अमन शांति के लंबरदार बुद्धिस्टों का चरित्र !!

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बर्मा में रोहिंगिया मुसलमानों के कत्लेआम की चर्चाएं सोशल नेटवर्किगं और समाचार वेब साइटों पर तो दिखी मगर अफसोस !!!! इतने बड़े हादसे की सच्चाई या इस पर से पर्दा उठाने की ज़हमत ना तो भारत के किसी ख़बरिया चैनल ने की और ना ही दुनियां भर के किसी मीडिया हाउस की नज़र इधर गई। ये अलग बात है जब जब इंसानी खून धरती पर बहा है तब तब दुनियां ने इसका असर महसूस ज़रूर किया है। भले ही पूरी दुनिया का मीडिया इतनी बड़े नरसंहार को दबाने या इसको अपने अंदाज़ से सुलझाने की जुगत में हो, लेकिन ये हादसा इतिहास और दुनियां के बदलाव का एक बड़ा अध्याय बन जाए तो कोई ताज्जुब नहीं…। हो सकता है कि ईराक़, अफगानिस्तान समेत दूसरे कई मुस्लिम देशों की तरह हज़ारों मुसलमानों की हत्या होते देख चुके मीडिया के लिए बर्मा का नरसहांर कुछ नई सनसनी ना ला सका हो। या हो सकता है कि सनी लियोन और पूनम पांडे जैसे घृणित व्यक्तित्व को परोसने के नाम पर कोरोड़ों की डील कर चुके मीडिया के लिए कुछ हजार गरीब और बेबस मुसलमानों की जघन्य हत्या टीआरपी के पैमानों पर खरा ना उतरने वाला मसाला हो।

खैर बर्मा में मुसलमानों के नरसंहार के बाद बुद्धिस्टों का भी चरित्र सामने आ चुका है।
साथ ही पहली बार डेमोक्रेसी का मज़ा चख रहे बर्मा का भविष्य, दिशा और दशा भी सबके सामने आ चुकी है। लेकिन सबसे ख़ास और ज़रूरी बात यह है इस मौक़े पर दुनियां भर के मुसलमानों को भी अपने गिरेबान में झांक कर देखना होगा कि आख़िर गड़बड़ कहां है। क्या वजह है कि नागरिक हो या शासक, देश हो या बस्ती जिस भी संस्था के साथ मुस्लिम नाम जुड़ गया वो सरेआम अपमानित और किसी ना किसी रूप में पीड़ित ही नज़र आता है।
ईमानदार होना और इस्लाम का परचम लहरना एक बात मगर दुनिया मे रहकर दुनियादारी सीखना और तब ज़िंदगी जीना एक अहम बात है । अफ्रीका महाद्वीप मे एक देश है “गाम्बिया” जिसका शायद अक्सर लोगो ने नाम भी नही सुना होगा जिसकी आबादी केवल 19 लाख है जिसमे 90% मुस्लिम है और इस देश का ज़िक्र तभी आता है जब कोई ग़रीबी और भुखमरी पे अंतराष्ट्रीय रिपोर्ट आई हो क्यूंकी ये देश दुनिया के टॉप 10 ग़रीब देशो मे आता है और देश की पहचान ग़रीबी, भुखमरी,कूपोषण व आकाल है ये देश अफ्रीका महाद्वीप मे बसा सबसे छोटा मुल्क है यानी इस मुल्क की हैसियत दुनिया की ताक़तो के सामने उतनी भी नही जितनी की एक कुन्तल आटे मे चुटकी भर नमक की । लेकिन आपको ये जान कर हैरानी होगी की इस इंतेहाई ग़रीब देश ने रोहिंगिया मुसलमानो को अपने देश मे बसाने व उनकी देख भाल की पेशकश की है और दुनिया के ठीक्केदारो से सिर्फ़ इतनी सी अपील की है की इन मज़लुमो को बस उनके देश मे पहुँचा दिया जाय अब देखना दिलचस्प होगा की क्या इन देशो मे इतनी भी गैरत व इंसानियत बाकी है की वो कम से कम इस अपील पे ध्यान दे सके….???

इस समय कोई मुस्लिम देश आलम-ए-इस्लाम की लीडरशिप करने की सलाहियत रखता है और उसे खोलुस के साथ करने की कोशिश कर रहा है तो वो है तुर्कीव उसके राष्ट्रपति रजब ताएब उर्दगान…….इस पूरे मामले के बाद तुर्की के राष्ट्रपति रजब ताएब उर्दगान ने तुरंत 1 मिलियन डालर की सहायता का एलान किया और अपना मिलेट्री जहाज़ भी भेजा|
दरअसल इसे विस्तार से जानना जरूरी है कि असल मसला क्या है । रोहिंग्या मुसलमानों का मामला जून में नृशंस जनसंहार और लूटपाट की एक कार्यवाही के बाद दुनिया के ध्यान का केन्द्र बना किन्तू यह कोई अस्थाई विषय नहीं है। संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से विश्व के सबसे अत्याचारग्रस्त अल्पसंख्यक बताए जाने वाले रोहिग्या मुसलमानों के अतिरिक्त शायद दुनिया का कोई भी अल्पसंख्यक इस विषम स्थिति का शिकार नहीं हुआ। जिस देश में वह शताब्दियों से आबाद हैं वह उन्हें अपना नागरिक स्वीकार करने और मूलभूत अधिकार देने को तैयार नहीं है बल्कि व्यवहारिक रूप से जातीय सफाए के प्रयास में है। म्यांमार के राष्ट्रपति थीन सेन का आदेश कि हम अपनी ही जाति के लोगों की ज़िम्मेदारी ले सकते हैं किन्तु अपने देश में ग़ैर क़ानूनी रूप से प्रविष्ट होने वाले रोहिग्या मुसलमानों की ज़िम्मेदारी स्वीकार करना हमारे लिए असंभव है जो हमारी जाती से संबंध नहीं रखते। यह बयान उन्होंने कुछ दिन पूर्व संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवाधिकार आयुक्त नवी पिल्ली के उस बयान के उत्तर में दिया जो उन्होंने रख़ाइन में बहुसंख्यक आबादी के हाथों जनसंहार और लूटपाट का निशाना बनने वाले रोहिग्या मुसलमानों की स्थिति की समीक्षा लेने के बाद किया था। संयुक्त राष्ट्र संघ में मानवाधिकार आयुक्त की आशंकाओं के उत्तर में राष्ट्रपति थीन सेन ने आठ लाख मुसलमानों के विषय का “समाधान” यह पेश किया कि यदि कोई तीसरा देश उन्हें स्वीकार करे तो मैं उन्हें वहां भेज दूंगा, यह है वह चीज़ जो हमारी नज़र में विषय का समाधान है।

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या लाखों रोहिग्या मुसलमान राष्ट्रपति थीन सेन के क्षेत्र में रातों रात प्रविष्ट हो गये हैं जिन्हें देश से निकाल बाहर करना ही उनके अनुसार विषय का एकमात्र समाधान है या इन लोगों का कोई इतिहास या अतीत भी था या है? उनका अतीत क्या है और उनके पूर्वज कौन थे और अराकान में यह लोग कब से आबाद हैं। इन प्रश्नों का प्रमाणित उत्तर के समीषा करना या , इस विषय को समझने के लिए अतिआवश्यक है। रोहिग्या शब्द कहां से निकला? इस बारे में रोहिग्या इतिहासकारों में मतभेद पाये जाते हैं।मगर कुछ लोगों का मानना है कि यह शब्द अरबी के शब्द रहमा अर्थात दया से लिया गया है और आठवीं शताब्दी ईसवी में जो अरब मुसलमान इस क्षेत्र में ब्यापार के सिलसिले मे आये थे, उन्हें यह नाम दिया गया था जो बाद में स्थानीय प्रभाव के कारण रोहिग्या बन गया किन्तु दूसरे इतिहासकारों का मानना है कि इसका स्रोत अफ़ग़ानिस्तान का रूहा स्थान है और उनका कहना है कि अरब मुसलमानों की पीढ़ीयां अराकान के तटवर्ती क्षेत्र में आबाद हैं जबकि रोहिग्या अफ़ग़ानिस्तान के रूहा क्षेत्र से आने वाली मुसलमान जाती है। इसके मुक़ाबले में बर्मी इतिहासकारों का दावा है कि रोहिग्या शब्द बीसवीं शताब्दी के मध्य अर्थात 1950 के दशक से पहले कभी प्रयोग नहीं हुआ और इसका उद्देश्य वह बंगाली मुसलमान हैं जो अपना घर बार छोड़कर अराकान में आबाद हुए। राष्ट्रपति थीन सेन और उनके समर्थक इस दावे को आधार बनाकर रोहिग्या मुसलमानों को नागरिक अधिकार देने से इन्कार कर रहे हैं किन्तु यह दावा सही नहीं है।

रोहिग्या शब्द का प्रयोग अट्ठारहवीं शताब्दी में प्रयोग होने का ठोस प्रमाण मौजूद है। बर्मा में अरब मुसलमानों के प्रविष्ट होने और रहने पर सभी एकमत हैं। उनकी बस्तियां अराकीन के मध्यवर्ती क्षेत्रों में हैं जबकि रोहिग्या मुसलमानों की अधिकांश आबादी बांग्लादेश के चटगांव डिविजन से मिली अराकान के सीमावर्ती क्षेत्र मायो में आबाद है। अराकान में बंगाली मुसलमानों के बसने के प्रथम प्रमाण पंद्रहवीं ईसवी शताब्दी के चौथे दशक से मिलते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बर्मा पर जापान के क़ब्ज़े के बाद आराकान में बौद्धमत के अनुयाई रख़ाइन और रोहिंग्या मुसलमानों के मध्य रक्तरंजित झड़पें हुईं। रख़ाइन की जनता जापानियों की सहायता कर रही थी और रोहिंग्या अंग्रेज़ों के समर्थक थे इसीलिए जापान ने भी रोहिंग्या मुसलमानों पर जम कर अत्याचार किया। जनवरी वर्ष 1948 में बर्मा स्वतंत्र हो गया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वर्ष 1948 में कुछ रोहिंग्या मुसलमानों ने अराकान को एक मुस्लिम देश बनाने के लिए सशस्त्र संघर्ष आरंभ किया। वर्ष 1962 में जनरल नी विंग की सैन्य क्रांति तक यह आंदोलन बहुत सक्रिय था। जनरल नी विंग की सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध व्यापक स्तर पर सैन्य कार्यवाही की जिसके कारण कई लाख मुसलमानों ने वर्तमान बांग्लादेश में शरण ली। उनमें से बहुत से लोगों ने बाद में कराची का रूख़ किया और उन लोगों ने पाकिस्तान की नागरिकता लेकर पाकिस्तान को अपना देश मान लिया। मलेशिया में भी पच्चीस से तीस हज़ार रोहिंग्या मुसलमान आबाद हैं। बर्मा के लोगों ने लंबे संघर्ष के बाद तानाशाह से मुक्ति प्राप्त कर ली है और देश में लोकतंत्र की बेल पड़ी । वर्ष 2012 के चुनाव में लोकतंत्र की सबसे बड़ी समर्थक आन सांग सू की की पार्टी की सफलता के बावजूद रोहिंग्या मुसलमानों की नागरिक के दरवाज़े बंद हैं और उन पर निरंतर अत्याचार जारी है जो लोकतंत्र के बारे में सू के बयानों से पूर्ण रूप से विरोधाभास रखता है। अब भी विश्व जनमत के मन में यह प्रश्न उठता है कि बर्मा में लोकतंत्र की स्थापना के बाद क्या रोहिंग्या मुसलमानों का उनका अधिकार मिल पायेगा? …… अल-अजहर विश्वविधालयकाहिरा मिस्र से अन्श लिया गया ।

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47 thoughts on “अमन शांति के लंबरदार बुद्धिस्टों का चरित्र !!

  • June 3, 2015 at 5:52 pm
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    बर्मा मे जिस तरह मुसलमानो का नारसभार किया जेया रहा है इस की मिसाल इस सदी मे नही मिलती और पूरी दुनिया चुप छप इस नरसबहार को देख रही है. मुसलमान तमाशयी बनी हुई है. अब अगर इस नरसंहार के खिलाफ अगर किसी ने बर्मा मे इस का बदला लेना शुरु कर दिया तो यही मीडिया उसे दुनिया का सब से बड़ा आतंकवादी बता दे गी .

    दुनिया मुसलमानो को मजबूर कर रही है आतंकवादी बनने के लिये. संयुक्त राष्ट्र संघ, अमरीका और अपना भारत भी कुछ नही बोल रहा है.

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    • June 4, 2015 at 9:53 am
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      इराक और सीरिया में कौन किस को मर रहा है

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      • June 8, 2015 at 9:19 pm
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        ये भी एक मेनिया बीमारी है ……. बात वर्मा के है उत्तर चाहिए इराक के बारे मे ???

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  • June 3, 2015 at 8:08 pm
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    वहाब साहब बर्मा में जो हो रहा है वह निंदनीय और घर्णित है लेकिन यह एक देश का अंदरूनी मामला है जिस तरह कश्मीर पर पाकिस्तान के हस्तक्षेप को देखकर हम पूंछ दबे कुत्ते की तरह बिलबिला जाते हैं वही स्थिति बर्मा में भी ह। भारत खुद ही तमाम मुश्किलें झेल रहा ह। चौधरी बनने का कोई फायदा नहीं हम पहले भीचौधरी बन चुके श्रीलंका में क्या हुआ कुछ नहीं। और कोई भी सच्चा मुसलमान कभी भी आतंकवादी नहीं बनेगा वो लडेगा

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  • June 3, 2015 at 8:31 pm
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    वहाब जी आप ए बताये के मुस्लिम देशो ने इन बर्मा के मुसलमानो के लिये क्याकिया . मलेशिया और इंडोनेषिया की हुकूमत ने तो उन्हे समुंद्र मे मरने के लिये छोड़ दिया. किसी अरब मुल्क ने हमदर्दी के एक लफ्ज़ नही बोले सिर्फ टर्की को छोड़ कर.

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  • June 4, 2015 at 7:46 am
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    श्रेीलंका में हिंनदु थे इसलिये भारत ने भाग लिया ! किन्तु यहा मुस्लिम हैं इस लिये भारत क्युं बोलेगा ! ये कम बडेी त्रासदेी नहेी है किन्तु जब नहेी बोलना है तो बहुत बहाने हैं ! क्या इस से बडेी भेी मानवता के लिये कोइ त्रासदेी होगेी ??????????

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  • June 4, 2015 at 10:04 am
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    filhal islam men atankwadiyon ke liye koi maqaam nahi
    Jo atankwaad hai wah musalman nahi. Aajkal to hamari pyari bekau meadia ki daad deni hogi jo ISLAM ke khilaf action lene men kafi intrest le rahi hai. Haan kuch log bure kaam karke,aur buri buri baat bolkar ISLAM ko badnam karne ki bharpur koshish men lage huwe hain. but’ ISLAM aur tezi se falta fulta nazar aa rahahai. Agar yehi meadia ki intrest bhari chaplosi aur logo ki sajishen kisi dusray dharm pe lagi hoti to ham shayad us dharm ka naam tak nahi sunte.ek baat aur muslim ki pahchan dadhi,topi, lambe kurte, aur bhashad se nahi balki imaan aur uske ache kirdar,ekhlaq se hoti hai

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  • June 4, 2015 at 10:05 am
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    Agar shanti aman ka phaath ka theka lekar baith gay toh … Dusri kaum . Hukumat ke maksad me utar jaaygi convent toh rag rag me bhara hai inke ….. Matalb Buddhist . Hindu . Jain ye sab shanti aman ki baat kare . Aur piche se ye khaash samuday ke log convent karne yaqeen rakhe nahi bhai aaisa shanti nahi cahiye . Kyunki Buddhist Hindu cristen agar convent hota hai toh isme in dharm ko maan ne wale secular hai . Lekin ek khaash samuday me aisa kya ki wo apna mazhab chore toh us insan ko sariyat ke mutabik katle aam kar dete hai .. Isliye apni ray pori tarah spast kare media …..

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  • June 4, 2015 at 10:06 am
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    मित्रो अगर हर हिन्दुस्तानी नेता खुद को इतना ही हिंदुत्व का हितेषी समझता तो सबसे पहले अपने बंगलो के आँगन में या छतो पर एक भगवा ध्वज जरूर लगता हिन्दुओं को सालों बाद एक हिन्दू राष्ट्रवादी, विकास पुरुष मिला है उसका गौरव लेना चाहिए—- उसे अभी राज्यसभा में बहुमत दिलवाकर हिन्दुओ को अपना फ़र्ज़ निभाना है और उसके बाद ही दोनों सदन में मोदीजी की भाजपा से सभी मांगे कर सकते है——–लेकिन निजी स्वार्थ के लिए हिन्दू कोई न कोई बहाना बनाकर जब मोदी सरकार की बुराई करता है तो मुझे उस हिन्दू की अल्प द्रष्टि पर तरस आता है– आप समाजसेवी ,देशभग्त है और देश की गंदगी साफ करना चाहते है तो देश को साफ सुथरा और भारत को पुनःविश्वगुरु देखना चाहते है तो नरेन्द्र मोदी टीम से जुड़ कर हमारा साथ दे हमारे इस पेज से जुड़े https://www.facebook.com/pages/Harish-Arora/1451813741722628
    Harish Arora

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  • June 4, 2015 at 10:07 am
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    फेक न्यूज है. ऐसे ही पोस्ट डालकर आतंकवादी और दंगाई मुसलमानों ने पिछली बार असम मुंबई रांची में दंगे करवाए थे अब फिर वही फेक फोटो डालकर दंगाई मुसलमान फिर से आतंक और दंगा फ़ैलाने की कोशिश कर रहे हैं शायद. कृपया गूगल पर सर्च कर इस फोटो की सच्चाई पता कर लीजिए और इस पोस्ट का ज्यादा से ज्यादा रिपोर्ट कीजिये ताकि पोस्ट डिलीट हो और फिर से दंगा ना हो.

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  • June 4, 2015 at 10:21 am
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    बर्मा की सरकार का तो घिनौना चेहरा सामने आया ही. लेकिन एक पूरी दुनिया मे मुस्लिम उम्मा की वकालत करने वाले मुस्लिम देशो की भी पोल खुल गयी. मैने अल-जज़ीरा पे उन नाविको को देखा, जो इंडोनेशिया की सीमा पे अँग्रेज़ी मे अपने मुस्लिम होने का हवाला दे के रो रहे थे. अरब के हुक्मरान दुनिया भर मे अपनी हराम की कमाई का एक हिस्सा ज़कात के तौर पे बाँटते है. लेकिन इन्हे गले लगाने के लिए तैयार नही.

    इसी पे गौर करिए, सऊदी जाकिर नायक जैसे लोगो पे पैसा खर्च कर रहा है, जो इस्लाम को एक ईश्वर की आस्था से बढ़कर दाढ़ी, बुर्क़ा तक ले के जा रहे हैं. लेकिन मुस्लिम बंधुत्व नदारद है. इनकी सभाओ मे लाखो लोग, जिनमे से ज़्यादातर मुस्लिम ही होते हैं, इनकी बातो पे ताली पीटने वाले लोगो की क्या एक ईश्वर मे आस्था नही है, फिर वहाँ क्यूँ अपना कीमती वक्त बर्बाद करने जाते हैं.

    ऐसे लोग, सोशल मीडिया पे तो बर्मा, इजरायल, अमेरिका के द्वारा मुस्लिमो पे अत्याचार पे तो खूब लिख लेते हैं, लेकिन अरब के राजवंशी हुक्मुरानो के खिलाफ कुछ नही बोलते, जो ग़रीब मुसलमानो के साथ उठना-बैठना तक पसंद नही करते. ये कौनसी उम्मा की बात करते हैं.

    गहराई से समझिए की क्यूँ ये लोग, इस्लाम को एक ईश्वर मे अटूट आस्था तक परिभाषित नही करते. क्यूंकी फिर इनकी मज़हब की दुकान बंद हो जाएगी. कोई इन्हे भाव नही देगा. इसलिए ये लोग, 100 मे से 100 नंबर दिलाने की कोचिंग खोल के बैठते है, ये दुनिया के मुसलमानो पे अपना सिक्का चला के उनपे हुकूमत करना चाहते है.

    रोहिंगया मुसलमान, अगर हिंसा के रास्ते पे उतर जाए तो सऊदी उन्हे पैसा तो दे देगा, इस्लाम के नाम पे. लेकिन इन्हे गले नही लगाएगा.

    सऊदी-ईरान, मुस्लिम उम्मा की बात करते है, लेकिन इराक़, सीरिया, लेबनान, यमन, पाकिस्तान ना जाने कहाँ कहाँ अपने छद्म युद्धो को लड़ रहे है. खुद तो ये तेल के भंडार से एश कर रहे हैं, लेकिन दूसरी दुनिया के ग़रीब मुस्लिमो की तकदीर, एक अच्छी तालीम से खुलेगी, जिसे ये लोग अपने रूढ़िवादी विचारो से लेने नही देते. ताकि ये उनके आगे हाथ पैसार के खड़े रहे.

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  • June 4, 2015 at 10:33 am
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    वाहीद साहब, तुर्की भी क्या कर रहा है, सिर्फ़ लफ़फाजी या कुछ खैरात के जैसे पैसे फैंक कर. सऊदी भी कुछ पैसे फैंक देगा. गले कोई नही लगाएगा. ये मुसलमान इंडोनेशिया की सरहद पे तड़प तड़प के मर रहे थे. एक दिन नही रोए, पूरी दुनिया मे इनकी क्लीपिंग चल रही थी. मुस्लिम देश, ये सब देख रहे थे.

    अब इसी को गहराई से सोचिए की आज दुनिया मे सारे लोग मुसलमान हो जाए फिर क्या ग़रीब मुसलमान का शोषण ये हराम की कमाई वाले मुस्लिम देश नही करेंगे? क्या जाकिर नायक की सभा मे लाखो की भीड़ से इस ग़ुरबत का हल निकलेगा. ये कठमुल्ला तो फिर वोही बुर्क़ा, दाढ़ी, टोपी की ही बाते करेंगे. या फिर फलाँ फिरका, कुफ्र मे मुजाम्मिल है, फलाँ मुनाफिक है, की ही रट लगाएँगे.
    सारी दुनिया को निकम्मी बना कर सिर्फ़ इस्लाम, अहले किताब, अहले सुन्नत, अहले बेत की बातो मे मशगूल कर देंगे. हक़ीकत पहचानो, बेनकाब करो, इन क़ौम को जहालत मे डुबोने वालो को. वरना आने वाली नस्ले हमे माफ़ नही करेगी.

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  • June 4, 2015 at 10:40 am
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    शादाब साहब, दिल्ली मे हज़ारो रोहिंगया मुसलमान रहते हैं, जो इस देश मे अपने आप को बड़ा सुरक्षित समझते हैं. चुप रहने की बात है तो 50 से ज़्यादा मुस्लिम देश है, औरो की चुप्पी आपको नही खल रही है.
    ये लोग इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे मुल्को की सरहदो पे तड़प तड़प के मर रहे थे. वो देश, जो ज़कात के पैसे के लिए सऊदी अरब के आगे लार टपकाए रहते हैं.

    हम अपने गिरेबान मे नही झाँक के इस बेरूख़ी के लिए भी भारत, अमेरिका आदि को ही दोष दे. कैसी सोच है ये. आज मुस्लिम उम्मा की हवा मुस्लिम देशो ने निकाली. ये देश, मुस्लिम मुमालिको मे मुसलमानो के ही गले रेत रहे हैं. लेकिन अब भी हमे अमेरिका और भारत ही दोषी नज़र आ रहे है.

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  • June 5, 2015 at 2:09 am
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    मुहरम ज़ाकिर साहेब ! मेरा कमेंट छोटा सा था जो एक हिंदू भाइ के कमेंट का प्रति उत्तर था जिस् में भारत की बात की गयी थी मैं भी भारतिय हूं इसलिये अपने गिरेबान में झांक कर पने देश की प्रतिक्रिया की बात की थी ! सारी दुनिया की बात नही की थी ! क्या आप चाहते हैं कि आप जो चाहे वही मैं लिखूं ? फ़िर मैं मुस्लिम दुनिया की बात करता तो आप को एतेराज़ होता कि यहूदी दुनिया की बात क्यों नही किये ? आप के अनुसार क्या ये केवल धार्मिक समस्या है मानवी समस्या नही है ? एक देश और उसमें रहने वालों की ही समस्या है ! नस्ले इंसानी की समस्या नही है ! भारत मेरा देश है इसलिये भी मैंने भारत की बात की ! अब अगर आप चाहते हैं कि आप को मेरे चोटे से कमेंट में आप् जो चाहते हो वही लिखा हुआ हो तो ये आप की कमी है मेरी नही !
    आप को नज़र नही आता कमेंट में लोगो को आज भी विकास पुरुष ही नज़र आरहे है !वो विकास पुरुष जो सिकंदर को पटना तक पहुंचाते हैं ! श्याम प्रसाद मुखरजी को गुजराती मूल का बताते है ,और कश्मीर के बदले लंदन में मरने की बात करते हैं ! भगत सिंह को काला पानी की जेल की बात करते हैं संजीवनी बुटी हिमाचल के बद्ले नेपाल से लाने की बात करते हैं ! कितना मैं कहूं ऐसी बहुत सी बातें हैं ! किसान आत्महत्या कर रहे हैं पूंजिपतियों की धन संपत्ति में बे पनाह इज़ाफ़ा हो रहा है ! भू अधिग्रहण की बहुत जल्दी है मंहगाइ शिर्ष पर है ! संप्रदायिक दंगों का उत्थान है दलितों को ट्रेक्टर से कुचला जारहा है ! न्यायालय के कहने के बावजूद मस्जिद नही बनने दी जार ही है ! चर्च जलाये जारहे हैं ! फिर भी वो विकास पुरुष हैं, महामानव ,हैं हर हर हैं ! वाह क्या बात है !

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    • June 6, 2015 at 10:10 pm
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      शादाब भाइ
      मह्न्गयि बध रहि है घर परिवार का खर्च चल नहि पा रहा है सरकारि नौकरि मिल नहि रहि है किराये के मकान से पिच्हा नहि च्हुत पा रहा पैसा नहि मकान खेइद्ने को अपनि हि सम्सय्ये इतनि है कि कहा से सोचे मानवता के बारे मे

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    • June 8, 2015 at 9:26 pm
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      बेशक आपकी बात दुरुस्त है । आप लिखिए बस लिखिए सच्च सामने रखिए । इंका बिलबिलाना ये साबित करता है की सही नस पर अंगूठा दबाया गया है

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  • June 5, 2015 at 2:12 am
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    मुहरम की जगह पर मुहतरम पढा जाये !

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  • June 5, 2015 at 8:36 am
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    शरद भाई का कॉमेंट sharad saxena
    To Sikander Hayat Today at 12:13 AM
    Hayat Bhai,

    Due to some technical problem failed to post below mentioned comment on recent blog (अमन शांति के लंबरदार बुद्धिस्टों का चरित्र) of Mr Lions Hannan Ansari

    कौआ कान ले गया…यह सुन कर दो तरफ के एक्शन दिखने को मिलते है
    1-समझदार इंसान अपने कान को छू कर देखता है
    2-कठमुल्ला बिना कुछ सोचे समझे कौवे के पीछे दौड़ पड़ता है जो उसका कन ले भागा है 🙂

    पाकिस्तान मे मुसलमानो ने अपने ही मुस्लिमो के 143 मासूम बच्चो की जान ले ली कितने मुसलमानो ने उन कातिलो के खिलाफ जेहाद शुरु किया ?? कितने मुसलमान ब्लॉगर ने ब्लॉग लिखे ??

    इराक मे, पाकिस्तान मे, पूर्वी अफ्रीकी देशो मे रोज कई सौ मुसलमान अपने ही मुस्लिम “बिरादरो” द्वारा मारे जाते है पर ना किसी को उसमे हैवानियत नज़र आती है और ना ही नरसंहार जैसा ही कुछ नज़र आता है ??

    सारी दुनिया मे मजहबो का चरित्र देखने वालो एक बार (फकत एक बार) अपने गिरेबां मे झांक कर अपने चरित्र के भी दीदार तो कर लीजिये 🙂

    This is for information.

    Regards,

    Sharad

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    • June 8, 2015 at 10:07 pm
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      मोहतरम हयात साहब आपका क़सूर नही है सच्च मे कुकुर खांसी का कोई इलाज़ है ही नही !!!! ये अलग बात है मेरी दवा कड़वी है ।
      आप लोगो को एक बात बताता चलु यमन के हवाले से की “अमेरिका ने यमन मे 2002 से लेकर 2015 तक कन्फर्म ड्रोन हमला 90 से 109 किया है जिसमे से 639 लोग मारे गये है साथ मे 215 लोग घायल हुये है और इनमे से 96 आम नागरिक और 8 बच्चे शामिल है और इसके साथ ही उम्मीद की जा रही है की इन हमलो के अलावा संभावित हमलो की संख्या 73-89 है जिनमे 311 से 445 लोग मारे गये है और 105 लोग घायल है साथ मे गुप्त आप्रेशन जो किया गया है उसकी संख्या 72 है जिसमे 365 लोग मारे गये है और 102 लोग घायल हुये है”
      यानी की अगर तीनो को मिला दिया जाय तो अमेरिका द्वारा यमन मे हमलो की संख्या हो जाती है 235 से ले कर 270 और मारे गये लोगो की संख्या हो जाती है 1365 से ले कर 1449 और साथ मे 422 लोग घायल हुये है
      यमन मे तीन बड़े संगठन है एक सुन्नियो का “अल क़ायदा” और दूसरा”अल नुस्रा फ्रंट” और तीसरा शियो का “हूती” है लेकिन हैरानी की बात है की ये जीतने भी अमेरिका ने हमला किया है वो सब के सब अलक़ायदा और अल नुस्रा फ्रंट पे किया है और इन संगठनो के बड़े बड़े लीडरो को आप्रेशन के द्वारा मारा है लेकिन एक भी हमला अमेरिका ने शिया संगठन हूती पे नही किया है…..अगर किसी के पास सबूत हो तो वो साबित करे की अमेरिका ने किसी ड्रोन अटैक द्वारा शिया संगठन हूती के किसी लीडर के विरुद्ध आप्रेशन किया हो या इस संगठन पे ड्रोन अटैक किया हो…..साथ मे ये भी याद रखे की अभी कुछ दिन पूर्व कुछ अमेरिकन सेना यमन मे मौजूद थी जिसे अमेरिका ने वापस बुला लिया और साथ मे अमेरिका का इस संगठन पे एक भी हमला न करना ये दर्शाता है की अमेरिका के इशारो पे ईरान ने यमन मे मुदाखलत की और अमेरिका ने उसके लिये पहले ही ज़मीन तय्यार कर दी थी उन संगठनो की कमर तोड़ के जो इसकी लिये रोड़ा साबित हो सकते थे….कुछ समझ मे आया गेम…

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  • June 5, 2015 at 10:45 am
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    शादाब साहब, एक बार तो आप अपनी पहचान भारतीय बताते हैं, दूसरी तरफ हम बर्मा के सवाल पे भारत के रवैये को मूक सहमति बताते हैं. जबकि भारत मे रोहिन्गया मुसलमान सदियो से रह रहे हैं. इस मुद्दे पे हमे ओर् मुखर होना चाहिए था, मान लेते हैं. सबसे अधिक निंदा बर्मा और उसके लोगो की होनी चाहिए, इसमे कोई दो राय नही.
    मानवता के नाते उसके बाद किसी ओर पक्ष से इसमे सक्रिय भूमिका की अपेक्षा थी तो वो देश है इंडोनेशिया, जिसके तट पे ये लोग तड़प तड़प के अपनी जाने दे रहे थे. इंसान या मुसलमान किसी भी पहचान से इंडोनेशिया का दायित्व बढ़ जाता है.

    मैने मुस्लिम देशो का उल्लेख इसलिए किया की दुनिया के हर मुस्लिम ने इसे मुस्लिमो के उपर अत्याचार बताकर अपने मगरमच्ची आँसू बहा दिए. भारत के भी कई मुसलमानो की सोशल मीडिया पे पोस्ट मैने देखी. वो तब एक भारतीय से ज़्यादा मुस्लिम नज़र आ रहे थे. मुझे इससे कोई आपत्ति नही, लेकिन मुस्लिम उम्मा की बात करने वाले देशो की निष्क्रियता एक मुस्लिम के नाते क्या आपको नही खल रही?

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  • June 5, 2015 at 10:52 am
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    इस कमेंट पे लेखक लायंस अंसारी साहब भी गौर फरमाये की आपने जो फोटो इस लेख के साथ डाली है, वो झूठी है. और यह इस बात का प्रमाण है की मुस्लिमो पे अत्याचार की हर फोटो या पोस्ट को हम बिना सत्यापन के फॉर्वर्ड कर देते हैं.
    ये फोटो 2010 के चीन मे भूकंप के बाद, तिब्बती चीन की सरकार से निवेदन के लिए बौद्ध भिक्षुओ की है. जिसमे वो हाथ जोड़े हुए है.

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  • June 5, 2015 at 12:27 pm
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    FROM IMRAN RIZWI WALL

    बर्मा नरसंहार पर वही सेक्युलर मुसलमान सबसे ज़्यादा हल्ला मचा रहे हैं जो दशकों से भी अधिक समय से पाकिस्तान में जारी अहमदी/शिया/हिन्दू समुदायों के नरसंहार पर मुंह नही खोलते….
    गाज़ापट्टी पर तो ये सेक्युलर मुसलमान आठ आठ आंसू बहाते हैं लेकिन आईसिस के आतंक पर उन्हें चुप्पी का सांप सूंघ जाता है ।
    क्वेटा ब्लास्ट पर तो ये खामोश हो जाते हैं लेकिन कार्टून ब्लास्ट पर कुछ कलाकारों की हत्या कर देने वालों के खुले समर्थन पर उतर आते हैं….
    सेक्युलर मुसलमान
    ~इमरान~

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  • June 5, 2015 at 2:23 pm
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    हैरत है आप लोगों पर जिनका ये कहना है कि पेशावर में तालिबइल्मों की हत्या या क्वेटा, पर मुस्लिम कुछ नही बोलते जबकि हर ऐसे कुकर्मों पर मुस्लिम उल्मा की मज़म्मत आती है, जमीयतुल उलमा हिंद जगह जगह जाकर ऐलानिया कहती कै कि बेगुनाहों का खून इस्लामी शेआर नेही बल्कि एक बेकसूर इन्सान का कत्ल पूरे आलमे इन्सानी का कत्ल है इख्वान से लेकर सउदी मुफ़्ती ए आज़म इस पर खुले श्ब्दों मे ऐलान करते है कि आतंकवाद की किसी भी सूरत मे इस्लाम इजाज़त नही देता ! हर मुफ़्ती ये कहता है कुरान से लेकर हदीसें भी कहती हैं ! लेकिन आप लोगों को अगर सुनाइ नही दे या सुनना नही चाहें तो कोइ क्या कर स्कता है ! हज़ के खुत्बे से लेकर खाना ए काबा के जुमा के खुतबे में , आलम ए इस्लाम की अकसर हर मस्जिद में ये बात अक्सर कही जाती है ! क्योंकि ये इस्लाम का उसूल और उसकी शरीयत है ! इसके बाद भी आप लोगों को और क्या चाहिये ?? असल में अगर इल्ज़ाम ही मक्सूदे खातिर हो तो आप लोगों को कौन रोक सक्ता है ? मेरा बज़ाते खुद ये इमान है कि बेगुनाह के खून का बदला केसास है ! किन्तु फ़िलस्तीनी और चेचनिया मे अगर कुछ होता है तो वो आतंकवाद होजाता है ! और चौरी चौरा कांड में २८ अंग्रेज जलाये जाते है तो जलाने वाले मुहिब्बे वतन (देश भक्त) बन जाते है ! ऐसा क्यों है ? आप लोग ही इंसाफ़ से कहो ! मैं तो दोनों को ही मुहिब्बे वतन मानता हू ! कि दोनों का काम एक जैसा है उद्देश्य एक है , लेकिन आप लोग ऐसा नही मान सकते ! ये मुझे पता है ! क्यों ? इसका जवाब आप को खुद के अन्दर से मिल जाये गा !! देशभक्त इस्लिये नही बोलता कि इस्लाम, वतन या देश के लिये सर कटाना सिखाता है उसकी पूजा अर्चना करना नही , पूजा केवल अल्लाह या भगवान के लिये ही मखसूस है ,और ये भी कहूं कि संसार के और सारे देशों मे Pateriotism में पूजा पाट नही आता, आप आक्सफ़ोर्ड डिकशनरी में भी इसका मतलब देख सक्ते है ,ये सिर्फ़ भारत मे है जहां ब्रहमण समुदाय का काम ही पूजा और भक्ति के नाम पर निर्भर है !

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  • June 5, 2015 at 4:03 pm
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    In logo ko musalmano aur mjhabe islam me kami nikalne ki aadat si ho gai hai in ko apna kukarm nazar nahi aata hai koi adar cast ka maowadi aur bhi kai organization hai jo kitne armi aur police ko shahid kiya lekin wo inko nazar nahi ayega kyuki inke najar me ye samaj se pichhda hai govt iss pe dhyan nahi de raha hai isliye ye haq ke liye lad raha hai lekin ek musalman ek kashmiri indian armi se sataya hua jinke ijjat ko ye log pamal karte hain aur agar musalman awaz utha ta hai to wo atankwadi hai ye dogli niti hai in logo ko

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  • June 5, 2015 at 10:29 pm
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    शादाब साहब आप पता नही किसकी बात कर रहे है मगर हमने तो एक भी विरोध प्रदर्शन ऐसा नही देखा जैसा मुम्बई मे रज़ा अकादमी ने 50,000 मुस्लिमो को इकट्ठा करके अपने ही देश के शहीदो के स्मारको पर तोड-फोड़ करके किया था ?? और वजह 🙂 वजह वही कही से किसी का बर्मा (म्यांमार) मे मुसलमानो पर ज्यादती का कोई एक फोटो और दौड़ पड़े 50,000 (बिना कुच सोचे समज्हे) उस कौवे के पीछे जिस पर उनके कान ले जाने की खबर मार्केट मे आई थी 🙂

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  • June 5, 2015 at 10:38 pm
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    ब्लॉगर महोदय और उनके साथ सुर-ताल मे कोरस गाने वालो से बड़े अदब से दरखवास्त है कि बराये मेहरबानी खबरो की उस फेक्ट्री का खुलासा का खुलासा तो करे जहा से ऐसी खबरे बना कर बाहर निकाली जाती है 🙂

    क्या ये ताज्जुब की बात नही कि फोन, इंटरनेट, सेटेलाइट से लैस इतने सारे न्यूज़ चॅनेल्स जिनकी पहुंच दुनिया के चप्पे-2 पर इस कदर है कि कही चूहा भी मर जाये तो किसी ना किसी चेनल पर वह खबर दिख ही जाती है !!…..और इतना बड़ा नरसंहार होने की खबर बाकी किसी को मालूम नही ??

    गुस्ताखी माफ मगर आप लोगो को धर्मान्धता की रतौंधी की ऐसी बीमारी लगी हुई है जिसका तुरंत इलाज करवाना आपकी बेहतर सेहत के लिये माकूल होगा…..

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  • June 5, 2015 at 10:58 pm
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    ईद आने को है, 2 साल पहले भी इसी तरह का माहौल बनाया गया था पूरे देश का माहौल खराब हो गया थ। इस साल फिर से वही हो रहा ह

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  • June 6, 2015 at 12:08 am
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    सारी पोस्ट और कमेण्ट को सही मानते हुए मेरी सभी इस्लाम के ऊपर ईमान रखने वालों से ये दरख्वास्त है कि बर्मा प्रकरण को लेकर आत्म चिंतन करें, ऐसी कौन सी वजह है कि बर्मा का शासन अपने देश में आबाद रही एक विशेष कौम को जबरदस्ती निकाल रहा है और पूरी दुनिया से मदद छोड़िए, सहानुभूति नहीं मिल रही है. मानव इतना निर्दयी कभी भी नहीं हो सकता. मुस्लिम समुदाय का समाज के अन्य समुदायों के मन-मस्तिष्क में कैसी छवि बन गई है और क्याें? मुस्लिम समुदाय के बुद्धिजीवियों को स्वयं आगे आकर इसे परिवर्तित करना होगा एक वाक्या मेरे साथ हुआ, मेरे तीन मुस्लिम मित्र जो ३० सालों से मेरे मित्र थे, एक अन्य मुस्लिम से मेरा विवाद होने पर जो उन्हें जानता भी नहीं था, की ओर से मुझसे लड़े.

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  • June 6, 2015 at 4:27 pm
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    इस्स पेज पर जो तस्वीर हे वह चीन मे हुए भुकम्प की हे

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    • June 7, 2015 at 9:28 pm
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      हो सकता है फोटो चीन का हो. हम ने इसे संकेतित रूप मे इस्तमाल किया है . इन दिनो सोशियल मीडिया पर 90 % फोटो फेक है . जिस तरह गलत फोटो का इस्तमाल मीडिया मे हो रहा है समाज के लिये खतरा है.

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  • June 8, 2015 at 10:08 am
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    ब्लॉगर हो या मेडियाकर्मी, उनसे आशा की जाती है कि वे कलम चलाने से पहले उस खबर की सच्चाई सुनिश्चित करे. हन्नान आंसारी साहब द्वारा अपने लेख मे लगाई फोटो अगर म्यांमार मे मुसलमानो के कत्लेआम की नही है तो उन्हे साम्प्रदायिक भावनाये भड़काने की अपनी बेहद शर्मनाक गलती के लिये इस साइट के सभी पाठको से हाथ जोड़ कर माफी माँगनी चाहिये !!

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  • June 8, 2015 at 11:03 am
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    शरद जी

    आज इसी विषय पे एक लेख प्रकाशित किया जाये गा , अवश्य पड़े किस तरह गलत फोटो का इस्तमाल भड़कने के तौर पे हो रहा है.

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    • June 8, 2015 at 3:14 pm
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      हमे इंतजार रहेगा अफ्झल सहब और ऐसे झूठे फोटो का भड़काने वाली बातो के लिये इस्तेमाल करने वालो का विरोध बिना उसका मजहब और जात देखे सभी को करना चाहिये क्योकि ऐसी बातो से माहौल बिगाडता है और भगदड और दंगो की बुनियाद रखी जाती है….और जब भगदड, दंगे होते है तो उस समय ना किसी की जाट पूछी जाती है और ना ही मजहब !! इसलिये ऐसे मुट्ठी भर लोगो का विरोध अनिवार्य है….

      हिन्दू मुसलमान अपने-2 पक्ष के ऐसे भड़काने वालो पर चुप रहेंगें या दूसरे पक्ष की तरफ इशारा करके जुस्टिफाई करेंगे (आपके वाले ने भी तो…) तो फिर इनको खामोश कौन कर पायेगा 🙂

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  • June 8, 2015 at 11:27 am
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    ये बात हन्नान साहब जैसे मुस्लिम कट्टरपंथी ही नही. हिंदू कट्टरपंथी भी करते हैं. मुज़फ़्फ़र नगर दंगे से पहले जिन दो जाट लड़को एक झगड़े मे हत्या हो गयी थी, उसका झूठा विडीओ वायरल किया गया. उस विधायक संगीत सोम को बीजेपी ने विशेष सम्मानित किया.
    इसके अलावा, मैने कई पोस्ट फेस्बुक पे पाकिस्तान की शिया मस्जिद मे हुए हमले को हिंदू मंदिरो मे हुए हमले की तरह प्रचारित होते देखेी है. दो ये दोनो कौमो के कट्टरपंथियो के साथ है.

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  • June 8, 2015 at 3:07 pm
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    बिल्कुल !! हिन्दू कट्टरपंथि भी ऐसा ही करते होंगे मगर वैसा राजनेता करते है ब्लॉगर लेवल पर गलत फोटो का इस्तेमाल कर झूठ और नफरत इस स्तर तक फैलाने वाले हिन्दू कट्टरपंथि आपको अव्वल तो नज़र ही नही आयेंगे और अगर एकाध दिख भी गया तो उसी ब्लॉग पर हिन्दू पाठक ही उसके विरोध मे अपनी प्रतिक्रिया देते अवश्य दिख जायेंगे !! वैसा नज़ारा मुस्लिम ब्लॉगर्स के ब्लॉग्स पर मुस्लिम पाठको द्वारा कम ही दिखता है …..ये वो कड़वा सच है जो सॉफ-2 नज़र आता है !!

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  • June 8, 2015 at 7:41 pm
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    शरद जी, मैं यहाँ कौन कट्टरपंथी बड़ा है या छोटा है की बहस नही करना चाहता. शिया मस्जिद मे विस्फोट की जिस तस्वीर का मैं ज़िक्र कर रहा हूँ, उसे मैने जब फेसबुक पे देखा था तो उसे 5 हज़ार लोगो ने सिर्फ़ 4 महीने मे शेयर कर दिया था.
    जब मैने उन लोगो के प्रोफाइल की बाकी पोस्ट्स देखी तो वो किस संगठन से प्राभावित है, वो भी स्पष्ट हो गया.
    समस्या यह है की जब कोई व्यक्ति इस देश को हिंदू राष्ट्र बनाने की बात करता है, तो बहुसंख्यक जनता उसे आतंकी या पोटेंशियल आतंकी नही मानती. बल्कि कई लोग ऐसे लोगो को राष्ट्र-भक्तो का संगठन भी कहते हैं. जबकि 4 बम ब्लास्ट के केसो मे उनसे जुड़े संगठनो के लोग अभियुक्त भी है. इस सबके बावजूद एक आम हिंदू इन संगठनो को इतना बड़ा ख़तरा नही मानता, जितना 15% मुस्लिमो के कट्टरपंथियो को मानता है.

    मैं यह कतई नही कह रहा की हिंदू समुदाय, इन ख़तरनाक संगठनो के खिलाफ आवाज़ नही उठा रहा, लेकिन एक बड़ा वर्ग इनके प्रति उदासीन है. यही हालत कम या अधिक मुस्लिम तबके मे भी है. आम मुस्लिम, कट्टरपंथी नही है लेकिन इन कठमुल्लाओ के नकारात्मक प्रभावों के प्रति इतना सचेत नही. लेकिन मेरे, सिकंदर साहब और अफ़ज़ल भाई की तरह आवाज़ उठाने वाले भी हैं.
    मेरा सिर्फ़ यही कहना है की आप जैसे समझदार लोगो को आर एस एस जैसे संगठनो के प्रति और मेहनत से लोगो को आगाह करना चाहिए. ऐसे संगठन हमारा भी काम मुश्किल करते हैं.

    Reply
    • June 8, 2015 at 10:18 pm
      Permalink

      सही कहा जाकिर भाई ऐसा वैसा नहीं बल्कि बेहद मुश्किल बना रहे हे कभी कभी में भी भविष्य के बारे में सोच कर बेहद तनाव में आ जाता हु सोचता हु की हम लोगो का हमारे लेखन भला क्या फ्यूचर हे सिवाय लगातार बढ़ती सरदर्दी के ? अब खेर चलो बर्मा का छोड़ो भारत की ही बात करे तो श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट के बाद अब फिर से हाशिमपुरा के आरोपियों को भी सजा नहीं हुई और इसका भी जवाब मुस्लिम महफ़िलो में हमारे से ही माँगा जाएगा और भड़काऊ नेता और उर्दू के भड़काऊ अखबार न्याय के लिए लड़ते नज़र आएंगे और हम जैसे विलेन और उदासीन माने जाएंगे जैसे देखे एक लाख बार कश्मीरी पंडितो के बारे में लिखने वाले बरसो से बक बक कर रहे तरुण विजय जैसे लोग हो या उर्दू के भड़काऊ ये तो एकतरफा टर्र टर्र करने वाले तो अपनी टर्र टर्र से अपने लिए बहुत कुछ हासिल कर लेते हे ( रज़्य्सभा सीट संपादक सीट विज्ञापन आदि ) मगर हमारे हिस्से में सिर्फ चौतरफा ताने तिश्ने ही आते हे अब एक साहब गल्फ से अफज़ल भाई को फोन करके कहते हे की सिकंदर जैसे लोग तो हिन्दुओ को खुश करने में लगे रहते हे भला कोई बात हे ऐसा हे तो हिन्दू कटटरपन्ति भी क्यों हमारे लेखन के ”खून के प्यासे ” हे क्यों हमने मोदी जी के बाद नम्बर टू अजित डोभाल साहब के खिलाफ लिखा ?

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      • June 9, 2015 at 6:45 am
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        जो गल्फ वाले साहब साहब हमें कहते हे की हम हिन्दुओ को खुश करने में लगे रहते हे तो में उन्हें पूरा समय देता हु जब चाहे नेट पर कही भी हिन्दू कटटरपन्ति के साथ इतनी लम्बी बहस करके दिखा दे हम तो ऐसी सेकड़ो बहस कर चुके आप सिर्फ एक बार करके दिखा दे किसी भी मुद्दे पर जैसे यहाँ अज़ान की बात हो रही थी देखे https://khabarkikhabar.com/archives/556

        Reply
  • June 9, 2015 at 12:11 am
    Permalink

    पाकिस्तान के पेशावर मे TTP यानी की तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने एक फ़ौजी स्कूल पर हमला कर के करीब 126 लोगो को मौत के घाट उतार दिया मैं इस हमले की कड़ी आलोचना करता हू लेकिन एक बात अर्ज़ कर दू की ये हमला क्यू किया गया उस पर ज़रा गौर किया जाय और इस हमले से इस्लाम को न जोड़ा जाय इसका मैं पसमंज़र क्या है उस पर ज़रा ध्यान दे की पाकिस्तानी फौज ने क़बायली इलाक़ो पर पिछले कई महीने आपरेशन कर रही है और आपरेशन के कारण रमज़ान जैसे मोकद्दस महीने मे करीब 10 लाख से अधिक लोग बेघर हुए और उसका कारण पाकिस्तान की अमेरिका के इशारो पर आपरेशन था अगर कोई पाकिस्तान के अंदुरूनी मामलात से वाक़िफ़ होगा या वहाँ की मीडीया से तो उसको मालूम होना चाहिए की इस आपरेशन की शुरू से पाकिस्तान की सबसे बड़ी धार्मिक पार्टी जमीयत उलमा-ए-इस्लाम ने खुल कर विरोध किया था क्यूंकी उस आपरेशन के यही नतीजे होने वाले थे और होकूमत को चेताया भी था की इस आपरेशन से लोगो के अंदर सिर्फ़ नफ़रत बढ़ेगी लेकिन होकूमत ने उनकी बातो पर कान न धरते हुए अमेरिकी हुक्म के आगे घुटने टेक दिए आप एक तरफ तो इस हमले के खिलाफ जम कर लिखते है लेकिन दूसरी तरह जिस कारण से इन्होने हमला किया उस पर चुप्पी साधते है बेशक़ ये हमला बिल्कुल ग़लत है और इसको जिसने भी अंजाम दिया है उस पर सख़्त कारवाई करनी चाहिए

    Reply
  • June 9, 2015 at 12:12 am
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    लेकिन आप जो वज़ीरिस्तान और क़बायली इलाक़ो पर बमो की बारिश कर रहे है उनके मोतालबात नही सुन रहे और उनके साथ इलाक़े की बुन्याद पर तस्सूब बरत रहे है तो भाई ये इंसानी फितरत है की जब किसी का परिवार मारा जाय तो वो बदले की आग मे अँधा हो जाता है और वो सब कुछ कर गुज़रता है जो वो कभी न करता अगर उसके साथ वो सब न किया गया होता अगर आप लोग पाकिस्तान और उसके क़बायली इलाक़ो व वज़ीरिस्तान और अफ़ग़ान मामलो के सबसे बड़े जानकार मे से एक जनाब सालिम साफ़ी साहब का प्रोग्राम”जिरगा विथ सालिम साफ़ी” देखते होंगे जो की जियो टीवी पर आता है तो उन्होने शुरू से ही इस तरह के हमले का होकूमत को सतर्क रहने की और आपरेशन के न करने के कारण का कारण बता दिया था और अब भी वक़्त है पाकिस्तानी होकूमत को अमेरिका के सामने घुटने टेकने से इनकार करना होगा और इन सब हमलो का कारण ढूँढ कर उनका खोलुस के साथ हल करना होगा वरना तो हालत सुधारने के आसार कम ही नज़र आते है

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  • June 9, 2015 at 8:02 am
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    गलती जमील की और थप्पड़ पड गया खलील के गाल पर 🙂

    अब पाकिस्तान की हुकूमत ने फ़ौज़ के दम पर वजीरिस्तान और कबाइली इलाको मे द्रोन मिसाइलो से हमले किये तो बदला फ़ौज़ीओ और उनके ठिकानो पर हमले करके लेना था मगर कायर आतंकवादियो ने वैसा ना करके मासूम बच्चो को बेरहमी से बम से उड़ाने मे अपनी बहादुरी ?? दिखाई जिससे दुनिया की सहानुभूति तो मिलने से रही….आप जैसे कुछ बुढ़िजीवी समर्थको को छोड़ कर ?? उन् मासूम बच्चो से आतंकवादियो और इस्लाम को कौन सा खतरा हो गया था जो उनकी जान ले ली गयी ? इसी तरह से इराक मे छोटी-2 बच्चियो और महिलाओ से आई-एस आतंकवादियो और इस्लाम को कौन सा खतरा हो गया है जो खुले बाझार मे उनकी बोली लगाई जा रही है और रोज गॅंग रेप किये जा रहे है ?? सच स्वीकार करने का कलेजा भी होना

    आप पेशावर के हमले की आलोचना करने की बात तो करते है पर साथ मे इतने अगर-मगर लगा कर साबित भी कर देते है कि आलोचना दिल से नही बल्कि दवाब मे करने के लिये मजबूर है

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  • June 9, 2015 at 9:57 am
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    हन्नान साहब, आप हमेशा ठीकरा दूसरो के सर फोड़ना चाहते हैं, जैसे वज़ीरिस्तान पे हमला, अमेरिका के आगे घुटने टेक देने से हो रहा है. तो जनाब, वज़ीरिस्तान और क़बायली इलाक़ो मे तालिबान अपने हिसाब का शरिया नाफिज़ करना चाह रहा है. बच्चियो के स्कूल उड़ा रहा है, टीवी, रेडियो पे पाबंदी लगा रहा है, बुर्क़ा कम्पल्सरि कर रहा है. कोई भी संप्रभु देश, अपने देश के एक हिस्से मे ऐसी अराजक और हिंसक समानांतर सरकार नही चाहेगा. इस बात के लिए, पाकिस्तान सरकार की तारीफ़ करनी चाहिए. इसके अलावा, सिविल सोसायटी के दवाब के बावजूद, सरकार ने हमले से पहले बातचीत का ही रास्ता अपनाया था. लेकिन लगातार हमलो के बाद, सेना और सरकार को एक पेज पे आना पड़ा.

    लेकिन TTP ने अपनी लड़ाई को इस्लाम की लड़ाई क्यूँ बोला है, इस्पे गहराई से सोचिए. इनके मुताबिक, वो इस्लाम की बेहतर व्याख्या कर रहे हैं, और सरकार मौलिक इस्लाम से बच रही है, उनसे लड़ रही है. तालिबान चाहे वो पाकिस्तानी हो या अफ़ग़ानिस्तान, वो संपूर्ण इस्लामी राज्य जो शरिया पे आधारित हो के लिए लड़ रही है. अब इनका शरिया तो आप को मालूम ही है. वैसे मुझे ताज्जुब नही होगा की आप इनके इस्लामी वर्ज़न की भी हिमायत करे तो.

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    • June 9, 2015 at 11:41 am
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      इस दुनिया में भले और शांति और इन्साफ के लिए लड़ने वालो लोगो की कोई कमी भी नहीं हे एक अमेरिकन श्वेत लड़की फिलीस्तीनियों के घर बचाते हुए इज़राइली बुल्डोज़रो के नीचे आ गयी पिछले साल भी जब मुस्लिम देश आपसी लड़ाई में उलझे तब भी इन्ही लोगो ने इज़राइल के वहशियों को रोक था बर्मा के मुस्लिमो को भी चाहिए की वो अपनी लड़ाई इन्ही लोगो के साथ मिल कर लड़े मुस्लिम यूनिटी के चक्कर में तो बिलकुल न पड़े मुस्लिम यूनिटी सुप्रियॉरिटी इक्वेल्टी प्रेक्टिकल में कही नहीं हे अपनी लड़ाई लड़े मगर कश्मीरियों ख़ालिस्स्तानियो श्रीलंकन तमिलो आदि वाली गलती ना करे और वहाबियों आदि को तो पास भी ना फटकने दे

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      • June 9, 2015 at 11:45 am
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        बर्मा के मुस्लिमो पर अत्याचार की खबरे भी मगरिबी मिडिया के माध्यम से आ रही हे और जब यही मिडिया मुस्लिम देशो में गैर मुस्लिम पर घोर अत्याचार की खबरे देता हे तो हम उसे ”यहूदी मिडिया ” का प्रोपेगेंडा बताते हे

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  • June 9, 2015 at 1:13 pm
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    वो कहते हैं ना कि “बुरा जो देखन मे चला, बुरा ना मिलया कोई, जो खुद देखा, आपने मुझसे बुरा ना कोई”

    ज़्यादातर लोग, हर समस्या के लिए दूसरो के सर ठीकरा फोड़ते हैं. मुस्लिम कट्टरपंथी जब अमेरिका और इजरायल को ही दोष देते हैं, तो भूल जाते हैं की “इस्लाम या मुसलमानो के सबसे बड़े दुश्मन देश अमेरिका” मे इस्लाम के प्रचार-प्रसार पे कोई रोक नही. जबकि ज़्यादातर मुस्लिम देशो मे दूसरे लोगो के धार्मिक और राजनैतिक अधिकार भी कम है. जब कोई मुस्लिम संगठन या कट्टरपंथी आतंकी हमला कर दे तो वो नाइंसाफी के खिलाफ स्वाभाविक प्रतिक्रिया. लेकिन जब कोई गैर मुस्लिम ऐसा करे तो वो मुस्लिमो पे हिंसा. अपने भीतर कोई भी कट्टरपंथी, किसी भी मज़हब, पंथ का हो, नही झाँकता.

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  • June 9, 2015 at 1:45 pm
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    जिस समय मुंबई में बर्मा के मुस्लिमो के लिए तोड़फोड़ करवाई जा रही थी ठीक उसी समय पाकिस्तानी हिन्दू लड़की कठमुल्लाओं की फैलाई सस्ते में सवाब की सनक की शिकार हो रही थी भारतीय मुस्लिम नेताओ उर्दू अखबारों ने इस पर चु तक करने की ज़हमत नहीं उठाई थी यही नहीं प्रोपेगेंडा वही घिसा पीटा की ये हिन्दू लडकिया खुद ही मुस्लिम लड़को पर और इस्लाम पर फ़िदा होकर ये शादिया कर रही हे एक बड़े मुस्लिम ब्लॉगर भी जब यही बकवास कर रहे थे मेने उनका कड़ा विरोध किया था तो दीन ईमान की बड़ी बड़ी बाते करने वाले ये धर्म प्रचारक और एक और इनके ही जैसे साहब दोनों मेरे खून के प्यासे हो गए थे और इन्हे तब तक चेन नहीं आया था जब तक की उन्होंने दोनों ने व्यंगय में कहु तो ”मेरी पीठ पर छुरा ” नहीं मार लिए था

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