अखलाख की हत्या पर भारी साहित्य अकादमी का सम्मान

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रविन्द्र नाथ टैगोर को 1913 में नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया और 1915 में इंग्लैंड की महारानी ने “सर” की उपाधि से सम्मानित किया । यूं टैगोर की ख्याती तो दुनिया में पहले से थी लेकिन नोबल और “सर” की उपाधि के सम्मान ने टैगोर की कृतियो को दुनिया भर में एक नई पहचान भी दी । खासकर अंग्रेजी भाषा ही नहीं बल्कि ब्रिटिश सत्ता के तहत जितने भी देश रहे, जिन्हें हम मौजूदा वक्त में कामनवेल्थ देश के नाम से जानते है कमोवेश हर जगह टैगोर के साहित्य को सभी ने जाना। सभी ने पढ़ा । जाहिर है दुनिया भर की कई भाषाओ में टैगोर की कृतियों का प्रकाशन हुआ । लेकिन अप्रैल 1919 में जब जलियांवाला बाग नरसंहार हुआ तो रविन्द्रनाथ टैगोर ने 31 मई 1919 को वायसराय को खत लिख कर ना सिर्फ जलियावालाकांड को दुनिया की सबसे त्रासदीदायक घटना माना बल्कि ब्रिटिश महारानी के दिये गये सम्मान को भी वापस कर दिया । और जब वह पत्र कोलकत्ता से निकलने वाले स्टेट्समैन ने छापा तो ना सिर्फ भारत में बल्कि दुनियाभर में जलियावाला घटना की तीव्र निंदा भी हुई और टैगोर के फैसले पर दुनियाभर के कलाकार-साहित्यकारों ने अपने अपने तरीके से सलाम किया । तब ब्रिटिश सरकार और दिल्ली में बैठे ब्रिटिश गवर्नमेंट के नुमाइन्दे वायसराय का सिर भी शर्म से झुक गया । और उस वक्त ब्रिटिश सरकार भी यह कहने नही आई कि अगर उसने सर की उपाधि ना दी होती तो कामनवेल्थ देशों में टैगौर को कौन जानता ।

इसलिये सम्मान लौटाना है तो 1915 के बाद दुनियाभर में जिस तरह सर की उपाधि पाने के बाद टैगोर को जो सम्मान मिला उसे वह लौटा दें । या फिर सम्मान लौटाने का जिक्र कर टैगोर महात्मा गांधी की राह पर निकल कर सतही सियासत कर रहे है । क्योंकि टैगोर ने तो सिर्फ एक पत्र लिखा है । तो उस वक्त जो शर्म जो नैतिक दबाब ब्रिटिश गवर्नमेंट तक में आया उस तरह की शर्म या नैतिक दबाब मौजूदा वक्त में भारत के ही सस्थानों साहित्यकार और संपादको में कितना बचा है । यह सवाल इसलिये क्योंकि 6 अक्टूबर को नयनतारा सहगल और अशोक वाजपेयी ने जब दादरी कांड और पीएम की चुप्पी के विरोध में साहित्य अकादमी सम्मान वापस करने के एलान किया तो उसके दो दिन बाद ही समाचार पत्र जनसत्ता ने पहले पेज पर अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के हवाले से रिपोर्ट छाप कर साहित्यकारों के सम्मान लौटाने को उस सम्मान से जोड़ दिया जो सम्मान देने के बाद अकादमी ने साहित्यकारों के लिये काम किया । जरा कल्पना कीजिये जनसत्ता जैसे अखबार में बिना कोई सवाल उठाये साहित्य अकादमी के यह बोल छपते है कि , ‘जो नाम और यश उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से मिला, उसे हम कैसे वापस लेंगे ? ‘ बकायदा अकादमी ने कहा कि सम्मान दिये जाने के बाद इन साहिकत्यकार की किताबों का अकादमी ने दसियो भाषाओ में अनुवाद किया , उसे कैसे वापस लिया जा सकता है । यानी झटके में साहित्य अकादमी ने साहित्यकारों की कृत्तियो से भी खुद को ज्यादा महत्वपूर्ण मान लिया । और चूंकि साहित्य अकादमी के मौजूदा अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी कोई नौकरशाह नहीं बल्कि कवि आलोचक है तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या मौजूदा वक्त में साहित्यकार-कवि भी पद पर बैठकर देश के हालातों को देखने के लिये अपने आप में सत्ता बन रहे हैं। क्योंकि साहित्य अकादमी के अध्यक्ष का कहना अपने आप में कुछ इस तरह का खुला एलान है जिससे लगता है कि साहित्य अकादमी ना होता या वह साहित्यकारों को सम्मान ना देता तो साहित्यकारो को जो यश मिला है वह न मिलता । और सम्मान या पुरस्कार लौटाने की बात कहना दरअसल साहित्यकार की समाज को लेकर संवेदनशीलता नहीं बल्कि सियासी ताम-झाम है । फिर इससे पहले साहित्यकार उदय प्रकाश ने भी साहित्य अकादमी के पुस्कार को लौटाने के एलान किया था । और अब मलयाली उपन्यासकार सारा जोसेफ ने भी सम्मान लौटाने का फैसला किया । हालाकि इस कतार में आधा दर्जन कन्नड लेखक है जिन्होने कुलबर्गी की हत्या के बाद कन्नड साहित्य अकादमी का सम्मान लौटाया ।

और इसी कतार में मलयाली कवि के सच्चिदानंदन और लेखक पी के परक्कादावू ने साहित्य अकादमी की सदस्यता छोडने का निर्णय लिया । यानी मौजूदा वक्त में समाज में जो घट रहा है उससे हर तबके में एक चिंता तो जरुर है। क्योंकि कुलबर्गी, दाभोलकर, पंसारे और अखलाख की हत्या के बाद भी राज्यसत्ता का नजरिया सियासत करने और सत्ता पर पकड मजबूत बनाये रखने के लिये अपने अंतर्रविरोध का भी राजनीतिक इस्तेमाल करने का ही रहा है । मुश्किल तो यह है कि साहित्यकार, लेखक, संपादकों की व्यक्तिगत पहल की विरोध के स्वर उठा रही है। लेकिन वह भी बुलबुले की तरह उठ कर दब जा रही है । क्योंकि सरोकार की भाषा हर स्तर पर खत्म कर दी जा रही है । कोई सीधा संवाद किसी भी माध्यम से लेखक–पाठक के बीच बन नहीं पा रहे है । संपादक भी कमरों में कैद है और साहित्यकार भी । पाठक भी कमरों में कैद है और लेखक भी । संस्थानो को लगने लगा है कि वह समाज से बड़े हो चले है । क्योकि समाज कोई समूह तो है नहीं । गिनती में चाहे दिल्ली की जनसंख्या दो करोड़ हो । और किसी लेखक की कोई एक साहित्यकृत्ति ही लाखों में बिक जाती हो लेकिन उसे पढ़ने वाले अपनी अपनी जगह अकेले ही है । ठीक वैसे ही जैसे नयनतारा सहगल हो या अशोक वाजपेयी या उदय प्रकाश अपने साहिकत्यकर्म से तो लाखो पाठको तक पहुंचते हो । लेकिन यह सभी अपने-अपने दायरे में अकेले है । वही किसी भी सरकारी संस्थान के साथ सत्ता होती है । यानी सत्ता के साथ खडे होने का एहसास संस्थान को भी अपने आप में सत्ता बनाने का एहसास जगा देती है । वजह भी यही है कि कोई लेखक जब साहित्य अकादमी की इस सोच पर कलम चलाता है कि अकादमी ने साहित्यकारों को यश और सम्मान किताबों को छाप कर पहुंचाया तो उसकी सोच भी अकदमी को मान्यता देने लगती है क्योकि अकदमी को खुद को सत्ता बना चुकी है । मसलन साहित्य का सुधीश पचौरी की कलम जब एक दूसरे अखबार हिन्दुस्तान में चलती है तो वह साहित्य अकदमी की सोच को सही ठहराते है । अकादमी के अध्यक्ष के बयान को गुगली मान कर उनकी प्रतिभा के कायल हो जाये है। और यह कहने से नहीं सही मानने से नहीं कतराते कि अकादमी लौटाते हो तो उससे प्राप्त कीर्ति भी लौटाओ। और पचौरी जी तो किसी साहित्यकार के विरोध को टीवी चैनलों की बहस या खबरो के बीच रहने के प्रोपगेंडा से आगे मानते भी नहीं है । यानी सवाल सिर्फ समाज के भीतर खिंची जाती लकीर भर का नहीं है बल्कि बदलते नजरिये और संवादहीनता से उभरे खालीपन का भी है । जो हर विचार को प्रचार तंत्र के दायरे में माप कर निर्णय सुनाने की स्थिति पैदा कर रहा है । तो इंतजार किजिये जब टैगोर के विरोध को भी कोई सत्ता ,संस्थान या साहित्यकार यह कहकर खारिज कर देगा कि उन्होने खुद के प्रचार और नाम कमाने के लिये जलियावाला नरंसहार का विरोध किया ।

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19 thoughts on “अखलाख की हत्या पर भारी साहित्य अकादमी का सम्मान

  • October 14, 2015 at 2:34 pm
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    पाठको यहाँ कई जगह हमने बज़रंगियो के झूठ दिखलाय हे अब आप देखिये की झूठ बोलने में ये संघी भी कितने माहिर होते हे झूठ सिर्फ ये बेनामी बज़रंगी ही नहीं फैलाते हे बल्कि संघ का राष्ट्रिय मुखपत्र भी बेशर्मी से झूठ फैलाते हे http://panchjanya.com//Encyc/2015/10/12/%E2%80%98%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%AC%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B6-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%97-%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%82%E0%A4%B9%E0%A5%80-%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%82-.aspx इस बार पाकिस्तानी मानवाधिकार कार्यकर्त्ता फौज़िया सईद का बयान वो भी तीन साल पुराना उसे ऐसे पेश किया हे मानो कल ही इन्हे ही इंटरव्यू देकर उन्होंने ये बात कही हो https://www.youtube.com/watch?v=3uWmi6NhpSs 21 : 20 से देखे की उन्होंने जबरन धर्मान्तरण की आदि की बात नहीं की ज़बदस्ती की बात ज़बदस्ती इन संघियो ने खुद ही घुसेड़ी
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  • October 14, 2015 at 6:04 pm
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    पाठको यहाँ कई जगह हमने बज़रंगियो के झूठ दिखलाय हे अब आप देखिये की झूठ बोलने में ये संघी भी कितने माहिर होते हे झूठ सिर्फ ये बेनामी बज़रंगी ही नहीं फैलाते हे बल्कि संघ का राष्ट्रिय मुखपत्र भी बेशर्मी से झूठ फैलाते हे इस बार पाञ्चजन्य में पाकिस्तानी मानवाधिकार कार्यकर्त्ता फौज़िया सईद का बयान वो भी तीन साल पुराना उसे ऐसे पेश किया हे मानो कल ही इन्हे ही इंटरव्यू देकर उन्होंने ये बात कही हो https://www.youtube.com/watch?v=3uWmi6NhpSs 21 : 20 से देखे की उन्होंने जबरन धर्मान्तरण की आदि की बात नहीं की ज़बदस्ती की बात ज़बदस्ती इन संघियो ने खुद ही घुसेड़ी

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  • October 14, 2015 at 6:22 pm
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    Ye is desh ka durbhagya hai ki Ek jawan Deshraj Mara jata hai to usko UP sarkar 5 lakh deti hai,Fir ek police inspector Mishra ji ko cattle mafiya goli marten hain to UP government 10 lakh dete hain per kisi karan se Akhlak Mara gaya to UP govt 45 lakh deti hai.
    Bas aise hi or bhi wakaya hain .
    Delhi main Sikh Dange hue shyad soye hue the aap,
    Kashmir se panditon ko mar bhagaya tab bhi, Sikhon ko Shirinagar main line se khade ho gar goliyan mari tab bhi .. Kitna. Lamba sote ho sahitya kar ji tab atma nahi jagi.
    Appeasement ki bhi had hoti hai … Ju samaj ko volcano per baithadete hain .Ek sipahi or ek police officer ki koi value nahi hai on duty per Jan dene ki .per vote chahiye to kon sa apna paisa hai lootado ,sahityakar ji ko kon janta tha per ab apna nam chamkana hai

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  • October 14, 2015 at 6:22 pm
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    Returning “Puraskarams” these few writers intend to tarnish the image of good-governance of Modi Govt and defame the nation worldwide, as a part of their anti-nationalist activities ! Why they are afraid of speaking or writing against the fascist approach/activities of our leftists, duly supported by some paid-media ! Where were these writers when a great social reformer & proletarian leader like TP Chandrasekharan was butchered by the CPM in Kerala ; where were these literary stooges, when Jayakrishnan Master was brutally killed in front of innocent children in a primary school class room also in North Kerala; where were these ‘award-winning’ writers when thousands of hapless Hindus were thrown out from their home land of Kashmir ? On 24×7 basis they used to scream on Gujarat riots, but where were these screamers when 100 helpless Kar Sevaks were burnt to death in one or two bogies of a train; Where were these mute & spineless writers when hundreds of innocent people died due to Mumbai bomb blast and similar other terrorist attack; Am neither a RSS man nor a Sangh Parivar member, but the pseudo secularist thinking of our leftists along with their parasite writers make hundreds of people may go with RSS way, if this biased attitude of our writers continues like that !

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    • October 16, 2015 at 9:35 am
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      प्रीत सिंह जैसे लोगो पे इसलिए गुस्सा आता है कि वो दादरी जैसी घटनाओ के पीछे जो सोच है, उसकी मुख़ालफ़त कभी नही करेंगे. इसमे बीजेपी या मोदी का क्या दोष, संघ का क्या दोष कहने के बाद, ये नही सोचेंगे कि उस भीड़ की सोच किस स्कूल से निकली है. और इसी वजह से दूसरा कट्टरपंथ सिर उठाता है. दोनो एक दूसरे के पूरक है, एक दूसरे को प्रश्रय दे रहे हैं. प्रीत सिंह जैसे लोगो को देश से कोई मतलब नही है. इनकी प्रिय पार्टी और ज़हरीले विचारो का समाज मे बोलबाला रहे. इनके जैसे लोगो की वजह से ओवैसी लोकप्रिय होता है. वहाब चिश्ती और हसन ख़ान जैसे लोगो की वजह से योगी आदित्यनाथ मलाई ख़ाता है.

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  • October 15, 2015 at 4:33 pm
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    जी न्यूज के एडिटर सुधीर चौधरी ने लेखकों को जो नसीहत व सलाह दी है, उसे लेकर सोशल मीडिया पर लोग काफी भड़क गए हैं. घनघोर भाजपाई पत्रकारिता करने वाले सुधीर चौधरी को एक्स कैटगरी सुरक्षा भी मोदी सरकार ने दी है. इसके बाद तो सुधीर को जो जी में आता है, जी न्यूज पर लाइव बक देते हैं. उनकी इस बकबक से जी ग्रुप समेत समस्त मीडिया जगत की इज्जत तार तार हो रही है. लेकिन आजकल सेटिंग गेटिंग रेवेन्यू रिलेशन के चक्कर में कौन पत्रकारिता व नैतिकता को देखता है. हां, सोशल मीडिया पर लोग अपने अपने तरीके से भड़ास निकाल कर अपनी प्रतिरोध जरूर दर्ज करा देते हैं. पढ़िए, सुधीर चौधरी ने क्या सलाह दी और उसे लेकर सोशल मीडिया पर लोग क्या क्या लिख रहे हैं, कुछ चुनिंदा स्टेटस व कमेंट्स नीचे पेश है. -एडिटर, भड़ास4मीडिया

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    • October 16, 2015 at 9:57 am
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      ये जो सुधीर चौधरी है, वो सुधीनद्र कुलकर्णी एपीसोड पे पूरा एक स्पेशल प्रोग्राम करता है. कहता है, हम उसपे स्याही फैक्ने का विरोध करते हैं, लेकिन ये भी सोचिए कि क्या सुधीनद्र कुलकर्णी जैसी हिम्मत पाकिस्तान मे हो पाती, क्या पाकिस्तान मे भी उसके समर्थन मे मीडिया की सहानुभूति जगती….. लेकिन हम उसपे स्याही फैंकने का विरोध करते हैं…….लेकिन पाकिस्तान……लेकिन पाकिस्तान……..लेकिन…
      अरे भाई, वैसे तो ये पाकिस्तान का बारीकी से विश्लेषण मे नाकाम है, इनके बूते की बात नही है, माईक्रो एनालिसिस करना.
      अरे भाई, पाकिस्तान इन 65 सालो मे कहाँ खड़ा है, और भारत कहाँ खड़ा है. पाकिस्तान उन्ही सुतियापो की वजह से वहाँ खड़ा है, जिसका सुधीर चौधरी बखान कर रहा है, और तुम उसी राह पे चलना चाहते हो?
      अरे सीखना है, तो अमेरिका, जापान, फ्रांस आदि से सिखो. भारत इन 65 सालो मे पाकिस्तान से इसीलिए आगे रहा, क्यूंकी यहाँ सुधीर जैसी मानसिकता के लोगो की सरकार नही थी. अब आ गयी है, तो इसका असर 15-20 वर्षो मे दिख जाएगा.
      पाकिस्तान से मोहित होकर, पाकिस्तान को उसीकि भाषा मे जवाब देके, उसीकि भाषा बोलकर, उसीके रास्ते चलकर, उसीके जैसे बनने जा रहे हैं हम.

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  • October 16, 2015 at 9:45 am
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    इन साहित्यकारो के पुरूस्कर लौटाने के पीछे की पीड़ा को कोई नही समझेगा. क्यूंकी प्रीत सिंह जैसे लोग, बैठे ही हैं ना धृतराष्ट्र बनके. ये इन साहित्यकारो पे ही अंगुली उठाएँगे. इन जैसे जाहिल सिपाहियो के होते हुए काल्बुर्गी या पानसेरी की हत्या, चिंता का विषय नही बन पाएगी.

    ये कूप-मन्डूक लोग, ऐसी बाते करने वालो को सिकुलर, खानग्रेस कह के मुँह बंद करा देंगे. अरे भाई हमने कब कश्मीरी पंडितों के विस्थापन को सही ठहराया, हमने कब पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को सही ठहराया. लेकिन ये धूर्त लोग, मोदी के शोर तले, जो नये आतंकी संगठन पनप रहे हैं, उससे ध्यान हटाने के लिए, कश्मीरी पंडित, सिख दंगे आदि का कुतर्क करने लग जाएँगे. ऐसे लोग सोशल मीडिया पे भी छाए हुए हैं.

    अरे भाई, दो ग़लत मिलके एक सही नही बन्त. इनके तरीका कुछ ऐसा है कि केंसर से लड़ने के लिए, शरीर मे एड्स घुसा दो. शक्ति संतुलन हो जाएगा, शरीर स्वस्थ हो जाएगा.

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  • October 16, 2015 at 10:56 am
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    हालात इतने ख़राब हो चुके हे की एक राज्य का मुख्यमंत्री बज़रंगी सड़कछाप गुंडों की तरह ब्यान भी दे रहा हे और अफवाह भी फैला रहा हे की ”अख़लाक़ ने कोई भी कोई आपत्तिजनक बात कही थी ” अंदाज़ा लगाइये की सौ खून कर चुके कातिल को भी हज़ारो लोगो की भीड़ घेर ले तो वो भी कोई ” आपत्तिजनक ‘ बात करने की हिम्मत बिलकुल नहीं करेगा और यहाँ एक बुजर्ग दुआरा भीड़ के सामने आपत्तिजनक बात करने की अफवाह संघी ट्रेनिंग लिए हुए एक सी एम फैला रहा हे

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  • October 16, 2015 at 12:51 pm
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    ज़रा सोचिये की ईमानदार कौन हे ? मोदी समर्थक पत्रकारों की लिस्ट और उनके कारनामे पता कीजिये दैनिक जागरण ज़ी न्यूज़ सुधीर चौधरी रजत शर्मा चन्दन मित्रा आदि दूसरी तरफ मोदी विरोधी माने जाने वालो को देखिये रविश कुमार पुण्य प्रसून विनोद शर्मा दीपक शर्मा आदि खुद ही फैसला कीजिये

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  • October 16, 2015 at 1:48 pm
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    इन लोगो का असली चेहरा निकल के सामने आ रहा है. हम तो शुरू से इनकी नीयत जानते थे. विकास के नारे के पीछे अपनी बदनीयती को छुपा के इन्होने चुनाव लड़ा, जीता. इसमे वो उदारवादी लोग अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं, जिन्होने हिंदुत्व के नाम पे नही, अपितु विकास के नाम पे वोट दिया था. जो इस देश को बांग्लादेश या पाकिस्तान की जैसी गर्त के रास्ते मे नही धकेलना चाहते थे.
    अभी भी अनेक भोले भाले लोगो को इस असलियत का नही पता. हो सकता है, कि उनको होश आए तो यहेी हो कि
    “सब कुछ लुटा के होश मे आए तो क्या किया?”
    इस सरकार का भीकास से कोई लेना देना नही.इनका एकसूत्री एजेन्डा नफ़रत के बीज बोके, वोटो की फसल काटना है.

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  • October 16, 2015 at 3:03 pm
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    लेकिन एक बार फिर साबित हो गया हे की आखिर क्यों साहित्य को समाज की मशाल कहा जाता हे सवर्गीय अन्नतमूर्ति ने तो देश पर छाने वाले मोदी नाम के ग्रहण और अँधेरे के बारे में सबसे पहले ही बता दिया थ तो अब साहित्यकारों ने इस ज़हरीली सरकार का ज़हरीलापन दुनिया के हर कोने तक पंहुचा दिया हे शीबा असलम फहमी लिखिति हे ”;किसने सोचा था की सहारा ढूंढने की उम्र वाले कलमकार सवा सौ करोड़ अवाम वाले इस नौजवान देश का इतना मज़बूत सहारा बनेंगे? शशदर हम जब नाउम्मीदी के दलदल में बेरोक धंस रहे थे, जब जंतर-मंतर में हमारे गले सूख गए थे, जब हुकूमत से शह पाये हत्यारे-गिरोह इस मिटटी के पंसारों की दोनों आँखों के बीच नली रख दाग़ रहे थे, जब सत्ता के अभयदान प्राप्त हमारे दाभोल्करों को सुबह सवेरे गोली मार रहे थे, जब किसी भी बेचारे को घर-बिस्तर से खींच कर कुचल कुचल के मारा जा रहा था, और ऐलान हो रहा था की मौत का ये नंगा नाच जारी रहेगा, जब सीनाजोरी सबसे निर्लज्ज अवस्था में आँख में आँख डाले खड़ी थी, जब अँधेरा सबसे ज़्यादा घना हो चला था, तभी अवाम के कलमकारों ने उम्मीद की डोर थाम ली। 2010 में ‘साहित्य और मीडिया’ पर अविनाश दास द्वारा मोहल्ला डॉट कॉम के मंच से आयोजित ‘बहसतलब’ गोष्ठी में हिंदी साहित्यकार राजेंद्र यादव ने कहा था की ‘साहित्यकार बेहतर प्रवक्ता हो सकते हैं समाज के’. आज साहित्यकार प्रवक्ता से आगे जा कर कर्णधार हो गए इस गरु दौर के.

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    • October 16, 2015 at 3:04 pm
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      अश्लील पूँजी का ये कैसा घना कुहासा था की अर्थतंत्र की धुरी पर घूमती दुनिया की कान पर जूं नहीं रेंग रही थी, विदेशों में बसे इंसाफ़पसन्द भारतीय हर बार अपना विरोध दर्ज कर रहे थे, भारत के पीड़ित और इंसाफ़पसन्द हर वैकल्पिक मंच पर गुहार लगा रहे थे. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में दुनिया की सबसे ग़रीब अवाम के बीच, दुनिया के सबसे अमीर भी बस्ते हैं लेकिन पूँजी के इन शहंशाहों को सिर्फ अपनी लूट से मतलब है- उन्होंने हर मीडिया-मंच खरीद लिया है, इस तरह वो दुनिया को भरमा कर खुश हैं की बात दबी रह जाएगी, कि तभी हिंदी के हरदिल अज़ीज़ लेखक उदय प्रकाश ने एक ऐसी मुनादी लगा दी जो देखते ही देखते महानाद में बदल गयी. उदय प्रकाश पर आरोप रहा है की कुछ साल पहले उन्होंने गोरखपुर के विवादास्पद योगी अदित्यानाथ जैसे हिंदुत्वा और साम्प्रदायिकता के प्रतीक पुरुष से सम्मान ले लिया था, इस लिहाज़ से ये सबसे मुनासिब भी था की उदय प्रकाश ही हिंदुत्वा के भस्मासुर पर पहला वार करें. १२ सितम्बर को उन्होंने साहित्य अकादमी द्वारा दिया गया पुरस्कार, शाल, 100,000 /- नक़द और ताम्रपत्र अकादमी को वापिस लौटा दिया ये कहते हुए की अकादमी द्वारा सम्मानित कन्नड़ साहित्य के लेखक एम एम कालबुर्गी की नृशंस हत्या और अन्य लेखकों पर हमलों पर साहित्य अकादमी बेशर्मी से खामोश है.

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      • October 16, 2015 at 3:05 pm
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        शुरुआत में वही हुआ जिसके लिए हिंदी साहित्य की दुनिया जानी जाती है, नैतिकता के सवाल यहाँ बहुत अखरते हैं, यानी सरकार से उम्मीद लगाये बैठे मठाधीश तिलमिला गए, सोशल मीडिया पर उनके चाकर अपनी सारी मेधा झोंक के उपहास उड़ाने आ गये. लेकिन जो क़दम इतिहास की ज़रुरत होता है, अगर वो ले लिया जाये तो इतिहास बना देता है. उदय प्रकाश के बाद मशहूर और बेख़ौफ़ लेखक नयनतारा सहगल, जिन्होंने इंदिरा गांधी का इमरजेंसी के दौरान विरोध किया था, ने अपना अकादमी अवार्ड वापिस कर दिया और देखते ही देखते देश भर के 41 बड़े लेखक, रंगकर्मी, बुद्धिजीवी इस कारवां में जुड़ गये. यानी इस नाज़ुक लम्हे में कश्मीर से केरल तक भारत का दिल और दिमाग़ एक जुट है।

        देश की अब तक की सबसे संवेदनहीन सरकार जिसके कृषि मंत्री कहते हैं की किसान नाकाम-इश्क़ और नाकाम-सेक्स के कारण आत्महत्या कर रहे हैं, जिसकी वरिष्ठ मंत्री देश के संविधान के बजाय अपने धर्म की किताब को राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित करती हैं, जिसके मंत्री मीडिया को वैश्या जैसा बिकाऊ बता कर नामकरण करते हैं ‘प्रेस्टीट्यूट’, जिसके नेता विपक्ष को ‘हरामज़ादे’ कहते हैं, जिसके मंत्री संविधान को धता बता कर भारत को एक धार्मिक राष्ट्र मानते हों, और जिसके मंत्री बात-बात पर पाकिस्तान चले जाने का हांका लगते हों , और अवाम इस सब को अवाक बर्दाश्त कर रही हो, उस मजबूर दौर में अपने होने को सार्थक करते ये बुद्धिजीवी अपने त्याग और दुस्साहस के लिए उस सूची में दर्ज रहेंगे जिसमे प्रतिरोध का इतिहास जगमगाएगा.

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  • October 16, 2015 at 3:12 pm
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    ऐसे समय में मुनवर राणा ने इस फासिस्ट सरकार से झुझ रहे बुजुर्ग लेखको को शायद थके हुए लोग कहा हे जबकि ये साहित्यकार जवानो से अधिक जवान सिद्ध हुए हे मुन्नवर राणा ने हमारी इस बात पर ही मोहर लगाई हे की अधिकांश मुस्लिम लेखको बुद्धजीवियों ने केवल सेकुलरिज़म की मलाई खायी हे कभी सेकुलरिज़म की लड़ाई नहीं लड़ी गैर मुस्लिमो के बीच बैठ कर प्यारी प्यारी बाते करके बहुत कुछ पाया मगर मुस्लिम महफ़िलो में बैठ कर कठमुल्लशाही के खिलाफ चु करने की भी इनकी मज़ाल नहीं हुई हमने तो बहुत पहले ही भाप लिया था की उपमहादीप में बढ़ता मुस्लिम काटरपंथ आखिरकार एक ज़हरीली शुद्ध संघी सरकार लाने में ही मदद करेगा व्ही हुआ भी अब ये संघी सरकार अपनी हरकतों से मुस्लिम काटरपंथ को और अधिक हवा देगी

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  • October 21, 2015 at 4:09 pm
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    गाय के ऊपर हरिशंकर परसाई ने लगभग 3 दशक पहले एक लेख लिखा था, आज के माहौल को देखते हुए लगता है कि ये आज भी प्रासंगिक है.

    “एक गोभक्त स्वामी से भेंट”

    सवाल – स्वामी जी आप तो गाय का दूध ही पीते होंगे ?

    जवाब – नही बच्चा हम भैंस का दूध पीते है। गाय कम दूध देती है और पतला देती है। भैंस के दूध की बढ़िया मलाई और रबड़ी बनती है।

    सवाल – तो क्या सभी गोभक्त भैंस का दूध पीते हैं?

    जवाब – हां बच्चा लगभग सभी।

    सवाल – तब तो भैंस का माता मानना चाहिये आखिर जिसका दूध पियो वही न माता हुई। पर आप लोग गौ को माता मानते हो।

    जवाब – यानी हम भैस को माता — बच्चा तर्क तो ठीक है पर भावना दूसरी है।




    सवाल – खैर छोड़िये मान लो गौ माता आके आंगन मे सूखता गेहूं खाने लगे तो आप क्या करेंगे?

    जवाब – बच्चा उसे डंडा मार कर भगा देंगे।

    सवाल – पर वह तो पूज्य है आपको हाथ जोड़ कर कहना चाहिये “माता मैं कृतार्थ हो गया, सब गेहूं खाजा”

    जवाब – बच्चा क्या तुम हमे मूर्ख समझते हो ?

    सवाल – नही मै तो आपको गो भक्त समझता था।

    जवाब – सो तो हम है लेकिन इतने मूर्ख भी नही कि गेहूं खा जाने दें।

    सवाल – फ़िर स्वामी जी ऐसी कैसी पूजा कि हड्डी का ढांचा बन के फ़िर मोहल्ले मे कागज कपड़ा पालिथिन खाती फ़िरे और जगह जगह खाना चुराने पर पिटे।

    जवाब – यह कोई अचरज की बात नही हमारे यहां जिसकी पूजा की जाती है उसकी दुर्दशा भी की जाती है। यही सच्ची पूजा है, नारी को भी तो पूज्य मानते है कि नहीं उसकी जैसी दुर्दशा वो तो जानते ही हो।

    सवाल – स्वामी जी यह कैसी पूजा विदेशो मे तो पूजते भी नही पर अच्छे से रखते हैं ध्यान रखते हैं।

    जवाब – बच्चा दूसरे देशो की बात छोड़ो, हम बहुत उंचे हैं। देवता इसलिये ही सिर्फ़ हमारे यहां अवतार लेते है। दूसरे देशों मे दूध के लिये और मांस के लिये पाली जाती है हमारे यहां दूध के लिये कम और दंगे के लिये आंदोलन कर सत्ता हथियाने के लिये उपयोग मे लाई जाती है । इसलिये वह पूज्य है माता है। जनता जनार्दन और गौ माता।

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    • October 21, 2015 at 4:15 pm
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      उपरोक्त कमेंट लेख “गाय ना गंगा” की बजाय ग़लती से इस पे डाल दिया.

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  • October 21, 2015 at 4:12 pm
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    धर्म शास्त्र पे जब अर्थ शास्त्र भारी पड़ जाता है तो गौ-रक्षा वाले जूतो की दुकान खोल लेते हैं (हरिशंकर परसाई)

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