”अमीरी का बुखार”

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by— गिरीश मिश्र
प्रस्तुति सिकंदर हयात

(वरिष्ठ अर्थशास्त्री और लेखक गिरीश मिश्र जी दुआरा लिखा ये प्रसांगिक लेख कुछ वर्ष पूर्व राष्ट्रीय सहारा हिंदी अखबार में लिखा गया था वही से साभार )
इधर कुछ वर्षो से एक नयी बीमारी या यो कहे की महामारी भारत को अपने चंगुल में लेती जा रही हे . इन्फ्लुएन्जा और बर्ड फ्लू की तरह ये पूर्व से नहीं आई हे तथा इसका प्रभाव अस्थायी नहीं हे एक बार इससे आक्रान्त होने के बाद इससे मुक्ति पाना बड़ा ही कठिन हे . अब तक न इसकी कोई दवा निकली हे न ही बचाव के लिए कोई टीका . यह बीमारी हे ” एन्फ्लूएंजा ” जिसका सम्बन्ध अमीरी या समृद्धि से हे . इसे हम अमीरी का बुखार या समृद्धि का ज़्वर कह सकते हे . इसका हमला गरीबो पर नहीं अमीरो पर होता हे इस बीमारी या महामारी का उद्गम अमेरिका में हुआ हे जहा से चलकर यह पश्चमी यूरोपियों देशो से होती हुई हमारे यहाँ पिछले एक डेढ़ दशक के दौरान पहुंची हे भूमंडलीकरण इसका मुख्य संवाहक हे . इसके विषय में हिंदी शबदकोशो में कुछ नहीं मिलता हे अंग्रेजी के भी गिने चुने शब्दकोशों में ही ” एन्फ्लूएंजा” शब्द का समावेश हो सका हे . वेब्सटर्स न्यूमिलेनियम डिक्शनरी के अनुसार यह चरम भौतिक वाद का घोतक हे . इसके शिकार लोग धन का संचय वस्तुओ और सेवाओ के अतिशय उपभोग के लिए करते हे . यह एक सामाजिक रोग हे जिसकी जड़ में उपभोक्ताकवाद और वय्वसायिकरण हे .इससे बचने का एक ही रास्ता हे सादा रहन सहन . इसके चंगुल में आये लोगो की सामाजिक राज़नीतिक एवं सांस्कर्तिक गतिविधियों में कोई रूचि नहीं होती वे आत्मकेंद्रित हो जाते हे .

” एन्फ्लूएंजा ” शब्द को मनोचिकत्स्क जेस्सी ओ निल ने अपनी १९९६ में प्रकाशित पुस्तक ” द गोल्डन घेट्टो : द साइकोलॉजी ऑफ़ एन्फ्लुएंस ” के जरिये प्रचारित किया याद रखने की बात हे की इंफ्लुएंजा की विविध किस्मे भारत में पिछली शताब्दी के दूसरे दशक से अबतक आमतौर पर पूर्व एशिया से आई हे मगर एन्फ्लूएंजा पश्चमी देशो विशेषकर अमेरिका से आया हे इंग्लैंड के प्रमुख मनोवैज्ञानिक ओलिवर जेम्स की जल्द प्रकाशित होने वाली इस रोग सम्बन्धी पुस्तक में इसके कारण और इससे बचाव के सामाजिक तरीको के बारे में बतलाया गया हे . उनके अनुसार वस्तुतः एन्फ्लूएंजा ऐसे जीवन मूल्यों का समुच्चय हे . जो मानसिक दबाव बढ़ाता हे क्योकि वह अधिकाधिक पैसे और सम्पत्ति के अर्जन के लिए उकसाता हे जिससे दूसरे की नज़र में ऐसे करना वाला का रुतबा बढे और तत्कालीन समाज में उसे अहमियत मिले . इसकी गिरफ्त में आने वाला उतावला और मानसिक तौर सदा अशांत रहता हे . भले ही वह व्यक्ति अपने और परिवार की अनिवार्य जरुरतो की और ध्यान न दे मगर वह मोटर गाड़ी , शानदार मकान बढ़िया कपड़ो आदि को येन केन प्रकारेण प्राप्त करने की कोशिश करता . जिससे उसके इर्द गिर्द रहने वाले उसकी अमीरी की धाक . माने प्रो ओलिवर जेम्स ने दुनिया के साथ महत्वपूर्ण देशो में जाकर इस परिघटना का विस्तृत अध्ययन किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचे की अमेरिकी जीवन शैली और मूल्यों को अपनाने से जीवन की बुनियादी जरूरते पूरी नहीं हो सकती और न ही देश या समाज विशेष की अपनी अलग पहचान बचाकर रखी जा सकती हे . मानसिक शांति और व्यक्तित्व का सही विकास तो बिलकुल असंभव हे . उलटे अमेरिकी जीवन शैली और जीवन मूल्यों को अपनाने वाले अमीरी के बुखार के जीवाणुओ से और ग्रस्त हो जाता हे जिससे छुटकारा पाना असंभव हे जेम्स के अनुसार अमेरिकी लोगो में मानसिक रोगियों का अनुपात सबसे अधिक हे . अमेरिका के बाद इस दर्ष्टि से ब्रिटेन कनाडा और ऑस्ट्रेलिया का स्थान हे जिन्होंने अमेरिकी जीवन शैली और मूल्यों को अपनाने में काफी उत्साह दिखलाया हे . मुख्य यूरोपियों देशो को एक साथ ले तो अमेरिका में औसतन तिगुने लोग मानसिक रोगो से पीड़ित हे . उन्होंने रेखांकित किया हे की आय के वितरण में विषमता का इससे गहरा सम्बन्ध हे . जहा जहा विषमता अधिक हे वहां मानसिक रोग अधिक हे . यह भी ध्यान रखने की बात हे की युवा पीढ़ी पुरानी पीढ़ी की उपेक्षा इस रोग से कही अधिक ग्रस्त हे . कारण स्पष्ट हे युवा पीढ़ी में अमेरिकी जीवन शैली और मूल्यों को अपनाने की ललक कही अधिक हे . जेम्स के शब्दों में एन्फ्लूएंजा सांस्कर्तिक सम्राज़्यवाद को बढ़ावा देता हे

अमीरी का बुखार ग्रामीण क्षेत्रो और गैर औद्दोगिक समुदायों को अपनी गिरफ्त में लेने में कोई खास सफल नहीं हो पाया हे उसका हमला सबसे अधिक शहरी जनसख्या पर होता हे क्योकि वहा आधुनिक मीडिया का असर काफी हे . आगे आने वाले समय में गावो में मीडिया की पेठ बढ़ने तथा वहा भी जनसँख्या का शहरी समाज से संपर्क बनने से अमीरी के बुखार के जीवाणु वहा भी अपनी पेठ बनाने में सफल हो जाएंगे .विज्ञापनों के बढ़ते असर का कुपरिणाम यह हुआ की आम लोग आवशयकता और अनिवार्य जरुरतो में भेद कर पाने में असमर्थ हो रहे हे . यह भेद मिटाने और लोगो को बिना सोचे समझे अधिकाधिक खरीदारी करने के लिए ही मुट्ठी भर कार्पोरेट जगत का मुनाफा लगातार बढ़ाया जा सकता हे उत्पादों में भले ही फर्क न हो और न उनका उपभोग आपके लिए अपरिहार्य हो मगर विज्ञापन के जरिये उनमे मानसिक तौर पर भेद किया जाता हे . साथ ही यह बतलाने की कोशिश की जाती हे की जब अमुक अभिनेता अभिनेत्री नेता या प्रतिष्ठित वयक्ति उस वास्तु या पेय पदार्थ को उपभोग में ला रहा तब आप पीछे क्यों हे ? सुनीता नारायण की बात मान कोला पेय को छोड़ आप अपने को अमीरो की जमात से अलग क्यों कर रहे हे ? स्वास्थय से अधिक आज जरुरी खुद को अमीरो की जमात में शामिल होना हे

वह जमाना लद गया जब पेसो की कमी खरीदारी और उपभोक्तावाद के आड़े आती थी . अब क्रेडिट कार्ड के जरिये तब तक खरीदारी करते रहिये जब तक आपका मन चाहे . मॉल में जाइए और बिना सोचे समझे की उत्पाद विशेष आवशयक हे या नहीं खरीदारी कीजिये . ” ऋण क्रेत्वा घृत पिबैत ” का दर्शन जीवन में अपनाइये . इसी को ध्यान में रख कर जॉन दे ग्राफ और उनके सहयोगियों ने अपनी पुस्तक ‘ एन्फ्लूएंजा : दी आल कन्ज्यूमिक एपीडेमिक ‘ में अमीरी के बुखार को कष्टदायक संक्रामक ऋण का जनक चांटा एवं मानसिक तनाव पैदा करने वाला बतलाया हे इससे समाज में संसधानो की बर्बादी के साथ ही येनकेन प्रकारेण पैसा कमाने की चाहत भ्र्ष्टाचार और भाति भाति के अपराध को जन्म देती हे अतः भूमंडलीकरण में किसी भी चर्चा में इस पहेली को नहीं भूलना चाहिए

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5 thoughts on “”अमीरी का बुखार”

  • October 10, 2014 at 10:20 pm
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    ” सादे गांधी कठिन गांधी ” गांधी जी सादा जीवन उच्च विचार का पाठ सिखाते थे और कम से कम चीज़ो के साथ संतोष में सुख की झलक देखते थे जाहिर हे गांधी जी का रास्ता असंभव रास्ता था जिस पर गांधी जी के अलावा और कोई नहीं चल सकता . इसलिए गांधी जी के नाम पर पाखण्ड होने लगा और गांधीवाद शब्द का ही धीरे धीरे अवमूल्यन होने लगा उनकी तकली चरखे खादी आदि का विलोप होने लगा जिस कांग्रेस को उन्होंने आज़ादी के बाद समाप्त करने का प्रस्ताव दिया था वह भ्र्ष्टाचार और कुशासन में मार्ग पर बढ़ती चली गयी दरअसल सत्य और न्याय की कसौटी पर खरे उतरने वाले सभी सिद्धांत अंततः आम आदमी के लिए अवयवहारिक हो जाते है आदमी की प्रकर्ति है की वह अपने लिए ही सब कुछ चाहता है पहले में और मेरा फिर तुम और तुम्हारा फिर सबका आता है क्यों मार्क्स का वैज्ञानिक दर्शन स्टालिन की तानाशाही के कारण विवादस्पद बना और कम्युनिसम के दुआरा नया मनुष्य गढ़ने का प्रयास अंततः बिल गए ? क्यों माओवाद की पेंदी में पूंजीवादी रस्ते के राहगीर दंग शयोओ पिंग ने सुराख कर डाला ? आज साम्यवादी चीन में भी बाजारवाद पैर फैला रहा है हम देख रहे की न रूस न चीन न अमेरिका में एक ऐसा नया मनुष्य गढ़ा जा सका है जो अपनी भौतिक उन्नति के साथ संतोष और सुख का अनुभव कर सके .सब जगह एक हाहाकार है कही समृद्धि है पूर्ण आज़ादी है तो कही उसका उलट भी है जरा सोचिये की तमाम उन्नति के बाद भी क्या आज का मनुष्य क्या ज़्यादा आक्रांत और परेशान नहीं है एक और समृद्धि की ऊँची मीनारों में मनुष्य दबा पड़ा है तो गरीबी ने मनुष्य को ही कुचल डाला है गांधी भौतिक समृद्धि के खिलाफ नहीं है और न ही वे विज्ञान और प्रगति के ही खिलाफ है वे पागल उपभोक्तावाद के खिलाफ है लेकिन आज ऐशो आराम और मौज़मस्ती और ऐश्वर्य की चाहत में मनुष्य चीज़ो के पीछे इस तेज़ी से भाग रहा है की ये चीज़े ही उसे कुचल डाल रही है वो भाग रहा है और कुचला जा रहा है गांधी जी का रास्ता कष्टकारी है उसमे आपको थोड़े से संतोष करना है कम से कम चीज़े और कम से कम झंझट . ज़्यादा से ज़्यादा त्याग और संतोष . इस रास्ते पर कौन चल सकता है ? झूठ बोलना आसान है अच्छे से अच्छे खाने पहने और रहने की चाहत आसान है हिंसा करना आसान है इसलिए हमने आसान रास्ता पकड़ा हुआ गांधी को पकड़ना वस्तुतः कठिन काम है सच्चा गांधीवाद वास्तव में मार्क्सवाद माओवाद और खुले बाज़ारवाद से कही अधिक कठिन है .( वरिष्ठ लेखक और संपादक मधुसूदन आनद जी के एक लेख के कुछ अंश साभार )

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  • December 19, 2016 at 9:40 am
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    बहुत बुरा हुआ अनुपम मिश्र जी नहीं रहे Om Thanvi
    22 mins ·
    हमारे समय का अनुपम आदमी –
    ये शब्द प्रभाष जोशीजी ने कभी अनुपम मिश्र के लिए लिखे थे। सच्चे, सरल, सादे, विनम्र, हँसमुख, कोर-कोर मानवीय। इस ज़माने में भी बग़ैर मोबाइल, बग़ैर टीवी, बग़ैर वाहन वाले नागरिक। दो जोड़ी कुरते-पायजामे और झोले वाले इंसान। गांधी मार्ग के पथिक। ‘गांधी मार्ग’ के सम्पादक। पर्यावरण के चिंतक। ‘राजस्थान की रजत बूँदें’ और ‘आज भी खरे हैं तालाब’ जैसी बेजोड़ कृतियों के लेखक।
    वे अनुपम भाई आज सुबह हमें छोड़ गए।
    कल रात एम्स में उनकी कराह मुझसे सुनी नहीं जाती थी। वह जानलेवा टीस बाहर तक सारे माहौल में पसरी थी। जिस कक्ष में वे थे, उसमें दाख़िल होने का साहस मैं देर तक जुटा सका। कभी परदे की ओट से उन्हें देखता, फिर पाँव पीछे हो जाते। असहनीय पीड़ा ही होगी। जबकि बरदाश्तगी के लिए अब छह की जगह हर तीन घंटे में मोर्फ़िन के इंजेक्शन दिए जा रहे थे। उन्हें कैंसर था जो पिछले कुछ दिनों में सारे शरीर में फैल चुका था।
    हम लौटे तो रास्ते में मैंने प्रेमलताजी से कहा, ये शायद अंतिम दर्शन न हों! वे चुप रहीं। मैंने कहा, हम कल आएँगे।
    पर सुबह 5.27 पर उन्होंने हम सबसे विदा ले ली।
    उनका शरीर बारह बजे गांधी शांति प्रतिष्ठान से निगम बोध घाट के विद्युत शवदावगृह ले जाया जाएगा।दोपहर एक बजे एक आख़िरी मुलाक़ात उनसे अब मौन में ही सही, पर वहाँ ज़रूर होगी।
    अनुपम भाई, जयहिंद!

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  • December 20, 2016 at 8:44 am
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    Sanjay Tiwari25 mins · कोई सेवक यह काम क्यों करेगा कि लाओ अपने पैसे तुम मेरे पास रख दो? अगर आप बैंकिंग सिस्टम को समझते हैं तो यह भी समझते होंगे कि बैंक केन्द्रित पूंजीवाद का सबसे सशक्त हथियार है। विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था में लेनदारी और देनदारी का जो काम लाखों लोग किया करते हैं पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में यही काम चंद बैंक करते हैं। इसलिए जन धन योजना असल में जन निर्धन योजना थी लेकिन कहा यह गया कि इससे देश मजबूत होगा।लेकिन बात वहां तक भी रहती तो ज्यादा मुश्किल न होती। अब उसके आगे जाकर कह रहे हैं कि चाय का बिल भी पेटीएम करो। तीन हजार तक की खरीदारी डिजिटल तरीके से करने के लिए ईनामों की सौगात दी जाएगी। मकसद साफ है कि छोटी पूंजी के वो लोग जो अभी तक बैंकिंग सिस्टम के बाहर थे वो बैंकिंग सिस्टम में आयेंगे और बड़ी मछली का पेट भरेंगे।ये दोनों योजनाएं किसी सेवक के दिमाग में नहीं आ सकती। यह किसी ठग के दिमाग में ही आ सकती हैं जो यह जानता हो कि जन धन ही सबसे बड़ा धन होता है। अगर उस पर हाथ साफ कर दिया जाए तो रातों रात अमीर हो जाएंगे। और कोई प्रधानमंत्री भले ही ऐसा पहली बार कर रहा हो लेकिन कंपनियां तो आये दिन ऐसा करती रहती हैं। सहारा कंपनी के खिलाफ तो सुप्रीम कोर्ट में ऐसी धोखाधड़ी का केस ही चल रहा है। उसने भी जन धन से हजारों करोड़ इकट्ठा कर लिये थे और फिर उसकी योजनाएं लुप्त हो गयीं थीं।ऐसी योजनाओं के जरिए जन धन के लूट का सबसे बड़ा फायदा ये होता है कि लुटने वाला बड़ी छोटी रकम खोता है लेकिन लूटनेवाला मोटा माल हथियाता है। मसलन चाय के लिए दस रूपये का अगर आप डिजिटल भुगतान करते हैं तो शायद सात पैसा आपको सेवाकर देना पड़े। क्या फर्क पड़ता है आपको सात पैसे से? लेकिन जो दस दस रूपये का भुगतान ले रहा है उसे भारी फर्क पड़ता है। उसकी कमाई लाखों और करोड़ो में होती है।खैर, अगर लोग समझदार होंगे तो इस लूट से खुद को बचाने का प्रयास करेंगे। डिजिटल मनी का इन्कार न करें लेकिन इस तरह से स्वीकार भी न करें। कैश और डिजिटल के बीच अपनी जरूरतों के मुताबिक एक संतुलन कायम रखें। यही आपके हित में है और यही भारतीय समाज के भी हित में है। बैंकों की गुलामी अच्छी बात नहीं है। यह कोई विकास नहीं है बल्कि मनुष्य और समाज का विनाश है। लोक मानस और लोक समझ को बचाते हुए अपनी अर्थव्यवस्था को अपने हाथ में रखिए। लॉटरी में मिलनेवाले करोड़ों की लालच में अपना हजारों बर्बाद मत करिए।Sanjay Tiwari

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  • June 7, 2018 at 10:54 pm
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    Devanshu
    2 hrs ·
    सोसायटी में नौकरीपेशा माताओं के ललनाओं को घुमाने फिराने के लिए छोटी उम्र की गरीब लड़कियां होती हैं । हमारी सोसायटी में भी हैं । उनमें से कुछ वक्त के मिज़ाज से मेल बिठाने के अच्छा पहनने ओढ़ने की कोशिश करती हैं । शिक्षा उनकी सातवीं आठवीं तक की होती है फिर इस महानगर की दारुण जिन्दगी में जीने के लिए उन्हें इस सेवाकार्य में उतरना होता है । उन्हें देखकर मेरा मन डूबता है । एक व्यक्त, अव्यक्त पीड़ा उनके चेहरों पर पसरी रहती है । जीवन के अथाह दैन्य में निरंतर डूबती हुईं वे हर रोज़ अनबुझी ख्वाहिशों की खोखल बनकर रह जाती हैं ।

    कितना पीड़ादायी होता होगा उनका हर क्षण जो निपट कठोरता से उन्हें याद दिलाता रहता होगा कि नहीं ! नही ! यह ऐशोआराम उनका सत्य नहीं ! सत्य तो वही खोली है, वही उमस, अंधकार, नैराश्य से भरा जीवन है । वही पानी की कतार है, इस विकट ताप में करवट बदलती रातें हैं , वही दस फुट के कमरे में पांच जानों को जीना है ।

    महानगरीय जीवन अब हमारे समय का कड़वा सच है । गांव के गांव यहां उठकर आ रहे हैं और हर दिन अपरिमित दुख, बेमेल जीवन को भोग रहे हैं । यहां रोटी तो मिल रही है पर हर क्षण मृत्यु है । दुख है । सिर्फ़ दारुण दुख । गांव में भी जीवन की खाई है पर इतनी गहरी नहीं है । जब तक भारत ग्रामीण था तब तक तृप्ति थी । जब से भारत शहरी हुआ है तब से अतृप्ति, आह है । पर, अब उपाय भी क्या है ? गांव में ज़मीन है नहीं । शहर में रोज़गार है और रोज़गार के साथ हर दिन इच्छाओं का दंश है । उन्हें इसी भंवर में उतरना है । यहीं जीना मरना है । सुविधाओं और ऐश्वर्य को देखे भोगे बिना रहना सरल है परंतु उन सुविधाओं, ऐश्वर्य को कुछ क्षण भोगते हुए अंततः अभाव के रेगिस्तान को पार करना एक वेदना है ।

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  • July 12, 2018 at 10:24 pm
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    Sanjay Shraman
    9 July at 21:06 ·
    भारत को विज्ञान और तकनीक की नहीं बल्कि मानविकी विषयों की समझ की सख्त जरूरत है.बार बार इस पर जोर देना जरुरी है.

    कई दार्शनिकों और विचारकों ने इस बात को दोहराया है … हमारे दौर के प्रख्यात चिन्तक कांचा आइलैया शेफर्ड भी दोहराते आये हैं कि जब तक किसी मुल्क या समाज में मानविकी विषयों, भाषा साहित्य, समाजशास्त्र, दर्शन इतिहास इत्यादि की ठीक पढ़ाई नहीं होगी तब तक वे मुल्क सभ्य नहीं बन सकते.

    आज जो सभ्यता और विज्ञान पश्चिम हमें सिखा रहा है उसकी बुनियाद में यह बात अनिवार्य रूप से छुपी हुई है कि यूरोप ने अपनी जमीन पर बहुत कुर्बानियां देते हुए स्वतंत्र विचार, तर्क और विज्ञान को विक्सित किया है.

    आप यूरोप के इतिहास को देखिये, पुनर्जागरण और उसके बाद एज ऑफ़ रिफोर्मेशन से पकते हुए यूरोप के चिंतकों ने समाज, धर्म, इतिहास, अर्थशास्त्र, राजनीती, साहित्य और दर्शन में गजब की उंचाई हासिल की. उसी की बुनियाद पर उनका विज्ञान जन्मा और उसी ने तकनीक को जन्म देकर आधुनिकीकरण की प्रक्रिया शुरू की लोकतंत्र, समाजवाद और साम्यवाद सहित अनेकानेक विचारों को जन्म दिया.

    केन विल्बर्स इस बिंदु पर एशियाई और अरब समाज पर तंज करते हुए कहते हैं कि इन मध्य पूर्वीय, दक्षिण एशिया और सुदूर पूर्वी देशों ने अपनी जमीन पर न लोकतंत्र की लड़ाई लड़ी न अपने धर्मों का कठोर मूल्यांकन करना सीखा न ही इतिहास को समझकर उससे भविष्य के लिए कोई मार्ग निकाला. ऐसी कौमों को लोकतंत्र और विज्ञान तकनीक इत्यादि उधार में मिल गये. वे आज भी इन महान विचारों को जीने के योग्य नहीं हुए हैं.

    कांचा आइलैया शेफर्ड और केन विल्बर्स की माने तो हमें इस मुल्क में विज्ञान तकनीक और इंजीनियरिंग मेडिसिन इत्यादि की बजाय साहित्य, कला, दर्शन, इतिहास समाजशास्त्र आदि पर जोर देना होगा.

    जो मुल्क विकसित और अमीर हैं वे ऐसे इसलिए हैं क्योंकि वे सभ्य हैं, सभ्यता पहले आती है और विकास या अमीरी बाद में आती है.

    भारत या एशिया के कई मुल्क एक न्यूनतम प्राकृतिक नैतिकता को भी नहीं सीख पाए हैं. इसीलिये वे असभ्य बर्बर और गरीब हैं. विज्ञान और तकनीक से वे अपनी गरीबी और समस्याएं कम नहीं कर रहे हैं बल्कि उसे बढाकर अपने ही गरीबों के खिलाफ इस्तेमाल कर रहे हैं.

    – संजय श्रमण

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