आईएसआईएस और इस्लाम बिना लाग लपेट !

muslims-against-ISIS

अगर .. अगर वास्तव में हम आईएसआईएस को सदा सदा के लिए नेस्तनाबूत करना चाहते हैं तो यहाँ आई इस आई इस इस्लाम के अनुसार या खिलाफ है या नहीं इससे ज्यादा आईएसआईएस के खात्मे की जिम्मेदारी किसकी है यह सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण है !

क्यों की इसमें अगर हम इस्लाम पर अटके रहें तो खुद आई इस आई इस में शामिल होने के बराबर होगा ! जी हाँ !! वो चाहते ही हैं की ऐसा विवाद हो !! और हर वारदात के बाद हो ! इस्लाम पर ,कुरआन पर ऊँगली उठती रहे ताकि पहले से ही इनकी वजह से आहत ,जलालत झेलते लोग केवल इस बात के लिए आई इस आई आई में बिना सोचे समझे शामिल होते रहे की जैसे अब इस्लाम के लिए यह अस्तित्व का सवाल हो ! और इस निर्णायक मोड़ पर isis में शामिल हो इस्लाम को बचाना उनके जीवन का अंतिम उद्देश्य हो !!

याद रहे जब भी धर्म पर अस्तित्व का सवाल आता है धर्म प्रतिष्ठा की नहीं सोचता ! पहले धर्म बचे बाकी बाद में देखि जायेगी ! बेशक कुछ ऐसी ही मिलती जुलती सीख इन आतंकवादियों की किस्मत से कुरआन में भी हैं !……….. इतना कहने भर से धर्म के अस्तित्व के सवाल पर दौड़ पड़े धार्मिकों के हाथ में बंदूके उठ जाती हो और आतंक का अपना मकसद सक्रीय हो उठता हो तो किसके पास फुरसत है उसके सही सन्दर्भ तक पहुँचने की ? वो आप चर्चाओं में करते रहो ! इस्लाम को बचाने के लिए आसमान उठाते रहो ! वो तो अपना काम कर चुके !!

और हम हर हमले के बाद इस्लाम को दोष देने या बचाने में लग जाते हैं ! लेकिन कभी देखा है आपने जो भी देश इन आतंकवादियों के खिलाफ कोई कड़ी कार्यवाही करता है फिर ओसामा का खात्मा हो ,सीरिया पर हमला हो या अभी अभी फ़्रांस की प्रतिक्रिया में उठे आंतरराष्ट्रीय ध्रुवीकरण ! ,या फिर खुद हमारा भारत ,अब पाकिस्तान का तो सवाल ही नहीं उठता !! कहीं भी ,कभी भी किसी भी देश ने इसका न तो इल्जाम इस्लाम पर लगाया और न ही इसकी पूर्ण जिम्मेदारी इस्लामिक कंट्री पर छोड़ अब वही इसपर कार्यवाही करेंगे इस इंतजार में बैठे रहे ! या फिर उनपर प्रतिबन्ध लगाते रहे !! याद रहे मैं सिर्फ आतंक्वाद की बात कर रहा हूँ ! राजनैतिक सत्ता संघर्ष की नहीं ।

इसीलिए इस्लाम पर इल्जाम लगाने से पहले सोचने वाली बात यह भी है की अगर इस्लाम ही इसके केंद्र में होता तो दुनिया के देश सीधे इस्लाम से ही हर कार्यवाही शुरू करते ! उन आतंकियों पर बम बरसाने की जगह कुरआन के पन्ने उसके सही अर्थों के साथ बरसाए जाते ! उनके हैवानियत के वीडियो के जवाब में इस्लाम के सर्वमान्य न सही लेकिन आतंकवादी जिन धर्मगुरुओं के कहे पर चल रहे हैं पहले उनको पकड़ा जाता और उनके ही द्वारा कहलवा कर या ब्लैक मेल कर आतंकियों से हथियार डलवाये जाते ! लेकिन ऐसा कुछ करने की जगह आतंकवादियों पर सीधी कार्यवाही जैसे कदमो और साथ साथ खुद की सुरक्षा पहले खुद कैसे करें इसको प्रार्थमिकता दी जा रही है ! क्यों की आतंकवाद किसी धर्म की सिख से ही पैदा होता तो उसी धर्म के लोगों के उनके खिलाफ हो जाने से वो खत्म भी हो जाना चाहिए ! लेकिन दुनिया देख रही है की आतंकी खुद ये कह रहा है की आतंकवाद तो बन्दुक की आवाज से ,मौत के डर से भी खत्म नहीं होगा फिर वहां इस्लाम की क्या औकात ? और इनके खिलाफ होने वाले मुसलमान भी फिर किस खेत की मूली ?

इसीलिए आतंकवाद के खिलाफ कार्यवाही किसी धर्म के हवाले से या भरोसे नहीं की जाती ! क्यों की वहां धर्म की कोई कीमत नहीं ये खुद आतंकी साबित कर रहा होता है ! असल में वो आपको धर्म में उलझा कर अपनी हठवादिता को अंजाम देने निकला होता है इसीलिए उनका खत्मा ये हमारा पहला कदम होना चाहिए ! लेकिन हम उनकी जगह वो जिस धर्म का नाम लेकर घिनौने काण्ड जानबूझकर करते है हम उन्ही के प्लान के अनुसार उस धर्म या उस धर्म के लोगों को बिना यह देखे की उस धर्म के आम लोग भी आतंकवाद के खिलाफ हैं या नहीं उन्हें सजा देने,बदनाम करने ,जलील करने निकल पड़ते हैं और जिसका सीधा फायदा आतंकियों के बढ़ोतरी से आतंकवादियों को ही होता है ! इसी तरह धर्म को बचाने की बेवजह कोशिश इसके धर्म से सम्बन्ध को पहली स्वीकृति देती है और जाहिर है नाकामयाब होने पर अंतत: आतंकवादियों को ही फायदा पहुंचाती है ! .

अब यहाँ इस्लाम पर सवाल है तो यह स्वाभाविक है आतंकवादियों द्वारा बताये जा रहे इस्लाम को सही मानकर इस्लाम पर सवाल उठाने वाले की गलतफहमी को दूर करने की कोशिश खुद को इस्लाम का ठेकेदार कहने वालों द्वारा होगी ही ! लेकिन ये लोग प्रत्यक्ष आतंकियों से कोसो दूर ऐसी कोशिश कर आम लोगों की इस्लाम के प्रति गलत फहमी दूर कराने की विफल कोशिश करने की जगह वो जो इस्लाम को लेकर गलतफहमी की वजह से खून खराबा कर रहे हैं उनकी गलतफहमी दूर करने के लिए उनके सामने जाकर अपनी आतंकवाद के खिलाफ मंशा का सबूत दें ! ऐसे भी वो मारते वक्त किसी के मुसलमान होने भर से उन्हें बक्श नहीं रहे तो भेजें अपने फतवे निकालने वाले ,धर्मांतरण करवाने वाले मुल्ला मौलवियों और जाकिर नाईक जैसे प्रचारकों को उन्हें समझाने , बंधकों को छुड़वाने या फिर उन्हें बातचीत की टेबल तक लाने के लिए ! अगर सच्चे इस्लाम पर सवाल से इतने ही आहात हो तो इस्लाम के लिए इतनी कुर्बानी तो लाजमी है ! यहाँ बहस में क्यों लगे पड़े हो ? बहस करने वाला ज्यादा से ज्यादा इस्लाम को गाली देगा ,लेकिन किसी भी वजह से हो जो खुद इस्लाम को ही एक गाली बनाने पर तुले हैं उनका केवल मुंह ही नहीं ,हाथ ,पैर ,शुक्राणु तक सब हमेशा के लिए बंद करना किसी भी बहस के ,आरोप प्रत्यारोप के नतीजे से कहीं ज्यादा बेहतर इस्लाम को निर्दोष साबित करेगा ! यह क्यों नहीं समझते ?

यहाँ आतंकवाद पर किसी धर्म को घसीटने और बचाने में अपनी अपनी शक्ति व्यर्थ गंवाने वालों को यह समझना जरुरी है की आतंकवाद एक प्रक्टिकल प्रॉब्लम है जिसका सिर्फ और सिर्फ प्रक्टिकल सलूशन ही एकमात्र उपाय है ! ठीक वैसे ही जैसे जंग में दुश्मन सामने हो तो किया जाता है ! और उनकी और से जंग कब की शुरू हो चुकी है | बस, हमें अब पता चल रहा है ! वह इसीलिए क्यूँ की हम उन्ही की रणनीति के शिकार थे ! मित्रों अंत में केवल इतना कहना चाहूँगा की चर्चा ,धर्म यह सब इंसानों के लिए लागू होने वाले उपाय हैं और आतंकवादी किसी सूरत में इंसान नहीं इसपर फिर से किन्तु, परन्तु लगाओगे तो याद रहे जाने अनजाने फिर से आप खुद आई एस आई एस की चाल में फंसोगे !

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21 thoughts on “आईएसआईएस और इस्लाम बिना लाग लपेट !

  • November 23, 2015 at 5:38 pm
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    आम मुसलमान, इस्लामिक स्टेट से बहुत अधिक व्यथीत है. वो अपने मज़हब से मुहब्बत करता है, उसकी आड़ मे हो रहे जुल्मो-सितम उसको भीतर से झकझोर दे रहे हैं. उनके बस मे हो तो इस्लामिक स्टेट के लोगो को इस्लाम को बदनाम करने के एवज मे सूली पे चढ़ा दें. मौलाना, मुफ़्ती भी इस ख़तरे को भाँप, नौजवानो को इससे दूर रखने का संदेश दे रहे हैं.

    लेकिन मुसलमानो को ये गंभीर रूप से सोचना पड़ेगा कि कैसे आम मुस्लिमो के बीच मे से ये क़ायदा, तालिबान, इस्लामिक स्टेट, बोको हराम निकल जाते हैं. हमे तब पता चलता है, जब ये सर पे तांडव करने लग जाते हैं.

    ये लोग, राजनैतिक इस्लाम के बीज आम मुसलमान के बीच बोते हैं. इस्लाम की निंदा करने पे मौत के फ़तवे जारी करते हैं. इस्लाम को शांति का मज़हब बतला कर, उससे असहमत लोगो पे हम हिंसक तरीके से टूटते हैं, तो गैर मुस्लिमो को यही संदेश जाता है कि इस्लाम, हिंसा का पाठ पढ़ाता है, वो इस असहिष्णुता के लिए इस्लाम पे धावा बोलते हैं, ये मज़हब के ठेकेदार, हमे फिर बरगालाने लगते हैं.
    लेकिन सोचिए, इस्लाम को अमन का मज़हब बताते बताते, जब हम उसकी रक्षा के नाम पे हिंसक हो जाते हैं, तो हम खुद इस्लाम को नुकसान पहुँचा रहे हैं.

    असहिष्णुता और सियासत से मज़हब को जोड़ने वाले हर विचार और व्यक्ति से अपने आस पास लड़िए. इस्लामिक स्टेट या आतंकवाद के खिलाफ व्यक्ति से ये मत समझिए कि उस व्यक्ति मे इस बीमारी के अंश नही है, उसे ढूंढीए, उसका इलाज करिए.
    जिस प्रकार, पोलियो उन्मूलन के लिए युद्ध स्तर और आंदोलन जैसी मुहिम चली, इसके लिए भी वैचारिक लड़ाई लड़नी होगी.

    इस्लाम के नाम पे हर किसी के साथ ना लग जाए. याद रखिए, हिंसा से अधिक, आपके मज़हब को कोई नुकसान नही पहुँचा सकता. सहिष्णुता से अधिक, आपके मज़हब की कोई लोकप्रियता कोई नही बढ़ा सकता.

    हमको, सहिष्णु होना पड़ेगा, ना सिर्फ़ कथनी पे बल्कि करनी मे भी.

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  • November 23, 2015 at 7:19 pm
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    हिंसा से अधिक, आपके मज़हब को कोई नुकसान नही पहुँचा सकता. सहिष्णुता से अधिक, आपके मज़हब की कोई लोकप्रियता कोई नही बढ़ा सकता.- बेहद बेहद सशक्त एवम् सीधी बात !
    लेकिन केवल इसीलिए की आतंकवादी ने कहा ये हिंसा की जड़ें धर्म में खोजने में लग जाते है ! और ये बातों की बन्दुक निकली गोलियों के खाली काडतुस् फिर उन लोगों तक पहुँचते है जिनके लिए काडतुस् का मतलब सीधे जान का खतरा होता है ! और फिर वो असली बन्दुक उठाने के लिए उतनी राह भी नहीं देखते जितनी हम दोनों पक्ष अपने अपने नतीजों पर पहुँचने में लगाते है !
    इस तरह की हिंसा या असहिष्णुता को फल फुलाने में तुलना का कवच बहुत बड़ी भूमिका अदा कर रहा होता है जो उन बुद्धिजीवियों को तक कभी कभी ऐसे सम्पूर्णतः धर्मविरोधी तत्वों के समर्थन पर मजबूर कर देता है ! जो फिर नरेंद्र दाभोलकर जैसे अंध श्रद्धा आदि धर्म की बुराइयों के लिए लड़ने वालों की हत्या के वैचारिक विरोध करने लायक भी नहीं रहते !
    मेरे ख्याल से एक समाज सुधारक की हत्या से हुवा नुक्सान हजारों आतंकवादियों की हत्या से भी नहीं भरा जा सकता , क्यों की एक सुधारक कितनी मुश्किल हलात में भी क्या कर सकता है यह दुनिया भी देख चुकी है ! जारी ..

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  • November 23, 2015 at 7:50 pm
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    तो अब तुलना के कवच का सहारा लेकर चिंगारियों को पालने वालों से भी मैं इतना पूछना चाहता हूँ की क्या एक समाज सुधारक का हत्यारा आतंकवादियों से भी ज्यादा घृणित और धर्म और समाज के लिए ज्यादा नुक्सान देह,ज्यादा घातक है की नहीं है ? फिर आतंकवादियों द्वारा की जा रही सामान्य नागरिकों की हत्याओं के लिए किये जा रहे स्यापा की तुलना में ऐसे समाजसेवी लोगों की हत्या पर कहाँ कोई बवाल है ? क्यों भाई क्या वो बेकसूर नहीं थे ? क्या उन्हें मारने वाले आतंकवादी नहीं ?? इस्लामी संगठनो की माला कंठस्थ कर रात दिन जपने वालों को अब मैं हिंदुओं के किन संगठनो की बात कर रहा हूँ ? किस समाज सेवीओ की हत्या की बात कर रहा हूँ इसको याद करने के लिए भी गूगल करना पड़ेगा !! ऐसे तो इस्लामी आतंकवाद की इतिहास से ही जड़े खोदने में डॉक्टरेट किये लोगों को उसी तर्ज पर हिंदुओं के कल के आई एस आई एस का आज उनके सामने जन्म लेकर पल बढ़ रहा इतिहास नजर नहीं आ रहा ?
    इस्लाम में भी ऐसे समाजसेवी होंगे ! नामचीन न सही जाकिर हुसैन और सिकंदर हयात जैसे गुमनाम ही होंगे तो भी उनके छोटे से ही सही योगदान की कदर्दानी अब सिर्फ मुस्लिम ही नहीं हिंदुओं को भी ‘इस्लाम का कुछ नहीं हो सकता ‘ वाली सोच से बाहर आकर करनी ही होगी ! वरना मरता क्या नहीं करता का तमाशा हमें हर युग में देखना पड़ेगा !

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  • November 23, 2015 at 8:03 pm
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    सचिन साहब एक बहुत ही अच्छा और बैलेंस लेख .सही बात है यूरोप और अमरीका आदि देश आतंकवाद ख़त्म ही नहीं करना चाहते क्यों के ये उन का मार्किट है हथियार का .आखिर हथियार किसी बेचे गे.

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  • November 23, 2015 at 8:29 pm
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    ( कहते हे की सोवियत संघ के ध्वंस के बाद तय किया गया था की अब फ़ौरन एक नया दुश्मन ईज़ाद करना हे वार्ना खरबो डॉलर की हथियार इंडस्ट्री का क्या होगा ? ) सही कहा रमेश भाई मेरे तो कमजोर भेजे में यही बात नहीं आती की आखिर रातो रात एक इतना खतरनाक आतंकवादी संघटन वज़ूद में आया कैसे कब कहा किस तरह ? अलकायदा और तालिबान ने कब वी आर एस ले ली ? और कमाल ये हे की ये सब इतने खतरनाक आतंकवादी संगठन जिन्हे सारी दुनिया के लिए खतरा बताया जाता हे वो जमुना पार की दिल्ली से भी कम आबादी के देश इज़राइल के सामने चू भी करने की मजाल नहीं करते हे तब भी नहीं जब इज़राइल बात की बात में पिछले साल दो हज़ार फिलिस्तीनी मर्दो औरतो बच्चो को ज़िबह कर देता हे तब भी नहीं? आम मुस्लिम आई अस नौ गयारह अलकायदा सबको साज़िश मानता हे और सब हमलो को अमेरिका इज़राइल की साज़िश बताता हे इस पर तो में सहमत नहीं हु करने वाले तो ये सब मुस्लिम ही हे मगर इन्हे रोकने वाले अचानक से कैसे गायब हो जाते हे ? बहुत बाते हे इसमें कोई शक नहीं हे की मगरिबी एशिया और अरब जगत पेट्रो राज़नीति में में सच ढूँढना भूसे के ढेर में सुई की तलाश हे अमेरिका इज़राइल सऊदी अरब ईरान रूस फ़्रांस शिया सुन्नी यहूदी यूरोप जर्मनी चीन सबने रायता फैलाया हुआ हे इसमें कोई शक नहीं की मुस्लिम कटरपंथ एक समस्या हे मगर सिर्फ यही एक समस्या नहीं हे यही बात सचिन भाई ने कही वार्ना यहाँ तो हमारे रंजन सर जैसे महाविद्वान लोग भी हे जो मोदी सरकार की समीक्षा को किसी कीमत पर राज़ी नहीं हे और कुरान की समीक्षा चाहते हे (में इस विषय पर लेख की कोशिश करता हु ) (मोदी जी जिनके कुर्ते पर तीन तीन आतंकवादी घटनाओ के छींटे पड़े हुए हे बाबरी , गुजरात दंगे , मुजफरनगर जिस पर ना कोई पछतावा ना माफ़ी न कुछ और )

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    • November 23, 2015 at 9:22 pm
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      हम इस विषय पर बोलना नहीं चाहते थे, पर क्या करें, हयात भाई हमें और मोदी जी को हर बात में घसीट ही लेते हैं. हयात भाई इतना याद अल्लाह को करें तो आपका उद्धार शर्तिया हो जाये… 🙂

      मोदी सरकार से हमारी कुछ शिकायतें हैं और उनमें इजाफा हो रहा है. पर हमने ठान रखा है कि कुछ समय की मोहलत और थोड़ा कर दिखाने का मौका सबको मिलना चाहिये, वरना मुख्य परीक्षा तो 2019 में है ही.

      रही बात षड्यंत्र वाली थ्योरियों की, तो क्या मुसलमान इतने मूर्ख हैं कि अमेरिका और इजरायल जैसे नामचीन दुश्मनों के बहकावे में आ जाते हैं. जहाँ तक हमारी जानकारी है फिरकापरस्ती तो इस्लाम में शुरू से ही है, इजरायल और अमेरिका तो मुश्किल से सत्तर अस्सी साल पहले मुस्लिम राजनीति में घुसे हैं.

      सही बात तो यह है कि कुरान के नाम पर ही आतंकवादी जेहाद (फसाद) के रहे हैं. उनका विरोध करने का नैतिक, शास्त्रोक्त या धर्मसंगत साहस व तर्क मुस्लिम जगत में नहीं है. क्योंकि जब तालिबा का उदय हो रहा था तब और इराक इरान युद्ध में जो परिभाषाएँ गढ़ी गयीं थीं, वे आज तक पोषित हो रहीं हैं, अब उन्हें कोई कैसे नकारे…

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    • November 24, 2015 at 6:32 am
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      मोदो जेी के अन्ध विरोधि श्रेी सिकन्दर जेी जिन्होने नभाता के एक् ब्लोग मे तिप्प्देी करते हुये यह लिखा था केी मोदेी को हताने के लिये शैतान {लालु के सन्दर्भ मे } से हाथ मिलाना भेी गलत नहेी है लेकिन् मुलायम् और ओवेसेी से हाथ मत मिलाना वह मोदेी समरथक् है शायद यह दोनो उन्कि नजर मे महा शैतान होन्गे !
      अगर मोदेी जि यह कह दे मुहाम्मद जेी के जमाने मे भेी हम थे तब सिकन्दर जेी यह भि कह सक्ते है कि इस्लाम के खलेीफा उमर जेी , उस्मान जेी , अलेी जेी , गर्भवतेी फातिमा जेी , उन्के बेते हसन जेी और् हुसैन जि केी हत्या मे भेी मोदेी जेी का हाथ था !
      अयोध्या { बाबरेी } कान्द मे आद्वानेी और बाज्पेयेी भज्पा के मुखिया थे मोदेी नहेी !
      गुजरात कान्द मे अगर गोधरा नहेी होता तो गुजरात कान्द भेी नहेी होता फिर भेी मोदेी जेी को जिम्मेदारेी से मुक्त नहेी किया जा सक्ता !
      मुजफफर नगर कान्द मे सपा मुखिया जिम्मेदार क्यो नहेी कहे जयेन्गे उस नगर के विशेश मुखिया भेी आजम जेी भेी थे ! मोदेी जेी उस समय गुज्ररात के मुखिया थे न कि भारत के !
      कोइ ” माई का लाल ” मुस्लिम ख्लेीफा अबु बकर् जेी को दोशेी नहेी कह्ता कि उन्के मुखिया होते हुए मुह्मम्द जेी कि एक् मात्र जिवित् बचेी जवान् गर्भवतेी बेतेी फातिमा जेी कि हत्या क्यो हो गयेी थेी इस्के लिये जिम्मेदार् अबु बकर जेी को दोशेी क्यो कहा जाये ?
      लेकिन कुच लोग बेशर्मेी मोदेी के अन्ध विरोधेी होने के कारन मुजफ्फर नगर कान्द के लिये भेी मोदेी जेी को दोशेी काह्ने मे कोइ सन्कोच् नहे कर पाते है !
      मोदेी जेी का विरोद्ध किजिये उचित दोश् धुधिये दिल्लि का चुनाव , बिहार चुनाव मे मिलेी हार , दाल के बध्ते दाम , भाज्पा नेताओ पर नियन्त्रन् कम् आदि पर्

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    • November 24, 2015 at 9:30 am
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      मेरा दृष्टिकोण यह है कि अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशो ने शुरू मे ईरान के प्रभाव को कम करने के लिए isis को सीमित समस्थान दिया. ईरान को लेके सऊदी और अमेरिका का टकराव नया नही है. जबकि शाह के समय अमेरिकी दूतावास के कब्ज़े को छोड़, ईरान ने कहीं भी किसी भी आतंकी गतिविधि को प्रोत्साहित नही किया. हिज़बुल्ला जैसे संगठन भी सुन्नी अतिवादियो और इजरायल से ही उलझे दिखाई देते हैं.
      isis छोड़ दीजिए, सऊदी अरब का भी बड़ा दुश्मन, इजरायल की तुलना मे ईरान दिखाई पड़ता है. इस साईकी के पीछे, शुद्धतवादी नज़रिया है, जिसकी जड़ को समझा जाना चाहिए.

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    • November 24, 2015 at 9:35 am
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      अब यहूदियो को लेकर कई कंसपीरेसी थ्योरीज है. एक के मुताबिक, isis उन्ही के द्वारा लीड किया जा रहा है, हालाँकि उसके क्षेत्र के अधिकांश वहाबी कठमुल्ला, उसके नेतृत्व को स्वीकार कर चुके हैं.
      एक कंसपीरेसी थ्योरी ईरान और इजरायल के गठजोड़ की है, जहाँ ईरान को इजरायल का ग्रेटर इजरायल बनाने का पार्टनर बताया जा रहा है. ऐसी सूरत मे शियाओ का क़त्ले आम isis की नज़र मे इजरायल और यहूदियो पे ही हमला है.
      ये दोनो ही कंसपीरेसी थ्योरीज, एक दूसरे के उलट है.
      सोचने वाली बात यह है कि अगर किसी अतिवादी संगठन का नेतृत्व गैर मुस्लिम ही कर रहे हैं, तो वो कैसे, मुस्लिम समुदाय मे अपनी जगह बना पाते हैं. इसी वजह से मैने कहा कि राजनैतिक इस्लाम, और असहिष्णुता का प्रचार जहाँ कहीं भी होता दिखे, उसका विरोध करें. इस्लाम को इससे अधिक और कोई दूसरी चीज़ बदनाम नही कर सकती.

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  • November 24, 2015 at 9:52 am
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    देखिए ये लड़ाई बड़ी लंबी है. पश्चिमी देश, अपने फ़ायदे के लिए, मुस्लिम चरमपंथियो को बढ़ावा दे रहे हैं, लेकिन इसका दोष, उनपे डालने से बेहतर है, हम अपने घर को दुरुस्त करे.
    आम मुस्लिम ना सिर्फ़ इस उप महाद्वीप का, बल्कि अरब देशो का भी शांति मे ही यकीन करता है. लेकिन मज़हब के विस्तारवाद की आकांक्षा मुस्लिम समुदाय के भीतर दिखाई देती है, इसमे कोई बुराई नही. बुराई है, विस्तारवाद के साथ असहिष्णुता रखने और इसका राजनैतिककरण करने मे. ये दोनो ही स्वाभाव, आधुनिक युग मे सर्व-स्वीकार्य नही है, विशेषकर बुद्धिजीवी वर्ग मे.
    लेकिन आम शांतिप्रिय मुस्लिम भी सैद्धांतिक तौर पे धर्म के अराजनैतिक स्वरूप से स्पष्ट असहमत दिखाई नही देता. वो इस्लाम के प्रति कोई भी राय बनाने के लिए कठमुल्लाओं की ओर ताकता है, और वो अपने समाज मे विशिष्ठ पद और प्रतिष्ठा के लिए, धर्म को निजी आस्था रखने तक सीमित नही रखना चाहते.

    हमारा समुदाय, भी आमतौर पे इन्ही लोगो का मुँह ताकता है. जबकि प्रगतिशील मुस्लिम तबका भी समाज मे उभर रहा है. मेरा मानना है कि दीर्घकालीन समाधान की राह, धर्म गुरुओं से नही, बल्कि इसी तबके से निकलेगी.

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  • November 24, 2015 at 12:13 pm
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    सचिन जी आप के लेख से पूरी तरह सहमत हु . अच्छा होता अगर आप लिखते के कैसे विकसित देश अपना आतंकवाद तेल वाले मुल्को पे कब्जा करने के लिए साजिश रचते है . फिर भीएक बढ़िया लेख के लिए आप को धन्यवाद .
    सिकंदर हयात और अफज़ल खान लिखते को पूरी गलती इस्लाम और मुस्लमान की ही बता देते . इधर कुछ कामो में बीजी था अब फिर से में एक्टिव हो जय गा

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    • November 24, 2015 at 1:16 pm
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      वहाब चिश्ती साहब, सिकंदर साहब तो इस्लाम पे कभी भी उंगली नही उठाते. इतने समय से इस फोरम पे उनसे चर्चा कर रहा हूँ. जबकि अनेको बार मैने भी इस्लाम की व्याख्या पे चर्चा करनी चाही, तो उन्होने उस एंगल को खारिज ही किया. आपने इस्लाम के तथाकथित आलिमो और कठमुल्लाओं को ही इस्लाम का ठेकेदार मान लिया है, और उनसे एतराज को आप इस्लाम पे ही सवाल मान लेते हैं. इसलिए उनके विचारो पे ये राय रखते हैं.

      मैं लेकिन इस बात पे ज़ोर देता हूँ कि अगर चरमपंथी, इस्लाम के किसी हिस्से या व्याख्या की आड़ मे अपने नापाक मंसूबो को आगे बढ़ा रहे हैं, तो हमे मज़हब से जुड़े सवालो से बचने की कोशिश नही करनी चाहिए. बल्कि खुले दिल से कारण ढूँढने मे लगना चाहिए.

      आप सही कह रहे हैं. पूंजीवाद, तेल इत्यादि इसकी जड़ मे है. लेकिन इन सबकी बात करते समय हम इस बात का जवाब नही दे पाते कि इस्लाम के नाम पे ये संगठन, मुस्लिम समुदाय मे कैसे अपनी जगह बना लेते हैं, मज़हब को लेके संवेदनशील रहने वाली क़ौम, कैसे अपने मज़हब को दहशतगर्दों के हाथ मे जाने से नही रोक पाई?

      सीरिया, इराक़ वो जगह हैं, जहाँ इस्लाम आज नही पहुँचा है, वहाँ हज़ार साल से उसकी जड़े हैं. आज उसके बड़े हिस्से पे तमाम मौलाना, मौलवी, आलिम, बग्दादि के आगे समर्पण कर चुके हैं. जबकि इन्ही लोगो ने अमेरिका के बमों के आगे हार नही मानी थी. हमे हर पहलू और एंगल को टटोलना चाहिए. कम से कम आत्म-मंथन तो करना ही चाहिए. हम सब परफ़ेक्ट है, कहना सही नही है.

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  • November 24, 2015 at 2:36 pm
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    इस्लामेी आतन्क्वाद के लिये २ मुख्य बात है ! कुरान् से प्रेरना लेकर अतन्क्वाद फैलाना , उस्मे मुल दोश इसलाम् और कुरान का रहेगा यह बात हुयेी सिधान्त् केी
    आज् केी हालत मे इस्लमि आतन्क्वाद से निपतने के लिये इसलाम के विरुद्ध् मोरचा नहि खोला जा सक्ता यह निति और राज्नेीतेी भि काह्तेी है ! आज हालत मे बहुत से मुस्लिमो का सहयोग् लेकर वर्त्मान हिन्सक इस्लामेी अतन्क्वाद को नश्त् या बहुत कम्जोर किया जाये इस्के बाद कुरान को इस्लामिक् विद्वानो से हेी पुनर भाशेीत करने के उपाय किये जाये ताकेी भविश्य मे इसलामेी अतन्क्वाद का जन्म भेी न हो सके !

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  • November 24, 2015 at 2:48 pm
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    साथियों ! मेरी बस इतनी इल्तेजा है की आनेवाली पीढ़ियों के लिए आज इतिहास लिखने का नहीं इतिहास बदलने का समय है ! हम हर बात पर सीधे ऐसे इतिहास लिखने बैठ जाते हैं जैसे बीते समय की तरह कुछ भी बदलना हमारे बस में नहीं रहा ! और अब ये सदा ऐसे ही रहेगा इसीलिए इसके लिए कौन जिम्मेदार है इसको तय कर डालो ! क्यों और तो कुछ करना हमारे बस में नहीं !! लेकिन ये कोई नहीं समझता की जब आग लगी हो तो वो किसने लगाईं इस सवाल से ज्यादा उसे बुझाने के लिए पानी कहाँ से मिलेगा ये सोचना ज्यादा जरुरी है ! और मुझे नहीं लगता की दुनिया में कहीं ऐसा हुवा हो की किसी मुस्लिम के हाथो फेंके पानी से आग बुझने से इनकार कर दिया हो या फिर किसी हिन्दू के फेंके पानी से वो ज्यादा भड़क उठी हो !! किसी भी आग को हम हिन्दू हैं या मुस्लिम इससे कोई फर्क नहीं पड़ता ! फर्क पड़ता है आपके हाथ में पानी है या पेट्रोल इससे ! इसीलिए ऐसे विषयों के मंथन में भी हमारे कमेंट में पानी है या पेट्रोल इतना भी हम जांच कर ले तो भी कहीं किसी कोने में पड़ी चिंगारी को कल आग में बदलने से रोक पाएंगे ! इस लेख के लिए मुझसे खुश और नाराज होने वाले सभी मान्यवर पाठकों का इस लेख को पढ़ने का शुक्रिया !!

    मैं तिनका ही तो हूँ ! बेशक उड़ा दो मुझे एक फूंक से
    बस इतना याद रखना की हवाओं पे मेरा बस नहीं

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  • November 26, 2015 at 11:43 am
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    अभी हाल के रूस लड़ाका विमान को गिराए जाने के बाद, रूस को प्रतिक्रिया देते समय बहुत सावधानी बरतनी चाहिए. तुर्की ने विमान गिरा के बहुत ग़लती की. वहाँ के वर्तमान प्रधानमंत्री, मोदी जैसे ही हैं, हालाँकि उनके इस्लामीकरण के प्रयासो को वहाँ की जनता से ही प्रतिरोध झेलना पड़ा है. तुर्की, उन चुने देशो मे हैं, जहाँ मुस्लिम बहुल होने के बावजूद, सेक़ूलेरिज़्म है. रूस की कोई भी जवाबी कार्यवाही, वहाँ के रेडिकल ताकतों का रास्ता आसान कर सकती है. तुर्की ने जो मुकाम एक सदी के सेक़ूलेरिज़्म मे पाया है, उसे बरकरार या आगे बढ़ाए जाने की बहुत ज़रूरत है. विश्व के तमाम शांति-प्रिय देशो को इस मसले मे निजी ऩफा-नुकसान को छोड़, विश्व शांति के नज़रिए से सोचना चाहिए.

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  • November 26, 2015 at 1:44 pm
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    एक तरफ कहा जाता हे की आई एस सारी दुनिया के लिए खतरा हे दूसरी तरफ उसको मारने जा रहे प्लेन को अमेरिका का नाटो सहयोगी तुर्की गिरा देता हे जिसका ओबामा सपोर्ट करते हे अच्छा हर कोई आई एस पर हमले कर रहा हे अमेरिका रूस ब्रिटेन फ़्रांस सीरियन आर्मी फिर भी ये खत्म नहीं होता ऊपर से ये देखिये की उस इलाके में ईरान टोटल शिया इराक 60 % से भी अधिक शिया सीरिया शिया सरकार शियाओ से इनकी जानी दुश्मनी और वहाँ कुर्द हे तो कुरदीश आर्मी से भी इनकी जंग चल रही हे सऊदी अरब इनसे बचने को पुरे इराक बॉर्डर पर दीवार बना रहा हे ? फिर भी ये संघटन मज़बूत का मज़बूत ? ये गोरखधन्दा नहीं हे तो क्या हे ?

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    • November 26, 2015 at 5:35 pm
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      खत्म कैसे होगा हयात जी ये एक तरफ तो बम गिरा रहे है दुसरी तरफ हथियार और पैसे दे रहे है
      तेल की सारी समेगलिन्ग धर्मनिरपेक्ष टर्की की बोर्डर से हो रही है और ड्रगस(जिससे आदमी कई दिन बिना सोये लड सकता है) सऊदी से आ रहा है

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    • November 26, 2015 at 5:56 pm
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      क्योकि कुरान् केी नदेी से मचलिया खुब मिल जातेी है !
      रुस ने कहा था कि इन्केी सहाय्ता कर्ने वाले ४० देश् है
      अनुमान् है कि उस्मे सऊदेी अरब , तर्केी , अमेरिका आदि देश भेी शामिल् है
      उन सभि देशो के अप्ने अपने राज्नैतिक हित उन्कि रक्शा भेी करते है!

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    • November 27, 2015 at 9:31 am
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      खैर इसमे तो कोई शक ही नही कि पश्चिमी देश इस लड़ाई को अपने अपने ऩफा-नुकसान से लड़ने की फिराक़ मे पूरे ज़ोर से नही लड़ रहे. जहाँ 9/11 के बाद, अल क़ायदा और तालिबान से अमेरिका ने पूरे मन से लड़ाई का फ़ैसला किया, वैसा सीरिया और इराक़ मे आईसिस के खिलाफ नही कर रहा. आईसिस के खिलाफ, अगर बिना किंतु-परंतु के कोई देश लड़ रहा है तो वो है, ईरान. और उसका साथ देता रूस.
      इस्लामी चरमपंथ को लेके रूस की नीति, शुरू से एक जैसी रही है. उसने 80 के दशक मे भी अफ़ग़ानिस्तान मे चरमपंथियो के खिलाफ लड़ाई लड़ी, जबकि अमेरिका ने तालिबान खड़े किए. उस लड़ाई मे भी ईरान, अमेरिका या पाकिस्तान के साथ शरीक नही हुआ, उसने लड़ाई नही लड़ी, लेकिन उसका झुकाव, तालिबान विरोधी गुटो के साथ ही था.
      मैं सुन्नी परिवार मे पला-बढ़ा हूँ, और मैं ईरान की रूढ़िवादी शिया सरकार का समर्थक नही हूँ. लेकिन आज के दौर मे मुझे लगता है कि वैश्विक इस्लामी चरमपंथ मे सऊदी अरब का ही मुख्य योगदान है. ईरान समर्थित वैश्विक आतंकवादी संगठन कोई नही है. हिज़बुल्ला भी इजरायल और सुन्नी चरमपंथियो से ही उलझा हुआ है.

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    • November 27, 2015 at 2:18 pm
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      केवल मग़रिबी देश ही आई एस के नाम पर गोरख धंदा नहीं कर रहे हे यहाँ भी देखिये की वफादार पार्टी कार्यकर्त्ता रंजन सर भी बढ़ती मेह्गाई पर से जनता का ध्यान बटवाने को क्या लिख रहे की भाई जनता तुम्हारी जान खतरे में हे कुछ दिन दाल सब्ज़ी मांस मछली अंडे के बिना गुजार लो कुछ और खा लो देखो(2019 तक कम से कम ) मोदी जी पूरी कोशिश कर रहे हे की तुम्हारी जान बची रहे सो उनका धन्यवाद दो की वो तुम्हे परमाणु हमले से बचा रहे हे वार्ना आई एस तुम्हारे ऊपर एटम बम चला देगा ( मानो कोई गुलेल हो जो चला देगा ) सर लिखते हे ” दुनिया और हमारे सामने असली खतरा आईएसआईएस है, जिसके हाथ कभी भी पाकिस्तान के परमाणु हथियार लग सकते हैं, और हमारे लिये यह स्थिति बेहद खतरनाक होगी. पर इस बात से सभी बुद्धिजीवी आँखें मूंदे अपनी अपनी आग ताप रहे हैं.
      संतोष इसी बात का है कि अभी केन्द्र की सरकार निर्णय लेने वाली स्थिति में है. और, जो कोरग्रुप देश की सुरक्षा में लगा है, वह इन कुकुरविलापों में नहीं पड़ रहा.

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  • November 27, 2015 at 8:17 pm
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    देश की असल सुरक्षा और शान्ति के लिए जो लोग लगे हुए हे मोदी टोडीज़ जैसे लुच्चे नहीं बल्कि बहुत ही काबिल सभ्य लोग -रंजन सर उनके लिए ” कूकर विलाप ” शब्द का प्रयोग करते हे खेर एक बेंगलोर की मुस्लिम बोहरा महिला डॉक्टर लेख लिख कर आमिर का विरोध कर रही हे लेख मेने अफज़ल भाई को मेल किया हे अगर छपेगा तो हम उनकी बात काटेंगे हमने फ़िलहाल कॉमेंट दिया हे सिकंदर हयात • 6 hours ago
    मेडम को मुद्दे की कोई समझ नहीं हे ” वाला ” बोहरा होते हे शायद ? ये ऐसे ही होते हे शायद जैसे बनिए ? ”बनिया मानसिकता ” ( जाती विशेष नहीं ) वैसे भी किसी मुद्दे मसले को नहीं समझती हे या समझना नहीं चाहती हे वो सिर्फ ये चाहती हे की सब लोग उन्हें शान्ति से बिज़नेस करके नोट छापने दे बाकी बातो से इन्हे कोई मतलब नहीं होता में लेखिका की बातो का जवाब दूंगा यहाँ https://khabarkikhabar.com/arch

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