अलीगढ़ के मुस्लिम मार्क्सवादी —–1

ALIGARH
प्रस्तुति — सिकंदर हयात

अलीगढ़ के कुंवर पाल सिंह जी जन्म 1937 अलीगढ़ में ही पले बढे पढ़े और अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से तीन दशक तक जुड़े रहे और 1997 में कला संकाय के डीन और हिंदी विभाग के अध्य्क्ष पद से 1997 में सेवानिर्वत्त हुए उनकी किताब ”साहित्य और हमारा समय ” के एक लेख”कुलीन संस्कर्ति बनाम जन संस्कर्ति” में उन्होंने अलीगढ़ के मुस्लिम मार्क्सवादियों का रोचक वर्णन किया हे पेश हे कुंवर पाल सिंह जी के लेख के कुछ अंश ”कुंवर पाल सिंह- अलीगढ़ के पुराने मार्क्सवादियों में सबसे ईमानदार जिनमे वैचारिक स्पष्ठता भी थी वे थे प्रो अब्दुल अलीम . प्रो अब्दुल अलीम प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम लखनऊ सम्मलेन से ही उसकी पृष्ठभूमि में रहे . 1936 से 1950 तक सभी महत्वपूर्ण प्रस्ताव सविधान की संरचना उसमे परिवर्तन आदि में प्रो अलीम की अग्रणी भूमिका रही दुर्भागयवश उन्हें वह महत्व नहीं मिला जिसके वो अधिकारी थे हिंदी उर्दू के परेशान को हल करने और दोनों भाषाओ को निर्धारित करने में डॉ अलीम और रामविलास शर्मा की समिति बनाई है थी ———-अलीम साहब का एक दिलचस्प प्रसंग हे जो आप लोगो के साथ बाटना चाहता हु 1968 से लेकर 1974 तक वे अलीगढ़ विश्वविद्यालय के कुलपति रहे . कुलपति बनने के बाद जब पहली ईद पड़ी तो बहुत से छात्र और अध्यापक उन्हें ईद की नमाज़ पढ़ने के लिए साथ ले आये . अलीम साहब ने कहा मेने तो कभी नमाज़ नहीं पढ़ी अब क्यों पढू लोगो ने कहा अब आप वाइस चांसलर हे अलीम साहब मुस्कुराये और बोले ये मेरे और अल्लाह के बीच का मामला आप लोग क्यों परेशान होते हे वाइस चांसलर होने के साथ साथ में अब्दुल अलीम भी हु में ईद का त्यौहार मनाता हु किसी तरह की इबादत नहीं करता अलीगढ़ के वाइस चांसलर का चाहे वो धार्मिक हो या नहीं , मस्ज़िद में न जाना अकल्पनीय था !

उन दिनों इंदिरा गाँधी का समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता जोरो पर थी लेकिन अलीम साहब विश्विद्यालय की साम्प्रदायिक शक्तियों से बराबर समझौता कर रहे थे . हम लोग बहुत परेशान थे . एक इतवार की सुबह में में अलीम साहब के यहाँ पंहुचा मेने अपनी और साथियो की व्यथा कथा कही और कहा आप तो हम सबके नेता रहे हे हिन्दू मुस्लिम साम्प्रदायिकता के खिलाफ आपने हमें लड़ना सिखाया फिर आप ये अनुचित समझौते क्यों कर रहे हे अलीम साहब बहुत देर तक चुप रहे उनके चहरे पर यह पीड़ा झलक रही थी काफी देर बाद मुझसे बोले तुम ठीक कहते हो मुझे यह समझौते नहीं करने चाहिए मेरा जी चाहता हे की ये वाइस चांसलरी छोड़ दू पर संघर्ष करते करते थक गया हु इसलिए यह कर रहा हु हर मध्यवर्गीय क्रन्तिकारी की यही नियति होती हे जब वाइस चांसलर बना था तो सोचा भी न था की इस तरह के अनुचित दबाव होंगे मेने पूछा कैसे दबाव डॉक्टर साहब , वे बोले मेडम गाँधी और कोंग्रेस के बड़े मंत्रियो के दबाव वे तीन चार दिन पहले ही इंदिरा गाँधी से मिले थे मेडम ने उनसे कहा था डॉक्टर साहब आप मुसलमानो को खुश रखिये आपकी और डॉक्टर नुरुल हसन की वजह से वे मुझसे नाराज़ हे अलीम साहब ने श्रीमती गाँधी से कहा मेडम कोंग्रेस के मुस्लिम नेता और मंत्री अनुचित कामो के लिए कहते हे जिसमे साम्प्रदायिकता की भी बू आती हे यह मेने जीवन में कभी नहीं किया श्रीमती गाँधी को यह बात अच्छी नहीं लगी उन्होंने कहा में यह सब नहीं जानती . अलीगढ़ के मुसलमानो की शिकायत नहीं आनी चाहिए मुझे उनके वोट चाहिए अलीम साहब व्यथित स्वर में बोले जी तो यह किया की उन्हें तुरंत इस्तीफा सौप दू लेकिन मज़बूरी हे की में यह नहीं कर सकता मेने कहा डॉक्टर साहब में आपकी मज़बूरी समझ गया आइंदा आपसे ऐसे सवाल नहीं करूँगा उनकी यह कितनी ईमानदार स्वीकाररोक्ति थी आज तो लोग चोरी भी करते हे और सीनाजोरी भी अपने गलत कामो और नीतियों को सैद्धान्तिकता जामा पहनाकर अपनी बौद्धिकता का आतंक फेल रहे हे !

भीष्म साहनी की एक कहानी हे नया मकान एक भूतपूर्व क्रन्तिकारी की कथा व्यथा बहुत कलात्मक ढंग से चित्रित हे इस कहानी में —————————– भीष्म साहनी की कहानी से पूर्व इस प्रकार के व्यक्तियों के सम्बन्ध में कामरेड हनीफ हाश्मी ( शहीद सफ़दर हाशमी के पिता ) मुझे बताते रहे आपसे सच कहु तब मेने उनकी बातो के यकीन नहीं किया कामरेड हनीफ हाशमी पुराने कम्युनिस्ट थे और जनसंघर्षो के उनके व्यापक अनुभव थे न किसी से समझौता किया न किसी के सामने हाथ फैलाया . बेहद शांत सौम्य गंभीर . मार्क्सवाद में अपूर्व आस्था और पार्टी के प्रति समर्पित व्यक्तित्व . में अक्सर उनसे मिलने उनके घर जाता था वे बहुत सी बाते करते वे कहते ‘ कामरेड जब तक हम निरंतर अपने को डी क्लास नहीं करते रहेंगे अपनी आत्मालोचना नहीं करेंगे तब तक हम अच्छे कम्युनिस्ट नहीं रह सकते . अपनी थ्योरी और प्रेक्टिस की खाई निरंतर कम करते रहिये और कुलीन कम्युनिस्टों के प्रभाव से बचते रहिये इन लोगो के बीच में अजीब अंतर्विरोध हे , दो नावों पर बराबर सवार रहने की कोशिश करते हे . वर्ग संघर्ष की जगह वर्ग सहयोग की राजनीति में इनकी अधिक दिलचस्पी हे जन संघर्षो से बचते हे जनता की वास्तविक समस्या से इनका परिचय अखबार और किताब के माध्यम से ही हे में कई बार उनसे सवाल करता , कामरेड हाशमी इनकी भी महत्वपूर्ण भूमिका रही हे ‘ वे हसंते हे , हमें स्वीकार करना चाहिए लेकिन क्रन्तिकारी आंदोलनों में इनकी बहुत सीमित भूमिका रही हे ये लोग बहुत परिश्रमी लोग हे इनका अध्ययन भी बहुत व्यापक हे लेकिन साधारणजन को इनके ज्ञान का लाभ नहीं होता ये अपने ही वर्ग के लोगो को समझते रहते हे और उन्ही की प्रशंसा चाहते हे ———————-

आप कामरेड हनीफ हाशमी के बारे में जानना चाहते होंगे वे इतिहास विभाग में एक मामूली कर्मचारी थे और जिस सेक्शन में वो काम करते थे उनके बॉस के वे भ्र्ष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ उठने पर जब किसी कम्युनिस्ट ने उनका साथ नहीं दिया तो वे नौकरी छोड़ कर दिल्ली ( अलीगढ़ से ) चले आये जहां उनकी पत्नी अध्यापिका थी हाशमी साहब बेहद जुझारू व्यक्ति थे अपने सिद्धांतो के लिए कोई खतरा उठने में समर्थ थे मुझे एक घटना याद आ रही हे 1965 के भारत पाक युद्ध के बीच पार्टी पर बहुत दबाव पड़ा पुरे देश में उन्माद की इस्थिति थी पाकिस्तान और मुसलमानो के पार्टी नफरत की हवा बाह रही थी कामरेड ई एम एस नम्बूदरीपाद ( दुनिया की पहली चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार 1957 केरल बनने वाले ) उत्तर भारत का दौरा कर रहे थे हम लोगो ने उन्हें अलीगढ़ भी आमंत्रित किया कामरेड ई एम एस नम्बूदरीपाद के कार्यक्रम के लिए तैयारी समिति की बैठक होनी थी कांग्रेस सरकार और आर एस एस का उन दिनों बड़ा भ्रातभाव था इस उन्माद और युद्ध का विरोध करने वाले हर व्यक्ति को देशद्रोही ठहरा रहे थे . हमारे कई मार्क्सवादी बुद्दिजीवियों के घर ऐसे थे जहां बैठक हो सकती थी मगर नहीं हुई . कामरेड हाशमी ने अपने छोटे से घर में बैठक रखी उन्होंने न सरकारी दमन की परवाह की न आर एस एस की गुंडागर्दी की . उनके ही सुझाव पर हम लोग झंडे में मज़बूत डंडे लगाकर स्टेशन पहुंचे थे कामरेड ई एम एस आये और हम लोग भी अच्छी संख्या में थे लेकिन यूथ कांग्रेस और आर एस एस के लोगो का प्रदर्शन भी स्टेशन पर हुआ . आर एस एस के लोगो ने घोषणा की थी की हम लोग ई एम एस को शहर में नहीं घुसने देंगे हम नौजवानों ने कामरेड ई एम एस को चारो और से घेर रखा था कांग्रेस और आर एस एस के लोग निरंतर धक्के मार रहे थे और गालिया बक रहे थे और ई एम एस की और बढ़ रहे थे पुलिस मूकदर्शक बानी एक और खडी थी जब इस्तिथि बेकाबू होने लगी तो कामरेड हाशमी ने झंडे को जेब में रखा और डंडा निकाल कर पिल पड़े और आह्वान किया मारो —- इस इस्तिथि के लिए ये देशभक्त सूरमा तैयार नहीं थे और दस मिनट में दम दबा कर भाग गए अलीगढ़ में ई एम एस की शानदार मीटिंग हुई जिसकी अध्यक्षता प्रो अब्दुल अलीम ने की थी ————- जारी
(वाणी प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक” साहित्य और हमारा समय ” लेखक कुंवर पाल सिंह , से साभार )

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16 thoughts on “अलीगढ़ के मुस्लिम मार्क्सवादी —–1

  • July 31, 2016 at 2:56 pm
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    हम ने जब अलीगढ यूनिवर्सिटी में दाखल लिया उस समय केपी सिंह का बहुत नाम था , आर्ट्स फैकल्टी के हर फंक्शन में वे शामिल होते थे और बहुत अच्छी तक़रीर करते थे ! हिंदी विभाग में जैदी साहब के साथ उनकी अच्छी दोस्ती थी ! मेरा दोस्त इमरान हिंदी विभाग में ही था इसलिए उसके साथ १-२ बार उनसे मेरी भी मुलाक़ात हुई थी ! खैर अच्छी किताब है में चाहुगा के सिकंदर हयात साहब इसकी श्रंखला जारी रखे ताके कुछ लोगो के बारे में लोगो को जानकारी हो जिसे लोग नहीं जानते !

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  • July 31, 2016 at 3:16 pm
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    बिलकुल अफ़ज़ल भाई कोशिश होनी चाहिए की लोगो को , लोगो की और किताबो की और सोच समझ , विचार विमर्श करने की और अट्रेक्ट किया जाए अगर ये काम ना हुआ तो आने वाली पीढ़ी पूरी तरह से उपभोक्तावाद और धार्मिक कठमुल्लवाद की गुलाम होकर रह जायेगी और एक बात की पाठको की हनीफ हाशमी के बेटे रंगकर्मी सफ़दर हाशमी जब एक नाटक खेलते हुए मारे दिए गए थे तो उनकी पत्नी मलय श्री हाशमी ने अगले ही दिन सेम उसी जगह वही नाटक खेल था अदभुत

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  • August 25, 2016 at 10:32 pm
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    कुंवर पाल सिंह जी के संस्मरणों से अंदाज़ा यही लगता हे की अलीगढ के मुस्लिम मार्क्सवादी कुल मिलाकर अपना फ़र्ज़ निभाने में नाकमयाब रहे शायद इसी का फायदा ओवैसियों से लेकर ” जाकिर नायको ” की फौज को मिला क्योकि जो भी ही भारतीय मुस्लिम समाज पर अलीगढ से निकले पढ़े लिखे कामयाब कल्चर्ड लोगो का बड़ा भारी असर तो हे ही . अब अगर अलीगढ़ के मुस्लिम मार्क्सवादी jnu की तरह amu को भी ” सेकुलरिज्म का किला ” बनाने में सफल रहते तो मुस्लिम साम्प्रदायिकता कमजोर होती जिससे फिर हिन्दू साम्प्रदायिकता भी वीक होती और आज हम पहली बहुमत संघी सरकार से ना झूझ रहे होते ——— ?

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  • November 19, 2016 at 1:47 pm
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    Shamshad Elahee Shams
    15 hrs ·
    कामरेड चौधरी फतह मोहम्मद का जन्म अमृतसर में हुआ था, मुल्क का बंटवारा हुआ तो पकिस्तान पहुँच गए. पूरी जिन्दगी टोबा टेक सिंह -सियाल कोट पाकिस्तान में मुकीम रहे. इसी साल ९१ साल की उम्र में इनकी मृत्यु हो चुकी है. फालिस के अटैक पर अटैक होते रहे, जब भी होश आता तो इमले की शक्ल में बोलते रहे जिसे लिखने वाला लिखता रहा और आखिरकार एक किताब को अंजाम दे गए जिसका उन्वान है- ‘ जो हम पे गुजरी ‘. यह किताब इसी साल जनवरी में इशाया हुई.
    विभाजन के दौरान अपने परिवार में हुई कई मौतों के ज़ख्म उन्हें मिले. दूसरे विश्व युद्ध में थोड़े समय के लिए ब्रिटिश फ़ौज में भी काम किया. लंदन में किसी रूद्रराय जोशी ने नसीहत की कि नौजवान हो, ज़हीन हो -पढो लिखो और समाज को बदलने का काम करो.
    नतीजतन ये हुआ कि १९४८ में कम्युनिस्ट पार्टी के रुकुन बन गए और जहाँ खूंटा गाढ़ा, ता उम्र जोश, ज़ज्बे, कूव्वत और अमल के साथ वही रहे. पकिस्तान में किसान संघर्ष का अगर कोई इतिहास लिखे तो उसे कामरेड चौधरी फ़तेह मोहम्मद के जिक्र के बिना पूरा नहीं लिखा जा सकता. अपनी जिन्दगी के १६ साल उन्होंने कम्युनिस्ट होने के जुर्म में मुख्तलिफ हुक्मरानों के दौर में जेलों को दिए है.
    उन्होंने इस किताब में भारत और पकिस्तान की सियासत और खासकर कम्युनिस्ट आन्दोलन पर गहरी नुक्ताचीनी की है. पंजाब के कई बड़े कामरेडों के हवाले इस किताब में मौजूद है. इसका अनुवाद भारतीय भाषाओ में खासकर पंजाबी और हिन्दी में जरुर किया जाना चाहिए.
    (कामरेड नौशाद -मोंट्रियाल से हुई बातचीत के आधार पर लिखी गयी पोस्ट )Shamshad Elahee Shams kanada

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  • December 9, 2017 at 7:39 pm
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    Kavita Krishnapallavi
    4 hrs ·
    प्रोफेसरों के बारे में चन्द बातें जिन्हें पढ़ना प्रोफेसरों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है !
    जब क्रांति की लहर आगे की ओर गतिमान होती है तो प्रोफ़ेसर लोग क्रांतिकारियों के व्यवहार और सिद्धांत से सीखते हैं I जब गतिरोध का समय होता है तो बहुतेरे क्रांतिकारी प्रोफेसरों से क्रांति के विज्ञान की शिक्षा लेने लगते हैं I
    दुनिया का इतिहास बनाने वाले आम लोगों को आजतक प्रोफेसरों ने नहीं बल्कि क्रांतिकारियों ने नेतृत्व दिया है I
    दुनिया का सारा ज्ञान उत्पादन और वर्ग-संघर्ष की प्रयोगशालाओं-कार्यशालाओं में पैदा हुआ है I प्रोफ़ेसर लोग तो उसकी मात्र व्याख्याएँ करते हैं, जो प्रायः अधूरी, आंशिक या विरूपित हुआ करती हैं I प्रोफ़ेसर लोग दुनिया के क्रांतिकारी प्रयोगों से पैदा हुए ज्ञान के आधार पर अपने नए-नए बेवकूफी भरे अमूर्त सिद्धांत गढ़ते हैं और उसी की रोटी खाते हैं I
    बेशक प्रोफेसरों को भी ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए, लेकिन भरपूर आलोचनात्मक सजगता के साथ I तभी उनकी अधूरी, एकांगी, मनोगतवादी व्याख्याओं से भी कुछ हासिल किया जा सकता है I प्रोफेसरों का लेखन प्रायः खंडन और आलोचना के लिए उकसाता है और इस प्रक्रिया में क्रांतिकारियों को अपनी समझ साफ़ करने में मदद मिलती है I
    मार्क्सवाद के धुरंधर माने जाने वाले दुनिया के अधिकांश प्रोफ़ेसर शास्त्रीय मार्क्सवाद की प्रचलित शब्दावली का इस्तेमाल करने में अपनी हेठी समझते है, इसलिए वे अपनी नयी टर्मिनोलॉजी गढ़ते हैं और अपनी कहन-शैली अनूठी बनाते हैं जिससे कुछ नयेपन के चमत्कार का अहसास हो I
    प्रोफ़ेसर लोग क्रांतियों के इतिहास-विषयक अपने ज्ञान से शासक वर्ग को यह बताने में बहुत अहम भूमिका निभाते हैं कि क्रांतियों को रोका कैसे जा सकता है ! इस काम में रिटायर्ड क्रांतिकारी उनका साथ बखूबी निभाते हैं I
    प्रोफ़ेसर यदि क्रांति का साथ भी देता है तो उसकी पूरी रॉयल्टी वसूलता है I वह सांस्कृतिक-बौद्धिक जन-संगठनों में ऊँचे-ऊँचे पद चाहता है और कार्यकर्ताओं के मार्क्सवाद के क्लास लगाना चाहता है I समाजवाद यदि आ जाये तो प्रोफ़ेसर तभीतक उसका साथ देंगे जबतक उनके बुर्जुआ विशेषाधिकारों पर आंच न आये I जैसे ही उनकी विशेष सुविधाएँ छिनेंगी, तनख्वाहों और सभी नागरिक सुविधाओं में बराबरी लाने की शुरुआत होगी वैसे ही प्रोफ़ेसर लोग समाजवाद से असंतुष्ट और नाराज हो जायेंगे और उसे व्यक्तिगत स्वातंत्र्य-विरोधी, निरंकुश, सर्वसत्तावादी आदि-आदि घोषित करने लगेंगे I
    प्रोफ़ेसर का हम लगभग एक रूपक के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं I यह बात अधिकांश उच्च-मध्य वर्गीय बुद्धिजीवियों के साथ लागू होती है I
    भारत में जो भी थोड़े-बहुत जेनुइन विद्वान मार्क्सवादी प्रोफ़ेसर थे इतिहास, अर्थशास्त्र, साहित्य या समाज विज्ञान के अन्य क्षेत्रों में, जिनसे तमाम राजनीतिक-वैचारिक मत-भिन्नता के बावजूद कुछ सीखा जा सकता था, वे या तो दिवंगत हो चुके हैं या क़ब्र में पैर लटकाए हुए हैं I ये जो नए -नए नव-मार्क्सवादी, उत्तर-मार्क्सवादी, उत्तर-आधुनिकतावादी प्रोफेसरों की नयी पीढी खद्योत समान नीम अँधेरे और नीम उजाले में भकभका और भटक रही है, ये सभी समाज-विमुख, संघर्ष-विमुख, कायर, कैरियरवादी, अपढ़, कुपढ, मूर्ख और सत्ताधर्मी हैं I ज्यादातर मामलों में ये काहिल, विलासी, लम्पट और दारूकुट्टे भी हैं — बौद्धिक अध्यवसाय और परिशुद्धता से पूर्णतः दूर I ये ख़तरनाक वायरस फ़ैलाने वाले गंदे जीव हैं जो बौद्धिक क्षेत्र के ज़हीन नौजवानों के बीच व्यक्तिवाद, कैरियरवाद, जन-विमुखता, कूपमंडूकता और ‘विद्वत्तापूर्ण मूर्खता’ की सांघातिक बीमारी फैला रहे हैं Kavita KrishnapallaviKavita Krishnapallav-i-=Ravi Ranjan आपके तर्क से असहमति का कोई कारण नहीं है.दिनानुदिन समस्या और ज्यादा गंभीर होती चली जा रही है.इस पेशे में सबसे भयानक बात है ‘इन्तेलेक्चुअल रिगर’ की कमी और खुद के कहे या लिखे को शाश्वत,सनातन और अकाट्य मानने-मनवाने की जिद.जाहिर है कि ज्यादातर बुद्धिजीवी खुद तो सुविधाभोगी होते हैं पर विद्यार्थियों को क्रांतिकारी बनकर अपना सबकुछ उनपर लुटा देने की सीख देते हैं.मंच से और अपने लेखन में ऊँची-ऊँची बातें करनेवाले बहुत सारे प्रोफ़ेसर नियुक्ति में भाई भतीजावाद,जातिवाद,भ्रष्टाचार,यौन शोषण आदि में लिप्त पाए जाते हैं.एक-दूसरे को नीचा दिखाना इनका प्रिय शगल है
    23 hrs ·
    साइबर युग की फ़ासीवादी बर्बरता
    उत्‍पादक शक्तियों के विकास के साथ ही साथ बर्बरता के स्‍वरूप में भी तब्‍दीली आती है। 1930 के दशक में यूरोप में फ़ासीवादियों ने अल्‍पसंख्‍यकों, कम्‍युनिस्‍टों, राजनीतिक व‍िरोधियों और मानवीय मूल्‍यों की बात करने वाले हर नागरिक के दिल में ख़ौफ़ व दहशत तथा उनके ख़‍िलाफ़ पूरे समाज में नफ़रत फैलाने के लिए कंसनट्रेशन कैम्‍प और गैस चैम्‍बर का सहारा लिया था। लेकिन आज 21वीं सदी के साइबर युग में फ़ासीवादियों को कंसनट्रेशन कैम्‍प और गैस चैम्‍बर के तामझाम की ज़रूरत नहीं है। उन्‍हें बड़े पैमाने पर दंगों और नरसंहार की भी ज़रूरत नहीं है। वे अब बस बर्बर ढंग से कुछ ‘टार्गेटेड’ हत्‍याएँ करके उनका वीडियो बनाकर उसे सोशल मीडिया, व्‍हाट्सएप और ब्‍लॉगों-वेबसाइटों के ज़रिये वायरल करके पूरे समाज में ख़ौफ़, दहशत और नफ़रत का माहौल बना सकते हैं। यही नहीं जिस तरह से कंसनट्रेशन कैम्‍प और गैस चैम्‍बर मुनाफ़ा कमाने के भी साधन थे उसी तरीके से ख़ौफ़, दहशत और नफ़रत फैलाने वाले वीडियो वायरल करने का कारोबार भी खूब फल-फूल रहा है जिसमें तमाम वेबसाइटें और मीडिया चैनल ज़बर्दस्‍त मुनाफ़ा कमा रहे हैं।
    राजसमंद की वीभत्‍स घटना के बाद कुछ लोग अचम्भित हैं कि एक इंसान दूसरे इंसान के साथ इतनी वहशियाना हरकत कैसे कर सकता है। कुछ लोग इसका कारण हत्‍यारे के पागलपन भरे जुनून में ढूँढ रहे हैं तो कुछ इसके लिए हिन्‍दुत्‍व की विचारधारा को जिम्‍मेदार ठहरा रहे हैं। इसमें कोई शक़ नहीं कि तमाम फ़ासीवादी विचारधाराओं की तरह हिन्‍दुत्‍व की विचारधारा भी ऐसा पागलपन भरा जुनून पैदा करती है जिसकी परिणति इस क़‍िस्‍म के बर्बर कृत्‍यों में होती है। लेकिन हमें अगला सवाल भी पूछने का साहस होना चाहिए कि वो कौन सी परिस्थितियाँ हैं जो हिन्‍दुत्‍व की विचारधारा को खाद-पानी देने का काम कर रही हैं। जब हम इस सवाल का जवाब ढूँढने की दिशा में आगे बढ़ते हैं तो बरबस ही बेर्टोल्‍ट ब्रेष्‍ट की वो बात याद आती है – बर्बरता बर्बरता से नहीं पैदा होती, बल्कि उन व्‍यापारिक सौदों से पैदा होती है जिन्‍हें बिना बर्बरता के अंजाम देना सम्‍भव नहीं हो पाता। आज साइबर युग की बर्बरता से अचम्भित होने की बजाय हमें इस बर्बरता के पीछे छ‍िपे उन सम्‍पत्ति सम्‍बन्‍धों को समझने की ज़रूरत है जिनको क़ायम रखने के लिए ऐसी बर्बरता आवश्‍यक है। जो लोग आज की बर्बरता से वाकई व्‍यथित हैं उनको यह ज़रूर सोचना चाहिए कि क्‍या लोभ-लालच, मुनाफ़े और निजी सम्‍पत्ति पर टिकी पूँजीवादी व्‍यवस्‍था के रहते इस बर्बरता से छुटकारा पाया जा सकता है? निश्‍चय ही ऐसी तमाम बर्बरताओं को बढ़ावा देने के लिए मौजूदा सरकार और शासन कर रही पार्टी को जिम्‍मेदार ठहराया जाना चाहिए। लेकिन हमें इस पर भी सोचना चाहिए कि क्‍या मौजूदा सरकार को बदल देने मात्र से समाज के पोर-पोर में घुल चुकी नफ़रत ख़त्‍म हो जाएगी? क्‍या हमें इस बर्बरता की जड़ यानी समूचे पूँजीवादी निजाम को ही नेस्‍तनाबूद करने के बारे में नहीं सोचना चाहिए?
    — Anand Singh की लेखनी से

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  • April 15, 2018 at 8:38 pm
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    Rahul Singh 10 April at 23:53 · विवेक अग्निहोत्री जी ने 2016 में नक्सल समस्या पर एक बेहतरीन फिल्म बनायी. फिल्म का नाम है “बुद्धा इन ए ट्रैफिक जाम”. इस फिल्म में अनुपम खेर ने अपने सशक्त अभिनय से जान डाल दी है. अनुपम खेर हैदराबाद के एक बड़े मैनेजमेंट कॉलेज में प्रोफेसर है. वो एक छुपा हुआ शहरी नक्सली है, जो करप्शन से नफरत करता है और पूरी दुनिया में सशस्त्र हिंसक क्रांति के द्वारा सत्ता परिवर्तन का ख्वाब अपनी आँखों में संजोए हुए है.लेकिन वो अपने स्टूडेंट्स के सामने हमेशा कहता रहता है “करप्शन इज गुड”, और इसके पक्ष में जबरदस्त तर्क प्रस्तुत करता है. प्रायः सभी स्टूडेंट्स उसके तर्कों से कन्विंस हो जाते हैं, लेकिन उसकी नजर उस स्टूडेंट को खोजती रहती है जो करप्शन को ठीक नहीं मानता हो और थोड़ा भावुक हो. ऐसे स्टूडेंट के चुनाव हो जाने पर वो उसे अकेले में अपने पास बुलाता है और वामपंथी साहित्य पढ़ने को देता है और धीरे-धीरे उसे अपने चपेट में ले लेता है.
    इस फिल्म में यह भी दिखाया गया है कि कैसे हमारे चारों तरफ किसी भी रूप में नक्सली हो सकते हैं, जिसके बारे में हम कभी सपने में भी नहीं सोच सकते कि ये हमारे साथ दिन-रात रहने वाला दोस्त, शिक्षक, प्रेमिका आदि नक्सली हैं और बड़े मुस्तैदी से अपने मिशन में लगे हैं. फिल्म बस कुछ उदाहरण देकर बताता है कि इनका जाल इतना बड़ा है कि हम उसे समझ ही नहीं सकते.इनका सबसे नरम शिकार कॉलेज के विद्यार्थी होते हैं. यही कारण है कि इन्होंने सबसे ज्यादा ध्यान शिक्षण संस्थाओं पर कब्जा करने में किया. ये जानते हैं कि राजनीतिक सत्ता अस्थायी है जबकि शिक्षण संस्थाओं पर कब्जा करके जब विद्यार्थियों के दिमाग में वायरस डाल दिया जाता है तो वो विद्यार्थी एक सुसाइड बम बनकर पहले अपने को, फिर परिवार, संस्कृति, धर्म और राष्ट्र को भीतर ही भीतर खोखला करने लग जाता है. और ऐसे ही खोखले राष्ट्र पर जब वह एकदिन राजनीतिक आधिपत्य स्थापित करेगा तो वह सत्ता स्थायी होगा.
    ये किस खतरनाक तरीके से काम करते हैं मैं उसका बस एक प्रत्यक्ष उदाहरण दे रहा हूँ. इस साल मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के बी.ए. के द्वितीय वर्ष के छात्राओं को हिन्दी पढ़ा रहा हूँ. उनके स्लेबस में महाभारत से मात्र एक ही प्रसंग है, वो भी एकलव्य वाला. इसमें कोई बुरी बात नहीं है, हमलोग भी बचपन से एकलव्य की गुरुभक्ति का प्रसंग पढ़ते आये हैं. लेकिन इनलोगों के द्वारा निर्मित पाठ में, इनलोगों का एकलव्य के गुरुभक्ति से कोई विशेष प्रयोजन नहीं है. इनका सारा फोकस यह साबित करने में है कि उस समय कैसे निम्न जाति के लोगों को शिक्षा से वंचित रखा जाता था.दूसरी बात, जो अर्जुन इतना योग्य है कि सशरीर स्वर्ग में चला गया है. एक गृहस्थ होकर भी इतना संयमी है कि स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी का प्रणय निवेदन ठुकरा देता है. भगवान श्री कृष्ण जिसके सखा हैं और जिसके लिए उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश किया, ऐसा महामानव भी नीची जाति के एकलव्य के अँगूठा काटे जाने पर थोड़ी भी सहानुभूति प्रदर्शित नहीं करता है. इतना महान आत्मा भी किसी निर्दोष के लिए कितना असंवेदनशील है. गुरु द्रोणाचार्य युद्ध कला में इतने निपुण हैं कि उनसे संपूर्ण विश्व के क्षत्रिय युद्ध कला सीखने के लिए आते हैं. लेकिन वो एक निम्न जाति के एकलव्य के लिए अत्यंत निर्दयी और घोर असंवेदनशील हैं.
    इसके अलावा गुरु द्रोणाचार्य अपने पुत्र के प्रति पक्षपाती हैं. सेवा कार्य के तौर पर शिष्यों को पानी भर कर लाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. गुरु द्रोण प्रतिदिन शिष्यों को एक-एक कमण्डलु इस कार्य के लिए देते थे, जबकि पुत्र अश्वत्थामा को वे एक बड़े मुँह वाला कलश देते थे. कमण्डलुओं का मुँह छोटा होने के कारण शिष्यों को अपना काम करने में विलम्ब होता था जबकि पुत्र अश्वत्थामा उसे जल्द पूरा कर लेता था. इस अवकाश का फायदा उठाकर गुरु द्रोण पुत्र अश्वत्थामा को उन श्रेष्ठ अस्त्रों का गूढ़ प्रयोग सिखाते थे जिन्हें वे अन्य शिष्यों को नहीं बताना चाहते थे.
    अब गुरु द्रोणाचार्य का ऐसा कलंकित चरित्र रट कर परीक्षा पास करनेवाला विद्यार्थी जब ग्रेजुएट होगा और उसके बाद विवाह करेगा, फिर अपने बच्चों को बचपन से ही दधीचि, भगीरथ आदि का त्याग नहीं समझा पायेगा, क्योंकि उसके अवचेतन मन में बहुत गहरे में गुरु द्रोणाचार्य की मक्कारी को इंजेक्ट कर दिया गया है.
    इस वैचारिक महासमर में, न प्रत्यक्ष कोई युद्ध होता दिख रहा है, न अस्त्र-शस्त्र दिख रहे हैं, लेकिन हमारी घायल संस्कृति दिन पर दिन और अधिक लहूलुहान और खोखली होती जा रही है. दुर्भाग्य से हम एक ऐसा ऐतिहासिक युद्ध लड़ रहे हैं, जिसके बारे में अधिकांश लोगों को पता तब चलेगा जब वे ये जंग बुरी तरह हार चुके होंगे.
    Rahul Singh —————————–
    Rajeev
    11 April at 08:54 ·
    सत्ता क्या होती है?
    एक मित्र ने समझाया था…दूसरे के behalf पर निर्णय लेने की शक्ति को सत्ता कहते हैं.
    सत्ता उसकी नहीं है जो कुर्सी पर बैठा है. सत्ता उसकी है जो निर्णय ले रहा है….
    उससे भी बड़ी सत्ता उसकी है जो वे सिद्धांत बनाता है जिसके आधार पर निर्णय लिए जाते हैं…इस शक्ति को एंटोनियो ग्राम्स्की ने हेजेमनी कहा था.

    इस देश में हर कुर्सी पर भाजपाई बैठे हैं, सत्ता कांग्रेसियों की है और हेजेमनी वामपंथियों की है.

    मोदी और शाह चुनाव जीत रहे हैं, कुर्सियाँ बटोर रहे हैं. सत्ता और हेजेमनी को चुनौती नहीं दे रहे हैं, नहीं दे पा रहे. कांग्रेसी सत्ता की परतें खुरचने में तो थोड़ी थोड़ी सफलता मिली भी है, पर वामपंथी हेजेमनी को छूना भी है इसकी समझ भी नहीं है…प्रकाश जावड़ेकर जैसा मानव संसाधन मंत्री होना ही इसका प्रमाण है.

    हम कांग्रेस और वामपंथियों के चरित्र के आकलन में एक छोटी सी चूक कर रहे हैं. चुनाव जीतना इसका मूल उद्देश्य नहीं है. वे समाज में कुत्सित विभेद और संघर्ष चुनाव जीतने के लिए नहीं फैला रहे. उनका मूल उद्देश्य ही यही है. सत्ता तो इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एक साधन मात्र है. अगर सत्ता हाथ में होती है तो वे यह काम आराम और फुरसत से करते हैं. कोई डेस्पेरेशन नहीं होती. अगर सत्ता नहीं होती है तो इसी काम के लिए थोड़ा अधिक प्रयत्न करना पड़ रहा है. पर आपके शासनकाल में भी वे यह काम कर ही ले रहे हैं. उनका काम नहीं रुका है, उन्होंने बस जरा सा डायवर्सन ले लिया है. आपने सड़कों पर कब्जा किया, वे गलियों से पहुँच गए. आप गलियाँ रोकेंगे वे पगडंडियों से चलते रहेंगे…आपने उनकी गाड़ियाँ ले लीं, उन गाड़ियों के गद्देदार सीट का मजा ले रहे हैं, उसे चलाना सीख रहे हैं, कुछ उसमें सवारी का मजा ले रहे हैं. और उधर वे अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ रहे हैं. साईकल से, हाथी से, हाथ हिलाते, झाड़ू पकड़े…रिक्शा, ठेला, पैदल…

    चुनाव तो एक refuelling स्टेशन है, सत्ता एक गाड़ी है…उनका असली लक्ष्य है देश में संघर्ष, गृहयुद्ध, देश की बर्बादी. उनके कमिटमेंट को कम मत आंकिए. कांग्रेसी और वामपंथी वे कमीने हैं जो खुद को बर्बाद कर के भी देश को बर्बाद करेंगे. उन्हें रोकना है तो आपको दिखाई देना चाहिए कि वे जा कहाँ रहे हैं, करना क्या चाहते हैं…और उन्हें रोकना है तो उनकी टाँगें तोड़नी होंगी…बहुत गाँधी गाँधी करते हैं ना…तो गाँधी के पास भी एक लाठी थी…वही काम आएगी…
    Rajeev
    7 April at 13:14 ·
    #विषैलावामपंथ
    आपने फौज की रिक्रूटमेंट देखी है कभी? रिक्रूटमेंट ऑफिस के बाहर क्या बड़ी बड़ी पोस्टर्स लगी होती है. बढ़िया चमकती यूनिफार्म में, स्मार्ट एसडी सूट और पीक कैप में हैंडसम फौजी, रेडियो टेलीफोन लिए, टैंक और हेलीकॉप्टर चलाते, पैराशूट से कूदते जांबाज़ फौजी, तलवार लेकर 26 जनवरी की परेड करते ग्लैमरस फौजी…
    और अंदर बहाली के लिए खड़ी भीड़ देखी है? पहले एक मील की दौड़, फिर कपड़े उतार कर मेडिकल, फिर एक लिखित एग्जाम…फिर बहाली…ट्रेनिंग…ट्रेड का बंटवारा…

    बन्दा फौज में जाकर सिर्फ गनर और पैराट्रूपर नहीं बनता…फौज में मोची, नाई, धोबी, क्लर्क सभी होते हैं. और वे रोज रोज टैंक नहीं फायर करते, पैराशूट से नहीं कूदते…घास भी काटते हैं, क्वार्टर गार्ड में चूना गेरू भी करते हैं, बैरक की नालियों की सफाई भी करते हैं, गार्ड ड्यूटी, सहायक ड्यूटी सब कुछ करते हैं…पर रिक्रूटमेंट ऑफिस के पोस्टर पर वह चमचमाती तस्वीरें ही नज़र आती हैं.

    वामपंथी प्रचार भी एक फौजी रिक्रूटमेंट जैसा है. लोगों को बहाली के लिए चमकदार तस्वीरें दिखाई जाती हैं. मजदूरों को कंम्यूनिज्म का स्वर्ग दिखाया जाता है, किसानों को अपनी जमीन के मालिक होने के सुख समझाए जाते हैं, दलितों को सदियों के अत्याचारों की कहानियाँ और उनका बदला लेने के अवसर समझाए जा रहे हैं, स्त्रियों को समानता की तस्वीर दिखाई जा रही है…हर वर्ग को किसी ना किसी रूप से वंचित, पीड़ित, शोषित होने की कहानी सुनाई जा रही है…हर वर्ग में उनकी एक पीड़ित पहचान स्थापित की जा रही है… माइनॉरिटी को मेजोरिटी से, स्त्री को पुरुष से, अवर्ण को सवर्ण से लड़ने और जीतने के रास्ते सिखाये जा रहे हैं…

    यह सब रिक्रूटमेंट टेक्निक है. जो जिस तरह से भर्ती हो जाये, ठीक है. भर्ती होने के बाद ऐसा नहीं है कि उनसे पूछ कर उन्हें लड़ाई पर भेजा जाएगा. उनकी सोच कर टैक्टिकल और स्ट्रेटेजिक गोल निर्धारित किये जायेंगे. और है यह फौज, तो यह भी नहीं कि इसके अंदर सबमें समानता होगी, कोई हायरार्की नहीं होगी. फौज बिना हायरार्की के हो ही नहीं सकती…तो एक नई हायरार्की, एक नई शोषक श्रेणी, एक नया शोषित वर्ग होगा…पर तबतक तो मछली के गले में कांटा फँस चुका होगा. तो मछली को पानी के अंदर रहना है तो उसे ज्यादा छटपटाने की छूट नहीं होगी…

    फौज से यह तुलना एक दृष्टि से अनुचित भी है…क्योंकि एक फौज का एक उद्देश्य होता है, एक आदर्श होता है, फौज में आप एक पवित्र ध्येय के लिए लड़ते हैं और फौज आपका ख्याल भी रखती है…यह फौज से ज्यादा एक गैंग जैसा है. पर इसके रिक्रूटमेंट की तकनीक बस रिक्रूटमेंट ऑफिस के विज्ञापन जैसी है. जो एक बार अंदर घुसेंगे, उन्हें समझ में आएगा कि फौज से निकलना आसान नहीं होता, और भगोड़ा होने की सजा क्या होती है…

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  • May 4, 2018 at 9:23 am
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    Tiwari
    2 May at 21:32 ·
    जिन्ना ने पाकिस्तान जरूर बनाया लेकिन मोहम्मद अली जिन्ना को पाकिस्तान का जिन्न बनाने का काम अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी ने ही किया था।

    सर सैयद अहमद का एएमयू न होता, तो मुस्लिम लीग न होता और मुस्लिम लीग न होता पाकिस्तान कभी न बन पाता।

    इसके बाद भी आपको एएमयू के जिन्ना प्रेम पर आश्चर्य हो रहा है तो आपके आश्चर्य पर हमें आश्चर्य हो रहा है।—————————————————————————–
    Dheeresh Saini
    Yesterday at 04:18 ·
    अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में गुंडा वाहिनी के पढ़ने, देखने, महसूस करने के लिए कुछ नहीं पर विकिपीडिया से कॉपी यह लिस्ट आपके लिए-
    एएमयू की लाइब्रेरी

    एएमयू की मौलाना आज़ाद लाइब्रेरी में 13.50 लाख पुस्तकों के साथ तमाम दुर्लभ पांडुलिपियां भी मौजूद हैं।

    एएमयू के संग्रहालय में मुख्य वस्तुएँ तथा पांडुलिपियां –

    1877 इस्वी में लाइब्रेरी की स्थापना।
    यहां रखी इंडेक्स इस्लामिक्स की कीमत 12 लाख रुपये।
    फारसी पांडुलिपि का कैटलॉग।
    साढ़े चार लाख दुर्लभ पुस्तकें, पांडुलिपियां व शोधपत्र ऑनलाइन।
    अकबर के दरबारी फ़ैज़ी द्वारा फ़ारसी में अनुदित गीता।
    400 साल पुरानी फ़ारसी में अनुदित महाभारत की पांडुलीपि।
    तमिल भाषा में लिखे भोजपत्र।
    1400 साल पुरानी क़ुरान।
    मुग़ल शासकों के क़ुरान लिखे विशेष कुर्ते जिन्हे रक्षा कबज कहते है।
    सर सैयद की पुस्तकें व पांडुलिपियां।
    जहांगीर के पेंटर मंसूर नक्काश की अद्भुत पेंटिग मौजूद है।

    एएमयू का संग्रहालय

    एएमयू के मूसा डाकरी संग्रहालय में अनेक ऐतिहासिक महत्वपूर्ण वस्तुएँ तो हैं ही, सर सैयद अहमद का 27 देव प्रतिभाओं का वह कलेक्शन भी है जिसे उन्होंने अलग-अलग स्थानों का भ्रमण कर जुटाया था। एएमयू के संग्रहालय में उपस्थित महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर वस्तुएँ-

    जैन तीर्थंकर भगवान महावीर का स्तूप और स्तूप के चारों ओर आदिनाथ की 23 प्रतिमाएं हैं।
    सुनहरे पत्थर से बने पिलर में कंकरीट की सात देव प्रतिमाएं।
    एटा व फतेहपुर सीकरी से खोजे गए बतर्न, पत्थर व लोहे के हथियार।
    शेष शैया पर लेटे भगवान विष्णु. कंकरीट के सूर्यदेव।
    महाभारत काल की भी कई चीजें, डायनासोर के अवशेष।
    वीमेंस कॉलेज के संस्थापक पापा मियां की ब्रिट्रिश काल की पॉएट्री।
    चित्रकार मक़बूल फ़िदा हुसैन व उनके बेटे शमशाद की बनाई पेंटिंग्स।
    एएमयू के विक्टोरिया गेट से उतारी गई प्राचीन घड़ी।
    उदयपुर की जवार ख़ान से मिली ढाई हजार साल पुरानी रिटार्ट।

    विश्वविद्यालय के पुरस्कार प्राप्त व्यक्ति-

    भारतरत्न

    डॉ. ज़ाकिर हुसैन (1963)
    ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार खां (1983)

    पद्मविभूषण

    डॉ. ज़ाकिर हुसैन (1954)
    हाफ़िज़ मुहम्मद इब्राहिम (1967)
    सैयद बशीर हुसैन ज़ैदी (1976)
    प्रो. आवेद सिद्दीकी (2006)
    प्रो. राजा राव (2007)
    प्रो. एआर किदवई (2010)

    पद्मभूषण

    शैख़ मोहम्मद अब्दुल्लाह (1964)
    प्रो. सय्यद ज़ुहूर क़ासिम (1982)
    प्रो. आले अहमद सुरुर (1985)
    नसीरुद्दीन शाह (2003)
    प्रो. इरफ़ान हबीब (2005)
    क़ुर्रतुल ऐन हैदर (2005)
    जावेद अख़्तर (2007)
    डॉ. अशोक सेठ (2014)

    पद्मश्री

    विश्वविद्यालय के 53 महानुभावों को।

    ज्ञानपीठ

    क़ुर्रतुल ऐन हैदर (1989)
    अली सरदार जाफ़री (1997)
    प्रो. शहरयार (2008)

    भारतीय न्याय क्षेत्र में विश्वविद्यालय का योगदान

    सुप्रीम कोर्ट के जज

    जस्टिस बहारुल इस्लाम
    जस्टिस सय्यद मुर्तज़ा फ़ज़ल अली
    जस्टिस एस. सग़ीर अहमद
    जस्टिस आरपी सेठी

    हाईकोर्ट के जज

    एएमयू से हाईकोर्ट 47 जज

    विश्वविद्यालय के प्रमुख व्यक्तित्व

    ज़ाकिर हुसैन, भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति।
    लियाक़त अली ख़ान, पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री।
    अली अशरफ़ फ़ातमी, भारत सरकार में पूर्व मानव संसाधन राज्य मंत्री (२००४-२००९)।
    साहिब सिंह वर्मा, भाजपा नेता एवं दिल्ली के भूतपूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व केन्द्रीय श्रम मंत्री।
    मोहम्मद हामिद अंसारी, भारत के भूतपूर्व उपराष्ट्रपति।
    ध्यानचंद, प्रमुख हॉकी खिलाड़ी।
    मुश्ताक़ अली, भारत के भूतपूर्व क्रिकेट खिलाड़ी एवं कप्तान।
    लाला अमरनाथ, भूतपूर्व क्रिकेट खिलाड़ी व मोहिंदर अमरनाथ के पिता।
    इरफ़ान हबीब, इतिहासकार
    ईश्वरी प्रसाद, इतिहासकार।
    प्यारा सिंह गिल, भौतिकशास्त्री।
    असरार-उल-हक़ मजाज़, उर्दू कवि।
    कैफ़ी आज़मीी, उर्दू कवि।
    राही मासूम रज़ा, लेखक।
    जावेद अख़्तर, गीतकार एवं शायर।
    के आसिफ़, मुगले-आजम फिल्म के निर्देशक।
    नसीरुद्दीन शाह, फिल्म अभिनेता।
    अनुभव सिन्हा, हिन्दी फिल्मों के निर्देशक।
    दिलीप ताहिल, फिल्म अभिनेता।
    शाद ख़ान, टी.वी. कलाकार।
    जैस चौहान अभिनेता।

    Reply
  • May 12, 2018 at 3:47 pm
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    Arun Maheshwari4 hrs · ‘मार्क्सवाद सर्वशक्तिमान है'(‘हस्तक्षेप’ में इसका शीर्षक है – ‘अग्निपुंज उनके विचार’ )—अरुण माहेश्वरी(आज के ‘राष्ट्रीय सहारा’ के ‘हस्तक्षेप’ का चार पृष्ठीय अंक कार्ल मार्क्स के जन्म के दो सौ साल की पूर्ति के अवसर पर मार्क्स पर केंद्रित अंक है । इस अंक की सामग्री को देखते हुए इसे आज के समय के संदर्भ में मार्क्स पर केंद्रित एक काफी महत्वपूर्ण और संग्रहणीय अंक कहा जा सकता है । इसमें जिन लोगों के लेखों को लिया गया है, उनके नाम है – डा. अमर्त्य सेन, प्रभात पटनायक, प्रकाश करात, रामचंद्र गुहा, इरफान हबीब, डी पी त्रिपाठी और अजय तिवारी । इनके साथ ही हमारा भी एक लेख शामिल है । इनके अलावा इसी मौके पर ‘इकोनोमिस्ट’ पत्रिका में प्रकाशित उस लेख का हिंदी अनुवाद भी इसमें प्रकाशित किया गया है जो इधर काफी चर्चित हुआ है । ‘इकोनोमिस्ट’ के उस लेख पर हम अपने ब्लाग ‘चतुर्दिक’ में पहले ही चर्चा कर चुके हैं ।
    यहां हम अपने लेख को और इस पूरे अंक के लिंक को मित्रों से साझा कर रहे हैं 🙂
    लेनिन ने मार्क्स के बारे में अपने प्रसिद्ध निबंध ‘मार्क्सवाद के तीन स्रोत तथा तीन संघटक तत्व’ (1913) में लिखा था कि “मार्क्स की प्रतिभा इस बात में निहित है कि उन्होंने उन प्रश्नों के उत्तर उपलब्ध किये, जिन्हें मानवजाति के प्रमुखतम चिंतक पहले ही उठा चुके थे ।” और इसी क्रम में उन्होंने लगभग धर्मशास्त्र की भाषा का प्रयोग करते हुए लिखा कि “मार्क्स की शिक्षा सर्वशक्तिमान है, क्योंकि वह सत्य है ।”

    अभी लेनिन के इस कथन के 105 साल बाद मार्क्स के जन्म के दो सौ साल पूर्ति के समारोह में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी लेनिन की इसी बात को दोहराया कि ‘मार्क्सवाद सर्वशक्तिमान है क्योंकि वह सत्य है’ ।

    विश्व पूंजीवाद की सबसे प्रमुख पत्रिका ‘इकोनोमिस्ट’ ने इस मौके पर प्रसारित अपने एक लेख ‘मार्क्स पर पुनर्विचार : दूसरी बार, प्रहसन’ में मार्क्स की विफलताओं का आख्यान लिखने के बावजूद उसे डावोस का, जहां हर साल दुनिया के पूंजीपतियों और अर्थशास्त्रियों का जमावड़ा हुआ करता है, मसीहा बताया है । उदार जनतंत्रवादियों को ‘इकोनोमिस्ट’ ने चेतावनी दी है कि मार्क्स ने पूंजीवाद के जिन दोषों को बताया था उन्हें समझ कर तुम सुधरो, अन्यथा मार्क्स अपने विचारों के साथ, वो कितने ही फालतू और खतरनाक क्यों न हो, तुम्हें अपदस्थ करने के लिये हमेशा मौजूद है । अर्थात ‘इकोनोमिस्ट’ ने भी मार्क्स की तमाम विफलताओं का ब्यौरा देने के बावजूद प्रकारांतर से उनकी इस जगत की परिघटना में सार्वलौकिक उपस्थिति को एक सत्य माना है ।

    अल्लामा इकबाल की बीसवीं सदी के प्रथमार्द्ध की प्रसिद्ध शायरी है – ‘इबलीस की मजलिस-ए-शुरा’ ( शैतान के परामर्श-मंडल की बैठक)। इसमें शैतान को उसका एक सलाहकार (तीसरा मुशीर) प्रसंगवश कहता है –
    ‘‘रूह-ए-सुल्तानी राहे बाकी तो फिर क्या इज्राब
    है मगर क्या उस यहूदी की शरारत का जवाब ?’’
    (साम्राज्य का गौरव यदि बाकी रहा तो फिर डर किस बात का, लेकिन उस यहूदी की शरारत का क्या जवाब है?)
    उस यहूदी का आगे और हुलिया बताता है कि –
    ‘‘वो कलीम बे-तजल्ली, वो मसीह बे-सलीब
    नीस्त पैगंबर व लेकिन दर बगल दारद किताब’’
    (वह प्रकाशहीन आप्त कथन, वह बिना सलीब का मसीहा, नहीं है पैगंबर वह पर उसकी बगल में उसकी किताब है)

    इकबाल की शैतानों की मजलिस में जिस खुदा के बिना नूर के ही कलमा कहने वाले, बिना सलीब के मसीहा और पैगंबर न होने पर भी बगल में एक किताब दबाए यहूदी पर चिंता जाहिर की जा रही थी, वह कोई और नहीं कार्ल मार्क्स ही था। वही मार्क्स, जिसकी प्रेरणा से कभी इकबाल ने ही लिखा था –
    ‘‘जिस खेत से दहकाँ को मयस्सर नहीं रोजी
    उस खेत के हर खोशा-ए-गंदुम को जला दो’’ ।

    इसीलिये जब आज कोई मार्क्स की विफलताओं का जिक्र करता है कि वे फलाना बात को नहीं देख पाएं, फलाना चीज को नहीं समझ पाएं, उनके विचारों के आधार पर तैयार हुई समाजवादी सरकारें पूरी तरह से बेकार साबित हुई, यहां तक कि उनके अनुयायियों के राज्यों ने ही गैर-समानतापूर्ण समाज के विकास का, पूंजीवाद का रास्ता पकड़ लिया आदि, आदि तो इस पर सबसे पहला सवाल यही उठाया जाना चाहिए कि किसी भी विचार की सफलता या विफलता से आपका तात्पर्य क्या है ? संसदीय जनतंत्र की तमाम विफलताओं के बावजूद उसी रास्ते पर सदियों तक ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करने की अनुमति दी जा सकती है, लेकिन कम्युनिस्ट विचारों के समाजवादी प्रकल्पों की विफलता का मतलब है कि अब उन विचारों पर अमल की कोई कल्पना करना भी अपराध है ! यह एक प्रकार की रूढ़ि नहीं तो और क्या है ? जो चल रहा है, उससे इतर सोचना सबसे बड़ा गुनाह है ! अर्थात अच्छाई का अपना कोई स्वायत्त सत्य नहीं होता, वह महज किसी बुराई के खिलाफ एक लड़ाई होती है ! इसीलिये रूढ़िवाद मार्क्सवाद को खारिज करके विचारों के क्षितिज के ही बाहर कर देने की जिद में हैं, न कि मार्क्सवाद के निरंतर सामाजिक प्रयोगों की निष्ठा में ।

    कौन नहीं जानता कि गणित के न जाने कितने प्रमेय बिना किसी सटीक सिद्धांत (उपपत्ति) पर पहुंचे ही सदियों तक गणितज्ञों को प्रेरित करते रहते हैं और साल-दर-साल के निरंतर प्रयत्नों के बाद ही उनकी कोई त्रुटिहीन उपपत्ति मिल पाती है । लेकिन इसके चलते कभी भी उन प्रमेयों को बिना प्रयत्नों के त्याग नहीं दिया जाता है । उसी प्रकार राजनीति और मानव के समाज-विज्ञान के क्षेत्र में भी मानव मुक्ति के किसी भी प्रमेय को त्याग देने में कोई बहादुरी नहीं है । इसके विपरीत इन प्रयत्नों में विफलताओं की शिक्षाओं और उनके तात्पर्यों की प्रक्रिया में ही मानव प्रगति के प्राण बसते हैं । कम्युनिस्ट विचारक एलेन बाद्यू ने अपनी पुस्तक ‘कम्युनिस्ट परिकल्पना’ में सही कहा है कि “यदि किसी भी परिकल्पना को त्याग नहीं दिया गया है तो उसकी विफलताएं ही उस परिकल्पना के सत्य का इतिहास कहलाती है ।”

    कम्युनिस्ट परिकल्पना के बारे में बाद्यू कहते हैं कि व्यवहारिक राजनीति में विचार के सत्य के साथ ही संगठनों और कामों का महत्व होता है । सिर्फ कुछ नामों, मार्क्स, लेनिन, माओ के जाप या क्रांति, समाजवाद, सर्वहारा आदि की बड़ी-बड़ी बातों और जनवादी केंद्रियता, सर्वहारा की तानाशाही की तरह के सिद्धांतों के बखान से कुछ हासिल नहीं होता है । उल्टे इन सबके अतिशय प्रयोग से ये राजनीति में और भी खोखले और महत्वहीन होते जाते हैं । इनमें से अधिकांश चीजें तो कोरे प्रचार के लिये, अपनी हवा बांधने भर के लिये भी होती है । दैनंदिन वास्तविक राजनीति में इन खास प्रकार की बातों की कोई स्वीकृति नहीं है । इनसे सिर्फ इतना पता चलता है कि इनसे जुड़े सत्य का काम जारी है । अन्यथा व्यवहारिक राजनीति के लिये इनका कोई मायने नहीं है ।

    इसीलिये मार्क्सवाद के व्यवहारिक प्रयोगों के बारे में माओ त्से तुंग की इस बात का सबसे अधिक महत्व है कि ‘साम्राज्यवादियों और प्रतिक्रियावादियों का एक ही तर्क हैं कि जीवन में परेशानी पैदा करो, विफल हो जाओ और फिर परेशानी पैदा करो । लेकिन मुक्तिकामी जनता का तर्क है कि लड़ो, विफल हो, फिर विफल हो, फिर लड़ो, जब तक विजयी नहीं हो जाते । मुक्ति हासिल नहीं कर लेते ।’

    समाजवाद की विफलताओं को मार्क्स और मार्क्सवाद की विफलताओं के रूप में देखने के बजाय मार्क्स के द्वारा शोषणविहीन समाज के निर्माण की जो दिशा दिखाई गई, उस दिशा में यात्रा के इतिहास के चरणों के रूप में उन्हें लिया जाना चाहिए । धर्मशास्त्रीय शब्दावली में ही हम कह सकते है कि विमर्श की दृढ़ता ही पूजा है । परमेश्वराभेदप्रतिपत्तिदाढर्यसिद्धये पूजाक्रिया उदाहरणीकृता । कम्युनिस्ट राजनीति में निवेदित प्राण क्रिया और सारे कारको को एक समतावादी समाज की दिशा में देखने के भाव में ही रहने का अभ्यस्त होता है । कह सकते हैं कि उसके लिये कर्त्ता, कर्म, करण, अपादान, सम्प्रदान और अधिकरण आदि के भेद भेद नहीं रहते, अभेद हो जाते हैं ।

    अगर मनुष्यता के इतिहास को उसकी मुक्ति के इतिहास की दिशा देनी है तो मार्क्सवाद ही उस पथ का सर्वशक्तिमान, सार्वलौकिक सत्य है । यह किसी खास सामाजिक परिवर्तन का निश्चित स्वरूप नहीं, उस परिवर्तन के नियम का सिद्धांत है । और इसीलिये, आज भी जब कहने के लिये दुनिया में पुराने प्रकार का एक भी समाजवादी राज्य नहीं रह गया है, मार्क्स की शिक्षाएं पूंजीवाद के तमाम झंडाबरदारों को हमेशा अपने पर लटक रही तलवार की तरह सताती रहती है ।—————————————————————————————————————————–
    शंकर शरण5 मई 2018 को कार्ल मार्क्स के जन्म के दो सौ साल पूरे हुए, तो कहीं कोई चर्चा नहीं है। जबकि पचास साल पहले डेढ़ सौ वीं जयंती एक अंतर्राष्ट्रीय धूम थी! इस बीच क्या बदल गया? यही कि जिन राज्यसत्ताओं को मार्क्सवाद का गुमान था, वह बैठ चुकी हैं। इसलिए मार्क्स को दी गई असंतुलित महत्ता भी धरातल पर आ गई है।

    निस्संदेह, अपने युग में मार्क्स ने यूरोप की तात्कालिक अर्थव्यवस्था का सशक्त विश्लेषण किया था। पर जैसे ही वह समाज आगे बढ़ा, वह विश्लेषण पुराना, व्यर्थ हो गया। किन्तु मार्क्स ने जिस आकर्षक शब्दावली के साथ मानवीय दुःख, ईर्ष्या, लोभ, चतुराई और हिंसा को एक सैद्धांतिक रूप दिया था, उस का आकर्षण बना रहा। उसी बल पर कई देशों में मार्क्सवादियों ने सत्ता पर भी कब्जा किया। पर भविष्य का जो अनुमान मार्क्स ने किया था, वह कहीं सामने न आया। फिर भी, अधकचरी जानकारी के साथ द्वेष, घृणा, लोभ और अहंकार से बनी रेडीमेड क्रांतिकारिता का जो नशा मार्क्स के बाद उन के अनुयायियों ने फैलाया उस में आज भी लाखों बुद्धिजीवी झूम रहे हैं!

    स्वयं मार्क्स भी अधकचरी जानकारी से ग्रस्त थे। उन्हें यूरोप के सिवा किसी समाज और साहित्य का ज्ञान नहीं था। इसलिए भी उन की सैद्धांतिक परिकल्पनाएं इतनी कच्ची साबित हुईं। उन का ‘इतिहास की गति का नियम’ कपोल-कल्पना थी। इसीलिए वे दार्शनिक भी नहीं, मात्र अर्थशास्त्री थे। वह भी एक सीमित समाज, सीमित युग के। उन के भारत संबंधी लेखन से ही इस का ठोस प्रमाण मिल जाता है।

    मार्क्स में जो मानवीयता, दार्शनिकता देखी जाती है वह अधिकांश अतिरंजित और अपनी सदिच्छाओं का आरोपण है। निस्संदेह, असंख्य श्रद्धालुओं ने अत्यंत परिश्रम से मार्क्स के लेखन से सीख कर वर्गहीन, शोषणविहीन समाज, आदि बनाने की कोशिशें की। पर वे हर कहीं, हर हाल में विफल हुए तो इस में मूलतः मार्क्सीय परिकल्पनाओं का दोष था, जिसे उन के शिष्यों ने अंधविश्वास में ‘साइंस’ मान लिया था। सो स्वयं मार्क्स की कसौटी कि ‘सिद्धांत का प्रमाण व्यवहार होता है’, पर मार्क्सवाद को कसें तो यह बिलकुल व्यर्थ साबित हुआ।

    अनेक देशों में मार्क्सवादियों ने दशकों तक जो सत्ता बनाई, चलाई वह अपनी अंतहीन हिंसा, विध्वंस, अत्याचार के बावजूद वह कुछ उपलब्ध न कर सकी जिस का दावा था। सब से संपन्न, सशक्त, बुद्धिमान देश रूस में सारे वर्तमान व संभावित विरोधियों का समूल संहार करके भी, मार्क्सवादी शासन केवल तानाशाही, हिंसा और जबरदस्ती पर ही चल सका। वह पूरा इतिहास और मानसिकता तफसील से समझने के लिए महान लेखक सोल्झेनित्सिन का ‘गुलाग आर्किपेलाग’ (1973) पढ़ना अनिवार्य है। इस में कम्युनिज्म की भयावह सचाई का प्रमाणिक आकलन है।

    वही हिंसा उसी जरूरत और उसी भाव से चीन, वियतनाम, कम्बोडिया, पूर्वी यूरोप, आदि हर कहीं चली। जिस ने कुल मिलाकर दसियों करोड़ अपने-अपने निरीह देशवासियों को ही खत्म किया। उसी के साथ वह सिद्धांत खत्म हो गया जिसे मार्क्सवाद कहा गया था। ‘वर्ग-हीन’, ‘गैर-दमनकारी राज्य’ और ‘शोषण-विहीन समाज’ के दावे मार्क्सवादी शासनों में चिंदी-चिंदी होकर नष्ट हो गए।

    जिसे कम्युनिस्ट देशों की ‘नौकरशाही’ कह कर दोष मढ़ने की कोशिश की गई, वह वस्तुतः कम्युनिस्ट पार्टी नामक नया शासक वर्ग ही था। उसे विशेषाधिकार, अतुलनीय सुविधाएं और निरंकुश ताकत दिए बिना कोई मार्क्सवादी राज्य एक दिन भी सत्ता में नहीं रह सकता था। यह समानता के सिद्धांत का क्रूर मजाक हुआ।

    आर्थिक-तकनीकी क्षेत्र में समाजवादी सत्ताएं अक्षम साबित हुईं। सफलता में लाभ या विफलता में हानि के वैयक्तिक कारकों का लोप होने से कर्मियों, व्यवस्थापकों में प्रेरणा का तत्व कमजोर हो गया। यानी, जो कारण पूँजीवादी देशों में सरकारी उद्योगों, सेवाओं के पिछड़ने के हैं, वही और भी बड़े पैमाने पर समाजवादी देशों के पिछड़ने का था।

    कृषि में मार्क्सवादी-लेनिनवादी प्रयोगों ने और विध्वंस किया। किसानों से जमीन छीन कर सामूहिकीकरण और राजकीय संचालन से अभूतपूर्व अकाल पड़े। रूस, चीन, कोरिया, कम्बोदिया, इथियोपिया, आदि देशों में करोडों-करोड़ लोग भूख से मर गए, जिन की जानकारी भी दुनिया को दशकों बाद मिली। इस प्रकार, पारंपरिक किसानी को खत्म कर ‘कम्युनिस्ट स्वामित्व’ में उत्पादन बढ़ाने की कल्पना उल्टी साबित हुई।

    वह तो रूस की विशाल प्राकृतिक संपदा थी, जिस के निर्मम दोहन के बल पर रूस के साथ-साथ पूर्व यूरोप की भी ‘समाजवादी उन्नति’ का झूठा चित्र दशकों तक दिखाया गया। सन् 1987-91 की घटनाओं ने दिखाया कि रूसी संसाधनों का सहारा हटते ही वे सत्ताएं ताश के घरों की तरह ढह गईं।

    वस्तुतः मार्क्सवाद की सारी बुनियादी कल्पनाएं रूस, चीन या किसी भी कम्युनिस्ट देश में आरंभ में ही ध्वस्त हो चुकी थीं। दशकों तक सारी हिंसा, प्रचार और प्रपंच के बावजूद मार्क्सीय विचारों के सभी प्रयोग निरपवाद रूप से निष्फल रहे। इस के विपरीत, पूँजीवादी देशों में कोई मर्मांतक व्यवस्थागत संकट न होना, फलतः लोगों द्वारा विद्रोह न करना, और वैज्ञानिक-तकनीकी-सामाजिक रूप से उन का निरंतर कमो-बेश उन्नत, आत्मविश्वासपूर्ण होता जाना, भी मार्क्स की कल्पनाओं के विपरीत रहा।

    सामाजिक, सांस्कृतिक क्षेत्र में भी कम्युनिस्ट देशों में ‘पूँजी की गुलामी’ से मुक्त होकर ‘स्वतंत्र’ बनने के बदले मनुष्य मूक जानवरों-सी अवस्था में पहुँच गया। ऐसी व्यवस्था, जहाँ राज्य-शासन एक मात्र रोजगारदाता था, वहाँ अंध-आज्ञापालन के सिवा जीने का ही कोई अवसर न था! मक्सिम गोर्की, रोजा लक्जमबर्ग, आदि कई विवेकशील कम्युनिस्टों ने भी शुरू में ही देख लिया था कि घोर-गुलामी की व्यवस्था बनने जा रही है। वही हुआ और हर कहीं हुआ।

    समाजवाद के राजनीतिक तंत्र का कठोर, सैनिक ढाँचे वाला मॉडल भी सीमित उपयोगिता का रहा। बाहरी हमले का मुकाबला करने में यह जरूर उपयोगी हुआ, जिस में लोगों और चीजों को मनचाहे, फौरन जहाँ तहाँ भेजा जा सकता था। किन्तु जहाँ भौतिक बल से मुकाबला न हो, वहाँ यह बिल्कुल निकम्मा, नपुंसक साबित हुआ। विचार, दर्शन और कला, संस्कृति की दरिद्रता इस के उदाहरण हैं।

    आलोचनाओं का उत्तर, स्वयं को सुधारना, साहित्य का निर्बाध लेखन-अध्ययन, खुला सांस्कृतिक आदान-प्रदान चला सकना, आदि में सभी मार्क्सवादी देश एक जैसे भयभीत, नकारा साबित हुए। अपने देश के बारे में झूठे विवरण और दूसरे देशों के बारे में दुष्प्रचार के सिवा उन की साहित्यिक, बौद्धिक क्षमता कभी कुछ न दे सकी।

    रूसी-चीनी कम्युनिज्म के पूरे सात दशकों में भी एक भी मार्क्सवादी साहित्यिक, दार्शनिक, सामाजिक पुस्तक या विद्वान नहीं, जिसे आज भी मूल्यवान कहा जाता हो। इस के विपरीत यूरोप, अमेरिका में इसी दौरान तकनीक ही नहीं, साहित्यिक, बौद्धिक अवदानों के एक से एक स्तंभ खड़े हुए जिन की गिनती तक कठिन है।

    अंतर्राष्ट्रीय दृश्य में भी ‘दुनिया के मजदूरों, एक हो!’ का नारा कभी स्वीकृत न हुआ। किसी देश की जनता ने अपने देश, भाषा, धर्म, संस्कृति को परे कर ‘वर्गीय’ एकता बनाने, दिखाने में कोई रुचि नहीं ली। रूस या चीन के साथ दूसरे देशों के कम्युनिस्टों की एकता तक स्वैच्छिक नहीं थी। यह बार-बार फिनलैंड, हंगरी, चेकोस्लोवाकिया, पोलैंड, चीन, युगोस्लाविया और वियतनाम के कम्युनिस्टों ने दिखाया। पश्चिमी यूरोप की कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी। वे या तो रूस के प्रचारक के रूप में महत्वहीन रहे, या मजबूत होते ही रूसी कम्युनिज्म से दूरी रखने लगे।

    इसलिए, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और अंतर्राष्ट्रीय – सभी क्षेत्रों में मार्क्सवादी कल्पनाएं विविध देशों में, पूरी तरह बार-बार विफल हुईं। यही कारण है आज मार्क्स से कुछ नहीं सीखा जा सकता। उस की तुलना में भारत, चीन जैसी सभ्यताओं का क्लासिक दर्शन आज भी मानवता के लिए उपयोगी है। इसे कोई भी परख सकता है।
    शंकर शरण

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  • May 13, 2018 at 11:21 am
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    Raj Kishore
    7 May at 14:21 ·
    मार्क्स के दो सौ वर्ष
    राजकिशोर

    कार्ल मार्क्स जीवित रहते, तो आज दो सौ वर्ष के हो जाते। आज मार्क्स हमारे बीच नहीं हैं, पर उनके विचार दुनिया भर में फैल गये हैं। शायद ही कोई देश हो, जहाँ कम्युनिस्ट पार्टी न हो। मनुष्य की अमरता इसी में है। वह जीता एक पीढ़ी भर है, पर आने वाली सभी पीढ़ियों के लिए विचार और कर्म की सामग्री छोड़ जाता है। आधुनिक युग के ऐसे विचारकों में डार्विन, फ्रायड, मार्क्स और गांधी का नाम शीर्ष पर जगमगाता है।
    मार्क्स की कल्पना के अनुसार, अभी तक पूरी दुनिया में मार्क्सवाद आ जाना चाहिए था। मार्क्स एक क्रांतिकारी थे, लेकिन उनके समय में किसी भी देश में क्रांति नहीं हो सकी। मार्क्स की मान्यता थी कि सब से पहले क्रांति उस देश में होगी, जहाँ पूँजीवाद सब से ज्यादा विकसित होगा। इसे समझाने के लिए उन्होंने जंजीर का उदाहरण दिया था, जो टूटती है तो उस बिंदु पर जहाँ वह सब से ज्यादा कमजोर होती है। लेकिन पूँजीवाद की जंजीर अलग किस्म की होती है। वह जितनी मजबूत होगी, वहाँ शोषण उतना ही ज्यादा होगा, इसलिए सर्वहारा की संख्या उतनी ही ज्यादा होगी। विद्रोह करने की ऐतिहासिक जिम्मेदारी सर्वहारा वर्ग की है। वह स्वयं को पूँजी के जाल से मुक्त करेगा और पूँजीपति को भी मुक्त कराएगा। इसके बाद समाजवादी समाज बनेगा, जिसमें सभी बराबर होंगे। चूँकि मार्क्स के जीवन काल में इंग्लैंड का पूँजीवाद सब से बढ़ा-चढ़ा था, इसलिए संभावना यही थी कि वहीं क्रांति सब से पहले होगी।
    लेकिन यह नहीं हो पाया, तो इसमें मार्क्स का कोई दोष नहीं था। मार्क्स के समय तक इतिहास स्थिर नहीं हुआ था। वह निरंतर बढ़ रहा था। उपनिवेशों का विस्तार हो रहा था, जहाँ से चूस कर लाया गया धन पूँजीवादी देशों के मजदूरों के जीवन स्तर में वृद्धि कर रहा था। नए-नए वैज्ञानिक आविष्कार हो रहे थे, जिससे मशीनों और मजदूरों की उत्पादकता बढ़ रही थी और इसके साथ ही उनका वेतन भी। औद्योगिक सर्वहारा भी पहले की तरह कमजोर नहीं रह गया था, श्रमिक यूनियनों में संगठित हो कर कारखाना मालिकों से मोलभाव कर सकता था। अमेरिका की खोज हो गई, जिसने यूरोप को समृद्ध बनाया। इसलिए जहाँ-जहाँ भी पूँजीवाद आगे बढ़ा, वहाँ के मजदूरों के रहन-सहन का स्तर सुधरता गया और क्रांति की संभावना क्षीण होती गई। आज स्थिति यह है कि दुनिया के एक बड़े हिस्से में मजदूर मध्यवर्गीय जीवन जी रहा है और उससे क्रांति की उम्मीद कोई नहीं करता।
    इस तरह, भविष्य का इतिहास मार्क्स की अवधारणा के उलटी दिशा में चला। जहाँ-जहाँ पूँजीवाद कमजोर है, वह मजदूरों को उचित वेतन नहीं दे सकता, पर्याप्त रोजगार पैदा नहीं कर सकते, ज्यादातर लोग खेती पर निर्भर होते हैं, जिसकी आय में अपेक्षित वृद्धि नहीं होती, वहाँ-वहाँ मार्क्सवाद जीवित दिखाई देता है। मार्क्सवाद वास्तव में वही था, जो मार्क्स ने धर्म के बारे में लिखा है : ‘धर्म उत्पीड़ित प्राणी का उच्छ्वास है, एक हृदय-विहीन दुनिया का हृदय है, आत्महीनों की आत्मा है। यह जनता की अफीम है।’ मार्क्सवाद ने अपने को विज्ञान बताया, जिसके नियम अकाट्य होते हैं और जिन्हें कोई तोड़ नहीं सकता। लेकिन वह यूटोपिया ही साबित हुआ, जिससे मनुष्य की दुखी आत्मा को शांति मिलती है। एशिया में नेपाल सब से गरीब देश है और वहाँ की सरकार कम्युनिस्ट पार्टियों के हाथ में है।
    भारत में मार्क्सवाद की क्या स्थिति है? क्या वह भारतीय संस्कृति की आत्मा के खिलाफ है? ऐसा कहना यह मानना होगा कि संस्कृति स्थिर होती है। एक बार जब वह बन जाती है, तो भविष्य में भी वैसी ही बनी रहती है। तथ्य इसका समर्थन नहीं करते। कल तक ब्राह्मणों का राज था, आज उन्हें कोसा जा रहा है। कल तक दलित चूँ भी नहीं कर सकते थे, आज सड़क पर उतर कर आंदोलन कर रहे हैं। लाखों या करोड़ों स्त्रियाँ घर से बाहर निकल कर नौकरी कर रही हैं। यही कारण है कि भारत में मार्क्सवाद एक बड़ी राजनीतिक धारा बन सका। आज वह मुरझाया हुआ दिखाई देता है, लेकिन इसलिए नहीं कि मार्क्सवाद में कोई दम नहीं है, बल्कि मार्क्सवादियों में कोई दम नहीं था। उनकी राजनीति को देख कर मार्क्स निश्चय ही शर्मिंदा होते।
    यही बात सोवियत संघ और चीन के बारे में कही जा सकती है। क्या कारण है कि सोवियत संघ में मार्क्सवाद एक खास समय तक ऊँचाई पर चढ़ता रहा, फिर एक बिंदु ऐसा आया, जहाँ वह बम की तरह फट पड़ा।? क्या कारण है कि चीन में मार्क्सवादी क्रांति हुई और जब उसने चीन को एक संपन्न देश बना दिया, तो उसने मार्क्सवाद को छोड़ कर पूँजीवाद की राह पकड़ ली?
    मेरी समझ से, ये दोनों घटनाएँ अनिवार्य थीं, क्योंकि दोनों ही देशों में मार्क्सवाद नहीं था, उसका तानाशाही वाला स्वरूप था। तानाशाही में भी विकास होता है, पर एक सीमा के बाद वह अविकास में बदल जाता है। रूस ने प्रथमार्ध में प्रगति की, परंतु उसने समता का सिद्धांत छोड़ दिया। उसके आका संयुक्त राज्य अमेरिका की तरह एक साम्राज्यवादी देश बनना चाहने लगे, जिसकी इजाजत रूस की अर्थव्यवस्था नहीं देती थी। साथ ही, मानव अधिकारों के अवमूल्यन से ज्ञान-विज्ञान और आविष्कार की मेधा में जो उछाल आता है, वह नहीं आ सका। चीन में केवल भौतिक विकास की तरफ ध्यान दिया गया, आत्मिक विकास की ओर नहीं। फलतः सभ्यता आगे बढ़ी, पर संस्कृति का संकुचन हुआ। ऐसी स्थिति में, और अधिक उन्नति के लिए पूँजीवाद ही एकमात्र ऐसी विचारधारा है जो सहायता कर सकता था।
    मार्क्सवाद की ही शिक्षा है कि मनुष्य सिर्फ भौतिक परिस्थितियों की उपज नहीं है, वह उनका नियामक भी है। लेकिन सत्ता में आने पर मार्क्सवादी इस पर अमल नहीं कर सके। वे मार्क्सवाद से डर गए। इसलिए एक सीमा के बाद मार्क्सवाद का उजाला धुँधलाने लगता है। लेकिन कुछ घरों की मोमबत्तियाँ बुझ जाएँ, इससे अग्नि का आविष्कार व्यर्थ नहीं हो जाता। मार्क्सवाद में आग है। इसलिए यह आज भी रोशनी दे रहा है और आगे भी देता रहेगा। दरअसल, मार्क्सवाद सिद्धांत से आगे बढ़ कर व्यवहार में भी सिद्ध हो, इसके लिए एक सर्वथा नई किस्म के आदमी चाहिए। दो-चार या दस-बीस नहीं, लाखों, करोड़ों लोग। यह एक वैकल्पिक सभ्यता के निर्माण का सपना है। वर्तमान सभ्यता की उम्र तीन से चार हजार वर्ष है। मार्क्सवाद को तीन से चार सौ वर्ष भी नहीं दिए जा सकते?

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  • May 16, 2018 at 5:45 pm
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    Pushya Mitra
    Yesterday at 13:29 ·
    बंगाल की राजनीतिक हिंसा
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    यह पोस्ट थोड़ी देर से लिखा जा रहा है, क्योंकि कर्नाटक के नतीजों ने बंगाल की राजनीतिक हिंसा के सवाल को रिप्लेस कर दिया है और फिलहाल वही ट्रेंड कर रही है. जाहिर है इस माहौल में कितने लोगों की इस सवाल में रुचि होगी, कहना मुश्किल है. मगर फिर भी, देर से ही सही, लिख रहा हूं. क्योंकि कई बातें बाद के दिनों के लिए भी दर्ज होती हैं.

    कल पंचायत चुनाव के दौरान बंगाल में हुई राजनीतिक हिंसा निश्चित तौर पर चिंतनीय है, खास कर ऐसे दौर में जब चुनावों में हिंसा के मामले लगातार घट रहे हैं. मगर जैसा कि कल डेरेक ओ ब्रायन ने ट्वीट किया कि बंगाल में राजनीतिक हिंसा कोई नई बात नहीं है. 1990 के दशक में इस राज्य में 400 से अधिक लोगों की हत्या राजनीतिक वजहों से हुई थी और 2004-5 के चुनाव में 40 लोग मारे गये थे. 1990 से 2004 के बीच का दौर हम बिहारियों को भी याद है, जब पूरा भारत अपने राज्य में निवेशकों को बुलाने की तरकीबें बनाने में जुटा था हम लोग राजनीतिक झगड़ों में फंसे हुए थे. इसी तरह बिहार में भी हर चुनाव में लोग मारे जाते थे और हम आहें भर कर रह जाते थे.

    मगर दुखद है कि उस दौर के बीतने के बावजूद बंगाल आज भी राजनीतिक हिंसा की चपेट में है, जबकि बिहार जैसा राज्य उससे उबर चुका है. इसकी वजहें क्या हैं. डेरेक का कहना सही है कि राजनीतिक हिंसा बंगाल में आम बात है. ममता बनर्जी भी खुद वामपंथियों से बार-बार पिटकर नेता बनी है. बंगाल में ही क्यों, केरल में भी राजनीतिक हिंसा आज भी आम है और उन तमाम राज्यों और देशों में राजनीतिक हिंसा की जड़ें गहरी हैं, जहां वामपंथ मजबूत है. क्योंकि वामपंथ हिंसा को राजनीति का हथियार मानता है और इस बात के खासा मुतमईन रहता है कि अपने विरोधियों की हत्या कर उसका नामोनिशान मिटा दो. यह वामपंथ के सिद्धांतों में शामिल है.

    मैं सिर्फ स्टालिन की बात नहीं कर रहा, न ही माओ की और कंबोडिया के खमेर रूज की. जब समतामूलक समाज बनाने के नाम पर लाखों विरोधियों को मौत के घाट उतार दिया जाता था. न ही चीन के थ्येनमान चौक की घटना को उद्धृत करके यह साबित करने की कोशिश करूंगा, जब लोकतंत्र की मांग कर रहे छात्रों को टैंक से कुचल दिया गया. वामपंथ में हिंसा के सिर्फ चंद उदाहरण नहीं हैं. विरोधियों को मौत के घाट उतार देना उनका मूलभूत सिद्धांत रहा है.

    1917 में जब रूसी क्रांति हुई थी तो जार और उसके पूरे परिवार की हत्या कर दी गयी. बाद के दिनों में ऐसे तमाम लोगों की हत्या सोवियत रूस में हुई जो मार्क्सवाद से जरा सा भी असहमत थे. इनमें लेखक, कलाकार, विचारक, हर तबके के लोग थे. इन्हें बुर्जुआ का नाम दिया गया. चीन में भी साम्यवाद रक्तरंजित तरीके से ही आया. यहां तक कि क्यूबा, कंबोडिया, जर्मनी और उत्तर कोरिया जैसे मुल्कों में भी साम्यवाद की वजह से राजनीतिक हिंसाएं हुईं. और उस जमाने में मान लिया गया था कि सत्ता परिवर्तन हिंसा से ही मुमकिन है, माओ खुद कहते थे कि क्रांति बंदूक की नली से आती है.

    मगर हमारे देश का मामला कुछ अलग था. दिलचस्प है कि जिस 1917 में रूस में बंदूक की नली से साम्यवाद आ रहा था, उसी साल हमारे यहां गांधी चंपारण में सत्याग्रह को जन्म दे रहे थे और अहिंसा देवी का साक्षात्कार कर रहे थे. वही गांधी जिसने दो-तीन साल बाद चौरा-चौरी में हिंसा की वजह से राष्ट्रव्यापी असहयोग आंदोलन वापस लिया. जिस आंदोलन के जरिये वे देश को एक साल में स्वराज दिलाने का वादा कर चुके थे.

    मगर गांधी ने कहा कि हिंसा से नहीं. हमें अपने कार्यकर्ताओं को अहिंसक तरीके से संघर्ष करने के लिए और प्रशिक्षित करना होगा. और उसी प्रशिक्षण का नतीजा था, कि जब रूस में स्तालिन अपने विरोधियों की सरेआम हत्याएं करवा रहा था, गांधी के अनुयायी नमक सत्याग्रह के लिए डांडी में पुलिसिया लाठी के सामने हाथ बांधे खड़े थे और चुपचाप मरे जा रहे थे. जिसे देखकर पूरी दुनिया दंग रह गयी.

    आज यह सोचकर हैरत होती है कि जब पूरी दुनिया रूसी क्रांति की वजह से मार्क्सवाद के ग्लैमर की गिरफ्त में थी तो भारत में लाखों युवक कैसे गांधी के पीछे खड़े थे. गांधी में वह कौन सी ताकत थी कि उसने एक पूरे जेनरेशन को हिंसक बनने से रोक लिया. उनमें नेहरू और जयप्रकाश जैसे लोग थे, जिनकी अपब्रिंगिंग साम्यवादी विचारों के बीच हुई थी. मगर वे भारत आकर अहिंसा के रास्ते पर चल पड़े. जेपी ने तो बाद में अहिंसा का इस्तेमाल डकैतों को आत्मसमर्पण कराने में भी किया. गांधी ने सुभाष को भी हिंसा के रास्ते से हटाने की कोशिश की, मगर सफल नहीं हो पाये. इसी दौर में भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे युवक भी हुए जिनका भरोसा गांधी से अधिक साम्यवाद पर था. मगर फिर भी एक गांधी के होने से भारत की राजनीति में हिंसा कभी केंद्रीय विषय नहीं बन पायी.

    आजादी के बाद तक, जब तक बंगाल में नक्सलवादी आंदोलन शुरू नहीं हुआ. भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद की हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी और कनाडा के गदर आंदोलन को छोड़ दिया जाये तो भारत में हिंसक राजनीति की शुरुआत नक्सलवाद से होती है, जिसके पीछे माओ की वही फिलॉसफी थी, कि सत्ता बंदूक की नली से आती है. तब न गांधी रहे थे, न नेहरू का असर रह गया था. नक्सलवाद अपनी तरह से फैला और बंगाल-बिहार-आंध्र प्रदेश, मध्यप्रदेश और उड़ीसा के इलाकों में पैठ बनाने में कामयाब रहा. इसमें चीन की कितनी भूमिका थी यह शोध का विषय है. मगर विचार वही था. मार्क्सवाद, जो राजनीतिक सवालों के लिए हिंसा करने में जरा भी संकोच नहीं करता.

    दूसरे राज्यों का तो मालूम नहीं मगर बिहार में इसकी प्रतिक्रिया में कई जातीय सेनाएं उठ खड़ी हुईं, जिनमें रणवीर सेना प्रमुख थी. और हमारा राज्य भी राजनीतिक हिंसा का गढ़ बनने लगा. मगर पहली बंदूक वामपंथ की थी. किस तरह समानता के नाम पर आयी बंदूक पूरे इलाके को हिंसा की चपेट में ले लेती है, यह मैंने भागलपुर के ताड़र और मकनपुर गांव में जाकर महसूस किया. एक वक्त ये दोनों गांव एक दूसरे के खून के प्यासे रहते थे. मैंने जाकर पता किया तो उस इलाके में पहली पिस्तौल वामपंथी विचार के लोगों की वजह से पहुंची थी.

    ऐसा नहीं है कि यह सब लिखने की वजह वामपंथी विचारों को खारिज करना है. अपनी सशस्त्र क्रांतियों के बावजूद वे आखिरकार कथित तौर पर जनता के लिए ही लड़ते हैं. हां, बाद के दिनों में भूल जाते हैं. जैसे कुछ साल पहले बिहार के माओवादी जातीय संगठनों के गढ़ बन गये थे. जैसे बंगाल और केरल में सत्ता को कायम रखने के लिए वाम कार्यकर्ता हिंसा करते हैं. यहां समानता का कोई सवाल नहीं है.

    इसके बावजूद देश के अधिकांश इलाकों में आज भी राजनीतिक हिंसा नहीं होती है तो इसकी वजह गांधीवादी समाजवाद है. जेपी की संपूर्ण क्रांति ने नक्सलवादी आंदोलनों को पूरे देश में फैलने से रोका और एक राजनीतिक विकल्प के रूप में समाजवाद को पेश किया. हालांकि छात्र आंदोलन में भी हिंसा हुई थी, मगर वह हिंसा वाम हिंसा से अलग और कमतर थी. इस बहाने युवाओं का गुस्सा निकल गया. बाद में एक पूरी पीढ़ी राजनीति में आयी जो संपूर्ण क्रांति के नहीं होने पर में जंगलों में छुपकर छापामार युद्ध करने और देश को गृहयुद्ध में झोंकने से सिवा कुछ नहीं कर पाती.

    मुमकिन है जेपी का आंदोलन और उनके शिष्य बहुत कुछ बदलने में कामयाब नहीं हो पाये. सिवाय इसके कि पूरे देश में मझोली जातियों के कई राजनीतिक धड़े खड़े हो गये और राजनीति से सवर्णों का प्रभाव खत्म हो गया. मगर इसके बावजूद इतना तो हुआ कि लोकतंत्र मजबूत हुआ और युवाओं का भटकाव खत्म हुआ. आज तक वह पीढ़ी देश की राजनीति को विकल्प देने की कोशिश करती है. और युवाओं का समूह बंदूक उठाने के बदले राजनीतिक विकल्प तलाशनें में रुचि लेता है.

    इसलिए मैं डेरेक ओ ब्रायन से पूरी तरह सहमत नहीं हो पाता. अगर बंगाल में वामपंथ खत्म हो गया है तो हिंसक राजनीतिक भी खत्म होनी चाहिए. मगर ममता दीदी ने पोरिबर्तन के बावजूद वामदलों के फार्मूले को ही अपना लिया है, जिस फार्मूले से वे तीन दशक तक बंगाल की सत्ता पर काबिज रहे. मुहल्लों और पंचायतों की सत्ता पर कब्जा और राजनीतिक हिंसा. बंगाल के कई वाम कार्यकर्ता अब ममता दीदी के साथ हैं और अपनी दादागिरी बरकरार रखने के लिए बंगाल को हिंसा की आग से उबरने नहीं देते. ममता बनर्जी के एक अक्षम नेता साबित हो रही हैं. उसे नीतीश कुमार से यह बात तो सीखनी ही चाहिए कि उसने बिहार को कैसे राजनीतिक हिंसा के भंवर से निकाला. अगर नहीं सीखती हैं तो बंगाल इसी तरह जलता रहेगा.

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  • June 11, 2018 at 5:49 pm
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    Ranjay Tripathi
    5 hrs · DU में हम पढ़ते थे कई मित्र JNU में थे जो कभी साथ में स्कूल में थे .. या फिर हमने ग्रेजुएशन करके आगे दुसरे जगह पढ़ना चालू किया और कुछ साथ के DU वाले JNU पहुँच गए MCA, M. Sc करने .. इस कारण और फिर कार्य भी ऐसा कि JNU से जुड़ाव – आना जाना बना रहा काफी समय तक … जब हम ग्रेजुएशन में थे तब JNUSU का प्रेजिडेंट बना था चंद्रशेखर प्रसाद उर्फ़ चंदू …..अपने खूब वैचारिक मतभेद थे लेकिन फिर भी कहता हूँ कि उसके बाद JNU ऐसा नेता नहीं पैदा कर सका …. उसके बाद पैदा हुए तो सिर्फ मुफ्तखोर, गांजाबाज़ और चिड़ीमार टाइप … चंदू को बहुत सुना … चंदू वैचारिक सोच, सोच को शब्दों में व्यक्त करके शाब्दिक जाल से लोगों को जोड़ देने वाला और हथियार बंद लड़ाई का कट्टर पक्षधर था .. चंदू के बोलने पर अच्छे अच्छे सम्मोहित हो जाते थे, गाँव जवार के लोगों की क्या बिसात … उसकी बेजोड़ oratory और हथियार बंद लड़ाई (CPI – माले) वाली विचारधारा – दोनों एक deadly combination था …
    . मेरी कई बार बात हुई उससे JNU में लेकिन सबसे बड़ी और लम्बी बात हुई थी … इसी कड़ाके की गर्मी के दिनों में JNU लाइब्रेरी के पास वाले बस स्टेशन पर पेंड़ के नींचे खड़े खड़े .. बड़ी लम्बी सीख दे गया था चंदू…उसने कहा कि जब हम सोचते हैं तो 15 – 20 साल आगे की सोचते हैं … जब कहीं चलते हैं तो उसके 200 किलोमीटर के आगे का रास्ता क्लियर करके चलते हैं .. तरीके बदल जाते हैं हर कदम लड़ाई के .. ऐसा कोई स्थान या व्यवस्था नहीं जहाँ अपने सोच और विचरधारा की गुंजाइश न हो ..हर ऐसे व्यवस्था और संस्थान में अपनी वैचारिक लड़ाई लड़ते रहना चाहिए .. इसको जीत लिया तो हथियार तो सिर्फ डराने के लिए होते हैं .. .
    कम्युनिष्ट लोगों ने हर संस्थान में खुद को घुसाया .. फिल्म एक बड़ा माध्यम है .. पहले तो अपने पास कोई माध्यम नहीं था .. आज ले दे कर SM है, सोशल मीडिया की लिमिटेशन है .. एक पोस्ट सब मिला के १००० लोग भी देख पाए तो बहुत बड़ी बात है … 4 – 5 वर्ष पहले एक फिल्म आई थी OMG और उसने समझा दिया कि भगवन कृष्ण असल में कृष्णा वासुदेव यादव थे … बाँट दिए गए भगवन जाती में .. “काला पत्थर” ने बताया कि कोयले के व्यवसायी मजदूरों का खून पीते हैं – नक्सलबाड़ी आंदोलन को तड़का लग गया और इसके साथ कन्धमाल से लेकर रामागुंडम भी जुड़ गया … मदर इंडिया ने बताया कि हर लाला सुखी राम होता है – मिल गया कम्युनिज्म को देशव्यापी समर्थन … फराह खान ने बनाई “मैं हूँ न” जिसने पाकिस्तान को शान्ति का पैगाम देने वाला और भारतीय सेना के अफसर को आतंकवादी तथा शान्ति समझौते का विरोधी बताया गया – मिल गया “अमन की आशा” वालों को वैश्विक समर्थन ..बनी हुई फिल्म – काल खण्ड और घटना को जोड़िए फिर देखिए कि कैसे फिल्म का शानदार उपयोग किया कम्युनिस्टों, इस्लाम और ईसाई ब्रिगेड ने … हमारे लोग गैंग्स ऑफ़ वासेपुर के रामाधीन सिंह का डायलाग पकड़ के चूतिया बने घूम रहे हैं … और ये न समझ रहे की कैसे शानदार तरीके वही उनको बनाया गया है …
    . अखबार आज तक न छाप पाए हम कोई … भारत में अंग्रेज़ों ने पहला अखबार 1780 में निकाल दिया कलकत्ता से और अगले 20 वर्षों में 15 के ऊपर अखबार निकाल दिए इन्होने जिसमे से 5 के लगभग भारतीय नामों के थे और वो धर्म परवर्तन के बड़े हथियार थे …मूलतः ईसाइयत को फ़ैलाने और अंग्रेज़ों का एजेंडा आगे करने को …. उसके जवाब में मुसलमान मदरसा संस्थापकों ने कलकत्ता, लाहौर और दिल्ली से 1856 में ही अखबार निकालने शुरू कर दिए और सफलतापूर्वक धर्मपरिवर्तन से लड़े … जबकि 1857 से पहले लाखों हिन्दू ईसाई बन गए .. हिन्दू प्रबुद्ध लोगों का समूह का समूह ईसाई बन गया … पूरी तरह से एक हिन्दू दर्शन और सोच वाला अखबार आने में 1948 का वर्ष आ गया और वो भी कोई पढ़ता नहीं …. बीच में आए हिंदी नाम अख़बारों से धोखा न खाए वो सब कम्युनिष्टों ने छापा था ..
    .कल जब फिल्म “परमाणु” देखा और उसके बारे में लिखा और उसके पहले जब Buddha in a Traffic Jam देखी थी तब चंदू का कहा याद आया कि “हम 20 साल आगे की सोचते हैं और आप लोग दिल से सोच के वहीँ थोड़ी देर में फुस्स हो जाते हैं ..” चंदू गलत था वो 20 साल आगे की सोचते हैं और हम अपने ही किसी सोचने वाले को गरिया के ढेर कर देते हैं …

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  • July 1, 2018 at 4:05 pm
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    एक सन्घि लेखक – 1967 में उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस के कुछ विधायक तोड़ कर व अन्य छोटे दलो को मिला कर संयुक्त विधायक दल के नाम से सरकार बनाई। सरकार बनाते ही गुड को उत्तर प्रदेश से बाहर ले जाने पर लगा प्रतिबंध हटा दिया। गुड के दामो में बहुत तेज़ी से व बहुत ज़्यादा उछाल आया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गाँवो में जो सम्पन्नता आयी आज तक बनी हुई है। कृषि उत्पादो के व्यवसाय पर लगे प्रतिबंध हटाने से यही होता है।
    हमारे गाँव के दो किसान परिवारों ने “पूँजी” हाथ आ जाने की वजह से entrepreneur बन जाने का निर्णय लिया। दोनो ने ट्रक ख़रीदे। एक ने नया लिया व परिवार का एक सदस्य उसका क्लीनर बन गया। दूसरे ने पुराना लिया व ड्राइवर व क्लीनर परिवार के ही सदस्य बने।
    पहले का ट्रक एक साल में बिक गया, परिवार पर क़र्ज़ हो गया व बमुश्किल कर्जे से बाहर आए।
    दूसरे परिवार का ट्रक दो साल में बिका। लेकिन ट्रक जो क़र्ज़ा दे गया, वो क़र्ज़ा उतारने में सारी, याने सारी, खेती की ज़मीन बिक गयी।
    पूँजी क्या है? जो भी हम आय अर्जित करने में प्रयोग करते है वह पूँजी है: धन, घर, हमारा ज्ञान, हमारी skills। आय वह धन है जो हम रोज़/महीने में/ साल में कमाते है। बचत वह है जो हम आय में से ख़र्चे करने के बाद बचा लेते है। अगर हम बचा रहे है तो बचत अग़ले वर्ष के लिए हमारी पूँजी बन जाती है व पूँजी बढ़ जाने से हमारी आय बढ़ जाएगी व उससे बचत बदग जाएगी व दूसरे साल हमारी पूँजी और बढ़ जाएगी अत: आय व बचत और बढ़ जाएगी, and so on….
    इसके विपरीत अगर हम आय से ज़्यादा ख़र्च कर रहे है तो इसका मतलब है कि हम अपनी पूँजी भी खा रहे है, तो अगले साल हमारी पूँजी कम रह जाएगी अत: आय कम होगी व और अगर हमने अपने ख़र्चे कम नहीं किए तो हमारी पूँजी और तेज़ी से कम होगी व हमारी आय अर्जित करने की क्षमता उतनी ही तेज़ी से कम होगी।
    बस इतना सा ही है पूरा अर्थशास्त्र……
    दो सौ साल पहले एक मुफ़्तखोर ठग पैदा हुआ, मार्क्स नाम था उसका। बोला जिनके पास पूँजी है वे ही धनी है और पूँजी होने की वजह से ही वे धनी है व अन्य लोग उनके पास काम करने को विवश है व इसलिए शोषित है। उनसे पूँजी छीनकर अगर सरकार अपने क़ब्ज़े में ले ले तो सब लोग सरकार के पास काम करेंगे व किसी का शोषण नहीं होगा।
    और विनाश आरम्भ हो गया। सारे मुफ़्तख़ोर मार्क्स के साथ हो लिए। आज तक विनाश चल रहा है।
    जबकि:
    १. धनी होने के लिए पूँजी की नहीं, व्यवसाय करने की स्वतंत्रता चाहिए होती है। गुड के व्यवसाय पर से जैसे ही सरकारी नियंत्रण समाप्त हुआ, किसानो के दिन फिर गए।
    २. Entrepreneur पूँजी से नहीं बनते। ट्रक उस समय भी चलते थे जब हमारे गाँव के दोनो किसान परिवारों ने लिए थे, व आज भी चलते है, अधिकतर मुनाफ़ा कमाते है इसीलिए चल रहे है। वे दोनो परिवार इसलिए बर्बाद हुए क्यूँकि उनके पास धन तो था, लेकिन जो धंधा आरम्भ किया उसका कोई ज्ञान नहीं था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गाँवो के बहुत से किसान परिवार आज भी अन्य व्यवसाय कर रहे है व बहुत अच्छा कमा रहे है।
    कौन entrepreneur है व कौन नहीं किसी को नहीं पता। UPSC कुछ भी करे, entrepreneur select नहीं कर सकता। दुनिया की कोई सरकार, कोई परीक्षा आज तक नहीं कर पायी।
    Entrepreneur मिट्टी में मिला वो सोना है जो केवल और केवल मार्केट की आग में तप कर ही निखरता है। उसके लिए आवश्यक है कि मार्केट हो, व मार्केट स्वतंत्र हो। जिन देशों के शासक सत्यनिष्ठ है व ये समझ गए, वे देश सम्पन्न है, बाक़ी सब ग़रीबी व भूखमरी झेल रहे है।
    इसीलिए मोदी का मुद्रा लोन भारत का भाग्य बदलने की क्षमता रखता है। बहुत सारे लोगों को छोटी छोटी मात्रा में धन दे दिया गया है: कुछ खोकर बैठ जाएँगे, कुछ सफल होकर व्यवसायी बन जाएँगे, कुछ अम्बानी अदानी बन जाएँगे। अगर मार्केट की स्वतंत्रता बरक़रार रही, व बढ़ती रही तो…….अगर निजी सम्पत्ति सुरक्षित रही व क़ानून व्यवस्था अच्छी रही तो……..
    ऐसा ही मैंने कुछ कल भी लिखा था। ऐसा ही में कुछ कल भी लिखूँगा। अधिकतर मानते नहीं है। कुछ सरकारी अधिकारी है जो मानते है कि UPSC द्वारा चुने होने की वजह से वे entrepreneur है व उनके पास सारी समस्याओ का हल है इसलिए सब कुछ उनके नियंत्रण में होना चाहिए। कुछ निजी व्यवसायी है जो मानते है कि अब कोई और व्यवसायी उनको competition देने नहीं आन चाहिए। कुछ सीधे सीधे मूर्ख है जो कुछ भी पढ़ने को व सीखने को, व सोच बदलने को तैयार नहीं है।
    लेकिन……… लेकिन कुछ सत्यनिष्ठ भी है जी मानते है कि भारत इतना ग़रीब है तो कुछ तो हम ग़लत कर रहे है और हमें सपमन्न देशों से सीखना चाहिए व उनके जैसे ही सिस्टम अपनाने चाहिए।

    उन्ही के लिए लिखता हूँ में।
    जय माँ काली।
    मुफ़्तखोरो का व उनको बढ़ावा देने वाले सरकारी अधिकारियों व नेताओं का विनाश हो व entrepreneur स्वतंत्र हो जाए व परिणामत: भारत सम्पन्न हो जाए।

    #Copied

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  • November 7, 2018 at 8:48 pm
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    Ashok Kumar PandeyYesterday at 09:31 · ग़ुलाम हिंदुस्तान के एक रईस ख़ानदान में पैदा होना उनकी च्वायस नहीं थी। जब च्वायस करने लायक़ हुए तो चुनी उन्होंने आज़ादी की लड़ाई और पैदा किया उसमें सबकुछ होम कर देने का जज़्बा। समझ और बढ़ी और इस आज़ादी की परिभाषा में शामिल हुआ इंसान को हर तरह के शोषण से मुक्त करने का सपना। “अंगारे” में शामिल कहानियाँ हों कि “पिघलता नीलम” की नज़्में, उस जज़्बे का आईना हैं और प्रलेसं का इतिहास “रौशनाई का सफ़र” तो एक ज़िंदा दस्तावेज़ है उस रौशन वक़्त का।
    क़लम को अपना हथियार बनाने वाले सज्जाद साहब ने अंजुमन तरक्कीपसंद मुसन्नेफ़ीन (प्रगतिशील लेखक संघ) की जो बुनियाद डाली वह इसी लड़ाई का हिस्सा थी, और वह इसे बुलन्दी तक ले गए।कम्युनिस्ट पार्टी के इस पूरावक़्ती कार्यकर्ता को जब आज़ादी के बाद पाकिस्तान जाकर पार्टी बनाने का हुक्म दिया गया तो बिना किसी हील हुज्जत के तीन मासूम बेटियों और रज़िया जी को छोड़कर वहाँ चले गए जो कल तक अपना ही मुल्क था। लेकिन जब पराया हुआ वह तो ऐसा कि कॉन्सपिरेसी केस में फाँसी के फंदे के क़रीब पहुँच गए। दुनिया भर के लेखकों के हस्तक्षेप से आज़ाद हुए तो उनकी कोई नागरिकता ही न बची थी। ख़ैर वह नेहरू का वक़्त था, अदीबों की इज़्ज़त थी तो हिंदुस्तान लौट सके अपने परिवार के पास। लौटने के बाद फिर लग गए वह अपने मोर्चे पर। देश भर के ही नहीं एशिया अफ्रीका और दुनिया भर के लेखकों को एक मंच पर लाने की मुहिम में। इंटरनेशल राइटर तो बहुत हैं हिंदुस्तान में लेकिन इंटरनेशन राइटर्स लीडर शायद वह अकेले थे।
    आज जन्मदिन पर बाबा ए हिंदुस्तानी तरक्कीपसंद तहरीक अपने साथियों के बन्ने भाई कॉमरेड सज्जाद ज़हीर को लाल सलाम।
    इंक़लाब ज़िन्दाबाद…

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  • December 31, 2018 at 11:08 pm
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    fek id —————————————————–
    Megha M21 December at 20:16 · मेरे पिता तीस-पैतीस साल पहले पढ़ते थे दिल्ली यूनिवर्सिटी में। उस जमाने में वामपंथ का क्रेज आज से काफी ज्यादा था। जेएनयू तो था ही गढ़ पर स्थिति यह थी कि एम्स जैसे संस्थानों से सालों-साल पढ़ाई करके निकले बहुत से डॉक्टर अपने सारे ज्ञान का प्रयोग साइकिल पर लाल झंडा लगा कर रैली निकालने में कर रहे थे। वामपंथ का बड़ा ही charged atmosphereहुआ करता थापापा बतलाते हैं कि उनके कुछ डॉक्टर दोस्त अपने करियर से इतना कट चुके थे कि उनसे पैरासिटामोल भी prescribe करवाने में इंसान को डर लगे। पर तब सोवियत यूनियन जिंदा था और ये युवा खून पूरी दुनिया को लाल करने का सपना लिये अपने करियर, पढ़ाई-लिखाई, पारिवारिक जिम्मेदारियों की तिलांजलि दे रहे थे। They all were after some greater good.

    पर ऐसा भी नहीं था कि हर विद्दार्थी राजनीति में कूदने को तैयार बैठा था। उन्हें तैयार करवाया जाता। यहाँ धड़ल्ले से प्रयोग में आती थी औरतें। भारत आज भी बहुत मॉडर्न नहीं है। फिर वह जमाना तो और ही था। बेचारे लड़को की पूरी कॉलेज लाइफ निकल जाती किसी लड़की से बात किये भी। ऐसे में जब कोई लड़की दोस्त बनने में रुचि दिखाये, राजनीति जैसे गम्भीर मुद्दे पर आकर चर्चा करें, तो सख्त से सख्त लौंडे भी पिघल जाते। फिर वे लड़कियाँ आपको अपने दोस्तों से मिलवाती जोकि बड़े-बड़े सामाजिक मुद्दों में अपनी भागीदारी लिये होते। कुछ रैली आपको भी अटेंड करने का मौका मिलता, कुछ जिम्मेदारियां आपको भी दी जाती, और देखते-देखते आप वामपंथी पार्टी का हिस्सा होते।

    लड़की साथ रहती या जाती वह अनिश्चित था पर एक बार राजनीतिक रूप से सक्रिय हो जाने के बाद उससे निकलना बड़ा मुश्किल होता। आप निकलने की कोशिश करते तो आपके दोस्त, सीनियर, और पूरा सर्किल आपको वापस खींच लेता। आपको दुनिया की प्रति जिम्मेदारियां बताई जाती, स्वार्थ के लिये धिक्कार जाता, उत्साहवर्धन भाषण दिया जाता।

    यह होता था अपने किस्म का लव जिहाद जिसे honey trap और peer pressure के मिलावट से बनाया जाता था। एक परम्परावादी घर में स्त्री का बहुत महत्व है एक माँ, बहन या पत्नी के रूप में किसी विचारधारा को फैलाने में। पर स्त्री देह का एक अलग प्रयोग हुआ है वामपन्थ, फिमिनिज्म या यहाँ तक कि ड्रग्स जैसी चीजों के कस्टमर तैयार करने में।

    Honey trap तब तक खत्म नहीं होने वाला जबतक कि लड़की देखते ही दिमाग सुन्न कर लेने वाले पुरुष मौजूद हैं। ऐसे पुरुषों के भी खत्म होने के आसार नजर नहीं आते। रोमांस का बादशाह भी आपको सीखा देता है कि कैसे जारा के चक्कर में कैप्टन वीर ने देश के बजाए अपने निजी हितों के लिये त्याग किया।

    आज भीे ऐसे बहुत से पुरुष हैं जो कभी न्यायसंगत बात करते थे पर अपनी जिंदगी में आयी किसी क्रांतिकारी स्त्री के चक्कर में अचानक से हिंदुत्व और परम्पराओ से जुड़ी हर चीज में कमी निकालने लगे हैं।

    जरूरी नहीं है कि अपने प्रेमियों को नया विचारधारा देने वाली ये लड़कियाँ किसी organization का हिस्सा हो। वे बस क्रांतिकारी सोच के साथ किसी ऐसे लड़के को चुन लेती हैं जो बिना पेंदे के लोटे होते हैं। अब ऐसी औरते जो हर रिश्ते में ही तराजू से तौल कर बराबरी ढूंढती हैं, विपरीत लिंग द्वारा किये गये हर हरकत पर माइक्रोस्कोप से शोषण के किसी नैरेटिव को खोजने की कोशिश करती हैं, सामान्य परम्परागत औरतों (जिसमें अक्सर लड़के की माँ भी आती है) की हर श्रद्धा का उपहास करती हैं, उनके साथ टिकने के लिये लड़के को रीढ़विहीन जीव होना ही पड़ेगा। वरना जहाँ लड़की को बेचारे की बातों में patriarchal का छर्रा भी नजर आया, वह पिछवाड़े पर लात मार कर भगा देगी। और शोषण के नैरेटिव को तैयार करने की manufacturing factory है वामपंथी, फिमिनिज्म (so-called) और लिबरल(again so-called) विचारधारा। तो पता नहीं कब आइसक्रीम का रंग या परांठे का शेप भी समानता के युध्द का कारण बन जाये। मने एक कट्टर क्रांतिकारी के साथ एक बिना पेंदे का लोटा अनिवार्य पैकेज है रिश्ता चलाने के लिये।

    तो पुरुषजाति को अभी अपने इन रीढ़विहीन भाइयों के हौसलाअफजाई की जरूरत है और कोई भी कट्टर क्रांतिकारी विचारधारा वाली स्त्री को चाहिये कि थोड़ी अलग सोच को भी कभी-कभी पचा जाये। अब प्रेमी ढूंढ रही हैं, जुड़वा भाई थोड़ी ना। 😀

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  • August 22, 2019 at 2:49 pm
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    -R S Tiwari
    20 August at 07:21 ·
    एक आध अपवादों को छोड़ दिया जाय तो मुझे आज तक एक भी भौतिक विज्ञानी , केमिकल साईटिंस्ट , जीव विज्ञानी , गणितज्ञ , टॉप सर्जन , टॉप डॉक्टर , टॉप रॉकेट साईटिस्ट वामपंथी नहीं मिला । कोई धावक, मुक्केबाज़ या मल्ल योद्धा भी नही मिलता वामपंथ में ।

    ये सब , बकैत शास्त्र में ही निपुण होते हैं । अधिकतर वामपंथी, पत्रकारिता ,मनोविज्ञान , फिलॉस्फी , इतिहास , इकॉनॉमिक्स और लैंगुएज के क्षेत्र के ही तथाकथित विद्वान होते है ।

    आप इतिहास पढ़कर कुछ भी बकैती कर सकते हैं पर यदि हार्ट खोलने वाला सर्जन बकैत होगा तो आपका जीवन संकट में पड़ जाएगा ।
    यह एक हल्की पोस्ट है पर इसको गम्भीरता से सोचिएगा , अवश्य ।——————————————————————————————————————–संजय श्रमण jhothe — भारत में इंजीनियरिंग मैनेजमेंट मेडिसिन या तकनीक की अकेली पढाई पूरी कौम और संस्कृति के लिए कितनी घातक हो सकती है ये साफ नजर आ रहा है। इस श्रेणी के भारतीय युवाओं में समाज, सँस्कृति, साहित्य, इतिहास, धर्म की अकादमिक समझ लगभग शून्य बना दी गयी है। ये तकनीक के “बाबू” देश के लिए बड़ा खतरा बन गए हैं।

    अकेली तकनीक,साइंस, मैनेजमेंट या मेडिसिन पढ़ने वालों से कभी बात करो तो पता चलता है कि ये व्हाट्सएप के प्रोपेगण्डा के कितने आसान शिकार हैं। इनमे से अधिकांश लोगों को इतिहास, समाज, सँस्कृति आदि की कोई समझ नहीं है, ये कल्पना भी नहीं कर पाते कि जैसे मेडिसिन या तकनीक की पढ़ाई की अपनी गहराई या ऊंचाई है उसी तरह साहित्य, दर्शन, राजनीति और सामाजिक विमर्श की भी अपनी गहराइयाँ और ऊंचाइयां होती हैं।

    ये तकनीक, मेडिसिन, मैनेजमेंट या साइंस के “बाबू” एक खतरनाक और आत्मघाती फौज में बदल गए हैं। दुर्भाग्य की बात ये भी है कि ये लोग सांप्रदायिक, धार्मिक और जातीय दुष्प्रचार के सबसे आसान शिकार हैं। आजकल के बाबाओं और अध्यात्म के मदारियों की गुलामी में इन बाबुओं की पूरी पीढ़ी बुरी तरह फस चुकी है.

    ये ही अप्रवासी भारतीयों की उस फ़ौज के निर्माता हैं जो विदेश से भारतीय संप्रदायवाद को पैसा और समर्थन भेजते हैं या यूरोप अमेरिका में पोलिटिकल या कोर्पोरेट लाबिंग करते हैं.

    भारत मे समाज विज्ञान और मानविकी (ह्यूमेनिटीज) के विषयों की जैसी उपेक्षा और हत्या की गई है वह भयानक तथ्य है। ठीक मिडिल ईस्ट और अरब अफ्रीका के जैसी हालत है, आगे ये हालत और बिगड़ने वाली है।

    विज्ञान तकनीक मेडिसिन आदि को यांत्रिक ढंग से सीखकर कुछ सवालों के जवाब देने इन्हें आ जाते हैं, कुछ बीमारियों का इलाज करना, कुछ प्रबंधकीय समस्याओं को सुलझा लेना या “यूरोपीय या अमेरिकी” प्रेस्क्रिप्शन पर खड़े मोडल्स को चला लेना इनकी कुल जमा विशेषज्ञता है. ये असल में अच्छे आज्ञापालक हैं जो तकनीकी आज्ञाओं का पालन करके कुछ काम कर लेते हैं.

    ये स्वयं अपनी इंजीनियरिंग मेडिसिन या मेनेजमेंट में कितना नवाचार या शोध कर रहे हैं ये जगजाहिर बात है, उस मामले में ये फिसड्डी थे आज भी हैं क्योंकि इनमे क्रिटिकल थिंकिंग की कोई ट्रेनिंग ही नहीं है, ये सिर्फ अपने कुवें के मेंढक बने रहते हैं, जैसे ही यूरोप अमेरिका से कोई नई तकनीक पैदा होकर आती है वैसे ही ये उसका सबसे सस्ता या देसी संस्करण बनाने में लग जाते हैं.

    इसी से ये खुद को “वैज्ञानिक” भी सिद्ध करवा लेते हैं. फिर आगे बढ़कर इस विज्ञान को वेद उपनिषदों में खोजकर दिखाने वाले बाबाओं के चरण भी दबाने पहुँच जाते हैं. इन अधकचरे तकनीक के बाबुओं की भीड़ से घिरे हुए बाबाजी फिर दुनिया भर में हल्ला मचा देते हैं.

    ये बाबू और बाबा समाज में रूतबा रखते हैं, चूँकि इनके पास पैसा होता है कारें होती हैं और कारपोरेट की लूट के ये सीधे हिस्सेदार हैं इसलिए लोग इन्हें समझदार समझते हैं. भारत जैसे गरीब अनपढ़ और अन्धविश्वासी समाज में ज्ञानी और बुद्धिमान वही समझा जाता है जिसके पास पैसा हो बड़ा बंगला या कार हो. ये तकनीक के बाबू इसपर खरे उतरते हैं. इसीलिये ये दुष्प्रचार के सबसे आसान शिकार और उपकरण बन गये हैं.

    इनकी अपनी पढाई पर भी गौर किया जाए विज्ञान विषयों की शार्टकट और ट्रिक सीखते हुए ये इंजीनियरिंग मेनेजमेंट या मेडिसिन की पढाई में प्रवेश करते हैं. ऊपर से धन कमाने की मशीन बन चुके कोचिंग संस्थान इन्हें इंसान भी नहीं रहने देते. जिस विज्ञान की ये ढपली बजाते हैं उस विज्ञान और तकनीक को भी एकदम भक्तिभाव से घोट पीसकर चबा जाते हैं कोई क्रिटिकल थिंकिंग नहीं की जाती.

    कोचिंग या तैयारी के दौरान पैसा खर्च करके बिलकुल रट्टा घोटा मारकर जैसे ये कालेज में घुसते हैं वसे ही बाहर निकलते हैं और पैसा कमाने की मशीन बन जाते हैं, तब ये भीड़ यथास्थिति बनाये रखना चाहती है ताकि इनके माता पिता ने अपनी क्षमता से बाहर जाकर भले बुरे ढंग से कमाते हुए इनपर जो खर्च किया है वह इस समाज से वसूल किया जा सके.

    ये अर्थशास्त्र भारत के भविष्य पर भारी पड़ रहा है. इसके कारण ये धनाड्य लेकिन अनपढ़ पीढी भारत में सामाजिक बदलाव या क्रान्ति की सबसे बड़ी दुश्मन बनकर उभर रही है.

    ऐसी यथास्थितिवादी और सुविधाभोगी ‘कुपढ़’ भीड़ को हांकना धर्म, सम्प्रदायाद और राष्ट्रवाद के लिए बहुत आसान है. वे बड़े पैमाने पर हांके जा रहे हैं. इन लोगों पता ही नहीं कि वे अपने और अपनी ही अगली पीढ़ियों की कब्र खोद रहे हैं.

    इस “तकनीक की बाबू” पीढ़ी से अब इतना बड़ा खतरा पैदा हो चुका है जिसका कोई हिसाब नहीं. ये पीढी चलताऊ राष्ट्रवाद, अध्यात्म, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और अतीत पर गर्व इत्यादि के बुखार में सबसे आसानी से फसती है और जहर फैलाने को तैयार हो जाती है. ये पीढी भारत के सभ्य और समर्थ होने की दिशा में एक बड़ी बाधा बनकर उभर रही है.

    इस पीढी को या अगली पीढी को अगर मानविकी विषयों, साहित्य, काव्य, इतिहास दर्शन आदि की थोड़ी समझ नहीं दी गयी तो ये सामूहिक आत्मघात के लिए बेहतरीन बारूद बन जायेंगे जिसे कोई भी सनकी तानाशाह या धर्मांध सत्ता आसानी से जब तब सुलगाती रहेगी

    -संजय श्रमण—–

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  • January 25, 2020 at 2:28 pm
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    राजीव म
    17 January at 12:03 ·
    जरा फिर से सोचिये, केजरीवाल आपको दिल्ली में कौन सा वामपंथी स्वर्ग देने वाला है…
    विषैलावामपन्थ
    एक इटालियन मित्र ने बताया…इटली में कम्युनिष्टों की बहुत मजबूत परंपरा रही है. एंटोनियो ग्राम्स्की तो खैर एक कम्युनिष्ट आइकॉन ही है. कम्युनिष्ट रशियन ब्लॉक से बाहर इटली की कम्युनिष्ट पार्टी पश्चिमी यूरोप में सबसे बड़ी थी. 90 के दशक में कभी यह चुनकर सत्ता में भी आई थी.
    मैंने पूछा, ऐसा कैसे हुआ कि यूरोप में रह कर भी इटली वालों को यह पता नहीं चल पाया कि आयरन कर्टेन के पीछे जीवन कैसा है? लोगों का कम्युनिज्म के प्रति मोह क्यों खत्म नहीं हुआ? क्या आप लोग कम्युनिज्म के अंदर जीवन कैसा होता है यह नहीं जान पाए?
    उसने कहा, शायद पूरी तरह नहीं. अमेरिका में जैसे कम्युनिज्म को शत्रु बना कर पेश किया गया, उतना इटली में नहीं हुआ, क्योंकि शायद खुद मीडिया इनके ही प्रभाव में था. पर कहानियाँ सुनते थे कि कैसे उस तरफ, पूर्वी यूरोप और रूस में ब्रेड के लिए हजारों लोगों की कतार लगती थी. कैसे एक अमेरिकन जीन्स लोगों का सपना हुआ करता था.
    उसकी पहली गर्लफ्रेंड मालडोवियन थी. माल्दोवा कम्युनिस्ट रूस से अलग हुआ एक देश है. वह बताती थी कि पूर्वी यूरोप में लोगों को लगता था कि पश्चिमी यूरोप कितना सम्पन्न है…मानों फुटपाथों पर सोने के सिक्के जड़े हों…पैसे तो जैसे कूड़े के डब्बे में मिलते हों. तो जब रूस टूटा तो सारे भागे पश्चिम की तरफ.
    पर उसे एक तरह से बहुत निराशा भी हुई. सबकुछ बेहतर तो था…पर यह क्या? यहाँ तो हर चीज के पैसे लगते हैं. स्कूल हो या हॉस्पिटल…हर चीज के पैसे लगते हैं, कुछ भी मुफ्त नहीं है. आप काम करके पैसे कमाते तो हो, पर उसे कहीं ना कहीं खर्च कर देते हो. कभी कभी तो मन करता है, वापस वही कम्युनिस्ट रूस का जमाना आ जाता…वहाँ कम से कम स्कूल, कॉलेज, हॉस्पिटल मुफ्त थे…जैसे भी थे, पर मुफ्त थे…हम गरीब थे, पर यह संतोष तो था कि हर कोई गरीब था.
    वामपंथी स्वर्ग की यही हकीकत है. आप गरीब तो होते हैं पर इस सुख से सुखी होते हैं कि सभी गरीब हैं. आपको स्कूल और हॉस्पिटल मुफ्त मिलते हैं, आप इसी में खुश हो…चाहे जैसे भी हैं, मुफ्त तो हैं…काम करके, पैसे कमा के आप उससे अच्छा अफोर्ड कर सकते हो पर उसकी कमी खलती है जो मुफ्त मिलता था. लोगों को निकम्मा, कामचोर, असहाय और आश्रित बना देना ही वामपंथ का सबसे बड़ा हथियार है.

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