अपलोडिंग स्पीड 100 mbps होती है। सरल भाषा में समझें तो हर सेकेंड 100 एमबी डेटा को अपलोड या डाउनलोड किया जा सकता है।
        लेखक हर्षित कुमार से संपर्क harshit05@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.
        भड़ास से साभार

        Reply
        • August 10, 2015 at 8:51 pm
          Permalink

          इंदौर के वकील कमलेश वासवानी ने पिटीशन दायर कर देश में सभी पोर्न वेबसाइट्स को बैन करने की मांग की थी। उनके वकील विजय पुंजवानी ने बताया कि पहले शॉट से लेकर आखिरी शॉट तक पोर्नोग्राफी की हर एक्टिविटी पूरी तरह से क्रिमिनल है। जिस तरह ड्रग्स का इस्तेमाल देश में बैन है, उसी तरह पोर्नोग्राफी भी बैन की जानी चाहिए। इस पिटीशन पर जुलाई में सुनवाई हुई थी। तब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एचएल दत्तू ने पोर्न वेबसाइट्स को बैन करने का इंटरिम ऑर्डर देने से इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा था कि किसी भी एडल्ट को अपने कमरे में प्राइवेसी के साथ पाेर्न देखने की आजादी से नहीं रोका जा सकता।

          Reply
        • August 11, 2015 at 9:59 am
          Permalink

          मैं सैद्धांतिक रूप से पॉर्न साइट्स के खिलाफ नही हूँ. 4 दीवारो के बीच व्यस्क इसे देखना चाहे तो देखे. बावजूद मैं पॉर्न साइट्स पे बैन का पुरजोर समर्थन करता हूँ, क्यूंकी इसकी उपलब्धता बेहद आसान है. 10-12 साल के बच्चे भी इसे देख सकते हैं. स्मार्ट-फ़ोन, टेबलेट तक आज हर बच्चे की पहुँच है, ऐसे मैं, इंटरनेट ब्राऊसर खोलते ही, साइट एड्रेस डालते ही, पेज ओपन हो जाता है.

          अगर सरकार वाकई मे इसके प्रति गंभीर है, तो प्रतिबंध के लिए 24×7 काम करना होगा, कौनसी नयी साइट्स आ रही है, इसका पता चलाया जाता रहे, और उसे ब्लॉक करते रहे.

          इस जगह मैं रूढ़िवादी लोगो के प्रभाव से ही कुछ आशा हो सकती है, क्यूंकी ऐसे लोग भी दक्षिणपंथी सरकार मे भरे होते हैं.

          Reply
  • August 10, 2015 at 10:01 am
    Permalink

    पाकिस्तान की कायर और भ्रष्ट फौज को सीधे सीधे भारत से लड़ने का अब साहस नहीं है । उसका इरादा तो पाकिस्तान पर शासन करना है । इसके लिए वो हमेशा भारत से दुश्मनी की आग को सुलगाए रखना चाहती है । इस काम के लिए वो आतंकी सगठनों की मदद लेते हैं जो हलाल होने के लिए अपने बकरे भारत भेजते हैं । आतंकी संगठनों के आका भी मौज मस्ती से जीते हैं। पाकिस्तानी फौज उनका बहुत खयाल रखती है । लेकिन इन बकरों को पाकिस्तानी मानने से भी इनकार कर देती है । उनकी लाश को दफन के लिए भी नहीं ले जाती है । आजकल तो ज्यादातर आतंकी तो सीमा पार करते समय ही भारतिय सेना और सीमा सुरक्षा बल के हाथों मारे जाते हैं । कुछ ही आतंकी अंदर आ पाते हैं जो आतंकी हमले करते हैं । अभी आतंकीयों के खिलाफ और कड़ा रूख अपनाना होगा । सीमा पर चौकसी बढ़ानी होगी और भारत के अंदर आतंकियों की मदद करनेवालों पर भी कड़ी कार्रवाई करनी होगी । साथ ही पाकिस्तान पर भी दबाव बढ़ाना होगा ।

    Reply
  • August 10, 2015 at 10:45 am
    Permalink

    अब वहाब चिश्ती जैसे लोग isis का सपोर्ट करने वालो को यहूदी बता देंगे. तो ये यहूदी अब सीरिया, इराक़ मे ही नही, भारत और पाकिस्तान के मुस्लिम समुदायो मे पहुँच गये है?

    अब ये बताओ, इन यहूदियो की पहचान कैसे करोगे? isis के नाम और उसके झंडे को गोली मारो. सैद्धांतिक रूप से ये क़ुरान, हदीसो की बात करते हैं, इस्लामिक क़ानून स्थापित करने की बात करते हैं. इस्लाम के लिए जान लेने और देने की बात करते हैं. दाढ़ी, पजामा, टोपी, बुर्क़ा, नमाज़ सब करते हैं.

    बताओ, नही पता, तो सोचो.

    Reply
  • August 10, 2015 at 1:01 pm
    Permalink

    Pakistani army officials are looting their country with both hands but pakistani avam is fool
    Just have a look below on Major U.S. Arms Sales and Grants to Pakistan Since 2001
    (1 million = 10 lac , 1 dollar = 63 rupees)

    ! eight P-3C Orion maritime patrol aircraft and their refurbishment (valued at $474 million, four delivered,
    three of which were destroyed in a 2011 attack by Islamist militants);

    $474 million +$212 million + $186 million + $100 million $76 million + $65 million + $48 million + $30 million + $891 million, + $87 million + $1.43 billion (1430 million) + $629 million +$298 million + $95 million + $80 million + $235 million……

    In April 2015, the State Department approved a possible $952 million FMS deal with Pakistan for 15 AH-1Z
    Viper attack helicopters and 1,000 Hellfire II missiles, along with helicopter engines, avionics, training, and support.

    Sources: U.S. Departments of Defense and State Contact: K. Alan Kronstadt, Specialist in South Asian Affairs, 7-5415
    Prepared by the Congressional Research Service for distribution to multiple congressional offices, May 4, 2015

    http s: // w ww. fas.org/sgp/crs/row/pa kar ms.pdf

    Reply
  • August 11, 2015 at 2:12 pm
    Permalink

    जब देश के सामने आतंकवाद, बढ़ती हुई जनसंख्या, गरीबी और बेरोजगारी जैसी गंभीर समस्याएँ है, ऐसे मे कुछ लोग फालतु बातों में सबको उलझाए रखना चाहते हैं । बस उनकी पब्लीसीटी होती रहे । कभी मोदी ने ये सुट पहन लिया तो कभी ऐसा ही कुछ और । विषय चाहे कितना ही गंभीर हो, ये लोग अपना ही राग अलापते रहेंगे। गुरूदासपुर मे पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी हमला हो रहा था, लेकिन उस स्थीति मे भी कुछ सांसद पुरे संसद को बंधक बनाकर नारेबाजी कर रहे थे । आजकल 44 सांसदों ने लोकसभा पर कब्जा किया हुआ है । अभी जनादेश क्या है, इससे भी उन्हें कुछ अंतर नहीं पड़ता ।

    हमारे बहुत से बुद्धीजीविगण भी हर बात के लिए सरकार को दोषि ठहराकर विलाप करते रहते हैं । कभी समाज को जागरूक करने के लिए उन्होंने कुछ किया ? बहुत से भ्रमित युवा आतंकियों का झंडा लहरा रहे हैं । कभी उन्हें सही रास्ते पर लाने का प्रयत्न किया ? कभी साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए कुछ किया ? कभी ज्यादा बच्चे पैदा करनेवालों को समझाया ? नहीं । लेकिन मीडिया मे बने रहने के लिए, 12 बजे रात मे एक आतंकी की पैरवी करने के लिए जाते हैं ।

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *